विराट पर्व · अध्याय 3
रसोइया भीम और बृहन्नला अर्जुन
बक, हिडिम्ब, किर्मीर और जटासुर पर भीम की विजयों का स्मरण कर युधिष्ठिर पूछते हैं कि वे कौन-सा काम करेंगे; भीम वलल नामक रसोइया बनकर विराट की सेवा करेंगे और किसी को मारे बिना राजा के मल्लों को पछाड़ेंगे तथा जंगली पशुओं को वश में करेंगे। फिर युधिष्ठिर अर्जुन की सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ के रूप में विस्तार से प्रशंसा करते हैं और सोचते हैं कि ऐसा वीर कैसे छिप सकेगा। अर्जुन उत्तर देते हैं कि वे अपनी घट्ठों वाली भुजाओं को शंख की चूड़ियों से ढककर, बालों की वेणी बनाकर, नृत्य-संगीत सिखाने वाली नपुंसक बृहन्नला के रूप में अन्तःपुर में रहेंगे और अपनी दशा का कारण उर्वशी का शाप बताएँगे; युधिष्ठिर दुःखी होते हैं कि इतने महान वीर को ऐसी प्रतिज्ञा करनी पड़ रही है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.3.1)
एवं निर्दिश्य चात्मानं निश्वसन्नुष्णमार्तिजम् । विमुञ्चन्नश्रु नेत्राभ्यां भीमसेनमुवाच ह ॥
evaṃ nirdiśya cātmānaṃ niśvasannuṣṇamārtijam | vimuñcannaśru netrābhyāṃ bhīmasenamuvāca ha
इस प्रकार अपने विषय में बताकर, पीड़ा से गरम साँसें भरते और आँखों से आँसू बहाते हुए युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (4.3.2)
भीमसेन कथं कर्म मात्स्यराष्ट्रे करिष्यसि । हत्वा क्रोधवशांस्तत्र पर्वते गन्धमादने ॥
bhīmasena kathaṃ karma mātsyarāṣṭre kariṣyasi | hatvā krodhavaśāṃstatra parvate gandhamādane
"भीमसेन, तुम मत्स्यराष्ट्र में कौन-सा काम करोगे? तुमने गन्धमादन पर्वत पर क्रोधवश राक्षसों को मारा,
श्लोक 3 (4.3.3)
यक्षान्क्रोधाभिताम्राक्षान्राक्षसांश्चापि पौरुषात् । प्रादाः पाञ्चालकन्यायै पद्मानि सुबहून्यपि ॥
yakṣānkrodhābhitāmrākṣānrākṣasāṃścāpi pauruṣāt | prādāḥ pāñcālakanyāyai padmāni subahūnyapi
क्रोध से लाल आँखों वाले यक्षों और राक्षसों को भी अपने पौरुष से मारकर पाञ्चालराजकुमारी को बहुत-से कमल लाकर दिए;
श्लोक 4 (4.3.4)
बकं राक्षसराजानं भीषणं पुरुषादकम् । जघ्निवानसि कौन्तेय ब्राह्मणार्थमरिन्दम । क्षेमा चाभयसंवीता सैकचक्रा त्वया कृता ॥
bakaṃ rākṣasarājānaṃ bhīṣaṇaṃ puruṣādakam | jaghnivānasi kaunteya brāhmaṇārthamarindama | kṣemā cābhayasaṃvītā saikacakrā tvayā kṛtā
हे कुन्तीपुत्र, शत्रुदमन, तुमने ब्राह्मण के हित के लिए भयानक नरभक्षी राक्षसराज बक का वध किया और एकचक्रा नगरी को सुरक्षित और निर्भय बना दिया;
