Skip to main content

विराट पर्व · अध्याय 57

अर्जुन द्वारा कुरु-सेना का संहार और कर्ण की पराजय

अश्वत्थामा सभा में की गई डींगों के लिए कर्ण पर व्यंग्य करता है, और कर्ण उत्तर देता है कि वह न अर्जुन से डरता है न कृष्ण से। दुर्योधन मानता है कि उन्हें पता नहीं था कि अर्जुन विराट के नगर में है, फिर भी भागने के बजाय युद्ध का निश्चय करता है, और दस हज़ार धनुर्धर द्रोण, भीष्म, कर्ण, दुर्योधन और अश्वत्थामा के साथ अर्जुन को घेर लेते हैं। अर्जुन के दिव्य अस्त्र घोड़ों, हाथियों और योद्धाओं को काट गिराते हैं और रणभूमि रक्त से लाल हो जाती है; वे एक-एक कर कुरु नायकों को बींधते हैं, कर्ण के घोड़ों और सारथि को मारकर उसका धनुष काट देते हैं, और कौरव सेना बिखर जाती है।

अध्याय 56अध्याय-सूचीअध्याय 58

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.57.1)

अश्वत्थामा ततस्तत्र कर्णं संप्रेक्ष्य वीर्यवान् । उवाच स्मयमानोऽसौ सूतपुत्रमरिन्दमम् ॥

aśvatthāmā tatastatra karṇaṃ saṃprekṣya vīryavān | uvāca smayamāno'sau sūtaputramarindamam

तब पराक्रमी अश्वत्थामा ने वहाँ कर्ण की ओर देखकर मुसकराते हुए शत्रुओं का दमन करने वाले उस सूतपुत्र से कहा:

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 2 (4.57.2)

कर्ण यस्त्वं सभामध्ये बह्वबद्धं विकत्थसे । न मे युधि समोऽस्तीति तदिदं प्रत्युपस्थितम् ॥

karṇa yastvaṃ sabhāmadhye bahvabaddhaṃ vikatthase | na me yudhi samo'stīti tadidaṃ pratyupasthitam

"कर्ण, तुम सभा के बीच बहुत-सी अनर्गल डींगें हाँकते थे कि युद्ध में मेरी बराबरी का कोई नहीं; वही अवसर अब सामने आ पहुँचा है।

श्लोक 3 (4.57.3)

एषोऽन्तक इव क्रुद्धः सर्वभूतावमर्दनः । संग्रामशिरसो मध्ये जृम्भते केसरी यथा ॥

eṣo'ntaka iva kruddhaḥ sarvabhūtāvamardanaḥ | saṃgrāmaśiraso madhye jṛmbhate kesarī yathā

यह रहा वह, क्रोध में यमराज के समान, सब प्राणियों को रौंद डालने वाला, युद्ध के अग्रभाग में सिंह की भाँति अँगड़ाई ले रहा है।

श्लोक 4 (4.57.4)

शूरोऽसि यदि संग्रामे दर्शयस्व सभां विना ॥

śūro'si yadi saṃgrāme darśayasva sabhāṃ vinā

यदि तुम शूर हो तो सभा से बाहर, युद्ध में अपनी शूरता दिखाओ।

श्लोक 5 (4.57.5)

यद्यशक्तोऽसि संग्रामे पार्थेनाद्भुतकर्मणा । पुनरेव सभां गत्वा धार्तराष्ट्रेण धीमता । मातुलं परिगृह्याशु मन्त्रयस्व यथासुखम् ॥

yadyaśakto'si saṃgrāme pārthenādbhutakarmaṇā | punareva sabhāṃ gatvā dhārtarāṣṭreṇa dhīmatā | mātulaṃ parigṛhyāśu mantrayasva yathāsukham

और यदि अद्भुत कर्म करने वाले पार्थ से युद्ध करने में तुम असमर्थ हो, तो बुद्धिमान धृतराष्ट्र-पुत्र के साथ फिर सभा में लौट जाओ, मामा को भी तुरंत साथ ले लो और आराम से मन्त्रणा करते रहो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 6 (4.57.6)

एवमुक्तस्तथा कर्णः क्रोधादुद्‌वृत्य लोचने । द्रोणपुत्रमिदं वाक्यमुवाच कुरुसन्निधौ ॥

evamuktastathā karṇaḥ krodhādudvṛtya locane | droṇaputramidaṃ vākyamuvāca kurusannidhau

इस प्रकार कहे जाने पर कर्ण ने क्रोध से आँखें तरेरकर कुरुओं के सामने द्रोणपुत्र से यह वचन कहा:

कर्ण उवाच

श्लोक 7 (4.57.7)

नाहं बिभेमि बीभत्सोर्न कृष्णाद्देवकीसुतात् । पाण्डवेभ्योऽपि सर्वेभ्यः क्षत्रधर्ममनुव्रतः ॥

nāhaṃ bibhemi bībhatsorna kṛṣṇāddevakīsutāt | pāṇḍavebhyo'pi sarvebhyaḥ kṣatradharmamanuvrataḥ

"मैं क्षत्रिय-धर्म का पालन करने वाला हूँ; मैं न बीभत्सु से डरता हूँ, न देवकीनन्दन कृष्ण से, न सारे पाण्डवों से।

