उद्योग पर्व · अध्याय 91
श्रीकृष्ण द्वारा दुर्योधन के अन्न का अस्वीकार
श्रीकृष्ण दुर्योधन के भव्य महल में जाते हैं, जहाँ उनका सम्मानपूर्वक स्वागत होता है और उन्हें सोने का पलंग, उपहार तथा भोजन अर्पित किया जाता है, पर वे भोजन करना अस्वीकार कर देते हैं। दुर्योधन के कारण पूछने पर कृष्ण कहते हैं कि दूत कार्य सिद्ध होने पर ही भोजन करते हैं, अन्न प्रेम से या विपत्ति में खाया जाता है, और जो पाण्डवों से द्वेष करता है वह उनसे द्वेष करता है। वे विदुर के घर चले जाते हैं, अपने भवन अर्पित करने आए कुरु-वृद्धों को विदा करते हैं और विदुर का परोसा हुआ भोजन ग्रहण करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.91.1)
पृथामामन्त्र्य गोविन्दः कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । दुर्योधनगृहं शौरिरभ्यगच्छदरिन्दमः ॥
pṛthāmāmantrya govindaḥ kṛtvā cābhipradakṣiṇam | duryodhanagṛhaṃ śaurirabhyagacchadarindamaḥ
पृथा से विदा लेकर और उनकी प्रदक्षिणा करके शत्रुओं का दमन करने वाले शौरि (श्रीकृष्ण) दुर्योधन के भवन की ओर चले।
श्लोक 2 (5.91.2)
लक्ष्म्या परमया युक्तं पुरन्दरगृहोपमम् । विचित्रैरासनैर्युक्तं प्रविवेश जनार्दनः ॥
lakṣmyā paramayā yuktaṃ purandaragṛhopamam | vicitrairāsanairyuktaṃ praviveśa janārdanaḥ
जनार्दन ने उस भवन में प्रवेश किया, जो परम शोभा से सम्पन्न, इन्द्र के महल के समान और विचित्र आसनों से सुसज्जित था।
श्लोक 3 (5.91.3)
तस्य कक्ष्या व्यतिक्रम्य तिस्रो द्वाःस्थैरवारितः । ततोऽभ्रघनसङ्काशं गिरिकूटमिवोच्छ्रितम् ॥
tasya kakṣyā vyatikramya tisro dvāḥsthairavāritaḥ | tato'bhraghanasaṅkāśaṃ girikūṭamivocchritam
द्वारपालों द्वारा बिना रोके तीन ड्योढ़ियाँ पार करके वे बादलों के समूह के समान, पर्वत-शिखर की भाँति ऊँचे उठे हुए महल के पास पहुँचे,
श्लोक 4 (5.91.4)
श्रिया ज्वलन्तं प्रासादमारुरोह महायशाः । तत्र राजसहस्रैश्च कुरुभिश्चाभिसंवृतम् ॥
śriyā jvalantaṃ prāsādamāruroha mahāyaśāḥ | tatra rājasahasraiśca kurubhiścābhisaṃvṛtam
जो शोभा से जगमगा रहा था; उस महायशस्वी ने उस पर आरोहण किया। वहाँ सहस्रों राजाओं और कुरुवंशियों से घिरे हुए
श्लोक 5 (5.91.5)
धार्तराष्ट्रं महाबाहुं ददर्शासीनमासने । दुःशासनं च कर्णं च शकुनिं चापि सौबलम् ॥
dhārtarāṣṭraṃ mahābāhuṃ dadarśāsīnamāsane | duḥśāsanaṃ ca karṇaṃ ca śakuniṃ cāpi saubalam
महाबाहु धृतराष्ट्रपुत्र को उन्होंने आसन पर बैठे देखा। दुःशासन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि को भी
श्लोक 6 (5.91.6)
