विराट पर्व · अध्याय 48
कर्ण की आत्मश्लाघा
कर्ण भयभीत कौरव वृद्धों से कहता है कि अर्जुन के साथ कोई भी आए, वह अकेला उसे वैसे ही रोक देगा जैसे तट समुद्र को रोकता है। आत्मप्रशंसा की लम्बी शृंखला में वह अपने बाणों से आकाश के ढक जाने और भौंरों जैसी गुंजार का वर्णन करता है, अर्जुन की ध्वजा के वानर को गिराने, अर्जुन का सिर काटकर दुर्योधन का ऋण चुकाने की प्रतिज्ञा करता है, और कहता है कि परशुराम से पाए अस्त्र के बल पर वह इन्द्र से भी लड़ सकता है। वह कहता है कि कौरव चाहें तो गायें लेकर चले जाएँ, या रथों में खड़े होकर उसका युद्ध देखें।
कर्ण उवाच
श्लोक 1 (4.48.1)
सर्वानायुष्मतो भीतान्संत्रस्तानिव लक्षये । अयुद्धमनसश्चैव सर्वांश्चैवानवस्थितान् ॥
sarvānāyuṣmato bhītānsaṃtrastāniva lakṣaye | ayuddhamanasaścaiva sarvāṃścaivānavasthitān
मैं आप सब आयुष्मानों को डरा हुआ, मानो त्रस्त, युद्ध से विमुख और अस्थिर देख रहा हूँ।
श्लोक 2 (4.48.2)
यद्येष जामदग्न्यो वा यदि वेन्द्रः पुरंदरः । वासुदेवेन सहितो यदि बीभत्सुरागतः । अहमेनं निरोत्स्यामि वेलेव वरुणालयम् ॥
yadyeṣa jāmadagnyo vā yadi vendraḥ puraṃdaraḥ | vāsudevena sahito yadi bībhatsurāgataḥ | ahamenaṃ nirotsyāmi veleva varuṇālayam
चाहे यह जमदग्निपुत्र (परशुराम) हो, या पुरन्दर इन्द्र, या वासुदेव के साथ आया बीभत्सु, मैं इसे वैसे ही रोक दूँगा जैसे तट वरुण के घर समुद्र को रोकता है।
श्लोक 3 (4.48.3)
रुक्मपुङ्खाः प्रसन्नाग्रा मुक्ता हस्तवता मया । छादयन्तु शराः सूर्यं पार्थस्यायुर्निरोधकाः ॥
rukmapuṅkhāḥ prasannāgrā muktā hastavatā mayā | chādayantu śarāḥ sūryaṃ pārthasyāyurnirodhakāḥ
मेरे सधे हाथ से छूटे सुनहरे पंखों और चमकीली नोकों वाले बाण सूर्य को ढक दें और पार्थ के प्राण रोक दें।
श्लोक 4 (4.48.4)
मम चापप्रमुक्तानां शराणां नतपर्वणाम् । निवृत्तिर्गच्छतां नास्ति सर्पाणां श्वसतामिव ॥
mama cāpapramuktānāṃ śarāṇāṃ nataparvaṇām | nivṛttirgacchatāṃ nāsti sarpāṇāṃ śvasatāmiva
मेरे धनुष से छूटे, झुकी गाँठों वाले बाण फुफकारते सर्पों की भाँति एक बार चल पड़ने पर लौटते नहीं।
श्लोक 5 (4.48.5)
शराणां पुङ्खसक्तानां मौर्व्याऽभिहतयोर्भृशम् । श्रूयते तलयोः शब्दो भेर्योराहतयोरिव ॥
śarāṇāṃ puṅkhasaktānāṃ maurvyā'bhihatayorbhṛśam | śrūyate talayoḥ śabdo bheryorāhatayoriva
प्रत्यंचा पर चढ़े बाणों को छोड़ते समय डोरी से ज़ोर से टकराती मेरी हथेलियों का शब्द दो पीटे जाते नगाड़ों जैसा सुनाई देता है।
श्लोक 6 (4.48.6)
एकैकं चतुरः पञ्च क्वचित्षष्टिं क्वचिच्छतम् । हतान्पश्यत मात्स्यानामिषुभिर्निहतान्रथान् ॥
ekaikaṃ caturaḥ pañca kvacitṣaṣṭiṃ kvacicchatam | hatānpaśyata mātsyānāmiṣubhirnihatānrathān
