विराट पर्व · अध्याय 61
अर्जुन द्वारा कृप की पराजय और कौरव-सेना का संहार
कृप अर्जुन से युद्ध करने आते हैं। अर्जुन कृप के रथ की रक्षा करने वाले ग्यारह योद्धाओं को मार डालते हैं, फिर उनका जुआ, घोड़े, सारथि, रथ और धनुष नष्ट कर देते हैं, उनकी शक्ति के टुकड़े कर देते हैं, गदा को लौटा देते हैं और तलवार-ढाल काट डालते हैं; कृप अश्वत्थामा के रथ पर चले जाते हैं। भीष्म कौरव महारथियों को एक साथ आक्रमण के लिए प्रेरित करते हैं, पर अर्जुन सारी सेना को भगा देते हैं, और उनके द्वारा बहाई गई रक्त की नदी का विस्तार से वर्णन होता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.61.1)
एतस्मिन्नन्तरे तत्र महावीर्यपराक्रमः । आजगाम महाबाहुः कृपः शस्त्रभृतांवरः । अर्जुनं प्रतियोद्धुं वै युद्धकामो महारथः ॥
etasminnantare tatra mahāvīryaparākramaḥ | ājagāma mahābāhuḥ kṛpaḥ śastrabhṛtāṃvaraḥ | arjunaṃ pratiyoddhuṃ vai yuddhakāmo mahārathaḥ
इसी बीच महान् वीर्य और पराक्रम वाले, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ महाबाहु महारथी कृप युद्ध की इच्छा से अर्जुन का सामना करने वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 2 (4.61.2)
अथ द्रौणे रथं त्यक्त्वा कृपस्य रथमुत्तमम् । आजगामार्जुनस्तूर्णं सूर्यवैश्वानरप्रभम् ॥
atha drauṇe rathaṃ tyaktvā kṛpasya rathamuttamam | ājagāmārjunastūrṇaṃ sūryavaiśvānaraprabham
तब अर्जुन द्रोणपुत्र के रथ को छोड़कर शीघ्र ही कृप के उत्तम रथ के पास आ गए, जो सूर्य और अग्नि के समान दमक रहा था।
श्लोक 3 (4.61.3)
तौ वीर सूर्यसंकाशौ योत्स्यमानौ महारथौ । वार्षिकाविव जीमूतौ व्यरोचेतां व्यवस्थितौ ॥
tau vīra sūryasaṃkāśau yotsyamānau mahārathau | vārṣikāviva jīmūtau vyarocetāṃ vyavasthitau
हे वीर, सूर्य के समान तेजस्वी वे दोनों महारथी युद्ध के लिए डटकर खड़े हुए वर्षा-ऋतु के दो मेघों की भाँति शोभा पा रहे थे।
श्लोक 4 (4.61.4)
प्रगृह्य गाण्डिवं लोके विश्रुतं पुनरर्जुनः । अभ्ययाद्भरतश्रेष्ठो विनिघ्नञ्शरमालया ॥
pragṛhya gāṇḍivaṃ loke viśrutaṃ punararjunaḥ | abhyayādbharataśreṣṭho vinighnañśaramālayā
जगत्-प्रसिद्ध गाण्डीव को फिर से उठाकर भरतश्रेष्ठ अर्जुन बाणों की माला से प्रहार करते हुए आगे बढ़े।
श्लोक 5 (4.61.5)
कृपश्च धनुरादाय तथैवार्जुनमभ्ययात् ॥
kṛpaśca dhanurādāya tathaivārjunamabhyayāt
कृप भी उसी प्रकार धनुष लेकर अर्जुन की ओर बढ़े।
श्लोक 6 (4.61.6)
प्रगृह्य बलवच्चापं नाराचान्रक्तभोजनान् । कृपः पार्थाय चिक्षेप शतशोऽथ सहस्रशः ॥
