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विराट पर्व · अध्याय 50

कर्ण का कृप पर आक्षेप; अश्वत्थामा की कर्ण और दुर्योधन को फटकार

कृप की चेतावनी से चिढ़कर कर्ण ताना देता है कि आचार्य और उनका परिवार भय के कारण शत्रु के भक्त बन गए हैं; वह उन्हें भिक्षा और भोजन-निमन्त्रणों की ओर लौट जाने को कहता है और डींग मारता है कि वह अकेला अर्जुन और मत्स्यों को मार डालेगा। अश्वत्थामा उत्तर देता है कि अभी गायें जीती भी नहीं गईं, चारों वर्णों के उचित कर्म गिनाता है, और फिर दुर्योधन की ओर मुड़कर जुए से जीते गए राज्य और द्रौपदी को सभा में घसीटे जाने की निन्दा करता है। वह अर्जुन को अद्वितीय और द्रोण को पुत्र के समान प्रिय बताता है, दुर्योधन और शकुनि से कहता है कि जैसे जुआ खेला था वैसे ही अब लड़ें, और घोषणा करता है कि वह स्वयं केवल मत्स्यराज से ही लड़ेगा।

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.50.1)

कृपस्य वचनं श्रुत्वा कर्णो राजन्युधांपतिः । पुनः प्रोवाच संरब्धो गर्हयन्ब्राह्मणं कृपम् ॥

kṛpasya vacanaṃ śrutvā karṇo rājanyudhāṃpatiḥ | punaḥ provāca saṃrabdho garhayanbrāhmaṇaṃ kṛpam

हे राजन्, कृप की बात सुनकर युद्धों के स्वामी कर्ण ने क्रोध में भरकर ब्राह्मण कृप की निन्दा करते हुए फिर कहा।

कर्ण उवाच

श्लोक 2 (4.50.2)

लक्षयाम्यहमाचार्यं भयाद्भक्तिं गतं रिपौ । भीतेन हि न योद्धव्यमहं योत्स्ये धनञ्जयम् ॥

lakṣayāmyahamācāryaṃ bhayādbhaktiṃ gataṃ ripau | bhītena hi na yoddhavyamahaṃ yotsye dhanañjayam

"मैं देखता हूँ कि आचार्य भय के कारण शत्रु के भक्त बन गए हैं। जो डरता हो, उसे युद्ध नहीं करना चाहिए; मैं धनंजय से लड़ूँगा।

श्लोक 3 (4.50.3)

ननु वारुणमाग्नेयं याम्यं वायव्यमेव च । अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव सत्वहीनस्य ते वृथा ॥

nanu vāruṇamāgneyaṃ yāmyaṃ vāyavyameva ca | astraṃ brahmaśiraścaiva satvahīnasya te vṛthā

निश्चय ही वारुण, आग्नेय, याम्य और वायव्य अस्त्र तथा ब्रह्मशिर अस्त्र भी तुझ जैसे साहसहीन के पास व्यर्थ हैं।

श्लोक 4 (4.50.4)

मित्रकार्यं कृतमिदं पितापुत्रैर्महारथैः । भर्तृपिण्डश्च निर्विष्टो यथेष्टं गन्तुमर्हथ ॥

mitrakāryaṃ kṛtamidaṃ pitāputrairmahārathaiḥ | bhartṛpiṇḍaśca nirviṣṭo yatheṣṭaṃ gantumarhatha

तुम पिता-पुत्र महारथियों ने मित्र का यह काम पूरा कर दिया और स्वामी का अन्न भी जी भरकर खा लिया; अब जहाँ चाहो चले जाओ।

श्लोक 5 (4.50.5)

भिक्षां हरस्व नित्यं त्वं यज्ञाननुचरस्व च । आमन्त्रणानि भुङ्क्षाद्य माऽस्मान्युद्धेन भीषय ॥

bhikṣāṃ harasva nityaṃ tvaṃ yajñānanucarasva ca | āmantraṇāni bhuṅkṣādya mā'smānyuddhena bhīṣaya

तुम नित्य भिक्षा माँगकर लाओ और यज्ञों के पीछे-पीछे घूमो; आज निमन्त्रणों का भोजन करो, पर हमें युद्ध से मत डराओ।

श्लोक 6 (4.50.6)

भार्गवास्त्रं मया मुक्तं निर्दहेत्पृथिवीमिमाम् । किं पुनः पाण्डुपुत्राणामेकमर्जुनमाहवे ॥

bhārgavāstraṃ mayā muktaṃ nirdahetpṛthivīmimām | kiṃ punaḥ pāṇḍuputrāṇāmekamarjunamāhave

मेरे द्वारा छोड़ा गया भार्गवास्त्र इस सारी पृथ्वी को जला सकता है; फिर युद्ध में पाण्डुपुत्रों में से अकेले अर्जुन की क्या बात है!

