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विराट पर्व · अध्याय 55

अर्जुन द्वारा गौओं को लौटाना

अर्जुन कौरव व्यूह में दुर्योधन को खोजते हैं, उसके मध्य और पक्षों में खड़े योद्धाओं के नाम बताते हैं, और उत्तर से कहते हैं कि गौओं को लेकर जा रहे राजा की ओर रथ ले चलो। भीष्म उनका अभिप्राय समझकर दुर्योधन की रक्षा के लिए सेना सहित उनके पीछे दौड़ते हैं। अर्जुन अपना नाम सुनाकर गौओं के रक्षकों को बाणों की वर्षा से ढक देते हैं और शंख बजाते हैं; डरी हुई गौएँ दक्षिण की ओर लौट पड़ती हैं और ग्वाले उन्हें मत्स्यदेश ले जाते हैं, जबकि दुर्योधन की ओर बढ़ते अर्जुन पर कौरव रथी टूट पड़ते हैं।

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.55.1)

तमदूरमुपायान्तं दृष्ट्वा पाण्डवमर्जुनम् । नारयः प्रेक्षितुं शेकुस्तपन्तं हि यथा रविम् ॥

tamadūramupāyāntaṃ dṛṣṭvā pāṇḍavamarjunam | nārayaḥ prekṣituṃ śekustapantaṃ hi yathā ravim

पाण्डुपुत्र अर्जुन को निकट आते देखकर शत्रु उनकी ओर देख भी नहीं सके, जैसे तपते हुए सूर्य को कोई नहीं देख पाता।

श्लोक 2 (4.55.2)

स तं दृष्ट्वा रथानीकं पार्थः सारथिमब्रवीत् । इषुपातमात्रे सेनायाः स्थापयाश्वानरिंदम । यावत्समीक्षे व्यूहेऽस्मिन्मम शत्रुं सुयोधनम् ॥

sa taṃ dṛṣṭvā rathānīkaṃ pārthaḥ sārathimabravīt | iṣupātamātre senāyāḥ sthāpayāśvānariṃdama | yāvatsamīkṣe vyūhe'sminmama śatruṃ suyodhanam

उस रथसेना को देखकर पार्थ ने अपने सारथी से कहा—"हे शत्रुदमन, सेना से एक बाण की मार भर की दूरी पर घोड़ों को रोक दो, जब तक मैं इस व्यूह में अपने शत्रु सुयोधन को खोजता हूँ।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 3 (4.55.3)

रक्तवैडूर्यविकृतं मणिप्रवरभूषितम् । परं जानाम्यहं तस्य ध्वजं दूरात्समुच्छ्रितम् ॥

raktavaiḍūryavikṛtaṃ maṇipravarabhūṣitam | paraṃ jānāmyahaṃ tasya dhvajaṃ dūrātsamucchritam

उसकी ध्वजा को मैं भली-भाँति पहचानता हूँ, जो लाल वैदूर्य से जड़ी, उत्तम मणियों से अलंकृत है और दूर से ही ऊँची उठी दिखती है।

श्लोक 4 (4.55.4)

यद्येनमिह पश्यामि दुर्बुद्धिमतिमानिनम् । यमाय प्रेषयिष्यामि सहायः स्याद्यदीश्वरः ॥

yadyenamiha paśyāmi durbuddhimatimāninam | yamāya preṣayiṣyāmi sahāyaḥ syādyadīśvaraḥ

यदि मैं उस दुर्बुद्धि, घोर अभिमानी को यहाँ देख लूँ, तो उसे यमलोक भेज दूँगा, चाहे स्वयं ईश्वर ही उसके सहायक क्यों न हों।

श्लोक 5 (4.55.5)

सर्वानन्याननादृत्य दृष्ट्वा तमतिमानिनम् । सिंहः क्षुद्रमृगस्येव पतिष्ये तस्य मूर्धनि ॥

sarvānanyānanādṛtya dṛṣṭvā tamatimāninam | siṃhaḥ kṣudramṛgasyeva patiṣye tasya mūrdhani

