Skip to main content

विराट पर्व · अध्याय 9

कंक बनकर युधिष्ठिर का विराट की सभा में प्रवेश

गंगा में स्नान और तर्पण करके युधिष्ठिर सरोवर पर मिले वरदान के लिए धर्म का आवाहन करते हैं, और तत्क्षण वे तथा उनके भाई नये रूप पा जाते हैं; युधिष्ठिर त्रिदण्डधारी तरुण संन्यासी ब्राह्मण बन जाते हैं। उनके राजोचित तेज से प्रभावित विराट पूरी सभा के साथ उठकर उनका स्वागत करते हैं। स्वयं को वैयाघ्रपद्य गोत्र का ब्राह्मण कंक, युधिष्ठिर का पुराना मित्र और जुए में सब कुछ हार चुका बताकर युधिष्ठिर एक वर्ष विराट के आश्रय में रहने की याचना करते हैं; राजा उन्हें अपने समान सम्मान देते हैं, और वे वहाँ अज्ञात रूप में रहने लगते हैं।

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.9.1)

ततस्तु ते पुण्यजलां शिवां शुभां महर्षिगन्धर्वनिषेवितोदकाम् । त्रिलोककान्तामवतीर्य जाह्नवीमृषींश्च देवांश्च पितॄनतर्पयन् ॥

tatastu te puṇyajalāṃ śivāṃ śubhāṃ maharṣigandharvaniṣevitodakām | trilokakāntāmavatīrya jāhnavīmṛṣīṃśca devāṃśca pitṝnatarpayan

तब वे पवित्र जलवाली, कल्याणमयी और शुभ जाह्नवी (गंगा) में उतरे, जिसके जल का सेवन महर्षि और गन्धर्व करते हैं और जो तीनों लोकों को प्रिय है; और उन्होंने ऋषियों, देवताओं तथा पितरों का तर्पण किया।

श्लोक 2 (4.9.2)

वरप्रदानं ह्यनुचिन्त्य पार्थिवो हुत्वाऽग्निहोत्रं कृतजप्यमङ्गलः । दिशं तथैन्द्रीमभितः प्रपेदिवान्कृताञ्जलिर्धर्ममुपाह्वयच्छनैः ॥

varapradānaṃ hyanucintya pārthivo hutvā'gnihotraṃ kṛtajapyamaṅgalaḥ | diśaṃ tathaindrīmabhitaḥ prapedivānkṛtāñjalirdharmamupāhvayacchanaiḥ

मिले हुए वरदान का स्मरण करके राजा ने अग्निहोत्र किया, जप और मंगल-कर्म पूरे किए, फिर इन्द्र की पूर्व दिशा की ओर मुख करके हाथ जोड़कर धीरे से धर्म का आवाहन किया।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 3 (4.9.3)

वरप्रदानं मम दत्तवान्पिता प्रसन्नचेता वरदः प्रजापतिः । जलार्थिनो मे तृषितस्य सोदरा मया प्रयुक्ता विविशुर्जलाशयम् ॥

varapradānaṃ mama dattavānpitā prasannacetā varadaḥ prajāpatiḥ | jalārthino me tṛṣitasya sodarā mayā prayuktā viviśurjalāśayam

"वर देनेवाले, प्रजाओं के स्वामी मेरे पिता ने प्रसन्नचित्त होकर मुझे वरदान दिया था। जब मैं प्यासा था और जल चाहता था, तब मेरे भेजे हुए मेरे सगे भाई उस जलाशय में उतरे थे,

श्लोक 4 (4.9.4)

निपातिता यक्षवरेण ते वने महाहवे वज्रभृतेव दानवाः । मया च गत्वा वरदो हि तोषितो विवक्षता प्रश्नसमुच्चयं गुरुः ॥

nipātitā yakṣavareṇa te vane mahāhave vajrabhṛteva dānavāḥ | mayā ca gatvā varado hi toṣito vivakṣatā praśnasamuccayaṃ guruḥ

और वन में उस श्रेष्ठ यक्ष ने उन्हें वैसे ही गिरा दिया था जैसे महासंग्राम में वज्रधारी इन्द्र दानवों को गिराते हैं। तब मैंने जाकर उन वरदाता गुरु को सन्तुष्ट किया, जो मुझसे अनेक प्रश्न पूछना चाहते थे।

श्लोक 5 (4.9.5)

स मे प्रसन्नो भगवान्वरं ददौ परिष्वजंश्चाह तथैव सौहृदात् । वृणीष्व यद्वाञ्छसि पाण्डुनन्दन स्थितोऽन्तरिक्षे वरदोऽस्मि पश्य माम् ॥

sa me prasanno bhagavānvaraṃ dadau pariṣvajaṃścāha tathaiva sauhṛdāt | vṛṇīṣva yadvāñchasi pāṇḍunandana sthito'ntarikṣe varado'smi paśya mām

उन भगवान ने मुझ पर प्रसन्न होकर वर दिया और स्नेह से गले लगाकर कहा — "हे पाण्डुनन्दन, जो चाहो माँग लो। आकाश में खड़ा मैं वरदाता हूँ, मुझे देखो।"

श्लोक 6 (4.9.6)

स वै मयोक्तो वरदः पिता प्रभुः सदैव मे धर्मरता मतिर्भवेत् । इमे च जीवन्तु ममानुजाः प्रभो वयं स्वरूपं च जयं तथाऽऽप्नुमः ॥

sa vai mayokto varadaḥ pitā prabhuḥ sadaiva me dharmaratā matirbhavet | ime ca jīvantu mamānujāḥ prabho vayaṃ svarūpaṃ ca jayaṃ tathā''pnumaḥ