दुर्योधनसमीपे तानासनस्थान्ददर्श सः । अभ्यागच्छति दाशार्हे धार्तराष्ट्रो महायशाः ॥
duryodhanasamīpe tānāsanasthāndadarśa saḥ | abhyāgacchati dāśārhe dhārtarāṣṭro mahāyaśāḥ
उन्होंने दुर्योधन के समीप अपने-अपने आसनों पर बैठे देखा। दाशार्ह के आते ही महायशस्वी धृतराष्ट्रपुत्र
श्लोक 7 (5.91.7)
उदतिष्ठत्सहामात्यः पूजयन्मधुसूदनम् । समेत्य धार्तराष्ट्रेण महामात्येन केशवः ॥
udatiṣṭhatsahāmātyaḥ pūjayanmadhusūdanam | sametya dhārtarāṣṭreṇa mahāmātyena keśavaḥ
मधुसूदन का सम्मान करते हुए अपने मन्त्रियों के साथ उठ खड़ा हुआ। केशव बड़े-बड़े मन्त्रियों से घिरे धृतराष्ट्रपुत्र से मिले,
श्लोक 8 (5.91.8)
राजभिस्तत्र वार्ष्णेयः समागच्छद्यथावयः । तत्र जाम्बूनदमयं पर्यङ्कं सुपरिष्कृतम् ॥
rājabhistatra vārṣṇeyaḥ samāgacchadyathāvayaḥ | tatra jāmbūnadamayaṃ paryaṅkaṃ supariṣkṛtam
और वार्ष्णेय ने वहाँ उपस्थित राजाओं से उनकी आयु के अनुसार भेंट की। फिर सोने के बने, भली-भाँति सजे हुए
श्लोक 9 (5.91.9)
विविधास्तरणास्तीर्णमभ्युपाविशदच्युतः । तस्मिन्गां मधुपर्कं चाप्युदकं च जनार्दने ॥
vividhāstaraṇāstīrṇamabhyupāviśadacyutaḥ | tasmingāṃ madhuparkaṃ cāpyudakaṃ ca janārdane
और भाँति-भाँति के बिछौनों से ढके पलंग पर अच्युत विराजमान हुए। वहाँ बैठे जनार्दन को कौरव ने गौ, मधुपर्क और जल अर्पित किया
श्लोक 10 (5.91.10)
निवेदयामास तदा गृहान्राज्यं च कौरवः । आसनं सर्वतोभद्रं सर्वरत्नविभूषितम् ॥
nivedayāmāsa tadā gṛhānrājyaṃ ca kauravaḥ | āsanaṃ sarvatobhadraṃ sarvaratnavibhūṣitam
और फिर अपने भवन तथा राज्य उन्हें समर्पित कर दिए। सब प्रकार के रत्नों से विभूषित सर्वतोभद्र नामक आसन
श्लोक 11 (5.91.11)
कृष्णार्थमेवं संसिद्धं धार्तराष्ट्रस्य शासनात् । तत्र गोविन्दमासीनं प्रसन्नादित्यवर्चसम् ॥
kṛṣṇārthamevaṃ saṃsiddhaṃ dhārtarāṣṭrasya śāsanāt | tatra govindamāsīnaṃ prasannādityavarcasam
धृतराष्ट्रपुत्र की आज्ञा से इसी प्रकार कृष्ण के लिए तैयार किया गया था। वहाँ निर्मल सूर्य के समान तेजस्वी गोविन्द के बैठ जाने पर
श्लोक 12 (5.91.12)
उपासाञ्चक्रिरे सर्वे कुरवो राजभिः सह । ततो दुर्योधनो राजा वार्ष्णेयं जयतां वरम् ॥
upāsāñcakrire sarve kuravo rājabhiḥ saha | tato duryodhano rājā vārṣṇeyaṃ jayatāṃ varam
सभी कुरुवंशी राजाओं के साथ उनकी सेवा में बैठ गए। तब राजा दुर्योधन ने विजयी पुरुषों में श्रेष्ठ वार्ष्णेय को
श्लोक 13 (5.91.13)
न्यमन्त्रयद्भोजनेन नाभ्यनन्दच्च केशवः । ततो दुर्योधनः कृष्णमब्रवीत्कुरुसंसदि ॥