बाकी सबकी उपेक्षा करके, उस अभिमानी को देखते ही मैं उसके सिर पर ऐसे टूट पड़ूँगा जैसे सिंह किसी छोटे मृग पर।

श्लोक 6 (4.55.6)

हनिष्यामि तमेवाद्य शरैर्गाण्डीवनिःसृतैः । तस्मिन्हते भविष्यन्ति सर्व एव पराजिताः ॥

haniṣyāmi tamevādya śarairgāṇḍīvaniḥsṛtaiḥ | tasminhate bhaviṣyanti sarva eva parājitāḥ

आज गाण्डीव से छूटे बाणों से मैं उसी को मारूँगा; उसके मारे जाने पर ये सभी पराजित हो जाएँगे।

श्लोक 7 (4.55.7)

शरैश्च शमयिष्येऽहं धार्तराष्ट्रं ससौबलम् । असभ्यानां च वक्तारं कुरूणां किल किल्विषम् ॥

śaraiśca śamayiṣye'haṃ dhārtarāṣṭraṃ sasaubalam | asabhyānāṃ ca vaktāraṃ kurūṇāṃ kila kilviṣam

अपने बाणों से मैं धृतराष्ट्रपुत्र को सुबलपुत्र सहित शान्त कर दूँगा, और उस अभद्र वचन बोलने वाले को भी, जो सचमुच कुरुवंश का कलंक है।

श्लोक 8 (4.55.8)

राजानं नेह पश्यामि निरामिषमिदं बलम् । अभिद्रवे ह राजानं व्यक्तमित्यत्र निर्भयः ॥

rājānaṃ neha paśyāmi nirāmiṣamidaṃ balam | abhidrave ha rājānaṃ vyaktamityatra nirbhayaḥ

राजा मुझे यहाँ नहीं दिखता, और इस सेना में लड़ने योग्य कोई लक्ष्य नहीं है। मैं निर्भय होकर राजा पर ही धावा बोलूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 9 (4.55.9)

आस्थितो मध्यमाचार्योऽप्यश्वत्थामाऽप्यनन्तरम् । कृपकर्णौ पुरस्तात्तु महेष्वासौ व्यवस्थितौ ॥

āsthito madhyamācāryo'pyaśvatthāmā'pyanantaram | kṛpakarṇau purastāttu maheṣvāsau vyavasthitau

बीच में आचार्य (द्रोण) डटे हैं और उनके ठीक पीछे अश्वत्थामा; महाधनुर्धर कृप और कर्ण आगे की ओर खड़े हैं।

श्लोक 10 (4.55.10)

भूरिश्रवाः सोमदत्तो बाह्लीकश्च जयद्रथः । दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता युद्धविशारदाः ॥

bhūriśravāḥ somadatto bāhlīkaśca jayadrathaḥ | dakṣiṇaṃ pakṣamāśritya sthitā yuddhaviśāradāḥ

भूरिश्रवा, सोमदत्त, बाह्लीक और जयद्रथ—ये युद्धकुशल योद्धा दाहिने पक्ष को सँभाले खड़े हैं।

श्लोक 11 (4.55.11)

साल्वराजो द्युमत्सेनो वृषसेनश्च सौबलः । दशार्णश्चैव कालिङ्गो वामं पक्षं समाश्रितः ॥

sālvarājo dyumatseno vṛṣasenaśca saubalaḥ | daśārṇaścaiva kāliṅgo vāmaṃ pakṣaṃ samāśritaḥ

शाल्वराज, द्युमत्सेन, वृषसेन, सुबलपुत्र, दशार्णराज और कलिंगराज ने बायाँ पक्ष सँभाला है।

श्लोक 12 (4.55.12)

पृष्ठतः कुरुमुख्यश्च भीष्मस्तिष्ठति दंशितः । सोऽर्धसैन्येन बलवान्सर्वेषां नः पितामहः ॥

pṛṣṭhataḥ kurumukhyaśca bhīṣmastiṣṭhati daṃśitaḥ | so'rdhasainyena balavānsarveṣāṃ naḥ pitāmahaḥ

