उद्योग पर्व · अध्याय 83
कुन्ती के लिए युधिष्ठिर का सन्देश; मार्ग में ऋषियों से भेंट
युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से कहते हैं कि वे उनकी माता कुन्ती को — जिसने उन्हें पाला, उनके लिए दुःख सहे और वन जाते समय जिसे वे रोती छोड़ गए — ढाढ़स बँधाएँ और गले लगाएँ, तथा धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोण, विदुर आदि कुरु-वृद्धों का सम्मान करें। अर्जुन कहते हैं कि यदि दुर्योधन सत्कारपूर्वक आधा राज्य लौटा दे तो सब ठीक है, अन्यथा वे क्षत्रियों का अन्त कर देंगे; भीम हर्ष से गर्जना करते हैं और योद्धा काँप उठते हैं। मार्ग में श्रीकृष्ण नारद आदि ऋषियों से मिलते हैं, और जमदग्निनन्दन परशुराम उनसे कहते हैं कि वे सब उनके वचन सुनने कुरुसभा में जा रहे हैं और वहाँ उनके दर्शन करेंगे। दस महारथी, एक हजार पैदल और घुड़सवार तथा सैकड़ों सेवक श्रीकृष्ण के पीछे चलते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (5.83.1)
या सा बाल्यात्प्रभृत्यस्मान्पर्यवर्धयताबला । उपवासतपःशीला सदा स्वस्त्ययने रता ॥
yā sā bālyātprabhṛtyasmānparyavardhayatābalā | upavāsatapaḥśīlā sadā svastyayane ratā
जिस अबला ने बचपन से हमारा पालन-पोषण किया, जो उपवास और तप में लगी रहती है और सदा हमारे कल्याण के अनुष्ठानों में रत रहती है;
श्लोक 2 (5.83.2)
देवतातिथिपूजासु गुरुशुश्रूषणे रता । वत्सला प्रियपुत्रा च माताऽस्माकं जनार्दन ॥
devatātithipūjāsu guruśuśrūṣaṇe ratā | vatsalā priyaputrā ca mātā'smākaṃ janārdana
जो देवताओं और अतिथियों की पूजा तथा गुरुजनों की सेवा में लगी रहती है, जो वात्सल्यमयी और पुत्रों से स्नेह करने वाली है — हमारी वह माता, जनार्दन;
श्लोक 3 (5.83.3)
सुयोधनभयाद्या नोऽत्रायतामित्रकर्शन । महतो मृत्युसंबाधाद्दुस्तरान्नौरिवार्णवात् ॥
suyodhanabhayādyā no'trāyatāmitrakarśana | mahato mṛtyusaṃbādhāddustarānnaurivārṇavāt
हे शत्रुसूदन, जिसने सुयोधन के भय से, मृत्यु के उस महान और दुस्तर संकट से हमें वैसे ही बचाया जैसे नौका समुद्र से बचाती है;
श्लोक 4 (5.83.4)
अस्मत्कृते च सततं यया दुःखानि माधव । अनुभूतान्यदुःखार्हां तां स्म पृच्छेरनामयम् ॥
asmatkṛte ca satataṃ yayā duḥkhāni mādhava | anubhūtānyaduḥkhārhāṃ tāṃ sma pṛccheranāmayam
हे माधव, जो दुःख के योग्य न होते हुए भी हमारे कारण निरन्तर दुःख भोगती रही है, उससे कुशल पूछना।
श्लोक 5 (5.83.5)
भृशमाश्वासयेश्चैनां पुत्रशोकपरिप्लुताम् । अभिवाद्य स्वजेथास्त्वं पाण्डवान्परिकीर्तयन् ॥
bhṛśamāśvāsayeścaināṃ putraśokapariplutām | abhivādya svajethāstvaṃ pāṇḍavānparikīrtayan
पुत्रों के शोक में डूबी हुई उस माता को भली-भाँति ढाढ़स बँधाना; प्रणाम करके और पाण्डवों की चर्चा करते हुए उसे गले लगाना।
श्लोक 6 (5.83.6)
ऊढात्प्रभृति दुःखानि श्वशुराणामरिन्दम । निकारानतदर्हा च पश्यन्ती दुःखमश्नुते ॥
ūḍhātprabhṛti duḥkhāni śvaśurāṇāmarindama | nikārānatadarhā ca paśyantī duḥkhamaśnute
हे शत्रुदमन, विवाह के समय से ही वह ससुराल में दुःख और अपमान देखती आई है; वह इनके योग्य नहीं थी, फिर भी कष्ट भोग रही है।
श्लोक 7 (5.83.7)
अपि जातु स कालः स्यात्कृष्ण दुःखविपर्ययः । यदहं मातरं क्लिष्टां सुखं दद्यामरिन्दम ॥
api jātu sa kālaḥ syātkṛṣṇa duḥkhaviparyayaḥ | yadahaṃ mātaraṃ kliṣṭāṃ sukhaṃ dadyāmarindama
हे कृष्ण, क्या कभी वह समय आएगा जब दुःख के दिन पलटेंगे और मैं अपनी क्लेश पाती माता को सुख दे सकूँगा, हे शत्रुदमन?
