उद्योग पर्व · अध्याय 92
विदुर की श्रीकृष्ण को सभा में न जाने की चेतावनी
उस रात विदुर श्रीकृष्ण से कहते हैं कि उनका यहाँ आना उचित नहीं था। वे दुर्योधन के दोषों — उसके अहंकार, कृतघ्नता और बड़ों के अनादर — तथा भीष्म, द्रोण और कर्ण पर उसके अन्धे भरोसे का वर्णन करते हैं, और चेताते हैं कि जिन्होंने पाण्डवों का भाग कभी न लौटाने का निश्चय कर लिया है, उनके बीच शान्ति की बात व्यर्थ जाएगी। युद्ध के लिए इकट्ठे हुए राजा कृष्ण के पुराने शत्रु हैं, और विदुर प्रेमवश नहीं चाहते कि वे उनके बीच जाएँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.92.1)
तं भुक्तवन्तमाश्वस्तं निशायां विदुरोऽब्रवीत् । नेदं सम्यग्व्यवसितं केशवागमनं तव ॥
taṃ bhuktavantamāśvastaṃ niśāyāṃ viduro'bravīt | nedaṃ samyagvyavasitaṃ keśavāgamanaṃ tava
जब वे भोजन करके विश्राम कर चुके, तब रात में विदुर ने उनसे कहा — "केशव, आपका यहाँ आना भली-भाँति विचारकर निश्चित नहीं किया गया।
विदुर उवाच
श्लोक 2 (5.92.2)
अर्थधर्मातिगो मन्दः संरम्भी च जनार्दन । मानघ्नो मानकामश्च वृद्धानां शासनातिगः ॥
arthadharmātigo mandaḥ saṃrambhī ca janārdana | mānaghno mānakāmaśca vṛddhānāṃ śāsanātigaḥ
जनार्दन, धृतराष्ट्र का पुत्र अर्थ और धर्म दोनों का उल्लंघन करता है; वह मन्दबुद्धि और क्रोधी है, दूसरों का मान नष्ट करता है पर स्वयं मान चाहता है, और बड़ों की आज्ञा नहीं मानता।
श्लोक 3 (5.92.3)
धर्मशास्त्रातिगो मूढो दुरात्मा प्रग्रहं गतः । अनेयः श्रेयसां मन्दो धार्तराष्ट्रो जनार्दन ॥
dharmaśāstrātigo mūḍho durātmā pragrahaṃ gataḥ | aneyaḥ śreyasāṃ mando dhārtarāṣṭro janārdana
वह धर्मशास्त्र की मर्यादा लाँघता है, मूढ़, दुष्टात्मा और हठी है। जनार्दन, यह मन्दबुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र कल्याण की ओर ले जाया नहीं जा सकता।
श्लोक 4 (5.92.4)
कामात्मा प्राज्ञमानी च मित्रध्रुक्सर्वशङ्किता । अकर्ता चाकृतज्ञश्च त्यक्तधर्मा प्रियानृतः ॥
kāmātmā prājñamānī ca mitradhruksarvaśaṅkitā | akartā cākṛtajñaśca tyaktadharmā priyānṛtaḥ
वह कामनाओं का दास है, अपने को बुद्धिमान मानता है, मित्रों से द्रोह करता है और सब पर संदेह करता है; वह किसी का उपकार नहीं करता, कृतघ्न है, धर्म को त्याग चुका है और असत्य उसे प्रिय है।
श्लोक 5 (5.92.5)
मूढश्चाकृतबुद्धिश्च इन्द्रियाणामनीश्वरः । कामानुसारी कृत्येषु सर्वेष्वकृतनिश्चयः ॥
mūḍhaścākṛtabuddhiśca indriyāṇāmanīśvaraḥ | kāmānusārī kṛtyeṣu sarveṣvakṛtaniścayaḥ
