विराट पर्व · अध्याय 58
अर्जुन द्वारा कर्ण के भाई का वध और कर्ण का रण से पलायन
भीष्म तितर-बितर हुई कौरव सेना को फिर से जुटाकर अभेद्य व्यूह में खड़ा करते हैं। अर्जुन उत्तर से अपना रथ कर्ण की ओर हँकवाते हैं; वे विकर्ण को भगा देते हैं, शत्रुन्तप और कर्ण के भाई संग्रामजित् को मार डालते हैं, और कौरवों के देखते-देखते कर्ण से भिड़ जाते हैं। अर्जुन सभा में की गई कर्ण की डींगों और द्रौपदी के अपमान को लेकर उसे ललकारते हैं, और कर्ण उत्तर देता है कि पाण्डवों का वनवास अभी पूरा नहीं हुआ। आगे के द्वंद्व में अर्जुन कर्ण का धनुष और शक्ति काट डालते हैं, ब्रह्मास्त्र प्रकट करते हैं और उसके अंग-अंग को बींध देते हैं, यहाँ तक कि बाणों को सह न सकने पर कर्ण रणभूमि छोड़कर चला जाता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.58.1)
तत्प्रभग्नं बलं सर्वं विपुलौघस्वनं तथा । भीष्ममासाद्य संतस्थौ वेलामिव महोदधिः ॥
tatprabhagnaṃ balaṃ sarvaṃ vipulaughasvanaṃ tathā | bhīṣmamāsādya saṃtasthau velāmiva mahodadhiḥ
वह सारी टूटी हुई सेना, जो बाढ़ के प्रचंड कोलाहल-सी गरज रही थी, भीष्म के पास पहुँचकर ऐसे ठहर गई, जैसे महासागर तट पर आकर रुक जाता है।
श्लोक 2 (4.58.2)
तानि सर्वाणि गाङ्गेयः समाश्वास्य परंतपः । ततो व्यूह्य महाबाहुः समरेष्वपराजितः ॥
tāni sarvāṇi gāṅgeyaḥ samāśvāsya paraṃtapaḥ | tato vyūhya mahābāhuḥ samareṣvaparājitaḥ
शत्रुओं को संतप्त करने वाले, युद्धों में कभी न हारने वाले महाबाहु गंगापुत्र भीष्म ने उन सबको ढाढ़स बँधाया और फिर उन्हें व्यूह में सजाकर,
श्लोक 3 (4.58.3)
रथनागाश्वकलिलं युयुजे युद्धकोविदः । अभेद्यं परसैन्यानां शूरैरपि समीक्षितम् ॥
rathanāgāśvakalilaṃ yuyuje yuddhakovidaḥ | abhedyaṃ parasainyānāṃ śūrairapi samīkṣitam
युद्धकुशल भीष्म ने रथों, हाथियों और घोड़ों से भरा एक ऐसा व्यूह रचा, जिसे शत्रु-सेनाएँ भेद न सकें और जिस पर शूरवीर भी दृष्टि रखे हुए थे।
श्लोक 4 (4.58.4)
आचार्यदुर्योधनसूतपुत्रैः कृपेण भीष्मेण च पालितानि । अवध्यकल्पानि दुरासदानि रथाश्वमातङ्गसमाकुलानि च ॥
ācāryaduryodhanasūtaputraiḥ kṛpeṇa bhīṣmeṇa ca pālitāni | avadhyakalpāni durāsadāni rathāśvamātaṅgasamākulāni ca
आचार्य द्रोण, दुर्योधन, सूतपुत्र कर्ण, कृप और भीष्म द्वारा रक्षित वे सेनाएँ लगभग अवध्य और दुर्गम थीं, और रथों, घोड़ों तथा हाथियों से भरी हुई थीं।
श्लोक 5 (4.58.5)
तेषामनीकानि किरीटमाली व्यूढानि दृष्ट्वा विपुलध्वजानि । गाण्डीवधन्वा द्विषतां निहन्ता वैराटिमामन्त्र्य ततोऽभ्युवाच ॥
teṣāmanīkāni kirīṭamālī vyūḍhāni dṛṣṭvā vipuladhvajāni | gāṇḍīvadhanvā dviṣatāṃ nihantā vairāṭimāmantrya tato'bhyuvāca
उनकी अनेक ध्वजाओं वाली व्यूहबद्ध सेनाओं को देखकर किरीटधारी, गाण्डीवधारी, शत्रुओं के संहारक अर्जुन ने विराटपुत्र को संबोधित करके कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 6 (4.58.6)
सुसंगृहीतैरथ रश्मिभिस्त्वं हयान्नियम्य प्रसमीक्ष्य यत्तः । संप्रेषयाशु प्रतिवीरमेनं वैकर्तनं योधयितुं वृणोमि ॥
susaṃgṛhītairatha raśmibhistvaṃ hayānniyamya prasamīkṣya yattaḥ | saṃpreṣayāśu prativīramenaṃ vaikartanaṃ yodhayituṃ vṛṇomi
"लगामों को भली भाँति थामकर, घोड़ों को साधकर और सावधानी से देखते हुए शीघ्र ही इस प्रतिद्वंद्वी वीर की ओर रथ हाँको; मैं वैकर्तन (कर्ण) से युद्ध करना चाहता हूँ।
श्लोक 7 (4.58.7)
यां हस्तिकक्ष्यां बहुधा विचित्रां स्तम्भे रथे पश्यसि दर्शनीयाम् । विवर्तमानां ज्वलनप्रकाशां वैकर्तनस्यैतदनीकमग्र्यम् ॥
yāṃ hastikakṣyāṃ bahudhā vicitrāṃ stambhe rathe paśyasi darśanīyām | vivartamānāṃ jvalanaprakāśāṃ vaikartanasyaitadanīkamagryam
जो हाथी की रस्सी (हस्तिकक्ष्या) के चिह्न वाला, अनेक प्रकार से विचित्र और दर्शनीय ध्वज तुम उस रथ के ध्वजस्तंभ पर घूमता और अग्नि-सा दमकता देख रहे हो, वही वैकर्तन की अग्रणी सेना है।
श्लोक 8 (4.58.8)
एतेन शीघ्रं प्रतिपादयेमान् श्वेतान्हयान्काञ्चनजालकक्ष्यान् । सर्वं जवं तत्र विदर्शयिष्ये ह्यासादयैतद्रथवीरवृन्दम् ॥
etena śīghraṃ pratipādayemān śvetānhayānkāñcanajālakakṣyān | sarvaṃ javaṃ tatra vidarśayiṣye hyāsādayaitadrathavīravṛndam
सोने की जाली वाली कक्ष्याओं से सजे इन श्वेत घोड़ों को शीघ्र उसी ओर ले चलो; वहाँ मैं अपना पूरा वेग दिखाऊँगा। मुझे रथी वीरों के उस समूह तक पहुँचाओ।
श्लोक 9 (4.58.9)
