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उद्योग पर्व · अध्याय 89

श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर में प्रवेश

प्रातःकाल श्रीकृष्ण वृकस्थल से कुरुओं की राजधानी के लिए चल पड़ते हैं। दुर्योधन को छोड़ धृतराष्ट्र के सभी पुत्र भीष्म, द्रोण और कृप के साथ उनकी अगवानी करते हैं, और सारा नगर सजे हुए राजमार्ग पर उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़ता है। वे धृतराष्ट्र के महल में प्रवेश करते हैं, जहाँ राजा और वृद्धजन उठकर उनका स्वागत करते हैं; वे अतिथि-सत्कार ग्रहण करके कुरुओं से हास-परिहास करते हैं, फिर विदा लेकर विदुर के घर जाते हैं। विदुर उनका स्वागत करके पाण्डवों का कुशल पूछते हैं, और श्रीकृष्ण उन्हें पाण्डवों का सारा वृत्तान्त सुनाते हैं।

अध्याय 88अध्याय-सूचीअध्याय 90

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.89.1)

प्रातरुत्थाय कृष्णस्तु कृतवान्सर्वमाह्निकम् । ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः प्रययौ नगरं प्रति ॥

prātarutthāya kṛṣṇastu kṛtavānsarvamāhnikam | brāhmaṇairabhyanujñātaḥ prayayau nagaraṃ prati

प्रातःकाल उठकर श्रीकृष्ण ने सारा नित्यकर्म किया और ब्राह्मणों की अनुमति लेकर नगर की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 2 (5.89.2)

तं प्रयान्तं महाबाहुमनुज्ञाप्य महाबलम् । पर्यवर्तन्त ते सर्वे वृकस्थलनिवासिनः ॥

taṃ prayāntaṃ mahābāhumanujñāpya mahābalam | paryavartanta te sarve vṛkasthalanivāsinaḥ

प्रस्थान करते हुए महाबली महाबाहु श्रीकृष्ण से विदा लेकर वृकस्थल के सभी निवासी लौट गए।

श्लोक 3 (5.89.3)

प्रददौ पुण्डरीकाक्षो रत्नानि च धनानि च । तान्प्रस्थाप्य महाबाहुरुपायात्कुरुसंसदम् ॥

pradadau puṇḍarīkākṣo ratnāni ca dhanāni ca | tānprasthāpya mahābāhurupāyātkurusaṃsadam

कमलनयन ने उन्हें रत्न और धन दिए, और उन्हें विदा करके वे महाबाहु कुरुओं की सभा की ओर चल पड़े।

श्लोक 4 (5.89.4)

धार्तराष्ट्रास्तमायान्तं प्रत्युज्जग्मुः स्वलङ्कृताः । दुर्योधनादृते सर्वे भीष्मद्रोणकृपादयः ॥

dhārtarāṣṭrāstamāyāntaṃ pratyujjagmuḥ svalaṅkṛtāḥ | duryodhanādṛte sarve bhīṣmadroṇakṛpādayaḥ

दुर्योधन को छोड़ धृतराष्ट्र के सभी पुत्र भली-भाँति सज-धजकर भीष्म, द्रोण, कृप आदि के साथ आते हुए श्रीकृष्ण की अगवानी के लिए निकले।

श्लोक 5 (5.89.5)

पौराश्च बहुला राजन्हृषीकेशं दिदृक्षवः । यानैर्बहुविधैरन्ये पद्भिरेव तथाऽपरे ॥

paurāśca bahulā rājanhṛṣīkeśaṃ didṛkṣavaḥ | yānairbahuvidhairanye padbhireva tathā'pare

हे राजन्, हृषीकेश के दर्शन को उत्सुक बहुत-से पुरवासी भी निकल पड़े — कुछ अनेक प्रकार के वाहनों पर और कुछ पैदल ही।

श्लोक 6 (5.89.6)

