विराट पर्व · अध्याय 8
युधिष्ठिर द्वारा दुर्गा की स्तुति
विराट नगर में जाते समय युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ देवी दुर्गा की स्तुति करते हैं — जो यशोदा से जन्मी, वासुदेव की बहन, महिषासुर का वध करने वाली और विन्ध्याचल पर निवास करने वाली हैं, तथा पुकारने वालों को हर संकट से उबारती हैं। प्रसन्न होकर देवी उन्हें दर्शन देती हैं, कौरव-सेना पर विजय और राज्य की पुनः प्राप्ति का वचन देती हैं, इस स्तोत्र का पाठ करने वालों को आशीर्वाद देती हैं, और पाण्डवों को आश्वस्त करती हैं कि विराट नगर में कोई उन्हें पहचान नहीं पाएगा; फिर वे अन्तर्धान हो जाती हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.8.1)
विराटनगरं रम्यं गच्छमानो युधिष्ठिरः । अस्तुवन्मनसा देवीं दुर्गां त्रिभुवनेश्वरीम् ॥
virāṭanagaraṃ ramyaṃ gacchamāno yudhiṣṭhiraḥ | astuvanmanasā devīṃ durgāṃ tribhuvaneśvarīm
रमणीय विराटनगर की ओर जाते हुए युधिष्ठिर ने मन ही मन त्रिभुवन की स्वामिनी देवी दुर्गा की स्तुति की —
श्लोक 2 (4.8.2)
यशोदागर्भसंभूतां नारायणवरप्रियाम् । नन्दगोपकुले जातां मङ्गल्यां कुलवर्धनीम् ॥
yaśodāgarbhasaṃbhūtāṃ nārāyaṇavarapriyām | nandagopakule jātāṃ maṅgalyāṃ kulavardhanīm
जो यशोदा के गर्भ से उत्पन्न हुईं, नारायण की अत्यन्त प्रिय हैं, नन्दगोप के कुल में जन्मीं, मंगलमयी और कुल की वृद्धि करने वाली हैं;
श्लोक 3 (4.8.3)
कंसविद्रावणकरीमसुराणां क्षयंकरीम् । शिलातटविनिक्षिप्तामाकाशं प्रति गामिनीम् ॥
kaṃsavidrāvaṇakarīmasurāṇāṃ kṣayaṃkarīm | śilātaṭavinikṣiptāmākāśaṃ prati gāminīm
जिन्होंने कंस को भयभीत करके भगाया और असुरों का संहार किया; जो शिला पर पटकी जाने पर आकाश की ओर चली गईं;
श्लोक 4 (4.8.4)
वासुदेवस्य भगिनीं दिव्यमाल्यविभूषिताम् । दिव्याम्बरधरां देवीं खड्गखेटकधारिणीम् ॥
vāsudevasya bhaginīṃ divyamālyavibhūṣitām | divyāmbaradharāṃ devīṃ khaḍgakheṭakadhāriṇīm
जो वासुदेव (श्रीकृष्ण) की बहन हैं, दिव्य मालाओं से विभूषित हैं, दिव्य वस्त्र धारण करती हैं और खड्ग तथा ढाल लिए रहती हैं।
श्लोक 5 (4.8.5)
भारावतरणे पुण्ये ये स्मरन्ति सदा शिवाम् । तान्वै तारयते पापात्पङ्के गामिव दुर्बलाम् ॥
bhārāvataraṇe puṇye ye smaranti sadā śivām | tānvai tārayate pāpātpaṅke gāmiva durbalām
पृथ्वी का भार उतारने के उस पुण्य अवसर पर जो लोग उस कल्याणमयी देवी का सदा स्मरण करते हैं, उन्हें वे पाप से वैसे ही उबार लेती हैं जैसे कीचड़ में फँसी दुर्बल गाय को निकाला जाता है।
श्लोक 6 (4.8.6)
स्तोतुं प्रचक्रमे भूयो विविधैः स्तोत्रसंभवैः । आमन्त्र्य दर्शनाकाङ्क्षी राजा देवीं सहानुजः ॥
stotuṃ pracakrame bhūyo vividhaiḥ stotrasaṃbhavaiḥ | āmantrya darśanākāṅkṣī rājā devīṃ sahānujaḥ
देवी के दर्शन की इच्छा से राजा ने अपने छोटे भाइयों के साथ देवी का आवाहन किया और अनेक प्रकार के स्तोत्रों से फिर उनकी स्तुति आरम्भ की —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 7 (4.8.7)
नमोऽस्तु वरदे कृष्णे कुमारि ब्रह्मचारिणि । बालार्कसदृशाकारे पूर्णचन्द्रनिभानने ॥
namo'stu varade kṛṣṇe kumāri brahmacāriṇi | bālārkasadṛśākāre pūrṇacandranibhānane
"हे वरदायिनी, हे कृष्णा, हे कुमारी, हे ब्रह्मचारिणी, तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारा रूप उगते सूर्य के समान है और मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान।
श्लोक 8 (4.8.8)
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रे पीनश्रोणिपयोधरे । मयूरपिच्छवलये केयूराङ्गदधारिणि ॥
caturbhuje caturvaktre pīnaśroṇipayodhare | mayūrapicchavalaye keyūrāṅgadadhāriṇi
हे चार भुजाओं और चार मुखों वाली, पुष्ट नितम्ब और वक्ष वाली, मोरपंख के कंगन पहनने वाली, केयूर और अंगद धारण करने वाली!