nyamantrayadbhojanena nābhyanandacca keśavaḥ | tato duryodhanaḥ kṛṣṇamabravītkurusaṃsadi
भोजन के लिए निमन्त्रित किया, पर केशव ने उसे स्वीकार नहीं किया। तब कौरव दुर्योधन ने कुरुओं की सभा में कृष्ण से
श्लोक 14 (5.91.14)
मृदुपूर्वं शठोदर्कं कर्णमाभाष्य कौरवः । कस्मादन्नानि पानानि वासांसि शयनानि च ॥
mṛdupūrvaṃ śaṭhodarkaṃ karṇamābhāṣya kauravaḥ | kasmādannāni pānāni vāsāṃsi śayanāni ca
पहले कर्ण की ओर संकेत करके ऐसे वचन कहे जो आरम्भ में कोमल पर परिणाम में कपटपूर्ण थे — "जनार्दन, जो अन्न, पेय, वस्त्र और शय्याएँ
दुर्योधन उवाच
श्लोक 15 (5.91.15)
त्वदर्थमुपनीतानि नाग्रहीस्त्वं जनार्दन । उभयोश्च ददत्साह्यमुभयोश्च हिते रतः ॥
tvadarthamupanītāni nāgrahīstvaṃ janārdana | ubhayośca dadatsāhyamubhayośca hite rataḥ
आपके लिए लाई गई थीं, उन्हें आपने ग्रहण क्यों नहीं किया? आप दोनों पक्षों की सहायता करते हैं और दोनों के हित में लगे रहते हैं;
श्लोक 16 (5.91.16)
संबन्धी दयितश्चासि धृतराष्ट्रस्य माधव । त्वं हि गोविन्द धर्मार्थौ वेत्थ तत्त्वेन सर्वशः । तत्र कारणमिच्छामि श्रोतुं चक्रगदाधर ॥
saṃbandhī dayitaścāsi dhṛtarāṣṭrasya mādhava | tvaṃ hi govinda dharmārthau vettha tattvena sarvaśaḥ | tatra kāraṇamicchāmi śrotuṃ cakragadādhara
माधव, आप धृतराष्ट्र के सम्बन्धी और प्रिय हैं। गोविन्द, आप धर्म और अर्थ को सब प्रकार से तत्त्वतः जानते हैं। हे चक्र और गदा धारण करने वाले, मैं इसका कारण सुनना चाहता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (5.91.17)
स एवमुक्तो गोविन्दः प्रत्युवाच महामनाः । उद्यन्मेघस्वनः काले प्रगृह्य विपुलं भुजम् ॥
sa evamukto govindaḥ pratyuvāca mahāmanāḥ | udyanmeghasvanaḥ kāle pragṛhya vipulaṃ bhujam
ऐसा कहे जाने पर महामना गोविन्द ने अपनी विशाल भुजा उठाकर, वर्षा-ऋतु में उमड़ते मेघ के गर्जन जैसे स्वर में उत्तर दिया।
श्लोक 18 (5.91.18)
अलघूकृतमग्रस्तमनिरस्तमसंकुलम् । राजीवनेत्रो राजानं हेतुमद्वाक्यमुत्तमम् ॥
alaghūkṛtamagrastamanirastamasaṃkulam | rājīvanetro rājānaṃ hetumadvākyamuttamam
कमलनयन ने राजा से युक्तियुक्त उत्तम वचन कहे — जो न अस्पष्ट थे, न अधूरे निगले हुए, न कटे हुए और न उलझे हुए:
वासुदेव उवाच
श्लोक 19 (5.91.19)
कृतार्था भुञ्जते दूताः पूजां गृह्णन्ति चैव ह । कृतार्थं मां सहामात्यं समर्चिष्यसि भारत ॥
kṛtārthā bhuñjate dūtāḥ pūjāṃ gṛhṇanti caiva ha | kṛtārthaṃ māṃ sahāmātyaṃ samarciṣyasi bhārata
