उद्योग पर्व · अध्याय 84
श्रीकृष्ण की यात्रा के शकुन और वृकस्थल में रात्रि-विश्राम
जनमेजय पूछते हैं कि श्रीकृष्ण ने किस प्रकार यात्रा की और उनके साथ कौन-से शकुन हुए। वैशम्पायन उत्पातों का वर्णन करते हैं — बिना बादलों के वज्रपात, नदियों का उलटा बहना, अग्नियों का भड़कना, पृथ्वी का काँपना, अन्धकार और धूल, तथा हस्तिनापुर को झकझोरती प्रचण्ड वायु — जबकि श्रीकृष्ण जहाँ-जहाँ गए वहाँ सुखद वायु बही, फूल बरसे और मार्ग समतल रहा। ब्राह्मणों और ग्राम-स्त्रियों से पूजित होते हुए, समृद्ध प्रदेशों से गुजरकर वे सूर्यास्त के समय वृकस्थल पहुँचते हैं, सन्ध्योपासना करते हैं, गाँव के प्रमुख ब्राह्मणों का आतिथ्य स्वीकार करते हैं, उन्हें भोजन कराते हैं और वहाँ सुखपूर्वक रात बिताते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (5.84.1)
कथं प्रयातो दाशार्हो महात्मा मधुसूदनः । कानि वा व्रजतस्तस्य निमित्तानि महौजसः ॥
kathaṃ prayāto dāśārho mahātmā madhusūdanaḥ | kāni vā vrajatastasya nimittāni mahaujasaḥ
महात्मा दाशार्ह मधुसूदन किस प्रकार प्रस्थित हुए? और यात्रा करते समय उन महातेजस्वी को कौन-कौन से शकुन दिखाई दिए?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (5.84.2)
तस्य प्रयाणे यान्यासन्निमित्तानि महात्मनः । तानि मे शृणु सर्वाणि दैवान्यौत्पातिकानि च ॥
tasya prayāṇe yānyāsannimittāni mahātmanaḥ | tāni me śṛṇu sarvāṇi daivānyautpātikāni ca
उन महात्मा की यात्रा के समय जो-जो शकुन हुए, वे सब मुझसे सुनो — शुभ शकुन भी और उत्पात-सूचक अपशकुन भी।
श्लोक 3 (5.84.3)
अनभ्रेऽशनिनिर्घोषः सविद्युत्समजायत । अन्वगेव च पर्जन्यः प्रावर्षद्विघने भृशम् ॥
anabhre'śaninirghoṣaḥ savidyutsamajāyata | anvageva ca parjanyaḥ prāvarṣadvighane bhṛśam
बिना बादलों के आकाश में बिजली के साथ वज्रपात का घोष हुआ, और उसके पीछे ही मेघ-देवता बादलरहित आकाश से भारी वर्षा करने लगे।
श्लोक 4 (5.84.4)
प्रत्यगूहुर्महानद्यः प्राङ्मुखाः सिन्धुसप्तमाः । विपरीता दिशः सर्वा न प्राज्ञायत किंचन ॥
pratyagūhurmahānadyaḥ prāṅmukhāḥ sindhusaptamāḥ | viparītā diśaḥ sarvā na prājñāyata kiṃcana
पूर्व की ओर बहने वाली, सिन्धु सहित सातों बड़ी नदियाँ उलटी बहने लगीं; सब दिशाएँ उलट-पुलट हो गईं और कुछ भी पहचाना न जा सका।
श्लोक 5 (5.84.5)
प्राज्वलन्नग्नयो राजन्पृथिवी समकम्पत । उदपानाश्च कुम्भाश्च प्रासिञ्चञ्शतशो जलम् ॥
prājvalannagnayo rājanpṛthivī samakampata | udapānāśca kumbhāśca prāsiñcañśataśo jalam
हे राजन्, अग्नियाँ प्रज्वलित हो उठीं, पृथ्वी काँपने लगी और कुएँ तथा घड़े सैकड़ों धाराओं में जल उछालने लगे।
