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विराट पर्व · अध्याय 7

शमी वृक्ष पर शस्त्रों को छिपाना

विराट की राजधानी के पास युधिष्ठिर कहते हैं कि उनके प्रसिद्ध आयुध, विशेषकर गाण्डीव, उनकी पहचान खोल देंगे; तब अर्जुन श्मशान के पास के एक विशाल शमी वृक्ष पर उन्हें छिपाने का उपाय सुझाते हैं। सब भाई अपने धनुषों की प्रत्यंचा उतारते हैं; आयुधों को लपेटकर वृक्ष पर ऊँचे बाँध दिया जाता है और लोगों को दूर रखने के लिए पास में एक शव बाँध दिया जाता है। युधिष्ठिर तेरहवाँ वर्ष पूरा होने तक इन्हें देवताओं को धरोहर के रूप में सौंपते हैं और कहते हैं कि ये क्रोधी भीम को न दिए जाएँ। राहगीरों से यह कहकर कि यह शव कुल-परम्परा के अनुसार रखी गई उनकी वृद्ध माता का है, पाण्डव जय, जयेश, विजय, जयत्सेन और जयद्बल — ये गुप्त नाम रखकर नगर में प्रवेश करते हैं।

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.7.1)

स राजधानीं संप्राप्य पार्थिवोऽर्जुनमब्रवीत् । इमानि पुरुषव्याघ्र आयुधानि परंतप । कस्मिन्न्यासयितव्यानि गुप्तिश्चैषां कथं भवेत् ॥

sa rājadhānīṃ saṃprāpya pārthivo'rjunamabravīt | imāni puruṣavyāghra āyudhāni paraṃtapa | kasminnyāsayitavyāni guptiścaiṣāṃ kathaṃ bhavet

राजधानी के निकट पहुँचकर राजा युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा — "हे पुरुषसिंह, हे परन्तप, इन आयुधों को हम कहाँ धरोहर के रूप में रखें? इनकी रक्षा कैसे होगी?

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (4.7.2)

सायुधा हि वयं तात प्रवेक्ष्यामः पुरं यदि । समुद्वेगं जनस्यास्य करिष्यामो न संशयः ॥

sāyudhā hi vayaṃ tāta pravekṣyāmaḥ puraṃ yadi | samudvegaṃ janasyāsya kariṣyāmo na saṃśayaḥ

तात, यदि हम शस्त्र लिए नगर में प्रवेश करेंगे तो निःसन्देह यहाँ के लोगों में घबराहट फैला देंगे।

श्लोक 3 (4.7.3)

गाण्डीवं हि नरव्याघ्र त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । कथं नाविष्कृताः स्यामो धार्तराष्ट्रस्य मारिष ॥

gāṇḍīvaṃ hi naravyāghra triṣu lokeṣu viśrutam | kathaṃ nāviṣkṛtāḥ syāmo dhārtarāṣṭrasya māriṣa

हे नरश्रेष्ठ, गाण्डीव तो तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। तब हम धृतराष्ट्र के पुत्र के सामने प्रकट होने से कैसे बच पाएँगे?

श्लोक 4 (4.7.4)

यदीदं धनुरादाय चरेम सजने पुरे । क्षिप्रं नः प्रतिजानीयुर्मनुष्या नात्र संशयः ॥

yadīdaṃ dhanurādāya carema sajane pure | kṣipraṃ naḥ pratijānīyurmanuṣyā nātra saṃśayaḥ

यदि हम यह धनुष लेकर लोगों से भरे नगर में घूमें, तो लोग हमें तुरन्त पहचान लेंगे, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 5 (4.7.5)

एकस्मिन्नपि विज्ञाते समयं नो व्यतीत्य च । भूयो द्वादशवर्षाणि प्रविशेम वनं वयम् ॥

ekasminnapi vijñāte samayaṃ no vyatītya ca | bhūyo dvādaśavarṣāṇi praviśema vanaṃ vayam

यदि हममें से एक भी पहचान लिया गया, तो हमारी शर्त टूट जाएगी और हमें फिर से बारह वर्षों के लिए वन में जाना पड़ेगा।

श्लोक 6 (4.7.6)

तस्मात्सर्वाणि शस्त्राणि प्रच्छाद्यान्यत्र यत्र वा । प्रविशेम पुरश्रेष्ठं तथा सम्यक्कृतं भवेत् ॥

tasmātsarvāṇi śastrāṇi pracchādyānyatra yatra vā | praviśema puraśreṣṭhaṃ tathā samyakkṛtaṃ bhavet

इसलिए अपने सब शस्त्रों को कहीं न कहीं छिपाकर हम इस श्रेष्ठ नगर में प्रवेश करें; तभी सब कुछ ठीक से होगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (4.7.7)

अजातशत्रोर्वचनं श्रुत्वा चैव महायशाः । उवाच धर्मपुत्रं तमर्जुनः परवीरहा ॥

ajātaśatrorvacanaṃ śrutvā caiva mahāyaśāḥ | uvāca dharmaputraṃ tamarjunaḥ paravīrahā