श्लोक 7 (4.50.7)

आगमिष्यन्ति पदवीं मात्स्याः पाण्डवमाश्रिताः । कीचकानां तु बलिनां शत्रुसेनावमर्दिनाम् ॥

āgamiṣyanti padavīṃ mātsyāḥ pāṇḍavamāśritāḥ | kīcakānāṃ tu balināṃ śatrusenāvamardinām

पाण्डव का आश्रय लिए हुए मत्स्यदेश के योद्धा — शत्रुसेना को कुचलने वाले बलवान कीचकों के लोग — हमारे पीछे-पीछे आएँगे।

श्लोक 8 (4.50.8)

तानहं निहनिष्यामि भवता गम्यतां गृहम् । किं वेदवादिनां कार्यं परस्नेहानुभाषिणाम् ॥

tānahaṃ nihaniṣyāmi bhavatā gamyatāṃ gṛham | kiṃ vedavādināṃ kāryaṃ parasnehānubhāṣiṇām

मैं उन्हें मार डालूँगा; आप घर जाइए। दूसरों के प्रति स्नेह की बातें करने वाले वेदपाठियों का यहाँ क्या काम?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (4.50.9)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा अश्वत्थामा प्रतापवान् । उवाच वदतांश्रेष्ठो दुर्योधनमवेक्ष्य च ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā aśvatthāmā pratāpavān | uvāca vadatāṃśreṣṭho duryodhanamavekṣya ca

उसकी वह बात सुनकर वक्ताओं में श्रेष्ठ प्रतापी अश्वत्थामा ने दुर्योधन की ओर देखकर कहा—

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 10 (4.50.10)

न च तावञ्जिता गावो न च सीमान्तरं गताः । न हास्तिनपुरं प्राप्तास्त्वं च कर्ण विकत्थसे ॥

na ca tāvañjitā gāvo na ca sīmāntaraṃ gatāḥ | na hāstinapuraṃ prāptāstvaṃ ca karṇa vikatthase

"अभी न तो गायें जीती गई हैं, न सीमा के पार पहुँची हैं, न हस्तिनापुर ही पहुँची हैं; और कर्ण, तुम डींग मार रहे हो।

श्लोक 11 (4.50.11)

बहूनि धर्मशास्त्राणि पठन्ति द्विजसत्तमाः । तेषु किंस्विदिदं दृष्टं द्यूते जीयेत यन्नृपः ॥

bahūni dharmaśāstrāṇi paṭhanti dvijasattamāḥ | teṣu kiṃsvididaṃ dṛṣṭaṃ dyūte jīyeta yannṛpaḥ

श्रेष्ठ ब्राह्मण अनेक धर्मशास्त्र पढ़ते हैं; उनमें कहाँ यह देखा गया है कि किसी राजा को जुए में जीता जाए?

श्लोक 12 (4.50.12)

संग्रामान्विपुलाञ्जित्वा लब्ध्वा च विपुलं धनम् । विजित्य च महीं कृत्स्नां नेह कत्थन्ति पण्डिताः ॥

saṃgrāmānvipulāñjitvā labdhvā ca vipulaṃ dhanam | vijitya ca mahīṃ kṛtsnāṃ neha katthanti paṇḍitāḥ

बड़े-बड़े युद्ध जीतकर, विपुल धन पाकर और सारी पृथ्वी को जीतकर भी बुद्धिमान लोग यहाँ अपनी बड़ाई नहीं करते।

श्लोक 13 (4.50.13)

पचत्यग्निरवाक्यस्तु तूष्णीं भाति दिवाकरः । तूष्णीं धारयते लोकान्वसुधा सचराचरान् ॥

pacatyagniravākyastu tūṣṇīṃ bhāti divākaraḥ | tūṣṇīṃ dhārayate lokānvasudhā sacarācarān

