उद्योग पर्व · अध्याय 93
श्रीकृष्ण द्वारा अपने आगमन का कारण बताना
श्रीकृष्ण विदुर के स्पष्ट और स्नेहपूर्ण परामर्श के लिए उनकी प्रशंसा करते हैं, फिर बताते हैं कि दुर्योधन की दुष्टता जानते हुए भी वे कौरवों के पास क्यों आए हैं। जो पृथ्वी को विनाश से बचाए, उसे महान पुण्य मिलता है; मित्र का कर्तव्य है कि वह अपने बन्धुओं को अनुचित मार्ग से लौटाने का प्रयत्न करे; और वे नहीं चाहते कि कोई कहे कि कृष्ण युद्ध रोक सकते थे पर उन्होंने नहीं रोका। यदि दुर्योधन हितकर बात न माने तो दैव अपना काम करेगा; इसके बाद श्रीकृष्ण सोने चले जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.93.1)
विदुरस्य वचः श्रुत्वा प्रश्रितं पुरुषोत्तमः । इदं होवाच वचनं मधुरं मधुसूदनः ॥
vidurasya vacaḥ śrutvā praśritaṃ puruṣottamaḥ | idaṃ hovāca vacanaṃ madhuraṃ madhusūdanaḥ
विदुर के विनयपूर्ण वचन सुनकर पुरुषोत्तम मधुसूदन ने यह मधुर वचन कहा —
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 2 (5.93.2)
यथा ब्रूयान्महाप्राज्ञो यथा ब्रूयाद्विचक्षणः । यथा वाच्यस्त्वद्विधेन भवता मद्विधः सुहृत् ॥
yathā brūyānmahāprājño yathā brūyādvicakṣaṇaḥ | yathā vācyastvadvidhena bhavatā madvidhaḥ suhṛt
"जैसे कोई महाबुद्धिमान बोले, जैसे कोई विवेकी बोले, जैसे आप जैसे व्यक्ति को मुझ जैसे मित्र से कहना चाहिए —
श्लोक 3 (5.93.3)
धर्मार्थयुक्तं तथ्यं च यथा त्वय्युपपद्यते । तथा वचनमुक्तोऽस्मि त्वयैतत्पितृमातृवत् ॥
dharmārthayuktaṃ tathyaṃ ca yathā tvayyupapadyate | tathā vacanamukto'smi tvayaitatpitṛmātṛvat
धर्म और अर्थ से युक्त, सत्य और आपके योग्य — ऐसे ही वचन आपने माता-पिता की भाँति मुझसे कहे हैं।
श्लोक 4 (5.93.4)
सत्यं प्राप्तं च युक्तं वाऽप्येवमेव यथाऽऽत्थ माम् । शृणुष्वागमने हेतुं विदुरावहितो मम ॥
satyaṃ prāptaṃ ca yuktaṃ vā'pyevameva yathā''ttha mām | śṛṇuṣvāgamane hetuṃ vidurāvahito mama
आपने मुझसे जो कहा, वह सत्य, समयोचित और उचित है। विदुर, अब मेरे आने का कारण ध्यान से सुनिए।
श्लोक 5 (5.93.5)
दौरात्म्यं धार्तराष्ट्रस्य क्षत्रियाणां च वैरिताम् । सर्वमेतदहं जानन्क्षत्तः प्राप्तोऽद्य कौरवान् ॥
daurātmyaṃ dhārtarāṣṭrasya kṣatriyāṇāṃ ca vairitām | sarvametadahaṃ jānankṣattaḥ prāpto'dya kauravān
क्षत्ता, धृतराष्ट्रपुत्र की दुष्टता और क्षत्रियों की शत्रुता — यह सब जानते हुए ही मैं आज कौरवों के पास आया हूँ।
श्लोक 6 (5.93.6)
पर्यस्तां पृथिवीं सर्वां साश्वां सरथकुञ्जराम् । यो मोचयेन्मृत्युपाशात्प्राप्नुयाद्धर्ममुत्तमम् ॥
paryastāṃ pṛthivīṃ sarvāṃ sāśvāṃ sarathakuñjarām | yo mocayenmṛtyupāśātprāpnuyāddharmamuttamam
घोड़ों, रथों और हाथियों सहित इस उलट-पुलट हुई सारी पृथ्वी को जो मृत्यु के पाश से छुड़ा दे, वह उत्तम धर्म का फल प्राप्त करेगा।
श्लोक 7 (5.93.7)
धर्मकार्यं यतञ्शक्त्या नो चेत्प्राप्नोति मानवः । प्राप्तो भवति तत्पुण्यमत्र मे नास्ति संशयः ॥
dharmakāryaṃ yatañśaktyā no cetprāpnoti mānavaḥ | prāpto bhavati tatpuṇyamatra me nāsti saṃśayaḥ
जो मनुष्य अपनी शक्ति भर धर्म-कार्य के लिए प्रयत्न करता है, वह उसे पूरा न कर पाए तो भी उसका पुण्य पा लेता है; इसमें मुझे कोई संदेह नहीं।