अजातशत्रु युधिष्ठिर के ये वचन सुनकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले महायशस्वी अर्जुन ने धर्मपुत्र से कहा —

अर्जुन उवाच

श्लोक 8 (4.7.8)

इयं वने मनुष्येन्द्र महती दृश्यते शमी । भीमशाखा दुरारोहा श्मशानस्य समीपतः ॥

iyaṃ vane manuṣyendra mahatī dṛśyate śamī | bhīmaśākhā durārohā śmaśānasya samīpataḥ

"हे नरेन्द्र, इस वन में एक विशाल शमी का वृक्ष दिखाई दे रहा है। उसकी शाखाएँ भयानक हैं, उस पर चढ़ना कठिन है, और वह श्मशान के पास है।

श्लोक 9 (4.7.9)

उत्पथे चापि जातेयं मनुष्यैर्न निषेव्यते । विपुलाऽऽकीर्णशाखा च वायसैरुपसेविता ॥

utpathe cāpi jāteyaṃ manuṣyairna niṣevyate | vipulā''kīrṇaśākhā ca vāyasairupasevitā

यह मार्ग से हटकर उगा है और मनुष्य इसके पास नहीं आते। इसकी शाखाएँ दूर तक फैली हैं और इस पर कौए बसेरा करते हैं।

श्लोक 10 (4.7.10)

स्नेहानुबद्धां पश्यामि दुरारोहामिमां शमीम् ॥

snehānubaddhāṃ paśyāmi durārohāmimāṃ śamīm

मैं देखता हूँ कि यह शमी रस से भरी और चिकनी है, इस पर चढ़ना कठिन है।

श्लोक 11 (4.7.11)

समीपे च श्मशानस्य गृहं नास्य विशेषतः । समासज्यायुधान्यस्यां गच्छामो नगरं नृप ॥

samīpe ca śmaśānasya gṛhaṃ nāsya viśeṣataḥ | samāsajyāyudhānyasyāṃ gacchāmo nagaraṃ nṛpa

यह श्मशान के समीप है और विशेषकर इसके पास कोई घर नहीं है। हे राजन्, अपने आयुध इस पर टाँगकर हम नगर की ओर चलें।

श्लोक 12 (4.7.12)

न चास्यां चारयिष्यन्ति मनुष्याः पार्थ केचन ॥

na cāsyāṃ cārayiṣyanti manuṣyāḥ pārtha kecana

हे पार्थ, लोग इसके आसपास अपने पशु भी नहीं चराएँगे।

श्लोक 13 (4.7.13)

धनुर्भिः पुरुषं कृत्वा चर्मकेशास्थिसंवृतम् । उद्बन्धमिव कृत्वा च धनुर्ज्यापाशसंवृतम् । अस्यामायुधमासज्य गच्छाम नगरं वयम् ॥

dhanurbhiḥ puruṣaṃ kṛtvā carmakeśāsthisaṃvṛtam | udbandhamiva kṛtvā ca dhanurjyāpāśasaṃvṛtam | asyāmāyudhamāsajya gacchāma nagaraṃ vayam

धनुषों से एक मनुष्य जैसा आकार बनाकर उसे चमड़े, बालों और हड्डियों से ढक दें, और धनुष की प्रत्यंचाओं के फंदों से बाँधकर उसे फाँसी पर लटके मनुष्य जैसा बना दें; फिर अपने आयुध इस वृक्ष पर टाँगकर हम नगर को चलें।

श्लोक 14 (4.7.14)

एवं परिहरिष्यन्ति मनुष्या वनचारिणः । अत्रैवं नावबुध्यन्ते मनुष्याः केचिदायुधम् ॥

evaṃ parihariṣyanti manuṣyā vanacāriṇaḥ | atraivaṃ nāvabudhyante manuṣyāḥ kecidāyudham

इस प्रकार वन में घूमने वाले लोग इससे दूर रहेंगे, और यहाँ किसी को हमारे आयुधों का पता नहीं चलेगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (4.7.15)

एवमुक्त्वा स राजानं धर्मात्मानं धनञ्जयः । प्रचक्रमे निधानाय शस्त्राणां भरतर्षभ ॥

evamuktvā sa rājānaṃ dharmātmānaṃ dhanañjayaḥ | pracakrame nidhānāya śastrāṇāṃ bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, धर्मात्मा राजा से ऐसा कहकर धनंजय शस्त्रों को छिपाने में लग गए।

श्लोक 16 (4.7.16)

तानि सर्वाणि संनह्य पञ्च पञ्चाचलोपमाः । आयुधानि कलापांश्च निस्त्रिंशानतुलप्रभान् ॥

tāni sarvāṇi saṃnahya pañca pañcācalopamāḥ | āyudhāni kalāpāṃśca nistriṃśānatulaprabhān

पाँच पर्वतों के समान वे पाँचों भाई अपने सब आयुधों, तूणीरों और अनुपम चमक वाली तलवारों को एक साथ बाँधने लगे।

श्लोक 17 (4.7.17)

ततो युधिष्ठिरो राजा सहदेवमुवाच ह । आरुह्येमां शमीं वीर निधत्स्वेहायुधानि नः ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā sahadevamuvāca ha | āruhyemāṃ śamīṃ vīra nidhatsvehāyudhāni naḥ

