उद्योग पर्व · अध्याय 90
कृष्ण का कुन्ती से मिलना
अपराह्न में कृष्ण विदुर के घर से अपनी बुआ कुन्ती से मिलने जाते हैं, जो उन्हें गले लगाकर रो पड़ती हैं। वे अपने एक-एक पुत्र और द्रौपदी का कुशल पूछती हैं, चौदह वर्षों के वनवास और द्यूतसभा में द्रौपदी के अपमान पर शोक करती हैं, विदुर के आचरण की प्रशंसा करती हैं और कुन्तिभोज को सौंप देने के लिए अपने पिता को दोष देती हैं। वे अर्जुन की विजय की भविष्यवाणी करने वाली आकाशवाणी का स्मरण करती हैं और पुत्रों को अपने अधिकार के लिए युद्ध करने का कठोर संदेश भेजती हैं। कृष्ण पाण्डवों के कुशल और आने वाली विजय का आश्वासन देकर उन्हें सांत्वना देते हैं; कुन्ती पुत्रों का भार उन्हें सौंपती हैं और कृष्ण दुर्योधन के भवन की ओर चल पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.90.1)
अथोपगम्य विदुरमपराह्णे जनार्दनः । पितृष्वसारं स पृथामभ्यगच्छदरिन्दमः ॥
athopagamya viduramaparāhṇe janārdanaḥ | pitṛṣvasāraṃ sa pṛthāmabhyagacchadarindamaḥ
तब विदुर से मिलकर शत्रुओं का दमन करने वाले जनार्दन अपराह्न में अपनी बुआ पृथा के पास गए।
श्लोक 2 (5.90.2)
सा दृष्ट्वा कृष्णमायान्तं प्रसन्नादित्यवर्चसम् । कण्ठे गृहीत्वा प्राक्रोशत्स्मरन्ती तनयान्पृथा ॥
sā dṛṣṭvā kṛṣṇamāyāntaṃ prasannādityavarcasam | kaṇṭhe gṛhītvā prākrośatsmarantī tanayānpṛthā
निर्मल सूर्य के समान तेजस्वी कृष्ण को आते देख पृथा उनके गले से लिपट गईं और अपने पुत्रों को याद करके ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं।
श्लोक 3 (5.90.3)
तेषां सत्ववतां मध्ये गोविन्दं सहचारिणम् । चिरस्य दृष्ट्वा वार्ष्णेयं बाष्पमाहारयत्पृथा ॥
teṣāṃ satvavatāṃ madhye govindaṃ sahacāriṇam | cirasya dṛṣṭvā vārṣṇeyaṃ bāṣpamāhārayatpṛthā
अपने उन बलशाली पुत्रों के बीच रहने वाले उनके साथी, वृष्णिवंशी गोविन्द को बहुत समय बाद देखकर पृथा की आँखों से आँसू बहने लगे।
श्लोक 4 (5.90.4)
साऽब्रवीत्कृष्णमासीनं कृतातिथ्यं युधां पतिम् । बाष्पगद्गदपूर्णेन मुखेन परिशुष्यता ॥
sā'bravītkṛṣṇamāsīnaṃ kṛtātithyaṃ yudhāṃ patim | bāṣpagadgadapūrṇena mukhena pariśuṣyatā
जब योद्धाओं के स्वामी कृष्ण का आतिथ्य हो चुका और वे आसन पर बैठ गए, तब कुन्ती आँसुओं से रुँधे कंठ और सूखते मुख से उनसे बोलीं —
कुन्त्युवाच
श्लोक 5 (5.90.5)
एते बाल्यात्प्रभृत्येव गुरुशुश्रूषणे रताः । परस्परस्य सुहृदः संमताः समचेतसः । निकृत्या भ्रंशिता राज्याज्जनार्हा निर्जनं गताः ॥
ete bālyātprabhṛtyeva guruśuśrūṣaṇe ratāḥ | parasparasya suhṛdaḥ saṃmatāḥ samacetasaḥ | nikṛtyā bhraṃśitā rājyājjanārhā nirjanaṃ gatāḥ
"मेरे ये पुत्र बचपन से ही गुरुजनों की सेवा में लगे रहे; वे एक-दूसरे के सच्चे सुहृद्, सबके आदरणीय और एकचित्त थे। छल से राज्य छिन जाने पर, जो लोगों के बीच रहने योग्य थे, वे निर्जन वन में चले गए।
श्लोक 6 (5.90.6)
विनीतक्रोधहर्षाश्च ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः । त्यक्त्वा प्रियसुखे पार्था रुदतीमपहाय माम् ॥
vinītakrodhaharṣāśca brahmaṇyāḥ satyavādinaḥ | tyaktvā priyasukhe pārthā rudatīmapahāya mām
क्रोध और हर्ष को जीत चुके, ब्राह्मणों के भक्त और सत्यवादी पृथापुत्र अपने प्रिय पदार्थों और सुखों को छोड़कर, मुझ रोती हुई को त्यागकर,
श्लोक 7 (5.90.7)
अहार्षुश्च वनं यान्तः समूलं हृदयं मम । अतदर्हा महात्मानः कथं केशव पाण्डवाः ॥
ahārṣuśca vanaṃ yāntaḥ samūlaṃ hṛdayaṃ mama | atadarhā mahātmānaḥ kathaṃ keśava pāṇḍavāḥ
वन जाते समय मेरा हृदय जड़ से उखाड़ ले गए। हे केशव, इस दुःख के अयोग्य वे महात्मा पाण्डव
श्लोक 8 (5.90.8)
ऊषुर्महावने तात सिंहव्याघ्रगजाकुले । बाला विहीनाः पित्रा ते मया सततलालिताः ॥
ūṣurmahāvane tāta siṃhavyāghragajākule | bālā vihīnāḥ pitrā te mayā satatalālitāḥ
हे तात, सिंहों, बाघों और हाथियों से भरे उस महावन में कैसे रहे होंगे? वे बालक, जो पिता से वंचित थे और जिन्हें मैंने सदा लाड़-प्यार से पाला —
श्लोक 9 (5.90.9)
अपश्यन्तश्च पितरौ कथमूषुर्महावने । शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्मृदङ्गैर्वेणुनिस्वनैः ॥
apaśyantaśca pitarau kathamūṣurmahāvane | śaṅkhadundubhinirghoṣairmṛdaṅgairveṇunisvanaiḥ
वे माता-पिता को देखे बिना उस महावन में कैसे रहे? शंखों और दुन्दुभियों के घोष, मृदंगों और बाँसुरियों की ध्वनि से
श्लोक 10 (5.90.10)
पाण्डवाः समबोध्यन्त बाल्यात्प्रभृति केशव । ये स्म वारणशब्देन हयानां हेषितेन च ॥
pāṇḍavāḥ samabodhyanta bālyātprabhṛti keśava | ye sma vāraṇaśabdena hayānāṃ heṣitena ca
हे केशव, पाण्डव बचपन से जगाए जाते थे। जो घर में हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की हिनहिनाहट
श्लोक 11 (5.90.11)
रथनेमिनिनादैश्च व्यबोध्यन्त तदा गृहे । शङ्खभेरीनिनादेन वेणुवीणानुनादिना ॥
rathanemininādaiśca vyabodhyanta tadā gṛhe | śaṅkhabherīninādena veṇuvīṇānunādinā
और रथ के पहियों की घरघराहट से जगाए जाते थे; शंख और भेरी के नाद तथा बाँसुरी और वीणा की मधुर ध्वनि से,
श्लोक 12 (5.90.12)
पुण्याहघोषमिश्रेण पूज्यमाना द्विजातिभिः । वस्त्रै रत्नैरलङ्कारैः पूजयन्तो द्विजन्मनः ॥
puṇyāhaghoṣamiśreṇa pūjyamānā dvijātibhiḥ | vastrai ratnairalaṅkāraiḥ pūjayanto dvijanmanaḥ
जिसमें पुण्याहवाचन का घोष मिला रहता था; जिनका द्विज सम्मान करते थे और जो स्वयं वस्त्रों, रत्नों और आभूषणों से ब्राह्मणों का पूजन करते थे;
श्लोक 13 (5.90.13)
गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिर्ब्राह्मणानां महात्मनाम् । अर्चितैरर्चनार्हैश्च स्तुवद्भिरभिनन्दिताः ॥
gīrbhirmaṅgalayuktābhirbrāhmaṇānāṃ mahātmanām | arcitairarcanārhaiśca stuvadbhirabhinanditāḥ
जिनका महात्मा ब्राह्मण मंगलमय वचनों से अभिनन्दन करते थे और जिन्हें पूजनीय, सम्मानित जन स्तुति करते हुए आशीर्वाद देते थे —
श्लोक 14 (5.90.14)
प्रासादाग्रेष्वबोध्यन्त राङ्कवाजिनशायिनः । क्रूरं च निनदं श्रुत्वा श्वापदानां महावने ॥
prāsādāgreṣvabodhyanta rāṅkavājinaśāyinaḥ | krūraṃ ca ninadaṃ śrutvā śvāpadānāṃ mahāvane
वे महलों के ऊपरी कक्षों में रांकव ऊनी बिछौनों और मृगचर्म पर सोकर जागते थे। अब महावन में हिंसक पशुओं का भयानक नाद सुनकर
श्लोक 15 (5.90.15)
न स्मोपयान्ति निद्रां ते न तदर्हा जनार्दन । भेरीमृदङ्गनिनदैः शङ्खवैणवनिस्वनैः ॥
na smopayānti nidrāṃ te na tadarhā janārdana | bherīmṛdaṅganinadaiḥ śaṅkhavaiṇavanisvanaiḥ
हे जनार्दन, वे इस दुःख के अयोग्य पुत्र निश्चय ही सो नहीं पाते होंगे। जो भेरी और मृदंग के नाद, शंख और बाँसुरी की ध्वनि,
श्लोक 16 (5.90.16)
स्त्रीणां गीतनिनादैश्च मधुरैर्मधुसूदन । वन्दिमागधसूतैश्च स्तुवद्भिर्बोधिताः कथम् ॥
strīṇāṃ gītaninādaiśca madhurairmadhusūdana | vandimāgadhasūtaiśca stuvadbhirbodhitāḥ katham
हे मधुसूदन, स्त्रियों के मधुर गीतों और स्तुति करते हुए वन्दियों, मागधों और सूतों से जगाए जाते थे — वे अब
श्लोक 17 (5.90.17)
महावनेष्वबोध्यन्त श्वापदानां रुतेन च । ह्रीमान्सत्यधृतिर्दान्तो भूतानामनुकम्पिता ॥
mahāvaneṣvabodhyanta śvāpadānāṃ rutena ca | hrīmānsatyadhṛtirdānto bhūtānāmanukampitā
महावनों में हिंसक पशुओं की आवाज़ से कैसे जागते होंगे? जो लज्जाशील, सत्य में दृढ़, संयमी और सब प्राणियों पर दया करने वाला है,
श्लोक 18 (5.90.18)
कामद्वेषौ वशे कृत्वा सतां वर्त्मानुवर्तते । अम्बरीषस्य मान्धातुर्ययातेर्नहुषस्य च ॥
kāmadveṣau vaśe kṛtvā satāṃ vartmānuvartate | ambarīṣasya māndhāturyayāternahuṣasya ca
जो काम और द्वेष को वश में करके सत्पुरुषों के मार्ग पर चलता है; जो अम्बरीष, मान्धाता, ययाति और नहुष,
श्लोक 19 (5.90.19)
भरतस्य दिलीपस्य शिबेरौशीनरस्य च । राजर्षीणां पुराणानां धुरं धत्ते दुरुद्वहाम् ॥
bharatasya dilīpasya śiberauśīnarasya ca | rājarṣīṇāṃ purāṇānāṃ dhuraṃ dhatte durudvahām
भरत, दिलीप और उशीनरपुत्र शिबि — इन प्राचीन राजर्षियों का कठिनाई से उठाया जाने वाला भार वहन करता है;
श्लोक 20 (5.90.20)
शीलवृत्तोपसंपन्नो धर्मज्ञः सत्यसङ्गरः । राजा सर्वगुणोपेतस्त्रैलोक्यस्यापि यो भवेत् ॥
śīlavṛttopasaṃpanno dharmajñaḥ satyasaṅgaraḥ | rājā sarvaguṇopetastrailokyasyāpi yo bhavet
जो शील और सदाचार से सम्पन्न, धर्मज्ञ और सत्यप्रतिज्ञ है, सब गुणों से युक्त ऐसा राजा जो तीनों लोकों का भी स्वामी होने योग्य है;
श्लोक 21 (5.90.21)
अजातशत्रुर्धर्मात्मा शुद्धजाम्बूनदप्रभः । श्रेष्ठः कुरुषु सर्वेषु धर्मतः श्रुतवृत्ततः । प्रियदर्शो दीर्घभुजः कथं कृष्ण युधिष्ठिरः ॥
ajātaśatrurdharmātmā śuddhajāmbūnadaprabhaḥ | śreṣṭhaḥ kuruṣu sarveṣu dharmataḥ śrutavṛttataḥ | priyadarśo dīrghabhujaḥ kathaṃ kṛṣṇa yudhiṣṭhiraḥ
अजातशत्रु, धर्मात्मा, शुद्ध स्वर्ण के समान कान्तिमान, धर्म, विद्या और आचरण में सब कुरुओं में श्रेष्ठ, प्रियदर्शन और दीर्घबाहु — हे कृष्ण, वह युधिष्ठिर कैसा है?
श्लोक 22 (5.90.22)
यः स नागायुतप्राणो वातरंहा महाबलः । सामर्षः पाण्डवो नित्यं प्रियो भ्रातुः प्रियंकरः ॥
yaḥ sa nāgāyutaprāṇo vātaraṃhā mahābalaḥ | sāmarṣaḥ pāṇḍavo nityaṃ priyo bhrātuḥ priyaṃkaraḥ
जिसमें दस हज़ार हाथियों का बल और वायु का वेग है, जो महाबली है, अन्याय को कभी सहन नहीं करता, भाई का प्यारा है और उसका प्रिय करता है;
श्लोक 23 (5.90.23)
कीचकस्य तु सज्ञातेर्यो हन्ता मधुसूदन । शूरः क्रोधवशानां च हिडिम्बस्य बकस्य च ॥
kīcakasya tu sajñāteryo hantā madhusūdana | śūraḥ krodhavaśānāṃ ca hiḍimbasya bakasya ca
हे मधुसूदन, जिसने कीचक को उसके बन्धुओं सहित मारा, और जो क्रोधवशों, हिडिम्ब और बक का वध करने वाला वीर है;
श्लोक 24 (5.90.24)
पराक्रमे शक्रसमो मातरिश्वसमो बले । महेश्वरसमः क्रोधे भीमः प्रहरतां वरः ॥
parākrame śakrasamo mātariśvasamo bale | maheśvarasamaḥ krodhe bhīmaḥ praharatāṃ varaḥ
जो पराक्रम में इन्द्र के, बल में वायु के और क्रोध में महेश्वर के समान है — योद्धाओं में श्रेष्ठ भीम;
श्लोक 25 (5.90.25)
क्रोधं बलममर्षं च यो निधाय परंतपः । जितात्मा पाण्डवोऽमर्षी भ्रातुस्तिष्ठति शासने ॥
krodhaṃ balamamarṣaṃ ca yo nidhāya paraṃtapaḥ | jitātmā pāṇḍavo'marṣī bhrātustiṣṭhati śāsane
वह शत्रुतापन, जो अपने क्रोध, बल और असहिष्णुता को दबाकर, स्वयं को जीत चुका और रोषी होते हुए भी, बड़े भाई की आज्ञा में रहता है;
श्लोक 26 (5.90.26)
तेजोराशिं महात्मानं वरिष्ठममितौजसम् । भीमं प्रदर्शनेनापि भीमसेनं जनार्दन ॥
tejorāśiṃ mahātmānaṃ variṣṭhamamitaujasam | bhīmaṃ pradarśanenāpi bhīmasenaṃ janārdana
हे जनार्दन, वह तेज का पुंज, महात्मा, श्रेष्ठ, अपार बलवाला, देखने में भी भयंकर भीमसेन —
श्लोक 27 (5.90.27)
तं ममाचक्ष्व वार्ष्णेय कथमद्य वृकोदरः । आस्ते परिघबाहुः स मध्यमः पाण्डवो बली ॥
taṃ mamācakṣva vārṣṇeya kathamadya vṛkodaraḥ | āste parighabāhuḥ sa madhyamaḥ pāṇḍavo balī
हे वार्ष्णेय, उसके विषय में मुझे बताओ। परिघ जैसी भुजाओं वाला वह बलवान मँझला पाण्डव वृकोदर आज कैसा है?
