विराट पर्व · अध्याय 49
कृप द्वारा कर्ण की भर्त्सना
कृप कर्ण की डींगों का उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि नीति के सब उपायों में युद्ध सबसे बुरा है और वह उचित देश-काल में ही सफल होता है; अर्जुन से भिड़ना बुद्धिमानी नहीं। वे अर्जुन के अकेले किए पराक्रम गिनाते हैं, अग्नि को तृप्त करने और सुभद्रा को ले जाने से लेकर द्रौपदी को जीतने और चित्रसेन तथा निवातकवचों को हराने तक, और पूछते हैं कि कर्ण ने अकेले कभी क्या किया है। अर्जुन से अकेले लड़ने की तुलना विषधर का दाँत उखाड़ने या गले में शिला बाँधकर समुद्र तैरने से करते हुए वे कहते हैं कि छहों महारथी मिलकर अर्जुन का सामना करें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.49.1)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा नीतिशास्त्रविशारदः । आचार्यः कुरुवीराणां कृपः शारद्वतोऽब्रवीत् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā nītiśāstraviśāradaḥ | ācāryaḥ kuruvīrāṇāṃ kṛpaḥ śāradvato'bravīt
उसकी यह बात सुनकर नीतिशास्त्र में निपुण, कुरुवीरों के आचार्य, शरद्वान् के पुत्र कृप बोले:
कृप उवाच
श्लोक 2 (4.49.2)
सदैव तव राधेय युद्धे क्रूरतरा मतिः । नार्थानां प्रकृतिं वेत्सि नानुबन्धमवेक्षसे ॥
sadaiva tava rādheya yuddhe krūratarā matiḥ | nārthānāṃ prakṛtiṃ vetsi nānubandhamavekṣase
राधेय, युद्ध के विषय में तुम्हारी बुद्धि सदा अत्यन्त कठोर रहती है। तुम न कार्यों का स्वभाव जानते हो, न उनके परिणाम पर ध्यान देते हो।
श्लोक 3 (4.49.3)
नया हि बहवः सन्ति शास्त्राण्याश्रित्य चिन्तिताः । तेषां युद्धं सुपापिष्ठं वेदयन्ति पुराविदः ॥
nayā hi bahavaḥ santi śāstrāṇyāśritya cintitāḥ | teṣāṃ yuddhaṃ supāpiṣṭhaṃ vedayanti purāvidaḥ
शास्त्रों के आधार पर सोची गई नीतियाँ अनेक हैं; पुरानी बातों के जानकार उनमें युद्ध को सबसे अधिक पापमय बताते हैं।
श्लोक 4 (4.49.4)
देशकालेन संयुक्तं युद्धं विजयदं भवेत् । हीनकालं तदेवेह अनर्थायोपकल्पते ॥
deśakālena saṃyuktaṃ yuddhaṃ vijayadaṃ bhavet | hīnakālaṃ tadeveha anarthāyopakalpate
उचित देश और काल में किया गया युद्ध विजय देता है; वही युद्ध असमय होने पर अनर्थ का कारण बनता है।
श्लोक 5 (4.49.5)
देशे काले च विक्रान्तं कल्याणाय विधीयते । आनुकूल्येन कार्याणामुत्तरं तु विधीयते ॥
deśe kāle ca vikrāntaṃ kalyāṇāya vidhīyate | ānukūlyena kāryāṇāmuttaraṃ tu vidhīyate
उचित देश और काल में दिखाया गया पराक्रम कल्याणकारी होता है; परिस्थितियों की अनुकूलता से ही उत्कर्ष प्राप्त होता है।
श्लोक 6 (4.49.6)
भारं हि रथकारस्य न व्यवस्यन्ति पण्डिताः । परिचिन्त्य तु पार्थेन संनिपातो न नः क्षमः ॥
bhāraṃ hi rathakārasya na vyavasyanti paṇḍitāḥ | paricintya tu pārthena saṃnipāto na naḥ kṣamaḥ
