विराट पर्व · अध्याय 4
नकुल, सहदेव और द्रौपदी के छद्म-वेश
अर्जुन के अपना छद्म-वेश बता देने पर युधिष्ठिर अपने दूसरे भाइयों से पूछते हैं कि वे राजा विराट के यहाँ कैसे रहेंगे। नकुल दामग्रन्थी नाम से अश्वाध्यक्ष बनेंगे, और सहदेव तन्त्रीपाल नाम से गायों के रक्षक और गणक। युधिष्ठिर सुकुमारी द्रौपदी के लिए चिन्तित होते हैं; द्रौपदी उत्तर देती हैं कि वे केश-सज्जा में कुशल सैरन्ध्री बनकर रानी सुदेष्णा की सेवा में रहेंगी और अपने व्रत से अपनी रक्षा करेंगी, और युधिष्ठिर उनके संकल्प की प्रशंसा करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.4.1)
इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीरस्तथार्जुनो धर्मभृतां वरिष्ठः । वाक्यं तथासौ विरराम भूयो नृपोऽपरं भ्रातरमाबभाषे ॥
ityevamuktvā puruṣapravīrastathārjuno dharmabhṛtāṃ variṣṭhaḥ | vākyaṃ tathāsau virarāma bhūyo nṛpo'paraṃ bhrātaramābabhāṣe
ऐसा कहकर पुरुषों में श्रेष्ठ वीर, धर्म का पालन करने वालों में अग्रणी अर्जुन चुप हो गए; तब राजा ने फिर अपने दूसरे भाई से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (4.4.2)
किंकर्मा किंसमाचारो नकुलोयं भविष्यति । सुकुमारश्च शूरश्च दर्शनीयः सुखोचितः ॥
kiṃkarmā kiṃsamācāro nakuloyaṃ bhaviṣyati | sukumāraśca śūraśca darśanīyaḥ sukhocitaḥ
"यह नकुल क्या काम करेगा, किस प्रकार का आचरण रखेगा? यह सुकुमार है, शूरवीर है, देखने में सुन्दर है और सुख में पला है।
श्लोक 3 (4.4.3)
अदुःखार्हश्च बालश्च लालितश्चापि नित्यशः । सोयमार्तश्च शान्तश्च किं नु रोचयतात्त्विह ॥
aduḥkhārhaśca bālaśca lālitaścāpi nityaśaḥ | soyamārtaśca śāntaśca kiṃ nu rocayatāttviha
यह दुःख के योग्य नहीं, अभी बालक है और सदा लाड़-प्यार में पला है। अब यह पीड़ित है और शान्त हो गया है — यहाँ यह क्या करना पसंद करेगा?
श्लोक 4 (4.4.4)
किं त्वं नकुल कुर्वाणस्तस्य तात चरिष्यसि । कर्म तत्त्वं समाचक्ष्व राज्ये तस्य महीपतेः ॥
kiṃ tvaṃ nakula kurvāṇastasya tāta cariṣyasi | karma tattvaṃ samācakṣva rājye tasya mahīpateḥ
तात नकुल, तुम वहाँ उसके लिए क्या काम करते हुए रहोगे? उस राजा के राज्य में तुम कौन-सा कर्म करोगे, ठीक-ठीक बताओ।"
नकुल उवाच
श्लोक 5 (4.4.5)
अश्वाध्यक्षो भविष्यामि विराटस्येति मे मतिः । दामग्रन्थीति नाम्नाऽहं कर्मैतत्सुप्रियं मम ॥
aśvādhyakṣo bhaviṣyāmi virāṭasyeti me matiḥ | dāmagranthīti nāmnā'haṃ karmaitatsupriyaṃ mama
"मेरा विचार है कि मैं विराट का अश्वाध्यक्ष बनूँगा। दामग्रन्थी मेरा नाम होगा। यह काम मुझे बहुत प्रिय है।
श्लोक 6 (4.4.6)
दामग्रन्थी परिज्ञातः कुशलो दामकर्मणि । न मां परिभविष्यन्ति जना जात्विह कर्हिचित् ॥
dāmagranthī parijñātaḥ kuśalo dāmakarmaṇi | na māṃ paribhaviṣyanti janā jātviha karhicit
