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उद्योग पर्व · अध्याय 86

धृतराष्ट्र द्वारा श्रीकृष्ण के स्वागत की योजना

यह सुनकर कि श्रीकृष्ण उपप्लव्य से आकर वृकस्थल में ठहरे हैं, धृतराष्ट्र विदुर को बताते हैं कि वे उनका सत्कार कैसे करेंगे — सोने के रथ, हाथी, दास-दासियाँ, ऊनी कम्बल, मृगचर्म, एक दीप्तिमान मणि, खच्चरियों से जुता वाहन और प्रचुर भोजन देकर। वे आदेश देते हैं कि दुर्योधन को छोड़ उनके सभी पुत्र-पौत्र और नगर की प्रमुख वारांगनाएँ श्रीकृष्ण की अगवानी करें, नगर ध्वजाओं से सजाया जाए, मार्ग सींचे जाएँ और दुःशासन का भवन हर योग्य रत्न के साथ उनके लिए तैयार किया जाए।

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धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (5.86.1)

उपप्लाव्यादिह क्षत्तरुपायातो जनार्दनः । वृकस्थले निवसति स च प्रातरिहैष्यति ॥

upaplāvyādiha kṣattarupāyāto janārdanaḥ | vṛkasthale nivasati sa ca prātarihaiṣyati

हे क्षत्ता (विदुर), जनार्दन उपप्लव्य से यहाँ आ पहुँचे हैं। वे वृकस्थल में ठहरे हैं और प्रातःकाल यहाँ पधारेंगे।

श्लोक 2 (5.86.2)

आहुकानामधिपतिः पुरोगः सर्वसात्वताम् । महामना महावीर्यो महासत्त्वो जनार्दनः ॥

āhukānāmadhipatiḥ purogaḥ sarvasātvatām | mahāmanā mahāvīryo mahāsattvo janārdanaḥ

जनार्दन आहुकों के अधिपति और समस्त सात्वतों के अगुआ हैं; वे महामना, महापराक्रमी और महान् सत्त्व वाले हैं।

श्लोक 3 (5.86.3)

स्फीतस्य वृष्णिराष्ट्रस्य भर्ता गोप्ता च माधवः । त्रयाणामपि लोकानां भगवान्प्रपितामहः ॥

sphītasya vṛṣṇirāṣṭrasya bhartā goptā ca mādhavaḥ | trayāṇāmapi lokānāṃ bhagavānprapitāmahaḥ

माधव समृद्ध वृष्णि-राष्ट्र के भरण-पोषण करने वाले और रक्षक हैं; वे भगवान् तीनों लोकों के भी प्रपितामह हैं।

श्लोक 4 (5.86.4)

वृष्ण्यन्धकाः सुमनसो यस्य प्रज्ञामुपासते । आदित्या वसवो रुद्रा यथा बुद्धिं बृहस्पतेः ॥

vṛṣṇyandhakāḥ sumanaso yasya prajñāmupāsate | ādityā vasavo rudrā yathā buddhiṃ bṛhaspateḥ

वृष्णि और अन्धक प्रसन्न मन से उनकी बुद्धि का आश्रय लेते हैं, जैसे आदित्य, वसु और रुद्र बृहस्पति की बुद्धि का आश्रय लेते हैं।

श्लोक 5 (5.86.5)

तस्मै पूजां प्रयोक्ष्यामि दाशार्हाय महात्मने । प्रत्यक्षं तव धर्मज्ञ तां मे कथयतः शृणु ॥

tasmai pūjāṃ prayokṣyāmi dāśārhāya mahātmane | pratyakṣaṃ tava dharmajña tāṃ me kathayataḥ śṛṇu

हे धर्मज्ञ, मैं उन महात्मा दाशार्ह की पूजा तुम्हारी आँखों के सामने करूँगा। मैं उसका वर्णन करता हूँ, सुनो।

श्लोक 6 (5.86.6)

एकवर्णैः सुक्लृप्ताङ्गैर्बाह्लिजातैर्हयोत्तमैः । चतुर्युक्तान्रथांस्तस्मै रौक्मान्दास्यामि षोडश ॥

ekavarṇaiḥ suklṛptāṅgairbāhlijātairhayottamaiḥ | caturyuktānrathāṃstasmai raukmāndāsyāmi ṣoḍaśa