pragṛhya balavaccāpaṃ nārācānraktabhojanān | kṛpaḥ pārthāya cikṣepa śataśo'tha sahasraśaḥ
अपने प्रबल धनुष को थामकर कृप ने पार्थ पर रक्त पीने वाले नाराच सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में छोड़े।
श्लोक 7 (4.61.7)
जीमूत इव घर्मान्ते शरवर्षं विमुञ्चति । नन्दयन्सुहृदः सर्वान्प्रत्ययुध्यत फल्गुनम् ॥
jīmūta iva gharmānte śaravarṣaṃ vimuñcati | nandayansuhṛdaḥ sarvānpratyayudhyata phalgunam
ग्रीष्म के अन्त में वर्षा करते मेघ की भाँति वे बाणों की झड़ी लगाते रहे, और अपने सब सुहृदों को आनन्दित करते हुए फाल्गुन से जूझते रहे।
श्लोक 8 (4.61.8)
विकृष्य बलवच्चापं पाण्डवोऽमितविक्रमः । चचार समरे पार्थश्चित्रमार्गान्विदर्शयन् ॥
vikṛṣya balavaccāpaṃ pāṇḍavo'mitavikramaḥ | cacāra samare pārthaścitramārgānvidarśayan
अपना प्रबल धनुष खींचकर अपार पराक्रमी पाण्डुपुत्र पार्थ अद्भुत पैंतरे दिखाते हुए रणभूमि में विचरने लगे।
श्लोक 9 (4.61.9)
सर्वाश्चैव दिशो बाणैः प्रदिशश्च महाबलः । एकच्छायमिवाकाशं सर्वतः कृतवान्प्रभुः ॥
sarvāścaiva diśo bāṇaiḥ pradiśaśca mahābalaḥ | ekacchāyamivākāśaṃ sarvataḥ kṛtavānprabhuḥ
उस महाबली प्रभु ने अपने बाणों से सब दिशाओं और उपदिशाओं को ढक दिया और सारे आकाश को मानो एक ही छाया बना दिया।
श्लोक 10 (4.61.10)
प्राच्छादयदमेयात्मा पार्थः शरशतैः कृपम् । उद्गतः समरे मेघो धाराभिरिव पर्वतम् ॥
prācchādayadameyātmā pārthaḥ śaraśataiḥ kṛpam | udgataḥ samare megho dhārābhiriva parvatam
अप्रमेय आत्मबल वाले पार्थ ने कृप को सैकड़ों बाणों से ढक दिया, जैसे उमड़ा हुआ मेघ जलधाराओं से पर्वत को ढक देता है।
श्लोक 11 (4.61.11)
स शरैरर्पितः क्रुद्धः शितैरग्निशिखोपमैः । कृपो बभूव समरे विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥
sa śarairarpitaḥ kruddhaḥ śitairagniśikhopamaiḥ | kṛpo babhūva samare vidhūmo'gniriva jvalan
अग्नि-शिखा जैसे उन तीखे बाणों से बिंधकर कृप क्रोध से भर उठे और रण में धुएँ-रहित अग्नि की भाँति प्रज्वलित हो उठे।
श्लोक 12 (4.61.12)
ततः शरसहस्रेण पार्थमप्रतिमौजसम् । अर्दयित्वा महाबाहुर्ननाद समरे कृपः ॥
tataḥ śarasahasreṇa pārthamapratimaujasam | ardayitvā mahābāhurnanāda samare kṛpaḥ
तब महाबाहु कृप ने अनुपम ओजस्वी पार्थ को हज़ार बाणों से पीड़ित करके रण में गर्जना की।
श्लोक 13 (4.61.13)
ततः कनकपुङ्खेन शरेण नतपर्वणा । बिभेद समरे पार्थः कृपस्य ध्वजमुत्तमम् ॥