"दूत अपना कार्य पूरा होने पर ही भोजन करते हैं और सत्कार ग्रहण करते हैं। भारत, जब मेरा प्रयोजन सिद्ध हो जाए, तब तुम मन्त्रियों सहित मेरा सत्कार करना।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (5.91.20)
एवमुक्तः प्रत्युवाच धार्तराष्ट्रो जनार्दनम् । न युक्तं भवताऽस्मासु प्रतिपत्तुमसांप्रतम् ॥
evamuktaḥ pratyuvāca dhārtarāṣṭro janārdanam | na yuktaṃ bhavatā'smāsu pratipattumasāṃpratam
ऐसा कहे जाने पर धृतराष्ट्रपुत्र ने जनार्दन को उत्तर दिया — "आपका हमारे प्रति अनुचित व्यवहार करना ठीक नहीं है।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 21 (5.91.21)
कृतार्थं वाऽकृतार्थं वा त्वां वयं मधुसूदन । यतामहे पूजयितुं दाशार्ह न च शक्नुमः ॥
kṛtārthaṃ vā'kṛtārthaṃ vā tvāṃ vayaṃ madhusūdana | yatāmahe pūjayituṃ dāśārha na ca śaknumaḥ
मधुसूदन, आपका प्रयोजन सिद्ध हो या न हो, हे दाशार्ह, हम आपका सत्कार करने का प्रयत्न करते हैं, फिर भी कर नहीं पाते।
श्लोक 22 (5.91.22)
न च तत्कारणं विद्मो यस्मान्नो मधुसूदन । पूजां कृतां प्रीयमाणो नामंस्थाः पुरुषोत्तम ॥
na ca tatkāraṇaṃ vidmo yasmānno madhusūdana | pūjāṃ kṛtāṃ prīyamāṇo nāmaṃsthāḥ puruṣottama
मधुसूदन, पुरुषोत्तम, हम यह भी नहीं जानते कि प्रसन्नचित्त होते हुए भी आपने हमारे किए हुए सत्कार को क्यों स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 23 (5.91.23)
वैरं नो नास्ति भवता गोविन्द न च विग्रहः । स भवान्प्रसमीक्ष्यैतन्नेदृशं वक्तुमर्हति ॥
vairaṃ no nāsti bhavatā govinda na ca vigrahaḥ | sa bhavānprasamīkṣyaitannedṛśaṃ vaktumarhati
गोविन्द, आपसे हमारा न कोई वैर है, न कोई विरोध। इस पर विचार करके आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (5.91.24)
एवमुक्तः प्रत्युवाच धार्तराष्ट्रं जनार्दनः । अभिवीक्ष्य सहामात्यं दाशार्हः प्रहसन्निव ॥
evamuktaḥ pratyuvāca dhārtarāṣṭraṃ janārdanaḥ | abhivīkṣya sahāmātyaṃ dāśārhaḥ prahasanniva
ऐसा कहे जाने पर दाशार्ह जनार्दन ने मन्त्रियों सहित धृतराष्ट्रपुत्र की ओर देखकर मानो मुस्कराते हुए उत्तर दिया —
वासुदेव उवाच
श्लोक 25 (5.91.25)
नाहं कामान्न संरम्भान्न द्वेषान्नार्थकारणात् । न हेतुवादाल्लोभाद्वा धर्मं जह्यां कथंचन ॥
nāhaṃ kāmānna saṃrambhānna dveṣānnārthakāraṇāt | na hetuvādāllobhādvā dharmaṃ jahyāṃ kathaṃcana
"मैं न कामना से, न क्रोध से, न द्वेष से, न धन के कारण, न कुतर्क से और न लोभ से — किसी भी प्रकार धर्म को नहीं छोड़ सकता।
श्लोक 26 (5.91.26)
संप्रीतिभोज्यान्यन्नानि आपद्भोज्यानि वा पुनः । न च संप्रीयते राजन्न चैवापद्गता वयम् ॥
