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उद्योग पर्व · अध्याय 95

धृतराष्ट्र से श्रीकृष्ण की शान्ति-याचना

मौन सभा के सामने श्रीकृष्ण धृतराष्ट्र से कहते हैं कि वे वीरों का विनाश हुए बिना कौरवों और पाण्डवों में शान्ति की याचना करने आए हैं। वे राजा को उनके कुल के गुणों और लोभी पुत्रों को रोकने के उनके कर्तव्य का स्मरण कराते हैं, दोनों पक्षों के मेल में उनका लाभ और परस्पर विनाश वाले युद्ध की निरर्थकता दिखाते हैं, और पाण्डवों का सन्देश सुनाते हैं कि उन्होंने वनवास की शर्तें पूरी की हैं और पुत्र के नाते राज्य का अपना भाग माँगते हैं। वे सभा को चेताते हैं कि जो सभासद धर्म का हनन होते देखते रहते हैं, वे स्वयं नष्ट होते हैं; फिर युधिष्ठिर की निष्ठा और द्यूत के छल का स्मरण कराकर राजा से हितकर मार्ग चुनने का आग्रह करते हैं। राजा मन ही मन उनकी सराहना करते हैं, पर कोई बोलने का साहस नहीं करता।

अध्याय 94अध्याय-सूचीअध्याय 96

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.95.1)

तेष्वासीनेषु सर्वेषु तूष्णींभूतेषु राजसु । वाक्यमभ्याददे कृष्णः सुदंष्ट्रो दुन्दुभिस्वनः ॥

teṣvāsīneṣu sarveṣu tūṣṇīṃbhūteṣu rājasu | vākyamabhyādade kṛṣṇaḥ sudaṃṣṭro dundubhisvanaḥ

जब सब लोग बैठ गए और राजा मौन हो गए, तब सुन्दर दाँतों वाले और दुन्दुभि के समान स्वर वाले श्रीकृष्ण ने बोलना आरम्भ किया।

श्लोक 2 (5.95.2)

जीमूत इव घर्मान्ते सर्वां संश्रावयन्सभाम् । धृतराष्ट्रमभिप्रेक्ष्य समभाषत माधवः ॥

jīmūta iva gharmānte sarvāṃ saṃśrāvayansabhām | dhṛtarāṣṭramabhiprekṣya samabhāṣata mādhavaḥ

ग्रीष्म ऋतु के अन्त में गरजते मेघ के समान सारी सभा को सुनाते हुए माधव ने धृतराष्ट्र की ओर देखकर कहा —

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 3 (5.95.3)

कुरूणां पाण्डवानां च शमः स्यादिति भारत । अप्रणाशेन वीराणामेतद्याचितुमागतः ॥

kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca śamaḥ syāditi bhārata | apraṇāśena vīrāṇāmetadyācitumāgataḥ

"हे भारत, मैं यह याचना करने आया हूँ कि वीरों का विनाश हुए बिना कौरवों और पाण्डवों में शान्ति हो जाए।

श्लोक 4 (5.95.4)

राजन्नान्यत्प्रवक्तव्यं तव नैःश्रेयसं वचः । विदितं ह्येव ते सर्वं वेदितव्यमरिन्दम ॥

rājannānyatpravaktavyaṃ tava naiḥśreyasaṃ vacaḥ | viditaṃ hyeva te sarvaṃ veditavyamarindama

"हे राजन्, आपके परम कल्याण के लिए मुझे आपसे और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है; हे शत्रुदमन, जो कुछ जानने योग्य है, वह सब आप जानते ही हैं।

श्लोक 5 (5.95.5)

इदं ह्यद्य कुलं श्रेष्ठं सर्वराजसु पार्थिव । श्रुतवृत्तोपसंपन्नं सर्वैः समुदितं गुणैः ॥

idaṃ hyadya kulaṃ śreṣṭhaṃ sarvarājasu pārthiva | śrutavṛttopasaṃpannaṃ sarvaiḥ samuditaṃ guṇaiḥ

"हे पृथ्वीपते, आज यह कुल सब राजकुलों में श्रेष्ठ है, विद्या और सदाचार से सम्पन्न है और सब गुणों से भरा-पूरा है।

श्लोक 6 (5.95.6)

कृपानुकम्पा कारुण्यमानृशंस्यं च भारत । तथार्जवं क्षमा सत्यं कुरुष्वेतद्विशिष्यते ॥

kṛpānukampā kāruṇyamānṛśaṃsyaṃ ca bhārata | tathārjavaṃ kṣamā satyaṃ kuruṣvetadviśiṣyate

"हे भारत, कृपा, अनुकम्पा, करुणा, अक्रूरता, सरलता, क्षमा और सत्य — इन्हीं से कौरवों की विशेषता है।

श्लोक 7 (5.95.7)

