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विराट पर्व · अध्याय 6

विराट नगर की ओर यात्रा

धौम्य प्रस्थान के संस्कार करते हैं और पाण्डव द्रौपदी के साथ निकल पड़ते हैं। वे पैदल ही काम्यक वन से यमुना के किनारे-किनारे और फिर पश्चिम की ओर वनों से होते हुए, अपने को व्याध बताकर, मत्स्य देश में पहुँचते हैं। वे धौम्य को अग्निहोत्र की सेवा के लिए विदा कर देते हैं और उनके सेवक रथों को लेकर अन्यत्र रहते हैं। नगर के पास द्रौपदी थककर आगे नहीं चल पातीं; नकुल और सहदेव थकान के कारण उन्हें उठाने में असमर्थता जताते हैं, और अर्जुन उन्हें कंधे पर उठाकर विराट की राजधानी के समीप ले आते हैं।

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.6.1)

तेऽग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा ब्राह्मणं च पुरोहितम् । अभिवाद्य ततः सर्वे प्रस्थातुमुपचक्रमुः ॥

te'gniṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā brāhmaṇaṃ ca purohitam | abhivādya tataḥ sarve prasthātumupacakramuḥ

उन्होंने अग्नि की प्रदक्षिणा की, अपने पुरोहित ब्राह्मण को प्रणाम किया और फिर सब प्रस्थान की तैयारी करने लगे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (4.6.2)

अनुशिष्टोऽस्मि भद्रं ते नैतद्वक्ताऽस्ति कश्चन । कुन्तीमृते मातरं नः पितरं च यशस्विनम् ॥

anuśiṣṭo'smi bhadraṃ te naitadvaktā'sti kaścana | kuntīmṛte mātaraṃ naḥ pitaraṃ ca yaśasvinam

"आपका कल्याण हो, आपने हमें भली-भाँति शिक्षा दी है। हमारी माता कुन्ती और हमारे यशस्वी पिता के सिवा और कोई हमें ऐसी सीख देने वाला नहीं है।

श्लोक 3 (4.6.3)

यदेवानन्तरं कार्यं तद्भवान्वक्तुमर्हति । तारणाय तु दुःखस्य प्रस्थानाय भवाय च ॥

yadevānantaraṃ kāryaṃ tadbhavānvaktumarhati | tāraṇāya tu duḥkhasya prasthānāya bhavāya ca

अब आगे जो करना उचित हो, वह आप बताइए, जिससे हम इस दुःख से पार पाएँ, यात्रा पर निकलें और हमारा कल्याण हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (4.6.4)

तेषां प्रतिष्ठमानानां धौम्यो मन्त्रानथाजपत् । सर्वविघ्नप्रशमनानर्थसिद्धिकरांस्तथा । ततः पावकमुज्ज्वाल्य मन्त्रहव्यपुरस्कृतम् ॥

teṣāṃ pratiṣṭhamānānāṃ dhaumyo mantrānathājapat | sarvavighnapraśamanānarthasiddhikarāṃstathā | tataḥ pāvakamujjvālya mantrahavyapuraskṛtam

जब वे प्रस्थान कर रहे थे, तब धौम्य ने सब विघ्नों को शान्त करने वाले और प्रयोजन सिद्ध करने वाले मन्त्रों का जप किया। फिर उन्होंने अग्नि प्रज्वलित करके मन्त्रों और आहुतियों से उसका सत्कार किया।

श्लोक 5 (4.6.5)

याज्ञसेनीं पुरस्कृत्य सर्व एव महारथाः । प्राद्रवन्सह धौम्येन बद्धशस्त्रा वनाद्वनम् ॥

yājñasenīṃ puraskṛtya sarva eva mahārathāḥ | prādravansaha dhaumyena baddhaśastrā vanādvanam

याज्ञसेनी (द्रौपदी) को आगे करके वे सभी महारथी शस्त्र बाँधे धौम्य के साथ एक वन से दूसरे वन की ओर तेज़ी से चल पड़े।

श्लोक 6 (4.6.6)

ते वीरा बद्धनिस्त्रिंशा धनुर्बाणकलापिनः । अगच्छन्भीमधन्वानः काम्यकाद्यमुनां नदीम् ॥

te vīrā baddhanistriṃśā dhanurbāṇakalāpinaḥ | agacchanbhīmadhanvānaḥ kāmyakādyamunāṃ nadīm