saṃprītibhojyānyannāni āpadbhojyāni vā punaḥ | na ca saṃprīyate rājanna caivāpadgatā vayam
अन्न या तो प्रेम के कारण खाया जाता है या फिर विपत्ति में। राजन्, यहाँ न प्रेम है और न हम विपत्ति में पड़े हैं।
श्लोक 27 (5.91.27)
द्विषदन्नं न भोक्तव्यं द्विषन्तं नैव भोजयेत् । पाण्डवान्द्विषसे राजन्मम प्राणा हि पाण्डवाः ॥
dviṣadannaṃ na bhoktavyaṃ dviṣantaṃ naiva bhojayet | pāṇḍavāndviṣase rājanmama prāṇā hi pāṇḍavāḥ
शत्रु का अन्न नहीं खाना चाहिए और शत्रु को भोजन भी नहीं कराना चाहिए। राजन्, तुम पाण्डवों से द्वेष करते हो, और पाण्डव तो मेरे प्राण हैं।
श्लोक 28 (5.91.28)
अकस्माद्द्विषसे राजञ्जन्मप्रभृति पाण्डवान् । प्रियानुवर्तिनो भ्रातॄन्सर्वैः समुदितान्गुणैः ॥
akasmāddviṣase rājañjanmaprabhṛti pāṇḍavān | priyānuvartino bhrātṝnsarvaiḥ samuditānguṇaiḥ
राजन्, तुम बिना किसी कारण जन्म से ही पाण्डवों से द्वेष करते आए हो — उन भाइयों से जो तुम्हारा प्रिय करते हैं और सब गुणों से सम्पन्न हैं।
श्लोक 29 (5.91.29)
अकस्माच्चैव पार्थानां द्वेषणं नोपपद्यते । धर्मे स्थिताः पाण्डवेयाः कस्तान्किं वक्तुमर्हति ॥
akasmāccaiva pārthānāṃ dveṣaṇaṃ nopapadyate | dharme sthitāḥ pāṇḍaveyāḥ kastānkiṃ vaktumarhati
पृथा के पुत्रों से यह अकारण द्वेष उचित नहीं है। पाण्डव धर्म में स्थित हैं; उनके विरुद्ध कौन क्या कह सकता है?
श्लोक 30 (5.91.30)
यस्तान्द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्ताननु समामनु । ऐकात्म्यं मां गतं विद्धि पाण्डवैर्धर्मचारिभिः ॥
yastāndveṣṭi sa māṃ dveṣṭi yastānanu samāmanu | aikātmyaṃ māṃ gataṃ viddhi pāṇḍavairdharmacāribhiḥ
जो उनसे द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है; जो उनके अनुकूल है, वह मेरे अनुकूल है। धर्म का आचरण करने वाले पाण्डवों के साथ मुझे एकात्म हुआ जानो।
श्लोक 31 (5.91.31)
कामक्रोधानुवर्ती हि यो मोहाद्विरुरुत्सति । गुणवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुः पुरुषाधमम् ॥
kāmakrodhānuvartī hi yo mohādvirurutsati | guṇavantaṃ ca yo dveṣṭi tamāhuḥ puruṣādhamam
जो काम और क्रोध के वश में होकर मोहवश विरोध करना चाहता है और गुणवान से द्वेष करता है, उसे अधम पुरुष कहते हैं।
श्लोक 32 (5.91.32)
यः कल्याणगुणाञ्ज्ञातीन्मोहाल्लोभाद्दिदृक्षते । सोऽजितात्माऽजितक्रोधो न चिरं तिष्ठति श्रिया ॥
yaḥ kalyāṇaguṇāñjñātīnmohāllobhāddidṛkṣate | so'jitātmā'jitakrodho na ciraṃ tiṣṭhati śriyā