श्लोक 5 (4.3.5)
हिडिम्बं च महावीर्यं किर्मीरं चैव राक्षसम् । त्वया हत्वा महाबाहो वनं निष्कण्टकं कृतम् ॥
hiḍimbaṃ ca mahāvīryaṃ kirmīraṃ caiva rākṣasam | tvayā hatvā mahābāho vanaṃ niṣkaṇṭakaṃ kṛtam
महाबाहो, तुमने महापराक्रमी हिडिम्ब और राक्षस किर्मीर को मारकर वन को निष्कण्टक कर दिया;
श्लोक 6 (4.3.6)
आपदं चापि संप्राप्ता द्रौपदी चारुहासिनी । जटासुरवधं कृत्वा वयं च परिमोक्षिताः ॥
āpadaṃ cāpi saṃprāptā draupadī cāruhāsinī | jaṭāsuravadhaṃ kṛtvā vayaṃ ca parimokṣitāḥ
और जब मनोहर मुस्कान वाली द्रौपदी विपत्ति में पड़ी, तब तुमने जटासुर का वध करके हम सबको छुड़ाया।
श्लोक 7 (4.3.7)
मत्स्यराजान्तिके तात वीर्यपूर्णोऽत्यमर्षणः । वृकोदर विराटस्य बलीयान्दुर्बलीयसः । समीपे नगरे तस्य वत्स्यसे केन कर्मणा ॥
matsyarājāntike tāta vīryapūrṇo'tyamarṣaṇaḥ | vṛkodara virāṭasya balīyāndurbalīyasaḥ | samīpe nagare tasya vatsyase kena karmaṇā
तात वृकोदर, तुम पराक्रम से भरे और अत्यन्त असहनशील हो, और दुर्बल विराट से कहीं अधिक बलवान हो। मत्स्यराज के समीप, उसी के नगर में, तुम किस काम से रहोगे?"
भीम उवाच
श्लोक 8 (4.3.8)
सूदोऽहं वललो नाम्ना सूपकारो नराधिप । उपस्थास्यामि राजानं विराटमिति रोचये ॥
sūdo'haṃ valalo nāmnā sūpakāro narādhipa | upasthāsyāmi rājānaṃ virāṭamiti rocaye
"हे नराधिप, मैं वलल नाम का रसोइया, सूप-व्यञ्जन बनाने वाला बनकर राजा विराट की सेवा में उपस्थित होऊँगा—मुझे यही ठीक लगता है।
श्लोक 9 (4.3.9)
रसान्नानाविधांश्चापि स्वादूंश्च मधुरांस्तथा । सूपांश्चापि करिष्यामि कुशलोस्मि महानसे ॥
rasānnānāvidhāṃścāpi svādūṃśca madhurāṃstathā | sūpāṃścāpi kariṣyāmi kuśalosmi mahānase
मैं अनेक प्रकार के स्वादिष्ट और मधुर रस-व्यञ्जन तथा सूप बनाऊँगा; मैं रसोई के काम में कुशल हूँ।
श्लोक 10 (4.3.10)
कृतपूर्वाणि यान्यस्य व्यञ्जनानि सुशिक्षितैः । तान्यप्यभिभविष्यामि प्रीतिं संजनयन्नहम् ॥
kṛtapūrvāṇi yānyasya vyañjanāni suśikṣitaiḥ | tānyapyabhibhaviṣyāmi prītiṃ saṃjanayannaham
उसके सुशिक्षित रसोइयों ने पहले जो-जो व्यञ्जन बनाए हैं, मैं उन्हें भी पीछे छोड़ दूँगा और उसकी प्रीति उत्पन्न करूँगा।
श्लोक 11 (4.3.11)
पूर्वमप्राशितांस्तेन कर्ता रसगुणान्वितान् । स्वादु व्यञ्जनमास्वाद्य मात्स्यः प्रीतो भविष्यति ॥
