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विराट पर्व · अध्याय 5

राजसेवा के विषय में धौम्य का उपदेश

युधिष्ठिर पुरोहित को अग्निहोत्र के साथ द्रुपद के घर, इन्द्रसेन आदि सेवकों को खाली रथों के साथ द्वारका, और द्रौपदी की दासियों को पाञ्चाल देश भेजते हैं, और सबको यह कहने का निर्देश देते हैं कि पाण्डव रात में द्वैतवन छोड़कर चले गए। फिर पुरोहित धौम्य भाइयों को विस्तार से समझाते हैं कि राजा के घर में कैसे रहना चाहिए — कहाँ बैठें और कहाँ खड़े हों, कब बोलें और कब चुप रहें, राजा की स्त्रियों, धन और प्रियजनों से कैसे दूर रहें, और दिखावे, होड़ तथा असावधानी से कैसे बचें। पाण्डव उनका उपदेश स्वीकार करते हैं, उनका आशीर्वाद लेते हैं और प्रस्थान करते हैं।

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (4.5.1)

कर्माण्युक्तानि युष्माभिर्यानि तानि चरिष्यथ । मम चापि यथा बुद्धिरुचिता हि विनिश्चयात् ॥

karmāṇyuktāni yuṣmābhiryāni tāni cariṣyatha | mama cāpi yathā buddhirucitā hi viniścayāt

"तुम लोगों ने जो-जो काम बताए हैं, वही तुम करोगे। मेरा कार्य भी, जैसा मेरी बुद्धि को उचित लगा, सोच-विचारकर निश्चित हो चुका है।

श्लोक 2 (4.5.2)

पुरोहितोऽयमस्माकमग्निहोत्राणि रक्षतु । सूतपौरोगवैः सार्धं द्रुपदस्य निवेशने ॥

purohito'yamasmākamagnihotrāṇi rakṣatu | sūtapaurogavaiḥ sārdhaṃ drupadasya niveśane

हमारे ये पुरोहित सारथियों और रसोइयों के साथ द्रुपद के घर में रहकर हमारे अग्निहोत्र की रक्षा करें।

श्लोक 3 (4.5.3)

इन्द्रसेनमुखाश्चेमे रथानादाय केवलान् । यान्तु द्वारवतीं शीघ्रमिति मे वर्तते मतिः ॥

indrasenamukhāśceme rathānādāya kevalān | yāntu dvāravatīṃ śīghramiti me vartate matiḥ

और इन्द्रसेन आदि ये सेवक केवल रथों को लेकर शीघ्र द्वारका चले जाएँ — यही मेरी सम्मति है।

श्लोक 4 (4.5.4)

इमाश्च नार्यो द्रौपद्याः सर्वाश्च परिचारिकाः । पाञ्चालानेव गच्छन्तु सूतपौरोगवैः सह ॥

imāśca nāryo draupadyāḥ sarvāśca paricārikāḥ | pāñcālāneva gacchantu sūtapaurogavaiḥ saha

और द्रौपदी की ये सब परिचारिका स्त्रियाँ सारथियों और रसोइयों के साथ पाञ्चाल देश को ही चली जाएँ।

श्लोक 5 (4.5.5)

सर्वैरपि च वक्तव्यं न प्रज्ञायन्त पाण्डवाः । अर्धरात्रे महात्मानो भिक्षादान्ब्राह्मणानपि । गता ह्यस्मानपाहाय सर्वे द्वैतवनादिति ॥

sarvairapi ca vaktavyaṃ na prajñāyanta pāṇḍavāḥ | ardharātre mahātmāno bhikṣādānbrāhmaṇānapi | gatā hyasmānapāhāya sarve dvaitavanāditi

और तुम सबको यही कहना है — 'पाण्डवों का कुछ पता नहीं। वे महात्मा आधी रात को हमें और भिक्षा पर जीने वाले ब्राह्मणों को भी छोड़कर, सब-के-सब द्वैतवन से चले गए।'"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 6 (4.5.6)

एवं तेऽन्योन्यमामन्त्र्य कर्माण्युक्त्वा पृथक्पृथक् । धौम्यमामन्त्रयामासुः स च तान्मन्त्रमब्रवीत् ॥

evaṃ te'nyonyamāmantrya karmāṇyuktvā pṛthakpṛthak | dhaumyamāmantrayāmāsuḥ sa ca tānmantramabravīt

इस प्रकार आपस में विचार करके और अलग-अलग अपने काम बताकर उन्होंने धौम्य से परामर्श किया, और धौम्य ने उन्हें अपनी सम्मति दी।

श्लोक 7 (4.5.7)

तानन्वशात्स धर्मात्मा सर्वधर्मविशेषवित् । धौम्यः पुरोहितो राजन्पाण्डवान्पुरुषर्षभान् ॥

tānanvaśātsa dharmātmā sarvadharmaviśeṣavit | dhaumyaḥ purohito rājanpāṇḍavānpuruṣarṣabhān

हे राजन्, सब धर्मों की बारीकियों को जानने वाले धर्मात्मा पुरोहित धौम्य ने उन नरश्रेष्ठ पाण्डवों को उपदेश दिया।

धौम्य उवाच

श्लोक 8 (4.5.8)

विदितं वै यथा सर्वं लोके वृत्तमिदं नृप । विदिते चापि वक्तव्यं सुहृद्भिरनुरागतः ॥

viditaṃ vai yathā sarvaṃ loke vṛttamidaṃ nṛpa | vidite cāpi vaktavyaṃ suhṛdbhiranurāgataḥ

"हे राजन्, संसार का यह सारा व्यवहार आप लोग जानते ही हैं। फिर भी जानी हुई बात भी हितैषियों को स्नेहवश कहनी चाहिए।

श्लोक 9 (4.5.9)

अतोऽहमभिवक्ष्यामि हेतुमात्रं निबोधत । हन्तेमां राजवसतिं राजपुत्रा ब्रवीमि वः । यथा राजकुलं प्राप्य चरन्प्रोष्य न रिष्यति ॥

ato'hamabhivakṣyāmi hetumātraṃ nibodhata | hantemāṃ rājavasatiṃ rājaputrā bravīmi vaḥ | yathā rājakulaṃ prāpya caranproṣya na riṣyati

इसलिए मैं कहूँगा; केवल सार-बात समझ लो। हे राजकुमारो, मैं तुम्हें राजा के घर में रहने की रीति बताता हूँ — जिससे परदेस में रहता हुआ व्यक्ति राजकुल में पहुँचकर भी हानि न उठाए।

