उद्योग पर्व · अध्याय 97
कण्व का उपदेश और मातलि की वर-खोज
परशुराम के बाद कण्व ऋषि दुर्योधन से कहते हैं कि केवल ब्रह्मा, नर-नारायण और विष्णु ही अविनाशी हैं, शेष सब नष्ट होता है, और राजाओं को भी मरकर अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है; वे युधिष्ठिर से सन्धि का आग्रह करते हैं और चेताते हैं कि बलवान को भी कोई अधिक बलवान मिल ही जाता है। इसी प्रसंग में वे इन्द्र के सारथि मातलि की प्राचीन कथा आरम्भ करते हैं, जो अपनी सुन्दर कन्या गुणकेशी के लिए वर खोज रहा था। देवताओं और मनुष्यों में कोई योग्य वर न पाकर मातलि अपनी पत्नी सुधर्मा से परामर्श करके नागलोक में खोज करने का निश्चय करता है और पृथ्वी के भीतर प्रवेश करता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.97.1)
जामदग्न्यवचः श्रुत्वा कण्वोऽपि भगवानृषिः । दुर्योधनमिदं वाक्यमब्रवीत्कुरुसंसदि ॥
jāmadagnyavacaḥ śrutvā kaṇvo'pi bhagavānṛṣiḥ | duryodhanamidaṃ vākyamabravītkurusaṃsadi
जमदग्निपुत्र के वचन सुनकर भगवान् कण्व ऋषि ने भी कुरुओं की सभा में दुर्योधन से यह कहा —
कण्व उवाच
श्लोक 2 (5.97.2)
अक्षयश्चाव्ययश्चैव ब्रह्मा लोकपितामहः । तथैव भगवन्तौ तौ नरनारायणावृषी ॥
akṣayaścāvyayaścaiva brahmā lokapitāmahaḥ | tathaiva bhagavantau tau naranārāyaṇāvṛṣī
लोकपितामह ब्रह्मा अक्षय और अविनाशी हैं; उसी प्रकार वे दोनों भगवान् नर और नारायण ऋषि भी।
श्लोक 3 (5.97.3)
आदित्यानां हि सर्वेषां विष्णुरेकः सनातनः । अजय्यश्चाव्ययश्चैव शाश्वतः प्रभुरीश्वरः ॥
ādityānāṃ hi sarveṣāṃ viṣṇurekaḥ sanātanaḥ | ajayyaścāvyayaścaiva śāśvataḥ prabhurīśvaraḥ
सब आदित्यों में केवल विष्णु सनातन हैं — अजेय, अविनाशी, शाश्वत, समर्थ ईश्वर।
श्लोक 4 (5.97.4)
निमित्तमरणाश्चान्ये चन्द्रसूर्यौ मही जलम् । वायुरग्निस्तथाऽऽकाशं ग्रहास्तारागणास्तथा ॥
nimittamaraṇāścānye candrasūryau mahī jalam | vāyuragnistathā''kāśaṃ grahāstārāgaṇāstathā
शेष सब किसी निमित्त के समाप्त होने पर मरने वाले हैं — चन्द्रमा और सूर्य, पृथ्वी और जल, वायु, अग्नि और आकाश, ग्रह और तारागण।
श्लोक 5 (5.97.5)
ते च क्षयान्ते जगतो हित्वा लोकत्रयं सदा । क्षयं गच्छन्ति वै सर्वे सृज्यन्ते च पुनः पुनः ॥
te ca kṣayānte jagato hitvā lokatrayaṃ sadā | kṣayaṃ gacchanti vai sarve sṛjyante ca punaḥ punaḥ
जगत् के प्रलय के समय वे सब तीनों लोकों को छोड़कर नष्ट हो जाते हैं, और बार-बार फिर रचे जाते हैं।
श्लोक 6 (5.97.6)
मुहूर्तमरणास्त्वन्ये मानुषा मृगपक्षिणः । तैर्यग्योन्याश्च ये चान्ये जीवलोकचरास्तथा ॥
muhūrtamaraṇāstvanye mānuṣā mṛgapakṣiṇaḥ | tairyagyonyāśca ye cānye jīvalokacarāstathā
अन्य प्राणी क्षणभर में मरने वाले हैं — मनुष्य, पशु-पक्षी, तिर्यक्-योनि के जीव और जीवलोक में विचरने वाले दूसरे सब प्राणी।
श्लोक 7 (5.97.7)
भूयिष्ठेन तु राजानः श्रियं भुक्त्वाऽऽयुषः क्षये । तरुणाः प्रतिपद्यन्ते भोक्तुं सुकृतदुष्कृते ॥
bhūyiṣṭhena tu rājānaḥ śriyaṃ bhuktvā''yuṣaḥ kṣaye | taruṇāḥ pratipadyante bhoktuṃ sukṛtaduṣkṛte
