विराट पर्व · अध्याय 51
भीष्म द्वारा कौरव सेनापतियों में मेल-मिलाप
भीष्म दुर्योधन से कहते हैं कि द्रोण, कृप और अश्वत्थामा सभी उचित सोचते हैं और कर्ण केवल लड़ना चाहता है, पर आचार्य का अपमान नहीं होना चाहिए और देश-काल का विचार करके ही युद्ध करना चाहिए; उनके अनुसार स्वार्थ ने क्रुद्ध राजा को अन्धा कर दिया है। फिर वे हाथ जोड़कर अश्वत्थामा से कर्ण के तानों को क्षमा करने की विनती करते हैं, द्रोण और उनके पुत्र को वेद और शस्त्र दोनों के एकमात्र ज्ञाता बताते हैं, और चेताते हैं कि फूट सेना का सबसे बड़ा संकट है। अश्वत्थामा इस शर्त पर शान्त होता है कि उसके पिता से फूट न हो; दुर्योधन कर्ण और भीष्म के साथ द्रोण और कृप से क्षमा माँगता है, और प्रसन्न हुए द्रोण कहते हैं कि ऐसी नीति बने जिससे अर्जुन दुर्योधन तक न पहुँच सके, और भीष्म अपनी सलाह दें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.51.1)
ततः शान्तनवस्तत्र धर्मार्थकुशलं हितम् । दुर्योधनमिदं वाक्यमब्रवीत्कुरुसंसदि ॥
tataḥ śāntanavastatra dharmārthakuśalaṃ hitam | duryodhanamidaṃ vākyamabravītkurusaṃsadi
तब शान्तनुपुत्र भीष्म ने कौरवों की सभा में दुर्योधन से धर्म और अर्थ से युक्त यह हितकारी वचन कहा—
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (4.51.2)
साधु पश्यति वै द्रोणः कृपः साध्वनुपश्यति । आचार्यपुत्रः सहजं निश्चितं साधु भाषते ॥
sādhu paśyati vai droṇaḥ kṛpaḥ sādhvanupaśyati | ācāryaputraḥ sahajaṃ niścitaṃ sādhu bhāṣate
"द्रोण ठीक देखते हैं, कृप भी ठीक समझते हैं; आचार्यपुत्र भी अपने स्वभाव के अनुसार निश्चित और उचित बात कहते हैं।
श्लोक 3 (4.51.3)
कर्णस्तु क्षत्रधर्मेण केवलं योद्धुमिच्छति । आचार्यो नावमन्तव्यः पुरुषेण विजानता । देशकालौ तु संप्रेक्ष्य योद्धव्यमिति मे मतिः ॥
karṇastu kṣatradharmeṇa kevalaṃ yoddhumicchati | ācāryo nāvamantavyaḥ puruṣeṇa vijānatā | deśakālau tu saṃprekṣya yoddhavyamiti me matiḥ
कर्ण केवल क्षत्रिय-धर्म के अनुसार युद्ध करना चाहता है। समझदार पुरुष को आचार्य का अपमान नहीं करना चाहिए। मेरा मत है कि देश और काल का विचार करके ही युद्ध करना चाहिए।
श्लोक 4 (4.51.4)
यस्य सूर्यसमाः पञ्च सपत्नाः स्युः प्रहारिणः । कथमभ्युदये तेषां न प्रमुह्येत पण्डितः ॥
yasya sūryasamāḥ pañca sapatnāḥ syuḥ prahāriṇaḥ | kathamabhyudaye teṣāṃ na pramuhyeta paṇḍitaḥ
जिसके पाँच शत्रु सूर्य के समान तेजस्वी और प्रहार करने को तत्पर हों, उनके उत्कर्ष के समय कोई बुद्धिमान कैसे व्याकुल न हो?