तब राजा युधिष्ठिर ने सहदेव से कहा — "वीर, इस शमी पर चढ़कर हमारे आयुध यहाँ रख दो।"

श्लोक 18 (4.7.18)

इति संदिश्य तं पार्थः पुनरेव धनञ्जयम् । अब्रवीदायुधानीह निधातुं भरतर्षभः ॥

iti saṃdiśya taṃ pārthaḥ punareva dhanañjayam | abravīdāyudhānīha nidhātuṃ bharatarṣabhaḥ

उसे यह आदेश देकर भरतश्रेष्ठ पार्थ युधिष्ठिर ने फिर धनंजय से भी अपने आयुध यहाँ रखने को कहा।

श्लोक 19 (4.7.19)

येन देवान्मनुष्यांश्च पिशाचोरगराक्षसान् । निवातकवचांश्चापि पौलोमांश्च परंतपः । कालकेयांश्च दुर्धर्षान्सर्वांश्चैकरथोऽजयत् ॥

yena devānmanuṣyāṃśca piśācoragarākṣasān | nivātakavacāṃścāpi paulomāṃśca paraṃtapaḥ | kālakeyāṃśca durdharṣānsarvāṃścaikaratho'jayat

जिस धनुष से उन्होंने अकेले एक रथ पर सवार होकर देवताओं, मनुष्यों, पिशाचों, नागों और राक्षसों को, निवातकवचों और पौलोमों को तथा दुर्जय कालकेयों को — सबको जीता था,

श्लोक 20 (4.7.20)

स्फीताञ्जनपदांश्चान्यानजयत्कुरुनन्दनः । तदुदग्रं महाघोरं सपत्नगणसूदनम् । अपज्यमकरोत्पार्थो गाण्डीवं च भयंकरम् ॥

sphītāñjanapadāṃścānyānajayatkurunandanaḥ | tadudagraṃ mahāghoraṃ sapatnagaṇasūdanam | apajyamakarotpārtho gāṇḍīvaṃ ca bhayaṃkaram

और जिससे कुरुनन्दन ने अन्य समृद्ध जनपदों को जीता था — उस ऊँचे, भीषण, शत्रु-समूहों का संहार करने वाले, भय उपजाने वाले गाण्डीव की प्रत्यंचा पार्थ ने उतार दी।

श्लोक 21 (4.7.21)

येन वीरः कुरुक्षेत्रमभ्यरक्षत्परंतपः । जृम्भिते च धनुःश्रेष्ठे न्यासार्थं नृपसत्तमः ॥

yena vīraḥ kurukṣetramabhyarakṣatparaṃtapaḥ | jṛmbhite ca dhanuḥśreṣṭhe nyāsārthaṃ nṛpasattamaḥ

और जिस धनुष से वीर परन्तप ने कुरुक्षेत्र की रक्षा की थी — उस श्रेष्ठ धनुष की प्रत्यंचा उतर जाने पर, धरोहर के रूप में रखने के लिए राजाओं में श्रेष्ठ

श्लोक 22 (4.7.22)

धर्मपुत्रो महातेजाः सर्वलोकवशंकरम् । भुजङ्गभोगसदृशं मणिकाञ्चनभूषितम् ॥

dharmaputro mahātejāḥ sarvalokavaśaṃkaram | bhujaṅgabhogasadṛśaṃ maṇikāñcanabhūṣitam

महातेजस्वी धर्मपुत्र ने उस धनुष को लिया जो सारे लोकों को वश में करने वाला, सर्प के शरीर के समान और मणियों तथा सोने से सजा हुआ था,

श्लोक 23 (4.7.23)

वित्रासनं दानवानां राक्षसानां च नित्यशः । धनूरत्नं महातेजा जृम्भयामास पाण्डवः ॥

vitrāsanaṃ dānavānāṃ rākṣasānāṃ ca nityaśaḥ | dhanūratnaṃ mahātejā jṛmbhayāmāsa pāṇḍavaḥ

जो दानवों और राक्षसों को सदा भयभीत करता था — उस श्रेष्ठ धनुष की प्रत्यंचा महातेजस्वी पाण्डव ने उतार दी।

श्लोक 24 (4.7.24)

पाञ्चालान्येन संग्रामे भीमसेनोऽजयत्पुरा । प्रत्यषेधद्बहूनेकः सपत्नांश्चापि दिग्जये ॥

pāñcālānyena saṃgrāme bhīmaseno'jayatpurā | pratyaṣedhadbahūnekaḥ sapatnāṃścāpi digjaye

जिस धनुष से भीमसेन ने पहले युद्ध में पाञ्चालों को जीता था और दिग्विजय में अकेले ही बहुत-से शत्रुओं को रोक दिया था;

श्लोक 25 (4.7.25)

निशम्य यस्य विस्फारं विद्रवन्ति रणे परे । पर्वतस्येव दीर्णस्य विस्फोटमशनेरिव ॥

niśamya yasya visphāraṃ vidravanti raṇe pare | parvatasyeva dīrṇasya visphoṭamaśaneriva