वह मूर्ख है, उसकी बुद्धि परिपक्व नहीं है, वह इन्द्रियों का स्वामी नहीं है; कामनाओं के पीछे चलता है और किसी भी कर्तव्य में निश्चय नहीं कर पाता।
श्लोक 6 (5.92.6)
एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्दोषैरेव समन्वितः । त्वयोच्यमानः श्रेयोऽपि संरम्भान्न ग्रहीष्यति ॥
etaiścānyaiśca bahubhirdoṣaireva samanvitaḥ | tvayocyamānaḥ śreyo'pi saṃrambhānna grahīṣyati
इन और ऐसे ही बहुत-से दोषों से युक्त होने के कारण, आपके कहने पर भी वह क्रोधवश अपने कल्याण की बात स्वीकार नहीं करेगा।
श्लोक 7 (5.92.7)
भीष्मे द्रोणे कृपे कर्णे द्रोणपुत्रे जयद्रथे । भूयसीं वर्तते वृत्तिं न शमे कुरुते मनः ॥
bhīṣme droṇe kṛpe karṇe droṇaputre jayadrathe | bhūyasīṃ vartate vṛttiṃ na śame kurute manaḥ
वह भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, द्रोणपुत्र और जयद्रथ पर सबसे अधिक भरोसा रखता है, और शान्ति की ओर मन नहीं लगाता।
श्लोक 8 (5.92.8)
निश्चितं धार्तराष्ट्राणां सकर्णानां जनार्दन । भीष्मद्रोणमुखान्पार्था न शक्ताः प्रतिवीक्षितुम् ॥
niścitaṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ sakarṇānāṃ janārdana | bhīṣmadroṇamukhānpārthā na śaktāḥ prativīkṣitum
जनार्दन, कर्ण सहित धृतराष्ट्र के पुत्रों का यह दृढ़ विश्वास है कि पृथा के पुत्र भीष्म, द्रोण आदि प्रमुख योद्धाओं की ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते।
श्लोक 9 (5.92.9)
सेनासमुदयं कृत्वा पार्थिवं मधुसूदन । कृतार्थं मन्यते बाल आत्मानमविचक्षणः ॥
senāsamudayaṃ kṛtvā pārthivaṃ madhusūdana | kṛtārthaṃ manyate bāla ātmānamavicakṣaṇaḥ
मधुसूदन, राजाओं की सेना इकट्ठी करके वह अविवेकी बालक अपने को कृतार्थ मान बैठा है।
श्लोक 10 (5.92.10)
एकः कर्णः पराञ्जेतुं समर्थ इति निश्चितम् । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेः स शमं नोपयास्यति ॥
ekaḥ karṇaḥ parāñjetuṃ samartha iti niścitam | dhārtarāṣṭrasya durbuddheḥ sa śamaṃ nopayāsyati
उसका निश्चय है कि अकेला कर्ण ही शत्रुओं को जीतने में समर्थ है; वह दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र शान्ति की ओर नहीं आएगा।
श्लोक 11 (5.92.11)
संविच्च धार्तराष्ट्राणां सर्वेषामेव केशव । शमे प्रयतमानस्य तव सौभ्रात्रकाङ्क्षिणः ॥
saṃvicca dhārtarāṣṭrāṇāṃ sarveṣāmeva keśava | śame prayatamānasya tava saubhrātrakāṅkṣiṇaḥ
केशव, आप भाईचारे की कामना से शान्ति का प्रयत्न कर रहे हैं, पर धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों ने आपस में यह ठान लिया है
श्लोक 12 (5.92.12)