गजो गजेनेव हि योद्धुकामो मया सदा काङ्क्षति सूतपुत्रः । तमेव मां प्रापय सूतपुत्रं दुर्योधनोपाश्रयजातदर्पम् । तं पातयिष्यामि रथस्य मध्ये सहस्रनेत्रोऽशनिनेव वृत्रम् ॥
gajo gajeneva hi yoddhukāmo mayā sadā kāṅkṣati sūtaputraḥ | tameva māṃ prāpaya sūtaputraṃ duryodhanopāśrayajātadarpam | taṃ pātayiṣyāmi rathasya madhye sahasranetro'śanineva vṛtram
जैसे हाथी दूसरे हाथी से लड़ना चाहता है, वैसे ही सूतपुत्र सदा मुझसे युद्ध की आकांक्षा करता रहा है। मुझे उसी सूतपुत्र के पास ले चलो, जिसका घमंड दुर्योधन के सहारे पनपा है। मैं उसे उसके रथ के बीच ही गिरा दूँगा, जैसे सहस्रनेत्र इन्द्र ने वज्र से वृत्र को गिराया था।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (4.58.10)
स तैर्हयैर्जातजवैर्बृहद्भिः पुत्रो विराटस्य हिरण्यकक्ष्यैः । विध्वंसयंस्तद्रथिनामनीकं ततोऽवहत्पाण्डवमाजिमध्ये ॥
sa tairhayairjātajavairbṛhadbhiḥ putro virāṭasya hiraṇyakakṣyaiḥ | vidhvaṃsayaṃstadrathināmanīkaṃ tato'vahatpāṇḍavamājimadhye
सोने की कक्ष्याओं वाले, पूरा वेग पकड़ चुके उन विशाल घोड़ों के सहारे विराटपुत्र ने रथियों की उस सेना को छिन्न-भिन्न करते हुए पाण्डव अर्जुन को रणभूमि के बीच पहुँचा दिया।
श्लोक 11 (4.58.11)
तमापतन्तं परमेण तेजसा समीक्ष्य वैकर्तनमभ्यरक्षन् । अभ्यद्रवंस्ते रथवीरवृन्दा व्याघ्रेण चाक्रान्तमिवर्षभं रणे ॥
tamāpatantaṃ parameṇa tejasā samīkṣya vaikartanamabhyarakṣan | abhyadravaṃste rathavīravṛndā vyāghreṇa cākrāntamivarṣabhaṃ raṇe
उसे परम तेज के साथ आते देख रथी वीरों के दल वैकर्तन की रक्षा के लिए उसके चारों ओर आ जुटे और ऐसे दौड़ पड़े, मानो बाघ के आक्रमण से घिरे किसी बैल को बचाने दौड़े हों।
श्लोक 12 (4.58.12)
चित्राङ्गदश्चित्ररथश्च वीरः संग्रामजिद्दुःसहचित्रसेनौ । विविंशतिर्दुर्मुखदुर्जयौ च विकर्णदुःशासनसौबलाश्च । शोणो निषेधश्च तमन्वयुस्ते वैकर्तनं शीघ्रतरं युवानः ॥
citrāṅgadaścitrarathaśca vīraḥ saṃgrāmajidduḥsahacitrasenau | viviṃśatirdurmukhadurjayau ca vikarṇaduḥśāsanasaubalāśca | śoṇo niṣedhaśca tamanvayuste vaikartanaṃ śīghrataraṃ yuvānaḥ
चित्राङ्गद, वीर चित्ररथ, संग्रामजित्, दुःसह और चित्रसेन, विविंशति, दुर्मुख और दुर्जय, विकर्ण, दुःशासन और सौबल, शोण और निषेध — ये युवा योद्धा बड़ी शीघ्रता से वैकर्तन के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 13 (4.58.13)
पुत्रा ययुस्ते सहसोदराश्च वैकर्तनं पार्थगतं समीक्ष्य । प्रगृह्य चापानि महाबला रणे धनंजयं पर्यकिरञ्शरार्चिभिः ॥
putrā yayuste sahasodarāśca vaikartanaṃ pārthagataṃ samīkṣya | pragṛhya cāpāni mahābalā raṇe dhanaṃjayaṃ paryakirañśarārcibhiḥ
वैकर्तन को पार्थ से भिड़ा हुआ देखकर वे पुत्र अपने सगे भाइयों सहित आगे बढ़े; उन महाबलियों ने रण में धनुष उठाकर धनंजय पर प्रज्वलित बाणों की झड़ी लगा दी।
श्लोक 14 (4.58.14)
तेषां धनुर्ज्याकृतनैकतन्त्रीं प्रासोपवीणां शरसङ्घकोणाम् । कराग्रयन्त्रां स्थिरचापदण्डां वीणामुपावादयदाशु पार्थः ॥
teṣāṃ dhanurjyākṛtanaikatantrīṃ prāsopavīṇāṃ śarasaṅghakoṇām | karāgrayantrāṃ sthiracāpadaṇḍāṃ vīṇāmupāvādayadāśu pārthaḥ
उनके धनुषों की प्रत्यंचाएँ जिसकी अनेक तंत्रियाँ थीं, भाले जिसकी उपवीणा थे, बाणों के समूह जिसका कोण (मिज़राब) थे, हाथ जिसका यंत्र थे और दृढ़ धनुष-दण्ड जिसका डाँड था — ऐसी उस वीणा को पार्थ ने शीघ्रता से बजा डाला।
श्लोक 15 (4.58.15)
तस्मिंस्तु युद्धे तुमुले प्रवृत्ते पार्थं विकर्णोऽतिरथं रथेन । विपाठवर्षेण कुरुप्रवीरो भीमेन भीमानुजमाससाद ॥
tasmiṃstu yuddhe tumule pravṛtte pārthaṃ vikarṇo'tirathaṃ rathena | vipāṭhavarṣeṇa kurupravīro bhīmena bhīmānujamāsasāda
जब वह घमासान युद्ध छिड़ गया, तब कुरुवीर विकर्ण अपने रथ पर चढ़कर विपाठ नामक बाणों की भयंकर वर्षा करता हुआ भीम के छोटे भाई, अतिरथी पार्थ पर टूट पड़ा।
श्लोक 16 (4.58.16)
ततो विकर्णस्य धनुर्विकृत्य जाम्बुनदेनोपहितं दृढज्यम् । न्यपातयत्तद्ध्वजमस्य विद्ध्वा छिन्नध्वजः सोऽप्यपयाञ्जवेन ॥
tato vikarṇasya dhanurvikṛtya jāmbunadenopahitaṃ dṛḍhajyam | nyapātayattaddhvajamasya viddhvā chinnadhvajaḥ so'pyapayāñjavena
तब पार्थ ने विकर्ण के जाम्बूनद सुवर्ण से मढ़े, दृढ़ प्रत्यंचा वाले धनुष को काट डाला और उसकी ध्वजा को बींधकर गिरा दिया; ध्वजा कट जाने पर वह भी वेग से भाग खड़ा हुआ।