अग्नि बिना बोले पकाती है, सूर्य चुपचाप चमकता है, और पृथ्वी चुपचाप चर-अचर सहित सब लोकों को धारण करती है।

श्लोक 14 (4.50.14)

चातुर्वर्ण्यस्य कर्माणि विहितानि महर्षिभिः । धनं यैरधिगन्तव्यं यच्च कुर्वन्न दुष्यति ॥

cāturvarṇyasya karmāṇi vihitāni maharṣibhiḥ | dhanaṃ yairadhigantavyaṃ yacca kurvanna duṣyati

महर्षियों ने चारों वर्णों के कर्म निर्धारित किए हैं — जिनके द्वारा धन कमाना चाहिए और जिन्हें करते हुए मनुष्य दोषी नहीं होता।

श्लोक 15 (4.50.15)

अधीत्य ब्राह्मणो वेदान्याजयेत यजेत वा । क्षत्रियो धनमाहृत्य यजेतैव न याजयेत् ॥

adhītya brāhmaṇo vedānyājayeta yajeta vā | kṣatriyo dhanamāhṛtya yajetaiva na yājayet

ब्राह्मण वेदों का अध्ययन करके दूसरों का यज्ञ कराए या स्वयं यज्ञ करे; क्षत्रिय धन अर्जित करके स्वयं यज्ञ करे, पर दूसरों का यज्ञ न कराए।

श्लोक 16 (4.50.16)

वैश्योऽधिगम्य वित्तानि वार्ताकर्माणि कारयेत् ॥

vaiśyo'dhigamya vittāni vārtākarmāṇi kārayet

वैश्य धन प्राप्त करके खेती, पशुपालन और व्यापार के काम कराए।

श्लोक 17 (4.50.17)

शूद्रः शुश्रूषणं कुर्यात्त्रिषु वर्णेषु नित्यशः । वन्दनायोगविधिभिर्वैतसीं वृत्तिमाश्रितः ॥

śūdraḥ śuśrūṣaṇaṃ kuryāttriṣu varṇeṣu nityaśaḥ | vandanāyogavidhibhirvaitasīṃ vṛttimāśritaḥ

शूद्र सदा तीनों वर्णों की सेवा करे, प्रणाम और सेवा की विधियों का पालन करते हुए बेंत की भाँति झुकने वाली विनम्र वृत्ति अपनाए।

श्लोक 18 (4.50.18)

वर्तमाना यथाशास्त्रं प्राप्य चापि महीमिमाम् । प्रकुर्वन्ति महाभागा यज्ञान्सुविपुलानपि ॥

vartamānā yathāśāstraṃ prāpya cāpi mahīmimām | prakurvanti mahābhāgā yajñānsuvipulānapi

शास्त्र के अनुसार आचरण करते हुए वे महाभाग इस पृथ्वी को पाकर बड़े-बड़े यज्ञ भी करते हैं।

श्लोक 19 (4.50.19)

का जातिस्तेषु सूतेयं केऽपि मन्त्राः क्रियाश्च काः । केयं वर्णेषु या राज्ञो वक्तृभोक्तृनियन्तृषु ॥

kā jātisteṣu sūteyaṃ ke'pi mantrāḥ kriyāśca kāḥ | keyaṃ varṇeṣu yā rājño vaktṛbhoktṛniyantṛṣu

इन वर्णों में सूत की कौन-सी जाति है? उसके कौन-से मन्त्र हैं और कौन-से कर्म? वर्णों में यह कौन-सा स्थान है कि वह राजा को सलाह दे, उसके भोगों में भागी बने और उस पर नियन्त्रण रखे?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 20 (4.50.20)

दुर्योधनमभिप्रेक्ष्य कर्णं च कुरुसंसदि । अश्वत्थामा भृशं क्रुद्धो दुर्योधनमतर्जयत् ॥

duryodhanamabhiprekṣya karṇaṃ ca kurusaṃsadi | aśvatthāmā bhṛśaṃ kruddho duryodhanamatarjayat

कौरवों की सभा में दुर्योधन और कर्ण की ओर देखकर अत्यन्त क्रुद्ध अश्वत्थामा ने दुर्योधन को डाँटा—