तस्मिन्नेवंविधे राजन्कुले महति तिष्ठति । त्वन्निमित्तं विशेषेण नेह युक्तमसांप्रतम् ॥

tasminnevaṃvidhe rājankule mahati tiṣṭhati | tvannimittaṃ viśeṣeṇa neha yuktamasāṃpratam

"हे राजन्, ऐसे महान कुल के रहते उसमें कोई अनुचित कार्य होना ठीक नहीं है, और विशेषकर आपके कारण तो बिल्कुल नहीं।

श्लोक 8 (5.95.8)

त्वं हि धारयिता श्रेष्ठः कुरूणां कुरुसत्तम । मिथ्याप्रचरतां तात बाह्येष्वाभ्यन्तरेषु च ॥

tvaṃ hi dhārayitā śreṣṭhaḥ kurūṇāṃ kurusattama | mithyāpracaratāṃ tāta bāhyeṣvābhyantareṣu ca

"हे कुरुश्रेष्ठ, तात, बाहरी और भीतरी मामलों में मिथ्या आचरण करने वाले कौरवों को रोकने वाले मुख्य व्यक्ति आप ही हैं।

श्लोक 9 (5.95.9)

ते पुत्रास्तव कौरव्य दुर्योधनपुरोगमाः । धर्मार्थौ पृष्ठतः कृत्वा प्रचरन्ति नृशंसवत् ॥

te putrāstava kauravya duryodhanapurogamāḥ | dharmārthau pṛṣṭhataḥ kṛtvā pracaranti nṛśaṃsavat

"हे कौरव्य, दुर्योधन आदि आपके पुत्र धर्म और अर्थ को पीछे छोड़कर क्रूर लोगों की तरह आचरण कर रहे हैं।

श्लोक 10 (5.95.10)

अशिष्टा गतमर्यादा लोभेन हृतचेतसः । स्वेषु बन्धुषु मुख्येषु तद्वेत्थ पुरुषर्षभ ॥

aśiṣṭā gatamaryādā lobhena hṛtacetasaḥ | sveṣu bandhuṣu mukhyeṣu tadvettha puruṣarṣabha

"वे अशिष्ट हैं, उन्होंने सारी मर्यादा तोड़ दी है और लोभ ने उनकी बुद्धि हर ली है — और यह सब अपने ही प्रमुख बन्धुओं के प्रति; हे पुरुषश्रेष्ठ, यह आप जानते हैं।

श्लोक 11 (5.95.11)

सेयमापन्महाघोरा कुरुष्वेव समुत्थिता । उपेक्ष्यमाणा कौरव्य पृथिवीं घातयिष्यति ॥

seyamāpanmahāghorā kuruṣveva samutthitā | upekṣyamāṇā kauravya pṛthivīṃ ghātayiṣyati

"यह अत्यन्त भयंकर विपत्ति कौरवों में ही उठ खड़ी हुई है; हे कौरव्य, यदि इसकी उपेक्षा की गई तो यह सारी पृथ्वी का विनाश करा देगी।

श्लोक 12 (5.95.12)

शक्या चेयं शमयितुं त्वं चेदिच्छसि भारत । न दुष्करो ह्यत्र शमो मतो मे भरतर्षभ ॥

śakyā ceyaṃ śamayituṃ tvaṃ cedicchasi bhārata | na duṣkaro hyatra śamo mato me bharatarṣabha

"हे भारत, यदि आप चाहें तो इसे अब भी शान्त किया जा सकता है। हे भरतश्रेष्ठ, मेरे विचार में यहाँ शान्ति स्थापित करना कठिन नहीं है।

श्लोक 13 (5.95.13)

त्वय्यधीनः शमो राजन्मयि चैव विशांपते । पुत्रान्स्थापय कौरव्य स्थापयिष्याम्यहं परान् ॥

tvayyadhīnaḥ śamo rājanmayi caiva viśāṃpate | putrānsthāpaya kauravya sthāpayiṣyāmyahaṃ parān

"हे राजन्, हे प्रजानाथ, शान्ति आपके और मेरे ही अधीन है। हे कौरव्य, आप अपने पुत्रों को मर्यादा में रखिए, दूसरे पक्ष को मैं रखूँगा।

श्लोक 14 (5.95.14)

आज्ञा तव हि राजेन्द्र कार्या पुत्रैः सहान्वयैः । हितं बलवदप्येषां तिष्ठतां तव शासने ॥

ājñā tava hi rājendra kāryā putraiḥ sahānvayaiḥ | hitaṃ balavadapyeṣāṃ tiṣṭhatāṃ tava śāsane

"हे राजेन्द्र, आपके पुत्रों और उनके अनुयायियों को आपकी आज्ञा माननी ही चाहिए; आपके शासन में रहना उनके लिए भी अत्यन्त हितकर है।

श्लोक 15 (5.95.15)

तव चैव हितं राजन्पाण्डवानामथो हितम् । शमे प्रयतमानस्य तव शासनकाङ्क्षिणः ॥

tava caiva hitaṃ rājanpāṇḍavānāmatho hitam | śame prayatamānasya tava śāsanakāṅkṣiṇaḥ