श्लोक 6 (5.84.6)
तमःसंवृतमप्यासीत्सर्वं जगदिदं तथा । न दिशो नादिशो राजन्प्रज्ञायन्तेस्म रेणुना ॥
tamaḥsaṃvṛtamapyāsītsarvaṃ jagadidaṃ tathā | na diśo nādiśo rājanprajñāyantesma reṇunā
यह सारा जगत अन्धकार से ढक गया; हे राजन्, धूल के कारण न दिशाएँ जान पड़ती थीं, न उपदिशाएँ।
श्लोक 7 (5.84.7)
प्रादुरासीन्महाञ्छब्दः खेशरीरमदृश्यत । सर्वेषु राजन्देशेषु तदद्भुतमिवाभवत् ॥
prādurāsīnmahāñchabdaḥ kheśarīramadṛśyata | sarveṣu rājandeśeṣu tadadbhutamivābhavat
एक महान शब्द प्रकट हुआ और आकाश में एक शरीर दिखाई दिया; हे राजन्, सब देशों में यह एक अद्भुत-सी बात हुई।
श्लोक 8 (5.84.8)
प्रामथ्नाद्धास्तिनपुरं वातो दक्षिणपश्चिमः । आरुजन्गणशो वृक्षान्परुषोऽशनिनिःस्वनः ॥
prāmathnāddhāstinapuraṃ vāto dakṣiṇapaścimaḥ | ārujangaṇaśo vṛkṣānparuṣo'śaniniḥsvanaḥ
दक्षिण-पश्चिम से वज्र के समान गर्जन करती हुई कठोर वायु ने झुण्ड के झुण्ड वृक्षों को उखाड़ते हुए हस्तिनापुर को मथ डाला।
श्लोक 9 (5.84.9)
यत्रयत्र च वार्ष्णेयो वर्तते पथि भारत । तत्रतत्र सुखो वायुः सर्वं चासीत्प्रदक्षिणम् ॥
yatrayatra ca vārṣṇeyo vartate pathi bhārata | tatratatra sukho vāyuḥ sarvaṃ cāsītpradakṣiṇam
परन्तु हे भारत, मार्ग में जहाँ-जहाँ वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण जाते, वहाँ-वहाँ सुखद वायु बहती और सब कुछ अनुकूल हो जाता।
श्लोक 10 (5.84.10)
ववर्ष पुष्पवर्षं च कमलानि च भूरिशः । समश्च पन्था निर्दुःखो व्यपेतकुशकण्टकः ॥
vavarṣa puṣpavarṣaṃ ca kamalāni ca bhūriśaḥ | samaśca panthā nirduḥkho vyapetakuśakaṇṭakaḥ
फूलों की वर्षा होने लगी और बहुत-से कमल भी बरसे; मार्ग समतल और सुखद हो गया, कुश और काँटों से रहित।
श्लोक 11 (5.84.11)
संस्तुतो ब्राह्मणैर्गीर्भिस्तत्रतत्र सहस्रशः । अर्च्यते मधुपर्कैश्च वसुभिश्च वसुप्रदः ॥
saṃstuto brāhmaṇairgīrbhistatratatra sahasraśaḥ | arcyate madhuparkaiśca vasubhiśca vasupradaḥ
स्थान-स्थान पर हजारों ब्राह्मणों ने वाणी से उनकी स्तुति की, और धन देने वाले श्रीकृष्ण का मधुपर्क और धन से पूजन किया गया।
श्लोक 12 (5.84.12)
तं किरन्ति महात्मानं वन्यैः पुष्पैः सुगन्धिभिः । स्त्रियः पथि समागम्य सर्वभूतहिते रतम् ॥
taṃ kiranti mahātmānaṃ vanyaiḥ puṣpaiḥ sugandhibhiḥ | striyaḥ pathi samāgamya sarvabhūtahite ratam
मार्ग में एकत्र होकर स्त्रियाँ समस्त प्राणियों के हित में लगे उन महात्मा पर सुगन्धित वन्य पुष्प बरसाती थीं।
श्लोक 13 (5.84.13)
स शालिभवनं रम्यं सर्वसस्यसमाचितम् । सुखं परमधर्मिष्ठमभ्यगाद्भरतर्षभ ॥
