उद्योग पर्व · अध्याय 76
श्रीकृष्ण द्वारा भीमसेन को आश्वासन
श्रीकृष्ण बताते हैं कि उन्होंने भीमसेन का मन परखने के लिए ही स्नेहवश वैसा कहा था, क्योंकि वे उनकी महिमा भली-भाँति जानते हैं। वे दैव और पुरुषार्थ पर विचार करते हैं: सुविचारित योजना भी दैव से विफल हो सकती है, फिर भी पुरुषार्थ बहुत कुछ जीत लेता है, और फल दोनों के मेल से मिलता है; इसलिए बुद्धिमान असफलता में दुखी और सफलता में हर्षित हुए बिना कर्म करता है। वे अगले दिन धृतराष्ट्र के पास जाकर शान्ति का प्रयत्न करेंगे; यदि कौरव न मानें तो युद्ध का भार भीमसेन पर होगा, धुरा अर्जुन सँभालेंगे और श्रीकृष्ण उनके सारथि होंगे।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 1 (5.76.1)
भावं जिज्ञासमानोऽहं प्रणयादिदमब्रवम् । न चाक्षेपान्न पाण्डित्यान्न क्रोधान्न विवक्षया ॥
bhāvaṃ jijñāsamāno'haṃ praṇayādidamabravam | na cākṣepānna pāṇḍityānna krodhānna vivakṣayā
मैंने यह बात स्नेहवश, आपका भाव जानने के लिए कही थी—न आपको चिढ़ाने के लिए, न अपनी चतुराई दिखाने के लिए, न क्रोध से, और न आपसे आपका परिचय कहलवाने के लिए।
श्लोक 2 (5.76.2)
वेदाहं तव माहात्म्यमुत ते वेद यद्बलम् । उत ते वेद कर्माणि न त्वां परिभवाम्यहम् ॥
vedāhaṃ tava māhātmyamuta te veda yadbalam | uta te veda karmāṇi na tvāṃ paribhavāmyaham
मैं आपकी महिमा जानता हूँ, आपका बल भी जानता हूँ और आपके कर्मों को भी जानता हूँ। मैं आपका तिरस्कार नहीं करता।
श्लोक 3 (5.76.3)
यथा चात्मनि कल्याणं संभावयसि पाण्डव । सहस्रगुणमप्येतत्त्वयि संभावयाम्यहम् ॥
yathā cātmani kalyāṇaṃ saṃbhāvayasi pāṇḍava | sahasraguṇamapyetattvayi saṃbhāvayāmyaham
हे पाण्डव, आप अपने में जितने कल्याणकारी गुण मानते हैं, मैं आपमें उससे हजार गुना अधिक मानता हूँ।
श्लोक 4 (5.76.4)
यादृशे च कुले जन्म सर्वराजाभिपूजिते । बन्धुभिश्च सुहृद्भिश्च भीम त्वमसि तादृशः ॥
yādṛśe ca kule janma sarvarājābhipūjite | bandhubhiśca suhṛdbhiśca bhīma tvamasi tādṛśaḥ
हे भीम, सब राजाओं द्वारा पूजित जिस कुल में आपका जन्म हुआ है, और जैसे आपके बन्धु और मित्र हैं, आप भी वैसे ही हैं।
श्लोक 5 (5.76.5)
जिज्ञासन्तो हि धर्मस्य सन्दिग्धस्य वृकोदर । पर्यायं नाध्यवस्यन्ति देवमानुषयोर्जनाः ॥
jijñāsanto hi dharmasya sandigdhasya vṛkodara | paryāyaṃ nādhyavasyanti devamānuṣayorjanāḥ
हे वृकोदर, धर्म के विषय में जिज्ञासा करने वाले लोग उसे संदिग्ध पाते हैं; वे निश्चय नहीं कर पाते कि उसकी गति में दैव और मनुष्य का कितना-कितना भाग है।
श्लोक 6 (5.76.6)
स एव हेतुर्भूत्वा हि पुरुषस्यार्थसिद्धिषु । विनाशेऽपि स एवास्य सन्दिग्धं कर्म पौरुषम् ॥
