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विराट पर्व · अध्याय 56

अर्जुन द्वारा ध्वज-चिह्नों से कौरव महारथियों की पहचान

तीन हज़ार कौरव रथ अर्जुन को घेर लेते हैं; कर्ण, भीष्म और दुर्योधन—प्रत्येक एक-एक हज़ार रथों के अगुआ हैं। तब अर्जुन उत्तर को ध्वजाओं और घोड़ों से प्रमुख योद्धाओं की पहचान कराते हैं: द्रोण, जिनकी वे प्रदक्षिणा करेंगे और जिन पर पहले प्रहार होने पर ही प्रहार करेंगे; अश्वत्थामा; उनके पिता के मित्र कृप; उनका कट्टर प्रतिद्वन्द्वी कर्ण, जिससे वे उसी दिन युद्ध करना चाहते हैं; दुर्योधन; और भीष्म, जिनका सामना वे सबसे अन्त में करेंगे। सबका परिचय देकर वे उत्सुकता से युद्ध की ओर बढ़ते हैं।

अध्याय 55अध्याय-सूचीअध्याय 57

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.56.1)

ततस्त्रीणि सहस्राणि रथानां च धनुष्मताम् । घोराणि कुरुवीराणां पर्यकीर्यन्त भारत ॥

tatastrīṇi sahasrāṇi rathānāṃ ca dhanuṣmatām | ghorāṇi kuruvīrāṇāṃ paryakīryanta bhārata

तब, हे भारत, धनुर्धारी कुरुवीरों के तीन हज़ार भयंकर रथ चारों ओर फैल गए।

श्लोक 2 (4.56.2)

कर्णो रथसहस्रेण प्रत्यगृह्णाद्धनञ्जयम् । भीष्मः शान्तनवो धीमान्सहस्रेण पुरस्कृतः ॥

karṇo rathasahasreṇa pratyagṛhṇāddhanañjayam | bhīṣmaḥ śāntanavo dhīmānsahasreṇa puraskṛtaḥ

कर्ण ने एक हज़ार रथों के साथ धनञ्जय का सामना किया; बुद्धिमान शान्तनुपुत्र भीष्म भी एक हज़ार रथों के अगुआ बने;

श्लोक 3 (4.56.3)

तथा रथसहस्रेण भ्रातृभिः परिवारितः । पश्चाद्दुर्योधनोऽतिष्ठद्यशसा च श्रिया ज्वलन् ॥

tathā rathasahasreṇa bhrātṛbhiḥ parivāritaḥ | paścādduryodhano'tiṣṭhadyaśasā ca śriyā jvalan

और उनके पीछे, उसी प्रकार एक हज़ार रथों के साथ, अपने भाइयों से घिरा दुर्योधन यश और शोभा से दमकता हुआ खड़ा था।

श्लोक 4 (4.56.4)

अतिष्ठन्नवकाशेषु पादाताः सह वाजिभिः । भीमरूपाश्च मातङ्गास्तोमराङ्कुशचोदिताः ॥

atiṣṭhannavakāśeṣu pādātāḥ saha vājibhiḥ | bhīmarūpāśca mātaṅgāstomarāṅkuśacoditāḥ

बीच के खाली स्थानों में घुड़सवारों के साथ पैदल सैनिक खड़े थे, और भालों तथा अंकुशों से हाँके जाने वाले भयंकर हाथी भी।

श्लोक 5 (4.56.5)

तानि दृष्ट्वा ह्यनीकानि विततानि महात्मनाम् । वैराटिमुत्तरं तं तु प्रत्यभाषत पाण्डवः ॥

tāni dṛṣṭvā hyanīkāni vitatāni mahātmanām | vairāṭimuttaraṃ taṃ tu pratyabhāṣata pāṇḍavaḥ

उन महात्मा योद्धाओं की दूर तक फैली सेनाओं को देखकर पाण्डुपुत्र ने विराटपुत्र उत्तर से कहा—

अर्जुन उवाच

श्लोक 6 (4.56.6)

जाम्बूनदमयी वेदी ध्वजाग्रे यस्य दृश्यते । शोणाश्चाश्वा रथे युक्ता द्रोण एष प्रकाशते ॥

jāmbūnadamayī vedī dhvajāgre yasya dṛśyate | śoṇāścāśvā rathe yuktā droṇa eṣa prakāśate