श्लोक 17 (4.58.17)
तं शात्रवाणां गणबाधितारं कर्माणि कुर्वाणममानुषाणि । शत्रुंतपो वैरममृष्यमाणः समार्पयत्कूर्मनखेन पार्थम् ॥
taṃ śātravāṇāṃ gaṇabādhitāraṃ karmāṇi kurvāṇamamānuṣāṇi | śatruṃtapo vairamamṛṣyamāṇaḥ samārpayatkūrmanakhena pārtham
शत्रुओं के दलों को पीड़ित करते और अलौकिक पराक्रम दिखाते पार्थ पर, वैर को सहन न कर पाने वाले शत्रुन्तप ने कूर्मनख नामक बाण चलाया।
श्लोक 18 (4.58.18)
स तेन राज्ञाऽतिरथेन विद्धो विगाहमानो ध्वजिनीं परेषाम् । शत्रुंतपं पञ्चभिराशु विद्ध्वा ततोऽस्य सूतं दशभिर्जघान ॥
sa tena rājñā'tirathena viddho vigāhamāno dhvajinīṃ pareṣām | śatruṃtapaṃ pañcabhirāśu viddhvā tato'sya sūtaṃ daśabhirjaghāna
उस अतिरथी राजा के बाण से बिंधकर, शत्रुओं की ध्वजाधारी सेना में घुसते हुए पार्थ ने तुरंत पाँच बाणों से शत्रुन्तप को बींधा और फिर दस बाणों से उसके सारथि को मार गिराया।
श्लोक 19 (4.58.19)
ततः स विद्धो भरतर्षभेण बाणेन कायावरणातिगेन । गतासुराजौ निपपात राजन्नगो नगाग्रादिव वातरुग्णः ॥
tataḥ sa viddho bharatarṣabheṇa bāṇena kāyāvaraṇātigena | gatāsurājau nipapāta rājannago nagāgrādiva vātarugṇaḥ
तब भरतश्रेष्ठ अर्जुन के कवच को भेदकर निकल जाने वाले बाण से बिंधकर वह, हे राजन्, प्राणहीन होकर रणभूमि में गिर पड़ा, जैसे आँधी से टूटा वृक्ष पर्वत की चोटी से गिरता है।
श्लोक 20 (4.58.20)
रथर्षभास्ते तु रथर्षभेण वीरा रणे वीरतरेण भग्नाः । चकम्पिरे वातवशेन काले प्रकम्पितानीव महावनानि ॥
ratharṣabhāste tu ratharṣabheṇa vīrā raṇe vīratareṇa bhagnāḥ | cakampire vātavaśena kāle prakampitānīva mahāvanāni
रथियों में श्रेष्ठ वे वीर, अपने से कहीं बढ़कर वीर रथिश्रेष्ठ अर्जुन से रण में पराजित होकर ऐसे काँपने लगे, जैसे ऋतु आने पर प्रचंड वायु के झोंकों से विशाल वन काँप उठते हैं।
श्लोक 21 (4.58.21)
हताश्च पार्थेन नरप्रवीरा भूमौ युवानः सुषुपुः सुवेषाः । वसुप्रदा वासवतुल्यवीर्याः पराजिता वासवजेन सङ्ख्ये । सुवर्णकार्ष्णायसवर्मनद्धा नागा यथा हैमवते प्रवृद्धाः ॥
hatāśca pārthena narapravīrā bhūmau yuvānaḥ suṣupuḥ suveṣāḥ | vasupradā vāsavatulyavīryāḥ parājitā vāsavajena saṅkhye | suvarṇakārṣṇāyasavarmanaddhā nāgā yathā haimavate pravṛddhāḥ
पार्थ के हाथों मारे गए वे सुंदर वेशधारी युवा नरश्रेष्ठ धरती पर सो गए — वे उदार दानी, इन्द्र के समान पराक्रमी, जो इन्द्रपुत्र से रण में पराजित हुए थे। सोने और काले लोहे के कवचों से ढके वे ऐसे पड़े थे, जैसे हिमालय के पूर्ण वयस्क हाथी।
श्लोक 22 (4.58.22)
तथा स शत्रून्समरे विनिघ्नन् गाण्डीवधन्वा पुरुषप्रवीरः । चचार सङ्ख्ये विदिशो दिशश्च दहन्निवाग्निर्वनमातपान्ते ॥
tathā sa śatrūnsamare vinighnan gāṇḍīvadhanvā puruṣapravīraḥ | cacāra saṅkhye vidiśo diśaśca dahannivāgnirvanamātapānte
इस प्रकार रण में शत्रुओं का संहार करते हुए गाण्डीवधारी पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन युद्धभूमि में दिशाओं और उपदिशाओं में ऐसे विचरने लगे, जैसे ग्रीष्म के अंत में अग्नि वन को जलाती फिरती है।
श्लोक 23 (4.58.23)
सुजीर्णपर्णानि यथा वसन्ते विशातयित्वा तु रजो नुदन्खे । तथा सपत्नान्विकिरन्किरीटी चचार सङ्ख्येऽतिरथो रथेन ॥
sujīrṇaparṇāni yathā vasante viśātayitvā tu rajo nudankhe | tathā sapatnānvikirankirīṭī cacāra saṅkhye'tiratho rathena
जैसे वसंत में वायु पुराने सूखे पत्तों को झाड़कर आकाश में धूल उड़ाती फिरती है, वैसे ही अतिरथी किरीटी अपने रथ पर शत्रुओं को तितर-बितर करते हुए युद्ध में विचरने लगे।
श्लोक 24 (4.58.24)
शोणाश्ववाहस्य हयान्निहत्य वैकर्तनभ्रातुरदीनसत्त्वः । एकेन संग्रामजितः शरेण शिरो जहाराथ किरीटमाली ॥
śoṇāśvavāhasya hayānnihatya vaikartanabhrāturadīnasattvaḥ | ekena saṃgrāmajitaḥ śareṇa śiro jahārātha kirīṭamālī
फिर अदम्य साहस वाले किरीटधारी अर्जुन ने लाल घोड़ों वाले, वैकर्तन के भाई संग्रामजित् के घोड़ों को मार डाला और एक ही बाण से उसका सिर काट लिया।
श्लोक 25 (4.58.25)
तस्मिन्हते भ्रातरि सूतपुत्रो वैकर्तनो वीर्यमदप्रतापी । प्रगृह्य दन्ताविव नागराजो महाबलः सिंहमिवाजगाम ॥
tasminhate bhrātari sūtaputro vaikartano vīryamadapratāpī | pragṛhya dantāviva nāgarājo mahābalaḥ siṃhamivājagāma