न पाण्डवानामस्माभिः प्रतिदेयं यथोचितम् । इति व्यवसितास्तेषु वचनं स्यान्निरर्थकम् ॥
na pāṇḍavānāmasmābhiḥ pratideyaṃ yathocitam | iti vyavasitāsteṣu vacanaṃ syānnirarthakam
कि हमें पाण्डवों को उनका उचित भाग नहीं लौटाना है। जब उनका ऐसा निश्चय है, तो उनसे कही गई आपकी बात व्यर्थ ही होगी।
श्लोक 13 (5.92.13)
यत्र सूक्तं दुरुक्तं च समं स्यान्मधुसूदन । न तत्र प्रलपेत्प्राज्ञो बधिरेष्विव गायनः ॥
yatra sūktaṃ duruktaṃ ca samaṃ syānmadhusūdana | na tatra pralapetprājño badhireṣviva gāyanaḥ
मधुसूदन, जहाँ अच्छी और बुरी बात बराबर समझी जाए, वहाँ बुद्धिमान को वैसे ही नहीं बोलना चाहिए जैसे बहरों के बीच गायक का गाना व्यर्थ है।
श्लोक 14 (5.92.14)
अविजानत्सु मूढेषु निर्मर्यादेषु माधव । तत्त्वं वाक्यं ब्रुवन्निन्द्यश्चण्डालेषु द्विजो यथा ॥
avijānatsu mūḍheṣu nirmaryādeṣu mādhava | tattvaṃ vākyaṃ bruvannindyaścaṇḍāleṣu dvijo yathā
माधव, अज्ञानी, मूढ़ और मर्यादाहीन लोगों के बीच सत्य वचन कहकर आप वैसे ही निन्दा के पात्र होंगे जैसे चाण्डालों के बीच ब्राह्मण।
श्लोक 15 (5.92.15)
सोऽयं बलस्थो मूढश्चन करिष्यति ते वचः । तस्मिन्निरर्थकं वाक्यमुक्तं संपत्स्यते तव ॥
so'yaṃ balastho mūḍhaścana kariṣyati te vacaḥ | tasminnirarthakaṃ vākyamuktaṃ saṃpatsyate tava
अपने बल के घमण्ड में चूर वह मूढ़ आपकी बात नहीं मानेगा; उससे कहा गया आपका वचन निष्फल ही होगा।
श्लोक 16 (5.92.16)
तेषां समुपविष्टानां सर्वेषां पापचेतसाम् । तव मध्यावतरणं मम कृष्ण न रोचते ॥
teṣāṃ samupaviṣṭānāṃ sarveṣāṃ pāpacetasām | tava madhyāvataraṇaṃ mama kṛṣṇa na rocate
कृष्ण, वहाँ एकत्र बैठे उन सब पापबुद्धि लोगों के बीच आपका उतरना मुझे अच्छा नहीं लगता।
श्लोक 17 (5.92.17)
दुर्बुद्धीनामशिष्टानां बहूनां दुष्टचेतसाम् । प्रतीपं वचनं मध्ये तव कृष्ण न रोचते ॥
durbuddhīnāmaśiṣṭānāṃ bahūnāṃ duṣṭacetasām | pratīpaṃ vacanaṃ madhye tava kṛṣṇa na rocate
कृष्ण, बहुत-से दुर्बुद्धि, अशिष्ट और दुष्ट-हृदय लोगों के बीच उनके विपरीत वचन कहना मुझे आपके लिए उचित नहीं लगता।
श्लोक 18 (5.92.18)
अनुपासितवृद्धत्वाच्छ्रियो दर्पाच्च मोहितः । वयोदर्पादमर्षाच्च न ते श्रेयो ग्रहीष्यति ॥
anupāsitavṛddhatvācchriyo darpācca mohitaḥ | vayodarpādamarṣācca na te śreyo grahīṣyati
उसने कभी वृद्धों की सेवा नहीं की; धन-वैभव के दर्प, यौवन के अभिमान और असहिष्णुता से मोहित होकर वह आपसे कल्याण की बात ग्रहण नहीं करेगा।
श्लोक 19 (5.92.19)
बलं बलवदप्यस्य यदि वक्ष्यसि माधव । त्वय्यस्य महती शङ्का न करिष्यति ते वचः ॥
