उद्योग पर्व · अध्याय 94
श्रीकृष्ण का कौरव-सभा में प्रवेश
विदुर की बातें सुनते हुए रात बिताने के बाद श्रीकृष्ण प्रातःकालीन कर्म करते हैं, और दुर्योधन तथा शकुनि उन्हें उस सभा में बुलाने आते हैं जहाँ धृतराष्ट्र, भीष्म और राजा उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। गरुड़-ध्वज वाले रथ पर विदुर को साथ लेकर, विशाल परिवार से घिरे वे हस्तिनापुर की भीड़ भरी गलियों से होकर सभा में प्रवेश करते हैं, जहाँ सब उठकर उनका सम्मान करते हैं। आकाश में नारद आदि ऋषियों को देखकर वे भीष्म से पहले उन्हें आसन देकर सत्कार करने को कहते हैं; फिर सब अपने-अपने आसन ग्रहण करते हैं और सारी सभा मौन होकर श्रीकृष्ण को निहारने लगती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.94.1)
तथा कथयतोरेव तयोर्बुद्धिमतोस्तदा । शिवा नक्षत्रसंपन्ना सा व्यतीयाय शर्वरी ॥
tathā kathayatoreva tayorbuddhimatostadā | śivā nakṣatrasaṃpannā sā vyatīyāya śarvarī
इस प्रकार उन दोनों बुद्धिमानों के बातचीत करते-करते ही नक्षत्रों से जगमगाती वह मंगलमयी रात बीत गई।
श्लोक 2 (5.94.2)
धर्मार्थकामयुक्ताश्च विचित्रार्थपदाक्षराः । शृण्वतो विविधा वाचो विदुरस्य महात्मनः ॥
dharmārthakāmayuktāśca vicitrārthapadākṣarāḥ | śṛṇvato vividhā vāco vidurasya mahātmanaḥ
श्रीकृष्ण महात्मा विदुर की धर्म, अर्थ और काम से युक्त, विचित्र अर्थ, पद और अक्षरों से भरी अनेक प्रकार की बातें सुनते रहे;
श्लोक 3 (5.94.3)
कथाभिरनुरूपाभी रक्तस्यामिततेजसः । अकामस्यैव कृष्णस्य सा व्यतीयाय शर्वरी ॥
kathābhiranurūpābhī raktasyāmitatejasaḥ | akāmasyaiva kṛṣṇasya sā vyatīyāya śarvarī
और इस प्रकार उपयुक्त कथाओं में रमे हुए अमित तेजस्वी श्रीकृष्ण की वह रात, मानो उनकी इच्छा के विरुद्ध ही, बीत गई।
श्लोक 4 (5.94.4)
ततस्तु स्वरसंपन्ना बहवः सूतमागधाः । शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैः केशवं प्रत्यबोधयन् ॥
tatastu svarasaṃpannā bahavaḥ sūtamāgadhāḥ | śaṅkhadundubhinirghoṣaiḥ keśavaṃ pratyabodhayan
तब सुरीले स्वर वाले बहुत-से सूत और मागधों ने शंख और दुन्दुभियों की ध्वनि से केशव को जगाया।
श्लोक 5 (5.94.5)
तत उत्थाय दाशार्ह ऋषभः सर्वसात्वताम् । सर्वमावश्यकं चक्रे प्रातः कार्यं जनार्दनः ॥
tata utthāya dāśārha ṛṣabhaḥ sarvasātvatām | sarvamāvaśyakaṃ cakre prātaḥ kāryaṃ janārdanaḥ
तब उठकर समस्त सात्वतों में श्रेष्ठ दाशार्हवंशी जनार्दन ने प्रातःकाल के सभी आवश्यक कर्म किए।
श्लोक 6 (5.94.6)
कृतोदकानुजप्यः स हुताग्निः समलङ्कृतः । ततश्चादित्यमुद्यन्तमुपातिष्ठत माधवः ॥
kṛtodakānujapyaḥ sa hutāgniḥ samalaṅkṛtaḥ | tataścādityamudyantamupātiṣṭhata mādhavaḥ
स्नान और उसके बाद का जप करके, अग्निहोत्र करके और अलंकार धारण करके माधव ने उगते हुए सूर्य का उपस्थान किया।
श्लोक 7 (5.94.7)
अथ दुर्योधनः कृष्णं शकुनिश्चापि सौबलः । सन्ध्यां तिष्ठन्तमभ्येत्य दाशार्हमपराजितम् ॥
atha duryodhanaḥ kṛṣṇaṃ śakuniścāpi saubalaḥ | sandhyāṃ tiṣṭhantamabhyetya dāśārhamaparājitam