स वै पथि समागम्य भीष्मेणाक्लिष्टकर्मणा । द्रोणेन धार्तराष्ट्रैश्च तैर्वृतो नगरं ययौ ॥

sa vai pathi samāgamya bhīṣmeṇākliṣṭakarmaṇā | droṇena dhārtarāṣṭraiśca tairvṛto nagaraṃ yayau

मार्ग में अक्लिष्टकर्मा भीष्म, द्रोण और धृतराष्ट्र के पुत्रों से मिलकर, उनसे घिरे हुए वे नगर में गए।

श्लोक 7 (5.89.7)

कृष्णसंमाननार्थं च नगरं समलङ्कृतम् । बभूव राजमार्गश्च बहुरत्नसमाचितः ॥

kṛṣṇasaṃmānanārthaṃ ca nagaraṃ samalaṅkṛtam | babhūva rājamārgaśca bahuratnasamācitaḥ

श्रीकृष्ण के सम्मान के लिए नगर सजाया गया था, और राजमार्ग अनेक रत्नों से भरा हुआ था।

श्लोक 8 (5.89.8)

न च कश्चिद्गृहे राजंस्तदाऽऽसीद्भरतर्षभ । न स्त्री न वृद्धो न शिशुर्वासुदेवदिदृक्षया ॥

na ca kaścidgṛhe rājaṃstadā''sīdbharatarṣabha | na strī na vṛddho na śiśurvāsudevadidṛkṣayā

हे राजन्, हे भरतश्रेष्ठ, उस दिन वासुदेव के दर्शन की उत्कण्ठा में कोई भी घर में नहीं रहा — न स्त्री, न वृद्ध, न बालक।

श्लोक 9 (5.89.9)

राजमार्गे नरास्तस्मिन्संस्तुवन्त्यवनिं गताः । तस्मिन्काले महाराज हृषीकेशप्रवेशने ॥

rājamārge narāstasminsaṃstuvantyavaniṃ gatāḥ | tasminkāle mahārāja hṛṣīkeśapraveśane

हे महाराज, उस समय जब हृषीकेश नगर में प्रवेश कर रहे थे, उस राजमार्ग पर लोग भूमि पर झुककर उनकी स्तुति कर रहे थे।

श्लोक 10 (5.89.10)

आवृतानि वरस्त्रीभिर्गृहाणि सुमहान्त्यपि । प्रचलन्तीव भारेण दृश्यन्तेस्म महीतले ॥

āvṛtāni varastrībhirgṛhāṇi sumahāntyapi | pracalantīva bhāreṇa dṛśyantesma mahītale

सुन्दर स्त्रियों से भरे हुए बड़े-बड़े भवन भी मानो भार से पृथ्वी पर डोलते हुए दिखाई देते थे।

श्लोक 11 (5.89.11)

तथा च गतिमन्तस्ते वासुदेवस्य वाजिनः । प्रनष्टगतयोऽभूवन्राजमार्गे नरैर्वृते ॥

tathā ca gatimantaste vāsudevasya vājinaḥ | pranaṣṭagatayo'bhūvanrājamārge narairvṛte

और वासुदेव के वे तेज़ घोड़े भी लोगों से भरे राजमार्ग पर अपनी गति खो बैठे।

श्लोक 12 (5.89.12)

स गृहं धृतराष्ट्रस्य प्राविशच्छत्रुकर्शनः । पाण्डुरैः पुण्डरीकाक्षः प्रासादैरुपशोभितम् ॥

sa gṛhaṃ dhṛtarāṣṭrasya prāviśacchatrukarśanaḥ | pāṇḍuraiḥ puṇḍarīkākṣaḥ prāsādairupaśobhitam

शत्रुओं का संहार करने वाले कमलनयन ने श्वेत प्रासादों से सुशोभित धृतराष्ट्र के भवन में प्रवेश किया।

श्लोक 13 (5.89.13)

तिस्रः कक्ष्या व्यतिक्रम्य केशवो राजवेश्मनः । वैचित्रवीर्यं राजानमभ्यगच्छदरिन्दमः ॥

tisraḥ kakṣyā vyatikramya keśavo rājaveśmanaḥ | vaicitravīryaṃ rājānamabhyagacchadarindamaḥ