श्लोक 8 (5.83.8)
प्रव्रजन्तोऽनुधावन्तीं कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् । रुदतीमपहायैनामगच्छाम वयं वनम् ॥
pravrajanto'nudhāvantīṃ kṛpaṇāṃ putragṛddhinīm | rudatīmapahāyaināmagacchāma vayaṃ vanam
जब हम वन को जा रहे थे, तब वह दीन होकर पुत्रों के मोह में हमारे पीछे दौड़ी; हम उसे रोती हुई छोड़कर वन चले गए।
श्लोक 9 (5.83.9)
सा नूनं म्रियते दुःखैः सा चेज्जीवति केशव । तथा पुत्राधिभिर्गाढमार्तामर्चय सत्कृत ॥
sā nūnaṃ mriyate duḥkhaiḥ sā cejjīvati keśava | tathā putrādhibhirgāḍhamārtāmarcaya satkṛta
निश्चय ही वह दुःखों से मरी जा रही होगी — यदि वह जीवित भी है, केशव। पुत्रों की चिन्ता से अत्यन्त पीड़ित उस माता का आदर करना, हे सर्वपूजित।
श्लोक 10 (5.83.10)
अभिवाद्याऽथ सा कृष्ण त्वया मद्वचनाद्विभो । धृतराष्ट्रश्च कौरव्यो राजानश्च वयोधिकाः ॥
abhivādyā'tha sā kṛṣṇa tvayā madvacanādvibho | dhṛtarāṣṭraśca kauravyo rājānaśca vayodhikāḥ
हे कृष्ण, हे प्रभो, मेरी ओर से आपको उसका अभिवादन करना है; और कुरुवंशी धृतराष्ट्र तथा आयु में बड़े राजाओं का भी —
श्लोक 11 (5.83.11)
भीष्मं द्रोणं कृपं चैव महाराजं च वाह्लिकम् । द्रौणिं च सोमदत्तं च सर्वांश्च भरतान्पृथक् ॥
bhīṣmaṃ droṇaṃ kṛpaṃ caiva mahārājaṃ ca vāhlikam | drauṇiṃ ca somadattaṃ ca sarvāṃśca bharatānpṛthak
भीष्म, द्रोण, कृप, महाराज बाह्लीक, द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा), सोमदत्त और समस्त भरतवंशियों का — प्रत्येक का अलग-अलग —
श्लोक 12 (5.83.12)
यथावयो यथास्थानं प्रपद्यस्व जनार्दन । विदुरं च महाप्राज्ञं कुरूणां मन्त्रधारिणम् । अगाधबुद्धिं मर्मज्ञं स्वजेथा मधुसूदन ॥
yathāvayo yathāsthānaṃ prapadyasva janārdana | viduraṃ ca mahāprājñaṃ kurūṇāṃ mantradhāriṇam | agādhabuddhiṃ marmajñaṃ svajethā madhusūdana
जनार्दन, आयु और पद के अनुसार उनके पास जाकर उनका सम्मान कीजिए। और हे मधुसूदन, कुरुओं की मन्त्रणा के धारक, अगाध बुद्धि वाले, मर्म को जानने वाले महाप्राज्ञ विदुर को गले लगाइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (5.83.13)
इत्युक्त्वा केशवं तत्र राजमध्ये युधिष्ठिरः । अनुज्ञातो निववृते कृष्णं कृत्वा प्रदक्षिणम् ॥
ityuktvā keśavaṃ tatra rājamadhye yudhiṣṭhiraḥ | anujñāto nivavṛte kṛṣṇaṃ kṛtvā pradakṣiṇam
वहाँ राजाओं के बीच केशव से ऐसा कहकर युधिष्ठिर उनकी अनुमति ले, श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा करके लौट गए।
श्लोक 14 (5.83.14)
व्रजन्नेव तु बीभत्सुः सखायं पुरुषर्षभम् । अब्रवीत्परवीरघ्रं दाशार्हमपराजितम् ॥