तब दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि सन्ध्या-वन्दन करते हुए अपराजित दाशार्ह के पास आए
श्लोक 8 (5.94.8)
आचक्षेतां तु कृष्णस्य धृतराष्ट्रं सभागतम् । कुरूश्च भीष्मप्रमुखान्राज्ञः सर्वांश्च पार्थिवान् ॥
ācakṣetāṃ tu kṛṣṇasya dhṛtarāṣṭraṃ sabhāgatam | kurūśca bhīṣmapramukhānrājñaḥ sarvāṃśca pārthivān
और श्रीकृष्ण से बोले कि धृतराष्ट्र सभा में आ गए हैं, और उनके साथ भीष्म आदि कौरव तथा पृथ्वी के सभी राजा भी हैं।
श्लोक 9 (5.94.9)
त्वामर्थयन्ते गोविन्द दिवि शक्रमिवामराः । तावभ्यनन्दद्गोविन्दः साम्ना परमवल्गुना ॥
tvāmarthayante govinda divi śakramivāmarāḥ | tāvabhyanandadgovindaḥ sāmnā paramavalgunā
"हे गोविन्द, जैसे स्वर्ग में देवता इन्द्र की प्रतीक्षा करते हैं, वैसे ही वे सब आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।" गोविन्द ने अत्यन्त मधुर और कोमल वचनों से उन दोनों का अभिनन्दन किया।
श्लोक 10 (5.94.10)
ततो विमल आदित्ये ब्राह्मणेभ्यो जनार्दनः । ददौ हिरण्यं वासांसि गाश्चाश्वांश्च परन्तपः ॥
tato vimala āditye brāhmaṇebhyo janārdanaḥ | dadau hiraṇyaṃ vāsāṃsi gāścāśvāṃśca parantapaḥ
फिर सूर्य के निर्मल होने पर शत्रुओं को तपाने वाले जनार्दन ने ब्राह्मणों को सोना, वस्त्र, गौएँ और घोड़े दान किए।
श्लोक 11 (5.94.11)
विसृष्टवन्तं रत्नानि दाशार्हमपराजितम् । तिष्ठन्तमुपसङ्गम्य ववन्दे सारथिस्तदा ॥
visṛṣṭavantaṃ ratnāni dāśārhamaparājitam | tiṣṭhantamupasaṅgamya vavande sārathistadā
रत्नों का दान कर चुकने के बाद जब अपराजित दाशार्ह खड़े थे, तब उनके सारथि ने पास आकर उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 12 (5.94.12)
तस्मै रथवरो युक्तः शुशुभे लोकविश्रुतः । वाजिभिः शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकैः ॥
tasmai rathavaro yuktaḥ śuśubhe lokaviśrutaḥ | vājibhiḥ śaibyasugrīvameghapuṣpabalāhakaiḥ
उनके लिए जोता गया लोकविख्यात श्रेष्ठ रथ शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामक घोड़ों से सुशोभित हो रहा था।
श्लोक 13 (5.94.13)
शैब्यस्तु शुकपत्राभः सुग्रीवः किंशुकप्रभः । मेघपुष्पो मेघवर्णः पाण्डरस्तु बलाहकः ॥
śaibyastu śukapatrābhaḥ sugrīvaḥ kiṃśukaprabhaḥ | meghapuṣpo meghavarṇaḥ pāṇḍarastu balāhakaḥ
शैब्य तोते के पंख के रंग का था, सुग्रीव किंशुक के फूल-सा चमकीला, मेघपुष्प बादल के रंग का और बलाहक श्वेत।
श्लोक 14 (5.94.14)
दक्षिणं चावहच्छैब्यः सुग्रीवः सव्यतोऽवहत् । पृष्ठवाहौ रथस्यास्तां मेघपुष्पबलाहकौ ॥
dakṣiṇaṃ cāvahacchaibyaḥ sugrīvaḥ savyato'vahat | pṛṣṭhavāhau rathasyāstāṃ meghapuṣpabalāhakau
दाहिनी ओर शैब्य जुता था और बाईं ओर सुग्रीव; मेघपुष्प और बलाहक रथ के पीछे वाले घोड़े थे।
श्लोक 15 (5.94.15)
विश्वकर्मकृताऽऽपीडा रत्नजालविभूषिता । आश्रिता वै रथे तस्मिन्ध्वजयष्टिरशोभत ॥
viśvakarmakṛtā''pīḍā ratnajālavibhūṣitā | āśritā vai rathe tasmindhvajayaṣṭiraśobhata
