Skip to main content

उद्योग पर्व · अध्याय 96

परशुराम द्वारा दम्भोद्भव की कथा

श्रीकृष्ण के बोल चुकने पर सभा मौन हो जाती है, और जमदग्नि के पुत्र परशुराम दुर्योधन को राजा दम्भोद्भव की कथा सुनाते हैं, जो अहंकारवश सबसे पूछता फिरता था कि क्या युद्ध में कोई उसकी बराबरी का है। ब्राह्मणों द्वारा गन्धमादन पर्वत पर तप करते नर और नारायण के पास भेजे जाने पर वह उनसे युद्ध का हठ करता है, और नर केवल मुट्ठी भर सींकों से उसके सैनिकों की आँखें, कान और नाक बींध देते हैं, यहाँ तक कि राजा उनके चरणों में गिर पड़ता है और विनम्र होकर घर लौटता है। परशुराम बताते हैं कि नर और नारायण ही अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं, और दुर्योधन से अभिमान छोड़कर पाण्डवों से सन्धि करने का आग्रह करते हैं।

अध्याय 95अध्याय-सूचीअध्याय 97

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.96.1)

तस्मिन्नभिहिते वाक्ये केशवेन महात्मना । स्तिमिता हृष्टरोमाण आसन्सर्वे सभासदः ॥

tasminnabhihite vākye keśavena mahātmanā | stimitā hṛṣṭaromāṇa āsansarve sabhāsadaḥ

महात्मा केशव के यह वचन कहने पर सभा में बैठे सभी लोग स्तब्ध रह गए और उनके रोंगटे खड़े हो गए।

श्लोक 2 (5.96.2)

कस्स्विदुत्तरमेतेषां वक्तुमुत्सहते पुमान् । इति सर्वे मनोभिस्ते चिन्तयन्ति स्म पार्थिवाः ॥

kassviduttarameteṣāṃ vaktumutsahate pumān | iti sarve manobhiste cintayanti sma pārthivāḥ

'इन बातों का उत्तर देने का साहस कौन पुरुष कर सकता है?' — सभी राजा मन-ही-मन यही सोचने लगे।

श्लोक 3 (5.96.3)

तथा तेषु च सर्वेषु तूष्णींभूतेषु राजसु । जामदग्न्य इदं वाक्यमब्रवीत्कुरुसंसदि ॥

tathā teṣu ca sarveṣu tūṣṇīṃbhūteṣu rājasu | jāmadagnya idaṃ vākyamabravītkurusaṃsadi

जब वे सब राजा इस प्रकार मौन बैठे थे, तब जमदग्नि के पुत्र (परशुराम) ने कुरुओं की सभा में यह वचन कहा —

राम उवाच

श्लोक 4 (5.96.4)

इमां मे सोपमां वाचं शृणु सत्यामशङ्कितः । तां श्रुत्वा श्रेय आदत्स्व यदि साध्विति मन्यसे ॥

imāṃ me sopamāṃ vācaṃ śṛṇu satyāmaśaṅkitaḥ | tāṃ śrutvā śreya ādatsva yadi sādhviti manyase

दृष्टान्त से युक्त मेरी इस सच्ची बात को निःशंक होकर सुनो। सुनकर यदि तुम्हें यह उचित लगे तो जो कल्याणकारी हो उसे अपनाओ।

श्लोक 5 (5.96.5)

राजा दम्भोद्भवो नाम सार्वभौमः पुराऽभवत् । अखिलां बुभुजे सर्वां पृथिवीमिति नः श्रुतम् ॥

rājā dambhodbhavo nāma sārvabhaumaḥ purā'bhavat | akhilāṃ bubhuje sarvāṃ pṛthivīmiti naḥ śrutam

प्राचीन काल में दम्भोद्भव नाम का एक सार्वभौम राजा था। वह सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन करता था — ऐसा हमने सुना है।

श्लोक 6 (5.96.6)

