विराट पर्व · अध्याय 1
पाण्डवों का ब्राह्मणों से विदा लेना
जनमेजय पूछते हैं कि पाण्डवों और द्रौपदी ने विराटनगर में अज्ञात रहकर समय कैसे बिताया। वैशम्पायन बताते हैं कि युधिष्ठिर ने ब्राह्मण को अरणी लौटा दी और आने वाले अज्ञातवास के तेरहवें वर्ष की चिन्ता में, वनवास के साथी ब्राह्मणों से विदा माँगते हुए वे मूर्च्छित हो गए। धौम्य उन देवताओं के उदाहरण देकर उन्हें सान्त्वना देते हैं जिन्होंने छिपकर रहते हुए शत्रुओं को जीता, और भीम आज्ञापालन का वचन देते हैं। ब्राह्मणों और सेवकों के घर लौट जाने पर पाण्डव धौम्य और द्रौपदी के साथ थोड़ी दूर जाकर आगे की योजना बनाने बैठते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (4.1.1)
कथं विराटनगरे मम पूर्वपितामहाः । अज्ञातवासमुषिता दुर्योधनभयार्दिताः ॥
kathaṃ virāṭanagare mama pūrvapitāmahāḥ | ajñātavāsamuṣitā duryodhanabhayārditāḥ
मेरे प्रपितामहों ने दुर्योधन के भय से पीड़ित होकर विराटनगर में अपना अज्ञातवास किस प्रकार बिताया?
श्लोक 2 (4.1.2)
पतिव्रता महाभागा सततं सुखभागिनी । द्रौपदी सा कथं ब्रह्मन्नज्ञाता दुःखिताऽवसत् ॥
pativratā mahābhāgā satataṃ sukhabhāginī | draupadī sā kathaṃ brahmannajñātā duḥkhitā'vasat
और हे ब्रह्मन्, वह पतिव्रता, महाभाग्यशालिनी, सदा सुख में रहने वाली द्रौपदी अज्ञात रहकर दुःख में कैसे रही?
श्लोक 3 (4.1.3)
ते च ब्राह्मणमुख्याश्च सूतपौरोगवैः सह । अज्ञातवासमुषिताः कथं च परिचारकाः ॥
te ca brāhmaṇamukhyāśca sūtapaurogavaiḥ saha | ajñātavāsamuṣitāḥ kathaṃ ca paricārakāḥ
और उनके साथ के प्रमुख ब्राह्मणों ने, सूतों और पाकशाला के अध्यक्षों सहित, तथा सेवकों ने अज्ञातवास का समय कैसे बिताया?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (4.1.4)
यथा विराटनगरे तव पूर्वपितामहाः । अज्ञातवासमुषितास्तावद्वक्ष्यामि तच्छृणु ॥
yathā virāṭanagare tava pūrvapitāmahāḥ | ajñātavāsamuṣitāstāvadvakṣyāmi tacchṛṇu
सुनो, तुम्हारे प्रपितामहों ने विराटनगर में जिस प्रकार अज्ञातवास किया, वह मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 5 (4.1.5)
तथा स तान्वराँल्लब्ध्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । गत्वाऽऽश्रमं ब्राह्मणेभ्य आचख्यौ वृत्तमात्मनः ॥
tathā sa tānvarām̐llabdhvā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | gatvā''śramaṃ brāhmaṇebhya ācakhyau vṛttamātmanaḥ
इस प्रकार वे वर पाकर धर्मराज युधिष्ठिर आश्रम में गए और ब्राह्मणों को अपना सारा वृत्तान्त सुनाया।
श्लोक 6 (4.1.6)
कथयित्वा च तत्सर्वं ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिरः । अरणीसहितं भाण्डं ब्राह्मणाय न्यवेदयत् ॥
kathayitvā ca tatsarvaṃ brāhmaṇebhyo yudhiṣṭhiraḥ | araṇīsahitaṃ bhāṇḍaṃ brāhmaṇāya nyavedayat