श्लोक 28 (5.90.28)
अर्जुनेनार्जुनो यः स कृष्ण बाहुसहस्रिणा । द्विबाहुः स्पर्धते नित्यमतीतेनापि केशव ॥
arjunenārjuno yaḥ sa kṛṣṇa bāhusahasriṇā | dvibāhuḥ spardhate nityamatītenāpi keśava
हे कृष्ण, हे केशव, जो अर्जुन दो भुजाओं वाला होकर भी सहस्र भुजाओं वाले प्राचीन अर्जुन (कार्तवीर्य) से, जो बहुत पहले हो चुका, सदा होड़ करता है;
श्लोक 29 (5.90.29)
क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्चबाणशतानि यः । इष्वस्त्रे सदृशो राज्ञः कार्तवीर्यस्य पाण्डवः ॥
kṣipatyekena vegena pañcabāṇaśatāni yaḥ | iṣvastre sadṛśo rājñaḥ kārtavīryasya pāṇḍavaḥ
जो एक ही वेग में पाँच सौ बाण छोड़ता है, वह पाण्डव धनुर्विद्या में राजा कार्तवीर्य के समान है;
श्लोक 30 (5.90.30)
तेजसाऽऽदित्यसदृशो महर्षिसदृशो दमे । क्षमया पृथिवीतुल्यो महेन्द्रसमविक्रमः ॥
tejasā''dityasadṛśo maharṣisadṛśo dame | kṣamayā pṛthivītulyo mahendrasamavikramaḥ
जो तेज में सूर्य के समान, इन्द्रियनिग्रह में महर्षि के समान, क्षमा में पृथ्वी के समान और पराक्रम में महेन्द्र के समान है;
श्लोक 31 (5.90.31)
आधिराज्यं महद्दीप्तं प्रथितं मधुसूदन । आहृतं येन वीर्येण कुरूणां सर्वराजसु ॥
ādhirājyaṃ mahaddīptaṃ prathitaṃ madhusūdana | āhṛtaṃ yena vīryeṇa kurūṇāṃ sarvarājasu
हे मधुसूदन, जिसके पराक्रम से सब राजाओं के बीच कुरुओं का महान, देदीप्यमान और प्रसिद्ध साम्राज्य प्राप्त हुआ;
श्लोक 32 (5.90.32)
यस्य बाहुबलं सर्वे पाण्डवाः पर्युपासते । स सर्वरथिनां श्रेष्ठः पाण्डवः सत्यविक्रमः ॥
yasya bāhubalaṃ sarve pāṇḍavāḥ paryupāsate | sa sarvarathināṃ śreṣṭhaḥ pāṇḍavaḥ satyavikramaḥ
जिसके बाहुबल का सब पाण्डव आश्रय लेते हैं — सब रथियों में श्रेष्ठ, सच्चे पराक्रम वाला वह पाण्डव;
श्लोक 33 (5.90.33)
यं गत्वाऽभिमुखः सङ्ख्ये न जीवन्कश्चिदाव्रजेत् । यो जेता सर्वभूतानामजेयो जिष्णुरच्युत ॥
yaṃ gatvā'bhimukhaḥ saṅkhye na jīvankaścidāvrajet | yo jetā sarvabhūtānāmajeyo jiṣṇuracyuta
हे अच्युत, युद्ध में जिसके सामने जाकर कोई जीवित नहीं लौटता; जो सब प्राणियों को जीतने वाला, स्वयं अजेय और विजयी है;
श्लोक 34 (5.90.34)
योऽपाश्रयः पाण्डवानां देवानामिव वासवः । स ते भ्राता सखा चैव कथमद्य धनञ्जयः ॥
yo'pāśrayaḥ pāṇḍavānāṃ devānāmiva vāsavaḥ | sa te bhrātā sakhā caiva kathamadya dhanañjayaḥ
जो पाण्डवों का वैसे ही आश्रय है जैसे देवताओं के इन्द्र — तुम्हारा वह भाई और सखा धनंजय आज कैसा है?
श्लोक 35 (5.90.35)
दयावान्सर्वभूतेषु ह्रीनिषेवो महास्त्रवित् । मृदुश्च सुकुमारश्च धार्मिकश्च प्रियश्च मे ॥
dayāvānsarvabhūteṣu hrīniṣevo mahāstravit | mṛduśca sukumāraśca dhārmikaśca priyaśca me
जो सब प्राणियों पर दयालु, लज्जाशील, महान अस्त्रों का ज्ञाता, कोमल, सुकुमार, धर्मात्मा और मुझे प्रिय है —
श्लोक 36 (5.90.36)
सहदेवो महेष्वासः शूरः समितिशोभनः । भ्रातॄणां कृष्ण शुश्रूषुर्धर्मार्थकुशलो युवा ॥
sahadevo maheṣvāsaḥ śūraḥ samitiśobhanaḥ | bhrātṝṇāṃ kṛṣṇa śuśrūṣurdharmārthakuśalo yuvā
हे कृष्ण, वह महाधनुर्धर, युद्ध में शोभा पाने वाला वीर सहदेव, जो भाइयों की सेवा में लगा रहता है और धर्म तथा अर्थ में कुशल युवक है —
श्लोक 37 (5.90.37)
सदैव सहदेवस्य भ्रातरो मधुसूदन । वृत्तं कल्याणवृत्तस्य पूजयन्ति महात्मनः ॥
sadaiva sahadevasya bhrātaro madhusūdana | vṛttaṃ kalyāṇavṛttasya pūjayanti mahātmanaḥ
हे मधुसूदन, उसके भाई उस कल्याणमय आचरण वाले महात्मा सहदेव के व्यवहार की सदा सराहना करते हैं।
श्लोक 38 (5.90.38)
ज्येष्ठोपचायिनं वीरं सहदेवं युधां पतिम् । शुश्रूषुं मम वार्ष्णेय माद्रीपुत्रं प्रचक्ष्व मे ॥
jyeṣṭhopacāyinaṃ vīraṃ sahadevaṃ yudhāṃ patim | śuśrūṣuṃ mama vārṣṇeya mādrīputraṃ pracakṣva me
हे वार्ष्णेय, बड़ों का आदर करने वाले, मेरी सेवा करने वाले, योद्धाओं के स्वामी वीर माद्रीपुत्र सहदेव का समाचार मुझे बताओ।
श्लोक 39 (5.90.39)
सुकुमारो युवा शूरो दर्शनीयश्च पाण्डवः । भ्रातॄणां चैव सर्वेषां प्रियः प्राणो बहिश्चरः ॥
sukumāro yuvā śūro darśanīyaśca pāṇḍavaḥ | bhrātṝṇāṃ caiva sarveṣāṃ priyaḥ prāṇo bahiścaraḥ
जो सुकुमार, युवा, शूर और सुन्दर पाण्डव अपने सब भाइयों को बाहर विचरते हुए प्राण के समान प्रिय है;
श्लोक 40 (5.90.40)
चित्रयोधी च नकुलो महेष्वासो महाबलः । कच्चित्स कुशली कृष्ण वत्सो मम सुखैधितः ॥
citrayodhī ca nakulo maheṣvāso mahābalaḥ | kaccitsa kuśalī kṛṣṇa vatso mama sukhaidhitaḥ
विचित्र ढंग से युद्ध करने वाला, महाधनुर्धर और महाबली नकुल — हे कृष्ण, सुख में पला मेरा वह बच्चा कुशल से तो है?