"हे राजन्, यदि आप, जो अपने पुत्रों पर शासन करना चाहते हैं, शान्ति के लिए प्रयत्न करें, तो इसमें आपका भी हित है और पाण्डवों का भी।

श्लोक 16 (5.95.16)

स्वयं निष्फलमालक्ष्य संविधत्स्व विशांपते । सहायभूता भरतास्तवैव स्युर्जनेश्वर ॥

svayaṃ niṣphalamālakṣya saṃvidhatsva viśāṃpate | sahāyabhūtā bharatāstavaiva syurjaneśvara

"हे प्रजानाथ, स्वयं देखिए कि यह वैर निष्फल है, और सन्धि का प्रबन्ध कीजिए; हे जनेश्वर, सारे भरतवंशी आपके ही सहायक बन जाएँ।

श्लोक 17 (5.95.17)

धर्मार्थयोस्तिष्ठ राजन्पाण्डवैरभिरक्षितः । न हि शक्यास्तथाभूता यत्नादपि नराधिप ॥

dharmārthayostiṣṭha rājanpāṇḍavairabhirakṣitaḥ | na hi śakyāstathābhūtā yatnādapi narādhipa

"हे राजन्, पाण्डवों से सुरक्षित होकर धर्म और अर्थ में स्थित रहिए; हे नराधिप, ऐसे सहायक तो प्रयत्न करने पर भी नहीं मिलते।

श्लोक 18 (5.95.18)

न हि त्वां पाण्डवैर्जेतुं रक्ष्यमाणं महात्मभिः । इन्द्रोऽपि देवैः सहितः प्रसहेत कुतो नृपाः ॥

na hi tvāṃ pāṇḍavairjetuṃ rakṣyamāṇaṃ mahātmabhiḥ | indro'pi devaiḥ sahitaḥ prasaheta kuto nṛpāḥ

"जब महात्मा पाण्डव आपकी रक्षा कर रहे हों, तब देवताओं सहित इन्द्र भी आपको नहीं जीत सकता; फिर राजाओं की तो बात ही क्या?

श्लोक 19 (5.95.19)

यत्र भीष्मश्च द्रोणश्च कृपः कर्णो विविंशतिः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तोऽथ बाह्लिकः ॥

yatra bhīṣmaśca droṇaśca kṛpaḥ karṇo viviṃśatiḥ | aśvatthāmā vikarṇaśca somadatto'tha bāhlikaḥ

"जहाँ भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, विविंशति, अश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त और बाह्लीक हों,

श्लोक 20 (5.95.20)

सैन्धवश्च कलिङ्गश्च काम्भोजश्च सुदक्षिणः । युधिष्ठिरो भीमसेनः सव्यसाची यमौ तथा ॥

saindhavaśca kaliṅgaśca kāmbhojaśca sudakṣiṇaḥ | yudhiṣṭhiro bhīmasenaḥ savyasācī yamau tathā

"सिन्धुराज, कलिंगराज और काम्बोजराज सुदक्षिण हों, तथा युधिष्ठिर, भीमसेन, सव्यसाची अर्जुन और दोनों जुड़वाँ भाई (नकुल-सहदेव) हों,

श्लोक 21 (5.95.21)

सात्यकिश्च महातेजा युयुत्सुश्च महारथः । को नु तान्विपरीतात्मा युध्येत भरतर्षभ ॥

sātyakiśca mahātejā yuyutsuśca mahārathaḥ | ko nu tānviparītātmā yudhyeta bharatarṣabha

"और महातेजस्वी सात्यकि तथा महारथी युयुत्सु हों — हे भरतश्रेष्ठ, ऐसा कौन विपरीत बुद्धि वाला होगा जो उनसे युद्ध करे?

श्लोक 22 (5.95.22)

लोकस्येश्वरतां भूयः शत्रुभिश्चाप्यधृष्यताम् । प्राप्स्यसि त्वममित्रघ्न सहितः कुरुपाण्डवैः ॥

lokasyeśvaratāṃ bhūyaḥ śatrubhiścāpyadhṛṣyatām | prāpsyasi tvamamitraghna sahitaḥ kurupāṇḍavaiḥ

"हे शत्रुनाशक, कौरवों और पाण्डवों के साथ मिलकर आप फिर से संसार का प्रभुत्व प्राप्त करेंगे और शत्रु आपको पराजित नहीं कर सकेंगे।

श्लोक 23 (5.95.23)

तस्य ते पृथिवीपालास्त्वत्समाः पृथिवीपते । श्रेयांसश्चैव राजानः सन्धास्यन्ते परन्तप ॥

tasya te pṛthivīpālāstvatsamāḥ pṛthivīpate | śreyāṃsaścaiva rājānaḥ sandhāsyante parantapa