श्लोक 10 (4.5.10)

दुर्वासमेव कौरव्य जातेन कुरुवेश्मनि । अमानितेन मानार्ह गूढेन परिवत्सरम् ॥

durvāsameva kauravya jātena kuruveśmani | amānitena mānārha gūḍhena parivatsaram

हे कौरव्य, हे सम्मान के योग्य, कुरुवंश के घर में जन्मे व्यक्ति के लिए पूरे एक वर्ष तक बिना सम्मान के और छिपकर रहना सचमुच कठिन है।

श्लोक 11 (4.5.11)

दिष्टद्वारो लभेद्द्रष्टुं राजस्वेषु न विश्वसेत् । न चानुशिष्याद्राजानमपृच्छन्तं कदाचन ॥

diṣṭadvāro labheddraṣṭuṃ rājasveṣu na viśvaset | na cānuśiṣyādrājānamapṛcchantaṃ kadācana

द्वार दिखाए जाने पर, अर्थात् अनुमति मिलने पर ही राजा के दर्शन करे, और राजा की वस्तुओं के विषय में निःशंक होकर व्यवहार न करे। बिना पूछे राजा को कभी उपदेश न दे।

श्लोक 12 (4.5.12)

तूष्णीं त्वेनमुपासीत काले समभिपूजयेत् ॥

tūṣṇīṃ tvenamupāsīta kāle samabhipūjayet

बल्कि चुपचाप उसकी सेवा में रहे और उचित समय पर उसका सम्मान करे।

श्लोक 13 (4.5.13)

असूयन्ति हि राजानो जनाननृतवादिनः । तथैव चावमन्यन्ते मन्त्रिणं वादिनं मृषा ॥

asūyanti hi rājāno janānanṛtavādinaḥ | tathaiva cāvamanyante mantriṇaṃ vādinaṃ mṛṣā

क्योंकि राजा झूठ बोलने वालों से द्वेष रखते हैं, और उसी प्रकार असत्य बोलने वाले मन्त्री का भी तिरस्कार करते हैं।

श्लोक 14 (4.5.14)

विदिते चास्य कुर्वीत कार्याणि सुलघून्यपि । एवं विचरतो राज्ञि न क्षतिर्जायते क्वचित् ॥

vidite cāsya kurvīta kāryāṇi sulaghūnyapi | evaṃ vicarato rājñi na kṣatirjāyate kvacit

छोटे-से-छोटा काम भी राजा की जानकारी में ही करे। राजा के प्रति ऐसा आचरण करने वाले की कहीं कोई हानि नहीं होती।

श्लोक 15 (4.5.15)

पाण्डवाग्निरयं लोके सर्वशस्त्रमयो महान् । भर्ता गोप्ता च भूतानां राजा पुरुषविग्रहः ॥

pāṇḍavāgnirayaṃ loke sarvaśastramayo mahān | bhartā goptā ca bhūtānāṃ rājā puruṣavigrahaḥ

हे पाण्डव, राजा इस लोक में मनुष्य का शरीर धारण किए हुए अग्नि है — महान्, समस्त शस्त्रों से युक्त, प्राणियों का भरण-पोषण करने वाला और रक्षक।

श्लोक 16 (4.5.16)

सर्वात्मना वर्तमानं यथा दोषो न संस्पृशेत् । राजानमुपतिष्ठन्तं तस्य वृत्तं निबोधत ॥

sarvātmanā vartamānaṃ yathā doṣo na saṃspṛśet | rājānamupatiṣṭhantaṃ tasya vṛttaṃ nibodhata

राजा की सेवा में उपस्थित रहने वाले का आचरण सुनो, जिससे पूरे मन से सेवा करते हुए भी उसे कोई दोष न छुए।

श्लोक 17 (4.5.17)

क्षत्रियं चैव सर्पं च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम् । नावमन्येत मेधावी कृशानपि कदाचन ॥

kṣatriyaṃ caiva sarpaṃ ca brāhmaṇaṃ ca bahuśrutam | nāvamanyeta medhāvī kṛśānapi kadācana

बुद्धिमान व्यक्ति क्षत्रिय, सर्प और बहुश्रुत ब्राह्मण का, वे दुर्बल ही क्यों न दिखें, कभी अपमान न करे।

श्लोक 18 (4.5.18)

एतत्त्रयं च पुरुषं निर्दहेदवमानितम् । राजा तस्माद्बुधैर्नित्यं पूजनीयः प्रयत्नतः ॥

etattrayaṃ ca puruṣaṃ nirdahedavamānitam | rājā tasmādbudhairnityaṃ pūjanīyaḥ prayatnataḥ

अपमानित होने पर ये तीनों मनुष्य को भस्म कर सकते हैं। इसलिए बुद्धिमानों को सदा यत्नपूर्वक राजा का सम्मान करना चाहिए।

श्लोक 19 (4.5.19)

नातिवर्तेत मर्यादां पुरुषो राजसंमतः । व्यवहारं पुनर्लोके मर्यादां पण्डिता विदुः ॥

nātivarteta maryādāṃ puruṣo rājasaṃmataḥ | vyavahāraṃ punarloke maryādāṃ paṇḍitā viduḥ

राजा का कृपापात्र पुरुष मर्यादा का उल्लंघन न करे। ज्ञानी लोग लोक में प्रचलित व्यवहार को ही मर्यादा मानते हैं।

श्लोक 20 (4.5.20)

न हि पुत्रं न नप्तारं न भ्रातरमरिन्दम । समतिक्रान्तमर्यादं पूजयन्ति पराधिपाः ॥

na hi putraṃ na naptāraṃ na bhrātaramarindama | samatikrāntamaryādaṃ pūjayanti parādhipāḥ

हे शत्रुदमन, मर्यादा लाँघने वाले पुत्र, पौत्र या भाई का भी राजा आदर नहीं करते।

श्लोक 21 (4.5.21)

गच्छन्नपि परां भूतिं भूमिपालनियोजितः । जात्यन्ध इव मन्येत मर्यादामनुचिन्तयन् ॥

gacchannapi parāṃ bhūtiṃ bhūmipālaniyojitaḥ | jātyandha iva manyeta maryādāmanucintayan

राजा द्वारा नियुक्त होकर बड़ी समृद्धि पा लेने पर भी वह अपने को जन्मान्ध के समान समझे और सदा मर्यादा का ध्यान रखे।

