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विराट पर्व · अध्याय 53

युद्ध देखने के लिए देवताओं का आकाश में एकत्र होना

इन्द्र सब देवताओं को अपने सुदर्शन नामक प्रासाद पर चढ़ाकर वहाँ ले जाते हैं जहाँ अर्जुन है। सूर्य के मार्ग में स्थित खम्भों वाली उस सभा, उसके छत्रों, मालाओं और सुगन्धित वायु का वर्णन है; और उसके चारों ओर देवता, प्रजापति और ऋषि, श्वेत और नृग से लेकर हरिश्चन्द्र, भगीरथ और पाण्डु तक राजर्षियों की लम्बी पंक्ति, तथा अप्सराएँ, गन्धर्व, दैत्य, यक्ष और नाग एकत्र होते हैं — सब आकाश में एक वीर को अनेकों से लड़ते देखने की प्रतीक्षा में।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.53.1)

ततः सुदर्शनं नाम प्रासादं हरिवाहनः । सर्वान्देवान्समारोप्य प्रययौ यत्र पाण्डवः ॥

tataḥ sudarśanaṃ nāma prāsādaṃ harivāhanaḥ | sarvāndevānsamāropya prayayau yatra pāṇḍavaḥ

तब हरे घोड़ों वाले इन्द्र सब देवताओं को सुदर्शन नामक प्रासाद पर चढ़ाकर वहाँ गए जहाँ पाण्डव (अर्जुन) थे।

श्लोक 2 (4.53.2)

स्थूणाराजिसहस्रं तु यत्र मध्ये प्रतिष्ठितम् । तत्र सूर्यपथेऽतिष्ठद्विमला महती सभा ॥

sthūṇārājisahasraṃ tu yatra madhye pratiṣṭhitam | tatra sūryapathe'tiṣṭhadvimalā mahatī sabhā

वहाँ सूर्य के मार्ग में एक विशाल और निर्मल सभा स्थित थी, जिसके मध्य में खम्भों की हज़ार पंक्तियाँ खड़ी थीं।

श्लोक 3 (4.53.3)

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च मरुद्गणाः । तत्र श्वेतानि चक्राणि काञ्चनस्फाटिकानि च ॥

ādityā vasavo rudrā aśvinau ca marudgaṇāḥ | tatra śvetāni cakrāṇi kāñcanasphāṭikāni ca

वहाँ आदित्य, वसु, रुद्र, दोनों अश्विनीकुमार और मरुद्गण थे, और सोने तथा स्फटिक के श्वेत चक्र भी;

श्लोक 4 (4.53.4)

तथा चित्राणि छत्राणि दिव्यरूपाणि भारत । मणिरत्नविचित्राणि नानारूपाणि भागशः । आकाशे सह दृश्यन्ते भानुमन्ति शुभानि च ॥

tathā citrāṇi chatrāṇi divyarūpāṇi bhārata | maṇiratnavicitrāṇi nānārūpāṇi bhāgaśaḥ | ākāśe saha dṛśyante bhānumanti śubhāni ca

और हे भारत, वैसे ही दिव्य रूप वाले रंग-बिरंगे छत्र, मणियों और रत्नों से जड़े, अनेक आकारों के, अपने-अपने स्थान पर, आकाश में एक साथ दिखाई दे रहे थे, प्रकाशमान और सुन्दर —

श्लोक 5 (4.53.5)

अग्नेरिन्द्रस्य सोमस्य यमस्य वरुणस्य च । तथा धातुर्विधातुश्च मित्रस्य धनदस्य च । रुद्रस्य विष्णोः सवितुस्त्रिदशानां तथैव च ॥

agnerindrasya somasya yamasya varuṇasya ca | tathā dhāturvidhātuśca mitrasya dhanadasya ca | rudrasya viṣṇoḥ savitustridaśānāṃ tathaiva ca

अग्नि, इन्द्र, सोम, यम और वरुण के; धाता, विधाता, मित्र और धनद (कुबेर) के; रुद्र, विष्णु, सविता और अन्य देवताओं के भी।

श्लोक 6 (4.53.6)

काञ्चनानि च दामानि विविधाश्चोत्तमस्रजः । दिव्यपुष्पाभिसंवीतास्तत्र चित्राणि भेजिरे ॥

kāñcanāni ca dāmāni vividhāścottamasrajaḥ | divyapuṣpābhisaṃvītāstatra citrāṇi bhejire