कमर में तलवारें बाँधे, धनुष और बाणों से भरे तूणीर लिए वे भयंकर धनुर्धर वीर काम्यक वन से यमुना नदी की ओर चले।

श्लोक 7 (4.6.7)

उत्तरेण दशार्णानां पाञ्चालान्दक्षिणेन तु । अन्तरेण यकृल्लोम्नः शूरसेनांश्च पाण्डवाः ॥

uttareṇa daśārṇānāṃ pāñcālāndakṣiṇena tu | antareṇa yakṛllomnaḥ śūrasenāṃśca pāṇḍavāḥ

दशार्ण देश के उत्तर से और पाञ्चाल देश के दक्षिण से होते हुए, यकृल्लोम और शूरसेन देशों के बीच से पाण्डव

श्लोक 8 (4.6.8)

ते तस्या दक्षिणं तीरमन्वगच्छन्पदातयः । ततः प्रत्यक्प्रयातास्ते संक्रामन्तो वनाद्वनम् ॥

te tasyā dakṣiṇaṃ tīramanvagacchanpadātayaḥ | tataḥ pratyakprayātāste saṃkrāmanto vanādvanam

पैदल ही उस नदी के दक्षिणी तट के साथ-साथ चले। फिर पश्चिम की ओर मुड़कर वे एक वन से दूसरे वन में होते हुए आगे बढ़े।

श्लोक 9 (4.6.9)

वसाना वनदुर्गेषु रमणीयेषु धन्विनः । पल्वलेषु च रम्येषु नदीनां संगमेषु च ॥

vasānā vanadurgeṣu ramaṇīyeṣu dhanvinaḥ | palvaleṣu ca ramyeṣu nadīnāṃ saṃgameṣu ca

वे धनुर्धर रमणीय वनों के भीतरी दुर्गम भागों में, सुन्दर तालाबों के किनारे और नदियों के संगमों पर ठहरते हुए चले।

श्लोक 10 (4.6.10)

द्रुमान्नानाविधाकारान्नानाविधलताकुलान् । कुसुमाढ्यान्मनःकान्ताञ्शुभगन्धान्मनोरमान् ॥

drumānnānāvidhākārānnānāvidhalatākulān | kusumāḍhyānmanaḥkāntāñśubhagandhānmanoramān

अनेक आकारों वाले, भाँति-भाँति की लताओं से घिरे, फूलों से लदे, मन को भाने वाले, सुगन्धित और मनोहर वृक्ष —

श्लोक 11 (4.6.11)

पार्था निरीक्षमाणाश्च तान्द्रुमान्पुष्पशालिनः । जिघ्रन्तः पुष्पगन्धांश्च फलगन्धान्मनोरमान् ॥

pārthā nirīkṣamāṇāśca tāndrumānpuṣpaśālinaḥ | jighrantaḥ puṣpagandhāṃśca phalagandhānmanoramān

उन पुष्पित वृक्षों को पृथा के पुत्र निहारते हुए और उनके फूलों तथा फलों की मनोहर सुगन्ध लेते हुए चलते रहे।

श्लोक 12 (4.6.12)

विध्यन्तो मृगजातानि महेष्वासा महाबलाः । उषित्वा द्वादशसमा वने परपुरंजयाः । लुब्धान्ब्रुवाणा मात्स्यस्य विषयं प्राविशंस्तदा ॥

vidhyanto mṛgajātāni maheṣvāsā mahābalāḥ | uṣitvā dvādaśasamā vane parapuraṃjayāḥ | lubdhānbruvāṇā mātsyasya viṣayaṃ prāviśaṃstadā

तरह-तरह के मृगों का शिकार करते हुए, बारह वर्ष वन में बिता चुके वे महाबली, महान धनुर्धर और शत्रुओं के नगर जीतने वाले पाण्डव अपने को व्याध बताते हुए तब मत्स्यराज के देश में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 13 (4.6.13)

तत्र धौम्यं महेष्वासाः पाण्डवेया व्यसर्जयन् । अग्निहोत्रं परिचरन्सोऽबुद्धोऽवसदाश्रमे ॥

tatra dhaumyaṃ maheṣvāsāḥ pāṇḍaveyā vyasarjayan | agnihotraṃ paricaranso'buddho'vasadāśrame