श्लोक 9 (4.8.9)
भासि देवि यथा पद्मा नारायणपरिग्रहः । स्वरूपं ब्रह्मचर्यं च विशदं तव खेचरि ॥
bhāsi devi yathā padmā nārāyaṇaparigrahaḥ | svarūpaṃ brahmacaryaṃ ca viśadaṃ tava khecari
हे देवी, तुम नारायण की पत्नी पद्मा (लक्ष्मी) के समान शोभा पाती हो। हे आकाशचारिणी, तुम्हारा स्वरूप और तुम्हारा ब्रह्मचर्य निर्मल है।
श्लोक 10 (4.8.10)
कृष्णच्छविसमा कृष्णा संकर्षणसमानना । बिभ्रती विपुलौ बाहू शक्रध्वजसमुच्छ्रयौ ॥
kṛṣṇacchavisamā kṛṣṇā saṃkarṣaṇasamānanā | bibhratī vipulau bāhū śakradhvajasamucchrayau
तुम्हारी कान्ति श्याम मेघ के समान है, इसीलिए तुम कृष्णा हो; तुम्हारा मुख संकर्षण (बलराम) के समान है। तुम इन्द्र के ध्वज के समान ऊँची उठी दो विशाल भुजाएँ धारण करती हो।
श्लोक 11 (4.8.11)
पात्री च पङ्कजी घण्टी स्त्री विशुद्धा च या भुवि । पाशं धनुर्महाचक्रं विविधान्यायुधानि च ॥
pātrī ca paṅkajī ghaṇṭī strī viśuddhā ca yā bhuvi | pāśaṃ dhanurmahācakraṃ vividhānyāyudhāni ca
तुम पात्र, कमल और घण्टा धारण करती हो — पृथ्वी पर तुम ही विशुद्ध नारी हो — और पाश, धनुष, महान चक्र तथा अनेक प्रकार के आयुध भी।
श्लोक 12 (4.8.12)
कुण्डलाभ्यां सुपूर्णाभ्यां कर्णाभ्यां च विभूषिता । चन्द्रविस्पर्धिना देवि मुखेन त्वं विराजसे ॥
kuṇḍalābhyāṃ supūrṇābhyāṃ karṇābhyāṃ ca vibhūṣitā | candravispardhinā devi mukhena tvaṃ virājase
हे देवी, कानों में सुन्दर गोल कुण्डलों से विभूषित तुम चन्द्रमा से होड़ लेने वाले मुख से शोभायमान हो।
श्लोक 13 (4.8.13)
मुकुटेन विचित्रेण केशबन्धेन शोभिना । भुजङ्गाभोगवासेन श्रोणिसूत्रेण राजता ॥
mukuṭena vicitreṇa keśabandhena śobhinā | bhujaṅgābhogavāsena śroṇisūtreṇa rājatā
विचित्र मुकुट, सुन्दर केशबन्ध और सर्प के शरीर जैसी चमकती करधनी से
श्लोक 14 (4.8.14)
विभ्राजसे चाऽऽबद्धेन भोगेनेवेह मन्दरः । ध्वजेन शिखिपिच्छानामुच्छ्रितेन विराजसे ॥
vibhrājase cā''baddhena bhogeneveha mandaraḥ | dhvajena śikhipicchānāmucchritena virājase
तुम वैसे ही शोभा पाती हो जैसे लिपटे हुए नाग से मन्दराचल शोभित हुआ था। मोरपंखों की ऊँची ध्वजा से भी तुम सुशोभित हो।
श्लोक 15 (4.8.15)
कौमारं व्रतमास्थाय त्रिदिवं पावितं त्वया । तेन त्वं स्तूयसे देवि त्रिदशैः पूज्यसेऽपि च ॥
kaumāraṃ vratamāsthāya tridivaṃ pāvitaṃ tvayā | tena tvaṃ stūyase devi tridaśaiḥ pūjyase'pi ca
कौमार्य-व्रत धारण करके तुमने स्वर्ग को पवित्र किया है। इसीलिए, हे देवी, देवता तुम्हारी स्तुति और पूजा करते हैं।
श्लोक 16 (4.8.16)
त्रैलोक्यरक्षणार्थाय महिषासुरनाशिनि । प्रसन्ना मे सुरश्रेष्ठे दयां कुरु शिवा भव ॥
