विराट पर्व · अध्याय 60
अश्वत्थामा पर अर्जुन की बढ़त
अर्जुन अश्वत्थामा के आक्रमण का सामना करते हैं, और दोनों में देवासुर-संग्राम जैसा युद्ध होता है, जिसमें बाणों से आकाश ढक जाता है। अश्वत्थामा अर्जुन की प्रत्यंचा पर प्रहार करके देवताओं की प्रशंसा पाता है; अर्जुन गाण्डीव पर फिर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसका धनुष, सारथि और घोड़ा काट डालते हैं, और चकित कौरवों के सामने युद्ध फिर छिड़ जाता है। अर्जुन के दो दिव्य तूणीर कभी खाली नहीं होते, जबकि अश्वत्थामा के बाण समाप्त हो जाते हैं, और इस प्रकार अर्जुन भारी पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.60.1)
तं पार्थः प्रतिजग्राह वायुवेगमिवाचलः । शरजालेन महता वर्षमाण इवाम्बुदः ॥
taṃ pārthaḥ pratijagrāha vāyuvegamivācalaḥ | śarajālena mahatā varṣamāṇa ivāmbudaḥ
पार्थ ने उसका सामना वैसे ही किया जैसे पर्वत आँधी के वेग का करता है, और बरसते मेघ के समान बाणों के विशाल जाल से उसे घेर लिया।
श्लोक 2 (4.60.2)
तयोर्देवासुरसमः सन्निपातो महानभूत् । किरतोः शरजालानि वृत्रवासवयोरिव ॥
tayordevāsurasamaḥ sannipāto mahānabhūt | kiratoḥ śarajālāni vṛtravāsavayoriva
एक-दूसरे पर बाणों के जाल फेंकते उन दोनों के बीच देवासुर-संग्राम जैसा, वृत्र और इन्द्र के युद्ध जैसा भारी संघर्ष हुआ।
श्लोक 3 (4.60.3)
न स्म सूर्यस्तदा भाति न च वाति समीरणः । शरगाढे कृते व्योम्नि छायाभूतमिवाभवत् ॥
na sma sūryastadā bhāti na ca vāti samīraṇaḥ | śaragāḍhe kṛte vyomni chāyābhūtamivābhavat
न सूर्य चमकता था, न वायु चलती थी; बाणों से आकाश के ठसाठस भर जाने पर सब कुछ छाया-सा हो गया।
श्लोक 4 (4.60.4)
महांश्चटचटाशब्दो योधयोर्युध्यमानयोः । दह्यतामिव वेणूनामासीत्परमदारुणः ॥
mahāṃścaṭacaṭāśabdo yodhayoryudhyamānayoḥ | dahyatāmiva veṇūnāmāsītparamadāruṇaḥ
उन दोनों योद्धाओं के युद्ध करते समय जलते बाँसों जैसी अत्यन्त भयंकर चटचट ध्वनि होने लगी।
श्लोक 5 (4.60.5)
हयांस्तस्यार्जुनः सङ्ख्ये कृतवानल्पतेजसः । ते राजन्न प्रजानन्ति दिशं कांचन मोहिताः ॥
hayāṃstasyārjunaḥ saṅkhye kṛtavānalpatejasaḥ | te rājanna prajānanti diśaṃ kāṃcana mohitāḥ
हे राजन्, अर्जुन ने युद्ध में उसके घोड़ों को शक्तिहीन कर दिया; मोहित होकर वे दिशाओं को पहचान ही नहीं पाते थे।
श्लोक 6 (4.60.6)
ततो द्रौणिर्महावीर्यः पार्थस्य विचरिष्यतः । विवरं सूक्ष्ममालोक्य ज्यां नुनोद क्षुरेण सः ॥
tato drauṇirmahāvīryaḥ pārthasya vicariṣyataḥ | vivaraṃ sūkṣmamālokya jyāṃ nunoda kṣureṇa saḥ
तब महापराक्रमी द्रोणपुत्र ने विचरते हुए पार्थ में एक सूक्ष्म छिद्र देखकर क्षुरप्र बाण से उनकी प्रत्यंचा पर प्रहार किया।
श्लोक 7 (4.60.7)
तदस्यापूजयन्देवाः कर्म दृष्ट्वाऽतिमानुषम् । न शक्तोऽन्यः पुमान्स्थातुमृते द्रौणेर्धनंजयम् ॥
tadasyāpūjayandevāḥ karma dṛṣṭvā'timānuṣam | na śakto'nyaḥ pumānsthātumṛte drauṇerdhanaṃjayam
उस अलौकिक कर्म को देखकर देवताओं ने उसकी प्रशंसा की — द्रोणपुत्र के सिवा कोई दूसरा पुरुष धनंजय के सामने टिक नहीं सकता था।
श्लोक 8 (4.60.8)
ततो द्रौणिर्धनुर्व्यस्य व्यपक्रम्य नरर्षभः । पुनरप्यभ्यहन्पार्थं हृदये कङ्कपत्रिभिः ॥
tato drauṇirdhanurvyasya vyapakramya nararṣabhaḥ | punarapyabhyahanpārthaṃ hṛdaye kaṅkapatribhiḥ
तब नरश्रेष्ठ द्रोणपुत्र ने कुछ पीछे हटकर धनुष चलाया और फिर कंकपत्र वाले बाणों से पार्थ की छाती पर प्रहार किया।
