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विराट पर्व · अध्याय 2

युधिष्ठिर का कङ्क बनकर विराट की सेवा का निश्चय

वनवास पूरा होने पर पाण्डव धौम्य के साथ मन्त्रणा करते हैं और युधिष्ठिर अर्जुन से पूछते हैं कि तेरहवाँ वर्ष कहाँ बिताया जाए। अर्जुन कुरुदेश के आसपास के जनपदों के नाम लेते हैं, जिनमें विराट का समृद्ध नगर भी है, और युधिष्ठिर मत्स्यराज के दरबार को चुनते हैं। जब अर्जुन सोचते हैं कि इतने धर्मनिष्ठ राजा किसी और की सेवा कैसे करेंगे, तो युधिष्ठिर बताते हैं कि वे पासों में निपुण और अनेक विद्याओं के ज्ञाता परिव्राजक ब्राह्मण कङ्क बनकर जाएँगे और कहेंगे कि वे कभी युधिष्ठिर के प्राणप्रिय मित्र थे।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.2.1)

निवृत्तवनवासास्ते सत्यसन्धा मनस्विनः । अकुर्वत पुनर्मन्त्रं सह धौम्येन पाण्डवाः ॥

nivṛttavanavāsāste satyasandhā manasvinaḥ | akurvata punarmantraṃ saha dhaumyena pāṇḍavāḥ

वनवास पूरा होने पर सत्यप्रतिज्ञ, मनस्वी पाण्डवों ने धौम्य के साथ फिर से मन्त्रणा की।

श्लोक 2 (4.2.2)

अथाब्रवीद्धर्मराजः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भ्रातॄन्कृष्णां च संप्रेक्ष्य धौम्यं च कुरुनन्दनः ॥

athābravīddharmarājaḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | bhrātṝnkṛṣṇāṃ ca saṃprekṣya dhaumyaṃ ca kurunandanaḥ

तब कुरुनन्दन, कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों, कृष्णा और धौम्य की ओर देखकर कहा—

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 3 (4.2.3)

द्वादशेमानि वर्षाणि राज्याद्विप्रोषिता वयम् । त्रयोदशोऽयं संप्राप्तः कृच्छ्रात्परमदुर्वसः । स साधु कौन्तेय इतो वासमर्जुन रोचय ॥

dvādaśemāni varṣāṇi rājyādviproṣitā vayam | trayodaśo'yaṃ saṃprāptaḥ kṛcchrātparamadurvasaḥ | sa sādhu kaunteya ito vāsamarjuna rocaya

"ये बारह वर्ष हम राज्य से निर्वासित रहे। अब कष्टों के बाद यह तेरहवाँ वर्ष आ पहुँचा है, जिसे बिताना अत्यन्त कठिन है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र अर्जुन, यहाँ से दूर रहने के लिए कोई अच्छा स्थान चुनो।

श्लोक 4 (4.2.4)

त्रयोदशमिदं प्राप्तं क्वनु वत्स्यामहेऽर्जुन । अबुद्धा धार्तराष्ट्रैश्च समग्राः सह कृष्णया ॥

trayodaśamidaṃ prāptaṃ kvanu vatsyāmahe'rjuna | abuddhā dhārtarāṣṭraiśca samagrāḥ saha kṛṣṇayā

तेरहवाँ वर्ष आ गया है। अर्जुन, हम सब कृष्णा के साथ धृतराष्ट्र के पुत्रों से अज्ञात रहकर कहाँ रहें?"

अर्जुन उवाच

श्लोक 5 (4.2.5)

तस्यैव वरदानेन धर्मस्य मनुजाधिप । अज्ञाता विचरिष्यामो नराणां भरतर्षभ ॥

tasyaiva varadānena dharmasya manujādhipa | ajñātā vicariṣyāmo narāṇāṃ bharatarṣabha

"हे नरेश्वर, भरतश्रेष्ठ, उन्हीं धर्म के वरदान से हम मनुष्यों के बीच अज्ञात रहकर विचरेंगे।

श्लोक 6 (4.2.6)

यानि राष्ट्राणि वासाय कीर्तयिष्यामि कानिचित् । रमणीयानि गुप्तानि तेषां किंचित्तु रोचय ॥

yāni rāṣṭrāṇi vāsāya kīrtayiṣyāmi kānicit | ramaṇīyāni guptāni teṣāṃ kiṃcittu rocaya

मैं रहने योग्य कुछ रमणीय और सुरक्षित राज्यों के नाम बताता हूँ; उनमें से कोई एक आप चुन लें।

श्लोक 7 (4.2.7)