स स्म नित्यं निशापाये प्रातरुत्थाय वीर्यवान् । ब्राह्मणान्क्षत्रियान्वैश्यान्पृच्छन्नास्ते महारथः ॥

sa sma nityaṃ niśāpāye prātarutthāya vīryavān | brāhmaṇānkṣatriyānvaiśyānpṛcchannāste mahārathaḥ

वह पराक्रमी महारथी प्रतिदिन रात बीतने पर प्रातःकाल उठकर ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों से पूछा करता था —

श्लोक 7 (5.96.7)

अस्ति कश्चिद्विशिष्टो वा मद्विधो वा भवेद्युधि । शूद्रो वैश्यः क्षत्रियो वा ब्राह्मणो वाऽपि शस्त्रभृत् ॥

asti kaścidviśiṣṭo vā madvidho vā bhavedyudhi | śūdro vaiśyaḥ kṣatriyo vā brāhmaṇo vā'pi śastrabhṛt

'क्या कोई शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय या शस्त्रधारी ब्राह्मण ऐसा है जो युद्ध में मुझसे बढ़कर हो या मेरे समान भी हो?'

श्लोक 8 (5.96.8)

इति ब्रुवन्नन्वचरत्स राजा पृथिवीमिमाम् । दर्पेण महता मत्तः कञ्चिदन्यमचिन्तयन् ॥

iti bruvannanvacaratsa rājā pṛthivīmimām | darpeṇa mahatā mattaḥ kañcidanyamacintayan

यही कहता हुआ वह राजा इस पृथ्वी पर घूमता रहा; वह भारी अहंकार से मतवाला था और किसी दूसरे को कुछ नहीं समझता था।

श्लोक 9 (5.96.9)

तं च वैद्या अकृपणा ब्राह्मणाः सर्वतोऽभयाः । प्रत्यषेधन्त राजानं श्लाघमानं पुनः पुनः ॥

taṃ ca vaidyā akṛpaṇā brāhmaṇāḥ sarvato'bhayāḥ | pratyaṣedhanta rājānaṃ ślāghamānaṃ punaḥ punaḥ

विद्वान, उदार और हर प्रकार से निर्भय ब्राह्मणों ने बार-बार अपनी बड़ाई करते उस राजा को टोका।

श्लोक 10 (5.96.10)

निषिध्यमानोऽप्यसकृत्पृच्छत्येव स वै द्विजान् । अतिमानं श्रिया मत्तं तमूचुर्ब्राह्मणास्तदा ॥

niṣidhyamāno'pyasakṛtpṛcchatyeva sa vai dvijān | atimānaṃ śriyā mattaṃ tamūcurbrāhmaṇāstadā

बार-बार रोके जाने पर भी वह ब्राह्मणों से यही पूछता रहा। तब अत्यन्त अभिमानी और ऐश्वर्य से मतवाले उस राजा से ब्राह्मणों ने कहा —

श्लोक 11 (5.96.11)

तपस्विनो महात्मानो वेदप्रत्ययदर्शिनः । उदीर्यमाणं राजानं क्रोधदीप्ता द्विजातयः ॥

tapasvino mahātmāno vedapratyayadarśinaḥ | udīryamāṇaṃ rājānaṃ krodhadīptā dvijātayaḥ

वे महात्मा तपस्वी, जो वेद को प्रमाण मानकर देखते थे; राजा की इस डींग से क्रोध से जलते हुए उन द्विजों ने कहा —

श्लोक 12 (5.96.12)

अनेकजयिनौ सङ्ख्ये यौ वै पुरुषसत्तमौ । तयोस्त्वं न समो राजन्भवितासि कदाचन ॥

anekajayinau saṅkhye yau vai puruṣasattamau | tayostvaṃ na samo rājanbhavitāsi kadācana

'युद्ध में अनेक विजय पाने वाले दो पुरुषश्रेष्ठ हैं। हे राजन्, तुम उन दोनों की बराबरी कभी नहीं कर सकोगे।'

श्लोक 13 (5.96.13)

एवमुक्तः स राजा तु पुनः पप्रच्छ तान्द्विजान् । क्व तौ वीरौ क्वजन्मानौ किंकर्माणौ च कौ च तौ ॥

evamuktaḥ sa rājā tu punaḥ papraccha tāndvijān | kva tau vīrau kvajanmānau kiṃkarmāṇau ca kau ca tau

यह सुनकर राजा ने उन ब्राह्मणों से फिर पूछा — 'वे दोनों वीर कहाँ हैं? उनका जन्म कहाँ हुआ? उनके कर्म क्या हैं और वे कौन हैं?'