श्लोक 22 (4.5.22)

धृष्टो द्वारं सदा पश्यन्न च राजसु विश्वसेत् । तदेवासनमन्विच्छेद्यत्र नाभिलषेत्परः ॥

dhṛṣṭo dvāraṃ sadā paśyanna ca rājasu viśvaset | tadevāsanamanvicchedyatra nābhilaṣetparaḥ

वह आत्मविश्वासी तो हो, पर सदा द्वार का ध्यान रखे और राजाओं पर पूरा भरोसा न करे। ऐसा आसन ढूँढ़े जिसकी कोई दूसरा इच्छा न करता हो।

श्लोक 23 (4.5.23)

यत्रोपविष्टः संकल्पं नोपहन्याद्बलीयसः । तदासनं राजकुले ईप्सेत पुरुषो वसन् ॥

yatropaviṣṭaḥ saṃkalpaṃ nopahanyādbalīyasaḥ | tadāsanaṃ rājakule īpseta puruṣo vasan

राजकुल में रहने वाला पुरुष ऐसा आसन चाहे जिस पर बैठकर वह किसी अधिक बलवान की इच्छा में बाधा न डाले।

श्लोक 24 (4.5.24)

यथैनं यत्र चासीनं शङ्कयेद्दुष्टचारिणम् । न तत्रोपविशेज्जातु यो राजवसतिं वसेत् ॥

yathainaṃ yatra cāsīnaṃ śaṅkayedduṣṭacāriṇam | na tatropaviśejjātu yo rājavasatiṃ vaset

जो राजा के यहाँ रहता हो, वह कभी वहाँ न बैठे जहाँ उसे बैठा देखकर कोई उस पर दुराचारी होने का सन्देह करे।

श्लोक 25 (4.5.25)

स्वभूमौ काममासीत तिष्ठेद्वा राजसन्निधौ । न त्वेवासनमन्यस्य प्रार्थयेत कदाचन ॥

svabhūmau kāmamāsīta tiṣṭhedvā rājasannidhau | na tvevāsanamanyasya prārthayeta kadācana

वह अपने स्थान पर इच्छानुसार बैठे या राजा के समीप खड़ा रहे, पर किसी दूसरे का आसन कभी न माँगे।

श्लोक 26 (4.5.26)

परासनगतं ह्येनं परस्य परिचारकाः । परिषद्यपकर्षेयुः परिहास्येत शत्रुभिः ॥

parāsanagataṃ hyenaṃ parasya paricārakāḥ | pariṣadyapakarṣeyuḥ parihāsyeta śatrubhiḥ

क्योंकि दूसरे के आसन पर बैठे व्यक्ति को उसके सेवक सभा में खींचकर हटा सकते हैं, और शत्रु उसकी हँसी उड़ाएँगे।

श्लोक 27 (4.5.27)

नित्यं विप्रतिषिद्धं तत्पुरस्तादासनं मतम् । अर्थार्थं हि यदा भृत्यो राजानमुपतिष्ठते ॥

nityaṃ vipratiṣiddhaṃ tatpurastādāsanaṃ matam | arthārthaṃ hi yadā bhṛtyo rājānamupatiṣṭhate

जब सेवक अपने प्रयोजन से राजा की सेवा में उपस्थित होता है, तब राजा के ठीक सामने का आसन सदा वर्जित माना गया है।

श्लोक 28 (4.5.28)

दक्षिणं वाऽथ वामं वा भागमाश्रित्य पण्डितः । तिष्ठेद्विनीतवद्राजन्न पुरस्तान्न पृष्ठतः । रक्षिणामात्तशस्त्राणां पश्चात्स्थानं विधीयते ॥

dakṣiṇaṃ vā'tha vāmaṃ vā bhāgamāśritya paṇḍitaḥ | tiṣṭhedvinītavadrājanna purastānna pṛṣṭhataḥ | rakṣiṇāmāttaśastrāṇāṃ paścātsthānaṃ vidhīyate

हे राजन्, बुद्धिमान दाहिनी या बाईं ओर का स्थान लेकर विनीत भाव से खड़ा हो — न सामने, न पीछे; पीछे का स्थान शस्त्रधारी रक्षकों के लिए नियत है।

श्लोक 29 (4.5.29)

मातृगोत्रे स्वगोत्रे वा नाम्ना शीलेन वा पुनः । संग्रहार्थं मनुष्याणां नित्यमाभाषिता भवेत् ॥

mātṛgotre svagotre vā nāmnā śīlena vā punaḥ | saṃgrahārthaṃ manuṣyāṇāṃ nityamābhāṣitā bhavet

लोगों को अपने अनुकूल करने के लिए वह सदा उन्हें उनके मातृकुल या उनके अपने गोत्र से, नाम से अथवा उनके स्वभाव के अनुसार सम्बोधित करे।

श्लोक 30 (4.5.30)

पूज्यमानोपि यो राज्ञा नरो न प्रतिपूजयेत् । नैनमाराधयेज्जातु शास्ता शिष्यानिवालसान् ॥

pūjyamānopi yo rājñā naro na pratipūjayet | nainamārādhayejjātu śāstā śiṣyānivālasān

जो मनुष्य राजा से सम्मान पाकर भी बदले में सम्मान नहीं करता, उस पर राजा कभी कृपा नहीं करता, जैसे गुरु आलसी शिष्यों पर प्रसन्न नहीं होता।

श्लोक 31 (4.5.31)

नास्य युग्यं न पर्यङ्कं नासनं न रथं तथा । आरोहेत्संमतोऽस्मीति यो राजवसतिं वसेत् ॥

nāsya yugyaṃ na paryaṅkaṃ nāsanaṃ na rathaṃ tathā | ārohetsaṃmato'smīti yo rājavasatiṃ vaset

जो राजा के यहाँ रहे, वह 'मैं कृपापात्र हूँ' ऐसा सोचकर राजा के वाहन, पलंग, आसन या रथ पर न चढ़े।

श्लोक 32 (4.5.32)

यो वै गृहेभ्यः प्रवसन्क्रियमाणमनुस्मरन् । उत्थाने नित्यसंकल्पो निस्तन्द्रीः संयतात्मवान् ॥

yo vai gṛhebhyaḥ pravasankriyamāṇamanusmaran | utthāne nityasaṃkalpo nistandrīḥ saṃyatātmavān