vrajanneva tu bībhatsuḥ sakhāyaṃ puruṣarṣabham | abravītparavīraghraṃ dāśārhamaparājitam
किन्तु बीभत्सु (अर्जुन) चलते-चलते ही अपने मित्र, पुरुषश्रेष्ठ, शत्रुवीरों के संहारक, अपराजित दाशार्ह से बोले —
अर्जुन उवाच
श्लोक 15 (5.83.15)
यदस्माकं विभो वृत्तं पुरा वै मन्त्रनिश्चये । अर्धराज्यस्य गोविन्द विदितं सर्वराजसु ॥
yadasmākaṃ vibho vṛttaṃ purā vai mantraniścaye | ardharājyasya govinda viditaṃ sarvarājasu
हे प्रभो गोविन्द, पहले मन्त्रणा करके आधे राज्य के विषय में हमने जो निश्चय किया था, वह सब राजाओं को विदित है।
श्लोक 16 (5.83.16)
तच्चेद्दद्यादखड्गेन सत्कृत्यानवमत्य च । प्रियं मे स्यान्महाबाहो मुच्येरन्महतो भयात् ॥
tacceddadyādakhaḍgena satkṛtyānavamatya ca | priyaṃ me syānmahābāho mucyeranmahato bhayāt
यदि वह बिना तलवार उठाए, सत्कारपूर्वक और बिना अपमान किए वह (आधा राज्य) दे दे, तो हे महाबाहु, मुझे प्रसन्नता होगी और वे भी एक बड़े भय से छूट जाएँगे।
श्लोक 17 (5.83.17)
अतश्चेदन्यथाकर्ता धार्तराष्ट्रोऽनुपायवित् । अन्तं नूनं करिष्यामि क्षत्रियाणां जनार्दन ॥
ataścedanyathākartā dhārtarāṣṭro'nupāyavit | antaṃ nūnaṃ kariṣyāmi kṣatriyāṇāṃ janārdana
परन्तु यदि उचित उपाय न जानने वाला धृतराष्ट्र-पुत्र इसके विपरीत करेगा, तो हे जनार्दन, मैं निश्चय ही क्षत्रियों का अन्त कर दूँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (5.83.18)
एवमुक्ते पाण्डवेन समहृष्यद्वृकोदरः । मुहुर्मुहुः क्रोधवशात्प्रावेपत च पाण्डवः ॥
evamukte pāṇḍavena samahṛṣyadvṛkodaraḥ | muhurmuhuḥ krodhavaśātprāvepata ca pāṇḍavaḥ
पाण्डुपुत्र अर्जुन के ऐसा कहने पर वृकोदर (भीम) हर्ष से भर उठे; क्रोध के आवेश में वे पाण्डव बार-बार काँपने लगे।
श्लोक 19 (5.83.19)
वेपमानश्च कौन्तेयः प्राक्रोशन्महतो रवान् । धनञ्जयवचः श्रुत्वा हर्षोत्सिक्तमना भृशम् ॥
vepamānaśca kaunteyaḥ prākrośanmahato ravān | dhanañjayavacaḥ śrutvā harṣotsiktamanā bhṛśam
धनञ्जय के वचन सुनकर अत्यन्त हर्ष से उमगे मन वाले कुन्तीपुत्र भीम काँपते हुए जोर-जोर से गर्जना करने लगे।
श्लोक 20 (5.83.20)
तस्य तं निनदं श्रुत्वा संप्रावेपन्त धन्विनः । वाहनानि च सर्वाणि शकृन्मूत्रे प्रसुस्रुवुः ॥
tasya taṃ ninadaṃ śrutvā saṃprāvepanta dhanvinaḥ | vāhanāni ca sarvāṇi śakṛnmūtre prasusruvuḥ
उनकी वह गर्जना सुनकर धनुर्धर काँप उठे और सब वाहन-पशु मल-मूत्र त्यागने लगे।
श्लोक 21 (5.83.21)
इत्युक्त्वा केशवं तत्र तथा चोक्त्वा विनिश्चयम् । अनुज्ञातो निववृते परिष्वज्य जनार्दनम् ॥