ब्राह्मणा ऊचुः

श्लोक 14 (5.96.14)

नरो नारायणश्चैव तापसाविति नः श्रुतम् । आयातौ मानुषे लोके ताभ्यां युद्ध्यस्व पार्थिव ॥

naro nārāyaṇaścaiva tāpasāviti naḥ śrutam | āyātau mānuṣe loke tābhyāṃ yuddhyasva pārthiva

वे नर और नारायण नाम के दो तपस्वी हैं — ऐसा हमने सुना है। वे मनुष्य-लोक में आए हुए हैं। हे राजन्, उन्हीं से युद्ध करो।

श्लोक 15 (5.96.15)

श्रूयेते तौ महात्मानौ नरनारायणावुभौ । तपो घोरमनिर्देश्यं तप्येते गन्धमादने ॥

śrūyete tau mahātmānau naranārāyaṇāvubhau | tapo ghoramanirdeśyaṃ tapyete gandhamādane

सुना जाता है कि वे दोनों महात्मा नर और नारायण गन्धमादन पर्वत पर ऐसा घोर तप कर रहे हैं जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

राम उवाच

श्लोक 16 (5.96.16)

स राजा महतीं सेनां योजयित्वा षडङ्गिनीम् । अमृष्यमाणः संप्रायाद्यत्र तावपराजितौ ॥

sa rājā mahatīṃ senāṃ yojayitvā ṣaḍaṅginīm | amṛṣyamāṇaḥ saṃprāyādyatra tāvaparājitau

यह सहन न कर पाकर राजा छः अंगों वाली विशाल सेना सजाकर वहाँ चल पड़ा जहाँ वे दोनों अपराजित तपस्वी थे।

श्लोक 17 (5.96.17)

स गत्वा विषमं घोरं पर्वतं गन्धमादनम् । मार्गमाणोऽन्वगच्छत्तौ तापसौ वनमाश्रितौ ॥

sa gatvā viṣamaṃ ghoraṃ parvataṃ gandhamādanam | mārgamāṇo'nvagacchattau tāpasau vanamāśritau

ऊबड़-खाबड़ और भयानक गन्धमादन पर्वत पर पहुँचकर उसने वन में रहने वाले उन दोनों तपस्वियों को खोजा और उन तक जा पहुँचा।

श्लोक 18 (5.96.18)

तौ दृष्ट्वा क्षुत्पिपासाभ्यां कृशौ धमनिसन्ततौ । शीतवातातपैश्चैव कर्शितौ पुरुषोत्तमौ ॥

tau dṛṣṭvā kṣutpipāsābhyāṃ kṛśau dhamanisantatau | śītavātātapaiścaiva karśitau puruṣottamau

उसने उन दोनों पुरुषोत्तमों को देखा — भूख-प्यास से दुबले, जिनकी नसें उभर आई थीं, और जो सर्दी, हवा और धूप से क्षीण हो गए थे।

श्लोक 19 (5.96.19)

अभिगम्योपसङ्गृह्य पर्यपृच्छदनामयम् । तमर्चित्वा मूलफलैरासनेनोदकेन च ॥

abhigamyopasaṅgṛhya paryapṛcchadanāmayam | tamarcitvā mūlaphalairāsanenodakena ca

उसने पास जाकर उनके चरण पकड़े और उनका कुशल पूछा। उन दोनों ने कन्द-मूल-फल, आसन और जल से उसका सत्कार किया