रम्या जनपदाः सन्ति बहवस्त्वभितः कुरून् । पाञ्चालाश्चैव मत्स्याश्च साल्ववैदेहबाह्लिकाः । दशार्णाः शूरसेनाश्च कलिङ्गा मागधा अपि ॥

ramyā janapadāḥ santi bahavastvabhitaḥ kurūn | pāñcālāścaiva matsyāśca sālvavaidehabāhlikāḥ | daśārṇāḥ śūrasenāśca kaliṅgā māgadhā api

कुरुदेश के चारों ओर अनेक रमणीय जनपद हैं—पाञ्चाल और मत्स्य; साल्व, विदेह और बाह्लिक; दशार्ण और शूरसेन; कलिङ्ग और मगध भी।

श्लोक 8 (4.2.8)

विराटनगरं चापि श्रूयते शत्रुसूदन । रमणीयं जनाकीर्णं सुभिक्षं स्फीतमेव च ॥

virāṭanagaraṃ cāpi śrūyate śatrusūdana | ramaṇīyaṃ janākīrṇaṃ subhikṣaṃ sphītameva ca

हे शत्रुसूदन, विराटनगर के विषय में भी सुना जाता है कि वह रमणीय, जनसंकुल, अन्न से भरपूर और समृद्ध है।

श्लोक 9 (4.2.9)

नानाराष्ट्राणि चान्यानि श्रूयन्ते सुबहूनि च । यत्र ते रोचते राजंस्तत्र गच्छामहे वयम् ॥

nānārāṣṭrāṇi cānyāni śrūyante subahūni ca | yatra te rocate rājaṃstatra gacchāmahe vayam

और भी बहुत-से राज्यों के बारे में सुना जाता है। राजन्, जहाँ आपकी रुचि हो, वहीं हम चलेंगे।

श्लोक 10 (4.2.10)

कतमस्मिञ्जनपदे महाराज निवत्स्यसि । मा विषादे मनः कार्यं राज्यभ्रंश इति क्वचित् ॥

katamasmiñjanapade mahārāja nivatsyasi | mā viṣāde manaḥ kāryaṃ rājyabhraṃśa iti kvacit

महाराज, आप किस जनपद में निवास करेंगे? 'राज्य छिन गया'—ऐसा सोचकर कभी मन को विषाद में न डुबोइए।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 11 (4.2.11)

एवमेतन्महाबाहो यथा स भगवान्प्रभुः । अब्रवीत्सर्वभूतेशस्तथैतन्न तदन्यथा ॥

evametanmahābāho yathā sa bhagavānprabhuḥ | abravītsarvabhūteśastathaitanna tadanyathā

"महाबाहो, यह ठीक ऐसा ही है। सब प्राणियों के स्वामी भगवान् धर्म ने जैसा कहा, वैसा ही होगा, उससे भिन्न नहीं।

श्लोक 12 (4.2.12)

अवश्यं त्वेव वासार्थं रमणीयं शिवं सुखम् । संमन्त्र्य सहितैः सर्वैर्द्रष्टव्यमकुतोभयम् ॥

avaśyaṃ tveva vāsārthaṃ ramaṇīyaṃ śivaṃ sukham | saṃmantrya sahitaiḥ sarvairdraṣṭavyamakutobhayam

फिर भी हमें सब मिलकर विचार करके रहने के लिए कोई रमणीय, कल्याणकारी, सुखद और सब ओर से निर्भय स्थान अवश्य खोजना चाहिए।

श्लोक 13 (4.2.13)

मात्स्यो विराटो बलवानभिरक्तोथ पाण्डवान् । धर्मशीलो वदान्यश्च वृद्धः सत्स्वपि संमतः ॥

mātsyo virāṭo balavānabhiraktotha pāṇḍavān | dharmaśīlo vadānyaśca vṛddhaḥ satsvapi saṃmataḥ

मत्स्यराज विराट बलवान हैं और पाण्डवों के प्रति अनुरक्त हैं; वे धर्मशील, उदार, वयोवृद्ध और सज्जनों में भी सम्मानित हैं।

श्लोक 14 (4.2.14)

गुणवाँल्लोकविख्यातो दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः । तत्र मे रोचते पार्थ मत्स्यराजान्तिकेऽनघ ॥

guṇavām̐llokavikhyāto dṛḍhabhaktirjitendriyaḥ | tatra me rocate pārtha matsyarājāntike'nagha

वे गुणवान, लोकविख्यात, दृढ़ निष्ठा वाले और जितेन्द्रिय हैं। निष्पाप पार्थ, मुझे मत्स्यराज के समीप रहना अच्छा लगता है।

श्लोक 15 (4.2.15)

विराटनगरे तात मासान्द्वादशसंमितान् । कुर्वन्तस्तस्य कर्माणि वसामो यदि रोचते ॥

virāṭanagare tāta māsāndvādaśasaṃmitān | kurvantastasya karmāṇi vasāmo yadi rocate

