विराट पर्व · अध्याय 52
भीष्म द्वारा तेरह वर्षों की गणना; कौरव सेना की व्यूह-रचना
भीष्म दुर्योधन को समझाते हैं कि अधिमासों की गणना करने पर तेरह वर्ष अर्जुन के प्रकट होने से एक दिन पहले ही पूरे हो चुके थे; पाण्डवों ने हर प्रतिज्ञा निभाई है और वे असत्य के बदले मृत्यु चुनेंगे, पर समय आने पर अपना अधिकार नहीं छोड़ेंगे। युद्ध में विजय कभी निश्चित नहीं होती, इसलिए वे सन्धि की सलाह देते हैं। दुर्योधन एक गाँव तक देने से इनकार कर देता है। द्रोण सुझाव देते हैं कि राजा सेना का चौथाई भाग लेकर लौट जाएँ, दूसरा चौथाई भाग गायों को ले जाए और शेष सेना अर्जुन का सामना करे; ऐसा ही किया जाता है, और भीष्म सेना का व्यूह रचते हैं — द्रोण मध्य में, अश्वत्थामा और कृप दोनों पार्श्वों पर, कर्ण आगे, और स्वयं वे स्वर्णमय ताल-ध्वज के साथ सबसे पीछे।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (4.52.1)
कलाः काष्ठाश्च युज्यन्ते मुहूर्ताश्च दिनानि च । अर्धमासाश्च मासाश्च नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ॥
kalāḥ kāṣṭhāśca yujyante muhūrtāśca dināni ca | ardhamāsāśca māsāśca nakṣatrāṇi grahāstathā
"कलाएँ और काष्ठाएँ, मुहूर्त और दिन, पक्ष और मास, नक्षत्र और ग्रह — ये सब परस्पर जुड़े रहते हैं;
श्लोक 2 (4.52.2)
ऋतवश्चापि युज्यन्ते तथा संवत्सरा अपि । एवं कालविभागेन कालचक्रं प्रवर्तते ॥
ṛtavaścāpi yujyante tathā saṃvatsarā api | evaṃ kālavibhāgena kālacakraṃ pravartate
ऋतुएँ और वर्ष भी जुड़े रहते हैं; इस प्रकार काल के विभाजन से कालचक्र घूमता है।
श्लोक 3 (4.52.3)
तेषां कालातिरेकेण ज्योतिषां च व्यतिक्रमात् । पञ्चमे पञ्चमे वर्षे द्वौ मासावधिमासकौ ॥
teṣāṃ kālātirekeṇa jyotiṣāṃ ca vyatikramāt | pañcame pañcame varṣe dvau māsāvadhimāsakau
उनमें काल के बढ़ जाने और ज्योतिष्पिण्डों की गति में अन्तर आने के कारण हर पाँचवें वर्ष दो अधिमास होते हैं।
श्लोक 4 (4.52.4)
एषामभ्यधिका मासाः पञ्च च द्वादश क्षपाः । त्रयोदशानां वर्षाणामिति मे वर्तते मतिः ॥
eṣāmabhyadhikā māsāḥ pañca ca dvādaśa kṣapāḥ | trayodaśānāṃ varṣāṇāmiti me vartate matiḥ
मेरे विचार में इन तेरह वर्षों में पाँच मास और बारह रातें अधिक हो जाती हैं।
श्लोक 5 (4.52.5)
पूर्वेद्युरेव निर्वृत्तस्ततो बीभत्सुरागतः ॥
pūrvedyureva nirvṛttastato bībhatsurāgataḥ
अवधि एक दिन पहले ही पूरी हो चुकी थी; उसके बाद ही बीभत्सु आए हैं।
श्लोक 6 (4.52.6)
सर्वं यथावच्चरितं यद्यदेभिः प्रतिश्रुतम् । एवमेतद्भ्रुवं ज्ञात्वा ततो बीभत्सुरागतः ॥
sarvaṃ yathāvaccaritaṃ yadyadebhiḥ pratiśrutam | evametadbhruvaṃ jñātvā tato bībhatsurāgataḥ
उन्होंने जो-जो प्रतिज्ञा की थी, उसका ठीक-ठीक पालन किया है; यह निश्चित रूप से जानकर ही बीभत्सु आए हैं।
श्लोक 7 (4.52.7)
सर्वे पञ्च महात्मानः सर्वे धर्मार्थकोविदाः । येषां युधिष्ठिरो राजा कस्माद्धर्मेऽपराध्नुयुः ॥
sarve pañca mahātmānaḥ sarve dharmārthakovidāḥ | yeṣāṃ yudhiṣṭhiro rājā kasmāddharme'parādhnuyuḥ
पाँचों ही महात्मा हैं, सभी धर्म और अर्थ के ज्ञाता हैं; जिनके राजा युधिष्ठिर हैं, वे धर्म के विरुद्ध अपराध क्यों करेंगे?