भाई के मारे जाने पर, पराक्रम के मद से प्रचंड, महाबली सूतपुत्र वैकर्तन ऐसे आगे बढ़ा, जैसे कोई गजराज दाँत उठाए सिंह पर झपटता है।
श्लोक 26 (4.58.26)
स पाण्डवं द्वादशभिः पृषत्कैर्वैकर्तनः पार्थमुपाजघान । विव्याध गात्रेषु हयांश्च सर्वान्विराटपुत्रं च शरैर्विजघ्ने ॥
sa pāṇḍavaṃ dvādaśabhiḥ pṛṣatkairvaikartanaḥ pārthamupājaghāna | vivyādha gātreṣu hayāṃśca sarvānvirāṭaputraṃ ca śarairvijaghne
वैकर्तन ने पाण्डुपुत्र पार्थ को बारह बाणों से घायल किया, उनके सभी घोड़ों के अंगों को बींध डाला और विराटपुत्र को भी बाणों से आहत किया।
श्लोक 27 (4.58.27)
तमापतन्तं समरे किरीटी वैकर्तनं सर्वसमृद्धतेजाः । प्रच्छादयामास महाधनुष्मान्न्यषेधयच्छत्रुगणांश्च वीरः ॥
tamāpatantaṃ samare kirīṭī vaikartanaṃ sarvasamṛddhatejāḥ | pracchādayāmāsa mahādhanuṣmānnyaṣedhayacchatrugaṇāṃśca vīraḥ
जब वैकर्तन रण में झपटा, तब पूर्ण तेज से युक्त, महाधनुर्धर वीर किरीटी ने उसे बाणों से ढक दिया और शत्रुओं के दलों को भी रोक दिया।
श्लोक 28 (4.58.28)
निहत्य कर्णस्य ततः किरीटी पुरश्चरांश्चापि च पृष्ठगोपान् । समीपमभ्यागमदप्रमेयो वितत्य पक्षौ गरुडो यथोरगम् ॥
nihatya karṇasya tataḥ kirīṭī puraścarāṃścāpi ca pṛṣṭhagopān | samīpamabhyāgamadaprameyo vitatya pakṣau garuḍo yathoragam
फिर अप्रमेय किरीटी ने कर्ण के आगे चलने वालों और पीछे रक्षा करने वालों को मारकर, पंख फैलाए गरुड़ जैसे सर्प पर झपटता है, वैसे ही उसके निकट जा पहुँचे।
श्लोक 29 (4.58.29)
तावुत्तमौ सर्वधनुर्धराणां महाबलौ सर्वसपत्नसाहौ । कर्णं च पार्थं च निशम्य युद्धे दिदृक्षमाणाः कुरवोऽवतस्थुः ॥
tāvuttamau sarvadhanurdharāṇāṃ mahābalau sarvasapatnasāhau | karṇaṃ ca pārthaṃ ca niśamya yuddhe didṛkṣamāṇāḥ kuravo'vatasthuḥ
समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ, महाबली और सब शत्रुओं को झेल लेने वाले उन दोनों — कर्ण और पार्थ — को युद्ध में भिड़ा सुनकर कौरव देखने की उत्सुकता से वहीं खड़े रह गए।
श्लोक 30 (4.58.30)
तं पाण्डवः स्पष्टमुदीर्णकोपं कृतागसं कर्णमुदीक्ष्य कोपात् । क्षणेन साश्वं सरथं ससूतमन्तर्दधे मेघ इवातिवृष्ट्या ॥
taṃ pāṇḍavaḥ spaṣṭamudīrṇakopaṃ kṛtāgasaṃ karṇamudīkṣya kopāt | kṣaṇena sāśvaṃ sarathaṃ sasūtamantardadhe megha ivātivṛṣṭyā
जिसने उनका अपराध किया था और जिसका क्रोध स्पष्ट भड़क उठा था, उस कर्ण को देखकर पाण्डव ने क्रोध में भरकर क्षण भर में उसे घोड़ों, रथ और सारथि समेत ऐसे ढक दिया, जैसे मेघ मूसलधार वर्षा से सब कुछ ढक देता है।
श्लोक 31 (4.58.31)
ततः सयुग्याः सरथाः सनागा योधा विनेदुर्भरतर्षभाणाम् । अन्तर्हितं भीष्ममुखाः समीक्ष्य किरीटिना कर्णरथं पृषत्कैः ॥
tataḥ sayugyāḥ sarathāḥ sanāgā yodhā vinedurbharatarṣabhāṇām | antarhitaṃ bhīṣmamukhāḥ samīkṣya kirīṭinā karṇarathaṃ pṛṣatkaiḥ
तब किरीटी के बाणों से कर्ण के रथ को ढका हुआ देखकर भीष्म आदि प्रमुखों के साथ भरतश्रेष्ठों के योद्धा अपने वाहनों, रथों और हाथियों समेत चीत्कार कर उठे।
श्लोक 32 (4.58.32)
स चापि तानर्जुनबाहुमुक्ताञ्शराञ्शरौघैः प्रतिहत्य तूर्णम् । बभौ महात्मा सधनुः सबाणः सविष्फुलिङ्गोऽग्निरिवाथ कर्णः ॥
sa cāpi tānarjunabāhumuktāñśarāñśaraughaiḥ pratihatya tūrṇam | babhau mahātmā sadhanuḥ sabāṇaḥ saviṣphuliṅgo'gnirivātha karṇaḥ
किंतु महात्मा कर्ण ने अर्जुन की भुजाओं से छूटे उन बाणों को अपने बाण-समूहों से शीघ्र ही काट गिराया और धनुष-बाण लिए वह चिनगारियाँ छोड़ती अग्नि की भाँति शोभित हुआ।
श्लोक 33 (4.58.33)
ततस्तु जज्ञे करतालघोषः सशङ्खभेरीपणवाकुलस्तु । प्रक्ष्वेलितास्फोटितसिंहनादैर्वैकर्तनं पूजयतां कुरूणाम् ॥
tatastu jajñe karatālaghoṣaḥ saśaṅkhabherīpaṇavākulastu | prakṣvelitāsphoṭitasiṃhanādairvaikartanaṃ pūjayatāṃ kurūṇām
तब कौरव ललकारों, ताल ठोकने और सिंहनादों से वैकर्तन का सम्मान करने लगे; तालियों का शब्द गूँज उठा, जिसमें शंख, भेरी और पणव की ध्वनि भी मिली थी।
श्लोक 34 (4.58.34)
आधूतलाङ्गूलमहापताकं रथोत्तमं श्रेष्ठतमं कुरूणाम् । ततः सगाण्डीवकृतप्रणादं किरीटिनं प्रेक्ष्य ननाद कर्णः ॥
ādhūtalāṅgūlamahāpatākaṃ rathottamaṃ śreṣṭhatamaṃ kurūṇām | tataḥ sagāṇḍīvakṛtapraṇādaṃ kirīṭinaṃ prekṣya nanāda karṇaḥ
तब कुरुओं में सर्वश्रेष्ठ किरीटी को — जिनके उत्तम रथ की महाध्वजा पर (वानर की) पूँछ लहरा रही थी और जिनका गाण्डीव गर्जना कर रहा था — देखकर कर्ण ने सिंहनाद किया।