जिसकी ध्वजा के शिखर पर सोने की वेदी दिखाई देती है और जिसके रथ में लाल घोड़े जुते हैं, वे वहाँ प्रकाशमान द्रोण हैं।

श्लोक 7 (4.56.7)

आचार्यो निपुणो धीमान्ब्रह्मविच्छूरसत्तमः । आहवे चाप्रतिद्वन्द्वो दूरपाती महारथः ॥

ācāryo nipuṇo dhīmānbrahmavicchūrasattamaḥ | āhave cāpratidvandvo dūrapātī mahārathaḥ

वे आचार्य हैं—निपुण, बुद्धिमान, ब्रह्मवेत्ता, शूरों में श्रेष्ठ, युद्ध में अद्वितीय, दूर तक लक्ष्य भेदने वाले महारथी।

श्लोक 8 (4.56.8)

सुप्रसन्नो महावीरः कुरुष्वैनं प्रदक्षिणम् । अत्रैव चाविरोधेन एष धर्मः सनातनः ॥

suprasanno mahāvīraḥ kuruṣvainaṃ pradakṣiṇam | atraiva cāvirodhena eṣa dharmaḥ sanātanaḥ

वे अत्यन्त प्रसन्नचित्त महावीर हैं; यहीं, बिना किसी विरोध-भाव के, उनकी प्रदक्षिणा करो। यही सनातन धर्म है।

श्लोक 9 (4.56.9)

यदि मे प्रहरेद्द्रोणः शरीरे मे प्रहृष्यतः । ततोऽस्मिन्प्रहरिष्यामि नान्यथा बुद्धिरस्ति मे ॥

yadi me prahareddroṇaḥ śarīre me prahṛṣyataḥ | tato'sminprahariṣyāmi nānyathā buddhirasti me

यदि द्रोण मुझ प्रसन्नचित्त के शरीर पर प्रहार करेंगे, तभी मैं उन पर प्रहार करूँगा; अन्यथा मेरा ऐसा कोई विचार नहीं है।

श्लोक 10 (4.56.10)

भारताचार्यमुख्येन ब्राह्मणेन महात्मना । तेन मे युध्यमानस्य मन्दं वाहय सारथे ॥

bhāratācāryamukhyena brāhmaṇena mahātmanā | tena me yudhyamānasya mandaṃ vāhaya sārathe

भरतवंशियों के प्रमुख आचार्य, उन महात्मा ब्राह्मण से जब मैं युद्ध करूँ, तब हे सारथी, रथ धीरे हाँकना।

श्लोक 11 (4.56.11)

ध्वजाग्रे सिंहलाङ्गूलो दिक्षु सर्वासु शोभते । भारताचार्यपुत्रस्तु सोऽश्वत्थामा विराजते ॥

dhvajāgre siṃhalāṅgūlo dikṣu sarvāsu śobhate | bhāratācāryaputrastu so'śvatthāmā virājate

जिसकी ध्वजा के शिखर पर सिंह की पूँछ का चिह्न सब दिशाओं में शोभा पा रहा है, वह भरतवंशियों के आचार्य का पुत्र अश्वत्थामा है, जो वहाँ विराजमान है।

श्लोक 12 (4.56.12)

ध्वजाग्रं दृश्यते यत्र बालसूर्यसमप्रभम् । दुर्जयः सर्वसैन्यानां देवैरपि सवासवैः । तेन मे युध्यमानस्य मन्दं वाहय सारथे ॥

dhvajāgraṃ dṛśyate yatra bālasūryasamaprabham | durjayaḥ sarvasainyānāṃ devairapi savāsavaiḥ | tena me yudhyamānasya mandaṃ vāhaya sārathe

जिसकी ध्वजा का शिखर उगते सूर्य के समान दमकता दिखाई देता है, उसे कोई भी सेना, इन्द्र सहित देवता भी नहीं जीत सकते। जब मैं उससे युद्ध करूँ, तब हे सारथी, रथ धीरे हाँकना।

श्लोक 13 (4.56.13)

ध्वजाग्रे गोवृषो यस्य काञ्चनोऽभिविराजते । आचार्यवरमुख्यस्तु कृप एष महारथः ॥

dhvajāgre govṛṣo yasya kāñcano'bhivirājate | ācāryavaramukhyastu kṛpa eṣa mahārathaḥ

जिसकी ध्वजा के शिखर पर सोने का बैल शोभा पा रहा है, वे श्रेष्ठ आचार्यों में प्रमुख महारथी कृप हैं।