वहाँ उन महान धनुर्धर पाण्डवों ने धौम्य को विदा कर दिया। वे अग्निहोत्र की सेवा करते हुए अज्ञात रूप से एक आश्रम में रहने लगे।

श्लोक 14 (4.6.14)

ततस्तेषु प्रयातेषु पाण्डवेषु महात्मसु । इन्द्रसेनमुखाश्चैव यथोक्तं प्राप्य निर्वृताः । रथानश्वांश्च रक्षन्तः सुखमूषुः सुसंवृताः ॥

tatasteṣu prayāteṣu pāṇḍaveṣu mahātmasu | indrasenamukhāścaiva yathoktaṃ prāpya nirvṛtāḥ | rathānaśvāṃśca rakṣantaḥ sukhamūṣuḥ susaṃvṛtāḥ

उन महात्मा पाण्डवों के चले जाने पर इन्द्रसेन आदि सेवक, जैसा कहा गया था वैसे ही नियत स्थान पर पहुँचकर, रथों और घोड़ों की देखभाल करते हुए सुरक्षित और सुखपूर्वक रहने लगे।

श्लोक 15 (4.6.15)

ततो जनपदं प्राप्य कृष्णा राजानमब्रवीत् ॥

tato janapadaṃ prāpya kṛṣṇā rājānamabravīt

फिर बस्तियों वाले प्रदेश में पहुँचकर कृष्णा (द्रौपदी) ने राजा से कहा —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 16 (4.6.16)

पश्यैकपद्यो दृश्यन्ते क्षेत्रे गोष्ठं समाश्रिताः । वृक्षांश्चोपवनोपेतान्ग्रामाणां नगरस्य च ॥

paśyaikapadyo dṛśyante kṣetre goṣṭhaṃ samāśritāḥ | vṛkṣāṃścopavanopetāngrāmāṇāṃ nagarasya ca

"देखिए, पगडंडियाँ दिखाई दे रही हैं, खेतों में गोशालाएँ बनी हैं, और गाँवों तथा नगर के उपवनों वाले वृक्ष भी दिख रहे हैं।

श्लोक 17 (4.6.17)

व्यक्तं दूरे विराटस्य राजधानी भविष्यति । वसामेहापरां रात्रिं बलवान्मे परिश्रमः ॥

vyaktaṃ dūre virāṭasya rājadhānī bhaviṣyati | vasāmehāparāṃ rātriṃ balavānme pariśramaḥ

स्पष्ट है कि विराट की राजधानी अभी दूर होगी। आज की एक रात और यहीं ठहर जाएँ; मुझे बहुत थकान है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 18 (4.6.18)

इमां कमलपत्राक्षीं द्रौपदीं माद्रिनन्दन । मुहूर्तं परिगृह्यैनां बाहुभ्यां नकुल व्रज ॥

imāṃ kamalapatrākṣīṃ draupadīṃ mādrinandana | muhūrtaṃ parigṛhyaināṃ bāhubhyāṃ nakula vraja

"माद्रीनन्दन नकुल! इस कमलनयनी द्रौपदी को थोड़ी देर अपनी भुजाओं में उठाकर ले चलो।

श्लोक 19 (4.6.19)

ततोऽदूरे विराटस्य नगरं भरतर्षभ । राजधान्यां निवत्स्यामः प्रमुक्तमिव नो वनम् ॥

tato'dūre virāṭasya nagaraṃ bharatarṣabha | rājadhānyāṃ nivatsyāmaḥ pramuktamiva no vanam

हे भरतश्रेष्ठ, यहाँ से विराट का नगर दूर नहीं है। उसकी राजधानी में हम निवास करेंगे, मानो वन से छुटकारा पा गए हों।"

नकुल उवाच

श्लोक 20 (4.6.20)

पूर्वाह्णे मृगयां कृत्वा मया विद्धा मृगा वने । अटवी च मया दूरं धृता मृगवधेप्सुना ॥

pūrvāhṇe mṛgayāṃ kṛtvā mayā viddhā mṛgā vane | aṭavī ca mayā dūraṃ dhṛtā mṛgavadhepsunā

"आज सवेरे मैंने शिकार किया और वन में मृगों को बाणों से बींधा। मृगों को मारने की चाह में मैं जंगल में बहुत दूर तक गया।

श्लोक 21 (4.6.21)