tataḥ kanakapuṅkhena śareṇa nataparvaṇā | bibheda samare pārthaḥ kṛpasya dhvajamuttamam
तब पार्थ ने सोने के पंखों वाले, झुकी गाँठों वाले एक बाण से रण में कृप की उत्तम ध्वजा को काट डाला।
श्लोक 14 (4.61.14)
ततः पश्चान्महातेजा नाराचान्सूर्यसन्निभान् । जग्राह समरे पार्थो भूयो बहुशिलीमुखान् ॥
tataḥ paścānmahātejā nārācānsūryasannibhān | jagrāha samare pārtho bhūyo bahuśilīmukhān
उसके बाद महातेजस्वी पार्थ ने रण में सूर्य के समान चमकते और भी बहुत-से नाराच और बाण उठाए।
श्लोक 15 (4.61.15)
तैस्तदानीं महाबाहुः कृपस्य रथरक्षिणः । जघान क्षत्रियश्रेष्ठो युध्यमानान्महारथान् ॥
taistadānīṃ mahābāhuḥ kṛpasya ratharakṣiṇaḥ | jaghāna kṣatriyaśreṣṭho yudhyamānānmahārathān
उनसे क्षत्रियों में श्रेष्ठ उस महाबाहु ने तब कृप के रथ की रक्षा करने वाले, युद्ध कर रहे महारथियों को मार गिराया —
श्लोक 16 (4.61.16)
चन्द्रकेतुः सुकेतुश्च चित्राश्वो मणिमांस्तथा । मुञ्जमौलिश्च विक्रान्तो हेमवर्णो भयावहः ॥
candraketuḥ suketuśca citrāśvo maṇimāṃstathā | muñjamauliśca vikrānto hemavarṇo bhayāvahaḥ
चन्द्रकेतु, सुकेतु, चित्राश्व और मणिमान्, पराक्रमी मुञ्जमौलि और भयंकर हेमवर्ण,
श्लोक 17 (4.61.17)
सुरथोऽतिरथश्चैव सुषेणोऽरिष्ट एव च । नृकेतुश्च सहानीकास्ते निषेदुर्गतासवः ॥
suratho'tirathaścaiva suṣeṇo'riṣṭa eva ca | nṛketuśca sahānīkāste niṣedurgatāsavaḥ
सुरथ, अतिरथ, सुषेण, अरिष्ट और नृकेतु — ये सब अपनी सेनाओं सहित प्राणहीन होकर गिर पड़े।
श्लोक 18 (4.61.18)
तान्निहत्य ततः पार्थो निमेषादिव भारत । पुनरन्यान्समाधत्त त्रयोदश शिलीमुखान् ॥
tānnihatya tataḥ pārtho nimeṣādiva bhārata | punaranyānsamādhatta trayodaśa śilīmukhān
हे भारत, पलक झपकते ही उन्हें मारकर पार्थ ने फिर दूसरे तेरह बाण चढ़ाए।
श्लोक 19 (4.61.19)
अथास्य युगमेकेन चतुर्भिश्चतुरो हयान् । षष्ठेन तु शिरः सङ्ख्ये कृपस्य रथसारथेः ॥
athāsya yugamekena caturbhiścaturo hayān | ṣaṣṭhena tu śiraḥ saṅkhye kṛpasya rathasāratheḥ
उनमें से एक से उन्होंने कृप का जुआ, चार से उसके चारों घोड़े, और छठे से युद्ध में उसके सारथि का सिर काट डाला;
श्लोक 20 (4.61.20)
त्रिभिस्त्रिवेणुं बलवान्द्वाभ्यामक्षं महाबलः । द्वादशेन तु भल्लेन कृपस्य सशरं धनुः ॥
tribhistriveṇuṃ balavāndvābhyāmakṣaṃ mahābalaḥ | dvādaśena tu bhallena kṛpasya saśaraṃ dhanuḥ
उस महाबली ने तीन बाणों से रथ का त्रिवेणु, दो से धुरा और बारहवें भल्ल से कृप का बाण-सहित धनुष
श्लोक 21 (4.61.21)