राजा लोग प्रायः ऐश्वर्य भोगकर आयु क्षीण होने पर, युवावस्था में ही, अपने पुण्य और पाप का फल भोगने चले जाते हैं।
श्लोक 8 (5.97.8)
स भवान्धर्मपुत्रेण शमं कर्तुमिहार्हसि । पाण्डवाः कुरवश्चैव पालयन्तु वसुन्धराम् ॥
sa bhavāndharmaputreṇa śamaṃ kartumihārhasi | pāṇḍavāḥ kuravaścaiva pālayantu vasundharām
इसलिए तुम्हें यहाँ धर्मपुत्र से सन्धि कर लेनी चाहिए। पाण्डव और कौरव दोनों मिलकर पृथ्वी का पालन करें।
श्लोक 9 (5.97.9)
बलवानहमित्येव न मन्तव्यं सुयोधन । बलवन्तो बलिभ्यो हि दृश्यन्ते पूरुषर्षभ ॥
balavānahamityeva na mantavyaṃ suyodhana | balavanto balibhyo hi dṛśyante pūruṣarṣabha
हे सुयोधन, यह मत सोचो कि 'मैं बलवान हूँ।' हे पुरुषश्रेष्ठ, बलवानों से भी अधिक बलवान देखे जाते हैं।
श्लोक 10 (5.97.10)
न बलं बलिनां मध्ये बलं भवति कौरव । बलवन्तो हि ते सर्वे पाण्डवा देवविक्रमाः ॥
na balaṃ balināṃ madhye balaṃ bhavati kaurava | balavanto hi te sarve pāṇḍavā devavikramāḥ
हे कौरव, सच्चे बलवानों के बीच सेना कोई बल नहीं होती; और वे सब पाण्डव बलवान हैं, देवताओं जैसे पराक्रमी।
श्लोक 11 (5.97.11)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । मातलेर्दातुकामस्य कन्यां मृगयतो वरम् ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | mātalerdātukāmasya kanyāṃ mṛgayato varam
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं — मातलि का, जो अपनी कन्या का विवाह करना चाहता था और वर खोज रहा था।
श्लोक 12 (5.97.12)
मतस्त्रिलोकराजस्य मातलिर्नाम सारथिः । तस्यैकैव कुले कन्या रूपतो लोकविश्रुता ॥
matastrilokarājasya mātalirnāma sārathiḥ | tasyaikaiva kule kanyā rūpato lokaviśrutā
त्रिलोकी के राजा का एक माना हुआ सारथि था, जिसका नाम मातलि था। उसके कुल में एक ही कन्या थी, जो अपने रूप के लिए संसार भर में प्रसिद्ध थी।
श्लोक 13 (5.97.13)
गुणकेशीति विख्याता नाम्ना सा देवरूपिणी । श्रिया च वपुषा चैव स्त्रियोऽन्याःसाऽतिरिच्यते ॥
guṇakeśīti vikhyātā nāmnā sā devarūpiṇī | śriyā ca vapuṣā caiva striyo'nyāḥsā'tiricyate
वह गुणकेशी नाम से विख्यात थी और देवताओं जैसी रूपवती थी; शोभा और शरीर के सौन्दर्य में वह अन्य सब स्त्रियों से बढ़कर थी।
श्लोक 14 (5.97.14)
तस्याः प्रदानसमयं मातलिः सह भार्यया । ज्ञात्वा विममृशे राजंस्तत्परः परिचिन्तयन् ॥
tasyāḥ pradānasamayaṃ mātaliḥ saha bhāryayā | jñātvā vimamṛśe rājaṃstatparaḥ paricintayan
हे राजन्, उसके विवाह का समय आया जानकर मातलि अपनी पत्नी के साथ चिन्तित हुआ और उसी में लीन होकर सोचने लगा।
मातलिरुवाच
श्लोक 15 (5.97.15)
धिक्खल्वलघुशीलानामुच्छ्रितानां यशस्विनाम् । नराणां मृदुसत्वानां कुले कन्याप्ररोहणम् ॥
dhikkhalvalaghuśīlānāmucchritānāṃ yaśasvinām | narāṇāṃ mṛdusatvānāṃ kule kanyāprarohaṇam
हाय! जो पुरुष गम्भीर स्वभाव वाले, ऊँचे पद पर स्थित, यशस्वी और कोमल प्रकृति के हैं, उनके कुल में कन्या का बड़ा होना भी कितना कष्टदायक है!