सोने की मालाएँ और अनेक प्रकार की उत्तम मालाएँ, दिव्य पुष्पों से गुँथी हुई, वहाँ उन रंग-बिरंगे छत्रों की शोभा बढ़ा रही थीं।

श्लोक 7 (4.53.7)

तस्मिंस्तु राजन्प्रासादे दिव्यरत्नविभूषिते । दिव्यगन्धसमायुक्ताः स्रजो दिव्याश्चकाशिरे ॥

tasmiṃstu rājanprāsāde divyaratnavibhūṣite | divyagandhasamāyuktāḥ srajo divyāścakāśire

हे राजन्, दिव्य रत्नों से विभूषित उस प्रासाद में दिव्य सुगन्ध से युक्त दिव्य मालाएँ चमक रही थीं।

श्लोक 8 (4.53.8)

दिव्यश्च वायुः प्रववौ गन्धमादाय सर्वशः । ऋतवः पुष्पमादाय समतिष्ठन्त भारत ॥

divyaśca vāyuḥ pravavau gandhamādāya sarvaśaḥ | ṛtavaḥ puṣpamādāya samatiṣṭhanta bhārata

हे भारत, एक दिव्य वायु चारों ओर सुगन्ध लेकर बह रही थी, और ऋतुएँ अपने फूल लिए उपस्थित थीं।

श्लोक 9 (4.53.9)

प्रजानां पतयः सप्त सप्त चैव महर्षयः । तत्र देवर्षयश्चैव देवराजं दिवौकसः । इन्द्रेण सहिताः सर्वे त्रिदशाश्च व्यवस्थिताः ॥

prajānāṃ patayaḥ sapta sapta caiva maharṣayaḥ | tatra devarṣayaścaiva devarājaṃ divaukasaḥ | indreṇa sahitāḥ sarve tridaśāśca vyavasthitāḥ

सात प्रजापति और सात महर्षि, देवर्षि, और देवराज के साथ रहने वाले स्वर्गवासी — इन्द्र सहित सभी देवता वहाँ उपस्थित थे।

श्लोक 10 (4.53.10)

न पङ्को न रजस्तत्र प्रविवेश कथंचन । आदित्यश्च विरूक्षोत्र नातिवेलमिवातपत् ॥

na paṅko na rajastatra praviveśa kathaṃcana | ādityaśca virūkṣotra nātivelamivātapat

वहाँ न कीचड़ था और न धूल ही किसी प्रकार प्रवेश कर पाती थी; और सूर्य भी अपनी प्रखरता छोड़कर अधिक नहीं तपता था।

श्लोक 11 (4.53.11)

दिव्यगन्धं समादाय वायुस्तत्राभिगच्छति । आकाशं च दिशः सर्वा दर्शनीयमदृश्यत ॥

divyagandhaṃ samādāya vāyustatrābhigacchati | ākāśaṃ ca diśaḥ sarvā darśanīyamadṛśyata

वायु दिव्य सुगन्ध लेकर वहाँ आती थी, और आकाश तथा सब दिशाएँ दर्शनीय दिखाई देती थीं।

श्लोक 12 (4.53.12)

तत्र देवाः समारुह्य तं दिव्यं सर्वतःप्रभम् । अम्बरे विमलेऽतिष्ठन्प्रासादं कामगामिनम् ॥

tatra devāḥ samāruhya taṃ divyaṃ sarvataḥprabham | ambare vimale'tiṣṭhanprāsādaṃ kāmagāminam

उस दिव्य, चारों ओर प्रभा फैलाने वाले, इच्छानुसार चलने वाले प्रासाद पर चढ़कर देवता निर्मल आकाश में स्थित हो गए।

श्लोक 13 (4.53.13)

तत्र राजर्षयश्चैव समारुह्य दिवौकसः । श्वेतो राजा वसुमनास्तथा भद्रः प्रदर्शनः ॥

tatra rājarṣayaścaiva samāruhya divaukasaḥ | śveto rājā vasumanāstathā bhadraḥ pradarśanaḥ

वहाँ स्वर्गवासी राजर्षि भी चढ़ आए थे — श्वेत, राजा वसुमना, भद्र और प्रदर्शन,

श्लोक 14 (4.53.14)