श्लोक 41 (5.90.41)
सुखोचितमदुःखार्हं सुकुमारं महारथम् । अपि जातु महाबाहो पश्येयं नकुलं पुनः ॥
sukhocitamaduḥkhārhaṃ sukumāraṃ mahāratham | api jātu mahābāho paśyeyaṃ nakulaṃ punaḥ
हे महाबाहु, सुख के योग्य, दुःख के अयोग्य, सुकुमार महारथी नकुल को क्या मैं फिर कभी देख पाऊँगी?
श्लोक 42 (5.90.42)
पक्ष्मसंपातजे काले नकुलेन विनाकृता । न लभामि धृतिं वीर साऽद्य जीवामि पश्य माम् ॥
pakṣmasaṃpātaje kāle nakulena vinākṛtā | na labhāmi dhṛtiṃ vīra sā'dya jīvāmi paśya mām
हे वीर, पलक झपकने भर के समय के लिए भी नकुल से अलग होने पर जिसे धैर्य नहीं मिलता था, वही मैं आज भी जी रही हूँ — मुझे देखो।
श्लोक 43 (5.90.43)
सर्वैः पुत्रैः प्रियतरा द्रौपदी मे जनार्दन । कुलीना रूपसंपन्ना सर्वैः समुदिता गुणैः ॥
sarvaiḥ putraiḥ priyatarā draupadī me janārdana | kulīnā rūpasaṃpannā sarvaiḥ samuditā guṇaiḥ
हे जनार्दन, द्रौपदी मुझे अपने सब पुत्रों से भी अधिक प्रिय है — वह कुलीन, रूपवती और सब गुणों से सम्पन्न है।
श्लोक 44 (5.90.44)
पुत्रलोकात्पतिलोकं वृण्वाना सत्यवादिनी । प्रियान्पुत्रान्परित्यज्य पाण्डवाननुरुध्यते ॥
putralokātpatilokaṃ vṛṇvānā satyavādinī | priyānputrānparityajya pāṇḍavānanurudhyate
उस सत्यवादिनी ने पुत्रों के लोक के स्थान पर पतियों का लोक चुना और अपने प्रिय पुत्रों को छोड़कर पाण्डवों का अनुसरण करती है।
श्लोक 45 (5.90.45)
महाभिजनसंपन्ना सर्वकामैः सुपूजिता । ईश्वरी सर्वकल्याणी द्रौपदी कथमच्युत ॥
mahābhijanasaṃpannā sarvakāmaiḥ supūjitā | īśvarī sarvakalyāṇī draupadī kathamacyuta
हे अच्युत, महान कुल में जन्मी, सब मनचाही वस्तुओं से सम्मानित, सर्वकल्याणी रानी द्रौपदी कैसी है?
श्लोक 46 (5.90.46)
पतिभिः पञ्चभिः शूरैरग्निकल्पैः प्रहारिभिः । उपपन्ना महेष्वासैर्द्रौपदी दुःखभागिनी ॥
patibhiḥ pañcabhiḥ śūrairagnikalpaiḥ prahāribhiḥ | upapannā maheṣvāsairdraupadī duḥkhabhāginī
अग्नि के समान तेजस्वी, प्रहार करने में कुशल पाँच शूरवीर महाधनुर्धर पतियों के होते हुए भी द्रौपदी के भाग्य में दुःख ही है।
श्लोक 47 (5.90.47)
चतुर्दशमिदं वर्षं यन्नापश्यमरिन्दम । पुत्रादिभिः परिद्यूनां द्रौपदीं सत्यवादिनीम् ॥
caturdaśamidaṃ varṣaṃ yannāpaśyamarindama | putrādibhiḥ paridyūnāṃ draupadīṃ satyavādinīm
हे शत्रुदमन, यह चौदहवाँ वर्ष है जब से मैंने पुत्रों आदि के कारण दुःख से क्षीण हुई सत्यवादिनी द्रौपदी को नहीं देखा।
श्लोक 48 (5.90.48)
न नूनं कर्मभिः पुण्यैरश्नुते पुरुषः सुखम् । द्रौपदी चेत्तथावृत्ता नाश्नुते सुखमव्ययम् ॥
na nūnaṃ karmabhiḥ puṇyairaśnute puruṣaḥ sukham | draupadī cettathāvṛttā nāśnute sukhamavyayam
यदि ऐसे पवित्र आचरण वाली द्रौपदी को अक्षय सुख नहीं मिलता, तो निश्चय ही मनुष्य पुण्यकर्मों से सुख नहीं पाता।
श्लोक 49 (5.90.49)
न प्रियो मम कृष्णाया बीभत्सुर्न युधिष्ठिरः । भीमसेनो यमौ वापि यदपश्यं सभागताम् ॥
na priyo mama kṛṣṇāyā bībhatsurna yudhiṣṭhiraḥ | bhīmaseno yamau vāpi yadapaśyaṃ sabhāgatām
मुझे कृष्णा (द्रौपदी) जितनी प्रिय है, उतने न बीभत्सु प्रिय हैं, न युधिष्ठिर, न भीमसेन और न दोनों जुड़वाँ भाई — और मैंने उसे सभा में लाई गई देखा।
श्लोक 50 (5.90.50)
न मे दुःखतरं किंचिद्भूतपूर्वं ततोऽधिकम् । स्त्रीधर्मिणीं द्रौपदीं यच्छ्वशुराणां समीपगाम् ॥
na me duḥkhataraṃ kiṃcidbhūtapūrvaṃ tato'dhikam | strīdharmiṇīṃ draupadīṃ yacchvaśurāṇāṃ samīpagām
मेरे जीवन में इससे बढ़कर दुःख पहले कभी नहीं हुआ कि रजस्वला द्रौपदी को ससुर-जनों के सामने
श्लोक 51 (5.90.51)
आनायितामनार्येण क्रोधलोभानुवर्तिना । सर्वे प्रैक्षन्त कुरव एकवस्त्रां सभागताम् ॥
ānāyitāmanāryeṇa krodhalobhānuvartinā | sarve praikṣanta kurava ekavastrāṃ sabhāgatām
क्रोध और लोभ के वश में रहने वाला वह नीच व्यक्ति सभा में ले आया, और सब कुरुओं ने एक वस्त्र में सभा में खड़ी उसे देखा।
श्लोक 52 (5.90.52)
तत्रैव धृतराष्ट्रश्च महाराजश्च बाह्लिकः । कृपश्च सोमदत्तश्च निर्विष्णाः कुरवस्तथा ॥
tatraiva dhṛtarāṣṭraśca mahārājaśca bāhlikaḥ | kṛpaśca somadattaśca nirviṣṇāḥ kuravastathā
वहीं धृतराष्ट्र, महाराज बाह्लीक, कृप और सोमदत्त भी थे — और सब कुरु खिन्न हो गए थे।
श्लोक 53 (5.90.53)
तस्यां संसदि सर्वेषां क्षत्तारं पूजयाम्यहम् । वृत्तेन हि भवत्यार्यो न धनेन न विद्यया ॥
tasyāṃ saṃsadi sarveṣāṃ kṣattāraṃ pūjayāmyaham | vṛttena hi bhavatyāryo na dhanena na vidyayā
उस सभा में सबमें से मैं क्षत्ता (विदुर) का ही आदर करती हूँ; क्योंकि मनुष्य आचरण से ही श्रेष्ठ होता है, धन या विद्या से नहीं।
श्लोक 54 (5.90.54)
तस्य कृष्ण महाबुद्धेर्गम्भीरस्य महात्मनः । क्षत्तुः शीलमलङ्कारो लोकान्विष्टभ्य तिष्ठति ॥
tasya kṛṣṇa mahābuddhergambhīrasya mahātmanaḥ | kṣattuḥ śīlamalaṅkāro lokānviṣṭabhya tiṣṭhati
हे कृष्ण, उस महाबुद्धिमान, गम्भीर और महात्मा क्षत्ता का शील ही उसका आभूषण है, जो लोकों को थामे हुए है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 55 (5.90.55)
सा शोकार्ता च हृष्टा च दृष्ट्वा गोविन्दमागतम् । नानाविधानि दुःखानि सर्वाण्येवान्वकीर्तयत् ॥
sā śokārtā ca hṛṣṭā ca dṛṣṭvā govindamāgatam | nānāvidhāni duḥkhāni sarvāṇyevānvakīrtayat
गोविन्द को आया देख शोक से व्याकुल और हर्षित भी कुन्ती ने अपने अनेक प्रकार के सभी दुःख कह सुनाए।
कुन्त्युवाच
श्लोक 56 (5.90.56)
पूर्वैराचरितं यत्तत्कुराजभिररिन्दम । अक्षद्यूतं मृगवधः कच्चिदेषां सुखावहम् ॥
pūrvairācaritaṃ yattatkurājabhirarindama | akṣadyūtaṃ mṛgavadhaḥ kaccideṣāṃ sukhāvaham
"हे शत्रुदमन, प्राचीन काल के बुरे राजाओं ने जो जुआ और मृगया अपनाई थी, क्या उनसे मेरे पुत्रों को कोई सुख मिला?