श्लोक 35 (4.58.35)
पार्थोऽपि वैकर्तनमर्दयित्वा साश्वं सकेतुं सरथं ससूतम् । ननाद हर्षात्सहसा किरीटी पितामहं द्रोणकृपौ च दृष्ट्वा ॥
pārtho'pi vaikartanamardayitvā sāśvaṃ saketuṃ sarathaṃ sasūtam | nanāda harṣātsahasā kirīṭī pitāmahaṃ droṇakṛpau ca dṛṣṭvā
पार्थ किरीटी ने भी वैकर्तन को घोड़ों, ध्वजा, रथ और सारथि समेत पीड़ित करके, पितामह भीष्म तथा द्रोण और कृप की ओर देखते हुए हर्ष से सहसा गर्जना की।
श्लोक 36 (4.58.36)
सिषेच पार्थं बहुभिः शरौघैर्वैकर्तनः संयति तीक्ष्णवेगैः । वैकर्तनं चापि किरीटमाली प्रच्छादयामास शितैः शरौघैः ॥
siṣeca pārthaṃ bahubhiḥ śaraughairvaikartanaḥ saṃyati tīkṣṇavegaiḥ | vaikartanaṃ cāpi kirīṭamālī pracchādayāmāsa śitaiḥ śaraughaiḥ
वैकर्तन ने रण में तीव्र वेग वाले अनेक बाण-समूहों से पार्थ को नहला दिया, और किरीटधारी अर्जुन ने भी पैने बाणों की झड़ियों से वैकर्तन को ढक दिया।
श्लोक 37 (4.58.37)
तयोरमोघान्सृजतोः शरौघानस्त्रज्ञयोरास महान्विमर्दः । राहुप्रमुक्ताविव चन्द्रसूर्यौ क्षणान्तरेणानुददर्श लोकः ॥
tayoramoghānsṛjatoḥ śaraughānastrajñayorāsa mahānvimardaḥ | rāhupramuktāviva candrasūryau kṣaṇāntareṇānudadarśa lokaḥ
अस्त्रविद्या के उन दोनों ज्ञाताओं के अचूक बाण-समूह बरसाने से भारी संघर्ष छिड़ गया; और लोग उन्हें बीच-बीच में ही ऐसे देख पाते थे, जैसे राहु के ग्रास से छूटे चंद्रमा और सूर्य।
श्लोक 38 (4.58.38)
हतास्तु पार्थेन रथप्रवीरा भूमौ युवानः सुषुपुः सुकेशाः । सुवर्णलोहायसवर्मगात्रा वृक्षा यथा हैमवते निकृत्ताः ॥
hatāstu pārthena rathapravīrā bhūmau yuvānaḥ suṣupuḥ sukeśāḥ | suvarṇalohāyasavarmagātrā vṛkṣā yathā haimavate nikṛttāḥ
पार्थ के हाथों मारे गए, सुंदर केशों वाले युवा श्रेष्ठ रथी धरती पर सो गए; सोने, ताँबे और लोहे के कवचों में लिपटे उनके शरीर हिमालय पर काटे गए वृक्षों के समान पड़े थे।
श्लोक 39 (4.58.39)
तथा स शत्रून्समरे विनिघ्नन्गाण्डीवधन्वा व्यधमत्सपत्नान् । चचार सङ्ख्ये विदिशो दिशश्च दहन्निवाग्निर्वनमातपान्ते ॥
tathā sa śatrūnsamare vinighnangāṇḍīvadhanvā vyadhamatsapatnān | cacāra saṅkhye vidiśo diśaśca dahannivāgnirvanamātapānte
इस प्रकार रण में शत्रुओं को मारते हुए गाण्डीवधारी ने विरोधियों को छिन्न-भिन्न कर दिया और ग्रीष्म के अंत में वन को जलाती अग्नि की भाँति युद्धभूमि में दिशाओं और उपदिशाओं में विचरने लगे।
श्लोक 40 (4.58.40)
सुशीर्णपर्णानि यथा वसन्ते विधूनयन्वायुरिवाल्पसारान् । तथा सपत्नान्विधमन्किरीटी चचार सङ्ख्येऽतिरथो रथेन ॥
suśīrṇaparṇāni yathā vasante vidhūnayanvāyurivālpasārān | tathā sapatnānvidhamankirīṭī cacāra saṅkhye'tiratho rathena
जैसे वसंत में वायु सूखे पत्तों और निर्बल वनस्पतियों को झकझोर कर गिरा देती है, वैसे ही अतिरथी किरीटी अपने रथ पर शत्रुओं को नष्ट करते हुए युद्ध में विचरने लगे।
श्लोक 41 (4.58.41)
शत्रूनिवेन्द्रः समरे किरीटी विद्रावयंस्तद्रथवीरवृन्दम् । प्राच्छादयच्चारुकिरीटमाली वरेषुभिः शत्रुगणाननेकान् ॥
śatrūnivendraḥ samare kirīṭī vidrāvayaṃstadrathavīravṛndam | prācchādayaccārukirīṭamālī vareṣubhiḥ śatrugaṇānanekān
जैसे इन्द्र युद्ध में शत्रुओं को खदेड़ते हैं, वैसे ही सुंदर किरीट धारण करने वाले किरीटी ने रथी वीरों के उस समूह को भगा दिया और अपने उत्तम बाणों से शत्रुओं के अनेक दलों को ढक दिया।
श्लोक 42 (4.58.42)
कर्णं तदोवाच किरीटमाली शूरः कुरूणां प्रवरोऽभिगर्जन् ॥
karṇaṃ tadovāca kirīṭamālī śūraḥ kurūṇāṃ pravaro'bhigarjan
तब कुरुओं में श्रेष्ठ, शूरवीर किरीटधारी अर्जुन ने गर्जते हुए कर्ण से कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 43 (4.58.43)
कर्ण यस्त्वं सभामध्ये बह्वबद्धं प्रभाषसे । न मे युधि समोऽस्तीति तदिदं प्रत्युपस्थितम् ॥
karṇa yastvaṃ sabhāmadhye bahvabaddhaṃ prabhāṣase | na me yudhi samo'stīti tadidaṃ pratyupasthitam
"कर्ण, तुम सभा के बीच जो बहुत-सी अनर्गल बातें बोलते रहे कि 'युद्ध में मेरे समान कोई नहीं है', उसकी परीक्षा की घड़ी अब आ पहुँची है।
श्लोक 44 (4.58.44)
सभायां पौरुषं प्रोच्य धर्ममुत्सृज्य केवलम् । कर्तुमिच्छसि यत्कर्म तन्मन्ये दुष्करं त्वया ॥
sabhāyāṃ pauruṣaṃ procya dharmamutsṛjya kevalam | kartumicchasi yatkarma tanmanye duṣkaraṃ tvayā