श्लोक 8 (4.52.8)
कामात्क्रोधाच्च लोभाच्च कामक्रोधभयादपि । स्नेहाद्वा यदि वा मोहाद्धर्मं नात्येति धर्मजः ॥
kāmātkrodhācca lobhācca kāmakrodhabhayādapi | snehādvā yadi vā mohāddharmaṃ nātyeti dharmajaḥ
धर्मपुत्र युधिष्ठिर न काम से, न क्रोध से, न लोभ से, न काम, क्रोध और भय से, न स्नेह से और न मोह से ही धर्म का उल्लंघन करते हैं।
श्लोक 9 (4.52.9)
अलुब्धाश्चैव कौन्तेयाः कृतवन्तश्च दुष्करम् । न चापि केवलं राज्यमिच्छेयुस्ते ह्यधर्मतः ॥
alubdhāścaiva kaunteyāḥ kṛtavantaśca duṣkaram | na cāpi kevalaṃ rājyamiccheyuste hyadharmataḥ
कुन्ती के पुत्र लोभ से रहित हैं और उन्होंने कठिन कार्य कर दिखाया है; वे केवल राज्य के लिए अधर्म का मार्ग नहीं चाहेंगे।
श्लोक 10 (4.52.10)
तदैव ते हि विक्रान्तुमीषुः कौरवनन्दनाः । धर्मपाशनिबद्धास्तु न चेलुः क्षत्रियव्रतात् ॥
tadaiva te hi vikrāntumīṣuḥ kauravanandanāḥ | dharmapāśanibaddhāstu na celuḥ kṣatriyavratāt
कुरुकुल को आनन्द देने वाले वे वीर उसी समय पराक्रम दिखा सकते थे, किन्तु धर्म के पाश में बँधे होने के कारण वे क्षत्रिय-व्रत से विचलित नहीं हुए।
श्लोक 11 (4.52.11)
यश्चानृत इति ख्यातः स च गच्छेत्पराभवम् । वृणुयुर्मरणं पार्था नानृतत्वं कथंचन ॥
yaścānṛta iti khyātaḥ sa ca gacchetparābhavam | vṛṇuyurmaraṇaṃ pārthā nānṛtatvaṃ kathaṃcana
जो असत्यवादी के रूप में प्रसिद्ध हो जाता है, उसका पतन होता है; पृथा के पुत्र मृत्यु को चुन लेंगे, पर असत्य को कभी नहीं।
श्लोक 12 (4.52.12)
प्राप्ते तु काले स्वानर्थान्नोत्सृजेयुर्नरर्षभाः । अपि वज्रभृता गुप्तांस्तथावीर्या हि पाण्डवाः ॥
prāpte tu kāle svānarthānnotsṛjeyurnararṣabhāḥ | api vajrabhṛtā guptāṃstathāvīryā hi pāṇḍavāḥ
किन्तु समय आ जाने पर वे नरश्रेष्ठ अपना अधिकार नहीं छोड़ेंगे, चाहे वज्रधारी इन्द्र ही उसकी रक्षा क्यों न कर रहे हों — पाण्डव ऐसे पराक्रमी हैं।
श्लोक 13 (4.52.13)
प्रतियुद्ध्येम समरे सर्वशस्त्रभृतांवरम् ॥
pratiyuddhyema samare sarvaśastrabhṛtāṃvaram
हमें युद्ध में समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ उस वीर का सामना करना होगा।
श्लोक 14 (4.52.14)
तस्माद्यदत्र कल्याणं लोके सद्भिरनुष्ठितम् । तत्संविधीयतां शीघ्रं मा वो ह्यर्थोऽभ्यगात्परम् ॥
tasmādyadatra kalyāṇaṃ loke sadbhiranuṣṭhitam | tatsaṃvidhīyatāṃ śīghraṃ mā vo hyartho'bhyagātparam
इसलिए संसार में सज्जनों ने जो कल्याणकारी मार्ग अपनाया है, उसकी शीघ्र व्यवस्था की जाए, ताकि तुम्हारा हित दूसरों के हाथ न चला जाए।
श्लोक 15 (4.52.15)