जिसकी टंकार सुनकर, जो फटते पर्वत या वज्र की गड़गड़ाहट जैसी थी, युद्ध में शत्रु भाग खड़े होते थे;

श्लोक 26 (4.7.26)

सैन्धवं येन राजानं जित्वा क्रुद्धः परामृशत् । येन क्रोधवशाञ्जघ्ने पर्वते गन्धमादने ॥

saindhavaṃ yena rājānaṃ jitvā kruddhaḥ parāmṛśat | yena krodhavaśāñjaghne parvate gandhamādane

जिससे उन्होंने क्रोध में भरकर सिन्धुराज (जयद्रथ) को जीतकर पकड़ लिया था; जिससे गन्धमादन पर्वत पर क्रोधवश नामक राक्षसों का वध किया था,

श्लोक 27 (4.7.27)

दिव्यं सौगन्धिकं पुष्पं येनाजैषीत्स पाण्डवः । त्रिगर्तान्येन संग्रामे जित्वा त्रैगर्तमानयत् ॥

divyaṃ saugandhikaṃ puṣpaṃ yenājaiṣītsa pāṇḍavaḥ | trigartānyena saṃgrāme jitvā traigartamānayat

जिससे उस पाण्डव ने दिव्य सौगन्धिक पुष्प प्राप्त किया था, और जिससे युद्ध में त्रिगर्तों को जीतकर वे त्रिगर्तराज को पकड़ लाए थे —

श्लोक 28 (4.7.28)

इन्द्राशनिसमस्पर्शं वज्रहाटकभूषितम् । ज्यापाशं धनुषस्तस्य भीमसेनोऽवतारयत् ॥

indrāśanisamasparśaṃ vajrahāṭakabhūṣitam | jyāpāśaṃ dhanuṣastasya bhīmaseno'vatārayat

इन्द्र के वज्र के समान प्रहार करने वाले, हीरों और सोने से सजे उस धनुष की प्रत्यंचा भीमसेन ने उतार दी।

श्लोक 29 (4.7.29)

नकुलं पुनराहूय धर्मराजो युधिष्ठिरः । उवाच येन संग्रामे सर्वशत्रूञ्जिघांससि ॥

nakulaṃ punarāhūya dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | uvāca yena saṃgrāme sarvaśatrūñjighāṃsasi

फिर धर्मराज युधिष्ठिर ने नकुल को बुलाकर कहा — "जिस धनुष से तुम युद्ध में सब शत्रुओं को मारना चाहते हो,

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 30 (4.7.30)

सुराष्ट्राञ्जितवान्येन शार्ङ्गगाण्डीवसन्निभम् । सुवर्णविकृतं सारमिन्द्रायुधनिभं वरम् ॥

surāṣṭrāñjitavānyena śārṅgagāṇḍīvasannibham | suvarṇavikṛtaṃ sāramindrāyudhanibhaṃ varam

जिससे तुमने सुराष्ट्र के लोगों को जीता था — जो शार्ङ्ग और गाण्डीव के समान, सोने से जड़ा, सुदृढ़ और इन्द्रधनुष के समान सुन्दर है —

श्लोक 31 (4.7.31)

तवानुरूपं सुकृतं चापमेतदलङ्कृतम् । तत्स्रंसयित्वा ज्यापाशं निधातुं धनुराहर ॥

tavānurūpaṃ sukṛtaṃ cāpametadalaṅkṛtam | tatsraṃsayitvā jyāpāśaṃ nidhātuṃ dhanurāhara

तुम्हारे योग्य यह सुन्दर, अलंकृत धनुष — इसकी प्रत्यंचा ढीली करके इसे रखने के लिए ले आओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 32 (4.7.32)

अजयत्पश्चिमामाशां धनुषा येन पाण्डवः । माद्रीपुत्रो महाबाहुस्ताम्रास्यो मितभाषिता ॥

ajayatpaścimāmāśāṃ dhanuṣā yena pāṇḍavaḥ | mādrīputro mahābāhustāmrāsyo mitabhāṣitā

जिस धनुष से उस पाण्डव ने पश्चिम दिशा को जीता था — ताँबे जैसे मुख वाले, मितभाषी, महाबाहु माद्रीपुत्र ने

श्लोक 33 (4.7.33)

तस्य मौर्वीमपाकर्षच्छूरः संक्रन्दनो युधि । कुले नास्ति समो रूपे यस्येति नकुलः स्मृतः ॥

tasya maurvīmapākarṣacchūraḥ saṃkrandano yudhi | kule nāsti samo rūpe yasyeti nakulaḥ smṛtaḥ

उस धनुष की डोरी उतार दी — युद्ध में शत्रुओं को रुलाने वाले उस शूरवीर ने, जिनके समान रूपवान उनके कुल में कोई नहीं है, इसीलिए वे नकुल कहलाते हैं।

श्लोक 34 (4.7.34)