सभा में धर्म को पूरी तरह त्यागकर अपने पौरुष की डींग हाँकने के बाद अब तुम जो कर्म करना चाहते हो, मैं समझता हूँ कि वह तुम्हारे लिए करना कठिन है।
श्लोक 45 (4.58.45)
यत्त्वया कथितं पूर्वं नास्ति मत्सम इत्यपि । तत्सत्यं कुरु राधेय कुरुमध्ये मया सह ॥
yattvayā kathitaṃ pūrvaṃ nāsti matsama ityapi | tatsatyaṃ kuru rādheya kurumadhye mayā saha
तुमने पहले जो कहा था कि 'मेरे समान कोई नहीं है', हे राधेय, उसे अब कौरवों के बीच मेरे साथ लड़कर सत्य कर दिखाओ।
श्लोक 46 (4.58.46)
सभायां यस्तु पाञ्चालीं क्लिश्यमानां तदा त्वया । दृष्टवानस्मि तस्याद्य फलमश्नुहि केवलम् ॥
sabhāyāṃ yastu pāñcālīṃ kliśyamānāṃ tadā tvayā | dṛṣṭavānasmi tasyādya phalamaśnuhi kevalam
उस दिन सभा में जिस पाञ्चाली को तुम्हारे द्वारा सताई जाती मैंने देखा था, उसका पूरा फल आज भोगो।
श्लोक 47 (4.58.47)
धर्मपाशनिबद्धेन यन्मया मर्षितं तव । तस्य पापस्य राधेय फलं प्राप्नुहि दुर्मते ॥
dharmapāśanibaddhena yanmayā marṣitaṃ tava | tasya pāpasya rādheya phalaṃ prāpnuhi durmate
धर्म के पाश में बँधे होने के कारण मैंने तुम्हारा जो अपराध सहा था, हे दुर्बुद्धि राधेय, उस पाप का फल अब पाओ।
श्लोक 48 (4.58.48)
एहि कर्ण मया सार्धमिहाद्य कुरु वैशसम् । प्रेक्षकाः कुरवः सन्तु सर्वे ते सहसैनिकाः ॥
ehi karṇa mayā sārdhamihādya kuru vaiśasam | prekṣakāḥ kuravaḥ santu sarve te sahasainikāḥ
आओ कर्ण, आज यहाँ मेरे साथ प्राणों की बाज़ी लगाकर युद्ध करो; ये सब कौरव अपनी सेनाओं सहित दर्शक बनें।
श्लोक 49 (4.58.49)
इदानीमेव तावत्त्वमपयातो रणान्मम । कस्माज्जीवसि राधेय निहतस्त्वनुजस्तव ॥
idānīmeva tāvattvamapayāto raṇānmama | kasmājjīvasi rādheya nihatastvanujastava
अभी-अभी तो तुम रण में मेरे सामने से भाग गए थे। हे राधेय, तुम्हारा छोटा भाई मारा गया, फिर भी तुम कैसे जीवित हो?
श्लोक 50 (4.58.50)
यो भ्रातरं पातयित्वा कस्त्यक्त्वा च रणाजिरम् । त्वदन्यः पुरुषः सत्सु ब्रूयादेवं व्यवस्थितः ॥
yo bhrātaraṃ pātayitvā kastyaktvā ca raṇājiram | tvadanyaḥ puruṣaḥ satsu brūyādevaṃ vyavasthitaḥ
भाई को मरवाकर और रणभूमि छोड़कर भी, सज्जनों के बीच तुम्हारे सिवा कौन ऐसा पुरुष होगा जो इस तरह डटकर ऐसी बातें करे?"
कर्ण उवाच
श्लोक 51 (4.58.51)
ब्रवीषि वाचा यत्पार्थ कर्मणा तत्समाचर । विशेषितो हि त्वं वाचा कर्मणाप्रतिमं भुवि ॥
bravīṣi vācā yatpārtha karmaṇā tatsamācara | viśeṣito hi tvaṃ vācā karmaṇāpratimaṃ bhuvi
"पार्थ, जो तुम वाणी से कहते हो, उसे कर्म से कर दिखाओ। वाणी में तुम बढ़े-चढ़े हो, पर संसार में कर्म ही अनुपम है।
श्लोक 52 (4.58.52)
यत्त्वया मर्षितं पूर्वं तदशक्तेन मर्षितम् । इति गृह्णीम ते पार्थ तमदृष्ट्वा पराक्रमम् ॥
yattvayā marṣitaṃ pūrvaṃ tadaśaktena marṣitam | iti gṛhṇīma te pārtha tamadṛṣṭvā parākramam
पहले तुमने जो सहा, वह असमर्थ होने के कारण सहा — पार्थ, तुम्हारा वह पराक्रम कभी न देखने के कारण हम तो यही समझते हैं।
श्लोक 53 (4.58.53)
धर्मपाशनिबद्धेन यत्त्वया मर्षितं पुरा । तथैव बद्धमात्मानमबद्ध इति मन्यसे ॥
dharmapāśanibaddhena yattvayā marṣitaṃ purā | tathaiva baddhamātmānamabaddha iti manyase
पहले तुमने धर्म के पाश में बँधकर जो सहा था, तुम अब भी वैसे ही बँधे हो, फिर भी अपने को मुक्त समझते हो।
श्लोक 54 (4.58.54)
न हि तावद्वने वासो यथोक्तं चरितस्त्वया । क्लिष्टस्त्वमर्थलोभात्तु समयं छेत्तुमिच्छसि ॥
na hi tāvadvane vāso yathoktaṃ caritastvayā | kliṣṭastvamarthalobhāttu samayaṃ chettumicchasi
जैसा तय हुआ था, वैसा तुम्हारा वनवास अभी पूरा नहीं हुआ है; कष्टों से थककर तुम धन के लोभ में उस शर्त को तोड़ना चाहते हो।
श्लोक 55 (4.58.55)
यदि चेन्द्रः स्वयं पार्थ तव युद्ध्येत कारणात् । तथापि न व्यथा काचिन्मम स्याद्विक्रमिष्यतः ॥
yadi cendraḥ svayaṃ pārtha tava yuddhyeta kāraṇāt | tathāpi na vyathā kācinmama syādvikramiṣyataḥ
पार्थ, यदि स्वयं इन्द्र भी तुम्हारे लिए युद्ध करें, तब भी पराक्रम दिखाने को उद्यत मुझे कोई भय न होगा।
श्लोक 56 (4.58.56)
अयं कौन्तेयकामस्ते नचिरात्समुपस्थितः । योत्स्यसे हि मया सार्धमत्र पश्यामि ते बलम् ॥
ayaṃ kaunteyakāmaste nacirātsamupasthitaḥ | yotsyase hi mayā sārdhamatra paśyāmi te balam