ityuktvā keśavaṃ tatra tathā coktvā viniścayam | anujñāto nivavṛte pariṣvajya janārdanam
वहाँ केशव से इस प्रकार कहकर और अपना निश्चय बताकर अर्जुन जनार्दन को गले लगाकर, उनकी अनुमति ले लौट गए।
श्लोक 22 (5.83.22)
तेषु राजसु सर्वेषु निवृत्तेषु जनार्दनः । तूर्णमभ्यगमद्धृष्टः शैब्यसुग्रीववाहनः ॥
teṣu rājasu sarveṣu nivṛtteṣu janārdanaḥ | tūrṇamabhyagamaddhṛṣṭaḥ śaibyasugrīvavāhanaḥ
उन सब राजाओं के लौट जाने पर जनार्दन प्रसन्न होकर शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ों से खींचे जाते हुए तेजी से आगे बढ़े।
श्लोक 23 (5.83.23)
ते हया वासुदेवस्य दारुकेण प्रचोदिताः । पन्थानमाचेमुरिव ग्रसमाना इवाम्बरम् ॥
te hayā vāsudevasya dārukeṇa pracoditāḥ | panthānamācemuriva grasamānā ivāmbaram
दारुक द्वारा हाँके गए वासुदेव के वे घोड़े मानो मार्ग को पीते और आकाश को निगलते हुए दौड़ रहे थे।
श्लोक 24 (5.83.24)
अथापश्यन्महाबाहुर्ऋषीनध्वनि केशवः । ब्राह्म्या श्रिया दीप्यमानान्स्थितानुभयतः पथि ॥
athāpaśyanmahābāhurṛṣīnadhvani keśavaḥ | brāhmyā śriyā dīpyamānānsthitānubhayataḥ pathi
तब महाबाहु केशव ने मार्ग में ऋषियों को देखा, जो ब्रह्मतेज से देदीप्यमान होकर मार्ग के दोनों ओर खड़े थे।
श्लोक 25 (5.83.25)
सोऽवतीर्य रथात्तूर्णमभिवाद्य जनार्दनः । यथावृत्तानृषीन्सर्वानभ्यभाषत पूजयन् ॥
so'vatīrya rathāttūrṇamabhivādya janārdanaḥ | yathāvṛttānṛṣīnsarvānabhyabhāṣata pūjayan
जनार्दन तुरन्त रथ से उतर पड़े और उन्हें प्रणाम करके, उन सब ऋषियों का उनके आचरण के अनुरूप सत्कार करते हुए बोले —
कृष्ण उवाच
श्लोक 26 (5.83.26)
कच्चिल्लोकेषु कुशलं कच्चिद्धर्मः स्वनुष्ठितः । ब्राह्मणानां त्रयो वर्णाः कच्चित्तिष्ठन्ति शासने । पितृदेवातिथिभ्यश्च कच्चित्पूजा स्वनुष्ठिता ॥
kaccillokeṣu kuśalaṃ kacciddharmaḥ svanuṣṭhitaḥ | brāhmaṇānāṃ trayo varṇāḥ kaccittiṣṭhanti śāsane | pitṛdevātithibhyaśca kaccitpūjā svanuṣṭhitā
"क्या लोकों में कुशल है? क्या धर्म का भली-भाँति पालन हो रहा है? क्या तीनों वर्ण ब्राह्मणों के अनुशासन में स्थित हैं? क्या पितरों, देवताओं और अतिथियों की पूजा भली-भाँति हो रही है?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (5.83.27)
तेभ्यः प्रयुज्य तां पूजां प्रोवाच मधुसूदनः । भगवन्तः क्व संसिद्धाः कोऽवधिर्भवतामिह ॥
tebhyaḥ prayujya tāṃ pūjāṃ provāca madhusūdanaḥ | bhagavantaḥ kva saṃsiddhāḥ ko'vadhirbhavatāmiha
उनका वह सत्कार करके मधुसूदन बोले — "भगवन्, आप लोगों ने कहाँ सिद्धि प्राप्त की है? यहाँ आपकी यात्रा कहाँ तक है?