जो मोह और लोभ के कारण कल्याणकारी गुणों वाले बन्धुओं को बुरी दृष्टि से देखता है, वह न अपने मन को जीत पाता है न क्रोध को, और लक्ष्मी के साथ अधिक समय तक नहीं टिकता।
श्लोक 33 (5.91.33)
अथ यो गुणसंपन्नान्हृदयस्याप्रियानपि । प्रियेण कुरुते वश्यांश्चिरं यशसि तिष्ठति ॥
atha yo guṇasaṃpannānhṛdayasyāpriyānapi | priyeṇa kurute vaśyāṃściraṃ yaśasi tiṣṭhati
किन्तु जो गुणवान लोगों को, चाहे वे उसके मन को प्रिय न हों, प्रेमपूर्ण व्यवहार से अपने वश में कर लेता है, वह चिरकाल तक यश में स्थित रहता है।
श्लोक 34 (5.91.34)
सर्वमेतन्न भोक्तव्यमन्नं दुष्टाभिसंहितम् । क्षत्तुरेकस्य भोक्तव्यमिति मे धीयते मतिः ॥
sarvametanna bhoktavyamannaṃ duṣṭābhisaṃhitam | kṣatturekasya bhoktavyamiti me dhīyate matiḥ
यह सारा अन्न खाने योग्य नहीं है, क्योंकि यह दुर्भावना से दूषित है। केवल क्षत्ता (विदुर) का अन्न ही मेरे खाने योग्य है — ऐसा मेरा निश्चय है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 35 (5.91.35)
एवमुक्त्वा महाबाहुर्दुर्योधनममर्षणम् । निश्चक्राम ततः शुभ्राद्धार्तराष्ट्रनिवेशनात् ॥
evamuktvā mahābāhurduryodhanamamarṣaṇam | niścakrāma tataḥ śubhrāddhārtarāṣṭraniveśanāt
असहिष्णु दुर्योधन से ऐसा कहकर महाबाहु श्रीकृष्ण धृतराष्ट्रपुत्र के उज्ज्वल भवन से बाहर निकल गए।
श्लोक 36 (5.91.36)
निर्याय च महाबाहुर्वासुदेवो महामनाः । निवेशाय ययौ वेश्म विदुरस्य महात्मनः ॥
niryāya ca mahābāhurvāsudevo mahāmanāḥ | niveśāya yayau veśma vidurasya mahātmanaḥ
बाहर निकलकर महामना महाबाहु वासुदेव ठहरने के लिए महात्मा विदुर के घर गए।
श्लोक 37 (5.91.37)
तमभ्यगच्छद्द्रोणश्च कृपो भीष्मोऽथ बाह्लिकः । कुरवश्च महाबाहुं विदुरस्य गृहे स्थितम् ॥
tamabhyagacchaddroṇaśca kṛpo bhīṣmo'tha bāhlikaḥ | kuravaśca mahābāhuṃ vidurasya gṛhe sthitam
विदुर के घर ठहरे हुए महाबाहु के पास द्रोण, कृप, भीष्म, बाह्लीक और अन्य कुरुवंशी आए।
श्लोक 38 (5.91.38)
त ऊचुर्माधवं वीरं कुरवो मधुसूदनम् । निवेदयामो वार्ष्णेय सरत्नांस्ते गृहान्वयम् ॥
ta ūcurmādhavaṃ vīraṃ kuravo madhusūdanam | nivedayāmo vārṣṇeya saratnāṃste gṛhānvayam
कुरुवंशियों ने वीर माधव मधुसूदन से कहा — "वार्ष्णेय, हम रत्नों सहित अपने भवन आपको समर्पित करते हैं।"
श्लोक 39 (5.91.39)
तानुवाच महातेजाः कौरवान्मधुसूदनः । सर्वे भवन्तो गच्छन्तु सर्वा मेऽपचितिः कृता ॥
tānuvāca mahātejāḥ kauravānmadhusūdanaḥ | sarve bhavanto gacchantu sarvā me'pacitiḥ kṛtā
महातेजस्वी मधुसूदन ने कौरवों से कहा — "आप सब लोग जाइए; आपने मेरा पूरा सत्कार कर दिया है।"