श्लोक 9 (4.60.9)
ततः पार्थो महाबाहुः प्रहसन्स्वनवत्तदा । योजयामास च तदा मौर्व्या गाण्डीवमोजसा ॥
tataḥ pārtho mahābāhuḥ prahasansvanavattadā | yojayāmāsa ca tadā maurvyā gāṇḍīvamojasā
तब महाबाहु पार्थ ने ठहाका लगाते हुए बलपूर्वक गाण्डीव पर प्रत्यंचा चढ़ाई।
श्लोक 10 (4.60.10)
तं दृष्ट्वा क्रुद्धमायान्तं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् । क्रुद्धः समाह्वयामास द्रौणिर्युद्धाय भारत ॥
taṃ dṛṣṭvā kruddhamāyāntaṃ prabhinnamiva kuñjaram | kruddhaḥ samāhvayāmāsa drauṇiryuddhāya bhārata
हे भारत, उन्हें मद से उन्मत्त हाथी की भाँति क्रोध में आते देखकर द्रोणपुत्र ने भी क्रुद्ध होकर उन्हें युद्ध के लिए ललकारा।
श्लोक 11 (4.60.11)
ततोऽर्धचन्द्रमाहृत्य तेन पार्थः समाहतः । चिच्छेद तस्य चापं च सूतं चाश्वं च तेजसा । विव्याध निशितैश्चापि शरैराशीविषोपमैः ॥
tato'rdhacandramāhṛtya tena pārthaḥ samāhataḥ | ciccheda tasya cāpaṃ ca sūtaṃ cāśvaṃ ca tejasā | vivyādha niśitaiścāpi śarairāśīviṣopamaiḥ
तब उसके प्रहार से आहत पार्थ ने अर्धचन्द्र बाण लेकर अपने तेज से उसका धनुष, सारथि और घोड़ा काट गिराए, और विषधर सर्पों जैसे तीखे बाणों से उसे बेध दिया।
श्लोक 12 (4.60.12)
सोऽन्यं रथं समास्थाय प्रत्यायाद्रथिपुङ्गवः । वारणेनेव मत्तेन मत्तो वारणयूथपः ॥
so'nyaṃ rathaṃ samāsthāya pratyāyādrathipuṅgavaḥ | vāraṇeneva mattena matto vāraṇayūthapaḥ
दूसरे रथ पर चढ़कर वह रथिश्रेष्ठ फिर लौट आया, जैसे मतवाले हाथी से भिड़ने के लिए यूथपति मतवाला हाथी आता है।
श्लोक 13 (4.60.13)
ततः प्रववृते युद्धं पृथिव्यामेकवीरयोः । रणमध्ये द्वयोरेव सुमहद्रोमहर्षणम् ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ pṛthivyāmekavīrayoḥ | raṇamadhye dvayoreva sumahadromaharṣaṇam
तब रणभूमि के बीच पृथ्वी के उन दो अद्वितीय वीरों में अत्यन्त रोमांचकारी महायुद्ध छिड़ गया।
श्लोक 14 (4.60.14)
तौ वीरौ कुरवः सर्वे ददृशुर्विस्मयान्विताः । युध्यमानौ महात्मानौ द्विरदाविव संगतौ ॥
tau vīrau kuravaḥ sarve dadṛśurvismayānvitāḥ | yudhyamānau mahātmānau dviradāviva saṃgatau
सब कौरव विस्मित होकर उन दोनों महात्मा वीरों को परस्पर भिड़े दो हाथियों की भाँति लड़ते देखते रहे।
श्लोक 15 (4.60.15)
तौ समाजघ्नतुर्वीरौ परस्परजयैषिणौ । शरैराशीविषाकारैर्ज्वलद्भिरिव पावकैः ॥
tau samājaghnaturvīrau parasparajayaiṣiṇau | śarairāśīviṣākārairjvaladbhiriva pāvakaiḥ
एक-दूसरे को जीतने की इच्छा वाले वे दोनों वीर विषधर सर्पों जैसे, जलती अग्नि जैसे बाणों से परस्पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 16 (4.60.16)
अक्षयाविषुधी दिव्यौ पाण्डवस्य महात्मनः । तेन पार्थो रणे शूरस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥
akṣayāviṣudhī divyau pāṇḍavasya mahātmanaḥ | tena pārtho raṇe śūrastasthau giririvācalaḥ
महात्मा पाण्डव के पास दो दिव्य अक्षय तूणीर थे; इसी कारण शूरवीर पार्थ रण में पर्वत की भाँति अटल खड़े रहे।
श्लोक 17 (4.60.17)
अश्वत्थाम्नः पुनर्बाणाः क्षिप्रमभ्यस्यतो रणे । जग्मुः परिक्षयं शीघ्रमभूत्तेनाधिकोऽर्जुनः ॥
aśvatthāmnaḥ punarbāṇāḥ kṣipramabhyasyato raṇe | jagmuḥ parikṣayaṃ śīghramabhūttenādhiko'rjunaḥ
परन्तु रण में तेज़ी से बाण चलाते अश्वत्थामा के बाण शीघ्र ही समाप्त हो गए, और इस कारण अर्जुन उससे भारी पड़े।