मैंने उन वरदाता पिता और प्रभु से कहा — "मेरी बुद्धि सदा धर्म में रत रहे। हे प्रभो, मेरे ये छोटे भाई जीवित हो जाएँ, और हम अपना स्वरूप तथा विजय भी प्राप्त करें।

श्लोक 7 (4.9.7)

क्षमा च कीर्तिश्च यथेप्सितं भवेद्व्रतं तु सत्यं च समाप्तिरेव च । वरो ममैषोस्तु यथाऽनुकीर्तितो न तन्मृषा देववृषो यथाऽब्रवीत् ॥

kṣamā ca kīrtiśca yathepsitaṃ bhavedvrataṃ tu satyaṃ ca samāptireva ca | varo mamaiṣostu yathā'nukīrtito na tanmṛṣā devavṛṣo yathā'bravīt

क्षमा और कीर्ति हमें इच्छानुसार प्राप्त हों, और हमारा व्रत तथा सत्य अन्त तक पूरा हो।" मेरा यह वर वैसा ही हो जैसा कहा गया था; देवश्रेष्ठ ने जो कहा, वह मिथ्या नहीं हो सकता।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (4.9.8)

इत्येवमुक्त्वा धर्मात्मा धर्ममेवानुचिन्तयन् । तदैव तत्प्रसादेन रूपमेवाभवत्स्वयम् ॥

ityevamuktvā dharmātmā dharmamevānucintayan | tadaiva tatprasādena rūpamevābhavatsvayam

ऐसा कहकर वे धर्मात्मा धर्म का ही ध्यान करते रहे, और उसी क्षण धर्म की कृपा से वह नया रूप उन्हें स्वयं प्राप्त हो गया।

श्लोक 9 (4.9.9)

स वै द्विजातिस्तरुणस्त्रिदण्डभृत्कमण्डलूष्णीषधरो व्यजायत । सुरक्तमाञ्जिष्ठवराम्बरः शिखी पवित्रपाणिर्ददृशे तदाऽद्भुतम् ॥

sa vai dvijātistaruṇastridaṇḍabhṛtkamaṇḍalūṣṇīṣadharo vyajāyata | suraktamāñjiṣṭhavarāmbaraḥ śikhī pavitrapāṇirdadṛśe tadā'dbhutam

वे एक तरुण ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए — त्रिदण्ड धारण किए, कमण्डलु और पगड़ी लिए, मजीठ से गहरा लाल रँगा सुन्दर वस्त्र पहने, शिखाधारी और हाथ में पवित्री (कुश) लिए; उस समय वे अद्भुत दिखाई दिए।

श्लोक 10 (4.9.10)

तथैव तेषामपि धर्मचारिणां यथोचितार्हाभरणाम्बरस्रजः । क्षणेन राजन्नभवन्महात्मनां प्रशस्तधर्माग्र्यफलाभिकाङ्क्षिणाम् ॥

tathaiva teṣāmapi dharmacāriṇāṃ yathocitārhābharaṇāmbarasrajaḥ | kṣaṇena rājannabhavanmahātmanāṃ praśastadharmāgryaphalābhikāṅkṣiṇām

हे राजन्, इसी प्रकार प्रशंसनीय धर्म के श्रेष्ठ फल की आकांक्षा रखनेवाले उन अन्य धर्माचारी महात्माओं को भी क्षण भर में अपने-अपने योग्य आभूषण, वस्त्र और मालाएँ प्राप्त हो गईं।

श्लोक 11 (4.9.11)

नवेन रूपेण विशांपतिर्युतस्त्वथर्वरूपेण बभौ प्रतापवान् । निबद्धवैडूर्यसितान्सकाञ्चनान्नृपस्तथाऽक्षान्परिवेष्ट्य वाससः ॥

navena rūpeṇa viśāṃpatiryutastvatharvarūpeṇa babhau pratāpavān | nibaddhavaiḍūryasitānsakāñcanānnṛpastathā'kṣānpariveṣṭya vāsasaḥ

नये रूप से युक्त वे प्रतापी प्रजापालक अथर्ववेदी ब्राह्मण के वेश में शोभा पाने लगे। राजा ने वैदूर्य जड़े, श्वेत और स्वर्णमण्डित पासों को भी अपने वस्त्र में लपेट लिया।

श्लोक 12 (4.9.12)

ततो विराटं प्रथमं युधिष्ठिरो ददर्श दूरात्सुसमृद्धतेजसम् । अनन्ततेजोज्वलितं हुताशनं दुरासदं तीक्ष्णविषं यथोरगम् ॥

tato virāṭaṃ prathamaṃ yudhiṣṭhiro dadarśa dūrātsusamṛddhatejasam | anantatejojvalitaṃ hutāśanaṃ durāsadaṃ tīkṣṇaviṣaṃ yathoragam

तब युधिष्ठिर ने पहले दूर से ही विराट को देखा — अत्यन्त तेजस्वी, अनन्त तेज से प्रज्वलित अग्नि के समान, और तीखे विषवाले सर्प की भाँति दुर्धर्ष।

श्लोक 13 (4.9.13)