कृष्ण उवाच
श्लोक 28 (5.83.28)
किं वा कार्यं भगवतामहं किं करवाणि वः । केनार्थेनोपसंप्राप्ता भगवन्तो महीतलम् ॥
kiṃ vā kāryaṃ bhagavatāmahaṃ kiṃ karavāṇi vaḥ | kenārthenopasaṃprāptā bhagavanto mahītalam
आप भगवानों का क्या कार्य है? मैं आपके लिए क्या करूँ? आप लोग किस प्रयोजन से पृथ्वी पर पधारे हैं?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (5.83.29)
एवमुक्ताः केशवेन मुनयः शंसितव्रताः । नारदप्रमुखाः सर्वे प्रत्यनन्दन्त केशवम् ॥
evamuktāḥ keśavena munayaḥ śaṃsitavratāḥ | nāradapramukhāḥ sarve pratyanandanta keśavam
केशव के ऐसा कहने पर कठोर व्रतों वाले नारद आदि सब मुनियों ने केशव का अभिनन्दन किया —
श्लोक 30 (5.83.30)
अधश्शिराः सर्पमाली महर्षिः स हि देवलः । अर्वावसुः सुजानुश्च मैत्रेयः शुनको बली ॥
adhaśśirāḥ sarpamālī maharṣiḥ sa hi devalaḥ | arvāvasuḥ sujānuśca maitreyaḥ śunako balī
अधःशिरा, सर्पमाली, महर्षि देवल, अर्वावसु, सुजानु, मैत्रेय, बलवान शुनक,
श्लोक 31 (5.83.31)
बको दाल्भ्यः स्थूलशिराः कृष्णद्वैपायनस्तथा । आयोदधौम्यो धौम्यश्च आणिमाण्डव्यकौशिकौ ॥
bako dālbhyaḥ sthūlaśirāḥ kṛṣṇadvaipāyanastathā | āyodadhaumyo dhaumyaśca āṇimāṇḍavyakauśikau
बक दाल्भ्य, स्थूलशिरा, कृष्णद्वैपायन, आयोदधौम्य, धौम्य, आणिमाण्डव्य और कौशिक,
श्लोक 32 (5.83.32)
दामोष्णीषस्त्रिषवणः पर्णादो घटजानुकः । मौञ्जायनो वायुभक्षः पाराशर्योऽथ शालिकः ॥
dāmoṣṇīṣastriṣavaṇaḥ parṇādo ghaṭajānukaḥ | mauñjāyano vāyubhakṣaḥ pārāśaryo'tha śālikaḥ
दामोष्णीष, त्रिषवण, पर्णाद, घटजानुक, मौञ्जायन, वायुभक्ष, पाराशर्य और शालिक,
श्लोक 33 (5.83.33)
शीलवानशनिर्धाता शून्यपालोऽकृतव्रणः । श्वेतकेतुः कहोलश्च रामश्चैव महातपाः ॥
śīlavānaśanirdhātā śūnyapālo'kṛtavraṇaḥ | śvetaketuḥ kaholaśca rāmaścaiva mahātapāḥ
शीलवान, अशनिर्धाता, शून्यपाल, अकृतव्रण, श्वेतकेतु, कहोल और महातपस्वी राम (परशुराम)।
श्लोक 34 (5.83.34)
तमब्रवीज्जामदग्न्य उपेत्य मधुसूदनम् । परिष्वज्य च गोविन्दं सुरासुरपतेः सखा ॥
tamabravījjāmadagnya upetya madhusūdanam | pariṣvajya ca govindaṃ surāsurapateḥ sakhā
देवताओं और असुरों के स्वामी के सखा जमदग्निनन्दन (परशुराम) ने मधुसूदन के पास आकर गोविन्द को गले लगाया और उनसे कहा —
जामदग्न्य उवाच
श्लोक 35 (5.83.35)
देवर्षयः पुण्यकृतो ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः । राजर्षयश्च दाशार्ह मानयन्ति तपस्विनः ॥
devarṣayaḥ puṇyakṛto brāhmaṇāśca bahuśrutāḥ | rājarṣayaśca dāśārha mānayanti tapasvinaḥ
हे दाशार्ह, पुण्यकर्मा देवर्षि, बहुश्रुत ब्राह्मण और तपस्वी राजर्षि आपका सम्मान करते हैं।
श्लोक 36 (5.83.36)
दैवासुरस्य द्रष्टारः पुराणस्य महामते । समेतं पार्थिवं क्षत्रं दिदृक्षन्तश्च सर्वतः । सभासदश्च राजानस्त्वां च सत्यं जनार्दनम् ॥
daivāsurasya draṣṭāraḥ purāṇasya mahāmate | sametaṃ pārthivaṃ kṣatraṃ didṛkṣantaśca sarvataḥ | sabhāsadaśca rājānastvāṃ ca satyaṃ janārdanam
