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उद्योग पर्व · अध्याय 75

भीमसेन का अपने बल का वर्णन

श्रीकृष्ण के उलाहने से आहत भीमसेन उत्तर देते हैं कि उन्होंने उन्हें गलत समझा है। आत्मप्रशंसा को अनार्य कर्म मानते हुए भी वे अपने बल का वर्णन करते हैं: यदि आकाश और पृथ्वी आपस में टकराएँ तो वे उन्हें अपनी भुजाओं से थाम सकते हैं, उनकी भुजाओं में पड़ा कोई छूट नहीं सकता, और युद्ध में कृष्ण तथा संसार उन्हें हाथियों, रथियों और श्रेष्ठ क्षत्रियों का संहार करते देखेंगे। उन्हें कोई भय नहीं; वे सब क्लेश केवल सौहार्द और करुणा से सहते हैं ताकि भरतवंश का नाश न हो।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.75.1)

तथोक्तो वासुदेवेन नित्यमन्युरमर्षणः । सदश्ववत्समाधावद्बभाषे तदनन्तरम् ॥

tathokto vāsudevena nityamanyuramarṣaṇaḥ | sadaśvavatsamādhāvadbabhāṣe tadanantaram

वासुदेव के ऐसा कहने पर सदा क्रोधी और असहिष्णु भीमसेन उत्तम घोड़े की तरह वेग से दौड़ पड़े और तुरन्त बोले।

भीमसेन उवाच

श्लोक 2 (5.75.2)

अन्यथा मां चिकीर्षन्तमन्यथा मन्यसेऽच्युत । प्रणीतभावमत्यर्थं युधि सत्यपराक्रमम् ॥

anyathā māṃ cikīrṣantamanyathā manyase'cyuta | praṇītabhāvamatyarthaṃ yudhi satyaparākramam

हे अच्युत, मैं कुछ और करना चाहता हूँ और आप मुझे कुछ और समझ रहे हैं। मेरा मन पूरी तरह युद्ध पर लगा है और युद्ध में मेरा पराक्रम सच्चा है।

श्लोक 3 (5.75.3)

वेत्सि दाशार्ह सत्यं मे दीर्घकालं सहोषितः । उत वा मां न जानासि प्लवन्ह्रद इवाप्लवे ॥

vetsi dāśārha satyaṃ me dīrghakālaṃ sahoṣitaḥ | uta vā māṃ na jānāsi plavanhrada ivāplave

हे दाशार्ह, आप बहुत समय से मेरे साथ रहे हैं, इसलिए मेरी सच्चाई जानते हैं। या फिर आप मुझे जानते ही नहीं, उस मनुष्य की तरह जो बिना नाव के सरोवर में तैर रहा हो और किनारा न पहचानता हो।

श्लोक 4 (5.75.4)

तस्मादनभिरूपाभिर्वाग्भिर्मां त्वं समर्च्छसि । कथं हि भीमसेनं मां जानन्कश्चन माधव ॥

tasmādanabhirūpābhirvāgbhirmāṃ tvaṃ samarcchasi | kathaṃ hi bhīmasenaṃ māṃ jānankaścana mādhava

इसीलिए आप मुझ पर अनुचित वचनों से प्रहार कर रहे हैं। हे माधव, मुझ भीमसेन को जानने वाला कोई भी कैसे

श्लोक 5 (5.75.5)

ब्रूयादप्रतिरूपाणि यथा मां वक्तुमर्हसि । तस्मादिदं प्रवक्ष्यामि वचनं वृष्णिनन्दन ॥

brūyādapratirūpāṇi yathā māṃ vaktumarhasi | tasmādidaṃ pravakṣyāmi vacanaṃ vṛṣṇinandana

ऐसी अनुचित बातें कह सकता है, जैसी आप मुझसे कह रहे हैं? इसलिए हे वृष्णिनन्दन, मैं यह बात कहूँगा

श्लोक 6 (5.75.6)