मैं उन्हें सोने के सोलह रथ दूँगा, जिनमें से प्रत्येक में बाह्लीक देश में उत्पन्न, एक ही रंग के, सुडौल अंगों वाले चार उत्तम घोड़े जुते होंगे।

श्लोक 7 (5.86.7)

नित्यप्रभिन्नान्मातङ्गानीषादन्तान्प्रहारिणः । अष्टानुचरमेकैकमष्टौ दास्यामि कौरव ॥

nityaprabhinnānmātaṅgānīṣādantānprahāriṇaḥ | aṣṭānucaramekaikamaṣṭau dāsyāmi kaurava

हे कौरव, मैं उन्हें आठ हाथी दूँगा, जो सदा मदमत्त रहते हैं, जिनके दाँत हल के दण्ड जैसे हैं, जो प्रहार करने में कुशल हैं और जिनमें से प्रत्येक के साथ आठ सेवक हैं।

श्लोक 8 (5.86.8)

दासीनामप्रजातानां शुभानां रुक्मवर्चसाम् । शतमस्मै प्रदास्यामि दासानामपि तावताम् ॥

dāsīnāmaprajātānāṃ śubhānāṃ rukmavarcasām | śatamasmai pradāsyāmi dāsānāmapi tāvatām

मैं उन्हें सौ सुन्दर दासियाँ दूँगा, जिन्होंने अभी सन्तान को जन्म नहीं दिया है और जिनकी कान्ति सोने जैसी है, और उतने ही दास भी।

श्लोक 9 (5.86.9)

आविकं च सुखस्पर्शं पार्वतीयैरुपाहृतम् । तदप्यस्मै प्रदास्यामि सहस्राणि दशाष्ट च ॥

āvikaṃ ca sukhasparśaṃ pārvatīyairupāhṛtam | tadapyasmai pradāsyāmi sahasrāṇi daśāṣṭa ca

पहाड़ी लोगों द्वारा लाए गए, छूने में कोमल ऊनी कम्बल भी मैं उन्हें दूँगा — अठारह हज़ार।

श्लोक 10 (5.86.10)

अजिनानां सहस्राणि चीनदेशोद्भवानि च । तान्यप्यस्मै प्रदास्यामि यावदर्हति केशवः ॥

ajinānāṃ sahasrāṇi cīnadeśodbhavāni ca | tānyapyasmai pradāsyāmi yāvadarhati keśavaḥ

और चीन देश में उत्पन्न हज़ारों मृगचर्म भी — वे भी मैं उन्हें दूँगा, जितने के केशव योग्य हैं।

श्लोक 11 (5.86.11)

दिवा रात्रौ च भात्येष सुतेजा विमलो मणिः । तमप्यस्मै प्रदास्यामि तमर्हति हि केशवः ॥

divā rātrau ca bhātyeṣa sutejā vimalo maṇiḥ | tamapyasmai pradāsyāmi tamarhati hi keśavaḥ

यह तेजस्वी, निर्मल मणि दिन-रात चमकती रहती है; वह भी मैं उन्हें दूँगा, क्योंकि केशव उसके योग्य हैं।

श्लोक 12 (5.86.12)

एकेनाभिपतत्यह्ना योजनानि चतुर्दश । यानमश्वतरीयुक्तं दास्ये तस्मै तदप्यहम् ॥

ekenābhipatatyahnā yojanāni caturdaśa | yānamaśvatarīyuktaṃ dāsye tasmai tadapyaham

खच्चरियों से जुता एक वाहन, जो एक ही दिन में चौदह योजन चला जाता है — वह भी मैं उन्हें दूँगा।

श्लोक 13 (5.86.13)

यावन्ति वाहनान्यस्य यावन्तः पुरुषाश्च ते । ततोऽष्टगुणमप्यस्मै भोज्यं दास्याम्यहं सदा ॥

yāvanti vāhanānyasya yāvantaḥ puruṣāśca te | tato'ṣṭaguṇamapyasmai bhojyaṃ dāsyāmyahaṃ sadā

उनके जितने वाहन-पशु हैं और जितने लोग हैं, उनसे आठ गुना भोजन मैं उन्हें सदा देता रहूँगा।

श्लोक 14 (5.86.14)

मम पुत्राश्च पौत्राश्च सर्वे दुर्योधनादृते । प्रत्युद्यास्यन्ति दाशार्हं रथैर्मृष्टैः स्वलङ्कृताः ॥

mama putrāśca pautrāśca sarve duryodhanādṛte | pratyudyāsyanti dāśārhaṃ rathairmṛṣṭaiḥ svalaṅkṛtāḥ