देखो, मेरे बाणों से मारे गए मत्स्यों के रथ: एक-एक, चार, पाँच, कहीं साठ, कहीं सौ।
श्लोक 7 (4.48.7)
मद्बाहुमुक्तैरिषुभिस्तैलधौतैः पतत्रिभिः । खद्योतैरिव संपृक्तमन्तरिक्षं विराजताम् ॥
madbāhumuktairiṣubhistailadhautaiḥ patatribhiḥ | khadyotairiva saṃpṛktamantarikṣaṃ virājatām
मेरी भुजाओं से छूटे, तेल से धुले, पंखदार बाणों से भरा आकाश ऐसे चमके मानो जुगनुओं से भरा हो।
श्लोक 8 (4.48.8)
ध्वजाग्राद्वानरस्तस्य भल्लेनाभिहतो मया । अद्यैव पततां भूमौ विनदन्भैरवान्रवान् ॥
dhvajāgrādvānarastasya bhallenābhihato mayā | adyaiva patatāṃ bhūmau vinadanbhairavānravān
उसकी ध्वजा के सिरे का वानर मेरे भल्ल से आहत होकर आज ही भयानक चीत्कार करता हुआ भूमि पर गिरे।
श्लोक 9 (4.48.9)
शत्रोर्मयाभिपन्नानां भूतानां ध्वजवासिनाम् । दिशः प्रतिष्ठमानानामस्तु शब्दो दिवं गतः ॥
śatrormayābhipannānāṃ bhūtānāṃ dhvajavāsinām | diśaḥ pratiṣṭhamānānāmastu śabdo divaṃ gataḥ
मेरे प्रहार से पीड़ित होकर दिशाओं में भागते, शत्रु की ध्वजा पर बसे भूतों का शब्द स्वर्ग तक पहुँचे।
श्लोक 10 (4.48.10)
क्रुद्धेनास्त्रं मया मुक्तं निर्दहेत्पृथिवीमिमाम् । स्थितं संग्रामशिरसि पार्थमेकाकिनं किमु ॥
kruddhenāstraṃ mayā muktaṃ nirdahetpṛthivīmimām | sthitaṃ saṃgrāmaśirasi pārthamekākinaṃ kimu
क्रोध में मेरा छोड़ा अस्त्र इस पूरी पृथ्वी को जला सकता है; फिर युद्ध के मुहाने पर अकेले खड़े पार्थ की तो बात ही क्या!
श्लोक 11 (4.48.11)
समाहितश्च बीभत्सुर्वर्षाण्यष्टौ च पञ्च च । जातस्नेहश्च युद्धस्य मयि संदर्शयिष्यति ॥
samāhitaśca bībhatsurvarṣāṇyaṣṭau ca pañca ca | jātasnehaśca yuddhasya mayi saṃdarśayiṣyati
आठ और पाँच, अर्थात् तेरह वर्षों तक संयम से रहा बीभत्सु युद्ध की लालसा लिए मुझ पर अपना पराक्रम दिखाएगा।
श्लोक 12 (4.48.12)
पात्रीभूतस्तु कौन्तेयो ब्राह्मणो गुणवानिव । शरमालां स गृह्णातु मत्प्रसृष्टां स्वधामिव ॥
pātrībhūtastu kaunteyo brāhmaṇo guṇavāniva | śaramālāṃ sa gṛhṇātu matprasṛṣṭāṃ svadhāmiva
गुणवान् ब्राह्मण की भाँति सुपात्र बना कुन्तीपुत्र मेरी छोड़ी बाणमाला को वैसे ही ग्रहण करे जैसे पितर स्वधा ग्रहण करते हैं।
श्लोक 13 (4.48.13)
एष चापि महेष्वासस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । अहं चापि नरश्रेष्ठादर्जुनान्नावमः क्वचित् ॥
eṣa cāpi maheṣvāsastriṣu lokeṣu viśrutaḥ | ahaṃ cāpi naraśreṣṭhādarjunānnāvamaḥ kvacit
वह तीनों लोकों में विख्यात महाधनुर्धर है; और मैं भी नरश्रेष्ठ अर्जुन से किसी बात में कम नहीं हूँ।
श्लोक 14 (4.48.14)
मम हस्तप्रमुक्तानां शराणां नतपर्वणाम् । निवृत्तिर्गच्छतां नास्ति वैश्वानरशिखार्चिषाम् ॥