सहदेवं च संप्रेक्ष्य पुनर्धर्मसुतोऽब्रवीत् । कलिङ्गान्दाक्षिणात्यांश्च मागधांश्चाजिशोभनः ॥

sahadevaṃ ca saṃprekṣya punardharmasuto'bravīt | kaliṅgāndākṣiṇātyāṃśca māgadhāṃścājiśobhanaḥ

फिर सहदेव की ओर देखकर धर्मपुत्र बोले — "हे युद्ध में शोभा पाने वाले वीर, कलिंगों, दक्षिण के निवासियों और मगधों को

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 35 (4.7.35)

येनैव शत्रून्समरे अधाक्षीररिमर्दन । तत्स्रंसयित्वा ज्यापाशं निधातुं धनुराहर ॥

yenaiva śatrūnsamare adhākṣīrarimardana | tatsraṃsayitvā jyāpāśaṃ nidhātuṃ dhanurāhara

जिस धनुष से तुमने युद्ध में उन शत्रुओं को भस्म कर दिया था, हे अरिमर्दन, उसकी प्रत्यंचा ढीली करके उसे रखने के लिए ले आओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 36 (4.7.36)

दक्षिणां दक्षिणाचारो दिशं येनाजयत्प्रभुः । अपज्यमकरोद्वीरः सहदेवस्तदायुधम् ॥

dakṣiṇāṃ dakṣiṇācāro diśaṃ yenājayatprabhuḥ | apajyamakarodvīraḥ sahadevastadāyudham

जिस धनुष से उस सदाचारी प्रभु ने दक्षिण दिशा को जीता था, उस आयुध की प्रत्यंचा वीर सहदेव ने उतार दी।

श्लोक 37 (4.7.37)

दीप्तान्खड्गांश्च सुदृढान्सुतीक्ष्णान्कनकत्सरून् । विविधान्क्षुरनाराचान्निस्त्रिंशांश्च शरानपि । आयुधानि कलापांश्च गदाश्च निदधुः सह ॥

dīptānkhaḍgāṃśca sudṛḍhānsutīkṣṇānkanakatsarūn | vividhānkṣuranārācānnistriṃśāṃśca śarānapi | āyudhāni kalāpāṃśca gadāśca nidadhuḥ saha

चमचमाती, सुदृढ़, अत्यन्त तीखी, सोने की मूठ वाली तलवारें, तरह-तरह के क्षुर और नाराच बाण, खड्ग और बाण, आयुध, तूणीर और गदाएँ — यह सब उन्होंने एक साथ रख दिया।

श्लोक 38 (4.7.38)

अथाब्रवीद्धर्मराजः सहदेवं परन्तपः । आरुह्येमां शमीं वीर निधत्स्वेहायुधानि नः ॥

athābravīddharmarājaḥ sahadevaṃ parantapaḥ | āruhyemāṃ śamīṃ vīra nidhatsvehāyudhāni naḥ

तब शत्रुओं को तपाने वाले धर्मराज ने सहदेव से कहा — "वीर, इस शमी पर चढ़कर हमारे आयुध यहाँ रख दो।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 39 (4.7.39)

इदं गोमृगमभ्याशे गतसत्वमचेतनम् । एतदुत्कृत्य वै वीर धनूंषि परिवेष्टय ॥

idaṃ gomṛgamabhyāśe gatasatvamacetanam | etadutkṛtya vai vīra dhanūṃṣi pariveṣṭaya

पास ही यह गवय (गोमृग) मरा पड़ा है, निष्प्राण। वीर, इसकी खाल उतारकर उसमें धनुषों को लपेट दो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 40 (4.7.40)

एवमुक्तो महाबाहुः सहदेवो यथोक्तवत् । शमीमारुह्य त्वरितो धनूंषि परिवेष्टयत् ॥

evamukto mahābāhuḥ sahadevo yathoktavat | śamīmāruhya tvarito dhanūṃṣi pariveṣṭayat

ऐसा कहे जाने पर महाबाहु सहदेव ने आज्ञा के अनुसार किया; वे तुरन्त शमी पर चढ़ गए और धनुषों को लपेट दिया।

श्लोक 41 (4.7.41)

शीतवातातपभयाद्वर्षत्राणाय दुर्जयः । तानि वीरो यथा जानन्निराबाधानि सर्वशः । पुनः पुनः सुसंवेष्ट्य कृत्वा सुकृतमावरम् ॥

śītavātātapabhayādvarṣatrāṇāya durjayaḥ | tāni vīro yathā jānannirābādhāni sarvaśaḥ | punaḥ punaḥ susaṃveṣṭya kṛtvā sukṛtamāvaram

सर्दी, हवा और धूप से और विशेषकर वर्षा से बचाने के लिए उस अजेय वीर ने, उन्हें पूरी तरह सुरक्षित रखने का उपाय जानते हुए, बार-बार भली-भाँति लपेटकर उनका सुन्दर आवरण बना दिया।

श्लोक 42 (4.7.42)

यत्र चापश्यत स वै तिरोवर्षाणि वर्षति । तत्र तानि दृढैः पाशैः सुगाढं पर्यबन्धत ॥

yatra cāpaśyata sa vai tirovarṣāṇi varṣati | tatra tāni dṛḍhaiḥ pāśaiḥ sugāḍhaṃ paryabandhata

