विराट पर्व · अध्याय 47
दुर्योधन द्वारा आचार्य की आशंकाओं का तिरस्कार
दुर्योधन भीष्म, द्रोण और कृप के सामने द्रोण को उत्तर देता है। वह कहता है कि अज्ञातवास का तेरहवाँ वर्ष अभी पूरा नहीं हुआ, इसलिए यदि अर्जुन प्रकट हो गया है तो पाण्डवों को फिर बारह वर्ष वन में रहना होगा; और वह त्रिगर्तों के साथ तय हुई योजना याद दिलाता है कि विराट के गोधन पर दोनों ओर से धावा बोला जाए। जो भी आया हो, युद्ध करना ही है; वह द्रोण पर अर्जुन का पक्ष लेने और सेना को डराने का आरोप लगाता है, विद्वान् आचार्यों को केवल महलों और भोजों के योग्य बताकर उनका उपहास करता है, और गायों को आगे भेजने तथा सेना को व्यूह में खड़ा करने का आदेश देता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.47.1)
ततो दुर्योधनो राजा समरे भीष्ममब्रवीत् । द्रोणं च रथिशार्दूलं कृपं च सुमहाबलम् ॥
tato duryodhano rājā samare bhīṣmamabravīt | droṇaṃ ca rathiśārdūlaṃ kṛpaṃ ca sumahābalam
तब रणभूमि में राजा दुर्योधन ने भीष्म से, रथियों में सिंह के समान द्रोण से और महाबली कृप से कहा:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 2 (4.47.2)
उक्तोऽयमर्थ आचार्य मया कर्णेन चासकृत् । पुनरेव च वक्ष्यामि न हि तृप्यामि तद्ब्रुवन् ॥
ukto'yamartha ācārya mayā karṇena cāsakṛt | punareva ca vakṣyāmi na hi tṛpyāmi tadbruvan
आचार्य, यह बात मैं और कर्ण बार-बार कह चुके हैं; फिर भी एक बार और कहूँगा, क्योंकि इसे कहते हुए मेरा मन नहीं भरता।
श्लोक 3 (4.47.3)
पराजितैर्विवस्तव्यं तैश्च द्वादशवत्सरान् । वने जनपदेऽज्ञातैरेष एव पणो हि नः ॥
parājitairvivastavyaṃ taiśca dvādaśavatsarān | vane janapade'jñātaireṣa eva paṇo hi naḥ
हारने पर उन्हें बारह वर्ष वन में और फिर किसी जनपद में अज्ञात रहकर निर्वासन बिताना था: यही हमारी शर्त थी।
श्लोक 4 (4.47.4)
तेषां न तावन्निर्वृत्तो वत्सरः स त्रयोदशः । अज्ञातवासे बीभत्सुरथास्माभिः परिश्रुतः ॥
teṣāṃ na tāvannirvṛtto vatsaraḥ sa trayodaśaḥ | ajñātavāse bībhatsurathāsmābhiḥ pariśrutaḥ
उनका वह तेरहवाँ वर्ष अभी पूरा नहीं हुआ, फिर भी अज्ञातवास के समय में ही हमें बीभत्सु का पता चल गया है।
श्लोक 5 (4.47.5)
अनिर्वृत्ते तु निर्वासे यदि बीभत्सुरागतः । पुनर्द्वादशवर्षाणि वने वत्स्यन्ति पाण्डवाः ॥
anirvṛtte tu nirvāse yadi bībhatsurāgataḥ | punardvādaśavarṣāṇi vane vatsyanti pāṇḍavāḥ
यदि निर्वासन पूरा होने से पहले बीभत्सु सामने आ गया है, तो पाण्डव फिर बारह वर्ष वन में रहेंगे।
श्लोक 6 (4.47.6)
लोभाद्वा ते न जानीयुरस्मान्वा मोह आविशत् । हीनातिरिक्तमेतेषां भीष्मो वेदितुमर्हति ॥
lobhādvā te na jānīyurasmānvā moha āviśat | hīnātiriktameteṣāṃ bhīṣmo veditumarhati
या तो लोभवश उन्हें समय का ठीक ज्ञान नहीं रहा, या हम पर मोह छा गया है। उनकी अवधि कम पड़ी है या अधिक हो गई है, यह भीष्म बता सकते हैं।
श्लोक 7 (4.47.7)
अर्थानां हि पुनर्द्वैधे नित्यं भवति संशयः । अन्यथा चिन्तितो ह्यर्थः पुनर्भवति चान्यथा ॥
arthānāṃ hi punardvaidhe nityaṃ bhavati saṃśayaḥ | anyathā cintito hyarthaḥ punarbhavati cānyathā
जब किसी विषय के दो पक्ष हों तो सदा संशय बना रहता है; जो बात एक प्रकार सोची जाती है, वह दूसरी प्रकार निकलती है।
श्लोक 8 (4.47.8)
उत्तरं मार्गमाणानां मात्स्यसेनां युयुत्सताम् । यदि बीभत्सुरायातः किंतु कृत्यमतः परम् ॥
uttaraṃ mārgamāṇānāṃ mātsyasenāṃ yuyutsatām | yadi bībhatsurāyātaḥ kiṃtu kṛtyamataḥ param
हम उत्तर दिशा के गोधन को खोजते हुए मत्स्य-सेना से लड़ने आए थे। यदि बीभत्सु आ गया है, तो इसके आगे हमारे लिए और करने को क्या है?