श्लोक 8 (4.57.8)

सत्वाधिकानां पुंसां तु धनुर्वेदोपजीविनाम् । गर्जतां जायते दर्पः स्वरश्च न विषीदति ॥

satvādhikānāṃ puṃsāṃ tu dhanurvedopajīvinām | garjatāṃ jāyate darpaḥ svaraśca na viṣīdati

धनुर्वेद से जीविका चलाने वाले, अधिक साहस वाले पुरुष जब गरजते हैं तो उनमें दर्प उत्पन्न होता है और उनका स्वर नहीं डगमगाता।

श्लोक 9 (4.57.9)

पश्यत्वाचार्यपुत्रो मामर्जुनेनातिरंहसा । युध्यमानं सुसंयुक्तं जयो वै मय्यवस्थितः ॥

paśyatvācāryaputro māmarjunenātiraṃhasā | yudhyamānaṃ susaṃyuktaṃ jayo vai mayyavasthitaḥ

आचार्यपुत्र देख लें कि मैं भली-भाँति सन्नद्ध होकर अत्यन्त वेगशाली अर्जुन से कैसे लड़ता हूँ; विजय तो मुझमें ही स्थित है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (4.57.10)

ततः प्रहस्य बीभत्सुः कौन्तेयः श्वेतवाहनः । दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणः प्रत्ययाद्रथिसत्तमः ॥

tataḥ prahasya bībhatsuḥ kaunteyaḥ śvetavāhanaḥ | divyamastraṃ vikurvāṇaḥ pratyayādrathisattamaḥ

तब श्वेत घोड़ों वाले कुन्तीपुत्र बीभत्सु हँसे और दिव्य अस्त्र प्रकट करते हुए वे रथियों में श्रेष्ठ वीर आगे बढ़े।

श्लोक 11 (4.57.11)

महात्मानं मन्दबुद्धिर्निश्वसन्धृतराष्ट्रजः । उवाच स महाराज राजा दुर्योधनस्तदा ॥

mahātmānaṃ mandabuddhirniśvasandhṛtarāṣṭrajaḥ | uvāca sa mahārāja rājā duryodhanastadā

हे महाराज, तब मन्दबुद्धि धृतराष्ट्र-पुत्र राजा दुर्योधन ने लंबी साँस लेते हुए उस महात्मा से कहा:

दुर्योधन उवाच

श्लोक 12 (4.57.12)

न विद्मो ह्यर्जुनं तत्र वसन्तं मत्स्यवेश्मनि । तेनेदं कर्ण मत्स्यानामग्रहीष्म धनं बहु ॥

na vidmo hyarjunaṃ tatra vasantaṃ matsyaveśmani | tenedaṃ karṇa matsyānāmagrahīṣma dhanaṃ bahu

"हमें पता नहीं था कि अर्जुन वहाँ मत्स्यराज के घर में रह रहा है; इसी कारण, कर्ण, हमने मत्स्यों का बहुत-सा धन छीन लिया।

श्लोक 13 (4.57.13)

एवं चेत्तर्हि गच्छामो विसृजन्तो धनं बहु । अयशो नातिवर्तेत लोकयोरुभयोरपि ॥

evaṃ cettarhi gacchāmo visṛjanto dhanaṃ bahu | ayaśo nātivarteta lokayorubhayorapi

ऐसी स्थिति में यदि हम वह बहुत-सा धन छोड़कर लौट जाएँ, तो दोनों लोकों में हमारा अपयश दूर न होगा।

श्लोक 14 (4.57.14)

किं च युद्धात्परं नास्ति क्षत्रियाणां सुखावहम् । तस्मात्पार्थेन संग्रामं कुर्महे न पलायनम् ॥

kiṃ ca yuddhātparaṃ nāsti kṣatriyāṇāṃ sukhāvaham | tasmātpārthena saṃgrāmaṃ kurmahe na palāyanam

फिर क्षत्रियों के लिए युद्ध से बढ़कर सुख देने वाला कुछ नहीं है; इसलिए हम पार्थ से युद्ध करेंगे, भागेंगे नहीं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (4.57.15)

एतावदुक्त्वा राजा वै ह्यभियानमियेष सः । तथा दशसहस्राणि वीराणां हि धनुष्मताम् । अभ्यद्रवंस्तदा पार्थं शलभा इव पावकम् ॥

etāvaduktvā rājā vai hyabhiyānamiyeṣa saḥ | tathā daśasahasrāṇi vīrāṇāṃ hi dhanuṣmatām | abhyadravaṃstadā pārthaṃ śalabhā iva pāvakam

इतना कहकर राजा ने आक्रमण करने का निश्चय किया। तब दस हज़ार वीर धनुर्धर पार्थ पर ऐसे टूट पड़े जैसे पतंगे आग पर।

श्लोक 16 (4.57.16)

वर्मिता वाजिनस्तत्र संभृताश्च पदातिभिः । भीमरूपाश्च मातङ्गास्तोमराङ्कुशपाणिभिः ॥

varmitā vājinastatra saṃbhṛtāśca padātibhiḥ | bhīmarūpāśca mātaṅgāstomarāṅkuśapāṇibhiḥ