sa śālibhavanaṃ ramyaṃ sarvasasyasamācitam | sukhaṃ paramadharmiṣṭhamabhyagādbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, वे सब प्रकार की फसलों से भरे, सुखद और परम धर्मनिष्ठ, रमणीय शालिभवन में पहुँचे,
श्लोक 14 (5.84.14)
पश्यन्बहुपशून्ग्रामान्रम्यान्हृदयतोषणान् । पुराणि च व्यतिक्रामन्राष्ट्राणि विविधानि च ॥
paśyanbahupaśūngrāmānramyānhṛdayatoṣaṇān | purāṇi ca vyatikrāmanrāṣṭrāṇi vividhāni ca
बहुत-से पशुओं वाले, रमणीय और हृदय को आनन्द देने वाले गाँवों को देखते हुए तथा नाना प्रकार के नगरों और राष्ट्रों को पार करते हुए।
श्लोक 15 (5.84.15)
नित्यं हृष्टाः सुमनसो भारतैरभिरक्षिताः । नोद्विग्नाः परचक्राणां व्यसनानामकोविदाः ॥
nityaṃ hṛṣṭāḥ sumanaso bhāratairabhirakṣitāḥ | nodvignāḥ paracakrāṇāṃ vyasanānāmakovidāḥ
वहाँ के लोग सदा प्रसन्न और प्रसन्नचित्त रहते थे, भरतवंशियों द्वारा सुरक्षित थे; उन्हें शत्रु-सेनाओं का कोई भय नहीं था और वे विपत्तियों को जानते तक न थे।
श्लोक 16 (5.84.16)
उपप्लाव्यादथागम्य जनाः पुरनिवासिनः । पथ्यतिष्ठन्त सहिता विष्वक्सेनदिदृक्षया ॥
upaplāvyādathāgamya janāḥ puranivāsinaḥ | pathyatiṣṭhanta sahitā viṣvaksenadidṛkṣayā
तब नगरवासी लोग आकर उपप्लव्य से आते हुए विष्वक्सेन (श्रीकृष्ण) को देखने की इच्छा से एक साथ मार्ग में खड़े हो गए।
श्लोक 17 (5.84.17)
ते तु सर्वे समायान्तमग्निमिद्धमिव प्रभुम् । अर्चयामासुरर्चार्हं देशातिथिमुपस्थितम् ॥
te tu sarve samāyāntamagnimiddhamiva prabhum | arcayāmāsurarcārhaṃ deśātithimupasthitam
उन सबने प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी, पूजा के योग्य, अपने देश में अतिथि बनकर आए उन प्रभु का पूजन किया।
श्लोक 18 (5.84.18)
वृकस्थलं समासाद्य केशवः परवीरहा । प्रकीर्णरश्मावादित्ये व्योम्नि वै लोहितायति ॥
vṛkasthalaṃ samāsādya keśavaḥ paravīrahā | prakīrṇaraśmāvāditye vyomni vai lohitāyati
शत्रुवीरों का संहार करने वाले केशव वृकस्थल पहुँचे, जब फैली किरणों वाला सूर्य आकाश में लाल हो रहा था।
श्लोक 19 (5.84.19)
ततो ह्यनुचरान्सर्वानुवाच मधुसूदनः । युधिष्ठिरस्य कार्यार्थमिह वत्स्यामहे वयम् ॥
tato hyanucarānsarvānuvāca madhusūdanaḥ | yudhiṣṭhirasya kāryārthamiha vatsyāmahe vayam
तब मधुसूदन ने अपने सब अनुचरों से कहा — "युधिष्ठिर के कार्य के लिए हम यहीं ठहरेंगे।"
श्लोक 20 (5.84.20)
तस्य तन्मतमाज्ञाय चक्रुरावसथं नराः । क्षणेन चान्नपानानि गुणवन्ति समार्जयन् ॥
tasya tanmatamājñāya cakrurāvasathaṃ narāḥ | kṣaṇena cānnapānāni guṇavanti samārjayan