पीछे कवच धारण किए कुरुश्रेष्ठ भीष्म आधी सेना के साथ खड़े हैं—वे बलवान, हम सबके पितामह।

श्लोक 13 (4.55.13)

दुर्योधनं न पश्यामि क्व नु राजा स तिष्ठति । उत्सृज्यैतद्रथानीकं याहि यत्र सुयोधनः ॥

duryodhanaṃ na paśyāmi kva nu rājā sa tiṣṭhati | utsṛjyaitadrathānīkaṃ yāhi yatra suyodhanaḥ

दुर्योधन मुझे नहीं दिखता; वह राजा कहाँ है? इस रथसेना को छोड़कर वहाँ चलो जहाँ सुयोधन है।

श्लोक 14 (4.55.14)

तं हत्वा संनिवर्तिष्ये गाः स आदाय गच्छति । गवाग्रमभितो याहि यत्र राजा भविष्यति ॥

taṃ hatvā saṃnivartiṣye gāḥ sa ādāya gacchati | gavāgramabhito yāhi yatra rājā bhaviṣyati

उसे मारकर मैं लौट आऊँगा; वह गौओं को लेकर जा रहा है। गौओं के झुंड के अग्रभाग की ओर चलो, जहाँ राजा होगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (4.55.15)

इत्युक्त्वा समरे पार्थो वैराटिमपराजितः । संस्पृशानो धनुर्दिव्यं त्वरमाणोऽगमत्तदा ॥

ityuktvā samare pārtho vairāṭimaparājitaḥ | saṃspṛśāno dhanurdivyaṃ tvaramāṇo'gamattadā

रणभूमि में विराटपुत्र से ऐसा कहकर अपराजित पार्थ अपने दिव्य धनुष को सहलाते हुए शीघ्रता से चल पड़े।

श्लोक 16 (4.55.16)

ततो भीष्मोऽब्रवीद्वाक्यं कुरुमध्ये परंतपः । चिरदृष्टोऽयमस्माभिर्धर्मज्ञो बान्धवप्रियः ॥

tato bhīṣmo'bravīdvākyaṃ kurumadhye paraṃtapaḥ | ciradṛṣṭo'yamasmābhirdharmajño bāndhavapriyaḥ

तब शत्रुओं को तपाने वाले भीष्म ने कौरवों के बीच कहा—"बहुत समय बाद हमने इस धर्मज्ञ और स्वजनप्रिय को देखा है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 17 (4.55.17)

अतीव ज्वलते लक्ष्म्या पाकशासनिरागतः । एष दुर्योधनं पार्थो मार्गते निकृतिं स्मरन् ॥

atīva jvalate lakṣmyā pākaśāsanirāgataḥ | eṣa duryodhanaṃ pārtho mārgate nikṛtiṃ smaran

पाकशासन इन्द्र का पुत्र अत्यन्त शोभा से दमकता हुआ आया है। अपने साथ हुए छल को स्मरण करता हुआ पार्थ दुर्योधन को खोज रहा है।

श्लोक 18 (4.55.18)

सेनामत्यर्थमालोक्य त्वरते ग्रहणेऽस्य च । मृगं सिंह इवादातुमीक्षते पाकशासनिः ॥

senāmatyarthamālokya tvarate grahaṇe'sya ca | mṛgaṃ siṃha ivādātumīkṣate pākaśāsaniḥ

सेना को भली-भाँति देखकर वह उसे पकड़ने को उतावला है; इन्द्रपुत्र उसे ऐसे देख रहा है जैसे सिंह मृग को दबोचने के लिए।

श्लोक 19 (4.55.19)

नैषोऽन्तरेण राजानं बीभत्सुः स्थातुमर्हति । तस्य पार्ष्णिं ग्रहीष्यामो जवेनाभिप्रधावतः ॥

naiṣo'ntareṇa rājānaṃ bībhatsuḥ sthātumarhati | tasya pārṣṇiṃ grahīṣyāmo javenābhipradhāvataḥ

बीभत्सु राजा तक पहुँचे बिना नहीं रुकेगा। वह वेग से आगे दौड़ रहा है; हम पीछे से उस पर आक्रमण करेंगे।