वहाँ कवचधारी घोड़े थे, जिनके साथ पैदल सैनिक थे, और भयंकर हाथी थे, जिन पर तोमर और अंकुश हाथ में लिए योद्धा बैठे थे,

श्लोक 17 (4.57.17)

अधिष्ठिताः सुसंयत्तैर्हस्तिशिक्षाविशारदैः । अभ्यद्रवन्सुसंक्रुद्धाश्चापहस्तोद्यतायुधाः ॥

adhiṣṭhitāḥ susaṃyattairhastiśikṣāviśāradaiḥ | abhyadravansusaṃkruddhāścāpahastodyatāyudhāḥ

जो पूरी तरह सन्नद्ध और हाथी चलाने की विद्या में निपुण थे। वे अत्यन्त क्रुद्ध होकर, हाथों में धनुष और उठे हुए शस्त्र लिए, धावा बोलने लगे।

श्लोक 18 (4.57.18)

पञ्च चैनं रथोदग्रास्त्वरिताः पर्यवारयन् । द्रोणो भीष्मश्च कर्णश्च कुरुराजश्च वीर्यवान् ॥

pañca cainaṃ rathodagrāstvaritāḥ paryavārayan | droṇo bhīṣmaśca karṇaśca kururājaśca vīryavān

पाँच प्रमुख रथियों ने शीघ्रता से उन्हें घेर लिया: द्रोण, भीष्म, कर्ण, पराक्रमी कुरुराज,

श्लोक 19 (4.57.19)

अश्वत्थामा महाबाहुर्धनुर्वेदपरायणः । इषूंश्च सम्यगस्यन्तो जीमूता इव वार्षिकाः ॥

aśvatthāmā mahābāhurdhanurvedaparāyaṇaḥ | iṣūṃśca samyagasyanto jīmūtā iva vārṣikāḥ

और धनुर्वेद में निष्ठ महाबाहु अश्वत्थामा; वे वर्षा ऋतु के बादलों की भाँति ठीक निशाने पर बाण छोड़ रहे थे।

श्लोक 20 (4.57.20)

ते लाभमिव मन्वानाः प्रत्यगृह्णन्धनंजयम् । शरौघानभिवर्षन्तो नादयन्तो दिशो दश ॥

te lābhamiva manvānāḥ pratyagṛhṇandhanaṃjayam | śaraughānabhivarṣanto nādayanto diśo daśa

मानो कोई लाभ पा रहे हों, ऐसा समझकर उन्होंने धनंजय का सामना किया; वे बाणों की बौछार करते हुए दसों दिशाओं को गुँजा रहे थे।

श्लोक 21 (4.57.21)

ततः प्रहस्य बीभत्सुः कौन्तेयः श्वेतवाहनः । दिव्यमस्त्रं प्रकुर्वाणः प्रत्ययाद्रथिसत्तमान् ॥

tataḥ prahasya bībhatsuḥ kaunteyaḥ śvetavāhanaḥ | divyamastraṃ prakurvāṇaḥ pratyayādrathisattamān

तब श्वेत घोड़ों वाले कुन्तीपुत्र बीभत्सु हँसे और दिव्य अस्त्र प्रकट करते हुए उन श्रेष्ठ रथियों पर चढ़ आए।

श्लोक 22 (4.57.22)

यथा रश्मिभिरादित्यः प्रच्छादयति मेदिनीम् । तथा गाण्डीवनिर्मुक्तैः शरैराच्छादयद्दिशः ॥

yathā raśmibhirādityaḥ pracchādayati medinīm | tathā gāṇḍīvanirmuktaiḥ śarairācchādayaddiśaḥ

जैसे सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी को ढक लेता है, वैसे ही उन्होंने गाण्डीव से छूटे बाणों से दिशाओं को ढक दिया।

श्लोक 23 (4.57.23)

न रथानां न चाश्वानां न ध्वजानां न वर्मिणाम् । अतिविद्धैः शितैर्बाणैरासीदद्व्यङ्गुलिरन्तरम् ॥

na rathānāṃ na cāśvānāṃ na dhvajānāṃ na varmiṇām | atividdhaiḥ śitairbāṇairāsīdadvyaṅgulirantaram

रथों, घोड़ों, ध्वजों और कवचधारी योद्धाओं पर दो अंगुल भर स्थान भी ऐसा न बचा जो उनके गहरे बिंधने वाले तीखे बाणों से अछूता हो।

श्लोक 24 (4.57.24)

दैवयोगाद्धि पार्थस्य हयानामुत्तरस्य च । शिक्षाबलोपपन्नत्वादस्त्राणां वै परिक्रमात् । ध्वजगाण्डीवयोश्चापि दैव्या शक्त्या च मायया ॥

daivayogāddhi pārthasya hayānāmuttarasya ca | śikṣābalopapannatvādastrāṇāṃ vai parikramāt | dhvajagāṇḍīvayoścāpi daivyā śaktyā ca māyayā

पार्थ, उनके घोड़ों और उत्तर पर दैव की कृपा से, उनके प्रशिक्षण और बल से, अस्त्रों के कुशल क्रम से, तथा ध्वज और गाण्डीव की दिव्य शक्ति और माया से,

श्लोक 25 (4.57.25)