उस रथ पर लगा ध्वज-दण्ड, जिस पर विश्वकर्मा का बनाया हुआ मुकुट-सा अलंकार था और जो रत्नों की जाली से सजा था, अत्यन्त शोभा पा रहा था।
श्लोक 16 (5.94.16)
वैनतेयः स्थितस्तस्यां प्रभाकरमिव स्पृशन् । तस्य सत्त्ववतः केतौ भुजगारिरशोभत ॥
vainateyaḥ sthitastasyāṃ prabhākaramiva spṛśan | tasya sattvavataḥ ketau bhujagāriraśobhata
उस पर विनतापुत्र गरुड़ विराजमान थे, मानो सूर्य को छू रहे हों; उस पराक्रमी वीर की ध्वजा पर सर्पों के शत्रु गरुड़ शोभा पा रहे थे।
श्लोक 17 (5.94.17)
तस्य कीर्तिमतस्तेन भास्वरेण विराजता । शुशुभे स्यन्दनश्रेष्ठः पतगेन्द्रेण केतुना ॥
tasya kīrtimatastena bhāsvareṇa virājatā | śuśubhe syandanaśreṣṭhaḥ patagendreṇa ketunā
उस तेजस्वी, दमकते हुए पक्षिराज की ध्वजा से उस यशस्वी वीर का श्रेष्ठ रथ सुशोभित हो रहा था।
श्लोक 18 (5.94.18)
रश्मिजालैः पताकाभिः सौवर्णेन च केतुना । बभूव स रथश्रेष्ठः कालसूर्य इवोदितः ॥
raśmijālaiḥ patākābhiḥ sauvarṇena ca ketunā | babhūva sa rathaśreṣṭhaḥ kālasūrya ivoditaḥ
किरणों के जाल, पताकाओं और सुनहरी ध्वजा से वह श्रेष्ठ रथ प्रलयकाल में उदित हुए सूर्य के समान दिखाई देता था।
श्लोक 19 (5.94.19)
पक्षिध्वजवितानैश्च रुक्मजालकृताङ्गणैः । दण्डमार्गविभागैश्च सुकृतैर्विश्वकर्मणा ॥
pakṣidhvajavitānaiśca rukmajālakṛtāṅgaṇaiḥ | daṇḍamārgavibhāgaiśca sukṛtairviśvakarmaṇā
पक्षियों की ध्वजाओं और चँदोवों से, सोने की जाली से बने चबूतरों से, और विश्वकर्मा द्वारा भली-भाँति गढ़े गए दण्डों और मार्गों के विभागों से;
श्लोक 20 (5.94.20)
प्रवालमणिशोभैश्च मुक्तावैडूर्यशोभनैः । किङ्किणीशतसङ्घैश्च वालजालकृतान्तरैः ॥
pravālamaṇiśobhaiśca muktāvaiḍūryaśobhanaiḥ | kiṅkiṇīśatasaṅghaiśca vālajālakṛtāntaraiḥ
मूँगे और मणियों की शोभा से, सुन्दर मोतियों और वैदूर्य से, सैकड़ों घुँघरुओं के गुच्छों से, और बीच-बीच में चँवर के बालों की जालियों से;
श्लोक 21 (5.94.21)
कार्तस्वरमयीभिश्च पद्मिनीभिरलङ्कृतः । शुशुभे स्यन्दनश्रेष्ठस्तापनीयैश्च पादपैः ॥
kārtasvaramayībhiśca padminībhiralaṅkṛtaḥ | śuśubhe syandanaśreṣṭhastāpanīyaiśca pādapaiḥ
शुद्ध सोने की कमलिनियों और तपाए हुए सोने के वृक्षों से अलंकृत वह श्रेष्ठ रथ शोभा पा रहा था,
श्लोक 22 (5.94.22)
व्याघ्रसिंहवराहैश्च गोभिश्च मृगपक्षिभिः । ताराभिर्भास्करैश्चापि वारणैश्च हिरण्मयैः ॥
vyāghrasiṃhavarāhaiśca gobhiśca mṛgapakṣibhiḥ | tārābhirbhāskaraiścāpi vāraṇaiśca hiraṇmayaiḥ
सोने के बने बाघों, सिंहों, सूअरों, गौओं, मृगों और पक्षियों से, तारों और सूर्यों से, और हाथियों से;
श्लोक 23 (5.94.23)
वज्राङ्कुशविमानैश्च कूबरावृत्तसन्धिषु । समुच्छ्रितमहानाभिः स्तनयित्नुमहास्वनः ॥
vajrāṅkuśavimānaiśca kūbarāvṛttasandhiṣu | samucchritamahānābhiḥ stanayitnumahāsvanaḥ
और जुए के घूमने वाले जोड़ों पर बने वज्रों, अंकुशों और विमानों से; उसकी विशाल नाभि ऊँची उठी हुई थी और वह मेघ की गर्जना के समान गम्भीर नाद करता था।
श्लोक 24 (5.94.24)