बुद्धिमान लोग केवल रथ बनानेवाले के कहने पर निर्णय नहीं कर लेते। सब सोच-विचारकर देखें तो पार्थ से भिड़ना हमारे लिए उचित नहीं।
श्लोक 7 (4.49.7)
एको हि शत्रून्समरे समर्थः प्रतिबाधितुम् । एकः कुरूनभ्यरक्षदेकश्चाग्निमतर्पयत् ॥
eko hi śatrūnsamare samarthaḥ pratibādhitum | ekaḥ kurūnabhyarakṣadekaścāgnimatarpayat
वह अकेला ही युद्ध में शत्रुओं को रोकने में समर्थ है। अकेले उसने कुरुओं की रक्षा की और अकेले अग्नि को तृप्त किया।
श्लोक 8 (4.49.8)
एकश्च पञ्च वर्षाणि ब्रह्मचर्यमधारयत् । एकः सुभद्रामारोप्य द्वैरथे कृष्णमाह्वयत् ॥
ekaśca pañca varṣāṇi brahmacaryamadhārayat | ekaḥ subhadrāmāropya dvairathe kṛṣṇamāhvayat
अकेले उसने पाँच वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन किया; अकेले सुभद्रा को रथ पर बिठाकर कृष्ण को द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकारा।
श्लोक 9 (4.49.9)
सैन्धवं वनवासे तु जित्वा कृष्णामथानयत् । एकश्च पञ्च वर्षाणि शक्रादस्त्राण्यशिक्षत ॥
saindhavaṃ vanavāse tu jitvā kṛṣṇāmathānayat | ekaśca pañca varṣāṇi śakrādastrāṇyaśikṣata
वनवास के समय उसने सिन्धुराज को जीतकर कृष्णा (द्रौपदी) को लौटा लिया; और अकेले पाँच वर्ष तक इन्द्र से अस्त्र-विद्या सीखी।
श्लोक 10 (4.49.10)
एकः सपत्नाञ्जित्वा तु कुरूणामकरोद्यशः । एको गन्धर्वराजानं चित्रसेनमरिन्दमः । विजिग्ये तरसा सङ्ख्ये सेनां चास्य सुदुर्जयाम् ॥
ekaḥ sapatnāñjitvā tu kurūṇāmakarodyaśaḥ | eko gandharvarājānaṃ citrasenamarindamaḥ | vijigye tarasā saṅkhye senāṃ cāsya sudurjayām
अकेले उसने शत्रुओं को जीतकर कुरुओं का यश बढ़ाया; अकेले उस शत्रुदमन ने गन्धर्वराज चित्रसेन को और उसकी दुर्जय सेना को युद्ध में बलपूर्वक पराजित किया।
श्लोक 11 (4.49.11)
पाञ्चाली श्रीमती प्राप्ता क्षत्रं जित्वा स्वयंवरे । आदाय गतवान्पार्थो भवान्क्वनु गतस्तदा ॥
pāñcālī śrīmatī prāptā kṣatraṃ jitvā svayaṃvare | ādāya gatavānpārtho bhavānkvanu gatastadā
स्वयंवर में क्षत्रियों को जीतकर श्रीमती पाञ्चाली प्राप्त की गई, और पार्थ उसे लेकर चला गया। तब तुम कहाँ चले गए थे?
श्लोक 12 (4.49.12)
तथा निवातकवचाः कालकेयाश्च दानवाः । दैवतैरप्यवध्यास्ते एकेन युधि पातिताः ॥
tathā nivātakavacāḥ kālakeyāśca dānavāḥ | daivatairapyavadhyāste ekena yudhi pātitāḥ
इसी प्रकार निवातकवच और कालकेय दानव, जिन्हें देवता भी नहीं मार सकते थे, उसी अकेले के द्वारा युद्ध में मार गिराए गए।
श्लोक 13 (4.49.13)
एकेन हि त्वया कर्ण किं नामेह कृतं पुरा । एकैकेन यथा तेषां भूमिपाला वशे कृताः ॥
ekena hi tvayā karṇa kiṃ nāmeha kṛtaṃ purā | ekaikena yathā teṣāṃ bhūmipālā vaśe kṛtāḥ
पर कर्ण, तुमने अकेले पहले कभी क्या किया है, जैसे उनमें से एक-एक ने अकेले ही राजाओं को अपने वश में किया?