सभासदं प्राञ्जलिभिर्जनैर्वृतं विचित्रनानाविधशस्त्रपाणिभिः । उपायनौघैः प्रविशद्भिराचितं द्विजैश्च शिक्षाक्षरमन्त्रधारिभिः ॥

sabhāsadaṃ prāñjalibhirjanairvṛtaṃ vicitranānāvidhaśastrapāṇibhiḥ | upāyanaughaiḥ praviśadbhirācitaṃ dvijaiśca śikṣākṣaramantradhāribhiḥ

वे सभा में बैठे थे, हाथ जोड़े हुए और नाना प्रकार के सुन्दर शस्त्र धारण किए लोगों से घिरे; भेंट लेकर भीतर आती भीड़ से और शिक्षा, अक्षर तथा मन्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मणों से भरी सभा में।

श्लोक 14 (4.9.14)

गजैरुदीर्णं तुरगैश्च सङ्कुलं मृगद्विपैः कुब्जगणैः समावृतम् । सितोच्छ्रितोष्णीषनिरुद्धमूर्धजं विचित्रवैडूर्यविकारकुण्डलम् । विराटमायाच्च युधिष्ठिरस्तदा बृहस्पतिः शक्रमिव त्रिविष्टपे ॥

gajairudīrṇaṃ turagaiśca saṅkulaṃ mṛgadvipaiḥ kubjagaṇaiḥ samāvṛtam | sitocchritoṣṇīṣaniruddhamūrdhajaṃ vicitravaiḍūryavikārakuṇḍalam | virāṭamāyācca yudhiṣṭhirastadā bṛhaspatiḥ śakramiva triviṣṭape

मदमत्त हाथियों और घोड़ों से भरी, पशुओं, गजों और कुबड़ों के समूहों से घिरी उस सभा में, ऊँची श्वेत पगड़ी में बँधे केशोंवाले और वैदूर्य के विचित्र कुण्डल पहने विराट के पास युधिष्ठिर तब वैसे ही गए जैसे स्वर्ग में बृहस्पति इन्द्र के पास जाते हैं।

श्लोक 15 (4.9.15)

तमाव्रजन्तं प्रसमीक्ष्य पाण्डवं विराटराजो मुदितेन चक्षुषा । पप्रच्छ चैनं स नराधिपो मुहुर्द्विजाश्च ये चास्य सभासदस्तदा ॥

tamāvrajantaṃ prasamīkṣya pāṇḍavaṃ virāṭarājo muditena cakṣuṣā | papraccha cainaṃ sa narādhipo muhurdvijāśca ye cāsya sabhāsadastadā

पाण्डुपुत्र को आते देखकर राजा विराट ने प्रसन्न नेत्रों से उनके विषय में ब्राह्मणों और अपने सभासदों से बार-बार पूछा।

विराट उवाच

श्लोक 16 (4.9.16)

को वा विजानाति पुराऽस्य दर्शनं युवा सभां योऽयमुपैति मामिकाम् । रूपेण सारेण विराजयन्महीं श्रिया ह्ययं वैश्रवणो द्विजो यथा ॥

ko vā vijānāti purā'sya darśanaṃ yuvā sabhāṃ yo'yamupaiti māmikām | rūpeṇa sāreṇa virājayanmahīṃ śriyā hyayaṃ vaiśravaṇo dvijo yathā

"इसे पहले किसने देखा है — यह युवक जो अपने रूप और बल से पृथ्वी को प्रकाशित करता हुआ मेरी सभा में आ रहा है? यह ब्राह्मण शोभा में कुबेर के समान है।

श्लोक 17 (4.9.17)

मृगेन्द्रराड्वारणयूथपोपमः प्रभात्ययं काञ्चनपर्वतो यथा । विराजते पावकसूर्यसन्निभं सचन्द्रनक्षत्र इवांशुमान्ग्रहः ॥

mṛgendrarāḍvāraṇayūthapopamaḥ prabhātyayaṃ kāñcanaparvato yathā | virājate pāvakasūryasannibhaṃ sacandranakṣatra ivāṃśumāngrahaḥ

यह सिंहराज और गजयूथपति के समान है, सोने के पर्वत की तरह चमकता है; अग्नि और सूर्य के समान दीप्त है, मानो चन्द्रमा और नक्षत्रों के बीच कोई तेजस्वी ग्रह हो।

श्लोक 18 (4.9.18)

न दृश्यतेऽस्यानुचरो न कुञ्जरो न चोष्णरश्म्यावरणं समुच्छ्रितम् । न कुण्डलं नाङ्गदमस्य न स्रजो विचित्रिताङ्गश्च रथश्चतुर्युजः ॥

na dṛśyate'syānucaro na kuñjaro na coṣṇaraśmyāvaraṇaṃ samucchritam | na kuṇḍalaṃ nāṅgadamasya na srajo vicitritāṅgaśca rathaścaturyujaḥ

न इसका कोई सेवक दिखता है, न हाथी, न धूप से बचाने को ऊँचा छत्र; न इसके कुण्डल हैं, न बाजूबन्द, न मालाएँ, न चार घोड़ोंवाला चित्रित रथ।

श्लोक 19 (4.9.19)

क्षात्रं च रूपं हि बिभर्त्ययं भृशं गजेन्द्रशार्दूलमहर्षभोपमः । अभ्यागतोऽस्माननलंकृतोपि सन् विरोचते भानुरिवाचिरोदितः ॥

kṣātraṃ ca rūpaṃ hi bibhartyayaṃ bhṛśaṃ gajendraśārdūlamaharṣabhopamaḥ | abhyāgato'smānanalaṃkṛtopi san virocate bhānurivāciroditaḥ