"हे पृथ्वीपते, हे परन्तप, तब आपके समान और आपसे बढ़कर भी जो राजा हैं, वे सब आपसे सन्धि करेंगे।

श्लोक 24 (5.95.24)

स त्वं पुत्रैश्च पौत्रैश्च पितृभिर्भ्रातृभिस्तथा । सुहृद्भिः सर्वतो गुप्तः सुखं शक्ष्यसि जीवितुम् ॥

sa tvaṃ putraiśca pautraiśca pitṛbhirbhrātṛbhistathā | suhṛdbhiḥ sarvato guptaḥ sukhaṃ śakṣyasi jīvitum

"पुत्रों, पौत्रों, पिता-तुल्य बड़ों, भाइयों और मित्रों से सब ओर से सुरक्षित रहकर आप सुखपूर्वक जीवन बिता सकेंगे।

श्लोक 25 (5.95.25)

एतानेव पुरोधाय सत्कृत्य च यथा पुरा । अखिलां भोक्ष्यसे सर्वां पृथिवीं पृथिवीपते ॥

etāneva purodhāya satkṛtya ca yathā purā | akhilāṃ bhokṣyase sarvāṃ pṛthivīṃ pṛthivīpate

"हे पृथ्वीपते, उन्हीं को आगे रखकर और पहले की भाँति उनका सत्कार करके आप सारी पृथ्वी का निष्कण्टक उपभोग करेंगे।

श्लोक 26 (5.95.26)

एतैर्हि सहितः सर्वैः पाण्डवैः स्वैश्च भारत । अन्यान्विजेष्यसे शत्रूनेष स्वार्थस्तवाखिलः ॥

etairhi sahitaḥ sarvaiḥ pāṇḍavaiḥ svaiśca bhārata | anyānvijeṣyase śatrūneṣa svārthastavākhilaḥ

"हे भारत, इन सब पाण्डवों और अपने लोगों के साथ मिलकर आप दूसरे शत्रुओं को जीत लेंगे; इसी में आपका सम्पूर्ण स्वार्थ है।

श्लोक 27 (5.95.27)

तैरेवोपार्जितां भूमिं भोक्ष्यसे च परन्तप । यदि संपत्स्यसे पुत्रैः सहामात्यैर्नराधिप ॥

tairevopārjitāṃ bhūmiṃ bhokṣyase ca parantapa | yadi saṃpatsyase putraiḥ sahāmātyairnarādhipa

"हे परन्तप, हे नराधिप, यदि आप अपने पुत्रों और मन्त्रियों सहित इस बात पर सहमत हो जाएँ, तो उन्हीं के द्वारा जीती हुई भूमि का भी आप उपभोग करेंगे।

श्लोक 28 (5.95.28)

संयुगे वै महाराज दृश्यते सुमहान्क्षयः । क्षये चोभयतो राजन्कं धर्ममनुपश्यसि ॥

saṃyuge vai mahārāja dṛśyate sumahānkṣayaḥ | kṣaye cobhayato rājankaṃ dharmamanupaśyasi

"हे महाराज, युद्ध में तो भारी विनाश ही दिखाई देता है; और हे राजन्, दोनों पक्षों के विनाश में आपको कौन-सा धर्म दिखाई देता है?

श्लोक 29 (5.95.29)

पाण्डवैर्निहतैः सङ्ख्ये पुत्रैर्वापि महाबलैः । यद्विन्देथाः सुखं राजंस्तद्ब्रूहि भरतर्षभ ॥

pāṇḍavairnihataiḥ saṅkhye putrairvāpi mahābalaiḥ | yadvindethāḥ sukhaṃ rājaṃstadbrūhi bharatarṣabha

"यदि युद्ध में पाण्डव मारे जाएँ, या आपके महाबली पुत्र, तो हे राजन्, आपको कौन-सा सुख मिलेगा? हे भरतश्रेष्ठ, यह मुझे बताइए।

श्लोक 30 (5.95.30)

शूराश्च हि कृतास्त्राश्च सर्वे युद्धाभिकाङ्क्षिणः । पाण्डवास्तावकाश्चैव तान्रक्ष महतो भयात् ॥

śūrāśca hi kṛtāstrāśca sarve yuddhābhikāṅkṣiṇaḥ | pāṇḍavāstāvakāścaiva tānrakṣa mahato bhayāt

"पाण्डव और आपके पक्ष के लोग — सभी शूरवीर हैं, सभी अस्त्रविद्या में निपुण हैं और सभी युद्ध के इच्छुक हैं; उन्हें इस महान भय से बचाइए।

श्लोक 31 (5.95.31)

न पश्येम कुरून्सर्वान्पाण्डवांश्चैव संयुगे । क्षीणानुभयतः शूरान्रथिनो रथिभिर्हतान् ॥

na paśyema kurūnsarvānpāṇḍavāṃścaiva saṃyuge | kṣīṇānubhayataḥ śūrānrathino rathibhirhatān