mama hastapramuktānāṃ śarāṇāṃ nataparvaṇām | nivṛttirgacchatāṃ nāsti vaiśvānaraśikhārciṣām
मेरे हाथ से छूटे, अग्नि की लपटों जैसी दीप्तिवाले, झुकी गाँठों के बाण एक बार चलकर लौटते नहीं।
श्लोक 15 (4.48.15)
इतश्चेतश्च मुक्तानां शराणां नतपर्वणाम् । तुमुलः श्रूयतां नादः षट्पदां गायतामिव ॥
itaścetaśca muktānāṃ śarāṇāṃ nataparvaṇām | tumulaḥ śrūyatāṃ nādaḥ ṣaṭpadāṃ gāyatāmiva
इधर-उधर छूटते मेरे झुकी गाँठों वाले बाणों का तुमुल नाद गुंजार करते भौंरों जैसा सुनाई दे।
श्लोक 16 (4.48.16)
अन्तरा संपतद्भिस्तु गृध्रपत्रैः शिलाशितैः । शलभानामिवाकाशे छाया संप्रति दृश्यताम् ॥
antarā saṃpatadbhistu gṛdhrapatraiḥ śilāśitaiḥ | śalabhānāmivākāśe chāyā saṃprati dṛśyatām
बीच-बीच में गिरते, पत्थर पर तेज़ किए, गिद्ध-पंखों वाले मेरे बाणों की छाया अब आकाश में टिड्डी-दल की छाया जैसी दिखाई दे।
श्लोक 17 (4.48.17)
अद्य मत्कार्मुकोत्सृष्टाः शिताः पार्थस्य मर्मगाः । शरीरमुपसर्पन्तु वल्मीकमिव पन्नगाः ॥
adya matkārmukotsṛṣṭāḥ śitāḥ pārthasya marmagāḥ | śarīramupasarpantu valmīkamiva pannagāḥ
आज मेरे धनुष से छूटे तीखे, मर्मभेदी बाण पार्थ के शरीर में वैसे ही घुसें जैसे साँप बाँबी में घुसते हैं।
श्लोक 18 (4.48.18)
बर्हिबर्हिणराजानां बर्हिणां बर्हिणामिव । पततां पततां घोषः पततां पततामिव ॥
barhibarhiṇarājānāṃ barhiṇāṃ barhiṇāmiva | patatāṃ patatāṃ ghoṣaḥ patatāṃ patatāmiva
मोर-पंखों से सजे, एक के पीछे एक गिरते मेरे बाणों का घोष, मोर के पीछे चलते मोरों की भाँति, उड़ते पक्षियों के कलरव जैसा सुनाई दे।
श्लोक 19 (4.48.19)
अद्य त्वहमृणान्मोक्ष्ये यन्मया तत्प्रतिश्रुतम् । धार्तराष्ट्रस्य तत्काले निहत्य समरेऽर्जुनम् ॥
adya tvahamṛṇānmokṣye yanmayā tatpratiśrutam | dhārtarāṣṭrasya tatkāle nihatya samare'rjunam
आज समर में अर्जुन को मारकर मैं धृतराष्ट्रपुत्र को दिए अपने वचन के ऋण से इसी समय मुक्त हो जाऊँगा।
श्लोक 20 (4.48.20)
इन्द्राशनिसमस्पर्शं महेन्द्रसमविक्रमम् । अर्दयिष्याम्यहं पार्थमुल्काभिरिव कुञ्जरम् ॥
indrāśanisamasparśaṃ mahendrasamavikramam | ardayiṣyāmyahaṃ pārthamulkābhiriva kuñjaram
जिसका स्पर्श इन्द्र के वज्र जैसा और पराक्रम महेन्द्र जैसा है, उस पार्थ को मैं वैसे ही पीड़ित करूँगा जैसे जलती मशालों से हाथी को पीड़ित किया जाता है।
श्लोक 21 (4.48.21)
शरजालमहाज्वालमसिशक्तिगदेन्धनम् । निर्दहन्तमनीकानि शमयिष्येऽर्जुनानलम् ॥
śarajālamahājvālamasiśaktigadendhanam | nirdahantamanīkāni śamayiṣye'rjunānalam
बाणों के जाल जिसकी विशाल लपटें हैं, तलवार, शक्ति और गदाएँ जिसका ईंधन हैं, और जो सेनाओं को जला रही है, उस अर्जुन-रूपी अग्नि को मैं शान्त कर दूँगा।