श्लोक 8 (5.93.8)
मनसा चिन्तयन्पापं कर्मणा नातिरोचयन् । न प्राप्नोति फलं तस्येत्येवं धर्मविदो विदुः ॥
manasā cintayanpāpaṃ karmaṇā nātirocayan | na prāpnoti phalaṃ tasyetyevaṃ dharmavido viduḥ
जो मन में पाप का विचार तो करता है पर कर्म द्वारा उसमें रुचि नहीं लेता, उसे उसका फल नहीं मिलता — ऐसा धर्मज्ञ कहते हैं।
श्लोक 9 (5.93.9)
सोऽहं यतिष्ये प्रशमं क्षत्तः कर्तुममायया । कुरूणां सृञ्जयानां च सङ्ग्रामे विनशिष्यताम् ॥
so'haṃ yatiṣye praśamaṃ kṣattaḥ kartumamāyayā | kurūṇāṃ sṛñjayānāṃ ca saṅgrāme vinaśiṣyatām
इसलिए क्षत्ता, मैं निष्कपट भाव से कुरुओं और सृंजयों में, जो युद्ध में नष्ट होने वाले हैं, शान्ति स्थापित करने का प्रयत्न करूँगा।
श्लोक 10 (5.93.10)
सेयमापन्महाघोरा कुरुष्वेव समुत्थिता । कर्णदुर्योधनकृता सर्वे ह्येते तदन्वयाः ॥
seyamāpanmahāghorā kuruṣveva samutthitā | karṇaduryodhanakṛtā sarve hyete tadanvayāḥ
यह महाभयंकर आपत्ति कुरुओं में ही उत्पन्न हुई है; यह कर्ण और दुर्योधन की करनी है, और ये सब दूसरे तो उन्हीं के पीछे चलने वाले हैं।
श्लोक 11 (5.93.11)
व्यसने क्लिश्यमानं हि यो मित्रं नाभिपद्यते । अनुनीय यथाशक्ति तं नृशंसं विदुर्बुधाः ॥
vyasane kliśyamānaṃ hi yo mitraṃ nābhipadyate | anunīya yathāśakti taṃ nṛśaṃsaṃ vidurbudhāḥ
जो विपत्ति में क्लेश पाते मित्र के पास जाकर यथाशक्ति उसे समझाने-मनाने का प्रयत्न नहीं करता, उसे बुद्धिमान लोग क्रूर कहते हैं।
श्लोक 12 (5.93.12)
आकेशग्रहणान्मित्रमकार्यात्संनिवर्तयन् । अवाच्यः कस्यचिद्भवति कृतयत्नो यथाबलम् ॥
ākeśagrahaṇānmitramakāryātsaṃnivartayan | avācyaḥ kasyacidbhavati kṛtayatno yathābalam
जो अपनी पूरी शक्ति से, यहाँ तक कि बाल पकड़कर भी, मित्र को अनुचित कर्म से लौटाने का प्रयत्न करता है, उसकी कोई निन्दा नहीं करता।
श्लोक 13 (5.93.13)
तत्समर्थं शुभं वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् । धार्तराष्ट्रः सहामात्यो ग्रहीतुं विदुरार्हति ॥
tatsamarthaṃ śubhaṃ vākyaṃ dharmārthasahitaṃ hitam | dhārtarāṣṭraḥ sahāmātyo grahītuṃ vidurārhati
विदुर, धृतराष्ट्र के पुत्र को अपने मन्त्रियों सहित ऐसे समर्थ, शुभ, हितकर तथा धर्म और अर्थ से युक्त वचन स्वीकार करने चाहिए।
श्लोक 14 (5.93.14)
हितं हि धार्तराष्ट्राणां पाण्डवानां तथैव च । पृथिव्यां क्षत्रियाणां च यतिष्येऽहममायया ॥
hitaṃ hi dhārtarāṣṭrāṇāṃ pāṇḍavānāṃ tathaiva ca | pṛthivyāṃ kṣatriyāṇāṃ ca yatiṣye'hamamāyayā
मैं निष्कपट भाव से धृतराष्ट्र के पुत्रों, पाण्डवों और पृथ्वी के सभी क्षत्रियों के हित के लिए प्रयत्न करूँगा।
श्लोक 15 (5.93.15)
हिते प्रयतमानं मां शङ्केद्दुर्योधनो यदि । हृदयस्य च मे प्रीतिरानृण्यं च भविष्यति ॥
hite prayatamānaṃ māṃ śaṅkedduryodhano yadi | hṛdayasya ca me prītirānṛṇyaṃ ca bhaviṣyati
यदि उसके हित का प्रयत्न करते हुए भी दुर्योधन मुझ पर संदेह करे, तो भी मेरे हृदय को संतोष रहेगा और मैं अपने कर्तव्य के ऋण से मुक्त हो जाऊँगा।
श्लोक 16 (5.93.16)
ज्ञातीनां हि मिथो भेदे यन्मित्रं नाभिपद्यते । सर्वयत्नेन माध्यस्थ्यं न तन्मित्रं विदुर्बुधाः ॥