"ऐसा न हो कि हम सभी कौरवों और पाण्डवों को युद्ध में दोनों ओर से क्षीण होते, रथियों द्वारा मारे गए शूरवीर रथियों के रूप में देखें।

श्लोक 32 (5.95.32)

समवेताः पृथिव्यां हि राजानो राजसत्तम । अमर्षवशमापन्ना नाशयेयुरिमाः प्रजाः ॥

samavetāḥ pṛthivyāṃ hi rājāno rājasattama | amarṣavaśamāpannā nāśayeyurimāḥ prajāḥ

"हे राजश्रेष्ठ, पृथ्वी पर एकत्र हुए ये राजा क्रोध के वश में होकर इस प्रजा का नाश कर डालेंगे।

श्लोक 33 (5.95.33)

त्राहि राजन्निमं लोकं न नश्येयुरिमाः प्रजाः । त्वयि प्रकृतिमापन्ने शेषः स्यात्कुरुनन्दन ॥

trāhi rājannimaṃ lokaṃ na naśyeyurimāḥ prajāḥ | tvayi prakṛtimāpanne śeṣaḥ syātkurunandana

"हे राजन्, इस लोक की रक्षा कीजिए, ये प्रजाएँ नष्ट न हों। हे कुरुनन्दन, यदि आप अपनी स्वाभाविक सात्त्विक प्रकृति में लौट आएँ, तो कुछ शेष बचा रहेगा।

श्लोक 34 (5.95.34)

शुक्ला वदान्या ह्रीमन्त आर्याः पुण्याभिजातयः । अन्योन्यसचिवा राजंस्तान्पाहि महतो भयात् ॥

śuklā vadānyā hrīmanta āryāḥ puṇyābhijātayaḥ | anyonyasacivā rājaṃstānpāhi mahato bhayāt

"वे पवित्र, उदार, लज्जाशील, श्रेष्ठ और पुण्य कुलों में जन्मे हैं, और एक-दूसरे के सहायक हैं; हे राजन्, उन्हें महान भय से बचाइए।

श्लोक 35 (5.95.35)

शिवेनेमे भूमिपालाः समागम्य परस्परम् । सह भुक्त्वा च पीत्वा च प्रतियान्तु यथागृहम् ॥

śiveneme bhūmipālāḥ samāgamya parasparam | saha bhuktvā ca pītvā ca pratiyāntu yathāgṛham

"ये भूपाल शुभ भाव से परस्पर मिलें, साथ खाएँ-पिएँ और अपने-अपने घर लौट जाएँ —

श्लोक 36 (5.95.36)

सुवाससः स्रग्विणश्च सत्कृता भरतर्षभ । अमर्षं च निराकृत्य वैराणि च परन्तप ॥

suvāsasaḥ sragviṇaśca satkṛtā bharatarṣabha | amarṣaṃ ca nirākṛtya vairāṇi ca parantapa

"हे भरतश्रेष्ठ, हे परन्तप, सुन्दर वस्त्र और मालाएँ पहने, सम्मानित होकर, अपना क्रोध और वैर त्यागकर।

श्लोक 37 (5.95.37)

हार्दं यत्पाण्डवेष्वासीत्प्राप्तोऽस्मिन्नायुषः क्षये । तदेव ते भवत्वद्य सन्धत्स्व भरतर्षभ ॥

hārdaṃ yatpāṇḍaveṣvāsītprāpto'sminnāyuṣaḥ kṣaye | tadeva te bhavatvadya sandhatsva bharatarṣabha

"पाण्डवों के प्रति जो स्नेह आपके मन में था, अब आयु के इस अन्तिम भाग में पहुँचकर वही स्नेह आज फिर आपमें जाग उठे; हे भरतश्रेष्ठ, सन्धि कर लीजिए।

श्लोक 38 (5.95.38)

बाला विहीनाः पित्रा ते त्वयैव परिवर्धिताः । तान्पालय यथान्यायं पुत्रांश्च भरतर्षभ ॥

bālā vihīnāḥ pitrā te tvayaiva parivardhitāḥ | tānpālaya yathānyāyaṃ putrāṃśca bharatarṣabha

"वे बचपन में ही पिता से वंचित हो गए थे और आपने ही उनका पालन-पोषण किया; हे भरतश्रेष्ठ, उनकी और अपने पुत्रों की भी न्यायपूर्वक रक्षा कीजिए।

श्लोक 39 (5.95.39)

भवतैव हि रक्ष्यास्ते व्यसनेषु विशेषतः । मा ते धर्मस्तथैवार्थो नश्येत भरतर्षभ ॥

bhavataiva hi rakṣyāste vyasaneṣu viśeṣataḥ | mā te dharmastathaivārtho naśyeta bharatarṣabha

"उनकी रक्षा आपको ही करनी है, विशेषकर संकट के समय; हे भरतश्रेष्ठ, ऐसा न हो कि आपका धर्म और अर्थ दोनों नष्ट हो जाएँ।

श्लोक 40 (5.95.40)