श्लोक 57 (5.90.57)
तन्मां दहति यत्कृष्णा सभायां कुरुसन्निधौ । धार्तराष्ट्रैः परिक्लिष्टा यथा न कुशलं तथा ॥
tanmāṃ dahati yatkṛṣṇā sabhāyāṃ kurusannidhau | dhārtarāṣṭraiḥ parikliṣṭā yathā na kuśalaṃ tathā
मुझे यह बात जलाती है कि कृष्णा को सभा में कुरुओं के सामने धृतराष्ट्र के पुत्रों ने ऐसा कष्ट दिया जो किसी प्रकार उचित नहीं था।
श्लोक 58 (5.90.58)
निर्वासनं च नगरात्प्रव्रज्या च परन्तप । नानाविधानां दुःखानामावासोऽस्मि जनार्दन ॥
nirvāsanaṃ ca nagarātpravrajyā ca parantapa | nānāvidhānāṃ duḥkhānāmāvāso'smi janārdana
हे परन्तप, नगर से निर्वासन और वनवास — हे जनार्दन, मैं नाना प्रकार के दुःखों का घर बन गई हूँ।
श्लोक 59 (5.90.59)
अज्ञातचर्या बालानामवरोधश्च माधव । न मे क्लेशतमं तत्स्यात्पुत्रैः सह परन्तप ॥
ajñātacaryā bālānāmavarodhaśca mādhava | na me kleśatamaṃ tatsyātputraiḥ saha parantapa
हे माधव, बच्चों का अज्ञातवास और उनकी जीविका का छिन जाना — हे परन्तप, यदि मैं पुत्रों के साथ होती तो यह मेरे लिए सबसे बड़ा क्लेश न होता।
श्लोक 60 (5.90.60)
दुर्योधनेन निकृता वर्षमद्य चतुर्दशम् । दुःखादपि सुखं नः स्याद्यदि पुण्यफलक्षयः ॥
duryodhanena nikṛtā varṣamadya caturdaśam | duḥkhādapi sukhaṃ naḥ syādyadi puṇyaphalakṣayaḥ
दुर्योधन के छल को सहते आज चौदहवाँ वर्ष है। यदि सुख पुण्यफल का क्षय है, तो दुःख से भी हमें सुख ही मिलेगा।
श्लोक 61 (5.90.61)
न मे विशेषो जात्वासीद्धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवैः । तेन सत्येन कृष्ण त्वां हतामित्रं श्रिया वृतम् । अस्माद्विमुक्तं सङ्ग्रामात्पश्येयं पाण्डवैः सह ॥
na me viśeṣo jātvāsīddhārtarāṣṭreṣu pāṇḍavaiḥ | tena satyena kṛṣṇa tvāṃ hatāmitraṃ śriyā vṛtam | asmādvimuktaṃ saṅgrāmātpaśyeyaṃ pāṇḍavaiḥ saha
मैंने धृतराष्ट्र के पुत्रों और पाण्डवों में कभी भेद नहीं किया। हे कृष्ण, उस सत्य के बल से मैं तुम्हें शत्रुओं को मारकर, लक्ष्मी से युक्त, इस युद्ध से सकुशल निकलकर पाण्डवों के साथ देखूँ।
श्लोक 62 (5.90.62)
नैव शक्याः पराजेतुं सर्वं ह्येषां तथाविधम् । पितरं त्वेव गर्हेयं नात्मानं न सुयोधनम् ॥
naiva śakyāḥ parājetuṃ sarvaṃ hyeṣāṃ tathāvidham | pitaraṃ tveva garheyaṃ nātmānaṃ na suyodhanam
उन्हें पराजित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनका सारा आचरण वैसा ही (सरल और धर्ममय) है। दोष तो मुझे अपने पिता को ही देना चाहिए — न अपने को, न सुयोधन को —
श्लोक 63 (5.90.63)
येनाहं कुन्तिभोजाय धनं वृत्तैरिवार्पिता । बालां मामार्यकस्तुभ्यं क्रीडन्तीं कन्दुहस्तिकां ॥
yenāhaṃ kuntibhojāya dhanaṃ vṛttairivārpitā | bālāṃ māmāryakastubhyaṃ krīḍantīṃ kanduhastikāṃ
जिन्होंने मुझे कुन्तिभोज को वैसे ही सौंप दिया जैसे दानी लोग धन दे देते हैं। जब मैं हाथ में गेंद लिए खेलने वाली छोटी बच्ची थी, तब तुम्हारे पितामह ने
श्लोक 64 (5.90.64)
अदात्तु कुन्तिभोजाय सखा सख्ये महात्मने । साऽहं पित्रा च निकृता श्वशुरैश्च परन्तप । अत्यन्तदुःखिता कृष्ण किं जीवितफलं मम ॥
adāttu kuntibhojāya sakhā sakhye mahātmane | sā'haṃ pitrā ca nikṛtā śvaśuraiśca parantapa | atyantaduḥkhitā kṛṣṇa kiṃ jīvitaphalaṃ mama
मुझे मैत्री के कारण अपने महात्मा मित्र कुन्तिभोज को दे दिया। हे परन्तप, इस प्रकार पिता और ससुर-जनों से छली गई, अत्यन्त दुःखी मुझ को, हे कृष्ण, जीवन का क्या फल मिला?