नृगो ययातिर्नहुषो मान्धाता भरतः कुरुः । अष्टकश्च शिबिश्चोभौ स च राजा पुरूरवाः ॥

nṛgo yayātirnahuṣo māndhātā bharataḥ kuruḥ | aṣṭakaśca śibiścobhau sa ca rājā purūravāḥ

नृग, ययाति, नहुष, मान्धाता, भरत, कुरु, अष्टक और शिबि दोनों, तथा राजा पुरूरवा;

श्लोक 15 (4.53.15)

डम्भोद्भवः कार्तवीर्यो ह्यर्जुनः सगरस्तथा । दिलीपः केरलः पूरुः शर्यातिः सोमकस्तदा ॥

ḍambhodbhavaḥ kārtavīryo hyarjunaḥ sagarastathā | dilīpaḥ keralaḥ pūruḥ śaryātiḥ somakastadā

दम्भोद्भव, कार्तवीर्य अर्जुन, सगर, दिलीप, केरल, पूरु, शर्याति और सोमक;

श्लोक 16 (4.53.16)

हरिश्चन्द्रश्च तेजस्वी रघुर्दशरथस्तथा । भगीरथश्च राजर्षिः सर्वे च जनमेजय ॥

hariścandraśca tejasvī raghurdaśarathastathā | bhagīrathaśca rājarṣiḥ sarve ca janamejaya

तेजस्वी हरिश्चन्द्र, रघु, दशरथ और राजर्षि भगीरथ — हे जनमेजय, ये सब;

श्लोक 17 (4.53.17)

पाण्डुश्चैव महाराजश्चामरव्यजनोज्ज्वलः । छत्रेण ध्रियमाणेन राजसूयश्रिया वृतः ॥

pāṇḍuścaiva mahārājaścāmaravyajanojjvalaḥ | chatreṇa dhriyamāṇena rājasūyaśriyā vṛtaḥ

और महाराज पाण्डु भी, चँवरों से सुशोभित, सिर पर छत्र धारण किए हुए, राजसूय यज्ञ की शोभा से युक्त।

श्लोक 18 (4.53.18)

एते चान्ये च बहवः पुण्यशीलाः शुचिव्रताः । कीर्तिमन्तो महावीर्यास्तत्रैवासन्दिवि स्थिताः ॥

ete cānye ca bahavaḥ puṇyaśīlāḥ śucivratāḥ | kīrtimanto mahāvīryāstatraivāsandivi sthitāḥ

ये तथा अन्य बहुत-से पुण्यशील, पवित्र व्रत वाले, कीर्तिमान और महापराक्रमी राजा वहीं स्वर्ग में उपस्थित थे।

श्लोक 19 (4.53.19)

गणाश्चाप्सरसां सर्वे गन्धर्वाश्चापि सर्वशः । दैत्यराक्षसयक्षाश्च सुपर्णाः पन्नगास्तथा ॥

gaṇāścāpsarasāṃ sarve gandharvāścāpi sarvaśaḥ | daityarākṣasayakṣāśca suparṇāḥ pannagāstathā

अप्सराओं के सभी समूह, सब गन्धर्व, दैत्य, राक्षस, यक्ष, सुपर्ण और नाग,

श्लोक 20 (4.53.20)

वासवप्रमुखाः सर्वे देवाश्च सगणेश्वराः । आसंस्तत्र समारूढाः संग्रामं तं दिदृक्षवः ॥

vāsavapramukhāḥ sarve devāśca sagaṇeśvarāḥ | āsaṃstatra samārūḍhāḥ saṃgrāmaṃ taṃ didṛkṣavaḥ

और इन्द्र के नेतृत्व में अपने गणों के स्वामियों सहित सभी देवता वहाँ प्रासाद पर चढ़े हुए थे, उस संग्राम को देखने के इच्छुक।

श्लोक 21 (4.53.21)

इत्यम्बरे व्यवस्थाय प्रासादस्था दिवौकसः । एकस्य च बहूनां च युद्धं द्रष्टुं व्यवस्थिताः ॥

ityambare vyavasthāya prāsādasthā divaukasaḥ | ekasya ca bahūnāṃ ca yuddhaṃ draṣṭuṃ vyavasthitāḥ

इस प्रकार प्रासाद में बैठे स्वर्गवासी आकाश में स्थित होकर एक वीर और अनेकों के बीच होने वाले उस युद्ध को देखने के लिए तैयार थे।

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