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 21 (4.50.21)

प्राप्य द्यूतेन को राज्यं क्षत्रियः स्तोष्टुमर्हति । तथा नृशंसरूपोयं धार्तराष्ट्रश्च निर्घृणः ॥

prāpya dyūtena ko rājyaṃ kṣatriyaḥ stoṣṭumarhati | tathā nṛśaṃsarūpoyaṃ dhārtarāṣṭraśca nirghṛṇaḥ

"जुए से राज्य पाकर कौन क्षत्रिय उसकी प्रशंसा कर सकता है? फिर भी धृतराष्ट्र का यह पुत्र ऐसा ही क्रूर और निर्दयी है।

श्लोक 22 (4.50.22)

तथाऽधिगम्य वित्तानि को विकत्थेद्विचक्षणः । निकृत्या वञ्चनायोगैश्चरन्वैतंसिको यथा ॥

tathā'dhigamya vittāni ko vikatthedvicakṣaṇaḥ | nikṛtyā vañcanāyogaiścaranvaitaṃsiko yathā

छल और धोखे की चालों से, बहेलिये की तरह आचरण करके, इस प्रकार धन पाकर कौन विवेकी पुरुष डींग मारेगा?

श्लोक 23 (4.50.23)

कतमद्द्वैरथं युद्धं यत्राजैषीर्धनञ्जयम् । नकुलं सहदेवं वा धनं येषां त्वया हृतम् ॥

katamaddvairathaṃ yuddhaṃ yatrājaiṣīrdhanañjayam | nakulaṃ sahadevaṃ vā dhanaṃ yeṣāṃ tvayā hṛtam

किस द्वन्द्वयुद्ध में तुमने धनंजय को, या नकुल अथवा सहदेव को हराया था, जिनका धन तुमने हर लिया?

श्लोक 24 (4.50.24)

युधिष्ठिरो जितः कस्मिन्भीमश्च बलिनांवरः । इन्द्रप्रस्थं त्वया कस्मिन्संग्रामे निर्जितं पुरा ॥

yudhiṣṭhiro jitaḥ kasminbhīmaśca balināṃvaraḥ | indraprasthaṃ tvayā kasminsaṃgrāme nirjitaṃ purā

युधिष्ठिर किस युद्ध में हारे थे, और बलवानों में श्रेष्ठ भीम किसमें? तुमने पहले किस संग्राम में इन्द्रप्रस्थ जीता था?

श्लोक 25 (4.50.25)

तथैव कतमद्युद्धं यस्मिन्कृष्णा जिता त्वया । एकवस्त्रा सभां नीता क्षुद्रकर्मन्रजस्वला ॥

tathaiva katamadyuddhaṃ yasminkṛṣṇā jitā tvayā | ekavastrā sabhāṃ nītā kṣudrakarmanrajasvalā

और हे नीच कर्म करने वाले, किस युद्ध में तुमने कृष्णा को जीता था, जिसे एक वस्त्र में, रजस्वला अवस्था में सभा में घसीटकर लाया गया?

श्लोक 26 (4.50.26)

मूलमेषां महत्कृत्तं सारार्थी चन्दनं यथा । क्षुद्रं कर्म समास्थाय तत्र किं विदुरोऽब्रवीत् ॥

mūlameṣāṃ mahatkṛttaṃ sārārthī candanaṃ yathā | kṣudraṃ karma samāsthāya tatra kiṃ viduro'bravīt

जैसे सार (सुगन्धित लकड़ी) चाहने वाला चन्दन के वृक्ष को काट डालता है, वैसे ही तुमने उनकी बड़ी जड़ काट दी। जब तुमने वह नीच कर्म किया, तब विदुर ने क्या कहा था?