आहुस्त्वां पाण्डवा राजन्नभिवाद्य प्रसाद्य च । भवतः शासनाद्दुःखमनुभूतं सहानुगैः ॥

āhustvāṃ pāṇḍavā rājannabhivādya prasādya ca | bhavataḥ śāsanādduḥkhamanubhūtaṃ sahānugaiḥ

"हे राजन्, पाण्डव आपको प्रणाम करके और आपको प्रसन्न करके कहते हैं — 'आपकी आज्ञा से हमने अपने अनुयायियों सहित दुःख भोगा है।

श्लोक 41 (5.95.41)

द्वादशेमानि वर्षाणि वने निर्व्युषितानि नः । त्रयोदशं तथाऽज्ञातैः सजने परिवत्सरम् ॥

dvādaśemāni varṣāṇi vane nirvyuṣitāni naḥ | trayodaśaṃ tathā'jñātaiḥ sajane parivatsaram

"'ये बारह वर्ष हमने वन में बिताए हैं, और तेरहवाँ वर्ष लोगों के बीच अज्ञात रहकर।

श्लोक 42 (5.95.42)

स्थाता नः समये तस्मिन्पितेति कृतनिश्चयाः । नाहास्म समयं तात तच्च नो ब्राह्मणा विदुः ॥

sthātā naḥ samaye tasminpiteti kṛtaniścayāḥ | nāhāsma samayaṃ tāta tacca no brāhmaṇā viduḥ

"'यह निश्चय करके कि हमारे पिता उस प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहेंगे, तात, हमने प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी; यह बात ब्राह्मण भी जानते हैं।

श्लोक 43 (5.95.43)

तस्मिन्नः समये तिष्ठ स्थितानां भरतर्षभ । नित्यं संक्लेशिता राजन्स्वराज्यांशं लभेमहि । त्वं धर्ममर्थं संजानन्सम्यङ्नस्त्रातुमर्हसि ॥

tasminnaḥ samaye tiṣṭha sthitānāṃ bharatarṣabha | nityaṃ saṃkleśitā rājansvarājyāṃśaṃ labhemahi | tvaṃ dharmamarthaṃ saṃjānansamyaṅnastrātumarhasi

"'हे भरतश्रेष्ठ, हम उस प्रतिज्ञा पर स्थिर रहे हैं, अब आप भी हमारे प्रति उस पर स्थिर रहिए; हे राजन्, सदा क्लेश पाते आए हम अपने राज्य का भाग प्राप्त करें। आप धर्म और अर्थ को भली-भाँति जानते हैं, इसलिए आपको हमारी ठीक से रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 44 (5.95.44)

गुरुत्वं भवति प्रेक्ष्य बहून्क्लेशांस्तितिक्ष्महे । स भवान्मातृपितृवदस्मासु प्रतिपद्यताम् ॥

gurutvaṃ bhavati prekṣya bahūnkleśāṃstitikṣmahe | sa bhavānmātṛpitṛvadasmāsu pratipadyatām

"'आपकी गुरुता को देखकर हम बहुत-से क्लेश सहते हैं; इसलिए आप हमारे प्रति माता-पिता के समान व्यवहार करें।

श्लोक 45 (5.95.45)

गुरोर्गरीयसी वृत्तिर्या च शिष्यस्य भारत । वर्तामहे त्वयि च तां त्वं च वर्तस्व नस्तथा ॥

gurorgarīyasī vṛttiryā ca śiṣyasya bhārata | vartāmahe tvayi ca tāṃ tvaṃ ca vartasva nastathā

"'हे भारत, गुरु और शिष्य के बीच जो व्यवहार उचित है — और उसमें गुरु का दायित्व अधिक बड़ा है — उसे हम आपके प्रति निभाते हैं; आप भी हमारे प्रति वैसा ही व्यवहार कीजिए।

श्लोक 46 (5.95.46)

पित्रा स्थापयितव्या हि वयमुत्पथमास्थिताः । संस्थापय पथिष्वस्मांस्तिष्ठ धर्मे सुवर्त्मनि ॥

pitrā sthāpayitavyā hi vayamutpathamāsthitāḥ | saṃsthāpaya pathiṣvasmāṃstiṣṭha dharme suvartmani

"'यदि हम कुमार्ग पर चले गए हों तो पिता का ही काम है कि हमें ठीक मार्ग पर लाए; हमें सन्मार्ग पर स्थापित कीजिए और स्वयं धर्म के उत्तम मार्ग पर स्थित रहिए।'

श्लोक 47 (5.95.47)

आहुश्चेमां परिषदं पुत्रास्ते भरतर्षभ । धर्मज्ञेषु सभासत्सु नेह युक्तमसांप्रतम् ॥

āhuścemāṃ pariṣadaṃ putrāste bharatarṣabha | dharmajñeṣu sabhāsatsu neha yuktamasāṃpratam