फिर भी यह पूरी तरह क्षत्रिय का रूप धारण किए है — गजराज, बाघ और महान वृषभ के समान। बिना अलंकार के हमारे पास आया है, फिर भी अभी-अभी उगे सूर्य की तरह शोभा पाता है।

श्लोक 20 (4.9.20)

विभात्ययं क्षत्रिय एव सर्वथा विराट इत्येवमुवाच तं प्रति । ससागरान्तामयमद्य मेदिनीं प्रशासितुं चार्हति वासवोपमः ॥

vibhātyayaṃ kṣatriya eva sarvathā virāṭa ityevamuvāca taṃ prati | sasāgarāntāmayamadya medinīṃ praśāsituṃ cārhati vāsavopamaḥ

"यह हर प्रकार से क्षत्रिय ही प्रतीत होता है," विराट ने उसके विषय में कहा; "इन्द्र के समान यह व्यक्ति आज ही समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी पर शासन करने योग्य है।

श्लोक 21 (4.9.21)

नाक्षत्रियो नूनमयं भविष्यति मूर्धाभिषिक्तः प्रतिभाति मां प्रति । तुल्यं हि रूपं प्रतिदृश्यतेऽस्य गजस्य सिंहस्य तथर्षभस्य ॥

nākṣatriyo nūnamayaṃ bhaviṣyati mūrdhābhiṣiktaḥ pratibhāti māṃ prati | tulyaṃ hi rūpaṃ pratidṛśyate'sya gajasya siṃhasya tatharṣabhasya

निश्चय ही यह अक्षत्रिय नहीं हो सकता; मुझे यह कोई अभिषिक्त राजा प्रतीत होता है। इसका रूप हाथी, सिंह और वृषभ जैसा दिखता है।

श्लोक 22 (4.9.22)

यमेष कामं परिमार्गते द्विजः स चास्य सर्वः क्रियतामसंशयम् । प्रियं च मे दर्शनमीदृशे जने द्विजेषु मुख्येषु तथाऽतिथिष्वपि ॥

yameṣa kāmaṃ parimārgate dvijaḥ sa cāsya sarvaḥ kriyatāmasaṃśayam | priyaṃ ca me darśanamīdṛśe jane dvijeṣu mukhyeṣu tathā'tithiṣvapi

यह ब्राह्मण जो भी चाहता है, वह सब निःसंदेह पूरा किया जाए। ऐसे व्यक्ति का दर्शन मुझे प्रिय है, जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों और अतिथियों का।

श्लोक 23 (4.9.23)

धनेषु रत्नेष्वथ गोषु वेश्मसु प्रकामतो मे विचरत्ववारितः ॥

dhaneṣu ratneṣvatha goṣu veśmasu prakāmato me vicaratvavāritaḥ

वह मेरे धन, रत्नों, गौओं और भवनों के बीच इच्छानुसार बिना रोक-टोक विचरे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 24 (4.9.24)

एवं ब्रुवाणस्तमनन्ततेजसं विराजमानं सहसोत्थितो नृपः । अन्येन रूपेण समीपमागतं त्रिदण्डकुण्ड्यङ्कुशशिक्यपाणिनम् ॥

evaṃ bruvāṇastamanantatejasaṃ virājamānaṃ sahasotthito nṛpaḥ | anyena rūpeṇa samīpamāgataṃ tridaṇḍakuṇḍyaṅkuśaśikyapāṇinam

ऐसा कहते हुए राजा सहसा उस अनन्त तेजवाले दीप्तिमान पुरुष के स्वागत में उठ खड़े हुए, जो दूसरे रूप में पास आया था और जिसके हाथों में त्रिदण्ड, कमण्डलु, अंकुश और छींका था।

श्लोक 25 (4.9.25)

समुत्थिता सा हि सभा सपार्थिवा सविप्रराजन्यविशा सशूद्रका । सभागतं प्रेक्ष्य तपन्तमर्चिषां विनिःसृतं राहुमुखाद्यथा रविम् ॥

samutthitā sā hi sabhā sapārthivā saviprarājanyaviśā saśūdrakā | sabhāgataṃ prekṣya tapantamarciṣāṃ viniḥsṛtaṃ rāhumukhādyathā ravim

राजा के साथ सारी सभा — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — उठ खड़ी हुई, जब उन्होंने सभा में आए उस पुरुष को राहु के मुख से निकले सूर्य की भाँति तेज से दमकते देखा।

श्लोक 26 (4.9.26)

स तेन पूर्वं जयतां भवानिह द्विजातिनोक्तोऽभिमुखः कृताञ्जलिः । जयं जयार्हेण समेत्य वर्धितो विराटराजो ह्यभिवादयच्च तम् ॥

sa tena pūrvaṃ jayatāṃ bhavāniha dvijātinokto'bhimukhaḥ kṛtāñjaliḥ | jayaṃ jayārheṇa sametya vardhito virāṭarājo hyabhivādayacca tam

उस ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर सामने खड़े होकर पहले ही कहा — "आपकी यहाँ जय हो।" जय के योग्य पुरुष से जय का आशीर्वाद पाकर राजा विराट ने भी उसका अभिवादन किया।

श्लोक 27 (4.9.27)

तमब्रवीत्प्राञ्जलिरेष पार्थिवो विराटराजो मधुराक्षरं वचः । प्राप्तः कुतस्त्वं भगवन्किमिच्छसि क्व यास्यसे किं करवाणि ते द्विज ॥

tamabravītprāñjalireṣa pārthivo virāṭarājo madhurākṣaraṃ vacaḥ | prāptaḥ kutastvaṃ bhagavankimicchasi kva yāsyase kiṃ karavāṇi te dvija

पृथ्वीपति राजा विराट ने हाथ जोड़कर उससे मधुर वाणी में कहा — "भगवन्, आप कहाँ से आए हैं? क्या चाहते हैं? कहाँ जाएँगे? हे ब्राह्मण, मैं आपके लिए क्या करूँ?