ततो रथेन शुभ्रेण महता किङ्किणीकिना । हयोत्तमयुजा शीघ्रमुपातिष्ठत दारुकः ॥
tato rathena śubhreṇa mahatā kiṅkiṇīkinā | hayottamayujā śīghramupātiṣṭhata dārukaḥ
तब दारुक घुँघरुओं से झनझनाते, उत्तम घोड़ों से जुते उस विशाल और उज्ज्वल रथ को लेकर शीघ्र उपस्थित हुआ।
श्लोक 25 (5.94.25)
तमुपस्थितमाज्ञाय रथं दिव्यं महामनाः । महाभ्रघननिर्घोषं सर्वरत्नविभूषितम् ॥
tamupasthitamājñāya rathaṃ divyaṃ mahāmanāḥ | mahābhraghananirghoṣaṃ sarvaratnavibhūṣitam
उस दिव्य रथ को उपस्थित जानकर, जो महामेघों के समूह की तरह गरजता था और सब प्रकार के रत्नों से विभूषित था, महामना जनार्दन ने
श्लोक 26 (5.94.26)
अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा ब्राह्मणांश्च जनार्दनः । कौस्तुभं मणिमाबध्य श्रिया परमया ज्वलन् ॥
agniṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā brāhmaṇāṃśca janārdanaḥ | kaustubhaṃ maṇimābadhya śriyā paramayā jvalan
अग्नि और ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा की, और कौस्तुभ मणि धारण करके वे परम शोभा से दमक उठे।
श्लोक 27 (5.94.27)
कुरुभिः संवृतः कृष्णो वृष्णिभिश्चाभिरक्षितः । आतिष्ठत रथं शौरिः सर्वयादवनन्दनः ॥
kurubhiḥ saṃvṛtaḥ kṛṣṇo vṛṣṇibhiścābhirakṣitaḥ | ātiṣṭhata rathaṃ śauriḥ sarvayādavanandanaḥ
कौरवों से घिरे और वृष्णियों द्वारा रक्षित, समस्त यादवों को आनन्द देने वाले शौरि श्रीकृष्ण रथ पर सवार हुए।
श्लोक 28 (5.94.28)
अन्वारुरोह दाशार्हं विदुरः सर्वधर्मवित् । सर्वप्राणभृतां श्रेष्ठं सर्वबुद्धिमतां वरम् ॥
anvāruroha dāśārhaṃ viduraḥ sarvadharmavit | sarvaprāṇabhṛtāṃ śreṣṭhaṃ sarvabuddhimatāṃ varam
सब धर्मों के ज्ञाता विदुर भी समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ और सब बुद्धिमानों में अग्रणी उन दाशार्ह के पीछे रथ पर चढ़े।
श्लोक 29 (5.94.29)
ततो दुर्योधनः कृष्णं शकुनिश्चापि सौबलः । द्वितीयेन रथेनैनमन्वयातां परन्तपम् ॥
tato duryodhanaḥ kṛṣṇaṃ śakuniścāpi saubalaḥ | dvitīyena rathenainamanvayātāṃ parantapam
फिर दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि एक दूसरे रथ पर शत्रुतापन श्रीकृष्ण के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 30 (5.94.30)
सात्यकिः कृतवर्मा च वृष्णीनां चापरे रथाः । पृष्ठतोऽनुययुः कृष्णं गजैरश्वै रथैरपि ॥
sātyakiḥ kṛtavarmā ca vṛṣṇīnāṃ cāpare rathāḥ | pṛṣṭhato'nuyayuḥ kṛṣṇaṃ gajairaśvai rathairapi
सात्यकि, कृतवर्मा और वृष्णियों के अन्य रथी हाथियों, घोड़ों और रथों के साथ श्रीकृष्ण के पीछे चले।
श्लोक 31 (5.94.31)
तेषां हेमपरिष्कारैर्युक्ताः परमवाजिभिः । गच्छतां घोषिणश्चित्ररथा राजन्विरेजिरे ॥
teṣāṃ hemapariṣkārairyuktāḥ paramavājibhiḥ | gacchatāṃ ghoṣiṇaścitrarathā rājanvirejire
हे राजन्, सोने से सजे और उत्तम घोड़ों से जुते उनके रंग-बिरंगे रथ चलते समय घरघराते हुए बड़े सुन्दर लग रहे थे।
श्लोक 32 (5.94.32)
संमृष्टसंसिक्तरजः प्रतिपेदे महापथम् । राजर्षिचरितं काले कृष्णो धीमाञ्श्रिया ज्वलन् ॥