ब्राह्मणों को वह सब बताकर युधिष्ठिर ने अरणी सहित वह पात्र उस ब्राह्मण को लौटा दिया।
श्लोक 7 (4.1.7)
ततो युधिष्ठिरो राजा कुन्तीपुत्रो दृढव्रतः । समाहूयानुजान्सर्वानिति होवाच भारत ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā kuntīputro dṛḍhavrataḥ | samāhūyānujānsarvāniti hovāca bhārata
हे भारत, तब दृढ़व्रती कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपने सब छोटे भाइयों को बुलाकर यों कहा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 8 (4.1.8)
द्वादशेमानि वर्षाणि राष्ट्राद्विप्रोषिता वयम् । छद्मना हृतराज्याश्च निस्वाश्च बहुशः कृताः ॥
dvādaśemāni varṣāṇi rāṣṭrādviproṣitā vayam | chadmanā hṛtarājyāśca nisvāśca bahuśaḥ kṛtāḥ
"ये बारह वर्ष हम राज्य से निर्वासित होकर रहे हैं। छल से हमारा राज्य छीना गया और हमें बार-बार निर्धन बनाया गया।
श्लोक 9 (4.1.9)
उषिताश्च वने वासं यथा द्वादश वत्सरान् । अज्ञातचर्यां वत्स्यामश्छन्ना वर्षं त्रयोदशम् ॥
uṣitāśca vane vāsaṃ yathā dvādaśa vatsarān | ajñātacaryāṃ vatsyāmaśchannā varṣaṃ trayodaśam
जैसे हमने बारह वर्ष वन में बिताए, वैसे ही अब तेरहवाँ वर्ष हम छिपकर, अज्ञात रूप में बिताएँगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (4.1.10)
धर्मेण तेऽभ्यनुज्ञाताः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः । अज्ञातवासं वत्स्यन्तश्छन्ना वर्षं त्रयोदशम् ॥
dharmeṇa te'bhyanujñātāḥ pāṇḍavāḥ satyavikramāḥ | ajñātavāsaṃ vatsyantaśchannā varṣaṃ trayodaśam
धर्म की अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव अब तेरहवाँ वर्ष छिपकर, अज्ञातवास में बिताने वाले थे।
श्लोक 11 (4.1.11)
उपोपविश्य विद्वांसः स्नातकाः संशितव्रताः । ये तत्र ब्राह्मणा आसन्वनवाससहायिनः । ये च भक्ता वसन्ति स्म वनवासे तपस्विनः ॥
upopaviśya vidvāṃsaḥ snātakāḥ saṃśitavratāḥ | ye tatra brāhmaṇā āsanvanavāsasahāyinaḥ | ye ca bhaktā vasanti sma vanavāse tapasvinaḥ
वे उन विद्वान, कठोर व्रत वाले स्नातकों के पास जाकर बैठे—जो ब्राह्मण वहाँ वनवास में उनके सहायक रहे थे, और जो भक्त तपस्वी वनवास में उनके साथ रहते थे।
श्लोक 12 (4.1.12)
तानब्रुवन्महात्मानो हृष्टाः प्राञ्जलयः स्थिताः । अभ्यनुज्ञापयिष्यन्तस्तद्विवासं धृतव्रताः ॥
tānabruvanmahātmāno hṛṣṭāḥ prāñjalayaḥ sthitāḥ | abhyanujñāpayiṣyantastadvivāsaṃ dhṛtavratāḥ
हाथ जोड़कर खड़े हुए, प्रसन्नचित्त और व्रत में दृढ़ महात्मा पाण्डवों ने उस प्रवास के लिए अनुमति लेने की इच्छा से उनसे कहा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 13 (4.1.13)
विदितं भवतां सर्वं धार्तराष्ट्रैर्यथा वयम् । छद्मना हृतराज्याश्च निस्वाश्च बहुशः कृताः ॥
viditaṃ bhavatāṃ sarvaṃ dhārtarāṣṭrairyathā vayam | chadmanā hṛtarājyāśca nisvāśca bahuśaḥ kṛtāḥ