balaṃ balavadapyasya yadi vakṣyasi mādhava | tvayyasya mahatī śaṅkā na kariṣyati te vacaḥ
माधव, यदि आप उससे प्रबल सेना-शक्ति की बात भी कहें, तो भी आप पर उसे भारी संदेह है; वह आपकी बात नहीं मानेगा।
श्लोक 20 (5.92.20)
नेदमद्य युधा शक्यमिन्द्रेणापि सहामरैः । इति व्यवसिताः सर्वे धार्तराष्ट्रा जनार्दन ॥
nedamadya yudhā śakyamindreṇāpi sahāmaraiḥ | iti vyavasitāḥ sarve dhārtarāṣṭrā janārdana
जनार्दन, धृतराष्ट्र के सब पुत्रों ने यह निश्चय कर रखा है कि "आज युद्ध में देवताओं सहित इन्द्र भी इसे हमसे नहीं छीन सकता।"
श्लोक 21 (5.92.21)
तेष्वेवमुपपन्नेषु कामक्रोधानुवर्तिषु । समर्थमपि ते वाक्यमसमर्थं भविष्यति ॥
teṣvevamupapanneṣu kāmakrodhānuvartiṣu | samarthamapi te vākyamasamarthaṃ bhaviṣyati
जब वे काम और क्रोध के वशीभूत होकर ऐसी स्थिति में हैं, तो आपकी समर्थ बात भी असमर्थ हो जाएगी।
श्लोक 22 (5.92.22)
मध्ये तिष्ठन्हस्त्यनीकस्य मन्दो । रथाश्वयुक्तस्य बलस्य मूढः । दुर्योधनो मन्यते वीतभीतिः । कृत्स्ना मयेयं पृथिवी जितेति ॥
madhye tiṣṭhanhastyanīkasya mando | rathāśvayuktasya balasya mūḍhaḥ | duryodhano manyate vītabhītiḥ | kṛtsnā mayeyaṃ pṛthivī jiteti
हाथियों की सेना और रथों तथा घोड़ों से युक्त सैन्य के बीच खड़ा मन्दबुद्धि, मूढ़ दुर्योधन निर्भय होकर सोचता है — "यह सारी पृथ्वी मैंने जीत ली है।"
श्लोक 23 (5.92.23)
आशंसते वै धृतराष्ट्रस्य पुत्रो । महाराज्यमसपत्नं पृथिव्याम् । तस्मिञ्शमः केवलो नोपलभ्यो । बद्धं सन्तं मन्यते लब्धमर्थम् ॥
āśaṃsate vai dhṛtarāṣṭrasya putro | mahārājyamasapatnaṃ pṛthivyām | tasmiñśamaḥ kevalo nopalabhyo | baddhaṃ santaṃ manyate labdhamartham
धृतराष्ट्र का पुत्र पृथ्वी पर बिना प्रतिद्वन्द्वी के महान साम्राज्य की आशा करता है; उसमें शान्ति का लेश भी नहीं मिलता। जो उसकी मुट्ठी में है, उसे वह सुरक्षित प्राप्त मान बैठा है।
श्लोक 24 (5.92.24)
पर्यस्तेयं पृथिवी कालपक्वा । दुर्योधनार्थे पाण्डवान्योद्धुकामाः । समागताः सर्वयोधाः पृथिव्यां । राजानश्च क्षितिपालैः समेताः ॥
paryasteyaṃ pṛthivī kālapakvā | duryodhanārthe pāṇḍavānyoddhukāmāḥ | samāgatāḥ sarvayodhāḥ pṛthivyāṃ | rājānaśca kṣitipālaiḥ sametāḥ
काल से पकी हुई यह पृथ्वी उलट-पुलट हो गई है। दुर्योधन के लिए पृथ्वी के सब योद्धा, भूपालों सहित राजा, पाण्डवों से युद्ध करने की इच्छा से इकट्ठे हुए हैं।
श्लोक 25 (5.92.25)
सर्वे चैते कृतवैराः पुरस्ता- । त्त्वया राजानो हृतसाराश्च कृष्ण । तवोद्वेगात्संश्रिता धार्तराष्ट्रा- । न्सुसंहताः सह कर्णेन वीराः ॥