pūrvamaprāśitāṃstena kartā rasaguṇānvitān | svādu vyañjanamāsvādya mātsyaḥ prīto bhaviṣyati
मैं रस और गुण से भरे ऐसे व्यञ्जन बनाऊँगा जिन्हें उसने पहले कभी नहीं चखा; उस स्वादिष्ट भोजन को चखकर मत्स्यराज प्रसन्न होगा।
श्लोक 12 (4.3.12)
आहरिष्यामि दारूणां पाटितानां शतंशतम् । राजा कर्माणि मे दृष्ट्वा न मां परिभविष्यति ॥
āhariṣyāmi dārūṇāṃ pāṭitānāṃ śataṃśatam | rājā karmāṇi me dṛṣṭvā na māṃ paribhaviṣyati
मैं चीरी हुई लकड़ियों के सैकड़ों-सैकड़ों गट्ठर ले आऊँगा; मेरे काम देखकर राजा मेरा अनादर नहीं करेगा।
श्लोक 13 (4.3.13)
ये च तस्य महामल्लाः समरेष्वपराजिताः । कृतप्रतापा बहुशो राज्ञः प्रत्यायिता बले ॥
ye ca tasya mahāmallāḥ samareṣvaparājitāḥ | kṛtapratāpā bahuśo rājñaḥ pratyāyitā bale
और उसके जो बड़े-बड़े मल्ल हैं, जो मुकाबलों में कभी नहीं हारे, जिन्होंने अनेक बार अपना प्रताप दिखाया है और बल के लिए राजा जिन पर भरोसा करता है,
श्लोक 14 (4.3.14)
रङ्गोपजीविनः सर्वे परेषां च भयावहाः । तानहं निहनिष्यामि रतिं राज्ञः प्रवर्तयन् ॥
raṅgopajīvinaḥ sarve pareṣāṃ ca bhayāvahāḥ | tānahaṃ nihaniṣyāmi ratiṃ rājñaḥ pravartayan
जो सब अखाड़े से जीविका चलाते हैं और दूसरों के लिए भयावह हैं—उन्हें मैं पछाड़ूँगा और राजा का मनोरंजन करूँगा।
श्लोक 15 (4.3.15)
न च तान्युध्यमानोऽहं नयिष्ये यमसादनम् । तथा तान्निहनिष्यामि जीविष्यन्ति यथाऽऽतुराः ॥
na ca tānyudhyamāno'haṃ nayiṣye yamasādanam | tathā tānnihaniṣyāmi jīviṣyanti yathā''turāḥ
किन्तु उनसे लड़ते हुए मैं उन्हें यमलोक नहीं पहुँचाऊँगा; उन्हें इस तरह गिराऊँगा कि घायल होकर भी वे जीवित रहें।
श्लोक 16 (4.3.16)
वृषो वा महिषो वापि नागो वा षाष्टिहायनः । सिंहो व्याघ्रो ग्रहीतव्यो भविष्यति न संशयः ॥
vṛṣo vā mahiṣo vāpi nāgo vā ṣāṣṭihāyanaḥ | siṃho vyāghro grahītavyo bhaviṣyati na saṃśayaḥ
यदि किसी साँड़ या भैंसे, साठ वर्ष के हाथी, सिंह या बाघ को पकड़ना होगा, तो वह निःसन्देह हो जाएगा।
श्लोक 17 (4.3.17)
तान्सर्वान्दुर्ग्रहानन्यैराशीविषविषोपमान् । बलादहं ग्रहीष्यामि मत्स्यराजस्य पश्यतः ॥
tānsarvāndurgrahānanyairāśīviṣaviṣopamān | balādahaṃ grahīṣyāmi matsyarājasya paśyataḥ
जिन्हें पकड़ना दूसरों के लिए कठिन है और जो विषधर सर्पों के विष के समान घातक हैं, उन सबको मैं मत्स्यराज के देखते-देखते बलपूर्वक पकड़ लूँगा।