"आप सब जानते हैं कि धृतराष्ट्र के पुत्रों ने किस प्रकार छल से हमारा राज्य छीन लिया और हमें बार-बार निर्धन कर दिया;
श्लोक 14 (4.1.14)
उषिताश्च वने वासं यथा द्वादशवत्सरान् । भवद्भिरेव सहिता वन्याहारा द्विजोत्तमाः ॥
uṣitāśca vane vāsaṃ yathā dvādaśavatsarān | bhavadbhireva sahitā vanyāhārā dvijottamāḥ
और हे द्विजश्रेष्ठो, किस प्रकार हम बारह वर्ष केवल आपके साथ, वन के आहार पर जीते हुए वन में रहे।
श्लोक 15 (4.1.15)
अज्ञातवाससमयं शेषं वर्षं त्रयोदशम् । तद्वत्स्यामो वयं छन्नास्तदनुज्ञातुमर्हथ ॥
ajñātavāsasamayaṃ śeṣaṃ varṣaṃ trayodaśam | tadvatsyāmo vayaṃ channāstadanujñātumarhatha
अब अज्ञातवास का शेष तेरहवाँ वर्ष बचा है। उसे हम छिपकर बिताएँगे; आप हमें अनुमति दें।
श्लोक 16 (4.1.16)
सुयोधनश्च दुष्टात्मा कर्णश्च सहसौबलः । जानन्तो विषमं कुर्युरस्मास्वत्यन्तवैरिणः ॥
suyodhanaśca duṣṭātmā karṇaśca sahasaubalaḥ | jānanto viṣamaṃ kuryurasmāsvatyantavairiṇaḥ
दुष्टात्मा सुयोधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि हमारे कट्टर शत्रु हैं; यदि ये हमें पहचान लें तो हमारा अनिष्ट करेंगे।
श्लोक 17 (4.1.17)
युक्तचाराश्च यत्ताश्च दाये स्वस्य जनस्य च । दुरात्मनां हि कस्तेषां विश्वासं गन्तुमर्हति ॥
yuktacārāśca yattāśca dāye svasya janasya ca | durātmanāṃ hi kasteṣāṃ viśvāsaṃ gantumarhati
वे गुप्तचर लगाए रहते हैं और अपनी सम्पत्ति तथा अपने लोगों के विषय में सदा सजग रहते हैं। ऐसे दुरात्माओं पर कौन विश्वास कर सकता है?
श्लोक 18 (4.1.18)
अपि नस्तद्भवेद्भूयो यद्वयं ब्राह्मणैः सह । समस्तेषु च राष्ट्रेषु स्वराज्यस्था भवेम हि ॥
api nastadbhavedbhūyo yadvayaṃ brāhmaṇaiḥ saha | samasteṣu ca rāṣṭreṣu svarājyasthā bhavema hi
क्या फिर वह दिन आएगा जब हम ब्राह्मणों के साथ समस्त राष्ट्रों में अपने राज्य पर प्रतिष्ठित होंगे?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (4.1.19)
इत्युक्त्वा दुःखशोकार्तः शुचिर्धर्मसुतस्तदा । संमूर्च्छितोऽभवद्राजा सास्रकण्ठो युधिष्ठिरः ॥
ityuktvā duḥkhaśokārtaḥ śucirdharmasutastadā | saṃmūrcchito'bhavadrājā sāsrakaṇṭho yudhiṣṭhiraḥ
यह कहकर दुःख और शोक से पीड़ित, पवित्र धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर का कण्ठ आँसुओं से रुँध गया और वे मूर्च्छित हो गए।
श्लोक 20 (4.1.20)
तमथाश्वासयन्सर्वे ब्राह्मणा भ्रातृभिः सह ॥
tamathāśvāsayansarve brāhmaṇā bhrātṛbhiḥ saha
तब सब ब्राह्मणों ने उनके भाइयों के साथ मिलकर उन्हें ढाढ़स बँधाया।
श्लोक 21 (4.1.21)
प्रबुध्य दुःखमोहार्तो धौम्यं धर्मभृतांवरम् । प्रावैक्षत तदा राजा साश्रुकण्ठो युधिष्ठिरः ॥
prabudhya duḥkhamohārto dhaumyaṃ dharmabhṛtāṃvaram | prāvaikṣata tadā rājā sāśrukaṇṭho yudhiṣṭhiraḥ