तात, यदि तुम्हें ठीक लगे तो हम उसकी सेवा के काम करते हुए पूरे बारह महीने विराटनगर में रहें।

श्लोक 16 (4.2.16)

यानियानि च कर्माणि तस्य शक्ष्यामहे वयम् । कर्तुं यो यत्स तत्कर्म ब्रवीतु कुरुनन्दन ॥

yāniyāni ca karmāṇi tasya śakṣyāmahe vayam | kartuṃ yo yatsa tatkarma bravītu kurunandana

हे कुरुनन्दन, उसके यहाँ के जिन-जिन कामों को हम कर सकें, उनमें से कौन कौन-सा काम करेगा, यह बताए।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 17 (4.2.17)

नरदेव कथं कर्म तस्य राष्ट्रे करिष्यसि । मनुजेन्द्र विराटस्य रंस्यसे केन कर्मणा ॥

naradeva kathaṃ karma tasya rāṣṭre kariṣyasi | manujendra virāṭasya raṃsyase kena karmaṇā

"हे नरदेव, आप उसके राज्य में कौन-सा काम करेंगे? हे मनुजेन्द्र, विराट के यहाँ आप किस कर्म में मन रमाएँगे?

श्लोक 18 (4.2.18)

अक्लिष्टवेषधारी च धार्मिको ह्यनसूयकः । न तवाभ्युचितं कर्म नृशंसं नापि कैतवम् ॥

akliṣṭaveṣadhārī ca dhārmiko hyanasūyakaḥ | na tavābhyucitaṃ karma nṛśaṃsaṃ nāpi kaitavam

आपने कभी क्लेश का वेश धारण नहीं किया; आप धार्मिक और ईर्ष्या-रहित हैं। न कोई क्रूर कर्म आपके योग्य है, न कोई छल।

श्लोक 19 (4.2.19)

सत्यवागसि याज्ञीको लोभक्रोधविवर्जितः । मृदुर्वदान्यो ह्रीमांश्च धार्मिकः सत्यविक्रमः ॥

satyavāgasi yājñīko lobhakrodhavivarjitaḥ | mṛdurvadānyo hrīmāṃśca dhārmikaḥ satyavikramaḥ

आप सत्यवादी, यज्ञपरायण, लोभ और क्रोध से रहित, कोमल, उदार, लज्जाशील, धार्मिक और सच्चे पराक्रमी हैं।

श्लोक 20 (4.2.20)

स राजंस्तपसा क्लिष्टः कथं तस्य करिष्यसि । न दुःखमुचितं किंचिद्राजन्पापमतेर्यथा । स इमामापदं प्राप्य कथं घोरां तरिष्यसि ॥

sa rājaṃstapasā kliṣṭaḥ kathaṃ tasya kariṣyasi | na duḥkhamucitaṃ kiṃcidrājanpāpamateryathā | sa imāmāpadaṃ prāpya kathaṃ ghorāṃ tariṣyasi

राजन्, तप से क्षीण आप उसकी सेवा कैसे करेंगे? राजन्, किसी पापबुद्धि मनुष्य की भाँति आपके लिए कोई दुःख उचित नहीं। इस भयानक विपत्ति में पड़कर आप इसे कैसे पार करेंगे?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (4.2.21)

अर्जुनेनैवमुक्तस्तु प्रत्युवाच युधिष्ठिरः । शृणु त्वं यत्करिष्यामि कर्म वै कुरुनन्दन ॥

arjunenaivamuktastu pratyuvāca yudhiṣṭhiraḥ | śṛṇu tvaṃ yatkariṣyāmi karma vai kurunandana

अर्जुन के ऐसा कहने पर युधिष्ठिर ने उत्तर दिया—"हे कुरुनन्दन, सुनो, मैं कौन-सा कर्म करूँगा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 22 (4.2.22)

विराटं समनुप्राप्य राजानं मात्स्यनन्दनम् । सभास्तारो भविष्यामि विराटस्येति मे मतिः ॥

virāṭaṃ samanuprāpya rājānaṃ mātsyanandanam | sabhāstāro bhaviṣyāmi virāṭasyeti me matiḥ

मत्स्यों को आनन्द देने वाले राजा विराट के पास पहुँचकर मैं विराट का सभासद बनूँगा—यही मेरा विचार है।

श्लोक 23 (4.2.23)

कङ्को नाम ब्रुवाणोऽहं मताक्षः साधुदेविता । वैडूर्यान्काञ्चनान्दान्तान्स्फाटिकान्राजतानपि ॥

kaṅko nāma bruvāṇo'haṃ matākṣaḥ sādhudevitā | vaiḍūryānkāñcanāndāntānsphāṭikānrājatānapi