श्लोक 18 (4.3.18)
आरालिका वा सूदा वा येऽस्य युक्ता महानसे । तानहं प्रीणयिष्यामि मनुष्यान्स्वेन कर्मणा ॥
ārālikā vā sūdā vā ye'sya yuktā mahānase | tānahaṃ prīṇayiṣyāmi manuṣyānsvena karmaṇā
उसकी पाकशाला में नियुक्त जो आरालिक और रसोइये हैं, उन लोगों को मैं अपने काम से प्रसन्न करूँगा।
श्लोक 19 (4.3.19)
आरालिको गोविकर्ता सूपकर्ता नियोधकः । आसं युधिष्ठिरस्याहमिति वक्ष्यामि मानवान् ॥
ārāliko govikartā sūpakartā niyodhakaḥ | āsaṃ yudhiṣṭhirasyāhamiti vakṣyāmi mānavān
मैं लोगों से कहूँगा—'मैं युधिष्ठिर का रसोइया, मांस काटने वाला, सूप बनाने वाला और मल्ल था।'
श्लोक 20 (4.3.20)
आत्मानमात्मना रक्षंश्चरिष्यामि विशांपते । इत्येवं च प्रतिज्ञातं विचरिष्याम्यहं यथा । विराटनगरे च्छन्नो विराटस्य समीपतः ॥
ātmānamātmanā rakṣaṃścariṣyāmi viśāṃpate | ityevaṃ ca pratijñātaṃ vicariṣyāmyahaṃ yathā | virāṭanagare cchanno virāṭasya samīpataḥ
हे प्रजानाथ, मैं स्वयं अपनी रक्षा करता हुआ विचरूँगा। यही मेरा निश्चय है, और इसी प्रकार मैं विराटनगर में विराट के समीप छिपकर रहूँगा।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 21 (4.3.21)
अग्निर्ब्राह्मणरूपेण प्रच्छन्नोऽन्नमयाचत । महाशनं ब्राह्मणं मां प्रमुञ्चार्जुन खाण्डवे ॥
agnirbrāhmaṇarūpeṇa pracchanno'nnamayācata | mahāśanaṃ brāhmaṇaṃ māṃ pramuñcārjuna khāṇḍave
"अग्नि ने ब्राह्मण का वेश धारण कर छिपे रूप में अन्न माँगा था—'अर्जुन, मुझ बहुत खाने वाले ब्राह्मण को खाण्डव में तृप्त करो।'
श्लोक 22 (4.3.22)
संशुश्रुवे च धर्मात्मा यस्तमर्थं चकार ह । तस्मै ब्राह्मणरूपाय हुताशाय महायशाः । विजित्यैकरथेनेन्द्रं हत्वा पन्नगराक्षसान् ॥
saṃśuśruve ca dharmātmā yastamarthaṃ cakāra ha | tasmai brāhmaṇarūpāya hutāśāya mahāyaśāḥ | vijityaikarathenendraṃ hatvā pannagarākṣasān
उस धर्मात्मा, महायशस्वी ने वचन दिया और ब्राह्मण-रूपधारी अग्नि का वह प्रयोजन पूरा किया—अकेले रथ से इन्द्र को जीतकर और नागों तथा राक्षसों को मारकर।
श्लोक 23 (4.3.23)
यस्तु देवान्मनुष्यांश्च सर्वानेकरथोऽजयत् । स भीमधन्वा श्वेताश्वः पाण्डवः किं करिष्यति ॥
yastu devānmanuṣyāṃśca sarvānekaratho'jayat | sa bhīmadhanvā śvetāśvaḥ pāṇḍavaḥ kiṃ kariṣyati
जिसने अकेले रथ से सब देवताओं और मनुष्यों को जीत लिया, वह भयंकर धनुष और श्वेत घोड़ों वाला पाण्डव क्या करेगा?