श्लोक 20 (4.55.20)

न ह्येनमभिसंक्रुद्धमेको युद्ध्येत संयुगे । अन्यो देवान्महादेवात्कृष्णाद्वा देवकीसुतात् । आचार्याच्च सपुत्राद्वा भारद्वाजान्महारथात् ॥

na hyenamabhisaṃkruddhameko yuddhyeta saṃyuge | anyo devānmahādevātkṛṣṇādvā devakīsutāt | ācāryācca saputrādvā bhāradvājānmahārathāt

जब वह क्रोध से भर जाए, तब युद्ध में अकेला कोई उससे नहीं लड़ सकता—सिवाय महादेव के, या देवकीपुत्र कृष्ण के, या पुत्र सहित भरद्वाजवंशी महारथी आचार्य द्रोण के।

श्लोक 21 (4.55.21)

किं नो गावः करिष्यन्ति द्रव्यं वा विपुलं तथा । दुर्योधनः पार्थगतः पुरा प्राणान्विमुञ्चति ॥

kiṃ no gāvaḥ kariṣyanti dravyaṃ vā vipulaṃ tathā | duryodhanaḥ pārthagataḥ purā prāṇānvimuñcati

गौएँ या विपुल धन हमारा क्या भला करेंगे? पार्थ की पकड़ में आया दुर्योधन शीघ्र ही प्राण त्याग देगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (4.55.22)

इत्युक्त्वा समरे भीष्मः सेनया सह कौरवः । अन्वधावत्तदा पार्थं धार्तराष्ट्रस्य रक्षणे ॥

ityuktvā samare bhīṣmaḥ senayā saha kauravaḥ | anvadhāvattadā pārthaṃ dhārtarāṣṭrasya rakṣaṇe

रणभूमि में ऐसा कहकर कुरुवंशी भीष्म धृतराष्ट्रपुत्र की रक्षा के लिए सेना के साथ पार्थ के पीछे दौड़े।

श्लोक 23 (4.55.23)

विक्रोशमात्रं यात्वा तु पार्थो वैराटिमब्रवीत् । इषुपातमात्रे सेनायाः स्थापयाश्वानरिंदम ॥

vikrośamātraṃ yātvā tu pārtho vairāṭimabravīt | iṣupātamātre senāyāḥ sthāpayāśvānariṃdama

पुकार भर की दूरी आगे जाकर पार्थ ने विराटपुत्र से कहा—"हे शत्रुदमन, सेना से बाण की मार भर की दूरी पर घोड़े रोक लो।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 24 (4.55.24)

एतदग्रं गवां दृष्टं मन्दं वाहय सारथे । याह्युत्तरेण सेनाया गाश्चैव प्रविभज्य च ॥

etadagraṃ gavāṃ dṛṣṭaṃ mandaṃ vāhaya sārathe | yāhyuttareṇa senāyā gāścaiva pravibhajya ca

वह गौओं के झुंड का अग्रभाग दिख रहा है; हे सारथी, धीरे-धीरे रथ हाँको। सेना के उत्तर की ओर से चलो और गौओं को उससे अलग कर दो।

श्लोक 25 (4.55.25)

परिक्षिप्य गवां यूथमत्र योत्स्ये सुयोधनम् । गच्छन्ति सत्वरा गावः सगोपाः परिमोचय ॥

parikṣipya gavāṃ yūthamatra yotsye suyodhanam | gacchanti satvarā gāvaḥ sagopāḥ parimocaya

गौओं के झुंड को घेरकर मैं यहीं सुयोधन से युद्ध करूँगा। गौएँ अपने ग्वालों सहित तेज़ी से जा रही हैं; उन्हें छुड़ा लो।

श्लोक 26 (4.55.26)

तत्र गत्वा पशून्वीर सगोपान्परिमोचय । अन्तरेण च सेनायाः प्राङ्मुखो गच्छ चोत्तर ॥

tatra gatvā paśūnvīra sagopānparimocaya | antareṇa ca senāyāḥ prāṅmukho gaccha cottara