विराट उवाच

श्लोक 28 (4.9.28)

श्रुतं च शीलं च कुलं च शंस मे गोत्रं तथा नाम च देशमेव ते । सत्यप्रतिज्ञा हि भवन्ति साधवो विशेषतः प्रव्रजिता द्विजातयः ॥

śrutaṃ ca śīlaṃ ca kulaṃ ca śaṃsa me gotraṃ tathā nāma ca deśameva te | satyapratijñā hi bhavanti sādhavo viśeṣataḥ pravrajitā dvijātayaḥ

मुझे अपनी विद्या, शील, कुल, गोत्र, नाम और देश बताइए। सज्जन सत्यप्रतिज्ञ होते हैं, विशेषकर संन्यास लिए हुए ब्राह्मण।

श्लोक 29 (4.9.29)

यथाऽनुरूपं प्रचरामि ते त्वहं न चावमन्ता न तवाभिभाषितम् । अपूजिता ह्यग्निसमा द्विजातयः कुलं दहेयुः सविषा इवोरगाः ॥

yathā'nurūpaṃ pracarāmi te tvahaṃ na cāvamantā na tavābhibhāṣitam | apūjitā hyagnisamā dvijātayaḥ kulaṃ daheyuḥ saviṣā ivoragāḥ

मैं आपके साथ आपके योग्य व्यवहार करूँगा; न आपका अपमान करूँगा, न आपकी बात का। अपूजित ब्राह्मण अग्नि के समान होते हैं; विषैले सर्पों की तरह वे कुल को भस्म कर सकते हैं।

श्लोक 30 (4.9.30)

सर्वां च भूमिं तव दातुमुत्सहे सदण्डकोशां विसृजामि ते पुरम् । कस्यासि राज्ञो विषयादिहागतः किं कर्म चात्राचरसि द्विजोत्तम ॥

sarvāṃ ca bhūmiṃ tava dātumutsahe sadaṇḍakośāṃ visṛjāmi te puram | kasyāsi rājño viṣayādihāgataḥ kiṃ karma cātrācarasi dvijottama

मैं आपको सारी भूमि देने को तैयार हूँ; सेना और कोश सहित अपना नगर आपको सौंप देता हूँ। आप किस राजा के राज्य से यहाँ आए हैं? और हे द्विजश्रेष्ठ, आप यहाँ क्या काम करते हैं?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (4.9.31)

एवं ब्रुवाणं तमुवाच पार्थिवं युधिष्ठिरो धर्ममवेक्ष्य चासकृत् । सत्यं वचः को न्विह वक्तुमुत्सहेद्यथाप्रतिज्ञं तु शृणुष्व पार्थिव ॥

evaṃ bruvāṇaṃ tamuvāca pārthivaṃ yudhiṣṭhiro dharmamavekṣya cāsakṛt | satyaṃ vacaḥ ko nviha vaktumutsahedyathāpratijñaṃ tu śṛṇuṣva pārthiva

ऐसा कहनेवाले राजा से युधिष्ठिर ने बार-बार धर्म का विचार करके कहा — "यहाँ पूरा सत्य कहने का साहस कौन कर सकता है? फिर भी, हे राजन्, अपने व्रत के अनुसार सुनिए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 32 (4.9.32)

श्रुतं च शीलं च कुलं च कर्म च शृणुष्व मे जन्म च देशमेव च । गुरूपदेशान्नियमाच्च मे व्रतं कुलक्रमार्थं पितृभिर्नियोजितम् ॥

śrutaṃ ca śīlaṃ ca kulaṃ ca karma ca śṛṇuṣva me janma ca deśameva ca | gurūpadeśānniyamācca me vrataṃ kulakramārthaṃ pitṛbhirniyojitam

मेरी विद्या, शील, कुल, कर्म, जन्म और देश सुनिए। गुरु के उपदेश और नियम से मैं एक व्रत का पालन करता हूँ, जिसे कुल की परम्परा के लिए मेरे पितरों ने मुझ पर रखा है।

श्लोक 33 (4.9.33)

द्विजो व्रतेनास्मि न च स्वतः प्रभो संमुण्डितः प्रव्रजितस्त्रिदण्डभृत् । इदं शरीरं मम पश्य मानुषं समावृतं पञ्चभिरेव धातुभिः ॥

dvijo vratenāsmi na ca svataḥ prabho saṃmuṇḍitaḥ pravrajitastridaṇḍabhṛt | idaṃ śarīraṃ mama paśya mānuṣaṃ samāvṛtaṃ pañcabhireva dhātubhiḥ

हे प्रभो, मैं व्रत से द्विज हूँ, स्वभाव से नहीं — मुण्डित सिर वाला, संन्यासी, त्रिदण्डधारी। मेरा यह मानव शरीर देखिए, जो केवल पाँच धातुओं (भूतों) से घिरा है।

श्लोक 34 (4.9.34)