श्लोक 20 (5.96.20)

न्यमन्त्रयेतां राजानं किं कार्यं क्रियतामिति । ततस्तामानुपूर्वीं स पुनरेवान्वकीर्तयत् ॥

nyamantrayetāṃ rājānaṃ kiṃ kāryaṃ kriyatāmiti | tatastāmānupūrvīṃ sa punarevānvakīrtayat

और राजा से कहा — 'बताइए, आपका क्या कार्य किया जाए?' तब उसने फिर से वही बात आरम्भ से अन्त तक कह सुनाई —

दम्भोद्भव उवाच

श्लोक 21 (5.96.21)

बाहुभ्यां मे जिता भूमिर्निहताः सर्वशत्रवः । भवद्भ्यां युद्धमाकाङ्क्षन्नुपयातोऽस्मि पर्वतम् ॥

bāhubhyāṃ me jitā bhūmirnihatāḥ sarvaśatravaḥ | bhavadbhyāṃ yuddhamākāṅkṣannupayāto'smi parvatam

अपनी भुजाओं से मैंने पृथ्वी जीत ली है और सब शत्रुओं को मार डाला है। आप दोनों से युद्ध की इच्छा लेकर मैं इस पर्वत पर आया हूँ।

श्लोक 22 (5.96.22)

आतिथ्यं दीयतामेतत्काङ्क्षितं मे चिरं प्रति ॥

ātithyaṃ dīyatāmetatkāṅkṣitaṃ me ciraṃ prati

आतिथ्य में मुझे यही दीजिए; मैं बहुत समय से इसकी कामना करता आया हूँ।

नरनारायणावूचतुः

श्लोक 23 (5.96.23)

अपेतक्रोधलोभोऽयमाश्रमो राजसत्तम ॥

apetakrodhalobho'yamāśramo rājasattama

हे राजश्रेष्ठ, यह आश्रम क्रोध और लोभ से रहित है।

श्लोक 24 (5.96.24)

न ह्यस्मिन्नाश्रमे युद्धं कुतः शस्त्रं कुतोऽनृजुः । अन्यत्र युद्धमाकाङ्क्ष बहवः क्षत्रियाः क्षितौ ॥

na hyasminnāśrame yuddhaṃ kutaḥ śastraṃ kuto'nṛjuḥ | anyatra yuddhamākāṅkṣa bahavaḥ kṣatriyāḥ kṣitau

इस आश्रम में युद्ध नहीं होता — फिर शस्त्र कहाँ और कुटिलता कहाँ? युद्ध कहीं और ढूँढ़ो; पृथ्वी पर बहुत-से क्षत्रिय हैं।

राम उवाच

श्लोक 25 (5.96.25)

उच्यमानस्तथाऽपि स्म भूय एवाभ्यभाषत । पुनः पुनः क्षाम्यमाणः सान्त्व्यमानश्च भारत ॥

ucyamānastathā'pi sma bhūya evābhyabhāṣata | punaḥ punaḥ kṣāmyamāṇaḥ sāntvyamānaśca bhārata

इस प्रकार कहे जाने पर भी वह और अधिक बोलता ही रहा। हे भारत, बार-बार उससे क्षमा माँगी गई और उसे शान्त करने का प्रयत्न किया गया,

श्लोक 26 (5.96.26)

दम्भोद्भवो युद्धमिच्छन्नाह्वयत्येव तापसौ । ततो नरस्त्विषीकाणां मुष्टिमादाय भारत ॥

dambhodbhavo yuddhamicchannāhvayatyeva tāpasau | tato narastviṣīkāṇāṃ muṣṭimādāya bhārata

फिर भी युद्ध चाहने वाला दम्भोद्भव उन दोनों तपस्वियों को ललकारता ही रहा। तब, हे भारत, नर ने मुट्ठी भर सींकें उठाईं

श्लोक 27 (5.96.27)