श्लोक 9 (4.47.9)
त्रिगर्तानां कृतं कार्यं पाण्डवानां च मार्गणम् । विप्रकारैर्हि मात्स्येन सुशर्मा बाधितः पुरा ॥
trigartānāṃ kṛtaṃ kāryaṃ pāṇḍavānāṃ ca mārgaṇam | viprakārairhi mātsyena suśarmā bādhitaḥ purā
हमने त्रिगर्तों का काम और पाण्डवों की खोज, दोनों का बीड़ा उठाया था, क्योंकि मत्स्यराज ने पहले अनेक उत्पीड़नों से सुशर्मा को सताया था।
श्लोक 10 (4.47.10)
तेषां भयाभिपन्नानां त्रस्तानां त्राणमिच्छताम् । अभयं याचमानानां तदाऽस्माभिः परिश्रुतम् ॥
teṣāṃ bhayābhipannānāṃ trastānāṃ trāṇamicchatām | abhayaṃ yācamānānāṃ tadā'smābhiḥ pariśrutam
वे भय से ग्रस्त थे, त्रस्त थे, रक्षा चाहते थे और अभय की याचना कर रहे थे; तब हमने उन्हें वचन दिया था:
श्लोक 11 (4.47.11)
प्रथमं तैर्ग्रहीतव्यं मात्स्यानां गोधनं महत् । अष्टम्याश्चापराह्णे तु इति नस्तैः समाहितम् ॥
prathamaṃ tairgrahītavyaṃ mātsyānāṃ godhanaṃ mahat | aṣṭamyāścāparāhṇe tu iti nastaiḥ samāhitam
कि वे पहले अष्टमी के अपराह्न में मत्स्यों का विशाल गोधन पकड़ेंगे; उनके साथ यही तय हुआ था;
श्लोक 12 (4.47.12)
नवम्यां पुनरस्माभिः सूर्यस्योदयनं प्रति । इमा गावो ग्रहीतव्या याते मत्स्ये गवांपदम् ॥
navamyāṃ punarasmābhiḥ sūryasyodayanaṃ prati | imā gāvo grahītavyā yāte matsye gavāṃpadam
और नवमी को सूर्योदय के समय, जब मत्स्यराज गायों के पीछे चला जाएगा, तब हम इन गायों को पकड़ेंगे।
श्लोक 13 (4.47.13)
इत्येवं निश्चयोऽस्माकं मन्त्रोऽभून्नागसाह्वये । पाण्डवानां परिज्ञाने सर्वेषां नः परस्परम् ॥
ityevaṃ niścayo'smākaṃ mantro'bhūnnāgasāhvaye | pāṇḍavānāṃ parijñāne sarveṣāṃ naḥ parasparam
पाण्डवों का पता लगाने के लिए हस्तिनापुर में हम सबने आपस में मिलकर यही निश्चय और यही मन्त्रणा की थी।
श्लोक 14 (4.47.14)
ते वा गाश्च नयिष्यन्ति यदि वा स्युः पराजिताः । अस्मान्वाऽप्यतिसन्धाय कुर्युर्मात्स्येन संगतिम् ॥
te vā gāśca nayiṣyanti yadi vā syuḥ parājitāḥ | asmānvā'pyatisandhāya kuryurmātsyena saṃgatim
या तो वे गायों को ले जा रहे होंगे, या पराजित हो गए होंगे, या फिर हमें धोखा देकर उन्होंने मत्स्यराज से मेल कर लिया होगा।
श्लोक 15 (4.47.15)