saṃmṛṣṭasaṃsiktarajaḥ pratipede mahāpatham | rājarṣicaritaṃ kāle kṛṣṇo dhīmāñśriyā jvalan
तेज से दमकते बुद्धिमान श्रीकृष्ण यथासमय उस राजमार्ग पर पहुँचे, जिस पर राजर्षि चलते आए थे और जिसे बुहारकर उसकी धूल पानी छिड़ककर बिठा दी गई थी।
श्लोक 33 (5.94.33)
ततः प्रयाते दाशार्हे प्रावाद्यन्तैकपुष्कराः । शङ्खाश्च दध्मिरे तत्र वाद्यान्यन्यानि यानि च ॥
tataḥ prayāte dāśārhe prāvādyantaikapuṣkarāḥ | śaṅkhāśca dadhmire tatra vādyānyanyāni yāni ca
दाशार्ह के प्रस्थान करते ही एकमुखी नगाड़े बज उठे, शंख फूँके गए और अन्य सब प्रकार के बाजे भी बजने लगे।
श्लोक 34 (5.94.34)
प्रवीराः सर्वलोकस्य युवानः सिंहविक्रमाः । परिवार्य रथं शौरेरगच्छन्त परन्तपाः ॥
pravīrāḥ sarvalokasya yuvānaḥ siṃhavikramāḥ | parivārya rathaṃ śaureragacchanta parantapāḥ
सारे संसार के चुने हुए वीर, सिंह के समान पराक्रमी, शत्रुओं को तपाने वाले युवक शौरि के रथ को घेरकर साथ चल रहे थे।
श्लोक 35 (5.94.35)
ततोऽन्ये बहुसाहस्रा विचित्राद्भुतवाससः । असिप्रासायुधधराः कृष्णस्यासन्पुरःसराः ॥
tato'nye bahusāhasrā vicitrādbhutavāsasaḥ | asiprāsāyudhadharāḥ kṛṣṇasyāsanpuraḥsarāḥ
फिर रंग-बिरंगे और अद्भुत वस्त्र पहने, तलवार, भाले और अन्य आयुध धारण किए हुए कई हज़ार दूसरे लोग श्रीकृष्ण के आगे-आगे चल रहे थे।
श्लोक 36 (5.94.36)
गजाः पञ्चशतास्तत्र रथाश्चासन्सहस्रशः । प्रयान्तमन्वयुर्वीरं दाशार्हमपराजितम् ॥
gajāḥ pañcaśatāstatra rathāścāsansahasraśaḥ | prayāntamanvayurvīraṃ dāśārhamaparājitam
वहाँ पाँच सौ हाथी और हज़ारों रथ थे, जो जाते हुए उस वीर, अपराजित दाशार्ह के पीछे चल रहे थे।
श्लोक 37 (5.94.37)
पुरं कुरूणां संवृत्तं द्रष्टुकामं जनार्दनम् । सबालवृद्धं सस्त्रीकं रथ्यागतमरिन्दम ॥
puraṃ kurūṇāṃ saṃvṛttaṃ draṣṭukāmaṃ janārdanam | sabālavṛddhaṃ sastrīkaṃ rathyāgatamarindama
हे शत्रुदमन, कौरवों का सारा नगर — बालक, वृद्ध और स्त्रियाँ भी — जनार्दन को देखने की इच्छा से गलियों में उमड़ आया था।
श्लोक 38 (5.94.38)
वेदिकामाश्रिताभिश्च समाक्रान्तान्यनेकशः । प्रचलन्तीव भारेण योषिद्भिर्भवनान्युत ॥
vedikāmāśritābhiśca samākrāntānyanekaśaḥ | pracalantīva bhāreṇa yoṣidbhirbhavanānyuta
जगह-जगह छज्जों पर खड़ी स्त्रियों से भवन इतने भर गए थे कि वे मानो उनके भार से डोलते-से प्रतीत होते थे।
श्लोक 39 (5.94.39)
स पूज्यमानः कुरुभिः संशृण्वन्मधुराः कथाः । यथार्हं प्रतिसत्कुर्वन्प्रेक्षमाणः शनैर्ययौ ॥
sa pūjyamānaḥ kurubhiḥ saṃśṛṇvanmadhurāḥ kathāḥ | yathārhaṃ pratisatkurvanprekṣamāṇaḥ śanairyayau
कौरवों से सम्मानित होते, उनकी मधुर बातें सुनते, सबका यथायोग्य सत्कार लौटाते और चारों ओर देखते हुए वे धीरे-धीरे आगे बढ़े।
श्लोक 40 (5.94.40)
ततः सभां समासाद्य केशवस्यानुयायिनः । सशङ्खैर्वेणुनिर्घोषैर्दिशः सर्वा व्यनादयन् ॥
tataḥ sabhāṃ samāsādya keśavasyānuyāyinaḥ | saśaṅkhairveṇunirghoṣairdiśaḥ sarvā vyanādayan