अब्रवीदेहि युद्ध्यस्व युद्धकामुक क्षत्रिय । सर्वशस्त्राणि चादत्स्व योजयस्व च वाहिनीम् ॥

abravīdehi yuddhyasva yuddhakāmuka kṣatriya | sarvaśastrāṇi cādatsva yojayasva ca vāhinīm

और कहा — 'आओ, युद्ध करो, युद्ध के लोभी क्षत्रिय! अपने सब शस्त्र उठा लो और अपनी सेना सजा लो।'

नर उवाच

श्लोक 28 (5.96.28)

अहं हि ते विनेष्यामि युद्धश्रद्धामितः परम् । यदाह्वयसि दर्पेण ब्राह्मणप्रमुखाञ्जनान् ॥

ahaṃ hi te vineṣyāmi yuddhaśraddhāmitaḥ param | yadāhvayasi darpeṇa brāhmaṇapramukhāñjanān

आज से मैं तुम्हारी युद्ध की लालसा दूर कर दूँगा — तुम, जो घमण्ड में ब्राह्मणों से लेकर सब लोगों को ललकारते फिरते हो।

दम्भोद्भव उवाच

श्लोक 29 (5.96.29)

यद्येतदस्त्रमस्मासु युक्तं तापस मन्यसे । एतेनापि त्वया योत्स्ये युद्धार्थी ह्यहमागतः ॥

yadyetadastramasmāsu yuktaṃ tāpasa manyase | etenāpi tvayā yotsye yuddhārthī hyahamāgataḥ

हे तपस्वी, यदि तुम हमारे विरुद्ध इसी अस्त्र को उचित समझते हो, तो मैं इसी से तुमसे लड़ूँगा, क्योंकि मैं युद्ध के लिए ही आया हूँ।

राम उवाच

श्लोक 30 (5.96.30)

इत्युक्त्वा शरवर्षेण सर्वतः समवाकिरत् । दम्भोद्भवस्तापसं तं जिघांसुः सहसैनिकः ॥

ityuktvā śaravarṣeṇa sarvataḥ samavākirat | dambhodbhavastāpasaṃ taṃ jighāṃsuḥ sahasainikaḥ

यह कहकर अपने सैनिकों सहित दम्भोद्भव ने उस तपस्वी को मार डालने की इच्छा से चारों ओर से बाणों की वर्षा से ढक दिया।

श्लोक 31 (5.96.31)

तस्य तानस्यतो घोरानिषून्परतनुच्छिदः । कदर्थीकृत्य स मुनिरिषीकाभिः समार्पयत् ॥

tasya tānasyato ghorāniṣūnparatanucchidaḥ | kadarthīkṛtya sa muniriṣīkābhiḥ samārpayat

वह शत्रुओं के शरीर चीर देने वाले भयंकर बाण चला रहा था; मुनि ने उन्हें निष्फल कर दिया और सींकों से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 32 (5.96.32)

ततोऽस्मै प्रासृजद्धोरमैषीकमपराजितः । अस्त्रमप्रतिसन्धेयं तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tato'smai prāsṛjaddhoramaiṣīkamaparājitaḥ | astramapratisandheyaṃ tadadbhutamivābhavat

तब उस अपराजित मुनि ने उस पर भयंकर ऐषीक अस्त्र छोड़ा, जिसका कोई प्रतिकार नहीं है; वह एक अद्भुत दृश्य था।

श्लोक 33 (5.96.33)

तेषामक्षीणि कर्णांश्च नासिकाश्चैव मायया । निमित्तवेधी स मुनिरिषीकाभिः समार्पयत् ॥

teṣāmakṣīṇi karṇāṃśca nāsikāścaiva māyayā | nimittavedhī sa muniriṣīkābhiḥ samārpayat

लक्ष्य-भेद में अचूक उस मुनि ने अपनी माया-शक्ति से सींकों द्वारा उनकी आँखें, कान और नाक बींध दिए।

श्लोक 34 (5.96.34)

स दृष्ट्वा श्वेतमाकाशमिषीकाभिः समाचितम् । पादयोर्न्यपतद्राजा स्वस्ति मेऽस्त्विति चाब्रवीत् ॥

sa dṛṣṭvā śvetamākāśamiṣīkābhiḥ samācitam | pādayornyapatadrājā svasti me'stviti cābravīt

आकाश को सींकों से भरकर सफ़ेद हुआ देखकर राजा उनके चरणों में गिर पड़ा और बोला — 'मेरी रक्षा कीजिए!'