jñātīnāṃ hi mitho bhede yanmitraṃ nābhipadyate | sarvayatnena mādhyasthyaṃ na tanmitraṃ vidurbudhāḥ
जब बन्धु-बान्धवों में आपस में फूट पड़ जाए, तब जो मित्र पूरे प्रयत्न से बीच-बचाव नहीं करता, उसे बुद्धिमान लोग मित्र नहीं मानते।
श्लोक 17 (5.93.17)
न मां ब्रूयुरधर्मिष्ठा मूढा ह्यसुहृदस्तथा । शक्तो नावारयत्कृष्णः संरब्धान्कुरुपाण्डवान् ॥
na māṃ brūyuradharmiṣṭhā mūḍhā hyasuhṛdastathā | śakto nāvārayatkṛṣṇaḥ saṃrabdhānkurupāṇḍavān
अधर्मी, मूढ़ और अमित्र लोग मेरे विषय में यह न कहें कि "समर्थ होते हुए भी कृष्ण ने क्रोध से भरे कौरवों और पाण्डवों को नहीं रोका।"
श्लोक 18 (5.93.18)
उभयोः साधयन्नर्थमहमागत इत्युत । तत्र यत्नमहं कृत्वा गच्छेयं नृष्ववाच्यताम् ॥
ubhayoḥ sādhayannarthamahamāgata ityuta | tatra yatnamahaṃ kṛtvā gaccheyaṃ nṛṣvavācyatām
मैं दोनों पक्षों का हित साधने आया हूँ; इसके लिए प्रयत्न करके मैं मनुष्यों में निन्दा से बचा रहूँगा।
श्लोक 19 (5.93.19)
मम धर्मार्थयुक्तं हि श्रुत्वा वाक्यमनामयम् । न चेदादास्यते बालो दिष्टस्य वशमेष्यति ॥
mama dharmārthayuktaṃ hi śrutvā vākyamanāmayam | na cedādāsyate bālo diṣṭasya vaśameṣyati
धर्म और अर्थ से युक्त तथा अहितकारी न होने वाले मेरे वचन सुनकर भी यदि वह मूर्ख उन्हें स्वीकार नहीं करेगा, तो वह दैव के वश में चला जाएगा।
श्लोक 20 (5.93.20)
अहापयन्पाण्डवार्थं यथाव- । च्छमं कुरूणां यदि चाचरेयम् । पुण्यं च मे स्याच्चरितं महात्म- । न्मुच्येरंश्च कुरवो मृत्युपाशात् ॥
ahāpayanpāṇḍavārthaṃ yathāva- | cchamaṃ kurūṇāṃ yadi cācareyam | puṇyaṃ ca me syāccaritaṃ mahātma- | nmucyeraṃśca kuravo mṛtyupāśāt
हे महात्मन्, यदि पाण्डवों के हित को छोड़े बिना मैं कुरुओं में यथोचित शान्ति स्थापित कर सकूँ, तो मेरा यह कार्य पुण्यमय होगा और कुरुवंशी मृत्यु के पाश से छूट जाएँगे।
श्लोक 21 (5.93.21)
अपि वाचं भाषमाणस्य काव्यां । धर्मारामामर्थवतीमहिंस्राम् । अवेक्षेरन्धार्तराष्ट्राः शमार्थं । मां च प्राप्तं कुरवः पूजयेयुः ॥
api vācaṃ bhāṣamāṇasya kāvyāṃ | dharmārāmāmarthavatīmahiṃsrām | avekṣerandhārtarāṣṭrāḥ śamārthaṃ | māṃ ca prāptaṃ kuravaḥ pūjayeyuḥ
संभव है, जब मैं विवेकपूर्ण, धर्म में रमी हुई, सार्थक और अहिंसक वाणी बोलूँ, तो धृतराष्ट्र के पुत्र शान्ति के लिए उस पर ध्यान दें, और आए हुए मेरा कुरुवंशी आदर करें।
श्लोक 22 (5.93.22)
न चापि मम पर्याप्ताः सहिताः सर्वपार्थिवाः । क्रुद्धस्य प्रमुखे स्थातुं सिंहस्येवेतरे मृगाः ॥
na cāpi mama paryāptāḥ sahitāḥ sarvapārthivāḥ | kruddhasya pramukhe sthātuṃ siṃhasyevetare mṛgāḥ
पृथ्वी के सब राजा मिलकर भी मेरे क्रोधित होने पर मेरे सामने टिक नहीं सकते, जैसे सिंह के सामने दूसरे पशु नहीं टिकते।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (5.93.23)
इत्येवमुक्त्वा वचनं वृष्णीनामृषभस्तदा । शयने सुखसंस्पर्शे शिश्ये यदुसुखावहः ॥
ityevamuktvā vacanaṃ vṛṣṇīnāmṛṣabhastadā | śayane sukhasaṃsparśe śiśye yadusukhāvahaḥ
ऐसा कहकर वृष्णियों में श्रेष्ठ, यदुवंशियों को सुख देने वाले श्रीकृष्ण कोमल स्पर्श वाली शय्या पर सो गए।