श्लोक 65 (5.90.65)
यन्मां वागब्रवीन्नक्तं सूतके सव्यसाचिनः । पुत्रस्ते पृथिवीं जेता यशश्चास्य दिवं स्पृशेत् ॥
yanmāṃ vāgabravīnnaktaṃ sūtake savyasācinaḥ | putraste pṛthivīṃ jetā yaśaścāsya divaṃ spṛśet
सव्यसाची के जन्म की रात आकाशवाणी ने मुझसे कहा था — 'तुम्हारा पुत्र पृथ्वी को जीतेगा और उसका यश स्वर्ग को छुएगा;
श्लोक 66 (5.90.66)
हत्वा कुरून्महाजन्ये राज्यं प्राप्य धनञ्जयः । भ्रातृभिः सह कौन्तेयस्त्रीन्मेधानाहरिष्यति ॥
hatvā kurūnmahājanye rājyaṃ prāpya dhanañjayaḥ | bhrātṛbhiḥ saha kaunteyastrīnmedhānāhariṣyati
महायुद्ध में कुरुओं को मारकर और राज्य पाकर कुन्तीपुत्र धनंजय अपने भाइयों के साथ तीन अश्वमेध यज्ञ करेगा।'
श्लोक 67 (5.90.67)
नाहं तामभ्यसूयामि नमो धर्माय वेधसे । कृष्णाय महते नित्यं धर्मो धारयति प्रजाः ॥
nāhaṃ tāmabhyasūyāmi namo dharmāya vedhase | kṛṣṇāya mahate nityaṃ dharmo dhārayati prajāḥ
मैं उस वाणी पर संदेह नहीं करती। विधाता धर्म को और महान कृष्ण को सदा नमस्कार है; धर्म ही प्रजा को धारण करता है।
श्लोक 68 (5.90.68)
धर्मश्चेदस्ति वार्ष्णेय यथा वागभ्यभाषत । त्वं चापि तत्तथा कृष्ण सर्वं संपादयिष्यसि ॥
dharmaścedasti vārṣṇeya yathā vāgabhyabhāṣata | tvaṃ cāpi tattathā kṛṣṇa sarvaṃ saṃpādayiṣyasi
हे वार्ष्णेय, यदि धर्म है, जैसा उस वाणी ने कहा था, तो हे कृष्ण, तुम भी वह सब वैसा ही पूरा करोगे।
श्लोक 69 (5.90.69)
न मां माधव वैधव्यं नार्थनाशो न वैरिता । तथा शोकाय दहति यथा पुत्रैर्विना भवः ॥
na māṃ mādhava vaidhavyaṃ nārthanāśo na vairitā | tathā śokāya dahati yathā putrairvinā bhavaḥ
हे माधव, न वैधव्य, न धन का नाश, न शत्रुता मुझे शोक से इतना जलाते हैं जितना पुत्रों से बिछोह।
श्लोक 70 (5.90.70)
याऽहं गाण्डीवधन्वानं सर्वशस्त्रभृतां वरम् । धनञ्जयं न पश्यामि का शान्तिर्हृदयस्य मे । इतश्चतुर्दशं वर्षं यन्नापश्यं युधिष्ठिरम् ॥
yā'haṃ gāṇḍīvadhanvānaṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varam | dhanañjayaṃ na paśyāmi kā śāntirhṛdayasya me | itaścaturdaśaṃ varṣaṃ yannāpaśyaṃ yudhiṣṭhiram
गाण्डीवधारी, सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ धनंजय को मैं नहीं देख पाती — मेरे हृदय को क्या शान्ति मिल सकती है? यह चौदहवाँ वर्ष है जब से मैंने युधिष्ठिर,
श्लोक 71 (5.90.71)
धनञ्जयं च गोविन्द यमौ तं च वृकोदरम् । जीवनाशं प्रनष्टानां श्राद्धं कुर्वन्ति मानवाः ॥
dhanañjayaṃ ca govinda yamau taṃ ca vṛkodaram | jīvanāśaṃ pranaṣṭānāṃ śrāddhaṃ kurvanti mānavāḥ
हे गोविन्द, धनंजय, दोनों जुड़वाँ भाइयों और वृकोदर को नहीं देखा। जो खो जाते हैं, उन्हें मृत मानकर लोग उनका श्राद्ध कर देते हैं;
श्लोक 72 (5.90.72)
अर्थतस्ते मम मृतास्तेषां चाहं जनार्दन । ब्रूया माधव राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥
arthataste mama mṛtāsteṣāṃ cāhaṃ janārdana | brūyā mādhava rājānaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram
हे जनार्दन, एक प्रकार से वे मेरे लिए मर चुके हैं और मैं उनके लिए। हे माधव, धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर से कहना —
श्लोक 73 (5.90.73)
भूयांस्ते हीयते धर्मो मा पुत्रक वृथा कृथाः । पराश्रया वासुदेव या जीवति धिगस्तु ताम् ॥
bhūyāṃste hīyate dharmo mā putraka vṛthā kṛthāḥ | parāśrayā vāsudeva yā jīvati dhigastu tām
'बेटा, तुम्हारा धर्म बहुत क्षीण हो रहा है, उसे व्यर्थ मत जाने दो।' हे वासुदेव, जो स्त्री दूसरों के आश्रय में जीती है, उसे धिक्कार है!
श्लोक 74 (5.90.74)
वृत्तेः कार्पण्यलब्धाया अप्रतिष्ठैव ज्यायसी । अथो धनञ्जयं ब्रूया नित्योद्युक्तं वृकोदरम् ॥
vṛtteḥ kārpaṇyalabdhāyā apratiṣṭhaiva jyāyasī | atho dhanañjayaṃ brūyā nityodyuktaṃ vṛkodaram
दीनता से मिली जीविका से तो कोई आधार न होना ही अच्छा है। फिर धनंजय से और सदा उद्यत रहने वाले वृकोदर से कहना —
श्लोक 75 (5.90.75)
यदर्थं क्षत्रिया सूते तस्य कालोऽयमागतः । अस्मिंश्चेदागते काले मिथ्या चातिक्रमिष्यति ॥
yadarthaṃ kṣatriyā sūte tasya kālo'yamāgataḥ | asmiṃścedāgate kāle mithyā cātikramiṣyati
'जिसके लिए क्षत्राणी पुत्र को जन्म देती है, उसका समय आ गया है। यदि यह समय आने पर भी व्यर्थ बीत गया,
श्लोक 76 (5.90.76)
लोकसंभाविताः संतः सुनृशंसं करिष्यथ । नृशंसेन च वो युक्तांस्त्यजेयं शाश्वतीः समाः ॥
lokasaṃbhāvitāḥ saṃtaḥ sunṛśaṃsaṃ kariṣyatha | nṛśaṃsena ca vo yuktāṃstyajeyaṃ śāśvatīḥ samāḥ
तो लोक में सम्मानित होकर भी तुम अत्यन्त निन्दनीय कर्म करोगे; और यदि तुम नीचता से जुड़ गए तो मैं तुम्हें सदा के लिए त्याग दूँगी।'
श्लोक 77 (5.90.77)
काले हि समनुप्राप्ते त्यक्तव्यमपि जीवनम् । माद्रीपुत्रौ च वक्तव्यौ क्षत्रधर्मरतौ सदा ॥
kāle hi samanuprāpte tyaktavyamapi jīvanam | mādrīputrau ca vaktavyau kṣatradharmaratau sadā
समय आने पर तो प्राण भी त्याग देने चाहिए। और सदा क्षत्रिय-धर्म में रत माद्री के दोनों पुत्रों से कहना —
श्लोक 78 (5.90.78)
विक्रमेणार्जितान्भोगान्वृणीतं जीवितादपि । विक्रमाधिगता ह्यर्थाः क्षत्रधर्मेण जीवतः ॥
vikrameṇārjitānbhogānvṛṇītaṃ jīvitādapi | vikramādhigatā hyarthāḥ kṣatradharmeṇa jīvataḥ
'पराक्रम से अर्जित भोगों को जीवन से भी बढ़कर मानो।' क्योंकि क्षत्रिय-धर्म से जीने वाले को पराक्रम से प्राप्त धन