आत्मनः पौरुषं चैव बलं च न समं परैः । सर्वथाऽनार्यकर्मैतत्प्रशंसा स्वयमात्मनः ॥

ātmanaḥ pauruṣaṃ caiva balaṃ ca na samaṃ paraiḥ | sarvathā'nāryakarmaitatpraśaṃsā svayamātmanaḥ

अपने पौरुष और बल के विषय में, जिसकी बराबरी दूसरे नहीं कर सकते। अपनी प्रशंसा स्वयं करना सब प्रकार से अनार्यों का काम है;

श्लोक 7 (5.75.7)

अतिवादापविद्धस्तु वक्ष्यामि बलमात्मनः । पश्येमे रोदसी कृष्ण ययोरासन्निमाः प्रजाः ॥

ativādāpaviddhastu vakṣyāmi balamātmanaḥ | paśyeme rodasī kṛṣṇa yayorāsannimāḥ prajāḥ

किन्तु आपके अतिशय वचनों से आहत होकर मैं अपने बल का वर्णन करूँगा। हे कृष्ण, इन आकाश और पृथ्वी को देखिए, जिनमें ये सारी प्रजाएँ रहती हैं,

श्लोक 8 (5.75.8)

अचले चाप्रतिष्ठे चाप्यनन्ते सर्वमातरौ । यदीमे सहसा क्रुद्धे समेयातां शिले इव ॥

acale cāpratiṣṭhe cāpyanante sarvamātarau | yadīme sahasā kruddhe sameyātāṃ śile iva

जो अचल हैं, बिना आधार के टिके हैं, अनन्त हैं और सबकी माता हैं। यदि ये दोनों अचानक क्रोध में आकर दो शिलाओं की तरह आपस में टकराएँ,

श्लोक 9 (5.75.9)

अहमेते निगृह्णीयां बाहुभ्यां सचराचरे । पश्यैतदन्तरं बाह्वोर्महापरिघयोरिव ॥

ahamete nigṛhṇīyāṃ bāhubhyāṃ sacarācare | paśyaitadantaraṃ bāhvormahāparighayoriva

तो मैं चराचर सहित इन्हें अपनी दोनों भुजाओं से थाम लूँ। मेरी इन भुजाओं के बीच के अन्तर को देखिए, जो दो विशाल परिघों के समान हैं।

श्लोक 10 (5.75.10)

य एतत्प्राप्य मुच्येत न तं पश्यामि पूरुषम् । हिमवांश्च समुद्रश्च वज्री वा बलभित्स्वयम् ॥

ya etatprāpya mucyeta na taṃ paśyāmi pūruṣam | himavāṃśca samudraśca vajrī vā balabhitsvayam

मैं ऐसा कोई पुरुष नहीं देखता जो इनकी पकड़ में आकर छूट सके। न हिमालय, न समुद्र, न स्वयं बल का संहार करने वाले वज्रधारी इन्द्र—

श्लोक 11 (5.75.11)

मयाभिपन्नं त्रायेरन्बलमास्थाय न त्रयः । युद्धार्हान्क्षत्रियान्सर्वान्पाण्डवेष्वाततायिनः ॥

mayābhipannaṃ trāyeranbalamāsthāya na trayaḥ | yuddhārhānkṣatriyānsarvānpāṇḍaveṣvātatāyinaḥ

ये तीनों अपना सारा बल लगाकर भी मेरे पकड़े हुए को नहीं बचा सकते। पाण्डवों पर आक्रमण करने वाले युद्ध के योग्य सभी क्षत्रियों को

श्लोक 12 (5.75.12)

अधः पादतलेनैतानधिष्ठास्यामि भूतले । न हि त्वं नाभिजानासि मम विक्रममच्युत ॥

adhaḥ pādatalenaitānadhiṣṭhāsyāmi bhūtale | na hi tvaṃ nābhijānāsi mama vikramamacyuta