सभा में पहुँचकर केशव के अनुयायियों ने शंखों और बाँसुरियों की ध्वनि से सब दिशाओं को गुँजा दिया।
श्लोक 41 (5.94.41)
ततः सा समितिः सर्वा राज्ञाममिततेजसाम् । संप्राकम्पत हर्षेण कृष्णागमनकाङ्क्षया ॥
tataḥ sā samitiḥ sarvā rājñāmamitatejasām | saṃprākampata harṣeṇa kṛṣṇāgamanakāṅkṣayā
तब अमित तेजस्वी राजाओं की वह सारी सभा श्रीकृष्ण के आगमन की उत्कण्ठा से हर्ष के मारे काँप उठी।
श्लोक 42 (5.94.42)
ततोऽभ्याशंगते कृष्णे समहृष्यन्नराधिपाः । श्रुत्वा तं रथनिर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम् ॥
tato'bhyāśaṃgate kṛṣṇe samahṛṣyannarādhipāḥ | śrutvā taṃ rathanirghoṣaṃ parjanyaninadopamam
श्रीकृष्ण के निकट आने पर, वर्षा के मेघ की गर्जना-जैसी उनके रथ की घरघराहट सुनकर राजा लोग अत्यन्त प्रसन्न हुए।
श्लोक 43 (5.94.43)
आसाद्य तु सभाद्वारमृषभः सर्वसात्वताम् । अवतीर्य रथाच्छौरिः कैलासशिखरोपमात् ॥
āsādya tu sabhādvāramṛṣabhaḥ sarvasātvatām | avatīrya rathācchauriḥ kailāsaśikharopamāt
सभा के द्वार पर पहुँचकर समस्त सात्वतों में श्रेष्ठ शौरि कैलास-शिखर-जैसे अपने रथ से उतरे
श्लोक 44 (5.94.44)
नवमेघप्रतीकाशां ज्वलन्तीमिव तेजसा । महेन्द्रसदनप्रख्यां प्रविवेश सभां ततः ॥
navameghapratīkāśāṃ jvalantīmiva tejasā | mahendrasadanaprakhyāṃ praviveśa sabhāṃ tataḥ
और उस सभा में प्रवेश किया, जो नए मेघ के समान थी, मानो तेज से प्रज्वलित हो रही थी और महेन्द्र के भवन-जैसी जान पड़ती थी।
श्लोक 45 (5.94.45)
पाणौ गृहीत्वा विदुरं सात्यकिं च महायशाः । ज्योतींष्यादित्यवद्राजन्कुरून्प्राच्छादयच्छ्रिया ॥
pāṇau gṛhītvā viduraṃ sātyakiṃ ca mahāyaśāḥ | jyotīṃṣyādityavadrājankurūnprācchādayacchriyā
हे राजन्, विदुर और सात्यकि का हाथ थामे उस महायशस्वी ने अपनी शोभा से कौरवों को वैसे ही ढक दिया जैसे सूर्य तारों को ढक लेता है।
श्लोक 46 (5.94.46)
अग्रतो वासुदेवस्य कर्णदुर्योधनावुभौ । वृष्णयः कृतवर्मा चाप्यासन्कृष्णस्य पृष्ठतः ॥
agrato vāsudevasya karṇaduryodhanāvubhau | vṛṣṇayaḥ kṛtavarmā cāpyāsankṛṣṇasya pṛṣṭhataḥ
वासुदेव के आगे कर्ण और दुर्योधन दोनों थे, और श्रीकृष्ण के पीछे वृष्णिवंशी तथा कृतवर्मा थे।
श्लोक 47 (5.94.47)
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य भीष्मद्रोणादयस्ततः । आसनेभ्योऽचलन्सर्वे पूजयन्तो जनार्दनम् ॥
dhṛtarāṣṭraṃ puraskṛtya bhīṣmadroṇādayastataḥ | āsanebhyo'calansarve pūjayanto janārdanam
तब धृतराष्ट्र को आगे करके भीष्म, द्रोण आदि सब लोग जनार्दन का सम्मान करते हुए अपने आसनों से उठ खड़े हुए।
श्लोक 48 (5.94.48)
अभ्यागच्छति दाशार्हे प्रज्ञाचक्षुर्नरेश्वर । सहैव द्रोणभीष्माभ्यामुदतिष्ठन्महायशाः ॥
abhyāgacchati dāśārhe prajñācakṣurnareśvara | sahaiva droṇabhīṣmābhyāmudatiṣṭhanmahāyaśāḥ
हे नरेश्वर, दाशार्ह के आते ही प्रज्ञाचक्षु महायशस्वी राजा द्रोण और भीष्म के साथ ही उठ खड़े हुए।
श्लोक 49 (5.94.49)
उत्तिष्ठति महाराजे धृतराष्ट्रे जनेश्वरे । तानि राजसहस्राणि समुत्तस्थुः समन्ततः ॥