राजभवन की तीन ड्योढ़ियाँ पार करके शत्रुदमन केशव विचित्रवीर्य के पुत्र राजा धृतराष्ट्र के पास पहुँचे।

श्लोक 14 (5.89.14)

अभ्यागच्छति दाशार्हे प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः । सहैव द्रोणभीष्माभ्यामुदतिष्ठन्महायशाः ॥

abhyāgacchati dāśārhe prajñācakṣurnarādhipaḥ | sahaiva droṇabhīṣmābhyāmudatiṣṭhanmahāyaśāḥ

दाशार्ह के आने पर प्रज्ञाचक्षु यशस्वी राजा द्रोण और भीष्म के साथ ही उठकर खड़े हो गए।

श्लोक 15 (5.89.15)

कृपश्च सोमदत्तश्च महाराजश्च बाह्लिकः । आसनेभ्योऽचलन्सर्वे पूजयन्तो जनार्दनम् ॥

kṛpaśca somadattaśca mahārājaśca bāhlikaḥ | āsanebhyo'calansarve pūjayanto janārdanam

कृप, सोमदत्त और महाराज बाह्लीक — सभी जनार्दन का सम्मान करते हुए अपने आसनों से उठ खड़े हुए।

श्लोक 16 (5.89.16)

ततो राजानमासाद्य धृतराष्ट्रं यशस्विनम् । सभीष्मं पूजयामास वार्ष्णेयो वाग्भिरञ्जसा ॥

tato rājānamāsādya dhṛtarāṣṭraṃ yaśasvinam | sabhīṣmaṃ pūjayāmāsa vārṣṇeyo vāgbhirañjasā

तब वार्ष्णेय ने यशस्वी राजा धृतराष्ट्र और भीष्म के पास जाकर तुरन्त वचनों से उनका सम्मान किया।

श्लोक 17 (5.89.17)

तेषु धर्मानुपूर्वी तां प्रयुज्य मधुसूदनः । यथावयः समीयाय राजभिः सह माधवः ॥

teṣu dharmānupūrvī tāṃ prayujya madhusūdanaḥ | yathāvayaḥ samīyāya rājabhiḥ saha mādhavaḥ

उनके बीच धर्म के अनुसार क्रम का पालन करते हुए मधुसूदन माधव ने राजाओं से उनकी आयु के अनुसार भेंट की।

श्लोक 18 (5.89.18)

अथ द्रोणं सबाह्लीकं सपुत्रं च यशस्विनम् । कृपं च सोमदत्तं च समीयाय जनार्दनः ॥

atha droṇaṃ sabāhlīkaṃ saputraṃ ca yaśasvinam | kṛpaṃ ca somadattaṃ ca samīyāya janārdanaḥ

फिर जनार्दन पुत्र सहित द्रोण से, यशस्वी बाह्लीक से, तथा कृप और सोमदत्त से मिले।

श्लोक 19 (5.89.19)

तत्रासीदूर्जितं मृष्टं काञ्चनं महदासनम् । शासनाद्धृतराष्ट्रस्य तत्रोपाविशदच्युतः ॥

tatrāsīdūrjitaṃ mṛṣṭaṃ kāñcanaṃ mahadāsanam | śāsanāddhṛtarāṣṭrasya tatropāviśadacyutaḥ

वहाँ एक विशाल, भव्य, चमचमाता स्वर्ण-आसन रखा था; धृतराष्ट्र के आदेश से अच्युत उस पर बैठे।

श्लोक 20 (5.89.20)

अथ गां मधुपर्कं चाप्युदकं च जनार्दने । उपजह्रुर्यथान्यायं धृतराष्ट्रपुरोहिताः ॥

atha gāṃ madhuparkaṃ cāpyudakaṃ ca janārdane | upajahruryathānyāyaṃ dhṛtarāṣṭrapurohitāḥ

तब धृतराष्ट्र के पुरोहितों ने विधिपूर्वक जनार्दन को गौ, मधुपर्क और जल अर्पित किया।

