विराट पर्व · अध्याय 54
अर्जुन का बाणों से गुरुजनों को प्रणाम
कौरव सेना व्यूह बनाकर खड़ी है, तभी अर्जुन उत्तर को सारथी बनाकर रथ लेकर आ पहुँचते हैं। रथसेना में दुर्योधन को न देखकर वे उत्तर से चुराई गई गौओं के झुंड के अग्रभाग की ओर चलने को कहते हैं, फिर भीष्म, कृप और द्रोण के चरणों के पास और कानों के पास से दो-दो बाण छोड़कर उन्हें प्रणाम करते हैं। द्रोण इस अभिवादन को पहचानकर अर्जुन की प्रशंसा करते हैं और चेताते हैं कि तेरह वर्षों के वनवास की स्मृति से जलता यह पाण्डव अकेला ही सारी सेना का नाश कर सकता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.54.1)
तथा व्यूढेष्वनीकेषु कौरवेयैर्महारथैः । उपायादर्जुनस्तूर्णं रथघोषेण नादयन् ॥
tathā vyūḍheṣvanīkeṣu kauraveyairmahārathaiḥ | upāyādarjunastūrṇaṃ rathaghoṣeṇa nādayan
जब कौरव महारथियों ने इस प्रकार अपनी सेनाओं का व्यूह रच लिया, तब अर्जुन अपने रथ की घरघराहट से दिशाओं को गुँजाते हुए तेज़ी से आ पहुँचे।
श्लोक 2 (4.54.2)
ददृशुस्ते ध्वजाग्रं वै शुश्रुवुश्च रथस्वनम् । दोधूयमानस्य भृशं गाण्डीवस्य च निस्वनम् ॥
dadṛśuste dhvajāgraṃ vai śuśruvuśca rathasvanam | dodhūyamānasya bhṛśaṃ gāṇḍīvasya ca nisvanam
उन्होंने उनकी ध्वजा का अग्रभाग देखा, रथ की ध्वनि सुनी, और बार-बार झटके जाते गाण्डीव धनुष की प्रचण्ड टंकार भी सुनी।
श्लोक 3 (4.54.3)
त्रिकोशमात्रं गत्वा तु पाण्डवः श्वेतवाहनः । सेनामुखमभिप्रेक्ष्य पार्थो वैराटिमब्रवीत् ॥
trikośamātraṃ gatvā tu pāṇḍavaḥ śvetavāhanaḥ | senāmukhamabhiprekṣya pārtho vairāṭimabravīt
लगभग तीन कोस आगे जाकर श्वेत घोड़ों वाले पाण्डुपुत्र पार्थ ने सेना के अग्रभाग को देखा और विराटपुत्र से कहा—
अर्जुन उवाच
श्लोक 4 (4.54.4)
राजानं नात्र पश्यामि रथानीके व्यवस्थितम् । दक्षिणं पक्षमादाय कुरवो यान्त्युदङ्मुखाः ॥
rājānaṃ nātra paśyāmi rathānīke vyavasthitam | dakṣiṇaṃ pakṣamādāya kuravo yāntyudaṅmukhāḥ
मैं यहाँ रथसेना में राजा को खड़ा नहीं देख रहा। कौरव दाहिना पक्ष साथ लेकर उत्तर की ओर मुँह किए जा रहे हैं।
श्लोक 5 (4.54.5)
उत्सृज्यैतद्रथानीकं महेष्वासाभिरक्षितम् । गवाग्रमभितो याहि यावत्पश्यामि मे रिपुम् ॥
utsṛjyaitadrathānīkaṃ maheṣvāsābhirakṣitam | gavāgramabhito yāhi yāvatpaśyāmi me ripum
बड़े-बड़े धनुर्धरों से रक्षित इस रथसेना को छोड़ दो और गौओं के झुंड के अग्रभाग की ओर चलो, जब तक मैं अपने शत्रु को देख न लूँ।
श्लोक 6 (4.54.6)
गवाग्रमभितो गत्वा गाश्चैवाशु निवर्तय । यावदेते निवर्तन्ते कुरवो जवमास्थिताः । तावदेव पशून्सर्वान्निवर्तिष्ये तवाभिभो ॥
gavāgramabhito gatvā gāścaivāśu nivartaya | yāvadete nivartante kuravo javamāsthitāḥ | tāvadeva paśūnsarvānnivartiṣye tavābhibho
झुंड के अग्रभाग तक पहुँचकर गौओं को शीघ्र लौटा दो। जब तक ये कौरव वेग से लौटकर आते हैं, उतने में ही, हे राजकुमार, मैं तुम्हारे सारे पशु लौटा लूँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (4.54.7)