न हि पश्यामि संग्रामे कदाचिदपि कौरव । एकान्तसिद्धिं राजेन्द्र संप्राप्तश्च धनञ्जयः ॥
na hi paśyāmi saṃgrāme kadācidapi kaurava | ekāntasiddhiṃ rājendra saṃprāptaśca dhanañjayaḥ
हे कौरव, हे राजेन्द्र, मैं युद्ध में कभी निश्चित सफलता नहीं देखता; और धनंजय आ पहुँचे हैं।
श्लोक 16 (4.52.16)
संप्रवृत्ते तु संग्रामे भावाभावौ जयाजयौ । अवश्यमेकं स्पृशतो दृष्टमेतदसंशयम् ॥
saṃpravṛtte tu saṃgrāme bhāvābhāvau jayājayau | avaśyamekaṃ spṛśato dṛṣṭametadasaṃśayam
युद्ध छिड़ जाने पर जीवन या मृत्यु, जय या पराजय — इनमें से कोई एक दोनों पक्षों को अवश्य छूता है; यह निःसन्देह देखा गया है।
श्लोक 17 (4.52.17)
तस्माद्युद्धोपचरितं कर्म वा धर्मसंहितम् । क्रियतामाशु राजेन्द्र संप्राप्तश्च धनञ्जयः ॥
tasmādyuddhopacaritaṃ karma vā dharmasaṃhitam | kriyatāmāśu rājendra saṃprāptaśca dhanañjayaḥ
इसलिए हे राजेन्द्र, युद्ध के योग्य कार्य हो या धर्मसम्मत कार्य, उसे तुरन्त किया जाए; धनंजय आ पहुँचे हैं।
श्लोक 18 (4.52.18)
एको हि समरे पार्थः पृथिवीं निर्दहेच्छरैः । भ्रातृभिः सहितो भूत्वा किं पुनः कौरवान्रणे । तस्मात्सन्धिं कुरुश्रेष्ठ कुरुष्व यदि मन्यसे ॥
eko hi samare pārthaḥ pṛthivīṃ nirdaheccharaiḥ | bhrātṛbhiḥ sahito bhūtvā kiṃ punaḥ kauravānraṇe | tasmātsandhiṃ kuruśreṣṭha kuruṣva yadi manyase
अकेला पार्थ ही युद्ध में अपने बाणों से पृथ्वी को भस्म कर सकता है; फिर भाइयों के साथ मिलकर रण में कौरवों का क्या कहना! इसलिए हे कुरुश्रेष्ठ, यदि उचित समझो तो सन्धि कर लो।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 19 (4.52.19)
नाहं राज्यं प्रदास्यामि पाण्डवेभ्यः पितामह । ग्रामं सेनां च दासांश्च स्वल्पं द्रव्यमपि प्रभो । युद्धोपचारिकं यत्तु तत्सर्वं संविधीयताम् ॥
nāhaṃ rājyaṃ pradāsyāmi pāṇḍavebhyaḥ pitāmaha | grāmaṃ senāṃ ca dāsāṃśca svalpaṃ dravyamapi prabho | yuddhopacārikaṃ yattu tatsarvaṃ saṃvidhīyatām
"पितामह, मैं पाण्डवों को राज्य नहीं दूँगा — हे प्रभो, न गाँव, न सेना, न दास, न थोड़ा-सा धन भी। युद्ध के लिए जो कुछ आवश्यक है, उस सबकी व्यवस्था की जाए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (4.52.20)
भीष्मस्योपरते वाक्ये तथा दुर्योधनस्य च । प्राप्तमर्थ्यं च यद्वाक्यं द्रोणश्चाह द्विजोत्तमः ॥
bhīṣmasyoparate vākye tathā duryodhanasya ca | prāptamarthyaṃ ca yadvākyaṃ droṇaścāha dvijottamaḥ
जब भीष्म और दुर्योधन अपनी बात कह चुके, तब द्विजश्रेष्ठ द्रोण ने समयोचित और सार्थक वचन कहे—
द्रोण उवाच
श्लोक 21 (4.52.21)
यत्तु युद्धोपचरितं भवेद्वा धर्मसंहितम् । कस्त्वया सदृशो लोके भूयस्त्वं वक्तुमर्हसि ॥