"हे भरतश्रेष्ठ, आपके वे पुत्र इस सभा से भी कहते हैं — 'जहाँ सभासद धर्म के ज्ञाता हों, वहाँ कोई अनुचित कार्य नहीं होना चाहिए।'

श्लोक 48 (5.95.48)

यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च । हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥

yatra dharmo hyadharmeṇa satyaṃ yatrānṛtena ca | hanyate prekṣamāṇānāṃ hatāstatra sabhāsadaḥ

"जहाँ सभासदों के देखते-देखते अधर्म के द्वारा धर्म का और असत्य के द्वारा सत्य का हनन होता है, वहाँ वे सभासद स्वयं मारे जाते हैं।

श्लोक 49 (5.95.49)

विद्धो धर्मो ह्यधर्मेण सभां यत्र प्रपद्यते । नचास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः । धर्म एतानारुजति यथा नद्यनुकूलजान् ॥

viddho dharmo hyadharmeṇa sabhāṃ yatra prapadyate | nacāsya śalyaṃ kṛntanti viddhāstatra sabhāsadaḥ | dharma etānārujati yathā nadyanukūlajān

"जब अधर्म से बिंधा हुआ धर्म सभा में आता है और सभासद उसका काँटा नहीं निकालते, तो वे स्वयं बिंध जाते हैं; जैसे नदी अपने तट पर उगे वृक्षों को ढहा देती है, वैसे ही धर्म उनका नाश कर देता है।

श्लोक 50 (5.95.50)

ये धर्ममनुपश्यन्तस्तूष्णीं ध्यायन्त आसते । ते सत्यमाहुर्धर्म्यं च न्याय्यं च भरतर्षभ ॥

ye dharmamanupaśyantastūṣṇīṃ dhyāyanta āsate | te satyamāhurdharmyaṃ ca nyāyyaṃ ca bharatarṣabha

"हे भरतश्रेष्ठ, जो धर्म पर दृष्टि रखकर मौन होकर चिन्तन करते बैठे हैं, उन्होंने सत्य, धर्मसंगत और न्यायोचित बात ही कही है।

श्लोक 51 (5.95.51)

शक्यं किमन्यद्वक्तुं ते दानादन्यज्जनेश्वर । ब्रुवन्तु ते महीपालाः सभायां ये समासते ॥

śakyaṃ kimanyadvaktuṃ te dānādanyajjaneśvara | bruvantu te mahīpālāḥ sabhāyāṃ ye samāsate

"हे जनेश्वर, उन्हें उनका भाग दे देने के अतिरिक्त आपसे और क्या कहा जा सकता है? इस सभा में जो राजा बैठे हैं, वे ही बताएँ

श्लोक 52 (5.95.52)

धर्मार्थौ संप्रधार्यैव यदि सत्यं ब्रवीम्यहम् । प्रमुञ्चेमान्मृत्युपाशात्क्षत्रियान्पुरुषर्षभ ॥

dharmārthau saṃpradhāryaiva yadi satyaṃ bravīmyaham | pramuñcemānmṛtyupāśātkṣatriyānpuruṣarṣabha

"कि धर्म और अर्थ का विचार करके मैं सत्य कह रहा हूँ या नहीं। हे पुरुषश्रेष्ठ, इन क्षत्रियों को मृत्यु के पाश से छुड़ा दीजिए।

श्लोक 53 (5.95.53)

प्रशाम्य भरतश्रेष्ठ मा मन्युवशमन्वगाः । पित्र्यं तेभ्यः प्रदायांशं पाण्डवेभ्यो यथोचितम् । ततः सपुत्रः सिद्धार्थो भुङ्क्ष भोगान्परन्तप ॥

praśāmya bharataśreṣṭha mā manyuvaśamanvagāḥ | pitryaṃ tebhyaḥ pradāyāṃśaṃ pāṇḍavebhyo yathocitam | tataḥ saputraḥ siddhārtho bhuṅkṣa bhogānparantapa

"हे भरतश्रेष्ठ, शान्त हो जाइए, क्रोध के वश में मत होइए। पाण्डवों को उनका पैतृक भाग यथोचित रूप से दे दीजिए; फिर हे परन्तप, सफल-मनोरथ होकर अपने पुत्रों के साथ सुखों का उपभोग कीजिए।

श्लोक 54 (5.95.54)

अजातशत्रुं जानीषे स्थितं धर्मे सतां सदा । सपुत्रे त्वयि वृत्तिं च वर्तते यां नराधिप ॥

ajātaśatruṃ jānīṣe sthitaṃ dharme satāṃ sadā | saputre tvayi vṛttiṃ ca vartate yāṃ narādhipa

"हे नराधिप, आप जानते हैं कि अजातशत्रु युधिष्ठिर सदा सत्पुरुषों के धर्म में स्थित रहते हैं, और आप यह भी जानते हैं कि आपके और आपके पुत्रों के प्रति उनका कैसा व्यवहार है।

श्लोक 55 (5.95.55)