जहाँ उन्होंने देखा कि वर्षा उन पर नहीं पड़ेगी, वहाँ उन्हें मज़बूत रस्सियों से कसकर बाँध दिया।

श्लोक 43 (4.7.43)

ततः परमदूरस्थमुञ्छवृत्तिकलेवरम् । प्रायोपवेशनाच्छुष्कं स्नायुचर्मास्थिसंयुतम् ॥

tataḥ paramadūrasthamuñchavṛttikalevaram | prāyopaveśanācchuṣkaṃ snāyucarmāsthisaṃyutam

फिर पास ही उञ्छवृत्ति से जीवन बिताने वाले एक व्यक्ति का शव पड़ा था, जो आमरण उपवास से सूखकर केवल नस, चमड़ी और हड्डियों का ढाँचा रह गया था।

श्लोक 44 (4.7.44)

तच्चानीय धनुर्मध्ये निबबन्धुः पाण्डवाः । उपायकुशलाः सर्वे प्रणदन्तः समब्रुवन् ॥

taccānīya dhanurmadhye nibabandhuḥ pāṇḍavāḥ | upāyakuśalāḥ sarve praṇadantaḥ samabruvan

पाण्डवों ने उसे लाकर धनुषों के बीच बाँध दिया। फिर उपाय जानने में कुशल वे सब ऊँचे स्वर में बोले —

पाण्डवा ऊचुः

श्लोक 45 (4.7.45)

अस्य बद्धस्य दौर्गन्ध्यान्मनुष्या वनचारिणः । दूरात्परिहरिष्यन्ति सशवेयं शमी इति ॥

asya baddhasya daurgandhyānmanuṣyā vanacāriṇaḥ | dūrātparihariṣyanti saśaveyaṃ śamī iti

"यहाँ बँधे इस शव की दुर्गन्ध के कारण वन में घूमने वाले लोग यह कहकर दूर से ही बचकर निकल जाएँगे कि इस शमी पर मुर्दा है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 46 (4.7.46)

अथाब्रवीन्महाराजो धर्मात्मा स युधिष्ठिरः । रज्जुभिः सुकृतं प्राज्ञ विनिर्बध्नीहि पाण्डव ॥

athābravīnmahārājo dharmātmā sa yudhiṣṭhiraḥ | rajjubhiḥ sukṛtaṃ prājña vinirbadhnīhi pāṇḍava

तब धर्मात्मा महाराज युधिष्ठिर ने कहा — "बुद्धिमान पाण्डव, इसे रस्सियों से भली-भाँति बाँध दो;

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 47 (4.7.47)

यानि चात्र विशालानि रूढमूलानि मन्यसे । तेषामुपरि बध्नीहि इदं विप्रकलेवरम् ॥

yāni cātra viśālāni rūḍhamūlāni manyase | teṣāmupari badhnīhi idaṃ viprakalevaram

जो शाखाएँ तुम्हें चौड़ी और मज़बूत जड़ वाली लगें, उनके ऊपर इस ब्राह्मण के शव को बाँध दो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 48 (4.7.48)

तच्छ्रुत्वा सहदेवस्तु पर्यबध्नत तच्छवम् ॥

tacchrutvā sahadevastu paryabadhnata tacchavam

यह सुनकर सहदेव ने उस शव को कसकर बाँध दिया।

श्लोक 49 (4.7.49)

युधिष्ठिरः शुचिर्भूत्वा मनसाऽभिप्रणम्य च । ब्रह्माणमिन्द्रं वरदं कुबेरं वरुणानिलौ ॥

yudhiṣṭhiraḥ śucirbhūtvā manasā'bhipraṇamya ca | brahmāṇamindraṃ varadaṃ kuberaṃ varuṇānilau

युधिष्ठिर ने पवित्र होकर मन ही मन ब्रह्मा, वरदायक इन्द्र, कुबेर, वरुण और वायु को,

श्लोक 50 (4.7.50)

रुद्रं यमं च विष्णुं च सोमार्कौ धर्ममेव च । पृथिवीमन्तरिक्षं च दिशश्चोपदिशस्तथा । वसूंश्च मरुतश्चैव ज्वलनं चातितेजसम् ॥

rudraṃ yamaṃ ca viṣṇuṃ ca somārkau dharmameva ca | pṛthivīmantarikṣaṃ ca diśaścopadiśastathā | vasūṃśca marutaścaiva jvalanaṃ cātitejasam

रुद्र, यम और विष्णु को, चन्द्रमा, सूर्य और धर्म को, पृथ्वी और आकाश को, दिशाओं और उपदिशाओं को, वसुओं और मरुतों को तथा अत्यन्त तेजस्वी अग्नि को प्रणाम किया।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 51 (4.7.51)

दिवाचरा रात्रिचराणि वाऽपि यानीह भूतान्यनुकीर्तितानि । तेभ्यो नमस्कृत्य च सुव्रतेभ्यः प्रणम्य तेषां शरणं गतोऽहम् ॥

divācarā rātricarāṇi vā'pi yānīha bhūtānyanukīrtitāni | tebhyo namaskṛtya ca suvratebhyaḥ praṇamya teṣāṃ śaraṇaṃ gato'ham