श्लोक 5 (4.51.5)
स्वार्थे सर्वे विमुह्यन्ति येऽपि धर्मविदो जनाः । तस्मात्तत्वं न जानाति यत्तु कार्यं नराधिपः ॥
svārthe sarve vimuhyanti ye'pi dharmavido janāḥ | tasmāttatvaṃ na jānāti yattu kāryaṃ narādhipaḥ
अपने स्वार्थ में सभी लोग मोहित हो जाते हैं, चाहे वे धर्म के ज्ञाता ही क्यों न हों। इसीलिए राजा यह तत्त्व नहीं जानता कि क्या करना चाहिए।
श्लोक 6 (4.51.6)
धार्तराष्ट्रोपि दुर्बुद्धिः पश्यन्नपि धनञ्जयम् । नैव पश्यति नाघ्राति मन्दः क्रोधवशं गतः ॥
dhārtarāṣṭropi durbuddhiḥ paśyannapi dhanañjayam | naiva paśyati nāghrāti mandaḥ krodhavaśaṃ gataḥ
धृतराष्ट्र का यह दुर्बुद्धि पुत्र भी धनंजय को देखते हुए भी न तो देखता है, न खतरे को भाँपता है; वह मूर्ख क्रोध के वश में है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (4.51.7)
एवमुक्त्वा तु राजानं पुनर्द्रौणिमुवाच ह । प्राञ्जलिर्भरतश्रेष्ठः साम्ना बुद्धिमतांवरः ॥
evamuktvā tu rājānaṃ punardrauṇimuvāca ha | prāñjalirbharataśreṣṭhaḥ sāmnā buddhimatāṃvaraḥ
राजा से यह कहकर भरतश्रेष्ठ, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ भीष्म ने हाथ जोड़कर फिर द्रोणपुत्र से कोमल वाणी में कहा—
भीष्म उवाच
श्लोक 8 (4.51.8)
कर्णो हि यदवोचत्त्वां तेजस्संजननाय तत् । आचार्यपुत्रः क्षमतां महत्कार्यमुपस्थितम् ॥
karṇo hi yadavocattvāṃ tejassaṃjananāya tat | ācāryaputraḥ kṣamatāṃ mahatkāryamupasthitam
"कर्ण ने तुमसे जो कहा, वह तुम्हारा तेज जगाने के लिए था। आचार्यपुत्र क्षमा करें; एक बड़ा कार्य सामने उपस्थित है।
श्लोक 9 (4.51.9)
नायं कालो विरोधस्य कौन्तेये समुपस्थिते । क्षन्तव्यं भवता सर्वमाचार्येण कृपेण च ॥
nāyaṃ kālo virodhasya kaunteye samupasthite | kṣantavyaṃ bhavatā sarvamācāryeṇa kṛpeṇa ca
जब कुन्तीपुत्र सामने आ पहुँचा है, तब यह विरोध का समय नहीं है। आपको, आचार्य को और कृप को सब कुछ क्षमा कर देना चाहिए।
श्लोक 10 (4.51.10)
भवतां हि कृतास्त्रत्वं यथाऽऽदित्ये प्रभा तथा । यथा चन्द्रमसो लक्ष्मीः सर्वथा नापकृष्यते । एवं भवत्सु ब्राह्मण्यं ब्रह्मास्त्रं च प्रतिष्ठितम् ॥
bhavatāṃ hi kṛtāstratvaṃ yathā''ditye prabhā tathā | yathā candramaso lakṣmīḥ sarvathā nāpakṛṣyate | evaṃ bhavatsu brāhmaṇyaṃ brahmāstraṃ ca pratiṣṭhitam
आप लोगों में अस्त्रविद्या वैसे ही है जैसे सूर्य में प्रभा; और जैसे चन्द्रमा की शोभा कभी कम नहीं होती, वैसे ही आपमें ब्राह्मणत्व और ब्रह्मास्त्र दोनों प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 11 (4.51.11)
चत्वार एकतो वेदाः क्षात्रमेकत्र दृश्यते । नैतत्समस्तमुभयं कस्मिंश्चिदनुशुश्रुम । अन्यत्र भारताचार्यात्सुपुत्रादिति मे मतिः ॥
catvāra ekato vedāḥ kṣātramekatra dṛśyate | naitatsamastamubhayaṃ kasmiṃścidanuśuśruma | anyatra bhāratācāryātsuputrāditi me matiḥ
चारों वेद एक में दिखते हैं और क्षात्रबल दूसरे में; ये दोनों एक साथ किसी में हमने नहीं सुने, सिवाय भरतवंशियों के आचार्य और उनके सुयोग्य पुत्र के — यह मेरा मत है।
श्लोक 12 (4.51.12)
वेदान्ताश्च पुराणानि इतिहासं पुरातनम् । जामदग्न्यमृते राजन्को द्रोणादधिको भवेत् ॥
vedāntāśca purāṇāni itihāsaṃ purātanam | jāmadagnyamṛte rājanko droṇādadhiko bhavet
हे राजन्, वेदान्त, पुराण और प्राचीन इतिहास में जमदग्निपुत्र (परशुराम) को छोड़कर द्रोण से बढ़कर कौन होगा?