श्लोक 40 (5.91.40)
यातेषु कुरुषु क्षत्ता दाशार्हमपराजितम् । अभ्यर्चयामास तदा सर्वकामैः प्रयत्नवान् ॥
yāteṣu kuruṣu kṣattā dāśārhamaparājitam | abhyarcayāmāsa tadā sarvakāmaiḥ prayatnavān
कुरुवंशियों के चले जाने पर क्षत्ता (विदुर) ने बड़े यत्न से अपराजित दाशार्ह का सब मनचाही वस्तुओं से सत्कार किया।
श्लोक 41 (5.91.41)
ततः क्षत्ताऽन्नपानानि शुचीनि गुणवन्ति च । उपाहरदनेकानि केशवाय महात्मने ॥
tataḥ kṣattā'nnapānāni śucīni guṇavanti ca | upāharadanekāni keśavāya mahātmane
फिर क्षत्ता ने महात्मा केशव के लिए अनेक प्रकार के पवित्र और उत्तम अन्न-पान ला कर रखे।
श्लोक 42 (5.91.42)
तैस्तर्पयित्वा प्रथमं ब्राह्मणान्मधुसूदनः । वेदविद्भ्यो ददौ कृष्णः परमद्रविणान्यपि ॥
taistarpayitvā prathamaṃ brāhmaṇānmadhusūdanaḥ | vedavidbhyo dadau kṛṣṇaḥ paramadraviṇānyapi
उनसे मधुसूदन ने पहले ब्राह्मणों को तृप्त किया, और कृष्ण ने वेदवेत्ताओं को उत्तम धन भी दान किया।
श्लोक 43 (5.91.43)
भुक्तवत्सु द्विजाग्र्येषु निषण्णेषु वरासने । शुचिः सुप्रयतो भूत्वा विदुरोऽन्नमुपाहरत् ॥
bhuktavatsu dvijāgryeṣu niṣaṇṇeṣu varāsane | śuciḥ suprayato bhūtvā viduro'nnamupāharat
जब श्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन करके उत्तम आसनों पर बैठ गए, तब विदुर पवित्र और संयत होकर अन्न लाए
श्लोक 44 (5.91.44)
श्रद्धया परया युक्त इदं वचनमब्रवीत् । संवृतैस्तुष्य गोविन्द एतन्नः परमं धनम् । अन्यथा हि विशेषेण कस्त्वामर्चितुमर्हति ॥
śraddhayā parayā yukta idaṃ vacanamabravīt | saṃvṛtaistuṣya govinda etannaḥ paramaṃ dhanam | anyathā hi viśeṣeṇa kastvāmarcitumarhati
और परम श्रद्धा से भरकर ये वचन बोले — "गोविन्द, इन साधारण वस्तुओं से ही संतुष्ट हों; यही हमारा परम धन है। अन्यथा आपकी यथोचित विशेष पूजा कौन कर सकता है?"
श्लोक 45 (5.91.45)
ततोऽनुयायिभिः सार्धं मरुद्भिरिव वासवः । विदुरान्नानि बुभुजे शुचीनि गुणवन्ति च ॥
tato'nuyāyibhiḥ sārdhaṃ marudbhiriva vāsavaḥ | vidurānnāni bubhuje śucīni guṇavanti ca
तब अपने अनुयायियों के साथ, मरुद्गणों सहित इन्द्र की भाँति, उन्होंने विदुर का पवित्र और उत्तम अन्न ग्रहण किया।
श्लोक 46 (5.91.46)
तं भुक्तवन्तं विविधाः सुशब्दाः सूतमागधाः । अभितुष्टुवुरासीनं दाशार्हमपराजितम् ॥
taṃ bhuktavantaṃ vividhāḥ suśabdāḥ sūtamāgadhāḥ | abhituṣṭuvurāsīnaṃ dāśārhamaparājitam
भोजन करके जब वे बैठे, तब मधुर स्वर वाले अनेक सूत और मागधों ने अपराजित दाशार्ह की स्तुति की।