दाहितश्च निरस्तश्च त्वामेवोपाश्रितः पुनः । इन्द्रप्रस्थं त्वयैवासौ सपुत्रेण विवासितः ॥

dāhitaśca nirastaśca tvāmevopāśritaḥ punaḥ | indraprasthaṃ tvayaivāsau saputreṇa vivāsitaḥ

"जलाए जाने और निकाले जाने पर भी वे फिर आपकी ही शरण में आए; और आपने ही अपने पुत्रों के साथ मिलकर उन्हें इन्द्रप्रस्थ भेज दिया।

श्लोक 56 (5.95.56)

स तत्र विवसन्सर्वान्वशमानीय पार्थिवान् । त्वन्मुखानकरोद्राजन्न च त्वामत्यवर्तत ॥

sa tatra vivasansarvānvaśamānīya pārthivān | tvanmukhānakarodrājanna ca tvāmatyavartata

"वहाँ रहते हुए उन्होंने सब राजाओं को वश में करके उन्हें आपकी ओर उन्मुख कर दिया, और हे राजन्, उन्होंने कभी आपका उल्लंघन नहीं किया।

श्लोक 57 (5.95.57)

तस्यैवं वर्तमानस्य सौबलेन जिहीर्षता । राष्ट्राणि धनधान्यं च प्रयुक्तः परमोपधिः ॥

tasyaivaṃ vartamānasya saubalena jihīrṣatā | rāṣṭrāṇi dhanadhānyaṃ ca prayuktaḥ paramopadhiḥ

"जब वे ऐसा आचरण कर रहे थे, तब उनके राज्य और धन-धान्य को हड़पने की इच्छा से सुबलपुत्र शकुनि ने उनके साथ भारी छल किया।

श्लोक 58 (5.95.58)

स तामवस्थां संप्राप्य कृष्णां प्रेक्ष्य सभां गताम् । क्षत्रधर्मादमेयात्मा नाकम्पत युधिष्ठिरः ॥

sa tāmavasthāṃ saṃprāpya kṛṣṇāṃ prekṣya sabhāṃ gatām | kṣatradharmādameyātmā nākampata yudhiṣṭhiraḥ

"उस दशा में पहुँचकर और द्रौपदी को सभा में लाई गई देखकर भी अपरिमित आत्मबल वाले युधिष्ठिर क्षत्रिय-धर्म से विचलित नहीं हुए।

श्लोक 59 (5.95.59)

अहं तु तव तेषां च श्रेय इच्छामि भारत । धर्मादर्थात्सुखाच्चैव मा राजन्नीनशः प्रजाः ॥

ahaṃ tu tava teṣāṃ ca śreya icchāmi bhārata | dharmādarthātsukhāccaiva mā rājannīnaśaḥ prajāḥ

"हे भारत, मैं तो आपका और उनका दोनों का कल्याण चाहता हूँ। हे राजन्, प्रजा को धर्म, अर्थ और सुख से वंचित करके उसका नाश मत कीजिए।

श्लोक 60 (5.95.60)

अनर्थमर्थं मन्वानोऽप्यर्थं चानर्थमात्मनः । लोभेऽतिप्रसृतान्पुत्रान्निगृह्णीष्व विशांपते ॥

anarthamarthaṃ manvāno'pyarthaṃ cānarthamātmanaḥ | lobhe'tiprasṛtānputrānnigṛhṇīṣva viśāṃpate

"हे प्रजानाथ, भले ही आप अपने लिए अनर्थ को अर्थ और अर्थ को अनर्थ मान रहे हों, फिर भी लोभ में बहुत आगे बढ़ गए अपने पुत्रों को रोकिए।

श्लोक 61 (5.95.61)

स्थिताः शुश्रूषितुं पार्थाः स्थिता योद्धुमरिन्दमाः । यत्ते पथ्यतमं राजंस्तस्मिंस्तिष्ठ परन्तप ॥

sthitāḥ śuśrūṣituṃ pārthāḥ sthitā yoddhumarindamāḥ | yatte pathyatamaṃ rājaṃstasmiṃstiṣṭha parantapa

"हे राजन्, शत्रुदमन पृथापुत्र आपकी सेवा के लिए भी तैयार हैं और युद्ध के लिए भी। हे परन्तप, जो आपके लिए सबसे अधिक हितकर हो, उसी पर स्थिर रहिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 62 (5.95.62)

तद्वाक्यं पार्थिवाः सर्वे हृदयैः समपूजयन् । न तत्र कश्चिद्वक्तुं हि वाचं प्राक्रामदग्रतः ॥

tadvākyaṃ pārthivāḥ sarve hṛdayaiḥ samapūjayan | na tatra kaścidvaktuṃ hi vācaṃ prākrāmadagrataḥ

सब राजाओं ने मन ही मन उन वचनों की सराहना की, परन्तु वहाँ कोई भी आगे बढ़कर बोलने का साहस न कर सका।

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