अथवा तानुपादाय मात्स्यो जानपदैः सह । सर्वथा सेनया सार्धमस्मानेष युयुत्सति ॥
athavā tānupādāya mātsyo jānapadaiḥ saha | sarvathā senayā sārdhamasmāneṣa yuyutsati
अथवा मत्स्यराज उन्हें और अपनी प्रजा को साथ लेकर पूरी सेना के साथ हमसे युद्ध करना चाहता है।
श्लोक 16 (4.47.16)
तेषामेको महावीर्यः कश्चिदेव पुरःसरः । अस्माञ्जेतुमिहायातो मात्स्यो वाऽपि स्वयं भवेत् ॥
teṣāmeko mahāvīryaḥ kaścideva puraḥsaraḥ | asmāñjetumihāyāto mātsyo vā'pi svayaṃ bhavet
उनमें से कोई एक महापराक्रमी योद्धा अगुआ बनकर हमें जीतने यहाँ आया है, या स्वयं मत्स्यराज भी हो सकता है।
श्लोक 17 (4.47.17)
यद्येष राजा मात्स्यानां यदि बीभत्सुरागतः । सर्वैर्योद्धव्यमस्माभिरिति नः समयः कृतः ॥
yadyeṣa rājā mātsyānāṃ yadi bībhatsurāgataḥ | sarvairyoddhavyamasmābhiriti naḥ samayaḥ kṛtaḥ
चाहे यह मत्स्यराज हो या बीभत्सु आया हो, हम सबको लड़ना ही है: यही हमारा समझौता था।
श्लोक 18 (4.47.18)
अथ कस्मात्स्थिता ह्येते रथेषु रथिसत्तमाः । भीष्मद्रोणकृपाः कर्णो विकर्णो द्रौणिरेव च । संभ्रान्तमनसः सर्वे प्राप्ते ह्यस्मिन्धनञ्जये ॥
atha kasmātsthitā hyete ratheṣu rathisattamāḥ | bhīṣmadroṇakṛpāḥ karṇo vikarṇo drauṇireva ca | saṃbhrāntamanasaḥ sarve prāpte hyasmindhanañjaye
तब ये श्रेष्ठ रथी, भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, विकर्ण और द्रोणपुत्र, धनञ्जय के आ जाने पर सब घबराए मन से रथों में क्यों खड़े हैं?
श्लोक 19 (4.47.19)
नान्यत्र युद्धाच्छ्रेयोऽस्ति तथाऽऽत्मा प्रणिधीयताम् । सर्वलोकेन वा युद्धं देवैर्वाऽस्तु सवासवैः ॥
nānyatra yuddhācchreyo'sti tathā''tmā praṇidhīyatām | sarvalokena vā yuddhaṃ devairvā'stu savāsavaiḥ
युद्ध के सिवा कोई श्रेयस्कर मार्ग नहीं, इसलिए मन को उसी में लगाइए, चाहे युद्ध सारे संसार से हो या इन्द्र सहित देवताओं से।
श्लोक 20 (4.47.20)
अनाच्छिन्ने धनेऽस्माकमथ शक्रेण वज्रिणा । यमेन वाऽपि संग्रामे को हास्तिनपुरं व्रजेत् ॥
anācchinne dhane'smākamatha śakreṇa vajriṇā | yamena vā'pi saṃgrāme ko hāstinapuraṃ vrajet
गोधन छीने बिना कौन हस्तिनापुर लौटेगा, चाहे युद्ध में वज्रधारी इन्द्र से भिड़ना पड़े या यम से?