श्लोक 35 (5.96.35)

तमब्रवीन्नरो राजञ्शरण्यः शरणैषिणाम् । ब्रह्मण्यो भव धर्मात्मा मा च स्मैवं पुनः कृथाः ॥

tamabravīnnaro rājañśaraṇyaḥ śaraṇaiṣiṇām | brahmaṇyo bhava dharmātmā mā ca smaivaṃ punaḥ kṛthāḥ

हे राजन्, शरणागतों को शरण देने वाले नर ने उससे कहा — 'ब्राह्मणों का आदर करने वाले और धर्मात्मा बनो, और फिर कभी ऐसा मत करना।'

नर उवाच

श्लोक 36 (5.96.36)

नैतादृक्पुरुषो राजन्क्षत्रधर्ममनुस्मरन् । मनसा नृपशार्दूल भवेत्परपुरञ्जयः ॥

naitādṛkpuruṣo rājankṣatradharmamanusmaran | manasā nṛpaśārdūla bhavetparapurañjayaḥ

हे राजन्, हे नृपश्रेष्ठ, शत्रुओं के नगर जीतने वाले, जो पुरुष क्षत्रिय-धर्म को स्मरण रखता है उसे मन से भी ऐसा नहीं होना चाहिए।

श्लोक 37 (5.96.37)

मा च दर्पसमाविष्टः क्षेप्सीः कांश्चित्कदाचन । अल्पीयांसं विशिष्टं वा तत्ते राजन्समाहितम् ॥

mā ca darpasamāviṣṭaḥ kṣepsīḥ kāṃścitkadācana | alpīyāṃsaṃ viśiṣṭaṃ vā tatte rājansamāhitam

अहंकार में भरकर कभी किसी का अपमान मत करना, चाहे वह तुमसे छोटा हो या बड़ा; हे राजन्, यही तुम्हारे लिए उचित है।

श्लोक 38 (5.96.38)

कृतप्रज्ञो वीतलोभो निरहङ्कार आत्मवान् । दान्तः क्षान्तो मृदुः सौम्य प्रजाः पालय पार्थिव ॥

kṛtaprajño vītalobho nirahaṅkāra ātmavān | dāntaḥ kṣānto mṛduḥ saumya prajāḥ pālaya pārthiva

हे सौम्य, बुद्धिमान, लोभरहित, अहंकारशून्य, आत्मवान, संयमी, क्षमाशील और कोमल बनकर प्रजा का पालन करो, हे राजन्।

श्लोक 39 (5.96.39)

मास्म भूयः क्षिपेः कंचिदविदित्वा बलाबलम् । अनुज्ञातः स्वस्ति गच्छ मैवं भूयः समाचरेः । कुशलं ब्राह्मणान्पृच्छेरावयोर्वचनाद्भृशम् ॥

māsma bhūyaḥ kṣipeḥ kaṃcidaviditvā balābalam | anujñātaḥ svasti gaccha maivaṃ bhūyaḥ samācareḥ | kuśalaṃ brāhmaṇānpṛccherāvayorvacanādbhṛśam

किसी का बल और दुर्बलता जाने बिना फिर कभी उसका अपमान मत करना। हम तुम्हें आज्ञा देते हैं; कुशलपूर्वक जाओ और फिर ऐसा आचरण मत करना। हम दोनों की ओर से ब्राह्मणों से भली-भाँति कुशल पूछना।

राम उवाच

श्लोक 40 (5.96.40)