छित्त्वा वज्रनिकाशेन फल्गुनः प्रहसन्निव । त्रयोदशेनेन्द्रसमः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे ॥
chittvā vajranikāśena phalgunaḥ prahasanniva | trayodaśenendrasamaḥ pratyavidhyatstanāntare
वज्र के समान बाण से काट डाला; और इन्द्र-तुल्य फाल्गुन ने मानो हँसते हुए तेरहवें बाण से उनकी छाती के बीच वार किया।
श्लोक 22 (4.61.22)
स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । अथ शक्तिं परामृश्य सूर्यवैश्वानरप्रभाम् । चिक्षेप सहसा क्रुद्धः पार्थायाद्भुतकर्मणे ॥
sa chinnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ | atha śaktiṃ parāmṛśya sūryavaiśvānaraprabhām | cikṣepa sahasā kruddhaḥ pārthāyādbhutakarmaṇe
धनुष कट जाने, रथ नष्ट हो जाने, घोड़ों और सारथि के मारे जाने पर कृप ने क्रोध में भरकर सूर्य और अग्नि के समान दमकती एक शक्ति उठाई और सहसा अद्भुत कर्म करने वाले पार्थ पर फेंक दी।
श्लोक 23 (4.61.23)
तामर्जुनस्तथारूपां शक्तिं हेमपरिष्कृताम् । रुरोध सायकैस्तीक्ष्णैरर्धचन्द्रमुखैश्च ताम् ॥
tāmarjunastathārūpāṃ śaktiṃ hemapariṣkṛtām | rurodha sāyakaistīkṣṇairardhacandramukhaiśca tām
अर्जुन ने सोने से सजी उस शक्ति को तीखे अर्धचन्द्राकार मुख वाले बाणों से रोक दिया;
श्लोक 24 (4.61.24)
आपतन्तीं महोल्काभां चिच्छेद दशभिः शरैः । सापतद्दशधा भूमौ पार्थेन निहता शरैः ॥
āpatantīṃ maholkābhāṃ ciccheda daśabhiḥ śaraiḥ | sāpataddaśadhā bhūmau pārthena nihatā śaraiḥ
बड़ी उल्का के समान आती हुई उस शक्ति को उन्होंने दस बाणों से काट डाला, और पार्थ के बाणों से नष्ट होकर वह दस टुकड़े होकर भूमि पर गिर पड़ी।
श्लोक 25 (4.61.25)
शक्त्यां तु विनिकृत्तायां विरथः शरपीडितः । गदापाणिरवप्लुत्य रथात्तूर्णममित्रहा । गदां चिक्षेप सहसा पार्थायामिततेजसे ॥
śaktyāṃ tu vinikṛttāyāṃ virathaḥ śarapīḍitaḥ | gadāpāṇiravaplutya rathāttūrṇamamitrahā | gadāṃ cikṣepa sahasā pārthāyāmitatejase
शक्ति के कट जाने पर रथहीन और बाणों से पीड़ित शत्रुनाशक कृप हाथ में गदा लेकर शीघ्र रथ से कूद पड़े और उन्होंने वह गदा सहसा अपार तेजस्वी पार्थ पर फेंक दी।
श्लोक 26 (4.61.26)
सा च मुक्ता गदा गुर्वी रूपेणास्य परिष्कृता । अर्जुनस्य शरैर्नुन्ना प्रतिमार्गं जगाम सा ॥
sā ca muktā gadā gurvī rūpeṇāsya pariṣkṛtā | arjunasya śarairnunnā pratimārgaṃ jagāma sā
पर छोड़ी गई वह भारी, सुन्दर रूप से सजी गदा अर्जुन के बाणों से धकेली जाकर उसी मार्ग से लौट गई।
श्लोक 27 (4.61.27)