sa eva heturbhūtvā hi puruṣasyārthasiddhiṣu | vināśe'pi sa evāsya sandigdhaṃ karma pauruṣam
जो बात मनुष्य के प्रयोजनों की सिद्धि का कारण बनती है, वही उसके विनाश का कारण भी बन जाती है; पुरुषार्थ का फल संदिग्ध होता है।
श्लोक 7 (5.76.7)
अन्यथा परिदृष्टानि कविभिर्दोषदर्शिभिः । अन्यथा परिवर्तन्ते वेगा इव नभस्वतः ॥
anyathā paridṛṣṭāni kavibhirdoṣadarśibhiḥ | anyathā parivartante vegā iva nabhasvataḥ
दोष देखने वाले विद्वानों ने जिन कार्यों को एक प्रकार से निश्चित किया हो, वे वायु के झोंकों की तरह दूसरे ही प्रकार से पलट जाते हैं।
श्लोक 8 (5.76.8)
सुमन्त्रितं सुनीतं च न्यायतश्चोपपादितम् । कृतं मानुष्यकं कर्म दैवेनापि विरुध्यते ॥
sumantritaṃ sunītaṃ ca nyāyataścopapāditam | kṛtaṃ mānuṣyakaṃ karma daivenāpi virudhyate
भली-भाँति विचारा गया, अच्छी तरह संचालित और न्यायपूर्वक सम्पन्न किया गया मनुष्य का कर्म भी दैव से बाधित हो जाता है।
श्लोक 9 (5.76.9)
दैवमप्यकृतं कर्म पौरुषेण विहन्यते । शीतमुष्णं तथा वर्षं क्षुत्पिपासे च भारत ॥
daivamapyakṛtaṃ karma pauruṣeṇa vihanyate | śītamuṣṇaṃ tathā varṣaṃ kṣutpipāse ca bhārata
हे भारत, दैव भी, जो मनुष्य का किया हुआ नहीं है, पुरुषार्थ से रोका जाता है—जैसे सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूख और प्यास।
श्लोक 10 (5.76.10)
यदन्यद्दिष्टभावस्य पुरुषस्य स्वयं कृतम् । तस्मादनुपरोधश्च विद्यते तत्र लक्षणम् ॥
yadanyaddiṣṭabhāvasya puruṣasya svayaṃ kṛtam | tasmādanuparodhaśca vidyate tatra lakṣaṇam
और प्रारब्ध से भिन्न जो कर्म मनुष्य ने स्वयं किया है, उसका फल रुकता नहीं; इसका स्पष्ट प्रमाण शास्त्रों में मिलता है।
श्लोक 11 (5.76.11)
लोकस्य नान्यतो वृत्तिः पाण्डवान्यत्र कर्मणः । एवंबुद्धिः प्रवर्तेत फलं स्यादुभयान्वये ॥
lokasya nānyato vṛttiḥ pāṇḍavānyatra karmaṇaḥ | evaṃbuddhiḥ pravarteta phalaṃ syādubhayānvaye
हे पाण्डव, कर्म के बिना संसार की जीविका किसी और प्रकार नहीं चलती। ऐसा समझकर मनुष्य कर्म में प्रवृत्त हो; दैव और पुरुषार्थ दोनों के मेल से ही फल मिलता है।
श्लोक 12 (5.76.12)
य एवं कृतबुद्धिः स कर्मस्वेव प्रवर्तते । नासिद्धो व्यथते तस्य न सिद्धौ हर्षमश्नुते ॥
ya evaṃ kṛtabuddhiḥ sa karmasveva pravartate | nāsiddho vyathate tasya na siddhau harṣamaśnute
जिसकी बुद्धि ऐसी निश्चित है, वह कर्म में ही लगा रहता है। असफल होने पर उसे व्यथा नहीं होती और सफल होने पर हर्ष नहीं होता।
श्लोक 13 (5.76.13)
तत्रेयमनुमात्रा मे भीमसेन विवक्षिता । नैकान्तसिद्धिर्वक्तव्या शत्रुभिः सह संयुगे ॥
tatreyamanumātrā me bhīmasena vivakṣitā | naikāntasiddhirvaktavyā śatrubhiḥ saha saṃyuge