ममेह पञ्चेन्द्रियगात्रदर्शिनो वदन्ति पञ्चैव पितॄन्यथा श्रुतिः । मनुष्यजातित्वमचिन्तयन्नहं न चास्मि तुल्यः पितृभिः स्वभावतः ॥

mameha pañcendriyagātradarśino vadanti pañcaiva pitṝnyathā śrutiḥ | manuṣyajātitvamacintayannahaṃ na cāsmi tulyaḥ pitṛbhiḥ svabhāvataḥ

जो मुझमें पाँच इन्द्रियोंवाला शरीर देखते हैं, वे श्रुति के अनुसार कहते हैं कि मेरे पाँच ही पिता हैं। मनुष्य-जाति का विचार न करते हुए भी मैं स्वभाव से अपने पितरों के समान नहीं हूँ।

श्लोक 35 (4.9.35)

कङ्को हि नाम्ना विषयं तवागतो व्रती द्विजातिः स्वकृतेन कर्मणा । द्यूतप्रसङ्गादधनोऽस्मि राजन्सत्यप्रतिज्ञा व्रतिनश्चरामः ॥

kaṅko hi nāmnā viṣayaṃ tavāgato vratī dvijātiḥ svakṛtena karmaṇā | dyūtaprasaṅgādadhano'smi rājansatyapratijñā vratinaścarāmaḥ

मैं कंक नाम से आपके राज्य में आया हूँ — अपने ही कर्मों से व्रतधारी ब्राह्मण बना हुआ। हे राजन्, जुए की आसक्ति से मैं निर्धन हो गया हूँ; हम व्रती लोग अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहकर विचरते हैं।

श्लोक 36 (4.9.36)

युधिष्ठिरस्यापि सखाऽभवं पुरा गृहप्रवेशी च शरीरमेव च । गृहे च तस्योषितवानहं सुखं राजाऽस्मि तस्य स्वपुरेऽभवं पुरा ॥

yudhiṣṭhirasyāpi sakhā'bhavaṃ purā gṛhapraveśī ca śarīrameva ca | gṛhe ca tasyoṣitavānahaṃ sukhaṃ rājā'smi tasya svapure'bhavaṃ purā

पहले मैं युधिष्ठिर का मित्र भी था — उनके घर में बेरोक आने-जानेवाला, मानो उनका अपना शरीर। उनके घर में मैं सुख से रहा; पहले उनके नगर में मैं राजा के समान था।

श्लोक 37 (4.9.37)

ममाज्ञया तत्र विचेरुरङ्गना मम प्रियार्थं दमयन्ति वाजिनः । मया कृतं तस्य पुरे तु यत्पुरा न तत्कदाचित्कृतवाञ्जनोऽन्यथा ॥

mamājñayā tatra viceruraṅganā mama priyārthaṃ damayanti vājinaḥ | mayā kṛtaṃ tasya pure tu yatpurā na tatkadācitkṛtavāñjano'nyathā

वहाँ स्त्रियाँ मेरी आज्ञा से चलती थीं, और मेरी प्रसन्नता के लिए घोड़े साधे जाते थे। पहले उनके नगर में मैंने जो किया, वैसा किसी और ने कभी नहीं किया।

श्लोक 38 (4.9.38)

सोहं पुरा तस्य वयस्समः सखा चरामि सर्वां वसुधां सुदुःखितः । न तु प्रशान्तिं क्वचिदाप्तवानहं व्रतोपदेशान्नियमेन भारिकः ॥

sohaṃ purā tasya vayassamaḥ sakhā carāmi sarvāṃ vasudhāṃ suduḥkhitaḥ | na tu praśāntiṃ kvacidāptavānahaṃ vratopadeśānniyamena bhārikaḥ

मैं, जो कभी उनका समवयस्क मित्र था, अब बड़े दुःख में सारी पृथ्वी पर भटकता हूँ। व्रत के उपदेश और नियम का भार ढोते हुए मुझे कहीं शान्ति नहीं मिली।

श्लोक 39 (4.9.39)

वैयाघ्रपद्योस्मि नरेन्द्र गोत्रतस्तदेव सौख्यं मृगयामहे वयम् । कृतज्ञभावेन मयाऽनुकीर्तितं युधिष्ठिरस्यात्मसमस्य चेष्टितम् ॥

vaiyāghrapadyosmi narendra gotratastadeva saukhyaṃ mṛgayāmahe vayam | kṛtajñabhāvena mayā'nukīrtitaṃ yudhiṣṭhirasyātmasamasya ceṣṭitam

हे नरेन्द्र, गोत्र से मैं वैयाघ्रपद्य हूँ, और हम वही सुख खोज रहे हैं। कृतज्ञता के भाव से मैंने अपने ही समान युधिष्ठिर के आचरण का वर्णन किया है।

श्लोक 40 (4.9.40)

इमं हि मोक्षाश्रममास्थितस्य मे युधिष्ठिरस्तुल्यगुणो भवानपि । न मेऽस्ति माता न पिता न बान्धवा न मेऽस्ति रूपं न रतिर्न सन्ततिः ॥

imaṃ hi mokṣāśramamāsthitasya me yudhiṣṭhirastulyaguṇo bhavānapi | na me'sti mātā na pitā na bāndhavā na me'sti rūpaṃ na ratirna santatiḥ

मोक्षाश्रम को अपना चुके मेरे लिए आप भी गुणों में युधिष्ठिर के समान हैं। मेरी न माता है, न पिता, न बन्धु-बान्धव; न मेरा रूप है, न भोग, न सन्तान।