इतस्ततश्च संयाने दूरे वाऽप्यथवाऽन्तिके । दुर्गे विषमजाते वा स्थले निम्ने तथा क्षितौ । न च रुध्येद्गतिस्तस्य रथस्य मनसो यथा ॥

itastataśca saṃyāne dūre vā'pyathavā'ntike | durge viṣamajāte vā sthale nimne tathā kṣitau | na ca rudhyedgatistasya rathasya manaso yathā

वे जहाँ-जहाँ जाते, दूर हो या पास, दुर्गम या ऊबड़-खाबड़ भूमि हो, ऊँची हो या नीची, उनके रथ की गति मन की गति की भाँति कहीं नहीं रुकती थी।

श्लोक 26 (4.57.26)

समरेषु तु विद्वांसस्तस्य तांस्तान्परिक्रमान् । वीर्यमत्यद्भुतं दृष्ट्वा तथा पार्थस्य तद्बलम् । त्रेसुरेवं परे भीताः पराङ्मुखरथा अपि ॥

samareṣu tu vidvāṃsastasya tāṃstānparikramān | vīryamatyadbhutaṃ dṛṣṭvā tathā pārthasya tadbalam | tresurevaṃ pare bhītāḥ parāṅmukharathā api

युद्धों के जानकार लोग उनकी वे चालें, उनका अत्यन्त अद्भुत पराक्रम और पार्थ का वह बल देखकर भयभीत हो गए; शत्रु काँप उठे और अपने रथ भी पीछे मोड़ने लगे।

श्लोक 27 (4.57.27)

कालाग्निमिव बीभत्सुं निर्दहन्तमिव प्रजाः । नारयः प्रेक्षितुं शेकुर्ज्वलन्तमिव पावकम् ॥

kālāgnimiva bībhatsuṃ nirdahantamiva prajāḥ | nārayaḥ prekṣituṃ śekurjvalantamiva pāvakam

प्रलयकाल की अग्नि की भाँति प्रजा को जलाते हुए, धधकती आग जैसे बीभत्सु की ओर शत्रु देख भी न सके।

श्लोक 28 (4.57.28)

तानि भिन्नान्यनीकानि रेजुरर्जुनमार्गणैः । तिग्मांशोश्च घनाभ्राणि व्याप्तानीव गभस्तिभिः ॥

tāni bhinnānyanīkāni rejurarjunamārgaṇaiḥ | tigmāṃśośca ghanābhrāṇi vyāptānīva gabhastibhiḥ

अर्जुन के बाणों से छिन्न-भिन्न वे सेनाएँ सूर्य की किरणों से बिंधे घने बादलों की तरह दिखाई दे रही थीं।

श्लोक 29 (4.57.29)

अशोकानां वनानीव सञ्चितैः कुसुमैः शुभैः । पार्थः संरञ्जयामास रुधिरेणाकुलं बलम् ॥

aśokānāṃ vanānīva sañcitaiḥ kusumaiḥ śubhaiḥ | pārthaḥ saṃrañjayāmāsa rudhireṇākulaṃ balam

सुन्दर फूलों से लदे अशोक के वनों की भाँति पार्थ ने व्याकुल सेना को रक्त से लाल कर दिया।

श्लोक 30 (4.57.30)

सहस्रशोऽर्जुनशरैश्छिन्नान्युच्चावचानि च । छत्राणि च पताकाश्च खेऽभ्युवाह सदागतिः ॥

sahasraśo'rjunaśaraiśchinnānyuccāvacāni ca | chatrāṇi ca patākāśca khe'bhyuvāha sadāgatiḥ

अर्जुन के बाणों से हज़ारों की संख्या में कटे हुए छोटे-बड़े छत्रों और पताकाओं को वायु आकाश में उड़ा ले गई।

श्लोक 31 (4.57.31)

ये ह्यर्जुनबलत्रस्ताः परिपेतुर्दिशो दश । रथात्तं देशमुत्सृज्य पार्थच्छिन्नयुगा हयाः ॥

ye hyarjunabalatrastāḥ paripeturdiśo daśa | rathāttaṃ deśamutsṛjya pārthacchinnayugā hayāḥ

जिन घोड़ों के जुए पार्थ ने काट दिए थे, वे अर्जुन के बल से भयभीत होकर रथों का स्थान छोड़ दसों दिशाओं में भाग खड़े हुए;

श्लोक 32 (4.57.32)

निकृत्तपूर्वचरणास्ते निपेतुः शितैः शरैः । शिरोभिः प्रथमं जग्मुर्मेदिनीं जघनैर्हयाः ॥

nikṛttapūrvacaraṇāste nipetuḥ śitaiḥ śaraiḥ | śirobhiḥ prathamaṃ jagmurmedinīṃ jaghanairhayāḥ

तीखे बाणों से अगले पैर कट जाने पर वे गिर पड़े; घोड़े पहले सिर के बल और फिर पिछले भाग के बल भूमि पर आ गिरे।

श्लोक 33 (4.57.33)

चक्षुर्नासाविषाणेषु दन्तवेष्टेषु च द्विपान् । मर्मस्वन्येषु चाहत्य तथा निघ्नन्गजोत्तमान् ॥

cakṣurnāsāviṣāṇeṣu dantaveṣṭeṣu ca dvipān | marmasvanyeṣu cāhatya tathā nighnangajottamān