अथ खड्गं समुद्धृत्य शतचन्द्रं च भानुमत् । इयेष पाण्डवं हन्तुं कृपोऽलघुपराक्रमः ॥
atha khaḍgaṃ samuddhṛtya śatacandraṃ ca bhānumat | iyeṣa pāṇḍavaṃ hantuṃ kṛpo'laghuparākramaḥ
तब बड़े पराक्रमी कृप ने सौ चन्द्र-चिह्नों से अंकित चमचमाती तलवार निकाली और पाण्डुपुत्र को मारना चाहा।
श्लोक 28 (4.61.28)
स शरद्वत्सुतस्तूर्णं महाचार्यः सुशिक्षितः । खेचरेव चचारैकः क्रमाच्चर्मासिधृग्भुवि ॥
sa śaradvatsutastūrṇaṃ mahācāryaḥ suśikṣitaḥ | khecareva cacāraikaḥ kramāccarmāsidhṛgbhuvi
शरद्वान् के पुत्र, सुशिक्षित महान् आचार्य, ढाल और तलवार धारण किए, आकाशचारी पक्षी की भाँति अकेले भूमि पर पैंतरे बदलते हुए तेज़ी से विचरने लगे।
श्लोक 29 (4.61.29)
ततः क्षुरप्रैः कौन्तेयो दशभिः खड्गचर्मणी । निमेषादिव चिच्छेद तदद्भुतमिवाभवत् ॥
tataḥ kṣurapraiḥ kaunteyo daśabhiḥ khaḍgacarmaṇī | nimeṣādiva ciccheda tadadbhutamivābhavat
तब कुन्तीपुत्र ने दस क्षुरप्र बाणों से पलक झपकते ही उनकी तलवार और ढाल काट दी; यह एक अद्भुत-सा दृश्य था।
श्लोक 30 (4.61.30)
विषण्णवदनस्तत्र विनाशात्खड्गचर्मणोः । दन्तैर्दन्तच्छदान्दष्ट्वा चुकोप हृदि दीर्घवत् ॥
viṣaṇṇavadanastatra vināśātkhaḍgacarmaṇoḥ | dantairdantacchadāndaṣṭvā cukopa hṛdi dīrghavat
तलवार और ढाल के नष्ट हो जाने से उनका मुख उदास हो गया; उन्होंने दाँतों से होंठ चबाए और भीतर-ही-भीतर गहरे क्रोध से भर उठे।
श्लोक 31 (4.61.31)
भवत्विति पुनश्चोक्त्वा युद्धापगमनोद्यतः । अश्वत्थाम्नस्तु स रथं कृपः समभिपुप्लुवे । स्वस्रीयस्य महातेजा जग्राह च धनुः पुनः ॥
bhavatviti punaścoktvā yuddhāpagamanodyataḥ | aśvatthāmnastu sa rathaṃ kṛpaḥ samabhipupluve | svasrīyasya mahātejā jagrāha ca dhanuḥ punaḥ
फिर "ऐसा ही हो" कहकर युद्ध से हटने को तत्पर कृप अपनी बहन के पुत्र अश्वत्थामा के रथ पर कूदकर चढ़ गए, और उस महातेजस्वी ने फिर धनुष उठा लिया।
श्लोक 32 (4.61.32)
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धो भीष्मो द्रोणमथाब्रवीत् । दृष्ट्वा कृपं फल्गुनेन पीडितं चोर्जितं च तम् ॥
etasminnantare kruddho bhīṣmo droṇamathābravīt | dṛṣṭvā kṛpaṃ phalgunena pīḍitaṃ corjitaṃ ca tam
इसी बीच कृप जैसे बलशाली को फाल्गुन से पीड़ित देखकर भीष्म क्रुद्ध हुए और द्रोण से बोले —
भीष्म उवाच
श्लोक 33 (4.61.33)
एकैकमस्मान्संग्रामे पराजयति फल्गुनः । अहं द्रोणश्च कर्णश्च द्रौणिर्गौतम एव च । अन्ये च बहवः शूरा वयं जेष्याम वासविम् ॥