श्लोक 79 (5.90.79)
मनो मनुष्यस्य सदा प्रीणन्ति पुरुषोत्तम । गत्वा ब्रूहि महाबाहो सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥
mano manuṣyasya sadā prīṇanti puruṣottama | gatvā brūhi mahābāho sarvaśastrabhṛtāṃ varam
हे पुरुषोत्तम, सदा मन को प्रसन्न करता है। हे महाबाहु, जाकर सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ
श्लोक 80 (5.90.80)
अर्जुनं पाण्डवं वीरं द्रौपद्याः पदवीं चर । विदितौ हि तवात्यन्तं क्रुद्धौ तौ तु यथान्तकौ ॥
arjunaṃ pāṇḍavaṃ vīraṃ draupadyāḥ padavīṃ cara | viditau hi tavātyantaṃ kruddhau tau tu yathāntakau
वीर पाण्डुपुत्र अर्जुन से कहना — 'द्रौपदी के बताए मार्ग पर चलो।' तुम तो भली-भाँति जानते हो कि वे दोनों क्रोध में आने पर यमराज के समान हो जाते हैं;
श्लोक 81 (5.90.81)
भीमार्जुनौ नयेतां हि देवानपि परां गतिम् । तयोश्चैतदवज्ञानं यत्सा कृष्णा सभां गता ॥
bhīmārjunau nayetāṃ hi devānapi parāṃ gatim | tayoścaitadavajñānaṃ yatsā kṛṣṇā sabhāṃ gatā
भीम और अर्जुन देवताओं को भी परम गति तक पहुँचा सकते हैं। उन दोनों का यह अपमान था कि कृष्णा सभा में लाई गई,
श्लोक 82 (5.90.82)
दुःशासनश्च कर्णश्च परुषाण्यभ्यभाषताम् । दुर्योधनो भीमसेनमभ्यगच्छन्मनस्विनम् ॥
duḥśāsanaśca karṇaśca paruṣāṇyabhyabhāṣatām | duryodhano bhīmasenamabhyagacchanmanasvinam
और दुःशासन तथा कर्ण ने उससे कठोर वचन कहे। दुर्योधन ने मनस्वी भीमसेन का अपमान किया
श्लोक 83 (5.90.83)
पश्यतां कुरुमुख्यानां तस्य द्रक्ष्यति यत्फलम् । न हि वैरं समासाद्य प्रशाम्यति वृकोदरः ॥
paśyatāṃ kurumukhyānāṃ tasya drakṣyati yatphalam | na hi vairaṃ samāsādya praśāmyati vṛkodaraḥ
कुरुश्रेष्ठों के देखते-देखते — उसका फल वह देखेगा। क्योंकि वृकोदर एक बार वैर ठान ले तो वह शान्त नहीं होता।
श्लोक 84 (5.90.84)
सुचिरादपि भीमस्य न हि वैरं प्रशाम्यति । यावदन्तं न नयति शात्रवाञ्छत्रुकर्शनः ॥
sucirādapi bhīmasya na hi vairaṃ praśāmyati | yāvadantaṃ na nayati śātravāñchatrukarśanaḥ
बहुत समय बीत जाने पर भी भीम का वैर शान्त नहीं होता, जब तक वह शत्रुनाशक अपने शत्रुओं का अन्त न कर दे।
श्लोक 85 (5.90.85)
न दुःखं राज्यहरणं न च द्यूते पराजयः । प्रव्राजनं तु पुत्राणां न मे तद्दुःखकारणम् ॥
na duḥkhaṃ rājyaharaṇaṃ na ca dyūte parājayaḥ | pravrājanaṃ tu putrāṇāṃ na me tadduḥkhakāraṇam
राज्य का छिन जाना मेरे लिए दुःख नहीं है, न जुए में हार; पुत्रों का वनवास भी मेरे दुःख का कारण नहीं है।
श्लोक 86 (5.90.86)
यत्तु सा बृहती श्यामा एकवस्त्रा सभां गता । अशृणोत्परुषा वाचः किं नु दुःखतरं ततः ॥
yattu sā bṛhatī śyāmā ekavastrā sabhāṃ gatā | aśṛṇotparuṣā vācaḥ kiṃ nu duḥkhataraṃ tataḥ
पर वह ऊँची, श्यामवर्णा स्त्री एक वस्त्र में सभा में लाई गई और उसने कठोर वचन सुने — इससे बढ़कर दुःख क्या होगा?
श्लोक 87 (5.90.87)
स्त्रीधर्मिणी वरारोहा क्षत्रधर्मरता सदा । नाभ्यगच्छत्तदा नाथं कृष्णा नाथवती सती ॥
strīdharmiṇī varārohā kṣatradharmaratā sadā | nābhyagacchattadā nāthaṃ kṛṣṇā nāthavatī satī
रजस्वला, सुन्दर अंगों वाली, सदा क्षत्रिय-धर्म में रत कृष्णा ने उस समय रक्षकों के होते हुए भी कोई रक्षक नहीं पाया।
श्लोक 88 (5.90.88)
यस्या मम सपुत्रायास्त्वं नाथो मधुसूदन । रामश्च बलिनां श्रेष्ठः प्रद्युम्नश्च महारथः ॥
yasyā mama saputrāyāstvaṃ nātho madhusūdana | rāmaśca balināṃ śreṣṭhaḥ pradyumnaśca mahārathaḥ
हे मधुसूदन, पुत्रों सहित मेरे रक्षक तुम हो, बलवानों में श्रेष्ठ बलराम हैं और महारथी प्रद्युम्न हैं।
श्लोक 89 (5.90.89)
साऽहमेवंविधं दुःखं सहेयं पुरुषोत्तम । भीमे जीवति दुर्धर्षे विजये चापलायिनि ॥
sā'hamevaṃvidhaṃ duḥkhaṃ saheyaṃ puruṣottama | bhīme jīvati durdharṣe vijaye cāpalāyini
फिर भी, हे पुरुषोत्तम, दुर्जय भीम और कभी पीठ न दिखाने वाले विजय (अर्जुन) के जीवित रहते मुझे ऐसा दुःख सहना पड़ रहा है!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 90 (5.90.90)
तत आश्वासयामास पुत्राधिभिरभिप्लुताम् । पितृष्वसारं शोचन्तीं शौरिः पार्थसखः पृथाम् ॥
tata āśvāsayāmāsa putrādhibhirabhiplutām | pitṛṣvasāraṃ śocantīṃ śauriḥ pārthasakhaḥ pṛthām
तब पार्थ के सखा शौरि ने पुत्रों की चिन्ता में डूबी, शोक करती हुई अपनी बुआ पृथा को सांत्वना दी।
वासुदेव उवाच
श्लोक 91 (5.90.91)
का नु सीमन्तिनी त्वादृग्लोकेष्वस्ति पितृष्वसः । शूरस्य राज्ञो दुहिता आजमीढकुलं गता ॥
kā nu sīmantinī tvādṛglokeṣvasti pitṛṣvasaḥ | śūrasya rājño duhitā ājamīḍhakulaṃ gatā
"हे बुआ, संसार में तुम्हारे जैसी स्त्री और कौन है? तुम राजा शूर की पुत्री हो और अजमीढ के कुल में ब्याही गईं।
श्लोक 92 (5.90.92)
महाकुलीना भवती ह्रदाद्ध्रदमिवागता । ईश्वरी सर्वकल्याणी भर्त्रा परमपूजिता ॥
mahākulīnā bhavatī hradāddhradamivāgatā | īśvarī sarvakalyāṇī bhartrā paramapūjitā
महान कुल में जन्मी तुम मानो एक सरोवर से दूसरे सरोवर में आईं — सर्वकल्याणी रानी, जिनका पति ने परम सम्मान किया।
श्लोक 93 (5.90.93)
वीरसूर्वीरपत्नी त्वं सर्वैः समुदिता गुणैः । सुखदुःखे महाप्राज्ञे त्वादृशी सोढुमर्हति ॥
vīrasūrvīrapatnī tvaṃ sarvaiḥ samuditā guṇaiḥ | sukhaduḥkhe mahāprājñe tvādṛśī soḍhumarhati
तुम वीरों की माता और वीर की पत्नी हो, सब गुणों से सम्पन्न हो; हे महाबुद्धिमती, तुम्हारे जैसी स्त्री सुख और दुःख दोनों सह सकती है।