हे महामति, ये देवताओं और असुरों के प्राचीन संग्राम के साक्षी रहे हैं; ये सब ओर से एकत्र हुए पृथ्वी के क्षत्रियों को, सभासदों और राजाओं को, तथा सत्यस्वरूप आप जनार्दन को देखना चाहते हैं।
श्लोक 37 (5.83.37)
एतन्महत्प्रेक्षणीयं द्रष्टुमिच्छाम केशव ॥
etanmahatprekṣaṇīyaṃ draṣṭumicchāma keśava
केशव, हम यह महान दृश्य देखना चाहते हैं।
श्लोक 38 (5.83.38)
धर्मार्थसहिता वाचः श्रोतुमिच्छाम माधव । त्वयोच्यमानाः कुरुषु राजमध्ये परन्तप ॥
dharmārthasahitā vācaḥ śrotumicchāma mādhava | tvayocyamānāḥ kuruṣu rājamadhye parantapa
हे माधव, हे परन्तप, कुरुओं के बीच राजाओं के मध्य आप जो धर्म और अर्थ से युक्त वचन कहेंगे, उन्हें हम सुनना चाहते हैं।
श्लोक 39 (5.83.39)
सभायां मधुरा वाचः शुश्रूषन्तस्त्वयेरिताः । कुरूणां प्रतिवाचश्च श्रोतुमिच्छाम माधव ॥
sabhāyāṃ madhurā vācaḥ śuśrūṣantastvayeritāḥ | kurūṇāṃ prativācaśca śrotumicchāma mādhava
सभा में आपके कहे मधुर वचनों को सुनने के इच्छुक हम कुरुओं के प्रत्युत्तर भी सुनना चाहते हैं, माधव।
श्लोक 40 (5.83.40)
भीष्मद्रोणादयश्चैव विदुरश्च महामतिः । त्वं च यादवशार्दूल सभायां वै समेष्यथ ॥
bhīṣmadroṇādayaścaiva viduraśca mahāmatiḥ | tvaṃ ca yādavaśārdūla sabhāyāṃ vai sameṣyatha
भीष्म, द्रोण आदि, महामति विदुर और आप, हे यादवश्रेष्ठ, सभा में एकत्र होंगे।
श्लोक 41 (5.83.41)
तव वाक्यानि दिव्यानि तथा तेषां च माधव । श्रोतुमिच्छाम गोविन्द सत्यानि च हितानि च । आपृष्टोऽसि महाबाहो पुनर्द्रक्ष्यामहे वयम् ॥
tava vākyāni divyāni tathā teṣāṃ ca mādhava | śrotumicchāma govinda satyāni ca hitāni ca | āpṛṣṭo'si mahābāho punardrakṣyāmahe vayam
हे माधव, हम आपके दिव्य वचन और उनके वचन भी सुनना चाहते हैं, हे गोविन्द — जो सत्य और हितकर हों। हे महाबाहु, हम आपसे विदा लेते हैं; हम फिर आपके दर्शन करेंगे।
श्लोक 42 (5.83.42)
याह्यविघ्नेन वै वीर द्रक्ष्यामस्त्वां सभागतम् । आसीनमासने दिव्ये बलतेजःसमाहितम् ॥
yāhyavighnena vai vīra drakṣyāmastvāṃ sabhāgatam | āsīnamāsane divye balatejaḥsamāhitam
हे वीर, निर्विघ्न जाइए; हम आपको सभा में पहुँचे हुए, दिव्य आसन पर विराजमान और बल तथा तेज से सम्पन्न देखेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 43 (5.83.43)
प्रयान्तं देवकीपुत्रं परवीररुजो दश । महारथा महाबाहुमन्वयुः शस्त्रपाणयः ॥
prayāntaṃ devakīputraṃ paravīrarujo daśa | mahārathā mahābāhumanvayuḥ śastrapāṇayaḥ
जाते हुए महाबाहु देवकीनन्दन के पीछे शत्रुवीरों का संहार करने वाले दस महारथी हाथों में शस्त्र लिए चले;
श्लोक 44 (5.83.44)
पदातीनां सहस्रं च सादिनां च परन्तप । भोज्यं च विपुलं राजन्प्रेष्याश्च शतशोऽपरे ॥
padātīnāṃ sahasraṃ ca sādināṃ ca parantapa | bhojyaṃ ca vipulaṃ rājanpreṣyāśca śataśo'pare
हे परन्तप राजन्, साथ में एक हजार पैदल और घुड़सवार, प्रचुर भोजन-सामग्री और सैकड़ों अन्य सेवक भी थे।