श्लोक 16 (5.97.16)
मातुः कुलं पितृकुलं यत्र चैव प्रदीयते । कुलत्रयं संशयितं कुरुते कन्यका सताम् ॥
mātuḥ kulaṃ pitṛkulaṃ yatra caiva pradīyate | kulatrayaṃ saṃśayitaṃ kurute kanyakā satām
सज्जनों के लिए कन्या तीन कुलों को संशय में डाल देती है — माता का कुल, पिता का कुल और वह कुल जिसमें वह ब्याही जाती है।
श्लोक 17 (5.97.17)
देवमानुषलोकौ द्वौ मानुषेणैव चक्षुषा । अपगाह्यैव विचितौ न च मे रोचते वरः ॥
devamānuṣalokau dvau mānuṣeṇaiva cakṣuṣā | apagāhyaiva vicitau na ca me rocate varaḥ
मैंने देवलोक और मनुष्यलोक दोनों में मनुष्य की दृष्टि से भीतर तक खोज की, पर कोई वर मुझे नहीं भाता।
कण्व उवाच
श्लोक 18 (5.97.18)
न देवान्नैव दितिजान्न गन्धर्वान्न मानुषान् । अरोचयद्वरकृते तथैव बहुलानृषीन् ॥
na devānnaiva ditijānna gandharvānna mānuṣān | arocayadvarakṛte tathaiva bahulānṛṣīn
न देवता, न दैत्य, न गन्धर्व, न मनुष्य, और न ही बहुत-से ऋषि उसे वर के रूप में भाए।
श्लोक 19 (5.97.19)
भार्यया तु स संमन्त्र्य सह रात्रौ सुधर्मया । मातलिर्नागलोकाय चकार गमने मतिम् ॥
bhāryayā tu sa saṃmantrya saha rātrau sudharmayā | mātalirnāgalokāya cakāra gamane matim
तब रात में अपनी पत्नी सुधर्मा से परामर्श करके मातलि ने नागलोक जाने का निश्चय किया।
मातलिरुवाच
श्लोक 20 (5.97.20)
न मे देवमनुष्येषु गुणकेश्याः समो वरः । रूपतो दृश्यते कश्चिन्नागेषु भविता ध्रुवम् ॥
na me devamanuṣyeṣu guṇakeśyāḥ samo varaḥ | rūpato dṛśyate kaścinnāgeṣu bhavitā dhruvam
देवताओं और मनुष्यों में रूप में गुणकेशी के समान कोई वर दिखाई नहीं देता; नागों में अवश्य कोई होगा।
कण्व उवाच
श्लोक 21 (5.97.21)
इत्यामन्त्र्य सुधर्मां स कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । कन्यां शिरस्युपाघ्राय प्रविवेश महीतलम् ॥
ityāmantrya sudharmāṃ sa kṛtvā cābhipradakṣiṇam | kanyāṃ śirasyupāghrāya praviveśa mahītalam
यह कहकर उसने सुधर्मा से विदा ली, उसकी प्रदक्षिणा की, कन्या का सिर सूँघकर (स्नेह से आशीर्वाद देकर) पृथ्वी के भीतर प्रवेश किया।