हाथियों की आँखों, सूँड़ों, दाँतों, मसूड़ों और अन्य मर्मस्थानों पर प्रहार करके उन्होंने श्रेष्ठ हाथियों को मार गिराया।

श्लोक 34 (4.57.34)

कौरवाणां गजानां च शरीरैर्गतचेतसाम् । क्षणेन संवृता भूमिर्मेघैरिव नभस्थलम् ॥

kauravāṇāṃ gajānāṃ ca śarīrairgatacetasām | kṣaṇena saṃvṛtā bhūmirmeghairiva nabhasthalam

क्षण भर में कौरवों के निष्प्राण हाथियों के शरीरों से भूमि ऐसे ढक गई जैसे बादलों से आकाश।

श्लोक 35 (4.57.35)

अस्त्रैर्दिव्यैर्महाबाहुरर्जुनः प्रहसन्निव । बडबामुखसंभूतः कालाग्निरिव संवृतः ॥

astrairdivyairmahābāhurarjunaḥ prahasanniva | baḍabāmukhasaṃbhūtaḥ kālāgniriva saṃvṛtaḥ

महाबाहु अर्जुन दिव्य अस्त्रों के साथ मानो हँसते हुए, वडवामुख से उत्पन्न, ज्वालाओं से घिरी प्रलयाग्नि के समान जान पड़ते थे।

श्लोक 36 (4.57.36)

यथा युगान्तसमये सर्वं स्थावरजङ्गमम् । कालपक्वमशेषेण धक्ष्येदुग्रशिखः शिखी ॥

yathā yugāntasamaye sarvaṃ sthāvarajaṅgamam | kālapakvamaśeṣeṇa dhakṣyedugraśikhaḥ śikhī

जैसे युग के अन्त में प्रचण्ड लपटों वाली अग्नि काल से पके हुए समस्त चराचर जगत को पूरी तरह जला डालती है,

श्लोक 37 (4.57.37)

तद्वत्पार्थोऽस्त्रतेजोभिर्धनुषो निस्वनेन च । दैवाद्वीर्याच्च बीभत्सुस्तस्मिन्दौर्योधने बले ॥

tadvatpārtho'stratejobhirdhanuṣo nisvanena ca | daivādvīryācca bībhatsustasmindauryodhane bale

वैसे ही बीभत्सु ने अपने अस्त्रों के तेज, धनुष की टंकार, दैव और अपने पराक्रम से दुर्योधन की उस सेना में

श्लोक 38 (4.57.38)

रणे शक्तिममित्राणां प्रणीयोपनिनाय सः । चेष्टां प्रायेण भूतानां रात्रिः प्राणभृतामिव ॥

raṇe śaktimamitrāṇāṃ praṇīyopanināya saḥ | ceṣṭāṃ prāyeṇa bhūtānāṃ rātriḥ prāṇabhṛtāmiva

युद्ध में शत्रुओं की शक्ति हर ली, जैसे रात्रि प्रायः प्राणियों की चेष्टा हर लेती है।

श्लोक 39 (4.57.39)

सोऽतीयात्सहसा शत्रून्सहसा तेऽभिपेदिरे । शीघ्रादूरं दृढामोघमस्त्रमस्यातिमानुषम् । दृष्ट्वा ते कौरवा भीता अतिमानुषविक्रमम् ॥

so'tīyātsahasā śatrūnsahasā te'bhipedire | śīghrādūraṃ dṛḍhāmoghamastramasyātimānuṣam | dṛṣṭvā te kauravā bhītā atimānuṣavikramam

वे वेग से शत्रुओं के पार निकल जाते और वेग से ही शत्रु उन पर टूट पड़ते। उनका शीघ्रगामी, दूर तक जाने वाला, दृढ़, अचूक और अलौकिक अस्त्र देखकर कौरव उस अलौकिक पराक्रम से भयभीत हो गए।

श्लोक 40 (4.57.40)

खगपत्राभिसंवीतैः खाविष्टैः खगमैरिव । अर्जुनस्य खमावव्रे लोहितप्राणपैः खगैः ॥

khagapatrābhisaṃvītaiḥ khāviṣṭaiḥ khagamairiva | arjunasya khamāvavre lohitaprāṇapaiḥ khagaiḥ

पक्षियों के पंख लगे, आकाश में पक्षियों की तरह उड़ते, रक्त और प्राण पीने वाले अर्जुन के बाणरूपी पक्षियों ने आकाश को ढक लिया।

श्लोक 41 (4.57.41)

अर्जुनेन विनिर्मुक्ताः शरा गाण्डीवधन्वना । तार्क्ष्यवेगा इवाकाशे ससञ्जुः परमर्मसु ॥

arjunena vinirmuktāḥ śarā gāṇḍīvadhanvanā | tārkṣyavegā ivākāśe sasañjuḥ paramarmasu

गाण्डीवधारी अर्जुन के छोड़े बाण आकाश में गरुड़ के वेग से जाकर शत्रुओं के मर्मस्थानों में धँस गए।

श्लोक 42 (4.57.42)