हे वीर, वहाँ जाकर ग्वालों सहित पशुओं को छुड़ा लो, और फिर, हे उत्तर, सेना के बीच से होकर पूर्व की ओर चलो।

श्लोक 27 (4.55.27)

इमे त्वतिरथाः सर्वे मम वीर्यपराक्रमम् । पश्यन्तु कुरवो युद्धे महेन्द्रस्येव दानवाः ॥

ime tvatirathāḥ sarve mama vīryaparākramam | paśyantu kuravo yuddhe mahendrasyeva dānavāḥ

ये सब अतिरथी कौरव युद्ध में मेरा बल और पराक्रम वैसे ही देखें जैसे दानवों ने महेन्द्र का देखा था।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (4.55.28)

ततः स रथिनां श्रेष्ठो नाम विश्राव्य चात्मनः । निशिताग्राञ्शरांस्तीक्ष्णान्मुमोचांतकसन्निभान् ॥

tataḥ sa rathināṃ śreṣṭho nāma viśrāvya cātmanaḥ | niśitāgrāñśarāṃstīkṣṇānmumocāṃtakasannibhān

तब रथियों में श्रेष्ठ अर्जुन ने अपना नाम सुनाकर तीखी नोक वाले, यमराज के समान पैने बाण छोड़े।

श्लोक 29 (4.55.29)

शलभैरिव चाकाशं धाराभिरिव पर्वतम् । निरावकाशमभवच्छरैः क्षिप्तैः किरीटिना ॥

śalabhairiva cākāśaṃ dhārābhiriva parvatam | nirāvakāśamabhavaccharaiḥ kṣiptaiḥ kirīṭinā

जैसे टिड्डियों से आकाश और जलधाराओं से पर्वत ढक जाता है, वैसे ही किरीटी के छोड़े बाणों से कहीं भी खाली स्थान न रहा।

श्लोक 30 (4.55.30)

विकीर्यमाणास्तु शरैस्ते योधा धार्तराष्ट्रिकाः । गाश्चैव न च पश्यन्ति पार्थमुक्तैरजिह्मगैः ॥

vikīryamāṇāstu śaraiste yodhā dhārtarāṣṭrikāḥ | gāścaiva na ca paśyanti pārthamuktairajihmagaiḥ

बाणों से ढके धृतराष्ट्र-पक्ष के योद्धा पार्थ के छोड़े सीधे जाने वाले बाणों के कारण गौओं को भी नहीं देख पा रहे थे।

श्लोक 31 (4.55.31)

सा चापि बहुला सेना पार्थबाणाभिपीडिता । नापश्यद्विवृतां भूमिं नान्तरिक्षं दिशोऽपि वा ॥

sā cāpi bahulā senā pārthabāṇābhipīḍitā | nāpaśyadvivṛtāṃ bhūmiṃ nāntarikṣaṃ diśo'pi vā

पार्थ के बाणों से पीड़ित वह विशाल सेना न खुली भूमि देख पा रही थी, न आकाश, न दिशाएँ ही।

श्लोक 32 (4.55.32)

अर्जुनस्तु तदा हृष्टो दर्शयन्वीर्यमात्मनः । पीडयामास सैन्यानि गाण्डीवप्रसृतैः शरैः ॥

arjunastu tadā hṛṣṭo darśayanvīryamātmanaḥ | pīḍayāmāsa sainyāni gāṇḍīvaprasṛtaiḥ śaraiḥ

तब अर्जुन ने हर्षित होकर अपना पराक्रम दिखाते हुए गाण्डीव से छूटे बाणों से सेनाओं को पीड़ित किया।

श्लोक 33 (4.55.33)

तेषां नैवापयाने च नाभियानेऽभवन्मतिः । शीघ्रतामेव पार्थस्य पूजयन्तस्तु विस्मिताः ॥

teṣāṃ naivāpayāne ca nābhiyāne'bhavanmatiḥ | śīghratāmeva pārthasya pūjayantastu vismitāḥ

उनका मन न पीछे हटने में लगा, न आगे बढ़ने में; वे चकित होकर पार्थ की फुर्ती की ही सराहना करते रहे।