श्लोक 41 (4.9.41)

सुखं च दुःखं च हि तुल्यमद्य मे प्रियाप्रिये तुल्यगते गतागते । मुक्तोस्मि कामाच्च धनाच्च सांप्रतं त्वदाश्रये वस्तुमिहाभ्युपागतः ॥

sukhaṃ ca duḥkhaṃ ca hi tulyamadya me priyāpriye tulyagate gatāgate | muktosmi kāmācca dhanācca sāṃprataṃ tvadāśraye vastumihābhyupāgataḥ

अब मेरे लिए सुख और दुःख समान हैं; प्रिय-अप्रिय और आना-जाना भी एक जैसे हैं। अब मैं काम और धन से मुक्त हूँ और आपके आश्रय में रहने के लिए यहाँ आया हूँ।

श्लोक 42 (4.9.42)

संवत्सरेणेह समाप्यते त्विदं मम व्रतं दुष्करकर्मकारिणः । ततो भवन्तं परितोष्य कर्मभिः पुनर्व्रजिष्ये च कुतूहलं यतः ॥

saṃvatsareṇeha samāpyate tvidaṃ mama vrataṃ duṣkarakarmakāriṇaḥ | tato bhavantaṃ paritoṣya karmabhiḥ punarvrajiṣye ca kutūhalaṃ yataḥ

कठिन कर्म करनेवाले मेरा यह व्रत यहाँ एक वर्ष में पूरा होगा। तब अपनी सेवाओं से आपको सन्तुष्ट करके मैं फिर वहीं चला जाऊँगा जहाँ मेरी उत्सुकता ले जाए।

श्लोक 43 (4.9.43)

अक्षान्निवप्तुं कुशलोस्म्यहं सदा पराजितः शकुनिरुतानि चिन्तयन् । मृगद्विजानां च रुतानि चिन्तयन्निराश्रयः प्रव्रजितोस्मि भिक्षुकः ॥

akṣānnivaptuṃ kuśalosmyahaṃ sadā parājitaḥ śakunirutāni cintayan | mṛgadvijānāṃ ca rutāni cintayannirāśrayaḥ pravrajitosmi bhikṣukaḥ

मैं पासे फेंकने में सदा कुशल रहा हूँ। हारकर मैं पक्षियों की बोलियों पर विचार करता रहा; पशु-पक्षियों की बोलियों का चिन्तन करते हुए, आश्रयहीन होकर मैं भिक्षुक संन्यासी बन गया।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 44 (4.9.44)

तेनैवमुक्ते वचने नराधिपः कृताञ्जलिः प्रव्रजितं विलोक्य च । अथाब्रवीद्धृष्टमनाः शुभाक्षरं मनोनुगं सर्वसभागतं वचः ॥

tenaivamukte vacane narādhipaḥ kṛtāñjaliḥ pravrajitaṃ vilokya ca | athābravīddhṛṣṭamanāḥ śubhākṣaraṃ manonugaṃ sarvasabhāgataṃ vacaḥ

उसके ऐसा कहने पर राजा ने हाथ जोड़कर उस संन्यासी की ओर देखा और प्रसन्न मन से सुन्दर शब्दोंवाली, मनभावन और सारी सभा को रुचनेवाली बात कही —

विराट उवाच

श्लोक 45 (4.9.45)

ददामि ते हन्त वरं यदीप्सितं प्रशाधि मत्स्यान्यदि मन्यते भवान् । प्रिया हि धूर्ता मम चाक्षकोविदास्त्वं चापि देवो मम राज्यमर्हसि ॥

dadāmi te hanta varaṃ yadīpsitaṃ praśādhi matsyānyadi manyate bhavān | priyā hi dhūrtā mama cākṣakovidāstvaṃ cāpi devo mama rājyamarhasi

"लीजिए, आप जो वर चाहें, मैं देता हूँ। यदि आप उचित समझें तो मत्स्यों पर शासन कीजिए। पासों में निपुण जुआरी मुझे प्रिय हैं, और आप तो देवता के समान मेरे राज्य के योग्य हैं।

श्लोक 46 (4.9.46)

समानयानासनवस्त्रभोजनं प्रभूतमाल्याभरणानुलेपनम् । स सार्वभौमोपम सर्वदाऽर्हसि प्रियं हि मन्ये तव नित्यदर्शनम् ॥

samānayānāsanavastrabhojanaṃ prabhūtamālyābharaṇānulepanam | sa sārvabhaumopama sarvadā'rhasi priyaṃ hi manye tava nityadarśanam

हे सार्वभौम सम्राट के समान पुरुष, आप सदा मेरे समान ही वाहन, आसन, वस्त्र और भोजन तथा प्रचुर मालाएँ, आभूषण और अनुलेपन पाने योग्य हैं; क्योंकि आपका नित्य दर्शन मुझे प्रिय है।

श्लोक 47 (4.9.47)

ये त्वाऽभिधावेयुरनर्थपीडिता द्विजातिमुख्या यदि वेतरे जनाः । सर्वाणि कार्याण्यहमर्थितस्त्वया तेषां करिष्यामि न मेऽत्र संशयः ॥

ye tvā'bhidhāveyuranarthapīḍitā dvijātimukhyā yadi vetare janāḥ | sarvāṇi kāryāṇyahamarthitastvayā teṣāṃ kariṣyāmi na me'tra saṃśayaḥ