वर्माणि सारथिश्चैव हेमजालानि वाजिनाम् । किरीटं सूर्यसंकाशं वैयाघ्रमथ चर्म च ॥

varmāṇi sārathiścaiva hemajālāni vājinām | kirīṭaṃ sūryasaṃkāśaṃ vaiyāghramatha carma ca

कवच और सारथि, घोड़ों की सोने की जालियाँ, सूर्य के समान चमकते मुकुट और बाघम्बर भी;

श्लोक 43 (4.57.43)

ततः सर्वाणि गात्राणि रथस्य द्विषतां शरैः । नीहारेणेव भूतानि छन्नानीह चकाशिरे ॥

tataḥ sarvāṇi gātrāṇi rathasya dviṣatāṃ śaraiḥ | nīhāreṇeva bhūtāni channānīha cakāśire

शत्रुओं के रथों के सारे अंग उनके बाणों से ढककर ऐसे दिखाई देने लगे जैसे कोहरे में छिपे प्राणी।

श्लोक 44 (4.57.44)

सकृदेव न तं शेकुः कथमभ्यसितुं परे । अनभ्यस्तः पुनस्तैर्हि रथः सोऽभिपपात तान् ॥

sakṛdeva na taṃ śekuḥ kathamabhyasituṃ pare | anabhyastaḥ punastairhi rathaḥ so'bhipapāta tān

शत्रु एक बार भी किसी प्रकार उन पर आक्रमण न कर सके; पर उनका रथ, जिस पर शत्रुओं का कोई वार न पहुँचा, बार-बार उन पर टूट पड़ता था।

श्लोक 45 (4.57.45)

तच्छरा द्विट्शरीरेषु यथा च न ससञ्जिरे । द्विधाऽनीकेषु बीभत्सोर्न ससञ्ज रथस्तथा ॥

taccharā dviṭśarīreṣu yathā ca na sasañjire | dvidhā'nīkeṣu bībhatsorna sasañja rathastathā

जैसे उनके बाण शत्रुओं के शरीरों में अटकते नहीं थे, वैसे ही बीभत्सु का रथ दो भागों में बँटी सेनाओं के बीच कहीं अटकता नहीं था।

श्लोक 46 (4.57.46)

स तद्धि क्षोभयामास विगाह्यारिबलं रथी । अनन्तवेगो भुजगः क्रीडन्निव महार्णवे ॥

sa taddhi kṣobhayāmāsa vigāhyāribalaṃ rathī | anantavego bhujagaḥ krīḍanniva mahārṇave

वह रथी शत्रु-सेना में घुसकर उसे ऐसे मथने लगा जैसे असीम वेग वाला सर्प महासागर में क्रीड़ा कर रहा हो।

श्लोक 47 (4.57.47)

अस्यतो नित्यमत्यर्थं सर्वघोषाधिकस्तथा । संनादः श्रूयते भूतैर्धनुषश्च किरीटिनः ॥

asyato nityamatyarthaṃ sarvaghoṣādhikastathā | saṃnādaḥ śrūyate bhūtairdhanuṣaśca kirīṭinaḥ

किरीटधारी अर्जुन निरन्तर और अत्यधिक बाण चला रहे थे; उनके धनुष का घोर नाद, जो सब ध्वनियों से ऊपर उठता था, सब प्राणियों को सुनाई दे रहा था।

श्लोक 48 (4.57.48)

संच्छिन्नास्तत्र मातङ्गा बाणैरल्पान्तरान्तरैः । संस्यूतास्तत्र दृश्यन्ते मेघा इव गभस्तिभिः ॥

saṃcchinnāstatra mātaṅgā bāṇairalpāntarāntaraiḥ | saṃsyūtāstatra dṛśyante meghā iva gabhastibhiḥ

वहाँ पास-पास लगे बाणों से बिंधे हाथी ऐसे दिखते थे मानो सूर्य की किरणों से सिले हुए बादल हों।

श्लोक 49 (4.57.49)

दिशोऽनुभ्रमतः सर्वाः सव्यदक्षिणमस्यतः । सततं दृश्यते युद्धे सायकासनमण्डलम् ॥

diśo'nubhramataḥ sarvāḥ savyadakṣiṇamasyataḥ | satataṃ dṛśyate yuddhe sāyakāsanamaṇḍalam

सब दिशाओं में घूमते और दाएँ-बाएँ बाण चलाते हुए उनके धनुष का मण्डल युद्ध में निरन्तर दिखाई देता था।

श्लोक 50 (4.57.50)

पतन्त्यरूपेषु यथा चक्षूंषि न कदाचन । नालक्ष्येषु शराः पेतुस्तस्य गाण्डीवधन्वनः ॥

patantyarūpeṣu yathā cakṣūṃṣi na kadācana | nālakṣyeṣu śarāḥ petustasya gāṇḍīvadhanvanaḥ

जैसे आँखें रूपहीन वस्तु पर कभी नहीं पड़तीं, वैसे ही गाण्डीवधारी के बाण कभी बिना लक्ष्य के नहीं गिरते थे।

श्लोक 51 (4.57.51)

महागजसहस्रस्य युगपन्मृद्नतो वनम् । कौन्तेयरथमार्गस्तु रणे घोरतरोऽभवत् ॥

mahāgajasahasrasya yugapanmṛdnato vanam | kaunteyarathamārgastu raṇe ghorataro'bhavat