जो घर से दूर रहता हुआ करने योग्य कार्य को स्मरण रखता है, जो उद्यम में सदा संकल्पित, आलस्यरहित और संयमी है,

श्लोक 33 (4.5.33)

परीतः क्षुत्पिपासाभ्यां विहाय परिदेवनम् । दुःखेन सुखमन्विच्छेद्यो राजवसतिं वसेत् ॥

parītaḥ kṣutpipāsābhyāṃ vihāya paridevanam | duḥkhena sukhamanvicchedyo rājavasatiṃ vaset

जो भूख-प्यास से घिरा होने पर भी विलाप छोड़कर कष्ट सहते हुए सुख की खोज करता है — वही राजा के यहाँ रह सकता है।

श्लोक 34 (4.5.34)

अन्येषु प्रेष्यमाणेषु पुरस्ताद्धीर उत्पतेत् । करिष्याम्यहमित्येव यः स राजसु सिध्यति ॥

anyeṣu preṣyamāṇeṣu purastāddhīra utpatet | kariṣyāmyahamityeva yaḥ sa rājasu sidhyati

जब दूसरों को किसी काम पर भेजा जा रहा हो, तब जो धीर पुरुष 'मैं करूँगा' कहकर सबसे पहले आगे बढ़ता है, वही राजाओं के यहाँ सफल होता है।

श्लोक 35 (4.5.35)

उष्णे वा यदि वा शीते रात्रौ वा यदि वा दिवा । आदिष्टो न विकल्पेत यः स राजसु सिद्ध्यति ॥

uṣṇe vā yadi vā śīte rātrau vā yadi vā divā | ādiṣṭo na vikalpeta yaḥ sa rājasu siddhyati

गर्मी हो या सर्दी, रात हो या दिन — आज्ञा मिलने पर जो आगा-पीछा नहीं करता, वही राजाओं के यहाँ सफल होता है।

श्लोक 36 (4.5.36)

नैव प्राप्तोऽवमन्येत सदाऽमात्यो विशारदः । मानं प्राप्तो न हृष्येत न व्यथेच्च विमानितः । ऋजुर्मृदुः सत्यवादी यः स राजसु सिद्ध्यति ॥

naiva prāpto'vamanyeta sadā'mātyo viśāradaḥ | mānaṃ prāpto na hṛṣyeta na vyathecca vimānitaḥ | ṛjurmṛduḥ satyavādī yaḥ sa rājasu siddhyati

कुशल मन्त्री ऊँचा स्थान पाकर भी कभी किसी का तिरस्कार न करे। सम्मान पाकर हर्षित न हो और अपमानित होकर दुखी न हो। जो सरल, कोमल और सत्यवादी है, वही राजाओं के यहाँ सफल होता है।

श्लोक 37 (4.5.37)

नैव लाभाद्धर्षमियान्न व्यथेच्च विमानितः । समः पूर्णतुलेव स्याद्यो राजवसतिं वसेत् ॥

naiva lābhāddharṣamiyānna vyathecca vimānitaḥ | samaḥ pūrṇatuleva syādyo rājavasatiṃ vaset

लाभ होने पर हर्षित न हो और अपमान होने पर व्यथित न हो; भरे हुए तराजू की तरह सम बना रहे — ऐसा व्यक्ति ही राजा के यहाँ रह सकता है।

श्लोक 38 (4.5.38)

अल्पेच्छो धृतिमान्राजञ्छायेवानुगतः सदा । दक्षः प्रदक्षिणो धीरः स राजवसतिं वसेत् ॥

alpeccho dhṛtimānrājañchāyevānugataḥ sadā | dakṣaḥ pradakṣiṇo dhīraḥ sa rājavasatiṃ vaset

हे राजन्, जो अल्प इच्छाओं वाला और धैर्यवान है, छाया की भाँति सदा साथ रहता है, दक्ष, विनम्र और धीर है — वह राजा के यहाँ रह सकता है।

श्लोक 39 (4.5.39)

इतिहासपुराणज्ञः कुशलः सत्कथासु च । वदान्यः सत्यवाक्चापि यो राजवसतिं वसेत् ॥

itihāsapurāṇajñaḥ kuśalaḥ satkathāsu ca | vadānyaḥ satyavākcāpi yo rājavasatiṃ vaset

जो इतिहास और पुराणों का ज्ञाता है, अच्छी कथा-वार्ता में कुशल है, उदार है और सत्य बोलने वाला है — वह राजा के यहाँ रह सकता है।

श्लोक 40 (4.5.40)

न मिथो भाषितं राज्ञो मनुष्येषु प्रकाशयेत् । यं चासूयन्ति राजानः पुरुषं नो वदेच्च तम् ॥

na mitho bhāṣitaṃ rājño manuṣyeṣu prakāśayet | yaṃ cāsūyanti rājānaḥ puruṣaṃ no vadecca tam

राजा की एकान्त में कही बात दूसरों पर प्रकट न करे, और जिस व्यक्ति से राजा द्वेष रखते हों, उससे बात न करे।

श्लोक 41 (4.5.41)

नैषां कर्मसु संयुक्तो धनं किंचिदुपस्पृशेत् । प्राप्नुयादाददानो वा बन्धं वा वधमेव वा ॥

naiṣāṃ karmasu saṃyukto dhanaṃ kiṃcidupaspṛśet | prāpnuyādādadāno vā bandhaṃ vā vadhameva vā

उनके कामों में नियुक्त होकर वह उनके धन को तनिक भी न छुए; ऐसा धन लेने वाला बन्धन या वध तक का भागी हो सकता है।

श्लोक 42 (4.5.42)

तुल्योपस्थितयोः पश्य मम चान्यस्य चोभयोः । अन्यं पुष्णाति मद्धीनमिति धीरो न मुह्यति ॥

tulyopasthitayoḥ paśya mama cānyasya cobhayoḥ | anyaṃ puṣṇāti maddhīnamiti dhīro na muhyati

देखो — जब मैं और कोई दूसरा, दोनों समान रूप से सेवा में उपस्थित हों और राजा मुझसे हीन उस दूसरे का पोषण करे, तब भी धीर पुरुष विचलित नहीं होता।

श्लोक 43 (4.5.43)

श्रेयांसं हि परित्यज्य वैद्यं कर्मणिकर्मणि । पापीयांसं प्रकुर्वीरञ्शीलमेषां तथाविधम् ॥

śreyāṃsaṃ hi parityajya vaidyaṃ karmaṇikarmaṇi | pāpīyāṃsaṃ prakurvīrañśīlameṣāṃ tathāvidham