trailokyarakṣaṇārthāya mahiṣāsuranāśini | prasannā me suraśreṣṭhe dayāṃ kuru śivā bhava
तीनों लोकों की रक्षा के लिए महिषासुर का नाश करने वाली, हे देवश्रेष्ठा, मुझ पर प्रसन्न होओ, दया करो, मेरे लिए कल्याणमयी बनो।
श्लोक 17 (4.8.17)
जया त्वं विजया चैव संग्रामे च जयप्रदा । ममापि विजयं देहि वरदा त्वं च सांप्रतम् ॥
jayā tvaṃ vijayā caiva saṃgrāme ca jayapradā | mamāpi vijayaṃ dehi varadā tvaṃ ca sāṃpratam
तुम ही जया और विजया हो, और युद्ध में विजय देने वाली हो। मुझे भी विजय दो; इस समय मुझे वर प्रदान करो।
श्लोक 18 (4.8.18)
विन्ध्ये चैव नगश्रेष्ठे तव स्थानं हि शाश्वतम् । कालि कालि महाकालि शीधुमांसपशुप्रिये ॥
vindhye caiva nagaśreṣṭhe tava sthānaṃ hi śāśvatam | kāli kāli mahākāli śīdhumāṃsapaśupriye
पर्वतों में श्रेष्ठ विन्ध्याचल पर तुम्हारा शाश्वत निवास है। हे काली, हे काली, हे महाकाली, मदिरा, मांस और पशु-बलि को प्रिय मानने वाली!
श्लोक 19 (4.8.19)
कृतानुयात्रा भूतैस्त्वं वरदा कामचारिणी । भारावतारे ये च त्वां संस्मरिष्यन्ति मानवाः ॥
kṛtānuyātrā bhūtaistvaṃ varadā kāmacāriṇī | bhārāvatāre ye ca tvāṃ saṃsmariṣyanti mānavāḥ
भूतगण तुम्हारे पीछे चलते हैं; तुम वर देने वाली और इच्छानुसार विचरने वाली हो। पृथ्वी का भार उतारने के समय जो मनुष्य तुम्हारा स्मरण करेंगे,
श्लोक 20 (4.8.20)
प्रणमन्ति च ये त्वां हि प्रभाते तु नरा भुवि । न तेषां दुर्लभं किंचित्पुत्रतो धनतोऽपि वा ॥
praṇamanti ca ye tvāṃ hi prabhāte tu narā bhuvi | na teṣāṃ durlabhaṃ kiṃcitputrato dhanato'pi vā
और जो लोग प्रातःकाल तुम्हें प्रणाम करते हैं — उनके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं, न पुत्र, न धन।
श्लोक 21 (4.8.21)
दुर्गात्तारयसे दुर्गे तत्त्वं दुर्गा स्मृता जनैः । कान्तारेष्ववसन्नानां मग्नानां च महार्णवे । दस्युभिर्वा निरुद्धानां त्वं गतिः परमा नृणाम् ॥
durgāttārayase durge tattvaṃ durgā smṛtā janaiḥ | kāntāreṣvavasannānāṃ magnānāṃ ca mahārṇave | dasyubhirvā niruddhānāṃ tvaṃ gatiḥ paramā nṛṇām
हे दुर्गे, तुम दुर्गम संकट से पार उतारती हो, इसीलिए लोग तुम्हें दुर्गा कहते हैं। घने वनों में थककर गिरे हुए, महासागर में डूबते हुए या डाकुओं द्वारा घेर लिए गए मनुष्यों की तुम ही परम गति हो।
श्लोक 22 (4.8.22)
जलप्रतरणे चैव कान्तारेष्वटवीषु च । ये स्मरन्ति महादेवि न च सीदन्ति ते नराः ॥
jalaprataraṇe caiva kāntāreṣvaṭavīṣu ca | ye smaranti mahādevi na ca sīdanti te narāḥ
जल पार करते समय, निर्जन प्रदेशों और जंगलों में जो लोग तुम्हारा स्मरण करते हैं, हे महादेवी, वे कभी दुःख नहीं पाते।