अपना नाम कङ्क बताकर, पासों में निपुण और अच्छा खिलाड़ी बनकर, मैं वैदूर्य, सोने, हाथीदाँत, स्फटिक और चाँदी के पासे,

श्लोक 24 (4.2.24)

कृष्णाक्षाँल्लोहिताक्षांश्च निवप्स्यामि मनोरमान् । अरिष्टान्राजगोलिङ्गान्दर्शनीयान्सुवर्चसः ॥

kṛṣṇākṣām̐llohitākṣāṃśca nivapsyāmi manoramān | ariṣṭānrājagoliṅgāndarśanīyānsuvarcasaḥ

तथा काले और लाल चिह्नों वाले मनोहर पासे फेंकूँगा; और अरिष्ट तथा राजगोलिङ्ग नामक सुन्दर, चमकीले पासे भी।

श्लोक 25 (4.2.25)

लोहिताश्चाश्मगर्भाश्च सन्ति तात धनानि मे । दर्शनीयाः सभानन्दाः कुशलैः साधुनिष्ठिताः ॥

lohitāścāśmagarbhāśca santi tāta dhanāni me | darśanīyāḥ sabhānandāḥ kuśalaiḥ sādhuniṣṭhitāḥ

तात, मेरे पास और भी धन है—लाल पासे और भीतर रत्न जड़े पासे, जो देखने में सुन्दर, सभा को आनन्द देने वाले और कुशल कारीगरों के भली-भाँति बनाए हुए हैं।

श्लोक 26 (4.2.26)

अप्येतान्पाणिना स्पृष्ट्वा संप्रहृष्यन्ति मानवाः ॥

apyetānpāṇinā spṛṣṭvā saṃprahṛṣyanti mānavāḥ

उन्हें हाथ से छूकर ही लोग प्रसन्न हो जाते हैं।

श्लोक 27 (4.2.27)

तान्विकीर्य समे देशे रमणीये विपांसुले । देविष्यामि यथाकामं स विहारो भविष्यति ॥

tānvikīrya same deśe ramaṇīye vipāṃsule | deviṣyāmi yathākāmaṃ sa vihāro bhaviṣyati

उन्हें समतल, रमणीय, धूल-रहित भूमि पर बिखेरकर मैं इच्छानुसार खेलूँगा; यही मेरा विहार होगा।

श्लोक 28 (4.2.28)

कङ्को नाम्ना परिव्राट् च विराटस्य सभासदः । ज्योतिषे शकुनज्ञाने निमित्ते चाक्षकौशले । ब्राह्मे वेदे मयाऽधीते वेदाङ्गेषु च सर्वशः ॥

kaṅko nāmnā parivrāṭ ca virāṭasya sabhāsadaḥ | jyotiṣe śakunajñāne nimitte cākṣakauśale | brāhme vede mayā'dhīte vedāṅgeṣu ca sarvaśaḥ

कङ्क नाम से, एक परिव्राजक और विराट के सभासद के रूप में—ज्योतिष, शकुन-विद्या, निमित्त और पासों की कला में निपुण, वेद और सब वेदाङ्गों का अध्ययन किए हुए,

श्लोक 29 (4.2.29)

धर्मकामार्थमोक्षेषु नीतिशास्त्रेषु पारगः । पृष्टोऽहं कथयिष्यामि राज्ञः प्रियतमं वचः ॥

dharmakāmārthamokṣeṣu nītiśāstreṣu pāragaḥ | pṛṣṭo'haṃ kathayiṣyāmi rājñaḥ priyatamaṃ vacaḥ

धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष तथा नीतिशास्त्रों में पारंगत होकर, पूछे जाने पर मैं राजा से उसके सबसे प्रिय वचन कहूँगा।

श्लोक 30 (4.2.30)

आसं युधिष्ठिरस्याहं पुरा प्राणसमः सखा । इति वक्ष्यामि राजानं यदि मामनुयोक्ष्यते ॥

āsaṃ yudhiṣṭhirasyāhaṃ purā prāṇasamaḥ sakhā | iti vakṣyāmi rājānaṃ yadi māmanuyokṣyate

यदि राजा मुझसे पूछेगा, तो मैं कहूँगा—'पहले मैं युधिष्ठिर का प्राणों के समान प्रिय मित्र था।'

श्लोक 31 (4.2.31)

विराटनगरे छन्न एवं युक्तः सदा वसे । इत्येवं मे प्रतिज्ञातं विचरिष्याम्यहं यथा ॥

virāṭanagare channa evaṃ yuktaḥ sadā vase | ityevaṃ me pratijñātaṃ vicariṣyāmyahaṃ yathā

इस प्रकार काम में लगा हुआ मैं विराटनगर में सदा छिपकर रहूँगा। यही मेरा निश्चय है और इसी प्रकार मैं विचरूँगा।"

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3