होश में आने पर दुःख और मोह से व्याकुल राजा युधिष्ठिर ने, जिनका कण्ठ आँसुओं से भरा था, धर्मधारियों में श्रेष्ठ धौम्य की ओर देखा।
श्लोक 22 (4.1.22)
अथ धौम्योऽब्रवीद्वाक्यं महार्थं नृपतिं तदा । आश्वासयंस्तं स नृपं भ्रातॄंश्च ब्राह्मणैः सह ॥
atha dhaumyo'bravīdvākyaṃ mahārthaṃ nṛpatiṃ tadā | āśvāsayaṃstaṃ sa nṛpaṃ bhrātṝṃśca brāhmaṇaiḥ saha
तब धौम्य ने राजा से गम्भीर अर्थ वाले वचन कहे और ब्राह्मणों सहित राजा तथा उनके भाइयों को सान्त्वना दी।
धौम्य उवाच
श्लोक 23 (4.1.23)
राजन्विद्वान्भवान्दान्तः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः । नैवंविधाः प्रमुह्यन्ति धीराः कस्यांचिदापदि ॥
rājanvidvānbhavāndāntaḥ satyasandho jitendriyaḥ | naivaṃvidhāḥ pramuhyanti dhīrāḥ kasyāṃcidāpadi
"राजन्, आप विद्वान, संयमी, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं। ऐसे धीर पुरुष किसी भी आपत्ति में मोहित नहीं होते।
श्लोक 24 (4.1.24)
देवैरप्यापदः प्राप्ताश्छन्नैश्च बहुभिस्तदा । तत्रतत्र सपत्नानां निग्रहार्थं महात्मभिः ॥
devairapyāpadaḥ prāptāśchannaiśca bahubhistadā | tatratatra sapatnānāṃ nigrahārthaṃ mahātmabhiḥ
महात्मा देवताओं पर भी विपत्तियाँ आई हैं, और उनमें से अनेक ने शत्रुओं का दमन करने के लिए जहाँ-तहाँ छिपकर निवास किया है।
श्लोक 25 (4.1.25)
दितिपुत्रैर्हृते राज्ये देवराजः सुदुःखितः । ब्रह्माणं तोषयिष्यंश्च ब्रह्मरूपं विधाय च ॥
ditiputrairhṛte rājye devarājaḥ suduḥkhitaḥ | brahmāṇaṃ toṣayiṣyaṃśca brahmarūpaṃ vidhāya ca
जब दिति के पुत्रों ने राज्य छीन लिया, तब अत्यन्त दुःखी देवराज ने ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण का रूप धारण किया;
श्लोक 26 (4.1.26)
इन्द्रेण निषधं प्राप्य गिरिप्रस्थाह्वये पुरे । छन्नेनोष्य कृतं कर्म द्विषतां बलनिग्रहे ॥
indreṇa niṣadhaṃ prāpya giriprasthāhvaye pure | channenoṣya kṛtaṃ karma dviṣatāṃ balanigrahe
इन्द्र ने निषध देश में गिरिप्रस्थ नामक नगर में जाकर छिपकर निवास किया और शत्रुओं के बल को तोड़ने का कार्य किया।
श्लोक 27 (4.1.27)
प्रसादाद्ब्रह्मणो राजन्दितेः पुत्रान्महाबलान् । निर्जित्य तरसा शत्रून्पुनर्लोकाञ्जुगोप च ॥
prasādādbrahmaṇo rājanditeḥ putrānmahābalān | nirjitya tarasā śatrūnpunarlokāñjugopa ca
राजन्, ब्रह्मा की कृपा से उसने अपने शत्रुओं—दिति के महाबली पुत्रों—को वेग से जीतकर फिर से लोकों की रक्षा की।
श्लोक 28 (4.1.28)
विष्णुनाऽश्मगिरिं प्राप्य तदादित्यां निवत्स्यता । गर्भे वधार्थं दैत्यानामज्ञातेनोषितं चिरम् ॥
viṣṇunā'śmagiriṃ prāpya tadādityāṃ nivatsyatā | garbhe vadhārthaṃ daityānāmajñātenoṣitaṃ ciram
विष्णु ने भी दैत्यों के वध के लिए अदिति के गर्भ में निवास करने का निश्चय कर अश्मगिरि पर जाकर दीर्घकाल तक अज्ञात रूप में वास किया।