श्लोक 24 (4.3.24)
आशीविषसमस्पर्शो नागानामिव वासुकिः । दृष्टीविष इवाहीनामग्निस्तेजस्विनामिव ॥
āśīviṣasamasparśo nāgānāmiva vāsukiḥ | dṛṣṭīviṣa ivāhīnāmagnistejasvināmiva
उसका स्पर्श विषैले सर्प के समान है; वह नागों में वासुकि, सर्पों में दृष्टिविष और तेजस्वियों में अग्नि के समान है;
श्लोक 25 (4.3.25)
समुद्र इव सिन्धूनां शैलानां हिमवानिव । महेन्द्र इव देवानां दानवानां बलिर्यथा ॥
samudra iva sindhūnāṃ śailānāṃ himavāniva | mahendra iva devānāṃ dānavānāṃ baliryathā
जैसे नदियों में समुद्र, पर्वतों में हिमालय, देवताओं में महेन्द्र और दानवों में बलि;
श्लोक 26 (4.3.26)
सुप्रतीको गजेन्द्राणां युग्यानां तुरगो यथा । कुबेर इव यक्षाणां मृगाणां केसरी यथा ॥
supratīko gajendrāṇāṃ yugyānāṃ turago yathā | kubera iva yakṣāṇāṃ mṛgāṇāṃ kesarī yathā
जैसे गजराजों में सुप्रतीक, वाहनों में घोड़ा, यक्षों में कुबेर और पशुओं में सिंह;
श्लोक 27 (4.3.27)
राक्षसानां दशग्रीवो दैत्यानामिव शम्बरः । रुद्राणामिव कापाली विष्णुर्बलवतामिव ॥
rākṣasānāṃ daśagrīvo daityānāmiva śambaraḥ | rudrāṇāmiva kāpālī viṣṇurbalavatāmiva
जैसे राक्षसों में दशग्रीव, दैत्यों में शम्बर, रुद्रों में कपाली (शिव) और बलवानों में विष्णु;
श्लोक 28 (4.3.28)
रोषामर्षसमायुक्तो भुजङ्गानां च तक्षकः । वायुवेगबलोद्धृतो गरुडः पततामिव ॥
roṣāmarṣasamāyukto bhujaṅgānāṃ ca takṣakaḥ | vāyuvegabaloddhṛto garuḍaḥ patatāmiva
जैसे सर्पों में रोष और अमर्ष से भरा तक्षक, और पक्षियों में वायु के वेग और बल से उड़ने वाला गरुड़;
श्लोक 29 (4.3.29)
तपतामिव चादित्यः प्रजानां ब्राह्मणो यथा । ह्रदानामिव पातालं पर्जन्यो नर्दतामिव ॥
tapatāmiva cādityaḥ prajānāṃ brāhmaṇo yathā | hradānāmiva pātālaṃ parjanyo nardatāmiva
जैसे तपने वालों में सूर्य, प्रजाओं में ब्राह्मण, गहरे जलाशयों में पाताल और गर्जने वालों में पर्जन्य (मेघ);
श्लोक 30 (4.3.30)
आयुधानां वरो वज्रः ककुद्मांश्च गवां वरः । धृतराष्ट्रश्च नागानां हस्तिष्वैरावतो यथा ॥
āyudhānāṃ varo vajraḥ kakudmāṃśca gavāṃ varaḥ | dhṛtarāṣṭraśca nāgānāṃ hastiṣvairāvato yathā
जैसे आयुधों में वज्र श्रेष्ठ है और गौओं में ककुद्मान् साँड़; जैसे नागों में धृतराष्ट्र और हाथियों में ऐरावत;
श्लोक 31 (4.3.31)
पुत्रः प्रियाणामधिको भार्या च सुहृदां वरा । गिरीणां प्रवरो मेरुर्देवानां मधुसूदनः । ग्रहाणां प्रवरश्चन्द्रः सरसां मानसो यथा ॥
putraḥ priyāṇāmadhiko bhāryā ca suhṛdāṃ varā | girīṇāṃ pravaro merurdevānāṃ madhusūdanaḥ | grahāṇāṃ pravaraścandraḥ sarasāṃ mānaso yathā
जैसे प्रियजनों में पुत्र सबसे प्रिय है और सुहृदों में पत्नी श्रेष्ठ है; जैसे पर्वतों में मेरु और देवताओं में मधुसूदन श्रेष्ठ हैं; जैसे ग्रहों में चन्द्रमा और सरोवरों में मानसरोवर श्रेष्ठ है—
श्लोक 32 (4.3.32)
यथैतानि विशिष्टानि स्वस्यां जात्यां वृकोदर । एवं युवा गुडाकेशः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥
yathaitāni viśiṣṭāni svasyāṃ jātyāṃ vṛkodara | evaṃ yuvā guḍākeśaḥ śreṣṭhaḥ sarvadhanuṣmatām
वृकोदर, जैसे ये सब अपनी-अपनी जाति में विशिष्ट हैं, वैसे ही युवा गुडाकेश (अर्जुन) सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ है।
श्लोक 33 (4.3.33)