yattu yuddhopacaritaṃ bhavedvā dharmasaṃhitam | kastvayā sadṛśo loke bhūyastvaṃ vaktumarhasi
"युद्ध के योग्य बात हो या धर्मसम्मत — उसमें संसार में आपके समान कौन है? आगे आप ही कहने योग्य हैं।
श्लोक 22 (4.52.22)
अत्र या मामिका बुद्धिः श्रूयतां यदि रोचते । सर्वथा हि मया श्रेयो वक्तव्यं कुरुनन्दन ॥
atra yā māmikā buddhiḥ śrūyatāṃ yadi rocate | sarvathā hi mayā śreyo vaktavyaṃ kurunandana
फिर भी, यदि आपको रुचे तो इस विषय में मेरा विचार सुनिए; हे कुरुनन्दन, मुझे तो हर प्रकार से कल्याण की ही बात कहनी है।
श्लोक 23 (4.52.23)
राजा बलचतुर्भागं क्षिप्रमादाय गच्छतु । ततोऽपरश्चतुर्भागो गाः समादाय गच्छतु । वयं चार्धेन सैन्यस्य प्रतियोत्स्याम पाण्डवम् ॥
rājā balacaturbhāgaṃ kṣipramādāya gacchatu | tato'paraścaturbhāgo gāḥ samādāya gacchatu | vayaṃ cārdhena sainyasya pratiyotsyāma pāṇḍavam
राजा सेना का एक चौथाई भाग लेकर तुरन्त चले जाएँ; दूसरा चौथाई भाग गायों को लेकर जाए; और हम आधी सेना के साथ पाण्डव का सामना करेंगे।
श्लोक 24 (4.52.24)
अहं भीष्मश्च कर्णश्च अश्वत्थामा कृपस्तथा । प्रतियोत्स्याम बीभत्सुमागतं कृतनिश्चयम् ॥
ahaṃ bhīṣmaśca karṇaśca aśvatthāmā kṛpastathā | pratiyotsyāma bībhatsumāgataṃ kṛtaniścayam
मैं, भीष्म, कर्ण, अश्वत्थामा और कृप — हम सब दृढ़ निश्चय करके आए हुए बीभत्सु से लड़ेंगे।
श्लोक 25 (4.52.25)
एवं राजा सुगुप्तः स्यान्न क्लैब्यं गन्तुमर्हति । मत्स्यं वा पुनरायातमथवापि शतक्रतुम् । अहमावारयिष्यामि वेलेव मकरालयम् ॥
evaṃ rājā suguptaḥ syānna klaibyaṃ gantumarhati | matsyaṃ vā punarāyātamathavāpi śatakratum | ahamāvārayiṣyāmi veleva makarālayam
इस प्रकार राजा सुरक्षित रहेंगे और उन्हें कायरता का कलंक नहीं लगेगा। मत्स्यराज लौटकर आएँ या स्वयं शतक्रतु इन्द्र, मैं उन्हें वैसे ही रोक दूँगा जैसे तट समुद्र को रोकता है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (4.52.26)
तद्वाक्यं रुरुचे तेषां द्रोणेनोक्तं महात्मना । तथाहि कृतवान्राजा कौरवाणामनन्तरम् ॥
tadvākyaṃ ruruce teṣāṃ droṇenoktaṃ mahātmanā | tathāhi kṛtavānrājā kauravāṇāmanantaram
महात्मा द्रोण की कही बात उन सबको अच्छी लगी, और कौरवराज ने तुरन्त वैसा ही किया।
श्लोक 27 (4.52.27)
भीष्मः प्रस्थाप्य राजानं गोधनं तदनन्तरम् । सेनामुख्यान्व्यवस्थाप्य व्यूहितुं संप्रचक्रमे ॥
bhīṣmaḥ prasthāpya rājānaṃ godhanaṃ tadanantaram | senāmukhyānvyavasthāpya vyūhituṃ saṃpracakrame
भीष्म ने राजा को और उसके बाद गोधन को रवाना करके, सेना के प्रमुखों को यथास्थान नियुक्त किया और व्यूह-रचना आरम्भ की।