श्लोक 29 (4.1.29)
प्रोष्य वामनरूपेण च्छन्नेन ब्रह्मचारिणा । बलेर्यथा हृतं राज्यं विक्रमैस्तच्च ते श्रुतम् ॥
proṣya vāmanarūpeṇa cchannena brahmacāriṇā | baleryathā hṛtaṃ rājyaṃ vikramaistacca te śrutam
और आपने सुना ही है कि उन्होंने ब्रह्मचारी वामन के रूप में छिपकर रहते हुए अपने पगों से बलि का राज्य कैसे हर लिया।
श्लोक 30 (4.1.30)
और्वेण वसता छन्नमूरौ ब्रह्मर्षिणा तदा । यत्कृतं तात लोकेषु तच्च सर्वं श्रुतं त्वया ॥
aurveṇa vasatā channamūrau brahmarṣiṇā tadā | yatkṛtaṃ tāta lokeṣu tacca sarvaṃ śrutaṃ tvayā
तात, ब्रह्मर्षि और्व ने जंघा में छिपकर रहते हुए लोकों में जो कुछ किया, वह सब भी आपने सुना है।
श्लोक 31 (4.1.31)
प्रच्छन्नेनापि सर्वत्र हरिणा वृत्रनिग्रहे । वज्रं प्रविश्य शक्रस्य यत्कृतं तच्च ते श्रुतम् ॥
pracchannenāpi sarvatra hariṇā vṛtranigrahe | vajraṃ praviśya śakrasya yatkṛtaṃ tacca te śrutam
वृत्र-वध के समय हरि ने सर्वत्र छिपे रहकर, इन्द्र के वज्र में प्रवेश करके जो किया, वह भी आपने सुना है।
श्लोक 32 (4.1.32)
हुताशनेन यच्चापः प्रविश्य च्छन्नमूषितम् । विबुधानां हि यत्कर्म कृतं तच्चापि ते श्रुतम् ॥
hutāśanena yaccāpaḥ praviśya cchannamūṣitam | vibudhānāṃ hi yatkarma kṛtaṃ taccāpi te śrutam
और अग्नि ने जल में प्रवेश कर छिपकर रहते हुए देवताओं का जो कार्य किया, वह भी आपने सुना है।
श्लोक 33 (4.1.33)
यथा विवस्वता तात छन्नेनोत्तमतेजसा । निर्दग्धाः शत्रवः सर्वे वसता गवि वर्षशः ॥
yathā vivasvatā tāta channenottamatejasā | nirdagdhāḥ śatravaḥ sarve vasatā gavi varṣaśaḥ
इसी प्रकार, तात, परम तेजस्वी विवस्वान् (सूर्य) ने वर्षों तक पृथ्वी में छिपकर रहते हुए अपने सब शत्रुओं को भस्म कर दिया।
श्लोक 34 (4.1.34)
विष्णुना वसता चात्र गृहे दशरथस्य वै । दशग्रीवो हतश्छन्नं संयुगे भीमकर्मणा ॥
viṣṇunā vasatā cātra gṛhe daśarathasya vai | daśagrīvo hataśchannaṃ saṃyuge bhīmakarmaṇā
और भयंकर कर्म करने वाले विष्णु ने दशरथ के घर में छिपकर रहते हुए युद्ध में दशग्रीव रावण का वध किया।
श्लोक 35 (4.1.35)
एवमेते महात्मानः प्रच्छन्नास्तत्रतत्र हि । अजयञ्छात्रवान्मुख्यांस्तथा त्वमपि जेष्यसि ॥
evamete mahātmānaḥ pracchannāstatratatra hi | ajayañchātravānmukhyāṃstathā tvamapi jeṣyasi
इस प्रकार इन महात्माओं ने जहाँ-तहाँ छिपकर अपने प्रमुख शत्रुओं को जीता; वैसे ही आप भी विजय पाएँगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 36 (4.1.36)
इति धौम्येन धर्मज्ञो वाक्यैः स परिहर्षितः । शान्तबुद्धिः पुनर्भूत्वा व्यष्टम्भत युधिष्ठिरः ॥
iti dhaumyena dharmajño vākyaiḥ sa pariharṣitaḥ | śāntabuddhiḥ punarbhūtvā vyaṣṭambhata yudhiṣṭhiraḥ