सोयमिन्द्रादनवमो वासुदेवाच्च भारत । उषित्वा पञ्च वर्षाणि सहस्राक्षस्य वेश्मनि । ब्रह्मचारी व्रते युक्तः सर्वशस्त्रभृतांवरः ॥
soyamindrādanavamo vāsudevācca bhārata | uṣitvā pañca varṣāṇi sahasrākṣasya veśmani | brahmacārī vrate yuktaḥ sarvaśastrabhṛtāṃvaraḥ
हे भारत, वह इन्द्र और वासुदेव से किसी प्रकार कम नहीं है। उसने सहस्राक्ष इन्द्र के भवन में ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुए पाँच वर्ष निवास किया; वह सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ है।
श्लोक 34 (4.3.34)
अवाप चास्त्रमस्त्रज्ञः सर्वज्ञः सर्वसंमतः । क्षिप्रं चाणु विचित्रं च ध्रुवं च वदतां वरः ॥
avāpa cāstramastrajñaḥ sarvajñaḥ sarvasaṃmataḥ | kṣipraṃ cāṇu vicitraṃ ca dhruvaṃ ca vadatāṃ varaḥ
उस अस्त्रज्ञ, सर्वज्ञ, सर्वसम्मानित और वक्ताओं में श्रेष्ठ ने शीघ्र, सूक्ष्म, विचित्र और अचूक दिव्य अस्त्र प्राप्त किए।
श्लोक 35 (4.3.35)
अनुज्ञातः सुरेन्द्रेण पुनः प्रत्यागतो महीम् । धार्तराष्ट्रविनाशाय पाण्डवानां जयाय च ॥
anujñātaḥ surendreṇa punaḥ pratyāgato mahīm | dhārtarāṣṭravināśāya pāṇḍavānāṃ jayāya ca
देवराज की अनुमति से वह धृतराष्ट्र के पुत्रों के विनाश और पाण्डवों की विजय के लिए फिर पृथ्वी पर लौट आया है।
श्लोक 36 (4.3.36)
यं मन्ये द्वादशं रुद्रमादित्यानां त्रयोदशम् । वसूनां नवमं मन्ये गिरीणामष्टमः स्मृतः ॥
yaṃ manye dvādaśaṃ rudramādityānāṃ trayodaśam | vasūnāṃ navamaṃ manye girīṇāmaṣṭamaḥ smṛtaḥ
मैं उसे बारहवाँ रुद्र, तेरहवाँ आदित्य और नौवाँ वसु मानता हूँ; पर्वतों में वह आठवाँ माना जाता है।
श्लोक 37 (4.3.37)
यस्य दीर्घौ समौ बाहू ज्याघातेन किणीकृतौ । दक्षिणश्चैव सव्यश्च बाहू अनडुहो यथा ॥
yasya dīrghau samau bāhū jyāghātena kiṇīkṛtau | dakṣiṇaścaiva savyaśca bāhū anaḍuho yathā
उसकी दोनों भुजाएँ लम्बी और बराबर हैं, धनुष की डोरी की चोट से उन पर घट्ठे पड़ गए हैं—दाहिनी भी और बाईं भी—बैल के समान बलिष्ठ;
श्लोक 38 (4.3.38)
तलाङ्गुलित्राभ्युचितौ नागराजकरोपमौ । पीनौ परिघसङ्काशौ मृदुताम्रतलौ शुभौ ॥
talāṅgulitrābhyucitau nāgarājakaropamau | pīnau parighasaṅkāśau mṛdutāmratalau śubhau
वे हथेली और अँगुलियों के चर्म-रक्षकों की अभ्यस्त हैं, गजराज की सूँड़ के समान, परिघ जैसी मोटी, सुन्दर और कोमल, ताँबे-सी लाल हथेलियों वाली हैं।
श्लोक 39 (4.3.39)
श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीयश्च पाण्डवः । गाण्डीवधन्वा श्वेताश्वः किरीटी वानरध्वजः ॥
śyāmo yuvā guḍākeśo darśanīyaśca pāṇḍavaḥ | gāṇḍīvadhanvā śvetāśvaḥ kirīṭī vānaradhvajaḥ
वह पाण्डव साँवला, युवा, गुडाकेश और दर्शनीय है—गाण्डीवधारी, श्वेत घोड़ों वाला, किरीटधारी और वानरध्वज।
श्लोक 40 (4.3.40)
किंरूपधारी किंकर्मा किंचेष्टः किंपरायणः । बीभत्सुर्भीमधन्वा च किं करिष्यति चार्जुनः । कुन्तीपुत्रो विराटस्य रमते केन कर्मणा ॥
kiṃrūpadhārī kiṃkarmā kiṃceṣṭaḥ kiṃparāyaṇaḥ | bībhatsurbhīmadhanvā ca kiṃ kariṣyati cārjunaḥ | kuntīputro virāṭasya ramate kena karmaṇā
वह कैसा रूप धारण करेगा, कौन-सा काम करेगा, कैसा आचरण करेगा, किसका सहारा लेगा? भयंकर धनुष वाला बीभत्सु अर्जुन क्या करेगा? कुन्तीपुत्र विराट के यहाँ किस कर्म से रहेगा?"