श्लोक 94 (5.90.94)
निद्रातन्द्रे क्रोधहर्षौ क्षुत्पिपासे हिमातपौ । एतानि पार्था निर्जित्य नित्यं वीरसुखे रताः ॥
nidrātandre krodhaharṣau kṣutpipāse himātapau | etāni pārthā nirjitya nityaṃ vīrasukhe ratāḥ
नींद और आलस्य, क्रोध और हर्ष, भूख और प्यास, सर्दी और गर्मी — इन सबको जीतकर पृथापुत्र सदा वीरों के सुख में रमते हैं।
श्लोक 95 (5.90.95)
त्यक्तग्राम्यसुखाः पार्था नित्यं वीरसुखप्रियाः । न तु स्वल्पेन तुष्येयुर्महोत्साहा महाबलाः ॥
tyaktagrāmyasukhāḥ pārthā nityaṃ vīrasukhapriyāḥ | na tu svalpena tuṣyeyurmahotsāhā mahābalāḥ
पृथापुत्रों ने ग्राम्य सुखों को त्याग दिया है और वे सदा वीरोचित सुख चाहते हैं; वे महान उत्साही और महाबली हैं, थोड़े से संतुष्ट नहीं होंगे।
श्लोक 96 (5.90.96)
अन्तं धीरा निषेवन्ते मध्यं ग्राम्यसुखप्रियाः । उत्तमांश्च परिक्लेशान्भोगांश्चातीव मानुषान् ॥
antaṃ dhīrā niṣevante madhyaṃ grāmyasukhapriyāḥ | uttamāṃśca parikleśānbhogāṃścātīva mānuṣān
धीर पुरुष चरम सीमाओं का सेवन करते हैं, ग्राम्य सुख चाहने वाले बीच की स्थिति का। चरम सीमाएँ हैं — सबसे कठोर क्लेश और मनुष्य से परे के उत्कृष्ट भोग।
श्लोक 97 (5.90.97)
अन्तेषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे । अन्तप्राप्तिं सुखं प्राहुर्दुःखमन्तरमन्तयोः ॥
anteṣu remire dhīrā na te madhyeṣu remire | antaprāptiṃ sukhaṃ prāhurduḥkhamantaramantayoḥ
धीर लोग चरम सीमाओं में ही रमते हैं, बीच में नहीं; वे कहते हैं कि अन्त को पा लेना सुख है और दोनों अन्तों के बीच रहना दुःख है।
श्लोक 98 (5.90.98)
अभिवादयन्ति भवतीं पाण्डवाः सह कृष्णया । आत्मानं ते कुशलिनं निवेद्याहुरनामयम् ॥
abhivādayanti bhavatīṃ pāṇḍavāḥ saha kṛṣṇayā | ātmānaṃ te kuśalinaṃ nivedyāhuranāmayam
पाण्डव कृष्णा के साथ तुम्हें प्रणाम करते हैं; उन्होंने अपनी कुशल बताकर तुम्हारे स्वास्थ्य की कामना की है।
श्लोक 99 (5.90.99)
अरोगान्सर्वसिद्धार्थान्क्षिप्रं द्रक्ष्यसि पाण्डवान् । ईश्वरान्सर्वलोकस्य हतामित्राञ्श्रिया वृतान् ॥
arogānsarvasiddhārthānkṣipraṃ drakṣyasi pāṇḍavān | īśvarānsarvalokasya hatāmitrāñśriyā vṛtān
तुम शीघ्र ही पाण्डवों को नीरोग, सब मनोरथ पूरे किए हुए, सारे लोक के स्वामी, शत्रुओं को मार चुके और लक्ष्मी से सम्पन्न देखोगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 100 (5.90.100)
एवमाश्वासिता कुन्ती प्रत्युवाच जनार्दनम् । पुत्राधिभिरभिध्वस्ता निगृह्याबुद्धिजं तमः ॥
evamāśvāsitā kuntī pratyuvāca janārdanam | putrādhibhirabhidhvastā nigṛhyābuddhijaṃ tamaḥ
इस प्रकार सांत्वना पाकर, पुत्रों की चिन्ता से टूटी हुई कुन्ती ने अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को रोककर जनार्दन को उत्तर दिया —
कुन्त्युवाच
श्लोक 101 (5.90.101)
यद्यत्तेषां महाबाहो पथ्यं स्यान्मधुसूदन । यथायथा त्वं मन्येथाः कुर्याः कृष्ण तथातथा ॥
yadyatteṣāṃ mahābāho pathyaṃ syānmadhusūdana | yathāyathā tvaṃ manyethāḥ kuryāḥ kṛṣṇa tathātathā
"हे महाबाहु मधुसूदन, उनके लिए जो-जो हितकर हो, हे कृष्ण, तुम जैसा-जैसा उचित समझो, वैसा-वैसा करो,
श्लोक 102 (5.90.102)
अविलोपेन धर्मस्य अनिकृत्या परन्तप । प्रभावज्ञाऽस्मि ते कृष्ण सत्यस्याभिजनस्य च ॥
avilopena dharmasya anikṛtyā parantapa | prabhāvajñā'smi te kṛṣṇa satyasyābhijanasya ca
हे परन्तप, धर्म का लोप किए बिना और छल किए बिना। हे कृष्ण, मैं तुम्हारे प्रभाव, सत्य और कुल को जानती हूँ,
श्लोक 103 (5.90.103)
व्यवस्थायां च मित्रेषु बुद्धिविक्रमयोस्तथा । त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं तपो महत् ॥
vyavasthāyāṃ ca mitreṣu buddhivikramayostathā | tvameva naḥ kule dharmastvaṃ satyaṃ tvaṃ tapo mahat
मित्रों के प्रति तुम्हारी नीति, तुम्हारी बुद्धि और पराक्रम को भी। हमारे कुल में तुम ही धर्म हो, तुम ही सत्य हो, तुम ही महान तप हो।
श्लोक 104 (5.90.104)
त्वं त्राता त्वं महद्ब्रह्म त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । यथैवात्थ तथैवैतत्त्वयि सत्यं भविष्यति ॥
tvaṃ trātā tvaṃ mahadbrahma tvayi sarvaṃ pratiṣṭhitam | yathaivāttha tathaivaitattvayi satyaṃ bhaviṣyati
तुम ही रक्षक हो, तुम ही महान ब्रह्म हो, तुममें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। जैसा तुम कहते हो, वैसा ही है; तुममें वह सत्य होगा।
श्लोक 105 (5.90.105)
कुरूणां पाण्डवानां च लोकानां चापराजित । सर्वस्यैतस्य वार्ष्णेय गतिस्त्वमसि माधव । प्रभावो बुद्धिवीर्यं च तादृशं तव केशव ॥
kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca lokānāṃ cāparājita | sarvasyaitasya vārṣṇeya gatistvamasi mādhava | prabhāvo buddhivīryaṃ ca tādṛśaṃ tava keśava
हे अपराजित, कुरुओं, पाण्डवों और सब लोकों की — इस सबकी, हे वार्ष्णेय माधव, तुम ही गति हो; हे केशव, तुम्हारा प्रभाव, बुद्धि और पराक्रम ऐसा ही है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 106 (5.90.106)
तामामन्त्र्य च गोविन्दः कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । प्रातिष्ठत महाबाहुर्दुर्योधनगृहान्प्रति ॥
tāmāmantrya ca govindaḥ kṛtvā cābhipradakṣiṇam | prātiṣṭhata mahābāhurduryodhanagṛhānprati
तब महाबाहु गोविन्द ने उनसे विदा ली, उनकी प्रदक्षिणा की और दुर्योधन के भवन की ओर चल पड़े।