दामग्रन्थी के नाम से प्रसिद्ध होकर, रस्सियों और लगामों के काम में कुशल रहते हुए, मैं ऐसा रहूँगा कि यहाँ के लोग कभी मेरा तिरस्कार न कर सकेंगे।
श्लोक 7 (4.4.7)
कुशलोऽस्म्यश्वशिक्षायां तथैवाश्वचिकित्सने । प्रियाश्च सततं मेऽश्वाः कुरुराज यथा तव ॥
kuśalo'smyaśvaśikṣāyāṃ tathaivāśvacikitsane | priyāśca satataṃ me'śvāḥ kururāja yathā tava
मैं घोड़ों को सिखाने में और उनकी चिकित्सा में भी निपुण हूँ। हे कुरुराज, घोड़े मुझे सदा वैसे ही प्रिय रहे हैं जैसे आपको।
श्लोक 8 (4.4.8)
न मां परिभविष्यन्ति किशोरा वडवास्तथा । न दुष्टाश्च भविष्यन्ति पृष्ठे धुरि च मद्गताः ॥
na māṃ paribhaviṣyanti kiśorā vaḍavāstathā | na duṣṭāśca bhaviṣyanti pṛṣṭhe dhuri ca madgatāḥ
न बछेड़े और न घोड़ियाँ मुझ पर हावी हो सकेंगी; और मेरे हाथ में आकर वे सवारी में हों या जुए में, कभी बिगड़ैल न होंगे।
श्लोक 9 (4.4.9)
द्रक्ष्यन्ति ये च मां केचिद्विराटनगरे जनाः । तेभ्य एवं प्रवक्ष्यामि विहरिष्याम्यहं यथा ॥
drakṣyanti ye ca māṃ kecidvirāṭanagare janāḥ | tebhya evaṃ pravakṣyāmi vihariṣyāmyahaṃ yathā
विराटनगर में जो भी लोग मुझे देखेंगे, उनसे मैं इस प्रकार कहूँगा — मैं इसी तरह रहूँगा:
श्लोक 10 (4.4.10)
पाण्डवेन ह्यहं तात अश्वेष्वधिकृतः पुरा । इति तस्य पुरे छन्नश्चरिष्यामि महीपते । इत्येतद्वः प्रतिज्ञातं विहरिष्याम्यहं यथा ॥
pāṇḍavena hyahaṃ tāta aśveṣvadhikṛtaḥ purā | iti tasya pure channaścariṣyāmi mahīpate | ityetadvaḥ pratijñātaṃ vihariṣyāmyahaṃ yathā
'तात, पहले पाण्डव ने मुझे अपने घोड़ों का अधिकारी बनाया था।' हे पृथ्वीपति, इस प्रकार मैं उस राजा के नगर में छिपकर रहूँगा। आप सबके सामने मेरी यही प्रतिज्ञा है; मैं इसी प्रकार रहूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (4.4.11)
नकुलेनैवमुक्तस्तु धर्मराजोऽब्रवीद्वचः । बृहस्पतिसमो बुद्ध्या नयेनोशनसा समः ॥
nakulenaivamuktastu dharmarājo'bravīdvacaḥ | bṛhaspatisamo buddhyā nayenośanasā samaḥ
नकुल के ऐसा कहने पर धर्मराज बोले। वे बुद्धि में बृहस्पति के समान और नीति में उशना के समान थे;
श्लोक 12 (4.4.12)
मन्त्रैर्नानाविधैर्नीतः पथ्येषु परिनिष्ठितः । सुप्रणीतः सुमार्गस्थो राजतन्त्रमवाप यः ॥
mantrairnānāvidhairnītaḥ pathyeṣu pariniṣṭhitaḥ | supraṇītaḥ sumārgastho rājatantramavāpa yaḥ
अनेक प्रकार की मन्त्रणाओं से मार्गदर्शन पाकर, हितकर मार्गों में दृढ़ता से स्थित, भली-भाँति शिक्षित और सन्मार्ग पर चलते हुए उन्होंने राज्य का शासन प्राप्त किया था।
श्लोक 13 (4.4.13)
न चास्य स्खलितं किंचिद्ददृशुस्तद्विदो जनाः । सुनीतिज्ञश्च शूरश्च सर्वमन्त्रविशारदः ॥
na cāsya skhalitaṃ kiṃciddadṛśustadvido janāḥ | sunītijñaśca śūraśca sarvamantraviśāradaḥ
इन बातों के जानकार लोगों ने उनमें कभी तनिक भी चूक नहीं देखी; वे उत्तम नीति के ज्ञाता, शूरवीर और सब प्रकार की मन्त्रणा में निपुण थे।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 14 (4.4.14)