uttiṣṭhati mahārāje dhṛtarāṣṭre janeśvare | tāni rājasahasrāṇi samuttasthuḥ samantataḥ
जब जनेश्वर महाराज धृतराष्ट्र उठे, तो चारों ओर बैठे वे हज़ारों राजा भी उठ खड़े हुए।
श्लोक 50 (5.94.50)
आसनं सर्वतोभद्रं जाम्बूनदपरिष्कृतम् । कृष्णार्थे कल्पितं तत्र धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥
āsanaṃ sarvatobhadraṃ jāmbūnadapariṣkṛtam | kṛṣṇārthe kalpitaṃ tatra dhṛtarāṣṭrasya śāsanāt
धृतराष्ट्र की आज्ञा से वहाँ श्रीकृष्ण के लिए जाम्बूनद सोने से मढ़ा हुआ सर्वतोभद्र नामक आसन रखा गया था।
श्लोक 51 (5.94.51)
स्मयमानस्तु राजानं भीष्मद्रोणौ च माधवः । अभ्यभाषत धर्मात्मा राज्ञश्चान्यान्यथावयः ॥
smayamānastu rājānaṃ bhīṣmadroṇau ca mādhavaḥ | abhyabhāṣata dharmātmā rājñaścānyānyathāvayaḥ
धर्मात्मा माधव ने मुस्कराते हुए राजा से, भीष्म और द्रोण से तथा अन्य राजाओं से उनकी अवस्था के अनुसार बातचीत की।
श्लोक 52 (5.94.52)
तत्र केशवमानर्चुः सम्यगभ्यागतं सभाम् । राजानः पार्थिवाः सर्वे कुरवश्च जनार्दनम् ॥
tatra keśavamānarcuḥ samyagabhyāgataṃ sabhām | rājānaḥ pārthivāḥ sarve kuravaśca janārdanam
वहाँ सभा में पधारे केशव जनार्दन की सभी राजाओं, भूपतियों और कौरवों ने विधिवत् पूजा की।
श्लोक 53 (5.94.53)
तत्र तिष्ठन्स दाशार्हो राजमध्ये परन्तपः । अपश्यदन्तरिक्षस्थानृषीन्परपुरञ्जयः ॥
tatra tiṣṭhansa dāśārho rājamadhye parantapaḥ | apaśyadantarikṣasthānṛṣīnparapurañjayaḥ
राजाओं के बीच खड़े शत्रुतापन, शत्रु-नगरों को जीतने वाले दाशार्ह ने आकाश में स्थित ऋषियों को देखा।
श्लोक 54 (5.94.54)
ततस्तानभिसंप्रेक्ष्य नारदप्रमुखानृषीन् । अभ्यभाषत दाशार्हो भीष्मं शान्तनवं शनैः ॥
tatastānabhisaṃprekṣya nāradapramukhānṛṣīn | abhyabhāṣata dāśārho bhīṣmaṃ śāntanavaṃ śanaiḥ
नारद आदि उन ऋषियों को देखकर दाशार्ह ने शान्तनुपुत्र भीष्म से धीरे से कहा —
कृष्ण उवाच
श्लोक 55 (5.94.55)
पार्थिवीं समितिं द्रष्टुमृषयोऽभ्यागता नृप । निमन्त्र्यन्तामासनैश्च सत्कारेण च भूयसा ॥
pārthivīṃ samitiṃ draṣṭumṛṣayo'bhyāgatā nṛpa | nimantryantāmāsanaiśca satkāreṇa ca bhūyasā
"हे राजन्, ऋषिगण राजाओं की इस सभा को देखने आए हैं। उन्हें आसन देकर और भरपूर सत्कार के साथ आमन्त्रित किया जाए।
श्लोक 56 (5.94.56)
नैतेष्वनुपविष्टेषु शक्यं केनचिदासितुम् । पूजा प्रयुज्यतामाशु मुनीनां भावितात्मनाम् ॥
naiteṣvanupaviṣṭeṣu śakyaṃ kenacidāsitum | pūjā prayujyatāmāśu munīnāṃ bhāvitātmanām
"जब तक वे न बैठें, तब तक कोई नहीं बैठ सकता। इन शुद्धात्मा मुनियों की पूजा तुरन्त की जाए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 57 (5.94.57)
ऋषीञ्शान्तनवो दृष्ट्वा सभाद्वारमुपस्थितान् । त्वरमाणस्ततो भृत्यानासनानीत्यचोदयत् ॥
ṛṣīñśāntanavo dṛṣṭvā sabhādvāramupasthitān | tvaramāṇastato bhṛtyānāsanānītyacodayat
ऋषियों को सभा के द्वार पर उपस्थित देखकर शान्तनुनन्दन ने उतावली में सेवकों को आदेश दिया — "आसन लाओ!"