अर्जुन उवाच
श्लोक 41 (4.3.41)
इमौ किणीकृतौ बाहू ज्याघाततलपीडनात् । नित्यं कञ्चुकसंछन्नौ नान्यथा गोप्तुमुत्सहे ॥
imau kiṇīkṛtau bāhū jyāghātatalapīḍanāt | nityaṃ kañcukasaṃchannau nānyathā goptumutsahe
"मेरी ये भुजाएँ डोरी और तलत्राण के दबाव से कठोर हो गई हैं। इन्हें सदा चोली से ढके रखने के सिवा मैं किसी और उपाय से नहीं छिपा सकता।
श्लोक 42 (4.3.42)
किं तु कार्यवशादेतदाचरिष्यामि कुत्सितम् ॥
kiṃ tu kāryavaśādetadācariṣyāmi kutsitam
किन्तु कार्य की विवशता से मैं यह निन्दित आचरण अपनाऊँगा।
श्लोक 43 (4.3.43)
बाहू मे भरतश्रेष्ठ महालाञ्छनलक्षितौ । ज्याघातेन महान्तौ मे गूहितुं नान्यथोत्सहे ॥
bāhū me bharataśreṣṭha mahālāñchanalakṣitau | jyāghātena mahāntau me gūhituṃ nānyathotsahe
हे भरतश्रेष्ठ, मेरी भुजाएँ बड़े-बड़े चिह्नों से अंकित हैं; डोरी की चोट से वे बहुत बड़ी हो गई हैं, और मैं उन्हें किसी और प्रकार से नहीं छिपा सकता।
श्लोक 44 (4.3.44)
उभौ कम्बू प्रतीमुच्य कुण्डले परिपातुके । वेणीकृतशिरा भूत्वा भविष्यामि बृहन्नला ॥
ubhau kambū pratīmucya kuṇḍale paripātuke | veṇīkṛtaśirā bhūtvā bhaviṣyāmi bṛhannalā
दोनों हाथों में शंख की चूड़ियाँ और कानों में लटकते कुण्डल पहनकर, सिर के बालों की वेणी बनाकर, मैं बृहन्नला बन जाऊँगा।
श्लोक 45 (4.3.45)
पठन्नाख्यायिकां नाम स्त्रीभावेन पुनः पुनः । प्रजानां समुदाचारं बहुनर्मकृतं वदन् । रमयिष्यामि राजानमन्यं चान्तःपुरे जनम् ॥
paṭhannākhyāyikāṃ nāma strībhāvena punaḥ punaḥ | prajānāṃ samudācāraṃ bahunarmakṛtaṃ vadan | ramayiṣyāmi rājānamanyaṃ cāntaḥpure janam
स्त्री-भाव से बार-बार कथाएँ सुनाते हुए और खूब हास-परिहास के साथ लोगों के आचार-व्यवहार की बातें करते हुए मैं राजा और अन्तःपुर के अन्य लोगों का मनोरंजन करूँगा।
श्लोक 46 (4.3.46)
नृत्तं गीतं च वादित्रं दिव्यं च विविधं तथा । शिक्षयिष्याम्यहं राजन्विराटनगरे स्त्रियः ॥
nṛttaṃ gītaṃ ca vāditraṃ divyaṃ ca vividhaṃ tathā | śikṣayiṣyāmyahaṃ rājanvirāṭanagare striyaḥ
राजन्, मैं विराटनगर की स्त्रियों को नृत्य, गीत और अनेक प्रकार का दिव्य वाद्य सिखाऊँगा।
श्लोक 47 (4.3.47)
स्त्रीभावसमुदाचारान्नृत्तगीतकथाश्रयैः । छादयिष्यामि राजेन्द्र माययाऽऽत्मानमात्मना ॥