श्लोक 27 (4.50.27)

यथाशक्ति मनुष्याणाममर्षं लक्षयामहे । अन्येषामपि सत्वानामपि कीटपिपीलिकैः ॥

yathāśakti manuṣyāṇāmamarṣaṃ lakṣayāmahe | anyeṣāmapi satvānāmapi kīṭapipīlikaiḥ

हम देखते हैं कि मनुष्यों में, और कीड़ों-चींटियों तक दूसरे प्राणियों में भी, अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार अपमान को न सहने का भाव होता है।

श्लोक 28 (4.50.28)

द्रौपद्याः संपरिक्लेशं न क्षन्तुं पाण्डवोऽर्हति । क्षयाय धार्तराष्ट्राणां प्रादुर्भूतो धनञ्जयः ॥

draupadyāḥ saṃparikleśaṃ na kṣantuṃ pāṇḍavo'rhati | kṣayāya dhārtarāṣṭrāṇāṃ prādurbhūto dhanañjayaḥ

पाण्डव द्रौपदी के उस घोर क्लेश को क्षमा नहीं कर सकते। धनंजय धृतराष्ट्र के पुत्रों के विनाश के लिए प्रकट हुए हैं।

श्लोक 29 (4.50.29)

त्वं पुनः पण्डितो भूत्वा ह्याचार्यं क्षेप्तुमिच्छसि । वैरान्तकरणो जिष्णुर्न नः शेषं करिष्यति ॥

tvaṃ punaḥ paṇḍito bhūtvā hyācāryaṃ kṣeptumicchasi | vairāntakaraṇo jiṣṇurna naḥ śeṣaṃ kariṣyati

और तुम पण्डित बनकर आचार्य पर आक्षेप करना चाहते हो! वैर का अन्त करने वाले जिष्णु हममें से किसी को शेष नहीं छोड़ेंगे।

श्लोक 30 (4.50.30)

नैव देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः । भयादिह न युद्ध्येरन्पाण्डुपुत्रेण धीमता ॥

naiva devā na gandharvā nāsurā na ca rākṣasāḥ | bhayādiha na yuddhyeranpāṇḍuputreṇa dhīmatā

न देवता, न गन्धर्व, न असुर और न राक्षस ही भय के मारे यहाँ उस बुद्धिमान पाण्डुपुत्र से लड़ने का साहस करेंगे।

श्लोक 31 (4.50.31)

यं यमेकोपि संक्रुद्धः संग्रामे निपतिष्यति । वृक्षं गरुडवद्वेगाद्विनिहत्यान्तमेष्यति ॥

yaṃ yamekopi saṃkruddhaḥ saṃgrāme nipatiṣyati | vṛkṣaṃ garuḍavadvegādvinihatyāntameṣyati

वह अकेला भी क्रुद्ध होकर युद्ध में जिस-जिस पर टूट पड़ेगा, उसे वैसे ही मारकर समाप्त कर देगा जैसे गरुड़ अपने वेग से वृक्ष को गिरा देता है।

श्लोक 32 (4.50.32)

त्वत्तो विशिष्टं वीर्येण धनुष्यमरराट्समम् । वासुदेवसमं युद्धे तं पार्थं को न पूजयेत् ॥

tvatto viśiṣṭaṃ vīryeṇa dhanuṣyamararāṭsamam | vāsudevasamaṃ yuddhe taṃ pārthaṃ ko na pūjayet

जो पराक्रम में तुमसे बढ़कर है, धनुर्विद्या में देवराज के समान है और युद्ध में वासुदेव के समान है, उस पार्थ का आदर कौन नहीं करेगा?

श्लोक 33 (4.50.33)

देवं दैवेन युद्ध्येत मानुषेण च मानुषम् । अस्त्रं ह्यस्त्रेण यो हन्यात्कोऽर्जुनेन समः पुमान् ॥

devaṃ daivena yuddhyeta mānuṣeṇa ca mānuṣam | astraṃ hyastreṇa yo hanyātko'rjunena samaḥ pumān

वह देवता से दिव्य अस्त्रों द्वारा और मनुष्य से मानवीय शस्त्रों द्वारा लड़ता है, और अस्त्र को अस्त्र से काट गिराता है; अर्जुन के समान कौन पुरुष है?

श्लोक 34 (4.50.34)

पुत्रादनवमः शिष्य इति धर्मविदो विदुः । एतेनापि निमित्तेन प्रियो द्रोणस्य पाण्डवः ॥

putrādanavamaḥ śiṣya iti dharmavido viduḥ | etenāpi nimittena priyo droṇasya pāṇḍavaḥ

धर्म के ज्ञाता कहते हैं कि शिष्य पुत्र से कम नहीं होता; इस कारण से भी पाण्डव द्रोण को प्रिय हैं।

श्लोक 35 (4.50.35)

यथा त्वमकरोर्द्यूतमिन्द्रप्रस्थं यथाऽहरः । यथाऽनैषीः सभां कृष्णां तथा युध्यस्व पाण्डवं ॥

yathā tvamakarordyūtamindraprasthaṃ yathā'haraḥ | yathā'naiṣīḥ sabhāṃ kṛṣṇāṃ tathā yudhyasva pāṇḍavaṃ

जैसे तुमने जुआ खेला, जैसे इन्द्रप्रस्थ छीन लिया, जैसे कृष्णा को सभा में घसीट लाए, वैसे ही अब पाण्डव से लड़ो!