श्लोक 21 (4.47.21)
शरैरभिप्रणुन्नानां भग्नानां गहने वने । को हि जीवेत्पदातीनां भवेदश्वेषु संशयः ॥
śarairabhipraṇunnānāṃ bhagnānāṃ gahane vane | ko hi jīvetpadātīnāṃ bhavedaśveṣu saṃśayaḥ
घने वन में बाणों से खदेड़े और तितर-बितर हुए पैदल सैनिकों में से कौन जीवित बचेगा? घोड़ों के विषय में भी संदेह है।
श्लोक 22 (4.47.22)
आचार्यं पृष्ठतः कृत्वा तथा नीतिर्विधीयताम् । जानामि च मतं तेषामतस्त्रासयतीव नः ॥
ācāryaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā tathā nītirvidhīyatām | jānāmi ca mataṃ teṣāmatastrāsayatīva naḥ
आचार्य को पीछे रखकर वैसी ही नीति बनाइए। मैं उन लोगों का मन जानता हूँ; इसीलिए वे हमें मानो डरा रहे हैं।
श्लोक 23 (4.47.23)
अर्जुने चापि संप्रीतिमधिकामुपलक्षये । तथा दृष्ट्वा हि बीभत्सुमुपायान्तं प्रशंसति । यथा सेना न भज्येत तथा नीतिर्विधीयताम् ॥
arjune cāpi saṃprītimadhikāmupalakṣaye | tathā dṛṣṭvā hi bībhatsumupāyāntaṃ praśaṃsati | yathā senā na bhajyeta tathā nītirvidhīyatām
मैं यह भी देखता हूँ कि अर्जुन पर उनका विशेष स्नेह है, क्योंकि बीभत्सु को आते देखकर वे उसकी प्रशंसा करते हैं। ऐसी नीति बनाइए कि सेना टूटे नहीं।
श्लोक 24 (4.47.24)
अदेशिका ह्यरण्येऽस्मिन्कृच्छ्रे शत्रुवशं गता । यथा न विभ्रमेत्सेना तथा नीतिर्विधीयताम् ॥
adeśikā hyaraṇye'sminkṛcchre śatruvaśaṃ gatā | yathā na vibhrametsenā tathā nītirvidhīyatām
इस वन में सेना के पास कोई मार्गदर्शक नहीं; वह संकट में है और शत्रु के वश में आ गई है। ऐसी नीति बनाइए कि सेना भ्रमित न हो।
श्लोक 25 (4.47.25)
अश्वानां हेषितं श्रुत्वा का प्रशंसा भवेत्परे । स्थाने वाऽपि व्रजन्तो वा सदा हेषन्ति वाजिनः ॥
aśvānāṃ heṣitaṃ śrutvā kā praśaṃsā bhavetpare | sthāne vā'pi vrajanto vā sadā heṣanti vājinaḥ
घोड़ों की हिनहिनाहट सुनकर शत्रु की क्या प्रशंसा? घोड़े तो खड़े हों या चलते हों, सदा हिनहिनाते ही हैं।
श्लोक 26 (4.47.26)
सदा च वायवो वान्ति नित्यं वर्षति वासवः । स्तनयित्नोश्च निर्घोषः श्रूयते बहुशस्तथा ॥
sadā ca vāyavo vānti nityaṃ varṣati vāsavaḥ | stanayitnośca nirghoṣaḥ śrūyate bahuśastathā
हवाएँ सदा चलती हैं, इन्द्र नित्य बरसते हैं, और मेघ की गर्जना भी बहुत बार सुनाई देती है।
श्लोक 27 (4.47.27)
भीषयन्पाण्डवेयेभ्यो भवान्सर्वानिमाञ्जनान् । प्रमुखे सर्वसैन्यानामबद्धं बहु भाषते ॥
bhīṣayanpāṇḍaveyebhyo bhavānsarvānimāñjanān | pramukhe sarvasainyānāmabaddhaṃ bahu bhāṣate
पाण्डवों के नाम पर आप इन सब लोगों को डरा रहे हैं, और समस्त सेना के सामने बहुत-सी अनर्गल बातें कह रहे हैं।
श्लोक 28 (4.47.28)
यथैवाश्वान्मार्गमाणास्तानेवाभिपरीप्सवः । हेषितानीव शृण्वन्ति तदिदं भवतस्तथा ॥
yathaivāśvānmārgamāṇāstānevābhiparīpsavaḥ | heṣitānīva śṛṇvanti tadidaṃ bhavatastathā
जैसे घोड़ों को खोजनेवाले, उन्हीं घोड़ों को पाने की लालसा में, मानो उनकी हिनहिनाहट सुनते रहते हैं, वैसा ही हाल आपका है।
श्लोक 29 (4.47.29)
किमत्र कार्यं पार्थस्य कथं वा स प्रशस्यते । अन्यत्र कामाद्द्वेषाद्वा रोषाद्वाऽस्मासु केवलम् ॥
kimatra kāryaṃ pārthasya kathaṃ vā sa praśasyate | anyatra kāmāddveṣādvā roṣādvā'smāsu kevalam
इसमें पार्थ का क्या काम, और उसकी प्रशंसा क्यों की जा रही है, सिवा इसके कि यह उसके प्रति प्रेम से हो, या केवल हमारे प्रति द्वेष या रोष से?