अधिको मातुरस्माकं कुन्त्याः प्रियतमः सदा । सहदेव कथं कर्म तस्य राज्ञः करिष्यसि । किं वा त्वं तात कुर्वाणः प्रच्छन्नो विचरिष्यसि ॥
adhiko māturasmākaṃ kuntyāḥ priyatamaḥ sadā | sahadeva kathaṃ karma tasya rājñaḥ kariṣyasi | kiṃ vā tvaṃ tāta kurvāṇaḥ pracchanno vicariṣyasi
"सहदेव, तुम हमारी माता कुन्ती को सदा हम सबसे बढ़कर प्रिय रहे हो। तुम उस राजा का कौन-सा काम करोगे? अथवा तात, क्या करते हुए तुम छिपकर रहोगे?"
सहदेव उवाच
श्लोक 15 (4.4.15)
गोसङ्ख्याता भविष्यामि विराटस्येति रोचये । प्रतिभोक्ता च दोग्धा च सङ्ख्यानकुशलो गवाम् । तन्त्रीपालेति मे नाम स्वयं प्रोक्तं भविष्यति ॥
gosaṅkhyātā bhaviṣyāmi virāṭasyeti rocaye | pratibhoktā ca dogdhā ca saṅkhyānakuśalo gavām | tantrīpāleti me nāma svayaṃ proktaṃ bhaviṣyati
"मुझे यह अच्छा लगता है कि मैं विराट की गायों का गणक बनूँ। मैं उनका पालन करने वाला और उन्हें दुहने वाला, गायों की गणना में कुशल रहूँगा। तन्त्रीपाल — यही नाम मैं स्वयं अपना बताऊँगा।
श्लोक 16 (4.4.16)
अरोगा बहुलाः पुष्टाः क्षीरवत्यो बहुप्रजाः । निष्पन्नसत्त्वाः सुभृता ह्यपेतज्वरकिल्विषाः ॥
arogā bahulāḥ puṣṭāḥ kṣīravatyo bahuprajāḥ | niṣpannasattvāḥ subhṛtā hyapetajvarakilviṣāḥ
निरोग, संख्या में बहुत, हृष्ट-पुष्ट, खूब दूध देने वाली, बहुत बछड़ों वाली, बलवती, भली-भाँति पाली गई और ज्वर तथा रोग से मुक्त,
श्लोक 17 (4.4.17)
नष्टचोरभया नित्यं व्याधिव्याघ्रविवर्जिताः । गावः सुसहिता राजन्निरुद्विग्ना निरामयाः ॥
naṣṭacorabhayā nityaṃ vyādhivyāghravivarjitāḥ | gāvaḥ susahitā rājannirudvignā nirāmayāḥ
चोरों के भय से सदा मुक्त, रोगों और बाघों से बची हुई — हे राजन्, वे गायें भली-भाँति एक साथ रहकर निश्चिन्त और निरोग रहेंगी;
श्लोक 18 (4.4.18)
भविष्यन्ति मया गुप्ता विराटनगरे तदा । निपुणत्वं चरिष्यामि प्रीतिरत्र परा हि मे ॥
bhaviṣyanti mayā guptā virāṭanagare tadā | nipuṇatvaṃ cariṣyāmi prītiratra parā hi me
तब विराटनगर में वे मेरे द्वारा सुरक्षित रहेंगी। मैं निपुणता से काम करूँगा, क्योंकि इसी में मुझे परम आनन्द है।
श्लोक 19 (4.4.19)
अहं हि भवता गोषु प्रहितः सततं पुरा । तत्र मे कौशलं सर्वमनुबद्धं विशांपते ॥
ahaṃ hi bhavatā goṣu prahitaḥ satataṃ purā | tatra me kauśalaṃ sarvamanubaddhaṃ viśāṃpate
क्योंकि पहले आप मुझे सदा गायों की देखभाल पर भेजा करते थे; हे प्रजानाथ, मेरा सारा कौशल उसी काम में बना है।
श्लोक 20 (4.4.20)
लक्षणं चरितं चैव गवां यच्चापि मङ्गलम् । तत्सर्वं मे सुविदितमन्यच्चापि विशांपते ॥
lakṣaṇaṃ caritaṃ caiva gavāṃ yaccāpi maṅgalam | tatsarvaṃ me suviditamanyaccāpi viśāṃpate
गायों के लक्षण, उनका स्वभाव और उनमें जो कुछ मंगलकारी है — हे प्रजानाथ, यह सब मुझे भली-भाँति ज्ञात है, और इसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ।