"दिन में विचरने वाले और रात में विचरने वाले जिन प्राणियों का यहाँ नाम लिया गया है, उन व्रतधारियों को नमस्कार करके और प्रणाम करके मैं उनकी शरण में आया हूँ।

श्लोक 52 (4.7.52)

सर्वायुधानीह महाबलानि न्यासं महादेवसमीपतो वै । न्यस्याम्यहं वायुसमीपतश्च वनस्पतीनां च सपर्वतानाम् ॥

sarvāyudhānīha mahābalāni nyāsaṃ mahādevasamīpato vai | nyasyāmyahaṃ vāyusamīpataśca vanaspatīnāṃ ca saparvatānām

ये सब महाबली आयुध मैं यहाँ महादेव और वायु के सान्निध्य में तथा वृक्षों और पर्वतों के समीप धरोहर के रूप में रखता हूँ।

श्लोक 53 (4.7.53)

एष न्यासो मया दत्तः सोमसूर्यानिलान्तिके । मम पार्थस्य वा देयं पूर्णे वर्षे त्रयोदशे ॥

eṣa nyāso mayā dattaḥ somasūryānilāntike | mama pārthasya vā deyaṃ pūrṇe varṣe trayodaśe

यह धरोहर मैंने चन्द्रमा, सूर्य और वायु के सामने सौंपी है। तेरहवाँ वर्ष पूरा होने पर यह मुझे या अर्जुन को लौटाई जाए।

श्लोक 54 (4.7.54)

नेदं भीमे प्रदातव्यमयं क्रुद्धो वृकोदरः । आमर्षान्नित्यसंक्रुद्धो धृतराष्ट्रसुतान्प्रति । अपूर्णकाले प्रहरेत्क्रोधसंजातमत्सरः ॥

nedaṃ bhīme pradātavyamayaṃ kruddho vṛkodaraḥ | āmarṣānnityasaṃkruddho dhṛtarāṣṭrasutānprati | apūrṇakāle praharetkrodhasaṃjātamatsaraḥ

इसे भीम को न दिया जाए, क्योंकि वृकोदर क्रोधी है। धृतराष्ट्र के पुत्रों के प्रति अमर्ष के कारण वह सदा क्रुद्ध रहता है, और क्रोध से उपजी ईर्ष्या के वश समय पूरा होने से पहले ही प्रहार कर सकता है।

श्लोक 55 (4.7.55)

पुनः प्रवेशो नः स्यात्तु वनवासाय सर्वदा । समये परिपूर्णे तु धार्तराष्ट्रान्निहन्महे ॥

punaḥ praveśo naḥ syāttu vanavāsāya sarvadā | samaye paripūrṇe tu dhārtarāṣṭrānnihanmahe

तब हमें सदा के लिए फिर से वन में रहने जाना पड़ेगा। पर समय पूरा हो जाने पर हम धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करेंगे।

श्लोक 56 (4.7.56)

एष चार्थश्च धर्मश्च कामः कीर्तिरलं यशः । मदायत्तमिदं सर्वं जीवितं च न संशयः ॥

eṣa cārthaśca dharmaśca kāmaḥ kīrtiralaṃ yaśaḥ | madāyattamidaṃ sarvaṃ jīvitaṃ ca na saṃśayaḥ

अर्थ, धर्म, काम, कीर्ति और पूरा यश — यह सब, और जीवन भी, मुझ पर ही निर्भर है, इसमें सन्देह नहीं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 57 (4.7.57)

दैवतेभ्यो नमस्कृत्य शमीं कृत्वा प्रदक्षिणम् । नगरं गन्तुमायाताः सर्वे ते भ्रातरः सह ॥

daivatebhyo namaskṛtya śamīṃ kṛtvā pradakṣiṇam | nagaraṃ gantumāyātāḥ sarve te bhrātaraḥ saha

देवताओं को नमस्कार करके और शमी की प्रदक्षिणा करके सब भाई एक साथ नगर की ओर चल पड़े।

श्लोक 58 (4.7.58)

आगोपालाविपालेभ्यः कर्षकेभ्यः परंतप । आजग्मुर्नगराभ्याशं दर्शयन्तः पुनः पुनः ॥

āgopālāvipālebhyaḥ karṣakebhyaḥ paraṃtapa | ājagmurnagarābhyāśaṃ darśayantaḥ punaḥ punaḥ

हे परन्तप, ग्वालों और गड़रियों से लेकर किसानों तक सबको बार-बार वह दिखाते हुए वे नगर के समीप आ पहुँचे।

पाण्डवा ऊचुः

श्लोक 59 (4.7.59)

अशीतिशतवर्षेयं माताऽस्माकमिहान्तिके । बहुकालपरीणामा मृत्योस्तु वशमेयुषी । न चाग्निसंस्कारमियं प्रापिता कुलधर्मतः ॥

aśītiśatavarṣeyaṃ mātā'smākamihāntike | bahukālaparīṇāmā mṛtyostu vaśameyuṣī | na cāgnisaṃskāramiyaṃ prāpitā kuladharmataḥ