विषमा ह्यतिदुर्गा च वेगवत्परिधावता । सोऽहं घर्माभितप्तो वै नैनामादातुमुत्सहे ॥

viṣamā hyatidurgā ca vegavatparidhāvatā | so'haṃ gharmābhitapto vai naināmādātumutsahe

वह जंगल ऊबड़-खाबड़ और अत्यन्त दुर्गम था और मैं तेज़ी से दौड़ता रहा। इसलिए मैं धूप से तपकर थक गया हूँ; मैं इन्हें नहीं उठा सकता।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 22 (4.6.22)

सहदेव त्वमादाय मुहूर्तं द्रौपदीं नय । राजधान्यां निवत्स्यामः सुमुक्तमिव नो वनम् ॥

sahadeva tvamādāya muhūrtaṃ draupadīṃ naya | rājadhānyāṃ nivatsyāmaḥ sumuktamiva no vanam

"सहदेव, तुम थोड़ी देर द्रौपदी को उठाकर ले चलो। हम राजधानी में निवास करेंगे, मानो वन से भली-भाँति मुक्त हो गए हों।"

सहदेव उवाच

श्लोक 23 (4.6.23)

अहमप्यस्मि तृषितः क्षुधया परिपीडितः । परिश्रान्तश्च भद्रं ते नैनामादातुमुत्सहे ॥

ahamapyasmi tṛṣitaḥ kṣudhayā paripīḍitaḥ | pariśrāntaśca bhadraṃ te naināmādātumutsahe

"मैं भी प्यासा हूँ, भूख से पीड़ित हूँ और थका हुआ भी हूँ। आपका भला हो, पर मैं इन्हें नहीं उठा सकता।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 24 (4.6.24)

एहि वीर विशालाक्ष वीरसिंह इवार्जुन । इमां कमलपत्राक्षीं द्रौपदीं द्रुपदात्मजाम् ॥

ehi vīra viśālākṣa vīrasiṃha ivārjuna | imāṃ kamalapatrākṣīṃ draupadīṃ drupadātmajām

"आओ वीर, विशाल नेत्रों वाले, वीरों में सिंह के समान अर्जुन! इस कमलनयनी द्रुपदकुमारी द्रौपदी को

श्लोक 25 (4.6.25)

परिगृह्य मुहूर्तं त्वं बाहुभ्यां कुशलं व्रज । राजधान्यां निवत्स्यामः प्रमुक्तमिव नो वनम् ॥

parigṛhya muhūrtaṃ tvaṃ bāhubhyāṃ kuśalaṃ vraja | rājadhānyāṃ nivatsyāmaḥ pramuktamiva no vanam

थोड़ी देर अपनी भुजाओं में उठाकर सकुशल ले चलो। हम राजधानी में निवास करेंगे, मानो वन से छुटकारा पा गए हों।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (4.6.26)

गुरोर्वचनमाज्ञाय संप्रहृष्टो जितेन्द्रियः । बाहुभ्यां परिगृह्याथ राजपुत्रीमनिन्दिताम् । प्रवव्राज महाबाहुरर्जुनः प्रियदर्शनाम् ॥

gurorvacanamājñāya saṃprahṛṣṭo jitendriyaḥ | bāhubhyāṃ parigṛhyātha rājaputrīmaninditām | pravavrāja mahābāhurarjunaḥ priyadarśanām

बड़े भाई की आज्ञा सुनकर जितेन्द्रिय महाबाहु अर्जुन प्रसन्न हुए। उन्होंने उस अनिन्द्य, प्रियदर्शना राजकुमारी को भुजाओं में उठाया और चल पड़े।

श्लोक 27 (4.6.27)

जटिलो वल्कलधरः शततूणीधनुर्धरः । स्कन्धे कृत्वा वरारोहां बालामायतलोचनाम् । आनीय नगराभ्याशमवातारयदर्जुनः ॥

jaṭilo valkaladharaḥ śatatūṇīdhanurdharaḥ | skandhe kṛtvā varārohāṃ bālāmāyatalocanām | ānīya nagarābhyāśamavātārayadarjunaḥ

जटाधारी, वल्कल-वस्त्र पहने, सौ तूणीर और धनुष धारण किए अर्जुन ने उस सुन्दर, विशाल नेत्रों वाली युवती को कंधे पर बिठा लिया, और नगर के समीप लाकर उतार दिया।

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