श्लोक 30 (4.47.30)
आचार्या वै कारुणिकाः प्राज्ञाश्चापायदर्शिनः । नैते महाहवे घोरे संप्रष्टव्याः कथंचन ॥
ācāryā vai kāruṇikāḥ prājñāścāpāyadarśinaḥ | naite mahāhave ghore saṃpraṣṭavyāḥ kathaṃcana
आचार्य दयालु, बुद्धिमान् और विपत्तियों को पहले से देखनेवाले होते हैं; घोर महायुद्ध में उनसे कभी सलाह नहीं लेनी चाहिए।
श्लोक 31 (4.47.31)
प्रासादेषु विचित्रेषु गोष्ठीपानाशनेषु च । कथा विचित्राः कुर्वाणाः पण्डितास्तत्र शोभनाः ॥
prāsādeṣu vicitreṣu goṣṭhīpānāśaneṣu ca | kathā vicitrāḥ kurvāṇāḥ paṇḍitāstatra śobhanāḥ
सुन्दर महलों में, खान-पान की गोष्ठियों में, विचित्र कथाएँ कहते हुए: वहीं पण्डित शोभा पाते हैं।
श्लोक 32 (4.47.32)
बहून्याश्चर्यरूपाणि कुर्वते जनसंसदि । इष्वस्त्रे चापसंधाने पण्डितास्तत्र शोभनाः ॥
bahūnyāścaryarūpāṇi kurvate janasaṃsadi | iṣvastre cāpasaṃdhāne paṇḍitāstatra śobhanāḥ
जनसभा में अनेक आश्चर्यजनक करतब दिखाने में, बाण-विद्या में और धनुष पर बाण चढ़ाने में: वहीं पण्डित शोभा पाते हैं।
श्लोक 33 (4.47.33)
परेषां विवरज्ञाने मनुष्याचरितेषु च । अन्नसंस्कारदोषेषु पण्डितास्तत्र शोभनाः ॥
pareṣāṃ vivarajñāne manuṣyācariteṣu ca | annasaṃskāradoṣeṣu paṇḍitāstatra śobhanāḥ
दूसरों के छिद्र खोजने में, मनुष्यों के आचरण में और भोजन बनाने के दोषों में: वहीं पण्डित शोभा पाते हैं।
श्लोक 34 (4.47.34)
पण्डितान्पृष्ठतः कृत्वा परेषां गुणवादिनः । विधीयतां तथा नीतिर्यथा वध्येत वै परः ॥
paṇḍitānpṛṣṭhataḥ kṛtvā pareṣāṃ guṇavādinaḥ | vidhīyatāṃ tathā nītiryathā vadhyeta vai paraḥ
शत्रु के गुण गानेवाले पण्डितों को पीछे रखकर ऐसी नीति बनाई जाए जिससे शत्रु मारा जाए।
श्लोक 35 (4.47.35)
गावश्चैताः प्रतिष्ठन्तां सेनां व्यूहन्तु माचिरम् । आरक्षाश्च विधीयन्तां यत्र योत्स्यामहे परैः ॥
gāvaścaitāḥ pratiṣṭhantāṃ senāṃ vyūhantu māciram | ārakṣāśca vidhīyantāṃ yatra yotsyāmahe paraiḥ
इन गायों को आगे रवाना कर दिया जाए, सेना बिना देर किए व्यूह में खड़ी हो, और जहाँ हम शत्रुओं से लड़ेंगे वहाँ रक्षक नियुक्त किए जाएँ।