श्लोक 23 (4.8.23)
त्वं कीर्तिः श्रीर्धृतिः सिद्धिर्ह्रीर्विद्या संततिर्मतिः । संध्या रात्रिः प्रभा निद्रा ज्योत्स्ना कांतिः क्षमा दया ॥
tvaṃ kīrtiḥ śrīrdhṛtiḥ siddhirhrīrvidyā saṃtatirmatiḥ | saṃdhyā rātriḥ prabhā nidrā jyotsnā kāṃtiḥ kṣamā dayā
तुम ही कीर्ति, श्री, धृति, सिद्धि, लज्जा, विद्या, सन्तति और बुद्धि हो; तुम ही सन्ध्या, रात्रि, प्रभा, निद्रा, चाँदनी, कान्ति, क्षमा और दया हो।
श्लोक 24 (4.8.24)
नृणां च बन्धनं मोहं पुत्रनाशं धनक्षयम् । व्याधिं मृत्युं भयं चैव पूजिता नाशयिष्यसि ॥
nṛṇāṃ ca bandhanaṃ mohaṃ putranāśaṃ dhanakṣayam | vyādhiṃ mṛtyuṃ bhayaṃ caiva pūjitā nāśayiṣyasi
पूजित होने पर तुम मनुष्यों के बन्धन, मोह, पुत्र-नाश, धन-क्षय, रोग, मृत्यु और भय का नाश करोगी।
श्लोक 25 (4.8.25)
सोऽहं राज्यात्परिभ्रष्टः शरणं त्वां प्रपन्नवान् । प्रणतश्च यथा मूर्ध्ना तव देवि सुरेश्वरि ॥
so'haṃ rājyātparibhraṣṭaḥ śaraṇaṃ tvāṃ prapannavān | praṇataśca yathā mūrdhnā tava devi sureśvari
मैं राज्य से भ्रष्ट होकर तुम्हारी शरण में आया हूँ और, हे देवी, हे देवेश्वरी, सिर झुकाकर तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 26 (4.8.26)
त्राहि मां पद्मपत्राक्षि सत्ये सत्या भवस्व नः । शरणं भव मे दुर्गे शरण्ये भक्तवत्सले ॥
trāhi māṃ padmapatrākṣi satye satyā bhavasva naḥ | śaraṇaṃ bhava me durge śaraṇye bhaktavatsale
हे कमलनयनी, मेरी रक्षा करो। हे सत्यस्वरूपा, हमारे लिए सत्य सिद्ध होओ। हे दुर्गे, हे शरणदायिनी, हे भक्तवत्सले, मेरी शरण बनो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (4.8.27)
एवं स्तुता हि सा देवी दर्शयामास पाण्डवम् । उपगम्य तु राजानमिदं वचनमब्रवीत् ॥
evaṃ stutā hi sā devī darśayāmāsa pāṇḍavam | upagamya tu rājānamidaṃ vacanamabravīt
इस प्रकार स्तुति किए जाने पर देवी ने पाण्डुपुत्र को दर्शन दिए और राजा के पास आकर यह वचन कहा —
देव्युवाच
श्लोक 28 (4.8.28)
शृणु राजन्महाबाहो मदीयं वचनं प्रभो । भविष्यत्यचिरादेव संग्रामे विजयस्तव ॥
śṛṇu rājanmahābāho madīyaṃ vacanaṃ prabho | bhaviṣyatyacirādeva saṃgrāme vijayastava
"हे महाबाहु राजन्, हे प्रभो, मेरी बात सुनो। शीघ्र ही युद्ध में तुम्हारी विजय होगी।
श्लोक 29 (4.8.29)
मम प्रसादान्निर्जित्य हत्वा कौरववाहिनीम् । राज्यं निष्कण्टकं कृत्वा भोक्ष्यसे मेदिनीं पुनः ॥
mama prasādānnirjitya hatvā kauravavāhinīm | rājyaṃ niṣkaṇṭakaṃ kṛtvā bhokṣyase medinīṃ punaḥ
मेरी कृपा से कौरव-सेना को जीतकर और उसका संहार करके, राज्य को निष्कण्टक बनाकर तुम फिर से पृथ्वी का भोग करोगे।