क्योंकि राजा प्रत्येक काम में श्रेष्ठ और विद्वान को छोड़कर किसी हीन व्यक्ति को आगे कर सकते हैं; उनका स्वभाव ही ऐसा होता है।

श्लोक 44 (4.5.44)

नैषां दारेषु कुर्वीत प्राज्ञो मैत्रीं कथंचन । रक्षणं तु न सेवेत यो राजवसतिं वसेत् ॥

naiṣāṃ dāreṣu kurvīta prājño maitrīṃ kathaṃcana | rakṣaṇaṃ tu na seveta yo rājavasatiṃ vaset

बुद्धिमान व्यक्ति कभी राजाओं की स्त्रियों से मित्रता न करे, और जो राजा के यहाँ रहे, वह रक्षित अन्तःपुर में आना-जाना न रखे।

श्लोक 45 (4.5.45)

यदा ह्यभिसमीक्षेत प्रेष्यं स्त्रीभिः समागतम् । बुद्धिः परिभवेत्तस्य राजा शङ्केत वा पुनः ॥

yadā hyabhisamīkṣeta preṣyaṃ strībhiḥ samāgatam | buddhiḥ paribhavettasya rājā śaṅketa vā punaḥ

क्योंकि जब राजा किसी सेवक को स्त्रियों के साथ देखता है, तो उसके मन में उस सेवक के प्रति तिरस्कार आ जाता है, या वह उस पर सन्देह करने लगता है।

श्लोक 46 (4.5.46)

शङ्कितस्य पुनः स्त्रीषु कस्य भृत्यस्य भूमिपः । जीवितं साधु मन्येत प्रकृतिस्थो बलात्कृतः ॥

śaṅkitasya punaḥ strīṣu kasya bhṛtyasya bhūmipaḥ | jīvitaṃ sādhu manyeta prakṛtistho balātkṛtaḥ

और जिस सेवक पर स्त्रियों के विषय में सन्देह हो गया हो, उसके जीवित रहने को कौन राजा — स्वभाव से शान्त होने पर भी, विवश हो जाने पर — भला मानेगा?

श्लोक 47 (4.5.47)

हर्षवस्तुषु चाप्यत्र वर्तमानेषु केषु चित् । नातिगाढं प्रहृष्येत तान्येवास्यानुपूजयेत् ॥

harṣavastuṣu cāpyatra vartamāneṣu keṣu cit | nātigāḍhaṃ prahṛṣyeta tānyevāsyānupūjayet

और जब यहाँ हर्ष के कोई अवसर हों, तब वह अत्यधिक हर्षित न हो, बल्कि राजा के उन्हीं अवसरों का आदर करे।

श्लोक 48 (4.5.48)

हर्षाद्धि मन्दः पुरुषः स्वैरं कुर्वीत वैकृतम् । तदस्यान्तःपुरे वृत्तमीक्षां कुर्वीत भूमिपः ॥

harṣāddhi mandaḥ puruṣaḥ svairaṃ kurvīta vaikṛtam | tadasyāntaḥpure vṛttamīkṣāṃ kurvīta bhūmipaḥ

क्योंकि मूर्ख व्यक्ति हर्ष में आकर मनमाना अनुचित आचरण कर बैठता है; तब राजा अन्तःपुर में उसके आचरण पर दृष्टि रखने लगता है।

श्लोक 49 (4.5.49)

अन्तःपुरगतं ह्येनं स्त्रियः क्लीबाश्च सर्वतः । वर्तमानं यथावच्च कुत्सयेयुरसंशयम् ॥

antaḥpuragataṃ hyenaṃ striyaḥ klībāśca sarvataḥ | vartamānaṃ yathāvacca kutsayeyurasaṃśayam

क्योंकि अन्तःपुर में जाने पर, उचित आचरण करते हुए भी, स्त्रियाँ और नपुंसक सब ओर से निःसन्देह उसकी निन्दा करेंगे।

श्लोक 50 (4.5.50)

तस्माद्गम्भीरमात्मानं कृत्वा हर्षं नियम्य च । नित्यमन्तःपुरे राज्ञो न वृत्तं कीर्तयेद्बहिः ॥

tasmādgambhīramātmānaṃ kṛtvā harṣaṃ niyamya ca | nityamantaḥpure rājño na vṛttaṃ kīrtayedbahiḥ

इसलिए अपने को गम्भीर रखकर और हर्ष को वश में करके, वह राजा के अन्तःपुर की बातें कभी बाहर न कहे।

श्लोक 51 (4.5.51)

यथा हि सुमहामन्त्रो भिद्यमानो हरेत्सुखम् । एवमन्तःपुरे वृत्तं श्रूयमाणं बहिर्भवेत् ॥

yathā hi sumahāmantro bhidyamāno haretsukham | evamantaḥpure vṛttaṃ śrūyamāṇaṃ bahirbhavet

क्योंकि जैसे कोई बड़ा गुप्त मन्त्र खुल जाने पर सुख हर लेता है, वैसा ही अन्तःपुर की बात बाहर सुनी जाने पर होता है।

श्लोक 52 (4.5.52)

या तु वृत्तिरबाह्यानां बाह्यानामपि केवलम् । उभयेषां समस्तानां शृणु राजोपजीविनाम् ॥

yā tu vṛttirabāhyānāṃ bāhyānāmapi kevalam | ubhayeṣāṃ samastānāṃ śṛṇu rājopajīvinām

अब राजा के आश्रित सेवकों का आचरण सुनो — भीतर रहने वालों का, बाहर रहने वालों का, और दोनों का एक साथ।

श्लोक 53 (4.5.53)

न स्त्रियो जातु मन्येत बाह्ये वाभ्यन्तरेऽपि वा । अनुजीविनां नरेन्द्रस्तु सृजेद्धि सुमहद्भयम् ॥

na striyo jātu manyeta bāhye vābhyantare'pi vā | anujīvināṃ narendrastu sṛjeddhi sumahadbhayam

बाहर हो या भीतर, वह कभी स्त्रियों की ओर मन न ले जाए; क्योंकि ऐसा होने पर नरेश अपने आश्रितों के लिए बहुत बड़ा भय उत्पन्न कर देता है।

श्लोक 54 (4.5.54)

मत्वाऽस्य प्रियमात्मानं राजरत्नानि राजवत् । अराजा राजयोग्यानि नोपयुञ्जीत पण्डितः ॥

matvā'sya priyamātmānaṃ rājaratnāni rājavat | arājā rājayogyāni nopayuñjīta paṇḍitaḥ