उनका अभिप्राय जानकर लोगों ने निवास-स्थान तैयार किया और क्षण भर में उत्तम अन्न-पान जुटा दिया।
श्लोक 21 (5.84.21)
अवतीर्य रथात्तूर्णं कृत्वा शौचं यथाविधि । रथमोचनमादिश्य सन्ध्यामुपविवेश ह ॥
avatīrya rathāttūrṇaṃ kṛtvā śaucaṃ yathāvidhi | rathamocanamādiśya sandhyāmupaviveśa ha
रथ से तुरन्त उतरकर उन्होंने विधिपूर्वक शौच किया, रथ खोलने का आदेश दिया और सन्ध्योपासना के लिए बैठ गए।
श्लोक 22 (5.84.22)
दारुकोऽपि हयान्मुक्त्वा परिचर्य च शास्त्रतः । मुमोच सर्वं योक्त्रादि मुक्त्वा चैतानवासृजत् ॥
dāruko'pi hayānmuktvā paricarya ca śāstrataḥ | mumoca sarvaṃ yoktrādi muktvā caitānavāsṛjat
दारुक ने भी घोड़ों को खोलकर शास्त्र-विधि से उनकी सेवा की, जोत आदि सब साज उतारे और उन्हें खुला छोड़ दिया।
श्लोक 23 (5.84.23)
तस्मिन्ग्रामे प्रधानास्तु य आसन्ब्राह्मणा नृप । आर्याः कुलीना ह्रीमन्तो ब्राह्मीं वृत्तिमनुष्ठिताः ॥
tasmingrāme pradhānāstu ya āsanbrāhmaṇā nṛpa | āryāḥ kulīnā hrīmanto brāhmīṃ vṛttimanuṣṭhitāḥ
हे राजन्, उस गाँव में जो प्रमुख ब्राह्मण थे — आर्य, कुलीन, लज्जाशील और ब्राह्मणोचित वृत्ति का पालन करने वाले —
श्लोक 24 (5.84.24)
तेऽभिगम्य महात्मानं हृषीकेशमरिन्दमम् । पूजां चक्रुर्यथान्यायमाशीर्मङ्गलसंयुताम् ॥
te'bhigamya mahātmānaṃ hṛṣīkeśamarindamam | pūjāṃ cakruryathānyāyamāśīrmaṅgalasaṃyutām
वे शत्रुदमन महात्मा हृषीकेश के पास आए और आशीर्वाद तथा मंगलाचार सहित उनकी यथोचित पूजा की।
श्लोक 25 (5.84.25)
ते पूजयित्वा दाशार्हं सर्वलोकेषु पूजितम् । न्यवेदयन्त वेश्मानि गुणवन्ति महात्मने ॥
te pūjayitvā dāśārhaṃ sarvalokeṣu pūjitam | nyavedayanta veśmāni guṇavanti mahātmane
समस्त लोकों में पूजित दाशार्ह की पूजा करके उन्होंने उन महात्मा को अपने सुविधा-सम्पन्न घर अर्पित किए।
श्लोक 26 (5.84.26)
तान्प्रभुः कृतमित्युक्त्वा सत्कृत्य च यथार्हतः । अभ्येत्य चैषां वेश्मानि पुनरायात्सहैव तैः ॥
tānprabhuḥ kṛtamityuktvā satkṛtya ca yathārhataḥ | abhyetya caiṣāṃ veśmāni punarāyātsahaiva taiḥ
प्रभु ने उनसे "यह तो हो गया" कहकर उनका यथायोग्य सत्कार किया, उनके घरों में जाकर फिर उन्हीं के साथ लौट आए।
श्लोक 27 (5.84.27)
सुमृष्टं भोजयित्वा च ब्राह्मणांस्तत्र केशवः । भुक्त्वा च सह तैः सर्वैरवसत्तां क्षपां सुखम् ॥
sumṛṣṭaṃ bhojayitvā ca brāhmaṇāṃstatra keśavaḥ | bhuktvā ca saha taiḥ sarvairavasattāṃ kṣapāṃ sukham
वहाँ केशव ने ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन कराया, उन सबके साथ स्वयं भोजन किया और वह रात सुखपूर्वक बिताई।