मैं पैरों के तलवों से धरती पर रौंद डालूँगा। हे अच्युत, ऐसा नहीं कि आप मेरे पराक्रम को न जानते हों—

श्लोक 13 (5.75.13)

यथा मया विनिर्जित्य राजानो वशगाः कृताः । अथ चेन्मां न जानासि सूर्यस्येवोद्यतः प्रभाम् ॥

yathā mayā vinirjitya rājāno vaśagāḥ kṛtāḥ | atha cenmāṃ na jānāsi sūryasyevodyataḥ prabhām

कि किस प्रकार मैंने राजाओं को जीतकर अपने वश में किया था। और यदि आप उदित होते सूर्य की प्रभा की भाँति मुझे नहीं पहचानते,

श्लोक 14 (5.75.14)

विगाढे युधि संबाधे वेत्स्यसे मां जनार्दन । परुषैराक्षिपसि किं व्रणं सूच्येव चानघ ॥

vigāḍhe yudhi saṃbādhe vetsyase māṃ janārdana | paruṣairākṣipasi kiṃ vraṇaṃ sūcyeva cānagha

तो हे जनार्दन, घमासान युद्ध में मुझे जान लेंगे। हे निष्पाप, आप मुझे कठोर वचनों से क्यों बेध रहे हैं, जैसे कोई सुई से घाव कुरेदे?

श्लोक 15 (5.75.15)

यथामति ब्रवीम्येतद्विद्धि मामधिकं ततः । द्रष्टासि युधि संबाधे प्रवृत्ते वैशसेऽहनि ॥

yathāmati bravīmyetadviddhi māmadhikaṃ tataḥ | draṣṭāsi yudhi saṃbādhe pravṛtte vaiśase'hani

मैं अपनी समझ के अनुसार यह कह रहा हूँ; मुझे इससे भी अधिक समझिए। जब संहार का दिन आरम्भ होगा, तब घमासान युद्ध में आप देखेंगे

श्लोक 16 (5.75.16)

मया प्रणुन्नान्मातङ्गान्रथिनः सादिनस्तथा । तथा नरानभिक्रुद्धं निघ्नन्तं क्षत्रियर्षभान् ॥

mayā praṇunnānmātaṅgānrathinaḥ sādinastathā | tathā narānabhikruddhaṃ nighnantaṃ kṣatriyarṣabhān

कि मेरे द्वारा हाथी, रथी और घुड़सवार खदेड़े जा रहे हैं, और मैं क्रोध में भरकर मनुष्यों और श्रेष्ठ क्षत्रियों का संहार कर रहा हूँ।

श्लोक 17 (5.75.17)

द्रष्टा मां त्वं च लोकश्च विकर्षन्तं वरान्वरान् । न मे सीदन्ति गात्राणि न ममोद्वेपते मनः ॥

draṣṭā māṃ tvaṃ ca lokaśca vikarṣantaṃ varānvarān | na me sīdanti gātrāṇi na mamodvepate manaḥ

आप और सारा संसार मुझे श्रेष्ठ से श्रेष्ठ योद्धाओं को घसीटते देखेंगे। मेरे अंग शिथिल नहीं होते और मेरा मन नहीं काँपता।

श्लोक 18 (5.75.18)

सर्वलोकादभिक्रुद्धान्न भयं विद्यते मम । किं तु सौहृदमेवैतत्कृपया मधुसूदन । सर्वांस्तितिक्षे संक्लेशान्मा स्म नो भरता नशन् ॥

sarvalokādabhikruddhānna bhayaṃ vidyate mama | kiṃ tu sauhṛdamevaitatkṛpayā madhusūdana | sarvāṃstitikṣe saṃkleśānmā sma no bharatā naśan

यदि सारा संसार क्रुद्ध होकर मेरे विरुद्ध हो जाए, तब भी मुझे भय नहीं। हे मधुसूदन, यह तो केवल सौहार्द है कि मैं करुणावश ये सब क्लेश सह रहा हूँ, ताकि भरतवंश का नाश न हो।

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