ततो राजा तयोः पादावभिवाद्य महात्मनोः । प्रत्याजगाम स्वपुरं धर्मं चैवाचरद्भृशम् ॥

tato rājā tayoḥ pādāvabhivādya mahātmanoḥ | pratyājagāma svapuraṃ dharmaṃ caivācaradbhṛśam

तब राजा उन दोनों महात्माओं के चरणों में प्रणाम करके अपने नगर लौट गया और पूरी निष्ठा से धर्म का आचरण करने लगा।

श्लोक 41 (5.96.41)

सुमहच्चापि तत्कर्म यन्नरेण कृतं पुरा । ततो गुणैः सुबहुभिः श्रेष्ठो नारायणोऽभवत् ॥

sumahaccāpi tatkarma yannareṇa kṛtaṃ purā | tato guṇaiḥ subahubhiḥ śreṣṭho nārāyaṇo'bhavat

नर ने प्राचीन काल में जो कर्म किया वह बहुत महान था; फिर भी अपने बहुत-से गुणों के कारण नारायण उनसे भी श्रेष्ठ थे।

श्लोक 42 (5.96.42)

तस्माद्यावद्धनुःश्रेष्ठे गाण्डीवेऽस्त्रं न युज्यते । तावत्त्वं मानमुत्सृज्य गच्छ राजन्धनञ्जयम् ॥

tasmādyāvaddhanuḥśreṣṭhe gāṇḍīve'straṃ na yujyate | tāvattvaṃ mānamutsṛjya gaccha rājandhanañjayam

इसलिए, हे राजन्, जब तक धनुषों में श्रेष्ठ गाण्डीव पर अस्त्र नहीं चढ़ाया जाता, तब तक अभिमान छोड़कर धनंजय के पास चले जाओ।

श्लोक 43 (5.96.43)

काकुदीकं शुकं नाकमक्षिसन्तर्जनं तथा । सन्तानं नर्तकं घोरमास्यमोदकमष्टमम् ॥

kākudīkaṃ śukaṃ nākamakṣisantarjanaṃ tathā | santānaṃ nartakaṃ ghoramāsyamodakamaṣṭamam

काकुदीक, शुक, नाक, अक्षिसन्तर्जन, सन्तान, भयंकर नर्तक, और आठवाँ आस्यमोदक —

श्लोक 44 (5.96.44)

एतैर्विद्धाः सर्व एव मरणं यान्ति मानवाः । उन्मत्ताश्च विचेष्टन्ते नष्टसंज्ञा विचेतसः ॥

etairviddhāḥ sarva eva maraṇaṃ yānti mānavāḥ | unmattāśca viceṣṭante naṣṭasaṃjñā vicetasaḥ

इनसे बिंधे हुए सभी मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होते हैं, अथवा उन्मत्त होकर छटपटाते हैं, संज्ञाहीन और चेतनाहीन हो जाते हैं।

श्लोक 45 (5.96.45)

स्वपन्ति च प्लवन्ते च च्छर्दयन्ति च मानवाः । मूत्रयन्ते च सततं रुदन्ति च हसन्ति च ॥

svapanti ca plavante ca cchardayanti ca mānavāḥ | mūtrayante ca satataṃ rudanti ca hasanti ca

ऐसे मनुष्य सो जाते हैं, उछलने-कूदने लगते हैं, वमन करते हैं, लगातार मूत्र त्यागते हैं, रोते हैं और हँसते हैं।

श्लोक 46 (5.96.46)

कामक्रोधौ लोभमोहौ मदमानौ तथैव च । मात्सर्याहङ्कृती चैव क्रमादेत उदाहृताः ॥

kāmakrodhau lobhamohau madamānau tathaiva ca | mātsaryāhaṅkṛtī caiva kramādeta udāhṛtāḥ

काम और क्रोध, लोभ और मोह, मद और मान, मात्सर्य और अहंकार — क्रम से ये ही वे आठ कहे गए हैं।

श्लोक 47 (5.96.47)