श्लोक 34 (4.55.34)

चन्द्रावदातं सामुद्रं कुरुसैन्यभयंकरम् । ततः शङ्खमुपाध्मासीद्द्विषतां रोमहर्षणम् । ज्याघोषं तलघोषं च कृत्वा भूतान्यमोहयत् ॥

candrāvadātaṃ sāmudraṃ kurusainyabhayaṃkaram | tataḥ śaṅkhamupādhmāsīddviṣatāṃ romaharṣaṇam | jyāghoṣaṃ talaghoṣaṃ ca kṛtvā bhūtānyamohayat

फिर उन्होंने चन्द्रमा के समान उज्ज्वल, समुद्र से उत्पन्न, कुरुसेना को भय देने वाला और शत्रुओं के रोंगटे खड़े कर देने वाला शंख बजाया; और प्रत्यंचा की टंकार तथा हस्तत्राण के आघात की ध्वनि से सब प्राणियों को मोहित कर दिया।

श्लोक 35 (4.55.35)

तस्य शङ्खस्य शब्देन धनुषो निस्वनेन च । शब्देनामानुषाणां च भूतानां ध्वजवासिनाम् । वियद्गतानां देवानां मानुषाणां रवेण च ॥

tasya śaṅkhasya śabdena dhanuṣo nisvanena ca | śabdenāmānuṣāṇāṃ ca bhūtānāṃ dhvajavāsinām | viyadgatānāṃ devānāṃ mānuṣāṇāṃ raveṇa ca

उस शंख के नाद से, धनुष की टंकार से, ध्वजा पर रहने वाले अमानुषी प्राणियों के शब्द से, और आकाश में स्थित देवताओं तथा मनुष्यों के कोलाहल से,

श्लोक 36 (4.55.36)

ऊर्ध्वं पुच्छं विधून्वाना रेभमाणाः समन्ततः । गावः सवत्साः संत्रस्ता निवृत्ता दक्षिणां दिशं ॥

ūrdhvaṃ pucchaṃ vidhūnvānā rebhamāṇāḥ samantataḥ | gāvaḥ savatsāḥ saṃtrastā nivṛttā dakṣiṇāṃ diśaṃ

बछड़ों सहित गौएँ डरकर, चारों ओर रँभाती हुई और पूँछें ऊपर उठाकर झटकती हुई, दक्षिण दिशा की ओर लौट पड़ीं।

श्लोक 37 (4.55.37)

ततः स समरे शूरो बीभत्सुः शत्रुपूगहा । गोपालांश्चोदयामास गावश्चोदयतेति च ॥

tataḥ sa samare śūro bībhatsuḥ śatrupūgahā | gopālāṃścodayāmāsa gāvaścodayateti ca

तब शत्रु-समूहों का संहार करने वाले शूर बीभत्सु ने रणभूमि में ग्वालों को प्रेरित करते हुए कहा—"गौओं को आगे हाँको!"

श्लोक 38 (4.55.38)

उत्तरं चाह बीभत्सुर्हर्षयन्पाण्डुनन्दनः । गवामग्रं समीक्षस्व गाश्चैवाशु निवर्तय ॥

uttaraṃ cāha bībhatsurharṣayanpāṇḍunandanaḥ | gavāmagraṃ samīkṣasva gāścaivāśu nivartaya

और पाण्डुनन्दन बीभत्सु ने उत्तर का उत्साह बढ़ाते हुए उससे कहा—"गौओं के झुंड के अग्रभाग पर दृष्टि रखो और गौओं को शीघ्र लौटा लो।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 39 (4.55.39)

यावदेते निवर्तन्ते कुरवो जवमास्थिताः । याह्युत्तरेण गाश्चैताः सैन्यानां च नृपात्मज ॥

yāvadete nivartante kuravo javamāsthitāḥ | yāhyuttareṇa gāścaitāḥ sainyānāṃ ca nṛpātmaja

जब तक ये कौरव वेग से लौटते हैं, हे राजकुमार, तुम इन गौओं को सेनाओं के उत्तर की ओर से ले चलो।

श्लोक 40 (4.55.40)