श्लोक 22 (4.48.22)
रथादतिरथं लोके सर्वशस्त्रभृतांवरम् । विवशं पार्थमादास्ये गरुत्मानिव पन्नगम् ॥
rathādatirathaṃ loke sarvaśastrabhṛtāṃvaram | vivaśaṃ pārthamādāsye garutmāniva pannagam
संसार के अतिरथी, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ पार्थ को मैं विवश करके उसके रथ से वैसे ही उठा लूँगा जैसे गरुड़ सर्प को उठा ले जाता है।
श्लोक 23 (4.48.23)
क्षुद्रकैर्विविधैर्भल्लैर्निपतद्भिश्च मामकैः । संमूढचेताः कौन्तेयः कर्तव्यं नाभिपद्यताम् ॥
kṣudrakairvividhairbhallairnipatadbhiśca māmakaiḥ | saṃmūḍhacetāḥ kaunteyaḥ kartavyaṃ nābhipadyatām
मेरे बरसते हुए अनेक प्रकार के छोटे बाणों और भल्लों से कुन्तीपुत्र का चित्त ऐसा मूढ़ हो जाए कि उसे कुछ करते न सूझे।
श्लोक 24 (4.48.24)
अद्य दुर्योधनस्याहं शोकं हृदि चिरं स्थितम् । समूलमपनेष्यामि हरन्पार्थशिरः शरैः ॥
adya duryodhanasyāhaṃ śokaṃ hṛdi ciraṃ sthitam | samūlamapaneṣyāmi haranpārthaśiraḥ śaraiḥ
आज बाणों से पार्थ का सिर काटकर मैं दुर्योधन के हृदय में चिरकाल से बसे शोक को जड़ से मिटा दूँगा।
श्लोक 25 (4.48.25)
अद्य मत्कार्मुकोत्सृष्टैर्भल्लैश्च नतपर्वभिः । हताश्वं विरथं पार्थं पौरुषे पर्यवस्थितम् । निश्वसन्तं यथा नागमद्य पश्यन्तु कौरवाः ॥
adya matkārmukotsṛṣṭairbhallaiśca nataparvabhiḥ | hatāśvaṃ virathaṃ pārthaṃ pauruṣe paryavasthitam | niśvasantaṃ yathā nāgamadya paśyantu kauravāḥ
आज कौरव देखें कि मेरे धनुष से छूटे झुकी गाँठों वाले भल्लों से पार्थ के घोड़े मारे गए हैं, वह रथहीन है, केवल अपने पौरुष के सहारे खड़ा है और सर्प की भाँति लम्बी साँसें ले रहा है।
श्लोक 26 (4.48.26)
जामदग्न्यान्मया लब्धं दिव्यास्त्रमृषिसत्तमात् । तदुपाश्रित्य वीर्यं च युध्येयमपि वासवम् ॥
jāmadagnyānmayā labdhaṃ divyāstramṛṣisattamāt | tadupāśritya vīryaṃ ca yudhyeyamapi vāsavam
मैंने ऋषिश्रेष्ठ जमदग्निपुत्र से दिव्य अस्त्र पाया है; उसके और अपने पराक्रम के भरोसे मैं इन्द्र से भी लड़ सकता हूँ।
श्लोक 27 (4.48.27)
ध्वजाग्रे वानरस्तिष्ठन्भल्लेन निहतो मया । अद्यैव पततां भूमौ विनदन्भैरवान्रवान् ॥
dhvajāgre vānarastiṣṭhanbhallena nihato mayā | adyaiva patatāṃ bhūmau vinadanbhairavānravān
उसकी ध्वजा के सिरे पर बैठा वानर मेरे भल्ल से आहत होकर आज ही भयानक चीत्कार करता हुआ भूमि पर गिरे।
श्लोक 28 (4.48.28)
कामं गच्छन्तु कुरवो गाः प्रगृह्य परंतपाः । रथेषु वाऽपि तिष्ठन्तो युद्धं पश्यन्तु मामकम् ॥
kāmaṃ gacchantu kuravo gāḥ pragṛhya paraṃtapāḥ | ratheṣu vā'pi tiṣṭhanto yuddhaṃ paśyantu māmakam
परंतप कौरव चाहें तो गायों को लेकर चले जाएँ, या अपने रथों में खड़े रहकर मेरा युद्ध देखें।