कुन्तीपुत्र, तुम्हारी यह इच्छा शीघ्र ही पूरी होने को आ पहुँची है; तुम मेरे साथ युद्ध करोगे, और यहीं मैं तुम्हारा बल देखूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 57 (4.58.57)
इति कर्णो ब्रुवन्नेव बीभत्सुमपराजितम् । अभ्ययाद्विसृजन्बाणान्कायावरणभेदिनः ॥
iti karṇo bruvanneva bībhatsumaparājitam | abhyayādvisṛjanbāṇānkāyāvaraṇabhedinaḥ
ऐसा कहते-कहते ही कर्ण कवच भेदने वाले बाण छोड़ता हुआ अपराजित बीभत्सु (अर्जुन) की ओर बढ़ा।
श्लोक 58 (4.58.58)
प्रतिजग्राह तान्पार्थः प्रीयमाणो महारथः ॥
pratijagrāha tānpārthaḥ prīyamāṇo mahārathaḥ
महारथी पार्थ ने प्रसन्न होकर उन बाणों का सामना किया।
श्लोक 59 (4.58.59)
शरवर्षेण महता पर्जन्य इव वृष्टिमान् । अभीयाय हि बीभत्सुर्गाण्डीवं विक्षिपन्धनुः ॥
śaravarṣeṇa mahatā parjanya iva vṛṣṭimān | abhīyāya hi bībhatsurgāṇḍīvaṃ vikṣipandhanuḥ
बरसते मेघ की भाँति बाणों की भारी वर्षा करते हुए, गाण्डीव धनुष को बार-बार खींचते हुए बीभत्सु आगे बढ़े।
श्लोक 60 (4.58.60)
जिघांसुः समरे कर्णं विससर्ज शरान्बहून् । तान्कर्णः प्रतिजग्राह वायुवेगमिवाचलः ॥
jighāṃsuḥ samare karṇaṃ visasarja śarānbahūn | tānkarṇaḥ pratijagrāha vāyuvegamivācalaḥ
रण में कर्ण को मारने की इच्छा से उन्होंने बहुत-से बाण छोड़े; कर्ण ने उन्हें वैसे ही झेल लिया, जैसे पर्वत वायु के वेग को झेलता है।
श्लोक 61 (4.58.61)
तयोर्दैवासुरसमः सन्निपातोऽभवन्महान् । किरतोः शरजालानि कृत्स्नं व्योम निरन्तरम् ॥
tayordaivāsurasamaḥ sannipāto'bhavanmahān | kiratoḥ śarajālāni kṛtsnaṃ vyoma nirantaram
बाणों के जाल बिखेरते उन दोनों के बीच देवताओं और असुरों के युद्ध जैसा भारी संग्राम हुआ, और सारा आकाश बिना किसी अंतराल के भर गया।
श्लोक 62 (4.58.62)
उत्पेतुर्मेघजालानि घोररूपाणि सर्वशः । ववर्ष च रजो भौमं कर्णपार्थसमागमे ॥
utpeturmeghajālāni ghorarūpāṇi sarvaśaḥ | vavarṣa ca rajo bhaumaṃ karṇapārthasamāgame
चारों ओर भयानक मेघ-समूह उमड़ आए, और जहाँ कर्ण और पार्थ भिड़े थे, वहाँ धरती की धूल बरसने लगी।
श्लोक 63 (4.58.63)
न स्म सूर्यः प्रतपति न च वाति समीरणः । शरप्रच्छादितं व्योम छायाभूतमिवाभवत् ॥
na sma sūryaḥ pratapati na ca vāti samīraṇaḥ | śarapracchāditaṃ vyoma chāyābhūtamivābhavat
न सूर्य तपता था, न वायु बहती थी; बाणों से ढका आकाश मानो छाया-सा हो गया।
श्लोक 64 (4.58.64)
गाण्डीवस्य च निर्घोषः कर्णस्य धनुषस्तथा । दह्यतामिव वेणूनामासीत्परमदारुणः ॥
gāṇḍīvasya ca nirghoṣaḥ karṇasya dhanuṣastathā | dahyatāmiva veṇūnāmāsītparamadāruṇaḥ
गाण्डीव और कर्ण के धनुष की टंकार जलते हुए बाँसों के चटकने जैसी अत्यंत भयानक थी।
श्लोक 65 (4.58.65)
अर्जुनस्तु हयान्नागान्रथांश्च विनिपातयन् । क्षोभयामास तत्सैन्यं कर्णं विव्याध चासकृत् ॥
arjunastu hayānnāgānrathāṃśca vinipātayan | kṣobhayāmāsa tatsainyaṃ karṇaṃ vivyādha cāsakṛt
अर्जुन ने घोड़ों, हाथियों और रथों को गिराते हुए उस सेना में खलबली मचा दी और कर्ण को बार-बार बींधा।
श्लोक 66 (4.58.66)
ततः पार्थो महाबाहुः कर्णस्य धनुरच्छिनत् । छिन्नधन्वा ततः कर्णः शक्तिं चिक्षेप वेगवान् । तां शक्तिं समरे पार्थश्चिच्छेद निशितैः शरैः ॥
tataḥ pārtho mahābāhuḥ karṇasya dhanuracchinat | chinnadhanvā tataḥ karṇaḥ śaktiṃ cikṣepa vegavān | tāṃ śaktiṃ samare pārthaściccheda niśitaiḥ śaraiḥ
तब महाबाहु पार्थ ने कर्ण का धनुष काट डाला। धनुष कट जाने पर कर्ण ने बड़े वेग से एक शक्ति फेंकी; पार्थ ने रण में पैने बाणों से उस शक्ति को भी काट गिराया।
श्लोक 67 (4.58.67)
ततो निपेतुर्बहुशो राधेयस्य पदानुगाः । तांश्च गाण्डीवनिर्मुक्तैः प्राहिणोद्यमसादनम् ॥
tato nipeturbahuśo rādheyasya padānugāḥ | tāṃśca gāṇḍīvanirmuktaiḥ prāhiṇodyamasādanam
तब राधेय के अनुयायी बड़ी संख्या में उन पर टूट पड़े, और उन्होंने गाण्डीव से छूटे बाणों से उन्हें यमलोक भेज दिया।
श्लोक 68 (4.58.68)
अशेरतावृत्य महीं समग्रां पार्थेषुमार्गे निहता द्विपेन्द्राः । हिरण्यकक्ष्याः शरजालचित्रा यथा नगाः पावकजालनद्धाः ॥
aśeratāvṛtya mahīṃ samagrāṃ pārtheṣumārge nihatā dvipendrāḥ | hiraṇyakakṣyāḥ śarajālacitrā yathā nagāḥ pāvakajālanaddhāḥ
पार्थ के बाणों के मार्ग में मारे गए बड़े-बड़े गजराज, जिनकी कक्ष्याएँ सोने की थीं और जिनके शरीर बाणों के जाल से चित्रित थे, सारी धरती को ढककर ऐसे पड़े थे, जैसे अग्नि की लपटों के जाल में लिपटे पर्वत।
श्लोक 69 (4.58.69)