युद्ध में कुन्तीपुत्र के रथ का मार्ग एक साथ वन को रौंदते हज़ार बड़े हाथियों के मार्ग से भी अधिक भयानक हो गया।

श्लोक 52 (4.57.52)

नूनं पार्थजयैषित्वाच्छक्रः सर्वामरैः सह । हन्त्यस्मानिति मन्यन्ते पार्थेनैवार्दिताः परे ॥

nūnaṃ pārthajayaiṣitvācchakraḥ sarvāmaraiḥ saha | hantyasmāniti manyante pārthenaivārditāḥ pare

"निश्चय ही पार्थ की विजय चाहकर इन्द्र सब देवताओं के साथ हमें मार रहे हैं," ऐसा शत्रु सोचने लगे, जबकि उन्हें अकेले पार्थ ही पीड़ित कर रहे थे।

श्लोक 53 (4.57.53)

घ्नन्तमत्यर्थमहितान्सव्यसाचिनमाहवे । कालमर्जुनरूपेण ग्रसन्तमिव च प्रजाः ॥

ghnantamatyarthamahitānsavyasācinamāhave | kālamarjunarūpeṇa grasantamiva ca prajāḥ

उन्होंने युद्ध में शत्रुओं का अत्यधिक संहार करते सव्यसाची को अर्जुन के रूप में प्रजा को निगलते स्वयं काल के समान देखा।

श्लोक 54 (4.57.54)

कुरुसेनाशरीराणि पार्थेनानाहतान्यपि । पेतुः पार्थहतानीव पार्थकर्मानुदर्शनात् ॥

kurusenāśarīrāṇi pārthenānāhatānyapi | petuḥ pārthahatānīva pārthakarmānudarśanāt

कुरुसेना के शरीर, पार्थ के प्रहार के बिना भी, केवल पार्थ के कर्म देखकर ऐसे गिर पड़ते थे मानो पार्थ ने ही उन्हें मारा हो।

श्लोक 55 (4.57.55)

ओषधीनां शिरांसीव कालपक्तिसमन्वयात् । अवनेमुः कुरूणां हि शिरांस्यर्जुनजाद्भयात् ॥

oṣadhīnāṃ śirāṃsīva kālapaktisamanvayāt | avanemuḥ kurūṇāṃ hi śirāṃsyarjunajādbhayāt

जैसे समय पकने पर पौधों के सिर झुक जाते हैं, वैसे ही अर्जुन से उपजे भय के कारण कुरुओं के सिर झुक गए।

श्लोक 56 (4.57.56)

बाह्वोरथास्फोटयतोः प्रध्माते शङ्खमर्जुने । चकार चार्जुनः क्रोधाद्विमुखान्रुषितानपि ॥

bāhvorathāsphoṭayatoḥ pradhmāte śaṅkhamarjune | cakāra cārjunaḥ krodhādvimukhānruṣitānapi

भुजाओं पर ताल ठोकते और शंख बजाते हुए अर्जुन ने क्रोध में भरकर कुपित योद्धाओं को भी पीठ दिखाने पर विवश कर दिया।

श्लोक 57 (4.57.57)

अर्जुनेनापि भिन्नानि बलाग्राणि पुनः क्वचित् । चक्रुर्लोहितधाराभिर्धरणीं लोहितोत्तराम् ॥

arjunenāpi bhinnāni balāgrāṇi punaḥ kvacit | cakrurlohitadhārābhirdharaṇīṃ lohitottarām

अर्जुन द्वारा तोड़ी गई अग्रिम पंक्तियों ने जहाँ-तहाँ रक्त की धाराओं से धरती को लाल कर दिया।

श्लोक 58 (4.57.58)

लोहितेनापि संपृक्तैः पांसुभिः पवनोद्धतैः । तेनैव च समुद्धूतैः सूक्ष्मैर्लोहितबिन्दुभिः ॥

lohitenāpi saṃpṛktaiḥ pāṃsubhiḥ pavanoddhataiḥ | tenaiva ca samuddhūtaiḥ sūkṣmairlohitabindubhiḥ

रक्त से सनी, वायु द्वारा उड़ाई गई धूल से और उसी वायु से उछाले गए रक्त के सूक्ष्म कणों से,

श्लोक 59 (4.57.59)

लोहितार्द्रैः प्रहरणैः प्रभग्ना लोहितोक्षिताः । लोहितेषु निमग्नास्ते निहताश्च किरीटिना ॥

lohitārdraiḥ praharaṇaiḥ prabhagnā lohitokṣitāḥ | lohiteṣu nimagnāste nihatāśca kirīṭinā

रक्त से भीगे शस्त्रों के साथ वे टूटे हुए, रक्त से लथपथ, रक्त में डूबे पड़े थे, किरीटधारी के हाथों मारे गए।

श्लोक 60 (4.57.60)

बभूवुर्लोहितास्तत्र भृशमादित्यरश्मयः । आकाशं तत्क्षणेनासीत्सन्ध्याभ्रमिव लोहितं ॥

babhūvurlohitāstatra bhṛśamādityaraśmayaḥ | ākāśaṃ tatkṣaṇenāsītsandhyābhramiva lohitaṃ