निर्माता सर्वलोकानामीश्वरः सर्वकर्मवित् । यस्य नारायणो बन्धुरर्जुनो दुःसहो युधि ॥

nirmātā sarvalokānāmīśvaraḥ sarvakarmavit | yasya nārāyaṇo bandhurarjuno duḥsaho yudhi

समस्त लोकों के निर्माता और सब कर्मों को जानने वाले ईश्वर नारायण हैं; जिसके बन्धु नारायण हैं, वह अर्जुन युद्ध में असह्य है।

श्लोक 48 (5.96.48)

कस्तमुत्सहते जेतुं त्रिषु लोकेषु भारत । वीरं कपिध्वजं जिष्णुं यस्य नास्ति समो युधि ॥

kastamutsahate jetuṃ triṣu lokeṣu bhārata | vīraṃ kapidhvajaṃ jiṣṇuṃ yasya nāsti samo yudhi

हे भारत, तीनों लोकों में कौन उस वीर को जीतने का साहस कर सकता है — कपिध्वज, विजयी अर्जुन को, जिसकी युद्ध में कोई बराबरी नहीं?

श्लोक 49 (5.96.49)

असङ्ख्येया गुणाः पार्थे तद्विशिष्टो जनार्दनः । त्वमेव भूयो जानासि कुन्तीपुत्रं धनञ्जयम् ॥

asaṅkhyeyā guṇāḥ pārthe tadviśiṣṭo janārdanaḥ | tvameva bhūyo jānāsi kuntīputraṃ dhanañjayam

पार्थ में असंख्य गुण हैं, और जनार्दन उनसे भी बढ़कर हैं। कुन्तीपुत्र धनंजय को तो तुम स्वयं भली-भाँति जानते हो।

श्लोक 50 (5.96.50)

नरनारायणौ यौ तौ तावेवार्जुनकेशवौ । विजानीहि महाराज प्रवीरौ पुरुषोत्तमौ ॥

naranārāyaṇau yau tau tāvevārjunakeśavau | vijānīhi mahārāja pravīrau puruṣottamau

हे महाराज, जान लो कि जो नर और नारायण थे, वे ही अर्जुन और केशव हैं — दोनों महावीर और पुरुषोत्तम।

श्लोक 51 (5.96.51)

यद्येतदेवं जानासि न च मामभिशङ्कसे । आर्यां मतिं समास्थाय शाम्य भारत पाण्डवैः ॥

yadyetadevaṃ jānāsi na ca māmabhiśaṅkase | āryāṃ matiṃ samāsthāya śāmya bhārata pāṇḍavaiḥ

यदि तुम इसे ऐसा ही जानते हो और मुझ पर संदेह नहीं करते, तो हे भारत, श्रेष्ठ बुद्धि अपनाकर पाण्डवों से सन्धि कर लो।

श्लोक 52 (5.96.52)

अथ चेन्मन्यसे श्रेयो न मे भेदो भवेदिति । प्रशाम्य भरतश्रेष्ठ मा च युद्धे मनः कृथाः ॥

atha cenmanyase śreyo na me bhedo bhavediti | praśāmya bharataśreṣṭha mā ca yuddhe manaḥ kṛthāḥ

और यदि तुम यह कल्याणकारी समझते हो कि तुम्हारे कुल में फूट न पड़े, तो हे भरतश्रेष्ठ, सन्धि कर लो और युद्ध में मन मत लगाओ।

श्लोक 53 (5.96.53)

भवतां च कुरुश्रेष्ठ कुलं बहुमतं भुवि । तत्तथैवास्तु भद्रं ते स्वार्थमेवोपचिन्तय ॥

bhavatāṃ ca kuruśreṣṭha kulaṃ bahumataṃ bhuvi | tattathaivāstu bhadraṃ te svārthamevopacintaya

हे कुरुश्रेष्ठ, तुम्हारा कुल पृथ्वी पर बहुत सम्मानित है। वह वैसा ही बना रहे — तुम्हारा कल्याण हो! अपने सच्चे हित का विचार करो।

अध्याय 95अध्याय-सूचीअध्याय 97