धौम्य के इन वचनों से प्रसन्न होकर धर्मज्ञ युधिष्ठिर का मन फिर शान्त हुआ और उन्होंने धैर्य धारण किया।
श्लोक 37 (4.1.37)
अथाब्रवीन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबलः । राजानं बलिनां श्रेष्ठो गिरा संपरिहर्षयन् ॥
athābravīnmahābāhurbhīmaseno mahābalaḥ | rājānaṃ balināṃ śreṣṭho girā saṃpariharṣayan
तब बलवानों में श्रेष्ठ, महाबली, महाबाहु भीमसेन ने अपनी वाणी से राजा का उत्साह बढ़ाते हुए कहा—
भीम उवाच
श्लोक 38 (4.1.38)
अवेक्षय महाराज तव गाण्डीवधन्वना । धर्मार्थपरया बुद्ध्या न किंचित्साहसं कृतम् ॥
avekṣaya mahārāja tava gāṇḍīvadhanvanā | dharmārthaparayā buddhyā na kiṃcitsāhasaṃ kṛtam
"महाराज, देखिए—गाण्डीवधारी अर्जुन ने आपके कारण, धर्म और प्रयोजन पर टिकी बुद्धि से, कोई भी दुस्साहस नहीं किया।
श्लोक 39 (4.1.39)
सहदेवो मया नित्यं नकुलश्च निवारितौ । शक्तौ विध्वंसने तेषां शत्रुघ्नौ भीमविक्रमौ ॥
sahadevo mayā nityaṃ nakulaśca nivāritau | śaktau vidhvaṃsane teṣāṃ śatrughnau bhīmavikramau
और सहदेव तथा नकुल को, जो शत्रुओं का नाश करने में समर्थ, शत्रुघाती और भयानक पराक्रमी हैं, मैंने सदा रोके रखा है।
श्लोक 40 (4.1.40)
न वयं वर्त्म हास्यामो यस्मिन्योक्ष्यति नो भवान् । तद्विधत्तां भवान्सर्वं क्षिप्रं जेष्यामहे परान् ॥
na vayaṃ vartma hāsyāmo yasminyokṣyati no bhavān | tadvidhattāṃ bhavānsarvaṃ kṣipraṃ jeṣyāmahe parān
आप हमें जिस मार्ग पर लगाएँगे, हम उसे नहीं छोड़ेंगे। आप सब कुछ अपनी इच्छा से व्यवस्थित करें; हम शीघ्र ही शत्रुओं को जीत लेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 41 (4.1.41)
इत्युक्तो भीमसेनेन धर्मराजो युधिष्ठिरः । सुखोपविष्टो विद्वद्भिस्तापसैः संशितव्रतैः ॥
ityukto bhīmasenena dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | sukhopaviṣṭo vidvadbhistāpasaiḥ saṃśitavrataiḥ
भीमसेन के ऐसा कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर कठोर व्रत वाले विद्वान तपस्वियों के बीच सुखपूर्वक बैठे।
श्लोक 42 (4.1.42)
ये तद्भक्त्याऽभवंस्तस्मिन्वनवासे तपस्विनः । तानब्रवीन्महाप्राज्ञः शिष्टान्राजा कृताञ्जलिः । अभ्यनुज्ञापयिष्यन्वै तस्मिन्वासे धृतव्रतः ॥
ye tadbhaktyā'bhavaṃstasminvanavāse tapasvinaḥ | tānabravīnmahāprājñaḥ śiṣṭānrājā kṛtāñjaliḥ | abhyanujñāpayiṣyanvai tasminvāse dhṛtavrataḥ
जो तपस्वी उनकी भक्ति के कारण वनवास में उनके साथ रहे थे, उन शिष्ट जनों से परम बुद्धिमान, व्रत में दृढ़ राजा ने उस प्रवास के लिए अनुमति लेने की इच्छा से हाथ जोड़कर कहा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 43 (4.1.43)
विदितं भवतां सर्वैर्धार्तराष्ट्रैर्यथा वयम् । संमन्त्राहृतराज्याश्च निस्स्वाश्च बहुशः कृताः । उषिताः स्मो वने कृच्छ्रं तथा वर्षाणि द्वादश ॥