श्लोक 21 (4.4.21)
वृषभानपि जानामि राजन्पूजितलक्षणान् । येषां मूत्रमुपाघ्राय अपि वन्ध्या प्रसूयते ॥
vṛṣabhānapi jānāmi rājanpūjitalakṣaṇān | yeṣāṃ mūtramupāghrāya api vandhyā prasūyate
हे राजन्, मैं प्रशंसित लक्षणों वाले उन साँड़ों को भी पहचानता हूँ जिनका मूत्र सूँघकर बाँझ गाय भी ब्याने लगती है।
श्लोक 22 (4.4.22)
सोऽहमेवं चरिष्यामि प्रीतिरत्र परा हि मे । विराटनगरे गूढो रंस्येऽहं तेन कर्मणा ॥
so'hamevaṃ cariṣyāmi prītiratra parā hi me | virāṭanagare gūḍho raṃsye'haṃ tena karmaṇā
इसलिए मैं इसी प्रकार रहूँगा, क्योंकि इसी में मेरा परम आनन्द है; विराटनगर में छिपकर मैं उसी काम में रमा रहूँगा।
श्लोक 23 (4.4.23)
तोषयिष्ये च राजानं मा भूच्चिन्ता तवानघ । न च मां वेत्स्यति परस्तत्ते रोचतु पार्थिव । इत्येतद्वः प्रतिज्ञातं विचरिष्याम्यहं यथा ॥
toṣayiṣye ca rājānaṃ mā bhūccintā tavānagha | na ca māṃ vetsyati parastatte rocatu pārthiva | ityetadvaḥ pratijñātaṃ vicariṣyāmyahaṃ yathā
मैं राजा को सन्तुष्ट रखूँगा; हे निष्पाप, आप चिन्ता न करें। कोई पराया मुझे पहचान नहीं पाएगा — हे राजन्, इससे आप सन्तुष्ट हों। आप सबके सामने मेरी यही प्रतिज्ञा है; मैं इसी प्रकार विचरूँगा।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 24 (4.4.24)
केनात्र कर्मणा कृष्णा द्रौपदी विचरिष्यति । न हि किंचिद्विजानाति कर्म कर्तुं यथा स्त्रियः ॥
kenātra karmaṇā kṛṣṇā draupadī vicariṣyati | na hi kiṃcidvijānāti karma kartuṃ yathā striyaḥ
"कृष्णा द्रौपदी यहाँ किस काम के सहारे रहेगी? स्त्रियाँ जो काम करती हैं, उनमें से वह कुछ भी करना नहीं जानती।
श्लोक 25 (4.4.25)
माल्यगन्धानलङ्कारान्वस्त्राणि विविधानि च । एतान्येवाभिजानाति यथाजाता च भामिनी ॥
mālyagandhānalaṅkārānvastrāṇi vividhāni ca | etānyevābhijānāti yathājātā ca bhāminī
माला, सुगन्ध, आभूषण और तरह-तरह के वस्त्र — यह सुन्दरी जन्म से बस इन्हीं को जानती आई है।
श्लोक 26 (4.4.26)
पतिव्रता महाभागा कथं नु विचरिष्यति । इयं तु नः प्रिया भार्या प्राणेभ्योपि गरीयसी ॥
pativratā mahābhāgā kathaṃ nu vicariṣyati | iyaṃ tu naḥ priyā bhāryā prāṇebhyopi garīyasī
वह पतिव्रता और महाभाग्यशालिनी कैसे निर्वाह करेगी? यह तो हमारी प्रिय पत्नी है, जो हमें प्राणों से भी बढ़कर प्यारी है।
श्लोक 27 (4.4.27)
मातेव परिपाल्या च पूज्या ज्येष्ठा स्वसेव च । सुकुमारी सुशीला च राजपुत्री यशस्विनी । कथं वत्स्यति कल्याणी विराटनगरे सती ॥
māteva paripālyā ca pūjyā jyeṣṭhā svaseva ca | sukumārī suśīlā ca rājaputrī yaśasvinī | kathaṃ vatsyati kalyāṇī virāṭanagare satī
माता की तरह उसका पालन करना है और बड़ी बहन की तरह उसका आदर। वह सुकुमारी है, सुशील है, यशस्विनी राजकुमारी है — यह कल्याणी साध्वी विराटनगर में कैसे रहेगी?"