श्लोक 21 (5.89.21)

कृतातिथ्यस्तु गोविन्दः सर्वान्परिहसन्कुरून् । आस्ते सांबन्धिकं कुर्वन्कुरुभिः परिवारितः ॥

kṛtātithyastu govindaḥ sarvānparihasankurūn | āste sāṃbandhikaṃ kurvankurubhiḥ parivāritaḥ

आतिथ्य ग्रहण करके गोविन्द कुरुओं से घिरे बैठे रहे; वे सबसे हास-परिहास करते हुए सम्बन्धियों जैसी बातचीत करते रहे।

श्लोक 22 (5.89.22)

सोऽर्चितो धृतराष्ट्रेण पूजितश्च महायशाः । राजानं समनुज्ञाप्य निरक्रामदरिन्दमः ॥

so'rcito dhṛtarāṣṭreṇa pūjitaśca mahāyaśāḥ | rājānaṃ samanujñāpya nirakrāmadarindamaḥ

धृतराष्ट्र द्वारा पूजित और प्रशंसित होकर वे यशस्वी शत्रुदमन राजा से अनुमति लेकर बाहर निकल आए।

श्लोक 23 (5.89.23)

तैः समेत्य यथान्यायं कुरुभिः कुरुसंसदि । विदुरावसथं रम्यमुपातिष्ठत माधवः ॥

taiḥ sametya yathānyāyaṃ kurubhiḥ kurusaṃsadi | vidurāvasathaṃ ramyamupātiṣṭhata mādhavaḥ

कुरुओं की सभा में कुरुओं से यथोचित रूप से मिलकर माधव विदुर के रमणीय निवास पर पहुँचे।

श्लोक 24 (5.89.24)

विदुरः सर्वकल्याणैरभिगम्य जनार्दनम् । अर्चयामास दाशार्हं सर्वकामैरुपस्थितम् ॥

viduraḥ sarvakalyāṇairabhigamya janārdanam | arcayāmāsa dāśārhaṃ sarvakāmairupasthitam

विदुर ने सभी मंगल-सामग्रियों के साथ जनार्दन के पास जाकर दाशार्ह की पूजा की और उनकी हर इच्छा की पूर्ति का प्रबन्ध किया।

श्लोक 25 (5.89.25)

कृतातिथ्यं तु गोविन्दं विदुरः सर्वधर्मवित् । कुशलं पाण्डुपुत्राणामपृच्छन्मधुसूदनम् ॥

kṛtātithyaṃ tu govindaṃ viduraḥ sarvadharmavit | kuśalaṃ pāṇḍuputrāṇāmapṛcchanmadhusūdanam

गोविन्द का आतिथ्य हो जाने पर सम्पूर्ण धर्म के ज्ञाता विदुर ने मधुसूदन से पाण्डु-पुत्रों का कुशल-समाचार पूछा।

श्लोक 26 (5.89.26)

प्रीयमाणस्य सुहृदो विदुरो बुद्धिसत्तमः । धर्मार्थनित्यस्य सतो गतरोषस्य धीमतः ॥

prīyamāṇasya suhṛdo viduro buddhisattamaḥ | dharmārthanityasya sato gataroṣasya dhīmataḥ

बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विदुर ने अपने उन प्रसन्नचित्त सुहृद से यह पूछा, जो सदा धर्म और अर्थ में तत्पर, सज्जन, क्रोधरहित और बुद्धिमान हैं।

श्लोक 27 (5.89.27)

तस्य सर्वं सविस्तारं पाण्डवानां विचेष्टितम् । क्षत्तुराचष्ट दाशार्हः सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ॥

tasya sarvaṃ savistāraṃ pāṇḍavānāṃ viceṣṭitam | kṣatturācaṣṭa dāśārhaḥ sarvaṃ pratyakṣadarśivān

और सब कुछ अपनी आँखों से देखने वाले दाशार्ह ने क्षत्ता (विदुर) को पाण्डवों की सारी गतिविधियाँ विस्तार से कह सुनाईं।

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