श्लोक 36 (4.50.36)

अयं ते मातुलः प्राज्ञः क्षत्रधर्मस्य कोविदः । दुर्द्यूतदेवी गान्धारः शकुनिर्युद्ध्यतामिह ॥

ayaṃ te mātulaḥ prājñaḥ kṣatradharmasya kovidaḥ | durdyūtadevī gāndhāraḥ śakuniryuddhyatāmiha

यह रहे तुम्हारे मामा — बुद्धिमान, क्षत्रिय-धर्म के ज्ञाता, कपट का जुआ खेलने वाले गान्धारराज शकुनि; अब यही यहाँ लड़ें!

श्लोक 37 (4.50.37)

नाक्षान्क्षिपति गाण्डीवं न कृतं द्वापरं न च । ज्वलतो निशितान्बाणांस्तांस्तान्क्षिपति गाण्डिवं ॥

nākṣānkṣipati gāṇḍīvaṃ na kṛtaṃ dvāparaṃ na ca | jvalato niśitānbāṇāṃstāṃstānkṣipati gāṇḍivaṃ

गाण्डीव पासे नहीं फेंकता, न कृत और न द्वापर के दाँव; गाण्डीव तो धधकते हुए पैने बाण एक के बाद एक बरसाता है।

श्लोक 38 (4.50.38)

न हि गाण्डीवनिर्मुक्ता गृध्रपक्षाः सुतेजनाः । नान्तरेष्ववतिष्ठन्ते गिरीणामपि दारणाः ॥

na hi gāṇḍīvanirmuktā gṛdhrapakṣāḥ sutejanāḥ | nāntareṣvavatiṣṭhante girīṇāmapi dāraṇāḥ

गाण्डीव से छूटे, गिद्ध के पंखों वाले, तीखी धार के बाण बीच में नहीं रुकते; वे पर्वतों को भी चीर डालते हैं।

श्लोक 39 (4.50.39)

अन्तकः पवनो मृत्युस्तथाऽग्निर्बडवामुखः । कुर्युरेते क्वचिच्छेषं न तु क्रुद्धो धनञ्जयः ॥

antakaḥ pavano mṛtyustathā'gnirbaḍavāmukhaḥ | kuryurete kvaciccheṣaṃ na tu kruddho dhanañjayaḥ

अन्तक, पवन, मृत्यु और बडवानल भी कहीं कुछ शेष छोड़ दें, पर क्रुद्ध धनंजय कुछ भी शेष नहीं छोड़ेंगे।

श्लोक 40 (4.50.40)

यथा सभायां द्यूतं त्वं मातुलेन सहाकरोः । तथा युध्यस्व संग्रामे सौबलेन सुरक्षितः ॥

yathā sabhāyāṃ dyūtaṃ tvaṃ mātulena sahākaroḥ | tathā yudhyasva saṃgrāme saubalena surakṣitaḥ

जैसे तुमने सभा में मामा के साथ मिलकर जुआ खेला था, वैसे ही सुबलपुत्र के संरक्षण में संग्राम में लड़ो।

श्लोक 41 (4.50.41)

युद्ध्यतां काममाचार्यो नाहं योत्स्ये धनञ्जयम् । मत्स्यो ह्यस्माभिरायोध्यो यद्यागच्छेद्गवांपदम् ॥

yuddhyatāṃ kāmamācāryo nāhaṃ yotsye dhanañjayam | matsyo hyasmābhirāyodhyo yadyāgacchedgavāṃpadam

आचार्य चाहें तो लड़ें; मैं धनंजय से नहीं लड़ूँगा। हमें तो मत्स्यराज से लड़ना है, यदि वह गायों के पीछे-पीछे आए।"

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51