विपत्ति से पीड़ित जो भी लोग आपके पास सहायता के लिए दौड़े आएँ — श्रेष्ठ ब्राह्मण हों या दूसरे लोग — आपके कहने पर मैं उनके सब काम कर दूँगा; इसमें मुझे कोई संशय नहीं।

श्लोक 48 (4.9.48)

ममान्तिके यश्च तवाप्रियं चरेत्प्रवासये तं परिचिन्त्य मानवम् । यच्चापि किंचिद्वसु विद्यते मम प्रभुर्भवांस्तस्य वशी वसेह च ॥

mamāntike yaśca tavāpriyaṃ caretpravāsaye taṃ paricintya mānavam | yaccāpi kiṃcidvasu vidyate mama prabhurbhavāṃstasya vaśī vaseha ca

और मेरे पास रहकर जो कोई आपका अप्रिय करेगा, उस मनुष्य पर विचार करके मैं उसे देश से निकाल दूँगा। मेरे पास जो भी धन है, उसके स्वामी आप हैं; उस पर अधिकार रखते हुए यहाँ रहिए।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 49 (4.9.49)

अतोऽभिलाषः परमो न विद्यते न मे जितं किंचन धारये धनम् । न भोजनं किंचन संस्पृशेयं हविष्यभोजी निशि च क्षितीशयः ॥

ato'bhilāṣaḥ paramo na vidyate na me jitaṃ kiṃcana dhāraye dhanam | na bhojanaṃ kiṃcana saṃspṛśeyaṃ haviṣyabhojī niśi ca kṣitīśayaḥ

"इससे बढ़कर मेरी कोई बड़ी अभिलाषा नहीं है। मैं जीता हुआ कोई भी धन अपने पास नहीं रखूँगा। मैं कोई (राजसी) भोजन नहीं छूऊँगा; केवल हविष्य खाता हूँ और रात को भूमि पर सोता हूँ।

श्लोक 50 (4.9.50)

व्रतोपदेशात्समयो हि नैष्ठिको न क्रोधितव्यं नरदेव कस्यचित् । एवंप्रतिज्ञस्य ममेह भूपते निवासबुद्धिर्भविता तु नान्यथा ॥

vratopadeśātsamayo hi naiṣṭhiko na krodhitavyaṃ naradeva kasyacit | evaṃpratijñasya mameha bhūpate nivāsabuddhirbhavitā tu nānyathā

व्रत के उपदेश के अनुसार मेरा नियम आजीवन है — हे नरदेव, किसी पर क्रोध नहीं करना। हे भूपति, ऐसी प्रतिज्ञावाले मेरा यहाँ रहने का निश्चय इसी प्रकार हो सकता है, अन्यथा नहीं।

श्लोक 51 (4.9.51)

एवं वरं मात्स्य वृणे प्रदापितं कृती भविष्यामि वरेण तेऽनघ ॥

evaṃ varaṃ mātsya vṛṇe pradāpitaṃ kṛtī bhaviṣyāmi vareṇa te'nagha

हे मत्स्यराज, आपने जो वर देने को कहा, उसमें से मैं यही वर माँगता हूँ; हे निष्पाप, आपके इस वर से मैं कृतार्थ हो जाऊँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 52 (4.9.52)

एवं तु राज्ञः प्रथमः समागमो बभूव मात्स्यस्य युधिष्ठिरस्य च । विराटराजस्य हि तेन सङ्गमो बभूव विष्णोरिव वज्रपाणिना ॥

evaṃ tu rājñaḥ prathamaḥ samāgamo babhūva mātsyasya yudhiṣṭhirasya ca | virāṭarājasya hi tena saṅgamo babhūva viṣṇoriva vajrapāṇinā

इस प्रकार मत्स्यराज और राजा युधिष्ठिर का पहला समागम हुआ; विराटराज का उनसे वैसा ही मिलन हुआ जैसा विष्णु का वज्रधारी इन्द्र से।

श्लोक 53 (4.9.53)

तमासनस्थं प्रियरूपदर्शनं निरीक्षमाणो न ततर्प भूमिपः । सभां च तां प्रज्वलयन्युधिष्ठिरः श्रिया यथा शक्रइव त्रिविष्टपम् ॥

tamāsanasthaṃ priyarūpadarśanaṃ nirīkṣamāṇo na tatarpa bhūmipaḥ | sabhāṃ ca tāṃ prajvalayanyudhiṣṭhiraḥ śriyā yathā śakraiva triviṣṭapam

आसन पर बैठे उस प्रियदर्शन पुरुष को निहारते हुए राजा तृप्त नहीं होते थे; और युधिष्ठिर अपनी शोभा से उस सभा को वैसे ही प्रकाशित करते रहे जैसे इन्द्र स्वर्ग को।

श्लोक 54 (4.9.54)

एवं स लब्ध्वा नृपतिः समागमं विराटराजेन नरर्षभस्तदा । उवास वीरः परमार्चितः सुखी न चास्य कश्चिच्चरितं बुबोध तत् ॥

evaṃ sa labdhvā nṛpatiḥ samāgamaṃ virāṭarājena nararṣabhastadā | uvāsa vīraḥ paramārcitaḥ sukhī na cāsya kaściccaritaṃ bubodha tat

इस प्रकार राजा विराट से समागम पाकर वह नरश्रेष्ठ वीर वहाँ अत्यन्त सम्मानित होकर सुख से रहने लगा, और किसी ने भी उसका रहस्य नहीं जाना।

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10