दुर्योधन को छोड़ मेरे सभी पुत्र और पौत्र भली-भाँति सजे हुए, चमचमाते रथों पर सवार होकर दाशार्ह की अगवानी के लिए जाएँगे।

श्लोक 15 (5.86.15)

स्वलङ्कृताश्च कल्याण्यः पादैरेव सहस्रशः । वारमुख्या महाभागं प्रत्युद्यास्यन्ति केशवम् ॥

svalaṅkṛtāśca kalyāṇyaḥ pādaireva sahasraśaḥ | vāramukhyā mahābhāgaṃ pratyudyāsyanti keśavam

सुन्दर, भली-भाँति सजी हुई प्रमुख वारांगनाएँ हज़ारों की संख्या में पैदल ही महाभाग केशव की अगवानी के लिए जाएँगी।

श्लोक 16 (5.86.16)

नगरादपि याः काश्चिद्गमिष्यन्ति जनार्दनम् । द्रष्टुं कन्याश्च कल्याण्यस्ताश्च यास्यन्त्यनावृताः ॥

nagarādapi yāḥ kāścidgamiṣyanti janārdanam | draṣṭuṃ kanyāśca kalyāṇyastāśca yāsyantyanāvṛtāḥ

नगर की जो भी सुन्दर कन्याएँ जनार्दन के दर्शन के लिए जाएँगी, वे बिना घूँघट के जाएँ।

श्लोक 17 (5.86.17)

सस्त्रीपुरुषबालं च नगरं मधुसूदनम् । उदीक्षतां महात्मानं भानुमन्तमिव प्रजाः ॥

sastrīpuruṣabālaṃ ca nagaraṃ madhusūdanam | udīkṣatāṃ mahātmānaṃ bhānumantamiva prajāḥ

स्त्री, पुरुष और बालकों सहित सारा नगर महात्मा मधुसूदन को वैसे ही निहारे, जैसे प्रजा सूर्य को निहारती है।

श्लोक 18 (5.86.18)

महाध्वजपताकाश्च क्रियन्तां सर्वतो दिशः । जलावसिक्तो विरजाः पन्थास्तस्येति चान्वशात् ॥

mahādhvajapatākāśca kriyantāṃ sarvato diśaḥ | jalāvasikto virajāḥ panthāstasyeti cānvaśāt

"चारों ओर बड़े-बड़े ध्वज और पताकाएँ लगाई जाएँ, और उनका मार्ग जल से सींचकर धूल-रहित किया जाए" — ऐसा उन्होंने आदेश दिया।

श्लोक 19 (5.86.19)

दुःशासनस्य च गृहं दुर्योधनगृहाद्वरम् । तदद्य क्रियतां क्षिप्रं सुसंमृष्टमलङ्कृतम् ॥

duḥśāsanasya ca gṛhaṃ duryodhanagṛhādvaram | tadadya kriyatāṃ kṣipraṃ susaṃmṛṣṭamalaṅkṛtam

दुःशासन का भवन दुर्योधन के भवन से भी उत्तम है। उसे आज ही शीघ्र भली-भाँति स्वच्छ करके सजाया जाए।

श्लोक 20 (5.86.20)

एतद्धि रुचिराकारैः प्रासादैरुपशोभितम् । शिवं च रमणीयं च सर्वर्तु सुमहाधनम् ॥

etaddhi rucirākāraiḥ prāsādairupaśobhitam | śivaṃ ca ramaṇīyaṃ ca sarvartu sumahādhanam

क्योंकि वह सुन्दर आकार वाले महलों से सुशोभित है; वह मंगलमय और रमणीय है, सभी ऋतुओं में सुखद है और उसमें अपार धन है।

श्लोक 21 (5.86.21)

सर्वमस्मिन्गृहे रत्नं मम दुर्योधनस्य च । यद्यदर्हति वार्ष्णेयस्तत्तद्देयमसंशयम् ॥

sarvamasmingṛhe ratnaṃ mama duryodhanasya ca | yadyadarhati vārṣṇeyastattaddeyamasaṃśayam

उस भवन में मेरे और दुर्योधन के जितने भी रत्न हैं, उनमें से वार्ष्णेय जिस-जिस के योग्य हों, वह-वह उन्हें निःसंदेह दिया जाए।

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