हे भीमसेन, मैं आपसे यही निश्चय कहना चाहता था कि शत्रुओं के साथ युद्ध में निश्चित सफलता की बात नहीं कही जा सकती।
श्लोक 14 (5.76.14)
नातिप्रहीणरश्मिः स्यात्तथा भावविपर्यये । विषादमर्च्छेद् ग्लानिं वाप्येतमर्थं ब्रवीमि ते ॥
nātiprahīṇaraśmiḥ syāttathā bhāvaviparyaye | viṣādamarcched glāniṃ vāpyetamarthaṃ bravīmi te
भाग्य के उलट जाने पर मनुष्य को अपना तेज पूरी तरह नहीं खोना चाहिए, न विषाद या ग्लानि में डूबना चाहिए; इसीलिए मैं आपसे यह कह रहा हूँ।
श्लोक 15 (5.76.15)
श्वोभूते धृतराष्ट्रस्य समीपं प्राप्य पाण्डव । यतिष्ये प्रशमं कर्तुं युष्मदर्थमहापयन् ॥
śvobhūte dhṛtarāṣṭrasya samīpaṃ prāpya pāṇḍava | yatiṣye praśamaṃ kartuṃ yuṣmadarthamahāpayan
हे पाण्डव, कल सवेरा होते ही मैं धृतराष्ट्र के पास जाकर आपके हित को छोड़े बिना शान्ति स्थापित करने का प्रयत्न करूँगा।
श्लोक 16 (5.76.16)
शमं चेत्ते करिष्यन्ति ततोऽनन्तं यशो मम । भवतां च कृतः कामस्तेषां च श्रेय उत्तमम् ॥
śamaṃ cette kariṣyanti tato'nantaṃ yaśo mama | bhavatāṃ ca kṛtaḥ kāmasteṣāṃ ca śreya uttamam
यदि वे सन्धि कर लेंगे तो मुझे अनन्त यश मिलेगा, आपकी कामना पूरी होगी और उनका भी परम कल्याण होगा।
श्लोक 17 (5.76.17)
ते चेदभिनिवेक्ष्यन्ते नाभ्युपैष्यन्ति मे वचः । कुरवो युद्धमेवात्र घोरं कर्म भविष्यति ॥
te cedabhinivekṣyante nābhyupaiṣyanti me vacaḥ | kuravo yuddhamevātra ghoraṃ karma bhaviṣyati
किन्तु यदि कौरव अपने हठ पर अड़े रहे और मेरी बात न मानी, तो युद्ध ही होगा—एक भयंकर कर्म।
श्लोक 18 (5.76.18)
अस्मिन्युद्धे भीमसेन त्वयि भारः समाहितः । धूरर्जुनेन धार्या स्याद्वोढव्य इतरो जनः ॥
asminyuddhe bhīmasena tvayi bhāraḥ samāhitaḥ | dhūrarjunena dhāryā syādvoḍhavya itaro janaḥ
हे भीमसेन, इस युद्ध में भार आप पर रखा गया है। धुरा अर्जुन को सँभालनी होगी, और शेष लोगों को साथ लेकर चलना होगा।
श्लोक 19 (5.76.19)
अहं हि यन्ता बीभत्सोर्भविता संयुगे सति । धनञ्जयस्यैष कामो न हि युद्धं न कामये ॥
ahaṃ hi yantā bībhatsorbhavitā saṃyuge sati | dhanañjayasyaiṣa kāmo na hi yuddhaṃ na kāmaye
युद्ध छिड़ने पर मैं बीभत्सु (अर्जुन) का सारथि बनूँगा। धनञ्जय की यही इच्छा है; और ऐसा नहीं कि मैं युद्ध नहीं चाहता।
श्लोक 20 (5.76.20)
तस्मादाशङ्कमानोऽहं वृकोदर मतिं तव । गदतः क्लीबया वाचा तेजस्ते समदीदिपम् ॥
tasmādāśaṅkamāno'haṃ vṛkodara matiṃ tava | gadataḥ klībayā vācā tejaste samadīdipam
इसलिए हे वृकोदर, आपको इतनी दुर्बल वाणी में बोलते देख आपकी मति के विषय में शंका करके मैंने आपके तेज को प्रज्वलित किया।