श्लोक 14 (4.56.14)

द्रोणेन च समो वीर्ये पितुर्मे परमः सखा । तेन मे युध्यमानस्य मन्दं वाहय सारथे ॥

droṇena ca samo vīrye piturme paramaḥ sakhā | tena me yudhyamānasya mandaṃ vāhaya sārathe

वे पराक्रम में द्रोण के समान हैं और मेरे पिता के परम मित्र हैं। जब मैं उनसे युद्ध करूँ, तब हे सारथी, रथ धीरे हाँकना।

श्लोक 15 (4.56.15)

यस्य काञ्चनकम्बूभिर्हस्तिकक्ष्यापरिष्कृतः । ध्वजः प्रकाशते दूराद्रथे विद्युद्गणोपमः ॥

yasya kāñcanakambūbhirhastikakṣyāpariṣkṛtaḥ | dhvajaḥ prakāśate dūrādrathe vidyudgaṇopamaḥ

जिसकी ध्वजा, सोने के शंख-जड़ाव वाली हाथी की कक्ष्या (रस्सी) के चिह्न से अलंकृत, रथ पर दूर से बिजलियों के समूह की भाँति चमक रही है,

श्लोक 16 (4.56.16)

एष वैकर्तनः कर्णः प्रतिमानं धनुष्मताम् । दृढवैरी सदाऽस्माकं नित्यं कटुकभाषणः ॥

eṣa vaikartanaḥ karṇaḥ pratimānaṃ dhanuṣmatām | dṛḍhavairī sadā'smākaṃ nityaṃ kaṭukabhāṣaṇaḥ

वह वैकर्तन कर्ण है—धनुर्धारियों का मानदण्ड, हमारा सदा का कट्टर वैरी और नित्य कटु वचन बोलने वाला।

श्लोक 17 (4.56.17)

यस्याश्रयबलादेव धार्तराष्ट्रः ससौबलः । अस्मान्निरस्य राज्याच्च पुनरद्यापि योत्स्यति ॥

yasyāśrayabalādeva dhārtarāṣṭraḥ sasaubalaḥ | asmānnirasya rājyācca punaradyāpi yotsyati

उसी के बल के सहारे धृतराष्ट्रपुत्र ने सुबलपुत्र के साथ मिलकर हमें राज्य से निकाल दिया, और अब भी फिर से युद्ध करना चाहता है।

श्लोक 18 (4.56.18)

एष वै स्पर्धते नित्यं मया सह सुदुर्जयः । जामदग्न्यस्य रामस्य शिष्यो ह्येष महारथः ॥

eṣa vai spardhate nityaṃ mayā saha sudurjayaḥ | jāmadagnyasya rāmasya śiṣyo hyeṣa mahārathaḥ

वह सदा मुझसे होड़ करता है और उसे जीतना अत्यन्त कठिन है; यह महारथी जमदग्निपुत्र परशुराम का शिष्य है।

श्लोक 19 (4.56.19)

सर्वास्त्रकुशलः कर्णः सर्वशस्त्रभृतांवरः । युद्धेऽप्रतिमवीर्यश्च दृढवेधी पराक्रमी ॥

sarvāstrakuśalaḥ karṇaḥ sarvaśastrabhṛtāṃvaraḥ | yuddhe'pratimavīryaśca dṛḍhavedhī parākramī

कर्ण सब अस्त्रों में कुशल, सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, युद्ध में अनुपम पराक्रमी, दृढ़ता से लक्ष्य भेदने वाला और बलशाली है।

श्लोक 20 (4.56.20)

अद्याहं युद्धमेतेन करिष्ये सूतबन्धुना । द्रष्टा त्वमावयोर्युद्धं बलिवासवयोरिव ॥

adyāhaṃ yuddhametena kariṣye sūtabandhunā | draṣṭā tvamāvayoryuddhaṃ balivāsavayoriva

आज मैं इस सूतबन्धु से युद्ध करूँगा; तुम हम दोनों का युद्ध वैसे ही देखोगे जैसे बलि और इन्द्र का।

श्लोक 21 (4.56.21)

महारथेन शूरेण सूतपुत्रेण धन्विना । तेन मे युध्यमानस्य शीघ्रं वाहय सारथे ॥

mahārathena śūreṇa sūtaputreṇa dhanvinā | tena me yudhyamānasya śīghraṃ vāhaya sārathe