"ये हमारी एक सौ अस्सी वर्ष की माता हैं, जो यहाँ पास ही हैं। लम्बी आयु भोगकर ये मृत्यु के वश में हो गई हैं, और हमारे कुलधर्म के अनुसार इनका अग्नि-संस्कार नहीं किया गया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 60 (4.7.60)

यः समासाद्यते कश्चित्तस्मिन्देशे यदृच्छया । तमेवमूचुर्धर्मज्ञाः कुलधर्मो न ईदृशः ॥

yaḥ samāsādyate kaścittasmindeśe yadṛcchayā | tamevamūcurdharmajñāḥ kuladharmo na īdṛśaḥ

उस स्थान पर संयोग से जो कोई उन्हें मिलता, उससे वे धर्मज्ञ यही कहते — "हमारा कुलधर्म ऐसा ही है।"

श्लोक 61 (4.7.61)

विश्रावयन्तस्ते हृष्टा दिशः सर्वा व्यनादयन् । स्वर्गतेयमिहास्माकं जननी शोकविह्वला ॥

viśrāvayantaste hṛṣṭā diśaḥ sarvā vyanādayan | svargateyamihāsmākaṃ jananī śokavihvalā

यह बात चारों ओर फैलाते हुए उन्होंने प्रसन्न मन से सब दिशाओं को गुँजा दिया — "यहाँ हमारी शोकाकुल माता स्वर्ग सिधार गई हैं।

पाण्डवा ऊचुः

श्लोक 62 (4.7.62)

वने विचरमाणानां लुब्धानां वनचारिणाम् । कुलधर्मोऽयमस्माकं पूर्वैराचरितः पुरा ॥

vane vicaramāṇānāṃ lubdhānāṃ vanacāriṇām | kuladharmo'yamasmākaṃ pūrvairācaritaḥ purā

हम वन में घूमने वाले व्याध हैं, और यह हमारा कुलधर्म है, जिसका पालन हमारे पूर्वज प्राचीन काल से करते आए हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 63 (4.7.63)

एवं ते सुकृतं कृत्वा समन्तादवघुष्य च । भीमसेनोऽर्जुनश्चैव माद्रीपुत्रावुभावपि ॥

evaṃ te sukṛtaṃ kṛtvā samantādavaghuṣya ca | bhīmaseno'rjunaścaiva mādrīputrāvubhāvapi

इस प्रकार यह कार्य कुशलता से करके और चारों ओर घोषणा करके भीमसेन, अर्जुन, दोनों माद्रीपुत्र,

श्लोक 64 (4.7.64)

युधिष्ठिरश्च कृष्णा च राजपत्नी सुमध्यमा । ततो यथासमाज्ञप्तं नगरं प्राविशंस्तदा ॥

yudhiṣṭhiraśca kṛṣṇā ca rājapatnī sumadhyamā | tato yathāsamājñaptaṃ nagaraṃ prāviśaṃstadā

युधिष्ठिर और पतली कमर वाली रानी कृष्णा — ये सब तब पहले से तय योजना के अनुसार नगर में प्रविष्ट हुए,

श्लोक 65 (4.7.65)

मत्स्यराज्ञो विराटस्य समीपं वस्तुमञ्जसा । अज्ञातचर्यां चरितुं वर्षं राष्ट्रे त्रयोदशम् ॥

matsyarājño virāṭasya samīpaṃ vastumañjasā | ajñātacaryāṃ carituṃ varṣaṃ rāṣṭre trayodaśam

ताकि मत्स्यराज विराट के पास सहज ही रह सकें और उनके राज्य में तेरहवाँ वर्ष अज्ञातवास में बिता सकें।

श्लोक 66 (4.7.66)

अतश्छन्नानि नामानि चकारैषां युधिष्ठिरः । जयो जयेशो विजयो जयत्सेनो जयद्बलः । आपत्सु नामभिस्त्वेतैः समाह्वामः परस्परम् ॥

ataśchannāni nāmāni cakāraiṣāṃ yudhiṣṭhiraḥ | jayo jayeśo vijayo jayatseno jayadbalaḥ | āpatsu nāmabhistvetaiḥ samāhvāmaḥ parasparam

इसलिए युधिष्ठिर ने उनके गुप्त नाम रखे — जय, जयेश, विजय, जयत्सेन और जयद्बल — और कहा, "संकट के समय हम इन्हीं नामों से एक-दूसरे को पुकारेंगे।"

श्लोक 67 (4.7.67)

ततो यथाप्रतिज्ञाभिः प्राविशन्नगरं महत् । अज्ञातचर्यां वत्स्यन्तो राष्ट्रे वर्षं त्रयोदशम् ॥

tato yathāpratijñābhiḥ prāviśannagaraṃ mahat | ajñātacaryāṃ vatsyanto rāṣṭre varṣaṃ trayodaśam

फिर अपनी प्रतिज्ञाओं के अनुसार वे उस विशाल नगर में प्रविष्ट हुए, ताकि उस राज्य में तेरहवाँ वर्ष अज्ञात रूप से बिता सकें।

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