श्लोक 13 (4.51.13)
ब्रह्मास्त्रं चैव वेदाश्च नैतदन्यत्र दृश्यते ॥
brahmāstraṃ caiva vedāśca naitadanyatra dṛśyate
ब्रह्मास्त्र और वेद दोनों एक साथ — यह और कहीं नहीं दिखता।
श्लोक 14 (4.51.14)
आचार्यपुत्रः क्षमतां नायं कालो विभेदने । सर्वे संहत्य युद्ध्यामः पाकशासनिमागतम् ॥
ācāryaputraḥ kṣamatāṃ nāyaṃ kālo vibhedane | sarve saṃhatya yuddhyāmaḥ pākaśāsanimāgatam
आचार्यपुत्र क्षमा करें; यह फूट का समय नहीं है। आइए, हम सब मिलकर आए हुए इन्द्रपुत्र से युद्ध करें।
श्लोक 15 (4.51.15)
बलस्य व्यसनानीह यान्युक्तानि मनीषिभिः । मुख्यो भेदोहि तेषां तु पापिष्ठो विदुषां मतः ॥
balasya vyasanānīha yānyuktāni manīṣibhiḥ | mukhyo bhedohi teṣāṃ tu pāpiṣṭho viduṣāṃ mataḥ
विद्वानों ने सेना के जो संकट बताए हैं, उनमें फूट सबसे प्रमुख है और ज्ञानी उसे सबसे बुरा मानते हैं।"
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 16 (4.51.16)
नैवं न्याय्यमिदं वाच्यमस्माकं पुरुषर्षभ । किंतु रोषपरीतेन गुरुणा भाषिता गुणाः ॥
naivaṃ nyāyyamidaṃ vācyamasmākaṃ puruṣarṣabha | kiṃtu roṣaparītena guruṇā bhāṣitā guṇāḥ
"हे पुरुषश्रेष्ठ, हमसे ऐसा कहना उचित नहीं। गुरुदेव ने तो क्रोध में भरकर ही अर्जुन के गुणों का बखान किया था।
श्लोक 17 (4.51.17)
शत्रोरपि गुणा ग्राह्या दोषा वाच्या गुरोरपि । सर्वथा सर्वयत्नेन पुत्रे शिष्ये हितं वदेत् ॥
śatrorapi guṇā grāhyā doṣā vācyā gurorapi | sarvathā sarvayatnena putre śiṣye hitaṃ vadet
शत्रु के भी गुण ग्रहण करने चाहिए और गुरु के भी दोष कहने चाहिए; पुत्र और शिष्य को तो सब प्रकार से, पूरे प्रयत्न से हित की बात ही कहनी चाहिए।
श्लोक 18 (4.51.18)
आचार्य एष क्षमतां शान्तिरत्र विधीयताम् । अभिद्यमाने तु गुरौ निवृत्तं रोषकारितम् ॥
ācārya eṣa kṣamatāṃ śāntiratra vidhīyatām | abhidyamāne tu gurau nivṛttaṃ roṣakāritam
आचार्य क्षमा करें और यहाँ शान्ति स्थापित की जाए; यदि गुरु से फूट न हो, तो क्रोध के कारण जो कुछ हुआ, वह समाप्त हो गया।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (4.51.19)
ततो दुर्योधनो द्रोणं क्षमयामास भारत । सह कर्णेन भीष्मेण कृपं चैव महाबलम् ॥
tato duryodhano droṇaṃ kṣamayāmāsa bhārata | saha karṇena bhīṣmeṇa kṛpaṃ caiva mahābalam
हे भारत, तब दुर्योधन ने कर्ण और भीष्म के साथ द्रोण से क्षमा माँगी, और महाबली कृप से भी।
द्रोण उवाच
श्लोक 20 (4.51.20)
यदेतत्प्रथमं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् । तेनैवाहं प्रसन्नो वै परमत्र विधीयताम् ॥
yadetatprathamaṃ vākyaṃ bhīṣmaḥ śāntanavo'bravīt | tenaivāhaṃ prasanno vai paramatra vidhīyatām
"शान्तनुपुत्र भीष्म ने जो पहली बात कही, उसी से मैं प्रसन्न हो गया। अब आगे का प्रबन्ध किया जाए।
श्लोक 21 (4.51.21)
यथा दुर्योधनं पार्थो नोपसर्पति संगरे । साहसाद्यदि वा मोहात्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥
yathā duryodhanaṃ pārtho nopasarpati saṃgare | sāhasādyadi vā mohāttathā nītirvidhīyatām
ऐसी नीति बनाई जाए कि पार्थ दुस्साहस या मोहवश युद्ध में दुर्योधन तक न पहुँच पाए।
श्लोक 22 (4.51.22)
वनवासे ह्यनिर्वृत्ते दर्शयेन्न धनञ्जयः । धनं चालभमानोऽत्र नाद्य तत्क्षन्तुमर्हति ॥
vanavāse hyanirvṛtte darśayenna dhanañjayaḥ | dhanaṃ cālabhamāno'tra nādya tatkṣantumarhati
यदि वनवास की अवधि पूरी न हुई होती तो धनंजय प्रकट न होते; और अपना धन वापस पाए बिना वे आज इसे क्षमा नहीं करेंगे।
श्लोक 23 (4.51.23)
यथा नायं समायुञ्ज्याद्धार्तराष्ट्रं कथंचन । न च सेनां पराजय्यात्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥
yathā nāyaṃ samāyuñjyāddhārtarāṣṭraṃ kathaṃcana | na ca senāṃ parājayyāttathā nītirvidhīyatām
ऐसी नीति बनाई जाए कि वे किसी भी प्रकार धृतराष्ट्रपुत्र से भिड़ न सकें और सेना को पराजित न कर सकें।
श्लोक 24 (4.51.24)
उक्तं दुर्योधनेनापि पुरस्ताद्वाक्यमीदृशम् । तदनुस्मृत्य गाङ्गेय यथावद्वक्तुमर्हसि ॥
uktaṃ duryodhanenāpi purastādvākyamīdṛśam | tadanusmṛtya gāṅgeya yathāvadvaktumarhasi
दुर्योधन ने भी पहले ऐसी ही बात कही थी। हे गंगापुत्र, उसे स्मरण करके आप उचित रूप से बताइए कि क्या करना चाहिए।"