इत्युक्त्वा समरे पार्थो वैराटिमपराजितः । सव्यं पक्षमनुप्राप्य जवेनाश्वानचोदयत् ॥
ityuktvā samare pārtho vairāṭimaparājitaḥ | savyaṃ pakṣamanuprāpya javenāśvānacodayat
रणभूमि में विराटपुत्र से ऐसा कहकर अपराजित पार्थ बाएँ पक्ष की ओर बढ़े और घोड़ों को वेग से हँकवाया।
श्लोक 8 (4.54.8)
ततोऽभ्यवादयत्पार्थो भीष्मं शान्तनवं कृपम् । द्वाभ्यांद्वाभ्यां तथाऽऽचार्यं द्रोणं प्रथमतः क्रमात् ॥
tato'bhyavādayatpārtho bhīṣmaṃ śāntanavaṃ kṛpam | dvābhyāṃdvābhyāṃ tathā''cāryaṃ droṇaṃ prathamataḥ kramāt
तब पार्थ ने शान्तनुपुत्र भीष्म, कृप और आचार्य द्रोण को, क्रम में सबसे पहले द्रोण को, दो-दो बाण छोड़कर प्रणाम किया।
श्लोक 9 (4.54.9)
द्रोणं कृपं च भीष्मं च पृषत्कैरभ्यवादयत् । ततस्तत्सर्वमालोक्य द्रोणो वचनमब्रवीत् ॥
droṇaṃ kṛpaṃ ca bhīṣmaṃ ca pṛṣatkairabhyavādayat | tatastatsarvamālokya droṇo vacanamabravīt
उन्होंने अपने बाणों से द्रोण, कृप और भीष्म का अभिवादन किया। यह सब देखकर द्रोण ने कहा—
द्रोण उवाच
श्लोक 10 (4.54.10)
महारथमनुप्राप्तं दृष्ट्वा गाण्डीवधन्विनम् । न कश्चिद्योद्धुमिच्छेत न च गुप्तं स्वजीवितम् । अयं वीरश्च शूरश्च दुर्धर्षश्चैव संयुगे ॥
mahārathamanuprāptaṃ dṛṣṭvā gāṇḍīvadhanvinam | na kaścidyoddhumiccheta na ca guptaṃ svajīvitam | ayaṃ vīraśca śūraśca durdharṣaścaiva saṃyuge
गाण्डीवधारी महारथी को सामने आया देखकर कोई भी लड़ना नहीं चाहेगा, न अपने प्राणों को सुरक्षित समझेगा। यह वीर है, शूर है और युद्ध में दुर्जेय है।
श्लोक 11 (4.54.11)
एतद्ध्वजाग्रं पार्थस्य दूरतः प्रतिदृश्यते । मेघः सविद्युत्स्तनितो रोरवीति च वानरः ॥
etaddhvajāgraṃ pārthasya dūrataḥ pratidṛśyate | meghaḥ savidyutstanito roravīti ca vānaraḥ
वह दूर से पार्थ की ध्वजा का अग्रभाग दिख रहा है; और उस पर बैठा वानर बिजली-भरे गरजते मेघ की भाँति बार-बार गर्जना कर रहा है।
श्लोक 12 (4.54.12)
आस्थाय च रथं याति गाण्डीवं विक्षिपन्धनुः ॥
āsthāya ca rathaṃ yāti gāṇḍīvaṃ vikṣipandhanuḥ
रथ पर आरूढ़ होकर, गाण्डीव धनुष को घुमाता हुआ वह चला आ रहा है।
श्लोक 13 (4.54.13)
अश्वानां स्तनतां शब्दो वहतां पाकशासनिम् । रथस्याम्बुधरस्येव श्रूयते भृशदारुणः ॥
aśvānāṃ stanatāṃ śabdo vahatāṃ pākaśāsanim | rathasyāmbudharasyeva śrūyate bhṛśadāruṇaḥ
इन्द्रपुत्र को खींचते हुए हिनहिनाते घोड़ों का और मेघ के समान गरजते उसके रथ का अत्यन्त भयानक शब्द सुनाई दे रहा है।
श्लोक 14 (4.54.14)
दारयन्निव तेजस्वी वसुधां वासवात्मजः । एष दृष्ट्वा रथानीकमस्माकमरिमर्दनः । श्रीमान्वदान्यो धृतिमान्सत्करोति च पाण्डवः ॥
dārayanniva tejasvī vasudhāṃ vāsavātmajaḥ | eṣa dṛṣṭvā rathānīkamasmākamarimardanaḥ | śrīmānvadānyo dhṛtimānsatkaroti ca pāṇḍavaḥ