द्रौपद्युवाच
श्लोक 28 (4.4.28)
अहं वत्स्यामि राजेन्द्र निर्वृतो भव पार्थिव । यथा ते मत्कृते शोको न भवेन्नृपते शृणु । यथा तु मां न जानन्ति यत्करिष्याम्यहं प्रभो ॥
ahaṃ vatsyāmi rājendra nirvṛto bhava pārthiva | yathā te matkṛte śoko na bhavennṛpate śṛṇu | yathā tu māṃ na jānanti yatkariṣyāmyahaṃ prabho
"हे राजेन्द्र, मैं वहाँ रह लूँगी; हे पृथ्वीपति, आप निश्चिन्त रहें। हे नरेश, सुनिए, ताकि मेरे कारण आपको शोक न हो; और हे प्रभो, सुनिए कि मैं क्या करूँगी जिससे लोग मुझे पहचान न सकें।
श्लोक 29 (4.4.29)
छन्ना वत्स्याम्यहं यन्मां न विजानन्ति केचन । वृत्तं तच्च समाख्यास्ये शर्म तेस्तु विशांपते ॥
channā vatsyāmyahaṃ yanmāṃ na vijānanti kecana | vṛttaṃ tacca samākhyāsye śarma testu viśāṃpate
मैं छिपकर ऐसे रहूँगी कि कोई मुझे पहचान न सके। मैं अपना वह आचरण आपको बताती हूँ; हे प्रजानाथ, आपको शान्ति मिले।
श्लोक 30 (4.4.30)
सैरन्ध्रीजातिसंपन्ना नाम्नाऽहं व्रतचारिणी । भविष्यामि महाराज विराटस्येति मे मतिः ॥
sairandhrījātisaṃpannā nāmnā'haṃ vratacāriṇī | bhaviṣyāmi mahārāja virāṭasyeti me matiḥ
हे महाराज, मेरा विचार है कि मैं नाम से सैरन्ध्री जाति की, व्रत का पालन करने वाली स्त्री बनकर विराट के यहाँ रहूँगी।
श्लोक 31 (4.4.31)
सैरन्ध्र्यो रक्षिताः स्त्रीणां भुजिष्याः सन्ति भारत । एकपत्न्यः स्त्रियश्चैता इति लोकस्य निश्चयः ॥
sairandhryo rakṣitāḥ strīṇāṃ bhujiṣyāḥ santi bhārata | ekapatnyaḥ striyaścaitā iti lokasya niścayaḥ
हे भारत, सैरन्ध्रियाँ कुलीन स्त्रियों के संरक्षण में रहने वाली सेविकाएँ होती हैं; और लोक की यह धारणा है कि ये स्त्रियाँ एक ही पति के प्रति निष्ठावान होती हैं।
श्लोक 32 (4.4.32)
साऽहं ब्रुवाणा सैरन्ध्री कुशला केशकर्मणि । प्रमदाहारिका लोके पुरुषाणां प्रवासिनाम् ॥
sā'haṃ bruvāṇā sairandhrī kuśalā keśakarmaṇi | pramadāhārikā loke puruṣāṇāṃ pravāsinām
मैं अपने को केश-सज्जा में कुशल सैरन्ध्री बताऊँगी — ऐसी, जो लोक में परदेस गए पुरुषों की स्त्रियों की सेवा करती है।
श्लोक 33 (4.4.33)
युधिष्ठिरस्य वै गेहे द्रौपद्याः परिचारिका । उषिताऽस्मीति वक्ष्यामि पृष्टा राज्ञा च भारत । आत्मगुप्ता चरिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥
yudhiṣṭhirasya vai gehe draupadyāḥ paricārikā | uṣitā'smīti vakṣyāmi pṛṣṭā rājñā ca bhārata | ātmaguptā cariṣyāmi yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi
हे भारत, राजा के पूछने पर मैं कहूँगी — 'मैं युधिष्ठिर के घर में द्रौपदी की परिचारिका बनकर रही हूँ।' आप मुझसे जो पूछ रहे हैं, उसका उत्तर यही है कि मैं इस प्रकार अपने को छिपाकर रहूँगी।
श्लोक 34 (4.4.34)
नाहं तत्र भविष्यामि दुर्भरा राजवेश्मनि । कृत्वा चैव सदा रक्षां व्रतेनैव नराधिप ॥
nāhaṃ tatra bhaviṣyāmi durbharā rājaveśmani | kṛtvā caiva sadā rakṣāṃ vratenaiva narādhipa
हे नराधिप, मैं वहाँ राजभवन में भार नहीं बनूँगी, और अपने व्रत के बल से ही सदा अपनी रक्षा करती रहूँगी।
श्लोक 35 (4.4.35)
सुदेष्णां प्रत्युपस्थास्ये राजभार्यां यशस्विनीम् । सा रक्षिष्यति मां प्राप्तां मा ते भूद्दुःखमीदृशम् ॥
sudeṣṇāṃ pratyupasthāsye rājabhāryāṃ yaśasvinīm | sā rakṣiṣyati māṃ prāptāṃ mā te bhūdduḥkhamīdṛśam
मैं राजा की यशस्विनी रानी सुदेष्णा की सेवा में उपस्थित होऊँगी। मेरे पहुँचने पर वे मेरी रक्षा करेंगी; आपको ऐसा दुःख न हो।
श्लोक 36 (4.4.36)
अथ गुप्ता चरिष्यामि युष्माभिस्तत्र तस्थुषी । इत्येवं वः प्रतिज्ञातं विहरिष्याम्यहं यथा ॥
atha guptā cariṣyāmi yuṣmābhistatra tasthuṣī | ityevaṃ vaḥ pratijñātaṃ vihariṣyāmyahaṃ yathā
तब आप सबके साथ वहीं रहते हुए मैं सुरक्षित होकर विचरूँगी। आप सबके सामने मेरी यही प्रतिज्ञा है; मैं इसी प्रकार रहूँगी।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 37 (4.4.37)
यथा नो दुर्हृदः पापा भवन्ति सुखिनः पुनः । कुर्यास्तथा त्वं कल्याणि लक्षयेयुर्न ते जनाः ॥
yathā no durhṛdaḥ pāpā bhavanti sukhinaḥ punaḥ | kuryāstathā tvaṃ kalyāṇi lakṣayeyurna te janāḥ
"हे कल्याणी, तुम ऐसा करना जिससे हमारे दुष्ट शत्रु फिर सुखी न हों और लोग तुम्हें पहचान न पाएँ।
श्लोक 38 (4.4.38)
कल्याणं भाषसे कृष्णे यथा कौलेयकी तथा । न पापमभिजानासि साध्वी साधुव्रते स्थिता ॥
kalyāṇaṃ bhāṣase kṛṣṇe yathā kauleyakī tathā | na pāpamabhijānāsi sādhvī sādhuvrate sthitā
कृष्णे, तुम कुलीन स्त्री की भाँति कल्याणकारी बात कह रही हो। तुम पाप को जानती ही नहीं; तुम उत्तम व्रत में स्थित साध्वी हो।"