श्लोक 28 (4.52.28)
द्रोणस्योपरते वाक्ये भीष्मः प्रोवाच बुद्धिमान् । आचार्य मध्ये तिष्ठ त्वमश्वत्थामा तु सव्यतः । कृपः शारद्वतो धीमान्पार्श्वं रक्षतु दक्षिणम् ॥
droṇasyoparate vākye bhīṣmaḥ provāca buddhimān | ācārya madhye tiṣṭha tvamaśvatthāmā tu savyataḥ | kṛpaḥ śāradvato dhīmānpārśvaṃ rakṣatu dakṣiṇam
द्रोण के बोल चुकने पर बुद्धिमान भीष्म ने कहा — "आचार्य, आप मध्य में खड़े हों और अश्वत्थामा बाईं ओर; बुद्धिमान शारद्वत कृप दाहिने पार्श्व की रक्षा करें।
भीष्म उवाच
श्लोक 29 (4.52.29)
विकर्णश्च महावीर्यो दुर्मुखश्च परन्तपः । शकुनिः सौबलश्चैव दुःसहश्च महाबलः । द्रोणस्य पार्श्वमजिताः पालयन्तु महाबलाः ॥
vikarṇaśca mahāvīryo durmukhaśca parantapaḥ | śakuniḥ saubalaścaiva duḥsahaśca mahābalaḥ | droṇasya pārśvamajitāḥ pālayantu mahābalāḥ
महापराक्रमी विकर्ण, शत्रुओं को सन्ताप देने वाला दुर्मुख, सुबलपुत्र शकुनि और महाबली दुःसह — ये अजेय बलवान वीर द्रोण के पार्श्व की रक्षा करें।
श्लोक 30 (4.52.30)
अग्रतः सूतपुत्रस्तु कर्णस्तिष्ठतु दंशितः । अहं सर्वस्य सैन्यस्य पश्चात्स्थास्यामि पालयन् ॥
agrataḥ sūtaputrastu karṇastiṣṭhatu daṃśitaḥ | ahaṃ sarvasya sainyasya paścātsthāsyāmi pālayan
सूतपुत्र कर्ण कवच धारण करके आगे खड़ा हो; मैं पूरी सेना के पीछे रहकर उसकी रक्षा करूँगा।
श्लोक 31 (4.52.31)
सर्वे महारथाः शूरा महेष्वासा महाबलाः । युद्ध्यन्तु पाण्डवश्रेष्ठमागतं यत्नतो युधि ॥
sarve mahārathāḥ śūrā maheṣvāsā mahābalāḥ | yuddhyantu pāṇḍavaśreṣṭhamāgataṃ yatnato yudhi
सभी शूरवीर, महाबली, महान धनुर्धर महारथी आए हुए पाण्डवश्रेष्ठ से पूरे प्रयत्न के साथ युद्ध करें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 32 (4.52.32)
अभेद्यं परसैन्यानां व्यूहं व्यूह्य कुरूत्तमः । वज्रगर्भं व्रीहिमुखं पद्मचन्द्रार्धमण्डलम् ॥
abhedyaṃ parasainyānāṃ vyūhaṃ vyūhya kurūttamaḥ | vajragarbhaṃ vrīhimukhaṃ padmacandrārdhamaṇḍalam
कुरुश्रेष्ठ भीष्म ने ऐसा व्यूह रचा जिसे शत्रुसेनाएँ भेद न सकें — जिसके गर्भ में वज्र और मुख पर व्रीहि (धान की बाल) का आकार था, और जिसमें पद्म, अर्धचन्द्र और मण्डल की रचनाएँ थीं।
श्लोक 33 (4.52.33)
तस्य व्यूहस्य पश्चार्धे भीष्मश्चाथोद्यतायुधः । सौवर्णं तालमुच्छ्रित्य रथे तिष्ठन्नशोभत ॥
tasya vyūhasya paścārdhe bhīṣmaścāthodyatāyudhaḥ | sauvarṇaṃ tālamucchritya rathe tiṣṭhannaśobhata
उस व्यूह के पिछले भाग में भीष्म शस्त्र उठाए, स्वर्णमय ताड़ के चिह्न वाला ध्वज ऊँचा किए हुए रथ पर खड़े शोभा पा रहे थे।