उस महारथी, शूरवीर, धनुर्धर सूतपुत्र से जब मैं युद्ध करूँ, तब हे सारथी, रथ तेज़ी से हाँकना।

श्लोक 22 (4.56.22)

यस्य चैव रथोपस्थे नागो मणिमयो ध्वजः । एष दुर्योधनस्तत्र कौरवो यशसा वृतः ॥

yasya caiva rathopasthe nāgo maṇimayo dhvajaḥ | eṣa duryodhanastatra kauravo yaśasā vṛtaḥ

जिसके रथ पर मणियों से बने हाथी के चिह्न वाली ध्वजा है, वह वहाँ यश से घिरा कौरव दुर्योधन है।

श्लोक 23 (4.56.23)

लब्धलक्षो दृढं वेधी लघुहस्तः प्रतापवान् । तेन मे युध्यमानस्य शीघ्रं वाहय सारथे ॥

labdhalakṣo dṛḍhaṃ vedhī laghuhastaḥ pratāpavān | tena me yudhyamānasya śīghraṃ vāhaya sārathe

वह लक्ष्य से नहीं चूकता, गहरा भेदता है, हाथ का फुर्तीला और प्रतापी है। जब मैं उससे युद्ध करूँ, तब हे सारथी, रथ तेज़ी से हाँकना।

श्लोक 24 (4.56.24)

यस्तु श्वेतावदातेन पञ्चतालेन केतुना । वैडूर्यमयदण्डेन तालवृक्षेण राजते ॥

yastu śvetāvadātena pañcatālena ketunā | vaiḍūryamayadaṇḍena tālavṛkṣeṇa rājate

जो पाँच तालवृक्षों वाली निर्मल श्वेत ध्वजा से, वैदूर्य के दण्ड से और तालवृक्ष के चिह्न से शोभा पा रहा है,

श्लोक 25 (4.56.25)

हस्तावापी बृहद्धन्वा सेनां तिष्ठति हर्षयन् । रामेण जामदग्न्येन द्वैरथेनाजितः पुरा ॥

hastāvāpī bṛhaddhanvā senāṃ tiṣṭhati harṣayan | rāmeṇa jāmadagnyena dvairathenājitaḥ purā

जो हस्तत्राण पहने, विशाल धनुष लिए सेना को हर्षित करता हुआ खड़ा है, और जिसे पूर्वकाल में जमदग्निपुत्र परशुराम भी द्वन्द्वयुद्ध में नहीं जीत सके,

श्लोक 26 (4.56.26)

शीघ्रश्च लघुवेधी च लघुहस्तः प्रतापवान् । एष शान्तनवो भीष्मः सर्वेषां नः पितामहः ॥

śīghraśca laghuvedhī ca laghuhastaḥ pratāpavān | eṣa śāntanavo bhīṣmaḥ sarveṣāṃ naḥ pitāmahaḥ

जो फुर्तीला, कुशलता से भेदने वाला, हाथ का हल्का और प्रतापी है—वे शान्तनुपुत्र भीष्म हैं, हम सबके पितामह।

श्लोक 27 (4.56.27)

ककुदः सर्वसैन्यानां सर्वशस्त्रभृतांवरः । जयश्रियाऽवबद्धस्तु सुयोधनवशानुगः । पश्चादेष प्रयातव्यो न मे विघ्नकरो भवेत् ॥

kakudaḥ sarvasainyānāṃ sarvaśastrabhṛtāṃvaraḥ | jayaśriyā'vabaddhastu suyodhanavaśānugaḥ | paścādeṣa prayātavyo na me vighnakaro bhavet

वे सारी सेनाओं के शिरोमणि और सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं, किन्तु राजलक्ष्मी से बँधे हुए सुयोधन के वश में चलते हैं। उनके पास सबसे अन्त में जाना चाहिए, ताकि वे मेरे मार्ग में बाधा न बनें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (4.56.28)

इत्येतांस्त्वरितः पार्थः कथयित्वा तु चोत्तरे । रूपतश्चिह्नतश्चैव युद्धाय त्वरते पुनः ॥

ityetāṃstvaritaḥ pārthaḥ kathayitvā tu cottare | rūpataścihnataścaiva yuddhāya tvarate punaḥ

इन योद्धाओं का रूप और चिह्नों द्वारा उत्तर को शीघ्रता से परिचय देकर पार्थ फिर से युद्ध के लिए आगे बढ़े।

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