strībhāvasamudācārānnṛttagītakathāśrayaiḥ | chādayiṣyāmi rājendra māyayā''tmānamātmanā
हे राजेन्द्र, स्त्रियों के आचार-व्यवहार और नृत्य, गीत तथा कथा के सहारे मैं अपनी माया से स्वयं को छिपा लूँगा।
श्लोक 48 (4.3.48)
युधिष्ठिरस्य गेहेऽस्मिन्द्रौपद्याः परिचारिका । उषिताऽस्मीति वक्ष्यामि धर्मराजस्य संमता ॥
yudhiṣṭhirasya gehe'smindraupadyāḥ paricārikā | uṣitā'smīti vakṣyāmi dharmarājasya saṃmatā
मैं कहूँगा—'मैं युधिष्ठिर के घर में द्रौपदी की परिचारिका बनकर रही हूँ, धर्मराज की सम्मानित।'
श्लोक 49 (4.3.49)
उर्वश्याश्चापि शापेन प्राप्तोस्मि नृप षण्डताम् । शक्रप्रसादान्मुक्तोऽहं वर्षादूर्ध्वं त्रयोदशात् । इत्येतन्मे प्रतिज्ञातं विचरिष्याम्यहं यथा ॥
urvaśyāścāpi śāpena prāptosmi nṛpa ṣaṇḍatām | śakraprasādānmukto'haṃ varṣādūrdhvaṃ trayodaśāt | ityetanme pratijñātaṃ vicariṣyāmyahaṃ yathā
राजन्, उर्वशी के शाप से मैं नपुंसकता को प्राप्त हुआ हूँ; इन्द्र की कृपा से तेरहवें वर्ष के बाद मैं उससे मुक्त हो जाऊँगा। यही मेरा निश्चय है और इसी प्रकार मैं विचरूँगा।
श्लोक 50 (4.3.50)
एतेन विधिना छन्नः कृतकेन यथा नलः । विहरिष्यामि राजेन्द्र विराटस्य पुरे सुखम् ॥
etena vidhinā channaḥ kṛtakena yathā nalaḥ | vihariṣyāmi rājendra virāṭasya pure sukham
हे राजेन्द्र, इसी विधि से, जैसे नल बनावटी रूप में छिपे रहे थे, वैसे ही मैं विराट के नगर में सुखपूर्वक रहूँगा।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 51 (4.3.51)
वासुदेवसमो लोके यशसा विक्रमेण च । सोयं राज्ये विराटस्य भवने भरतर्षभः ॥
vāsudevasamo loke yaśasā vikrameṇa ca | soyaṃ rājye virāṭasya bhavane bharatarṣabhaḥ
"जो यश और पराक्रम में संसार में वासुदेव के समान है, वह भरतश्रेष्ठ विराट के राज्य में, उसके महल में,
श्लोक 52 (4.3.52)
मेरुः प्रच्छादित इव वसन्वज्रेण मुष्टिना । आख्याता षण्डकोस्मीति प्रतिज्ञातं हि पातकं ॥
meruḥ pracchādita iva vasanvajreṇa muṣṭinā | ākhyātā ṣaṇḍakosmīti pratijñātaṃ hi pātakaṃ
ढके हुए मेरु की भाँति, मुट्ठी में छिपे वज्र की भाँति रहेगा; और वह कहेगा—'मैं नपुंसक हूँ'—सचमुच यह कितनी कष्टदायक प्रतिज्ञा है!"