जो राजा नहीं है, ऐसा बुद्धिमान व्यक्ति अपने को राजा का प्रिय मानकर भी राजा के रत्नों और राजा के योग्य वस्तुओं का राजा की भाँति उपभोग न करे।

श्लोक 55 (4.5.55)

अराजानं हि रत्नानि राजकान्तानि राजवत् । भुञ्जानं तं नरं राजा न तितिक्षेत जीवितम् ॥

arājānaṃ hi ratnāni rājakāntāni rājavat | bhuñjānaṃ taṃ naraṃ rājā na titikṣeta jīvitam

क्योंकि जो राजा न होकर भी राजाओं को प्रिय रत्नों का राजा की भाँति भोग करता है, उस मनुष्य के जीवन को राजा सहन नहीं करता।

श्लोक 56 (4.5.56)

तस्मादव्यक्तभोगेन भोक्तव्यं भूतिमिच्छता । तुल्यभोगं हि राजा तु भृत्यं कोपेन योजयेत् ॥

tasmādavyaktabhogena bhoktavyaṃ bhūtimicchatā | tulyabhogaṃ hi rājā tu bhṛtyaṃ kopena yojayet

इसलिए समृद्धि चाहने वाले को बिना दिखावे के भोग करना चाहिए; क्योंकि जो सेवक राजा के बराबर भोग करता है, उस पर राजा क्रोध करता है।

श्लोक 57 (4.5.57)

न चापत्येन संप्रीतिं राज्ञः कुर्वीत केनचित् । अधिक्षिप्तमनर्थं च द्वेष्यं च परिवर्जयेत् ॥

na cāpatyena saṃprītiṃ rājñaḥ kurvīta kenacit | adhikṣiptamanarthaṃ ca dveṣyaṃ ca parivarjayet

राजा की किसी भी सन्तान से घनिष्ठता न करे; और जो तिरस्कृत हो, अनर्थकारी हो या राजा का द्वेषपात्र हो, उससे दूर रहे।

श्लोक 58 (4.5.58)

एतां हि सेवमानस्य नरसीमां चतुर्विधाम् । द्विधा विच्छिद्यते मूलं राजमूलोपसेविनः ॥

etāṃ hi sevamānasya narasīmāṃ caturvidhām | dvidhā vicchidyate mūlaṃ rājamūlopasevinaḥ

राजा के आश्रय में सेवा करने वाला यदि इन चार प्रकार के मनुष्यों का — जो उसके लिए लाँघने योग्य सीमा नहीं — संग करता है, तो उसकी जड़ दो प्रकार से कट जाती है।

श्लोक 59 (4.5.59)

एतैस्तु विपरीता या नरसीमा नराधमैः । तथा कुर्वीत संसर्गं न विरोधं कथंचन ॥

etaistu viparītā yā narasīmā narādhamaiḥ | tathā kurvīta saṃsargaṃ na virodhaṃ kathaṃcana

किन्तु जो लोग इन अधम लोगों के विपरीत हैं, उनसे वह उसी प्रकार संग रखे और कभी उनका विरोध न करे।

श्लोक 60 (4.5.60)

बन्धुभिश्च नरेन्द्रस्य बलवद्भिश्च मानवैः । साधु मन्येत संसर्गं न विरोधं कथंचन ॥

bandhubhiśca narendrasya balavadbhiśca mānavaiḥ | sādhu manyeta saṃsargaṃ na virodhaṃ kathaṃcana

राजा के बन्धु-बान्धवों और बलवान लोगों के साथ संग रखना वह अच्छा समझे, और उनसे कभी विरोध न करे।

श्लोक 61 (4.5.61)

ताभ्यां तु नरसीमाभ्यां विरुद्धस्याल्पतेजसः । प्रथमं छिद्यते मूलं द्वितीयं जायते भयम् ॥

tābhyāṃ tu narasīmābhyāṃ viruddhasyālpatejasaḥ | prathamaṃ chidyate mūlaṃ dvitīyaṃ jāyate bhayam

जो अल्प तेज वाला व्यक्ति इन दोनों प्रकार के लोगों का विरोध करता है, उसकी पहले जड़ कटती है, फिर भय उत्पन्न होता है।

श्लोक 62 (4.5.62)

उद्धतानां च यो वेषः कुहकानां च यो भवेत् । राजवेषं च विस्पष्टं सेवमानो न वर्धते । इतराभ्यां तु वेषाभ्यां परिहास्येत बान्धवैः ॥

uddhatānāṃ ca yo veṣaḥ kuhakānāṃ ca yo bhavet | rājaveṣaṃ ca vispaṣṭaṃ sevamāno na vardhate | itarābhyāṃ tu veṣābhyāṃ parihāsyeta bāndhavaiḥ

एक वेश उद्दण्ड लोगों का होता है, एक धूर्तों का, और एक स्पष्ट राजसी वेश। राजसी वेश धारण करने वाला उन्नति नहीं करता, और अन्य दोनों वेशों के कारण अपने ही बन्धु उसकी हँसी उड़ाते हैं।

श्लोक 63 (4.5.63)

अपुंभिश्चैव पुंभिश्च स्त्रीभिः स्त्रीदर्शिभिर्नरैः । शक्ये सति न संभाषां जातु कुर्वीत कर्हिचित् ॥

apuṃbhiścaiva puṃbhiśca strībhiḥ strīdarśibhirnaraiḥ | śakye sati na saṃbhāṣāṃ jātu kurvīta karhicit

जहाँ तक सम्भव हो, वह नपुंसकों से, स्त्रियों से और स्त्रियों को ताकने वाले पुरुषों से कभी बातचीत न करे।

श्लोक 64 (4.5.64)

प्रतिसंभाषमाणो हि त्रिभिरेतैरचेतनः । श्येनः पेशीमिवादत्ते पुरुषो भूतिमात्मनः ॥

pratisaṃbhāṣamāṇo hi tribhiretairacetanaḥ | śyenaḥ peśīmivādatte puruṣo bhūtimātmanaḥ

क्योंकि जो नासमझ इन तीनों से बातचीत करता रहता है, उसकी समृद्धि वैसे ही छिन जाती है जैसे बाज़ मांस का टुकड़ा झपट ले जाता है।

श्लोक 65 (4.5.65)