sarve caite kṛtavairāḥ purastā- | ttvayā rājāno hṛtasārāśca kṛṣṇa | tavodvegātsaṃśritā dhārtarāṣṭrā- | nsusaṃhatāḥ saha karṇena vīrāḥ
कृष्ण, ये सभी राजा पहले से ही आपसे वैर रखते हैं, क्योंकि आपने इनका धन-बल छीन लिया था। आपके भय से ये वीर धृतराष्ट्र के पुत्रों की शरण में आकर कर्ण के साथ संगठित हो गए हैं।
श्लोक 26 (5.92.26)
त्यक्तात्मानः सह दुर्योधनेन । सृष्टा योद्धुं पाण्डवान्सर्वयोधाः । मृत्युर्जयो वेति कृतैकभावाः । कामात्मानो मन्युवशाविनीताः । तेषां मध्ये प्रविशेथा यदि त्वं । न तन्मतं मम दाशार्हवीर ॥
tyaktātmānaḥ saha duryodhanena | sṛṣṭā yoddhuṃ pāṇḍavānsarvayodhāḥ | mṛtyurjayo veti kṛtaikabhāvāḥ | kāmātmāno manyuvaśāvinītāḥ | teṣāṃ madhye praviśethā yadi tvaṃ | na tanmataṃ mama dāśārhavīra
ये सब योद्धा दुर्योधन के साथ प्राणों का मोह त्यागकर पाण्डवों से लड़ने के लिए छोड़ दिए गए हैं; "मृत्यु या विजय" — यही उनका एक संकल्प है; वे कामनाओं के दास, क्रोध के वशीभूत और उद्दण्ड हैं। हे वीर दाशार्ह, आप उनके बीच प्रवेश करें, यह मुझे स्वीकार नहीं।
श्लोक 27 (5.92.27)
तेषां समुपविष्टानां बहूनां दुष्टचेतसाम् । कथं मध्यं प्रपद्येथाः शत्रूणां शत्रुकर्शन ॥
teṣāṃ samupaviṣṭānāṃ bahūnāṃ duṣṭacetasām | kathaṃ madhyaṃ prapadyethāḥ śatrūṇāṃ śatrukarśana
हे शत्रुसूदन, एक साथ बैठे उन बहुत-से दुष्टचित्त शत्रुओं के बीच आप कैसे जा सकते हैं?
श्लोक 28 (5.92.28)
सर्वथा त्वं महाबाहो देवैरपि दुरुत्सहः । प्रभावं पौरुषं बुद्धिं जानामि तव शत्रुहन् ॥
sarvathā tvaṃ mahābāho devairapi durutsahaḥ | prabhāvaṃ pauruṣaṃ buddhiṃ jānāmi tava śatruhan
महाबाहु, आप सब प्रकार से देवताओं के लिए भी दुःसह हैं। हे शत्रुहन्ता, मैं आपका प्रभाव, पौरुष और बुद्धि जानता हूँ।
श्लोक 29 (5.92.29)
या मे प्रीतिः पाण्डवेषु भूयः सा त्वयि माधव । प्रेम्णा च बहुमानाच्च सौहृदाच्च ब्रवीम्यहम् ॥
yā me prītiḥ pāṇḍaveṣu bhūyaḥ sā tvayi mādhava | premṇā ca bahumānācca sauhṛdācca bravīmyaham
माधव, पाण्डवों के प्रति मेरा जो प्रेम है, वह आपके प्रति उससे भी अधिक है। मैं प्रेम, आदर और सौहार्द के कारण ही यह कह रहा हूँ।
श्लोक 30 (5.92.30)
या मे प्रीतिः पुष्कराक्ष त्वद्दर्शनसमुद्भवा । सा किमाख्यायते तुभ्यमन्तरात्माऽसि देहिनां ॥
yā me prītiḥ puṣkarākṣa tvaddarśanasamudbhavā | sā kimākhyāyate tubhyamantarātmā'si dehināṃ
हे कमलनयन, आपके दर्शन से जो आनन्द मुझे मिलता है, उसका वर्णन आपसे क्या करूँ? आप तो सब देहधारियों के अन्तरात्मा हैं।"