viditaṃ bhavatāṃ sarvairdhārtarāṣṭrairyathā vayam | saṃmantrāhṛtarājyāśca nissvāśca bahuśaḥ kṛtāḥ | uṣitāḥ smo vane kṛcchraṃ tathā varṣāṇi dvādaśa
"आप जानते हैं कि धृतराष्ट्र के सब पुत्रों ने षड्यन्त्र से हमारा राज्य छीना और हमें बार-बार निर्धन किया, तथा हम बारह वर्ष कष्ट सहते हुए वन में रहे।
श्लोक 44 (4.1.44)
अज्ञातचर्यासमयं शेषं वर्षं त्रयोदशम् । तद्वत्स्यामः क्वचिच्छन्नास्तदनुज्ञातुमर्हथ ॥
ajñātacaryāsamayaṃ śeṣaṃ varṣaṃ trayodaśam | tadvatsyāmaḥ kvacicchannāstadanujñātumarhatha
अब अज्ञातवास का शेष तेरहवाँ वर्ष है। उसे हम कहीं छिपकर बिताएँगे; आप हमें अनुमति दें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (4.1.45)
इत्युक्ता धर्मराजेन ब्राह्मणाः परमाशिषः । प्रयुज्यापृच्छ्य भरतान्यथास्वं प्रययुर्गृहान् ॥
ityuktā dharmarājena brāhmaṇāḥ paramāśiṣaḥ | prayujyāpṛcchya bharatānyathāsvaṃ prayayurgṛhān
धर्मराज के ऐसा कहने पर ब्राह्मणों ने उत्तम आशीर्वाद दिए और भरतवंशियों से विदा लेकर अपने-अपने घर चले गए।
श्लोक 46 (4.1.46)
सर्वे वेदविदो मुख्या यतयो मुनयस्तदा । आशीरुक्त्वा यथान्यायं पुनर्दर्शनकाङ्क्षिणः ॥
sarve vedavido mukhyā yatayo munayastadā | āśīruktvā yathānyāyaṃ punardarśanakāṅkṣiṇaḥ
सब प्रमुख वेदज्ञ, यति और मुनि यथोचित आशीर्वाद देकर, फिर दर्शन की अभिलाषा लिए विदा हुए।
श्लोक 47 (4.1.47)
ते तु भृत्याश्च दूताश्च शिल्पिनः परिचारकाः । अनुज्ञाप्य यथान्यायं पुनर्दर्शनकाङ्क्षिणः ॥
te tu bhṛtyāśca dūtāśca śilpinaḥ paricārakāḥ | anujñāpya yathānyāyaṃ punardarśanakāṅkṣiṇaḥ
उनके सेवक, दूत, शिल्पी और परिचारक भी यथोचित विदा लेकर, फिर मिलने की आकांक्षा के साथ चले गए।
श्लोक 48 (4.1.48)
सह धौम्येन विद्वांसस्तथा ते पञ्च पाण्डवाः । उत्थाय प्रययुर्वीराः कृष्णामादाय भारत ॥
saha dhaumyena vidvāṃsastathā te pañca pāṇḍavāḥ | utthāya prayayurvīrāḥ kṛṣṇāmādāya bhārata
हे भारत, तब वे पाँचों विद्वान वीर पाण्डव धौम्य के साथ उठे और कृष्णा (द्रौपदी) को साथ लेकर चल पड़े।
श्लोक 49 (4.1.49)
क्रोशमात्रमतिक्रम्य तस्माद्वासान्निमित्ततः । श्वोभूते मनुजव्याघ्राश्छन्नवासार्थमुद्यताः ॥
krośamātramatikramya tasmādvāsānnimittataḥ | śvobhūte manujavyāghrāśchannavāsārthamudyatāḥ
किसी प्रयोजन से उस निवास-स्थान से एक कोस आगे जाकर, अगले दिन वे नरश्रेष्ठ छिपकर रहने की तैयारी में लग गए।
श्लोक 50 (4.1.50)
पृथक् शास्त्रविदः सर्वे सर्वे मन्त्रविशारदाः । सन्धिविग्रहतत्वज्ञा मन्त्राय समुपाविशन् ॥
pṛthak śāstravidaḥ sarve sarve mantraviśāradāḥ | sandhivigrahatatvajñā mantrāya samupāviśan
वे सब शास्त्रों के ज्ञाता, सब मन्त्रणा में निपुण और सन्धि-विग्रह के तत्त्व को जानने वाले थे; वे अलग जाकर मन्त्रणा के लिए बैठे।