मानो पृथ्वी को विदीर्ण करता हुआ यह तेजस्वी इन्द्रपुत्र, शत्रुओं का मर्दन करने वाला, श्रीसम्पन्न, उदार और धैर्यवान पाण्डुपुत्र हमारी रथसेना को देखकर उसका सत्कार कर रहा है।
श्लोक 15 (4.54.15)
इमौ बाणावनुप्राप्तौ पादयोः प्रत्युपस्थितौ । रथस्याग्रे निखातौ मे चित्रपुङ्खावजिह्मगौ ॥
imau bāṇāvanuprāptau pādayoḥ pratyupasthitau | rathasyāgre nikhātau me citrapuṅkhāvajihmagau
ये दो बाण मेरे पास आकर मेरे चरणों के सामने आ पड़े हैं—रंग-बिरंगे पंखों वाले, सीधे जाने वाले ये दोनों बाण मेरे रथ के आगे भूमि में गड़े हैं।
श्लोक 16 (4.54.16)
इमौ चाप्यपरौ बाणावभितः कर्णमूलयोः । संस्पृशन्तावतिक्रान्तौ पृष्ट्वेवानामयं भृशम् ॥
imau cāpyaparau bāṇāvabhitaḥ karṇamūlayoḥ | saṃspṛśantāvatikrāntau pṛṣṭvevānāmayaṃ bhṛśam
और ये दूसरे दो बाण मेरे दोनों कानों के मूल को छूते हुए निकल गए, मानो बड़े आग्रह से मेरा कुशल-क्षेम पूछ रहे हों।
श्लोक 17 (4.54.17)
चिरदृष्टोऽयमस्माभिर्धर्मज्ञो बान्धवप्रियः । अतीव ज्वलते लक्ष्म्या पाण्डुपुत्रः प्रतापवान् ॥
ciradṛṣṭo'yamasmābhirdharmajño bāndhavapriyaḥ | atīva jvalate lakṣmyā pāṇḍuputraḥ pratāpavān
बहुत समय बाद हमने इस धर्मज्ञ और स्वजनप्रिय को देखा है। यह प्रतापी पाण्डुपुत्र शोभा से अत्यन्त दमक रहा है।
श्लोक 18 (4.54.18)
निरुष्य च वने वासं कृत्वा कर्म सुदुष्करम् । अभिवादयते पार्थः पूजयन्मामरिंदमः ॥
niruṣya ca vane vāsaṃ kṛtvā karma suduṣkaram | abhivādayate pārthaḥ pūjayanmāmariṃdamaḥ
वन में निवास पूरा करके और अत्यन्त कठिन कार्य करके, शत्रुदमन पार्थ मेरा सम्मान करते हुए मुझे प्रणाम कर रहा है।
श्लोक 19 (4.54.19)
अमर्षेण हि संपूर्णो दुःखेन प्रतिबोधितः । अद्येमां भारतीं सेनामेको नाशयते ध्रुवम् ॥
amarṣeṇa hi saṃpūrṇo duḥkhena pratibodhitaḥ | adyemāṃ bhāratīṃ senāmeko nāśayate dhruvam
रोष से भरा और दुःखों से जागा हुआ यह आज अकेला ही निश्चय ही इस भरतवंशियों की सेना का नाश कर देगा।
श्लोक 20 (4.54.20)
द्व्यधिकं दशमुष्य वत्सराणां स्वजनेनाविदितस्त्रयोदशं च । ज्वलते रथमास्थितः किरीटी तम इव रात्रिजमभ्युदस्य सूर्यः ॥
dvyadhikaṃ daśamuṣya vatsarāṇāṃ svajanenāviditastrayodaśaṃ ca | jvalate rathamāsthitaḥ kirīṭī tama iva rātrijamabhyudasya sūryaḥ
बारह वर्ष वन में और तेरहवाँ वर्ष अपने स्वजनों से भी अज्ञात रहकर बिताने के बाद, रथ पर बैठा यह किरीटधारी ऐसे दमक रहा है जैसे रात्रि के अन्धकार को हटाकर उदित हुआ सूर्य।
श्लोक 21 (4.54.21)
रथी शरी चारुमाली निषङ्गी शङ्खी पताकी कवची किरीटी । खड्गी च धन्वी च विराजतेऽयं शिखीव यज्ञेषु घृतेन सिक्तः ॥
rathī śarī cārumālī niṣaṅgī śaṅkhī patākī kavacī kirīṭī | khaḍgī ca dhanvī ca virājate'yaṃ śikhīva yajñeṣu ghṛtena siktaḥ
रथ, बाण, सुन्दर माला, तरकश, शंख, पताका, कवच और किरीट से युक्त, खड्ग और धनुष धारण किए यह ऐसे शोभित है जैसे यज्ञ में घी से सींची गई अग्नि।