श्लोक 14 (4.49.14)
इन्द्रोऽपि हि न पार्थेन संयुगे योद्धुमर्हति । यस्तेनाशंसते योद्धुं कर्तव्यं तस्य भेषजम् ॥
indro'pi hi na pārthena saṃyuge yoddhumarhati | yastenāśaṃsate yoddhuṃ kartavyaṃ tasya bheṣajam
इन्द्र भी युद्ध में पार्थ से लड़ने योग्य नहीं। जो उससे लड़ने की आशा करता है, उसकी दवा करानी चाहिए।
श्लोक 15 (4.49.15)
आशीविषस्य क्रुद्धस्य पाणिमुद्यम्य दक्षिणम् । अवमुच्य प्रदेशिन्या दंष्ट्रामादातुमिच्छसि ॥
āśīviṣasya kruddhasya pāṇimudyamya dakṣiṇam | avamucya pradeśinyā daṃṣṭrāmādātumicchasi
तुम क्रुद्ध विषधर की ओर दाहिना हाथ उठाकर, असावधानी से, तर्जनी से उसका दाँत उखाड़ना चाहते हो।
श्लोक 16 (4.49.16)
अथवा कुञ्जरं मत्तमेकमेकचरं वने । निरङ्कुशं समारुह्य नगरं यातुमिच्छसि ॥
athavā kuñjaraṃ mattamekamekacaraṃ vane | niraṅkuśaṃ samāruhya nagaraṃ yātumicchasi
अथवा तुम वन में अकेले विचरते मतवाले हाथी पर बिना अंकुश के चढ़कर नगर जाना चाहते हो।
श्लोक 17 (4.49.17)
समिद्धं पावकं चापि घृतमेदोवसाहुतम् । घृताक्तश्चीरवासास्त्वं मध्येनोत्सर्तुमिच्छसि ॥
samiddhaṃ pāvakaṃ cāpi ghṛtamedovasāhutam | ghṛtāktaścīravāsāstvaṃ madhyenotsartumicchasi
अथवा घी में सने, वल्कल पहने तुम घी, मेद और चर्बी की आहुतियों से धधकती अग्नि के बीच से निकल जाना चाहते हो।
श्लोक 18 (4.49.18)
आत्मानं यः समाबध्य कण्ठे बद्ध्वा तथा शिलाम् । समुद्रं प्रतरेद्दोर्भ्यां तत्र किं कर्ण पौरुषम् ॥
ātmānaṃ yaḥ samābadhya kaṇṭhe baddhvā tathā śilām | samudraṃ pratareddorbhyāṃ tatra kiṃ karṇa pauruṣam
जो अपने को बाँधकर और गले में शिला बाँधकर भुजाओं से समुद्र तैरे, कर्ण, उसमें कौन-सा पौरुष है?