वहाँ सूर्य की किरणें गहरी लाल हो गईं और क्षण भर में आकाश सन्ध्या के बादल की भाँति लाल हो गया।

श्लोक 61 (4.57.61)

अप्यस्तं प्राप्य चादित्यो निवर्तेत न पाण्डवः । निवर्तन्ते न जित्वारिं नित्यजल्पविचक्षणाः ॥

apyastaṃ prāpya cādityo nivarteta na pāṇḍavaḥ | nivartante na jitvāriṃ nityajalpavicakṣaṇāḥ

सूर्य भले ही अस्त होकर लौट आए, पर पाण्डव पीछे नहीं हटेंगे; ऐसे वीर शत्रु को जीते बिना नहीं लौटते, ऐसा वाणी में सदा निपुण लोग कहते हैं।

श्लोक 62 (4.57.62)

तान्सर्वान्समरे शूरान्पौरुषे पर्यवस्थितान् । दिव्यैरस्त्रैरमोघात्मा सर्वानार्च्छद्धनुर्धरान् ॥

tānsarvānsamare śūrānpauruṣe paryavasthitān | divyairastrairamoghātmā sarvānārcchaddhanurdharān

अमोघ आत्मबल वाले अर्जुन ने दिव्य अस्त्रों से युद्ध में पौरुष के साथ डटे उन सभी शूर धनुर्धरों पर आक्रमण किया।

श्लोक 63 (4.57.63)

स तु द्रोणं त्रिसप्तत्या नाराचानां समार्पयत् । अशीत्या शकुनिं चैव द्रौणिमप्याशु सप्तभिः ॥

sa tu droṇaṃ trisaptatyā nārācānāṃ samārpayat | aśītyā śakuniṃ caiva drauṇimapyāśu saptabhiḥ

उन्होंने द्रोण को तिहत्तर नाराचों से, शकुनि को अस्सी से और द्रोणपुत्र को तुरंत सात बाणों से बींध दिया।

श्लोक 64 (4.57.64)

दुःसहं दशभिर्बाणैरर्जुनः समविध्यत । दुःशासनं द्वादशभिः कृपं शारद्वतं त्रिभिः । भीष्मं शान्तनवं षष्ट्या प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे ॥

duḥsahaṃ daśabhirbāṇairarjunaḥ samavidhyata | duḥśāsanaṃ dvādaśabhiḥ kṛpaṃ śāradvataṃ tribhiḥ | bhīṣmaṃ śāntanavaṃ ṣaṣṭyā pratyavidhyatstanāntare

अर्जुन ने दुःसह को दस बाणों से, दुःशासन को बारह से, शरद्वान के पुत्र कृप को तीन से और शान्तनुपुत्र भीष्म को साठ बाणों से छाती में बींधा।

श्लोक 65 (4.57.65)

स कर्णं कर्णिनाऽविध्यत्पीतेन निशितेन च । वासविर्द्विषतां मध्ये विव्याध परमेषुणा ॥

sa karṇaṃ karṇinā'vidhyatpītena niśitena ca | vāsavirdviṣatāṃ madhye vivyādha parameṣuṇā

शत्रुओं के बीच इन्द्रपुत्र ने कर्ण को एक पीले, तीखे, उत्तम कर्णी बाण से बींध दिया।

श्लोक 66 (4.57.66)

स कर्णं सतनुत्राणं निर्भिद्य निशितः शरः । अगच्छद्दारयन्भूमिं चोदितो दृढधन्वना ॥

sa karṇaṃ satanutrāṇaṃ nirbhidya niśitaḥ śaraḥ | agacchaddārayanbhūmiṃ codito dṛḍhadhanvanā

उस दृढ़ धनुर्धर द्वारा छोड़ा गया वह तीखा बाण कवच सहित कर्ण को भेदकर धरती को फाड़ता हुआ आगे निकल गया।

श्लोक 67 (4.57.67)

ततोऽस्य वाहान्व्यहनच्चतुर्भिश्चतुरः क्षुरैः । सारथेश्च शिरः कायादपाहरदरिन्दमः । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद चापं तस्य करे स्थितम् ॥

tato'sya vāhānvyahanaccaturbhiścaturaḥ kṣuraiḥ | sāratheśca śiraḥ kāyādapāharadarindamaḥ | ardhacandreṇa ciccheda cāpaṃ tasya kare sthitam

तब शत्रुओं का दमन करने वाले अर्जुन ने चार क्षुर बाणों से उसके चारों घोड़ों को मार डाला, सारथि का सिर धड़ से अलग कर दिया और अर्धचन्द्र बाण से उसके हाथ का धनुष काट डाला।

श्लोक 68 (4.57.68)

तस्मिन्विद्धे महाभागे कर्णे सर्वास्त्रपारगे । हताश्वसूते विरथे ततोऽनीकमभज्यत ॥

tasminviddhe mahābhāge karṇe sarvāstrapārage | hatāśvasūte virathe tato'nīkamabhajyata

सब अस्त्रों में पारंगत महाभाग कर्ण के इस प्रकार घायल होने, घोड़े और सारथि के मारे जाने और रथहीन हो जाने पर सेना तितर-बितर हो गई।

अध्याय 56अध्याय-सूचीअध्याय 58