ये च राज्ञाऽभिसत्कारं लभेरन्कारणादिव । तैश्च सामन्तदूतैश्च न संसज्येत कर्हिचित् ॥

ye ca rājñā'bhisatkāraṃ labherankāraṇādiva | taiśca sāmantadūtaiśca na saṃsajyeta karhicit

और जो लोग मानो किसी विशेष कारण से राजा का सत्कार पाते हैं, उनसे तथा पड़ोसी राजाओं के दूतों से वह कभी मेल-जोल न रखे।

श्लोक 66 (4.5.66)

न चान्याचरितां भूमिमसंदिष्टो महीपतेः । उपसेवेत मेधावी यो राजवसतिं वसेत् ॥

na cānyācaritāṃ bhūmimasaṃdiṣṭo mahīpateḥ | upaseveta medhāvī yo rājavasatiṃ vaset

राजा के यहाँ रहने वाला बुद्धिमान व्यक्ति राजा के आदेश के बिना उस स्थान पर न जाए जिस पर दूसरों का अधिकार हो।

श्लोक 67 (4.5.67)

न च संदर्शने राज्ञां प्रबन्धमभिसंजपेत् । अपि चैतद्दरिद्राणां व्यलीकस्थानमुत्तमम् ॥

na ca saṃdarśane rājñāṃ prabandhamabhisaṃjapet | api caitaddaridrāṇāṃ vyalīkasthānamuttamam

राजा के सामने रहते हुए वह लगातार कुछ बड़बड़ाता न रहे; दरिद्र लोगों के अप्रिय लगने का यही सबसे बड़ा कारण है।

श्लोक 68 (4.5.68)

अर्थकामा च या नारी राजानं स्यादुपस्थिता । अनुजीवी तथायुक्तां निध्यायन्दुष्यते च सः ॥

arthakāmā ca yā nārī rājānaṃ syādupasthitā | anujīvī tathāyuktāṃ nidhyāyanduṣyate ca saḥ

और जब कोई धन की इच्छा रखने वाली स्त्री राजा के पास उपस्थित हो, तब उसे एकटक देखने वाला आश्रित दोष का भागी होता है।

श्लोक 69 (4.5.69)

तस्मान्नारीं न निध्यायेत्तथायुक्तां विचक्षणः । तथा क्षुतं च वातं च निष्ठीवं चाचरेच्छनैः ॥

tasmānnārīṃ na nidhyāyettathāyuktāṃ vicakṣaṇaḥ | tathā kṣutaṃ ca vātaṃ ca niṣṭhīvaṃ cācarecchanaiḥ

इसलिए विवेकी व्यक्ति ऐसी स्त्री को एकटक न देखे। इसी प्रकार छींकना, अधोवायु छोड़ना और थूकना धीरे से, सावधानी के साथ करे।

श्लोक 70 (4.5.70)

न नर्मसु हसेज्जातु मूढवृत्तिर्हि सा स्मृता । स्मितं तु मृदुपूर्वेण दर्शयीत प्रसादजम् ॥

na narmasu hasejjātu mūḍhavṛttirhi sā smṛtā | smitaṃ tu mṛdupūrveṇa darśayīta prasādajam

हँसी-मज़ाक की बातों पर कभी ठहाका न लगाए, क्योंकि यह मूर्ख का आचरण माना गया है; बल्कि प्रसन्नता से उपजी कोमल मुस्कान दिखाए।

श्लोक 71 (4.5.71)

न चाक्षौ न भुजौ जातु न च वाक्यं समाक्षिपेत् । न च तिर्यगवेक्षेत चक्षुर्भ्यां सम्यगाचरेत् ॥

na cākṣau na bhujau jātu na ca vākyaṃ samākṣipet | na ca tiryagavekṣeta cakṣurbhyāṃ samyagācaret

वह न आँखें इधर-उधर घुमाए, न भुजाएँ झटकाए, और न किसी की बात काटे; न तिरछी दृष्टि से देखे, बल्कि आँखों का संयत प्रयोग करे।

श्लोक 72 (4.5.72)

भ्रुकुटिं च न कुर्वीत न चाङ्गुष्ठैर्लिखेन्महीम् । न च गाढं विजृम्भेत जातु राज्ञः समीपतः ॥

bhrukuṭiṃ ca na kurvīta na cāṅguṣṭhairlikhenmahīm | na ca gāḍhaṃ vijṛmbheta jātu rājñaḥ samīpataḥ

वह भौंहें न चढ़ाए, अँगूठों से धरती न कुरेदे, और राजा के समीप कभी ज़ोर से जम्हाई न ले।

श्लोक 73 (4.5.73)

न प्रशंसेन्न चासूयेत्प्रियेषु च हितेषु च । स्तूयमानेषु वा तत्र दूष्यमानेषु वा पुनः ॥

na praśaṃsenna cāsūyetpriyeṣu ca hiteṣu ca | stūyamāneṣu vā tatra dūṣyamāneṣu vā punaḥ

राजा को प्रिय और हितकर बातों की जब वहाँ प्रशंसा हो रही हो या निन्दा, तब वह न उनकी प्रशंसा करे, न उनमें दोष निकाले।

श्लोक 74 (4.5.74)

अथ संदृश्यमानेषु प्रियेषु च हितेषु च । श्रूयमाणेषु वाक्येषु वर्णयेदमृतं यथा ॥

atha saṃdṛśyamāneṣu priyeṣu ca hiteṣu ca | śrūyamāṇeṣu vākyeṣu varṇayedamṛtaṃ yathā

परन्तु जब प्रिय और हितकर बातें प्रत्यक्ष दिख रही हों और ऐसे वचन सुने जा रहे हों, तब उनका वर्णन ऐसे करे मानो वे अमृत हों।

श्लोक 75 (4.5.75)

न राज्ञः प्रतिकूलानि सेवमानः सुखी भवेत् । पुत्रो वा यदि वा भ्राता यद्यप्यात्मसमो भवेत् ॥

na rājñaḥ pratikūlāni sevamānaḥ sukhī bhavet | putro vā yadi vā bhrātā yadyapyātmasamo bhavet

राजा के प्रतिकूल आचरण करने वाला कोई सुखी नहीं रहता — चाहे वह पुत्र हो या भाई, या राजा को अपने ही समान प्रिय क्यों न हो।

श्लोक 76 (4.5.76)