पश्यन्तु कुरवः सर्वे मम वीर्यपराक्रमम् ॥

paśyantu kuravaḥ sarve mama vīryaparākramam

सारे कौरव मेरा बल और पराक्रम देखें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 41 (4.55.41)

ते लाभमिव मन्वानाः कुरवोऽर्जुनमाहवे । दृष्ट्वा यान्तमदूरस्थं क्षिप्रमभ्यपतन्रथैः ॥

te lābhamiva manvānāḥ kuravo'rjunamāhave | dṛṣṭvā yāntamadūrasthaṃ kṣipramabhyapatanrathaiḥ

रणभूमि में अर्जुन को थोड़ी ही दूरी पर जाते देखकर कौरव इसे मानो लाभ समझते हुए अपने रथों के साथ तुरंत उन पर टूट पड़े,

श्लोक 42 (4.55.42)

हस्त्यश्वपरिवारेण महताऽभिविराजता । योधैः प्रासासिहस्तैश्च चापबाणोद्यतायुधैः ॥

hastyaśvaparivāreṇa mahatā'bhivirājatā | yodhaiḥ prāsāsihastaiśca cāpabāṇodyatāyudhaiḥ

हाथी-घोड़ों के विशाल और शोभायमान दल के साथ, और भाले व तलवारें हाथ में लिए तथा धनुष-बाण और अन्य शस्त्र उठाए योद्धाओं के साथ।

श्लोक 43 (4.55.43)

तान्यनीकान्यशोभन्त कुरूणामाततायिनाम् । संसर्पन्त इवाकाशे विद्युत्वन्तो वलाहकाः ॥

tānyanīkānyaśobhanta kurūṇāmātatāyinām | saṃsarpanta ivākāśe vidyutvanto valāhakāḥ

उन आततायी कौरवों की वे सेनाएँ ऐसी शोभित हुईं जैसे आकाश में सरकते बिजली-भरे बादल।

श्लोक 44 (4.55.44)

तानि दृष्ट्वाऽप्यनीकानि निवर्तितरथानि च । पार्थोऽपि वायुवद्घोरं सैन्याग्रं व्यधुनोच्छरैः ॥

tāni dṛṣṭvā'pyanīkāni nivartitarathāni ca | pārtho'pi vāyuvadghoraṃ sainyāgraṃ vyadhunoccharaiḥ

उन सेनाओं और लौटकर आते रथों को देखकर पार्थ ने भी वायु के समान अपने बाणों से सेना के भयंकर अग्रभाग को झकझोर दिया।

श्लोक 45 (4.55.45)

तां शत्रुसेनां तरसा प्रणुद्य गाश्चापि जित्वा धनुषा परेण । दुर्योधनायाभिमुखं प्रयान्तं कुरुप्रवीराः सहसाऽभ्यगच्छन् ॥

tāṃ śatrusenāṃ tarasā praṇudya gāścāpi jitvā dhanuṣā pareṇa | duryodhanāyābhimukhaṃ prayāntaṃ kurupravīrāḥ sahasā'bhyagacchan

उस शत्रुसेना को वेग से खदेड़कर और अपने श्रेष्ठ धनुष से गौओं को जीतकर जब वे दुर्योधन की ओर बढ़ रहे थे, तब कुरुवंश के प्रमुख वीर सहसा उन पर चढ़ आए।

श्लोक 46 (4.55.46)

गोषु प्रयातासु जवेन मात्स्यान्किरीटिनं प्रीतियुतं च दृष्ट्वा । पशून्समादाय ततो निवृत्ता गोपाः समस्ताः प्रययुश्च राष्ट्रम् ॥

goṣu prayātāsu javena mātsyānkirīṭinaṃ prītiyutaṃ ca dṛṣṭvā | paśūnsamādāya tato nivṛttā gopāḥ samastāḥ prayayuśca rāṣṭram

जब गौएँ वेग से मत्स्यदेश की ओर चल पड़ीं, तब किरीटी को प्रसन्न देखकर सब ग्वाले पशुओं को साथ लेकर लौटे और अपने राष्ट्र की ओर चल दिए।

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