तं शत्रुसेनाङ्गनिबर्हणानि कर्माणि कुर्वाणममानुषाणि । वैकर्तनः पूर्वममृष्यमाणः समार्पयल्लक्ष्यमिवाशु पार्थम् ॥
taṃ śatrusenāṅganibarhaṇāni karmāṇi kurvāṇamamānuṣāṇi | vaikartanaḥ pūrvamamṛṣyamāṇaḥ samārpayallakṣyamivāśu pārtham
शत्रु-सेना के अंगों का संहार करने वाले उन अलौकिक कर्मों को करते पार्थ को, आरंभ से ही असहिष्णु वैकर्तन ने, मानो कोई लक्ष्य हो, शीघ्रता से बाणों से बींध दिया।
श्लोक 70 (4.58.70)
ततश्चतुर्भिस्तुरगान्विकृष्य विव्याध कर्णोऽथ धनंजयस्य । षड्भिश्च सूतं दशभिर्हयांश्च षष्ट्या च पार्थं त्रिभिरस्य केतुम् ॥
tataścaturbhisturagānvikṛṣya vivyādha karṇo'tha dhanaṃjayasya | ṣaḍbhiśca sūtaṃ daśabhirhayāṃśca ṣaṣṭyā ca pārthaṃ tribhirasya ketum
फिर कर्ण ने धनुष खींचकर चार बाणों से धनंजय के घोड़ों को बींधा; छह से सारथि को, दस से फिर घोड़ों को, साठ से स्वयं पार्थ को और तीन से उनकी ध्वजा को।
श्लोक 71 (4.58.71)
सविष्फुलिङ्गोज्ज्वलभीमघोषः कोपेन्धनः केतुशिखः शरार्चिः । कर्णाग्निरस्त्रानिलभीमवातो बभौ दिधक्षन्निव पार्थकक्षम् ॥
saviṣphuliṅgojjvalabhīmaghoṣaḥ kopendhanaḥ ketuśikhaḥ śarārciḥ | karṇāgnirastrānilabhīmavāto babhau didhakṣanniva pārthakakṣam
कर्ण रूपी अग्नि — चिनगारियों से दमकती जिसकी भयानक गर्जना थी, क्रोध जिसका ईंधन था, ध्वजा जिसकी शिखा, बाण जिसकी लपटें और अस्त्रों की वायु जिसकी प्रचंड आँधी थी — पार्थ रूपी सूखे वन को जला डालने को उद्यत-सी चमक उठी।
श्लोक 72 (4.58.72)
स्वनेमिशङ्खस्वनभीमघोषश्चलत्पताकोज्ज्वलभीमविद्युत् । पार्थाम्बुदः शस्त्रशराम्बुधारः कर्णानलं संशमयांचकार ॥
svanemiśaṅkhasvanabhīmaghoṣaścalatpatākojjvalabhīmavidyut | pārthāmbudaḥ śastraśarāmbudhāraḥ karṇānalaṃ saṃśamayāṃcakāra
किंतु पार्थ रूपी मेघ ने — रथ के पहियों और शंख की ध्वनि जिसकी भयंकर गर्जना थी, फहराती पताका जिसकी दमकती बिजली थी, और शस्त्र-बाण जिसकी जलधाराएँ थीं — कर्ण रूपी अग्नि को शांत कर दिया।
श्लोक 73 (4.58.73)
तेनातिविद्धः समरे किरीटी प्रबोधितः सिंह इव प्रसुप्तः । गाण्डीवधन्वा प्रवरः कुरूणां प्रतत्वरे कर्णवधाय जिष्णुः ॥
tenātividdhaḥ samare kirīṭī prabodhitaḥ siṃha iva prasuptaḥ | gāṇḍīvadhanvā pravaraḥ kurūṇāṃ pratatvare karṇavadhāya jiṣṇuḥ
उसके बाणों से अत्यंत बिंधकर, सोते से जगाए गए सिंह की भाँति, कुरुओं में श्रेष्ठ गाण्डीवधारी जिष्णु किरीटी कर्ण-वध के लिए झपट पड़े।
श्लोक 74 (4.58.74)
स ब्राह्ममस्त्रं समरे किरीटी प्रादुश्चकाराद्भुतवीर्यकर्मा । सन्तापयन्कर्णरथं शरौघैर्लोकानिमान्त्सूर्य इवांशुमाली ॥
sa brāhmamastraṃ samare kirīṭī prāduścakārādbhutavīryakarmā | santāpayankarṇarathaṃ śaraughairlokānimāntsūrya ivāṃśumālī
तब अद्भुत पराक्रम और कर्म वाले किरीटी ने रण में ब्रह्मास्त्र प्रकट किया और बाणों की झड़ियों से कर्ण के रथ को ऐसे तपाने लगे, जैसे किरणमाली सूर्य इन लोकों को तपाता है।
श्लोक 75 (4.58.75)
स हस्तिनेवाभिहतो गजेन्द्रः प्रगृह्य भल्लान्निशितान्निषङ्गात् । आकर्णपूर्णं तु धनुर्विकृष्य विव्याध बाणैरथ सूतपुत्रम् ॥
sa hastinevābhihato gajendraḥ pragṛhya bhallānniśitānniṣaṅgāt | ākarṇapūrṇaṃ tu dhanurvikṛṣya vivyādha bāṇairatha sūtaputram
दूसरे हाथी से आहत गजराज की भाँति उन्होंने तरकश से पैने भल्ल बाण निकाले, धनुष को कान तक खींचा और उन बाणों से सूतपुत्र को बींध डाला।
श्लोक 76 (4.58.76)
अथास्य बाहू सशिरो ललाटं ग्रीवामुरः स्कन्धभुजान्तरं च । कर्णस्य पार्थो युधि निर्बिभेद वज्रैरिवाद्रिं भगवान्महेन्द्रः ॥
athāsya bāhū saśiro lalāṭaṃ grīvāmuraḥ skandhabhujāntaraṃ ca | karṇasya pārtho yudhi nirbibheda vajrairivādriṃ bhagavānmahendraḥ
फिर पार्थ ने युद्ध में कर्ण की भुजाओं, सिर और ललाट, गर्दन, छाती तथा कंधों और भुजाओं के बीच के भाग को ऐसे भेद डाला, जैसे भगवान् महेन्द्र वज्रों से पर्वत को भेदते हैं।
श्लोक 77 (4.58.77)
स पार्थमुक्तानविषह्य बाणान् गजो गजेनेव जितस्तरस्वी । विहाय संग्रामशिरोऽपयातो वैकर्तनः पार्थशराभितप्तः ॥
sa pārthamuktānaviṣahya bāṇān gajo gajeneva jitastarasvī | vihāya saṃgrāmaśiro'payāto vaikartanaḥ pārthaśarābhitaptaḥ
पार्थ के छोड़े बाणों को सह न सकने के कारण, दूसरे हाथी से पराजित हाथी की भाँति, वह वेगशाली वैकर्तन पार्थ के बाणों से संतप्त होकर युद्ध का अग्रभाग छोड़कर हट गया।