अप्रमत्तो हि राजानं रञ्जयेच्छीलसंपदा । उत्थानेन तु मेधावी शौचेन विविधेन च ॥

apramatto hi rājānaṃ rañjayecchīlasaṃpadā | utthānena tu medhāvī śaucena vividhena ca

इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति सदा सावधान रहकर अपने उत्तम शील, उद्यम और अनेक प्रकार की पवित्रता से राजा को प्रसन्न रखे।

श्लोक 77 (4.5.77)

स्नानं हि वस्त्रशुद्धिश्च शारीरं शौचमुच्यते । असक्तिः प्राकृतार्थेषु द्वितीयं शौचमुच्यते ॥

snānaṃ hi vastraśuddhiśca śārīraṃ śaucamucyate | asaktiḥ prākṛtārtheṣu dvitīyaṃ śaucamucyate

स्नान और वस्त्रों की शुद्धि को शारीरिक शौच कहा जाता है; सांसारिक विषयों में आसक्ति न होना दूसरा शौच कहलाता है।

श्लोक 78 (4.5.78)

राजा भोजो विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः । य एतैः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति ॥

rājā bhojo virāṭ samrāṭ kṣatriyo bhūpatirnṛpaḥ | ya etaiḥ stūyate śabdaiḥ kastaṃ nārcitumarhati

राजा, भोज, विराट्, सम्राट्, क्षत्रिय, भूपति, नृप — जिसकी इन नामों से स्तुति होती है, उसकी पूजा कौन नहीं करेगा?

श्लोक 79 (4.5.79)

तस्माद्भक्त्या च युक्तः सन्सत्यवादी जितेन्द्रियः । मेधावी धृतिमान्प्राज्ञः संश्रयीत महीपतिम् ॥

tasmādbhaktyā ca yuktaḥ sansatyavādī jitendriyaḥ | medhāvī dhṛtimānprājñaḥ saṃśrayīta mahīpatim

इसलिए भक्ति से युक्त, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, मेधावी, धैर्यवान और बुद्धिमान होकर मनुष्य राजा का आश्रय ले।

श्लोक 80 (4.5.80)

कृतज्ञं प्राज्ञमक्षुद्रं दृढभक्तिं जितेन्द्रियम् । वर्धमानं स्थितं स्थाने संश्रयीत महीपतिम् ॥

kṛtajñaṃ prājñamakṣudraṃ dṛḍhabhaktiṃ jitendriyam | vardhamānaṃ sthitaṃ sthāne saṃśrayīta mahīpatim

वह ऐसे राजा का आश्रय ले जो कृतज्ञ, बुद्धिमान, उदारचित्त, दृढ़ अनुराग वाला, जितेन्द्रिय, उन्नतिशील और अपने पद पर दृढ़ता से स्थित हो।

श्लोक 81 (4.5.81)

एष वः समुदाचारः समुद्दिष्टो यथाविधि । यथार्थान्संप्रपत्स्यन्ते पार्थ राजोपजीविनः ॥

eṣa vaḥ samudācāraḥ samuddiṣṭo yathāvidhi | yathārthānsaṃprapatsyante pārtha rājopajīvinaḥ

हे पार्थ, यह आचार-संहिता मैंने तुम्हें विधिपूर्वक बता दी है, जिसके अनुसार चलकर राजसेवक अपने प्रयोजन प्राप्त करते हैं।

श्लोक 82 (4.5.82)

संवत्सरमिमं तावदेवंशीला बुभूषवः । ततः स्वविषयं प्राप्य यथाकामं चरिष्यथ ॥

saṃvatsaramimaṃ tāvadevaṃśīlā bubhūṣavaḥ | tataḥ svaviṣayaṃ prāpya yathākāmaṃ cariṣyatha

तो इस एक वर्ष तक ऐसा ही आचरण रखने का संकल्प करो; उसके बाद अपना राज्य पाकर तुम इच्छानुसार विचरोगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 83 (4.5.83)

तं तथेत्यब्रुवन्पार्थाः पितृकल्पं यशस्विनम् । प्रहृष्टाश्चाभिवाद्यैनमुपातिष्ठन्परंतपाः ॥

taṃ tathetyabruvanpārthāḥ pitṛkalpaṃ yaśasvinam | prahṛṣṭāścābhivādyainamupātiṣṭhanparaṃtapāḥ

पृथा के पुत्रों ने पिता-तुल्य उस यशस्वी पुरोहित से कहा — "ऐसा ही होगा।" फिर शत्रुओं को सन्ताप देने वाले वे हर्षित होकर उन्हें प्रणाम करके उनके सामने खड़े हुए।

श्लोक 84 (4.5.84)

तेषां प्रतिष्ठमानानां मन्त्रांश्च ब्राह्मणोऽजपत् । भवाय राज्यलाभाय वीर्याय विजयाय च ॥

teṣāṃ pratiṣṭhamānānāṃ mantrāṃśca brāhmaṇo'japat | bhavāya rājyalābhāya vīryāya vijayāya ca

जब वे प्रस्थान करने लगे, तब उस ब्राह्मण ने उनके कल्याण, राज्य-प्राप्ति, पराक्रम और विजय के लिए मन्त्रों का जप किया।

श्लोक 85 (4.5.85)

ततोऽब्रवीदसौ विप्रो वाचमाशीः प्रयुज्य च । स्वद्रव्यप्रतिलाभाय शत्रूणां मर्दनाय च ॥

tato'bravīdasau vipro vācamāśīḥ prayujya ca | svadravyapratilābhāya śatrūṇāṃ mardanāya ca

फिर उस विप्र ने उनकी अपनी सम्पत्ति की पुनः प्राप्ति और शत्रुओं के विनाश के लिए आशीर्वाद देते हुए यह वचन कहा —

श्लोक 86 (4.5.86)

स्वस्ति वोस्तु शिवः पन्था द्रक्ष्यामि पुनरागतान् । इत्युक्ता हृष्टमनसो गुरुणा तेन धीमता । युधिष्ठिरमुखाः सर्वे गन्तुं समुपचक्रमुः ॥

svasti vostu śivaḥ panthā drakṣyāmi punarāgatān | ityuktā hṛṣṭamanaso guruṇā tena dhīmatā | yudhiṣṭhiramukhāḥ sarve gantuṃ samupacakramuḥ

"तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो; लौटने पर मैं तुमसे फिर मिलूँगा।" उस बुद्धिमान गुरु के ऐसा कहने पर युधिष्ठिर आदि सभी प्रसन्न मन से जाने को उद्यत हुए।

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