श्लोक 19 (4.49.19)
अकृतास्त्रः कृतास्त्रं वै बलवन्तं सुदुर्बलः । तादृशं कर्ण यः पार्थं योद्धुमिच्छेत्स दुर्मतिः ॥
akṛtāstraḥ kṛtāstraṃ vai balavantaṃ sudurbalaḥ | tādṛśaṃ karṇa yaḥ pārthaṃ yoddhumicchetsa durmatiḥ
कर्ण, जो अस्त्र-विद्या से अनजान और अत्यन्त दुर्बल होकर पार्थ जैसे अस्त्रकुशल और बलवान् योद्धा से लड़ना चाहे, वह मूर्ख है।
श्लोक 20 (4.49.20)
अस्माभिरेव निकृतो वर्षाणीह त्रयोदश । सिंहः पाशविनिर्मुक्तो न नः शेषं करिष्यति ॥
asmābhireva nikṛto varṣāṇīha trayodaśa | siṃhaḥ pāśavinirmukto na naḥ śeṣaṃ kariṣyati
हमने ही तेरह वर्षों तक उसके साथ छल किया है। पाश से छूटा वह सिंह हममें से किसी को शेष नहीं छोड़ेगा।
श्लोक 21 (4.49.21)
एकान्ते पार्थमासीनं कूपेऽग्निमिव संवृतम् । अज्ञानादभ्यवस्कन्द्य प्राप्ताः स्मो भयमुत्तमम् ॥
ekānte pārthamāsīnaṃ kūpe'gnimiva saṃvṛtam | ajñānādabhyavaskandya prāptāḥ smo bhayamuttamam
पार्थ कुएँ में ढकी अग्नि की तरह एकान्त में बैठा था; अनजाने में उस पर धावा बोलकर हम बड़े भारी संकट में आ पड़े हैं।
श्लोक 22 (4.49.22)
उत्सृष्टं तूलराशौ तु एकोऽग्निं शमयेत्कथम् । सह युद्ध्यामहे पार्थमागतं युद्धदुर्मदम् ॥
utsṛṣṭaṃ tūlarāśau tu eko'gniṃ śamayetkatham | saha yuddhyāmahe pārthamāgataṃ yuddhadurmadam
रुई के ढेर में छोड़ी गई आग को अकेला कोई कैसे बुझा सकता है? हम सब मिलकर रणोन्मत्त होकर आए पार्थ से युद्ध करें।
श्लोक 23 (4.49.23)
यत्ता वयं पराक्रान्ता व्यूढानीकाः प्रहारिणः । युद्धायावस्थितं पार्थमागतं पाकशासनिम् ॥
yattā vayaṃ parākrāntā vyūḍhānīkāḥ prahāriṇaḥ | yuddhāyāvasthitaṃ pārthamāgataṃ pākaśāsanim
हम सावधान और पराक्रमी होकर, व्यूह बनाकर, प्रहार के लिए तैयार रहें और युद्ध के लिए आकर डटे इन्द्रपुत्र पार्थ का सामना करें।
श्लोक 24 (4.49.24)
यत्ताः सर्वे रथश्रेष्ठं परिवार्य समन्ततः । षड्रथाः परिकीर्यन्तां वज्रपाणिमिवासुराः ॥
yattāḥ sarve rathaśreṣṭhaṃ parivārya samantataḥ | ṣaḍrathāḥ parikīryantāṃ vajrapāṇimivāsurāḥ
हम सब छह रथी सावधान होकर उस श्रेष्ठ रथी को चारों ओर से घेर लें, जैसे असुरों ने वज्रधारी इन्द्र को घेरा था।
श्लोक 25 (4.49.25)
द्रोणो दुर्योधनो भीष्मो भवान्द्रौणिस्तथा वयम् । सर्वे युद्ध्यामहे पार्थं कर्ण मा साहसं कृथाः ॥
droṇo duryodhano bhīṣmo bhavāndrauṇistathā vayam | sarve yuddhyāmahe pārthaṃ karṇa mā sāhasaṃ kṛthāḥ
द्रोण, दुर्योधन, भीष्म, तुम, द्रोणपुत्र और मैं: हम सब मिलकर पार्थ से लड़ें। कर्ण, दुस्साहस मत करो।
श्लोक 26 (4.49.26)
न ह्यसंगत्य समरे पार्थं जेष्यामहे वयम् । संगत्य समरे पार्थं सर्वे जेष्यामहे वयम् ॥
na hyasaṃgatya samare pārthaṃ jeṣyāmahe vayam | saṃgatya samare pārthaṃ sarve jeṣyāmahe vayam
युद्ध में एकजुट हुए बिना हम पार्थ को नहीं जीत सकेंगे; युद्ध में एकजुट होकर हम सब उसे जीत लेंगे।