श्लोक 58 (5.94.58)
आसनान्यथ मृष्टानि महान्ति विपुलानि च । मणिकाञ्चनचित्राणि समाजह्रुस्ततस्ततः ॥
āsanānyatha mṛṣṭāni mahānti vipulāni ca | maṇikāñcanacitrāṇi samājahrustatastataḥ
तब सेवक इधर-उधर से मणियों और सोने से जड़े, चमचमाते, बड़े और चौड़े आसन ले आए।
श्लोक 59 (5.94.59)
तेषु तत्रोपविष्टेषु गृहीतार्घ्येषु भारत । निषसादासने कृष्णो राजानश्च यथासनम् ॥
teṣu tatropaviṣṭeṣu gṛhītārghyeṣu bhārata | niṣasādāsane kṛṣṇo rājānaśca yathāsanam
हे भारत, जब मुनि वहाँ बैठ गए और उन्होंने अर्घ्य ग्रहण कर लिया, तब श्रीकृष्ण अपने आसन पर बैठे और राजा भी अपने-अपने आसनों पर बैठ गए।
श्लोक 60 (5.94.60)
दुःशासनः सात्यकये ददावासनमुत्तमम् । विविंशतिर्ददौ पीठं काञ्चनं कृतवर्मणे ॥
duḥśāsanaḥ sātyakaye dadāvāsanamuttamam | viviṃśatirdadau pīṭhaṃ kāñcanaṃ kṛtavarmaṇe
दुःशासन ने सात्यकि को उत्तम आसन दिया और विविंशति ने कृतवर्मा को सोने की चौकी दी।
श्लोक 61 (5.94.61)
अविदूरे तु कृष्णस्य कर्णदुर्योधनावुभौ । एकासने महात्मानौ निषीदतुरमर्षणौ ॥
avidūre tu kṛṣṇasya karṇaduryodhanāvubhau | ekāsane mahātmānau niṣīdaturamarṣaṇau
श्रीकृष्ण से थोड़ी ही दूर महामना और असहिष्णु कर्ण तथा दुर्योधन दोनों एक ही आसन पर बैठे।
श्लोक 62 (5.94.62)
गान्धारराजः शकुनिर्गान्धारैरभिरक्षितः । निषसादासने राजा सहपुत्रो विशांपते ॥
gāndhārarājaḥ śakunirgāndhārairabhirakṣitaḥ | niṣasādāsane rājā sahaputro viśāṃpate
हे प्रजानाथ, गान्धारों से रक्षित गान्धारराज शकुनि अपने पुत्र के साथ आसन पर बैठे।
श्लोक 63 (5.94.63)
विदुरो मणिपीठे तु शुक्लस्पर्ध्याजिनोत्तरे । संस्पृशन्नासनं शौरेर्महामतिरुपाविशत् ॥
viduro maṇipīṭhe tu śuklaspardhyājinottare | saṃspṛśannāsanaṃ śaurermahāmatirupāviśat
परम बुद्धिमान विदुर श्वेतता से होड़ लेते मृगचर्म से ढकी मणिजटित चौकी पर शौरि के आसन से सटकर बैठे।
श्लोक 64 (5.94.64)
चिरस्य दृष्ट्वा दाशार्हं राजानः सर्व एव ते । अमृतस्येव नातृप्यन्प्रेक्षमाणा जनार्दनम् ॥
cirasya dṛṣṭvā dāśārhaṃ rājānaḥ sarva eva te | amṛtasyeva nātṛpyanprekṣamāṇā janārdanam
बहुत समय बाद दाशार्ह को देखकर वे सभी राजा जनार्दन को निहारते हुए वैसे ही तृप्त नहीं होते थे, जैसे कोई अमृत से तृप्त नहीं होता।
श्लोक 65 (5.94.65)
अतसीपुष्पसङ्काशः पीतवासा जनार्दनः । व्यभ्राजत सभामध्ये हेम्नीवोपहितो मणिः ॥
atasīpuṣpasaṅkāśaḥ pītavāsā janārdanaḥ | vyabhrājata sabhāmadhye hemnīvopahito maṇiḥ
अलसी के फूल-से वर्ण वाले, पीताम्बरधारी जनार्दन सभा के बीच सोने में जड़ी मणि के समान दमक रहे थे।
श्लोक 66 (5.94.66)
ततस्तूष्णीं सर्वमासीद्गोविन्दगतमानसम् । न तत्र कश्चित्किंचिद्वा व्याजहार पुमान्क्वचित् ॥
tatastūṣṇīṃ sarvamāsīdgovindagatamānasam | na tatra kaścitkiṃcidvā vyājahāra pumānkvacit
तब सब लोग मौन हो गए, सबका मन गोविन्द में लगा था; वहाँ किसी भी पुरुष ने कहीं कुछ भी नहीं कहा।