श्लोक 30 (4.8.30)
भ्रातृभिः सहितो राजन्प्रीतिं प्राप्स्यसि पुष्कलाम् । मत्प्रसादाच्च ते सौख्यमारोग्यं च भविष्यति ॥
bhrātṛbhiḥ sahito rājanprītiṃ prāpsyasi puṣkalām | matprasādācca te saukhyamārogyaṃ ca bhaviṣyati
हे राजन्, भाइयों के साथ तुम्हें भरपूर आनन्द मिलेगा, और मेरी कृपा से तुम्हें सुख और आरोग्य प्राप्त होगा।
श्लोक 31 (4.8.31)
ये च संकीर्तयिष्यन्ति लोके विगतकल्मषाः । तेषां तुष्टा प्रदास्यामि राज्यमायुर्वपुः सुतम् ॥
ye ca saṃkīrtayiṣyanti loke vigatakalmaṣāḥ | teṣāṃ tuṣṭā pradāsyāmi rājyamāyurvapuḥ sutam
और संसार में जो पापरहित होकर मेरा कीर्तन करेंगे, उनसे प्रसन्न होकर मैं उन्हें राज्य, आयु, सुन्दर शरीर और पुत्र दूँगी।
श्लोक 32 (4.8.32)
प्रवासे नगरे वाऽपि संग्रामे शत्रुसंकटे । अटव्यां दुर्गकान्तारे सागरे गहने गिरौ ॥
pravāse nagare vā'pi saṃgrāme śatrusaṃkaṭe | aṭavyāṃ durgakāntāre sāgare gahane girau
परदेस में या नगर में, युद्ध में या शत्रुओं के संकट में, वन में, दुर्गम निर्जन प्रदेश में, समुद्र में, घने जंगल में या पर्वत पर —
श्लोक 33 (4.8.33)
ये स्मरिष्यन्ति मां राजन्यथाऽहं भवता स्मृता । न तेषां दुर्लभं किंचिदस्मिँल्लोके भविष्यति ॥
ye smariṣyanti māṃ rājanyathā'haṃ bhavatā smṛtā | na teṣāṃ durlabhaṃ kiṃcidasmim̐lloke bhaviṣyati
जो लोग वहाँ मेरा वैसे ही स्मरण करेंगे जैसे तुमने किया है, हे राजन्, उनके लिए इस लोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा।
श्लोक 34 (4.8.34)
इदं स्तोत्रवरं भक्त्या शृणुयाद्वा पठेत वा । तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्धिं यास्यन्ति पाण्डवाः ॥
idaṃ stotravaraṃ bhaktyā śṛṇuyādvā paṭheta vā | tasya sarvāṇi kāryāṇi siddhiṃ yāsyanti pāṇḍavāḥ
हे पाण्डवो, जो इस श्रेष्ठ स्तोत्र को भक्ति से सुनेगा या पढ़ेगा, उसके सब कार्य सिद्ध होंगे।
श्लोक 35 (4.8.35)
मत्प्रसादाच्च वः सर्वान्विराटनगरे स्थितान् । न प्रज्ञास्यन्ति कुरवो नरा वा तन्निवासिनः ॥
matprasādācca vaḥ sarvānvirāṭanagare sthitān | na prajñāsyanti kuravo narā vā tannivāsinaḥ
और मेरी कृपा से, जब तुम सब विराटनगर में रहोगे, तब न कौरव तुम्हें पहचान पाएँगे, न वहाँ के निवासी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 36 (4.8.36)
इत्युक्त्वा वरदा देवी युधिष्ठिरमरिंदमम् । रक्षां कृत्वा च पाण्डूनां तत्रैवान्तरधीयत ॥
ityuktvā varadā devī yudhiṣṭhiramariṃdamam | rakṣāṃ kṛtvā ca pāṇḍūnāṃ tatraivāntaradhīyata
शत्रुदमन युधिष्ठिर से ऐसा कहकर वरदायिनी देवी ने पाण्डवों की रक्षा का विधान किया और वहीं अन्तर्धान हो गईं।