ekaikamasmānsaṃgrāme parājayati phalgunaḥ | ahaṃ droṇaśca karṇaśca drauṇirgautama eva ca | anye ca bahavaḥ śūrā vayaṃ jeṣyāma vāsavim
"फाल्गुन युद्ध में हमें एक-एक करके हरा रहा है। मैं, द्रोण, कर्ण, द्रोणपुत्र और गौतम (कृप) तथा अन्य बहुत-से शूरवीर — हम सब मिलकर इन्द्रपुत्र को जीतेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 34 (4.61.34)
समागम्य ततः सर्वे भीष्मद्रोणमुखा रथाः । अर्जुनं सहसा युक्ताः प्रत्ययुध्यन्त भारत ॥
samāgamya tataḥ sarve bhīṣmadroṇamukhā rathāḥ | arjunaṃ sahasā yuktāḥ pratyayudhyanta bhārata
तब भीष्म और द्रोण आदि सब रथी एकत्र होकर, हे भारत, एक साथ अर्जुन से जूझने लगे।
श्लोक 35 (4.61.35)
स सायकमयैर्जालैः सर्वतस्तान्महारथान् । प्राच्छादयच्छरौघैस्तान्नीहार इव पर्वतान् ॥
sa sāyakamayairjālaiḥ sarvatastānmahārathān | prācchādayaccharaughaistānnīhāra iva parvatān
उन्होंने बाणों के जालों और बाणों की बाढ़ से उन महारथियों को चारों ओर से ढक दिया, जैसे कोहरा पर्वतों को ढक लेता है।
श्लोक 36 (4.61.36)
नदद्भिश्च महानागैर्हेषमाणैश्च वाजिभिः । भेरीशङ्खनिनादैश्च स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥
nadadbhiśca mahānāgairheṣamāṇaiśca vājibhiḥ | bherīśaṅkhaninādaiśca sa śabdastumulo'bhavat
चिंघाड़ते बड़े-बड़े हाथियों, हिनहिनाते घोड़ों और भेरी तथा शंखों के नाद से वह कोलाहल अत्यन्त भयंकर हो उठा।
श्लोक 37 (4.61.37)
नागाश्वकायान्निर्भिद्य लौहानि कवचानि च । पार्थस्य शरवर्षाणि न्यपतञ्शतशः क्षितौ ॥
nāgāśvakāyānnirbhidya lauhāni kavacāni ca | pārthasya śaravarṣāṇi nyapatañśataśaḥ kṣitau
हाथियों और घोड़ों के शरीरों तथा लोहे के कवचों को भेदकर पार्थ की बाण-वर्षा सैकड़ों की संख्या में धरती पर गिरने लगी।
श्लोक 38 (4.61.38)
त्वरमाणः शरानस्यन्पाण्डवस्तु प्रकाशते । मध्यंदिनगतोऽर्चिष्माञ्छरदीव दिवाकरः ॥
tvaramāṇaḥ śarānasyanpāṇḍavastu prakāśate | madhyaṃdinagato'rciṣmāñcharadīva divākaraḥ
शीघ्रता से बाण छोड़ते हुए पाण्डुपुत्र ऐसे प्रकाशित हो रहे थे जैसे शरद् ऋतु में दोपहर का दीप्तिमान सूर्य।
श्लोक 39 (4.61.39)
अविषह्य शरान्सर्वे पार्थचापच्युतान्रणे । उदक्प्रयान्ति विध्वस्ता रथेभ्यो रथिनस्तदा । सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चापि पदातयः ॥
aviṣahya śarānsarve pārthacāpacyutānraṇe | udakprayānti vidhvastā rathebhyo rathinastadā | sādinaścāśvapṛṣṭhebhyo bhūmau cāpi padātayaḥ
रण में पार्थ के धनुष से छूटे बाणों को सह न पाकर सब के सब ध्वस्त होकर तब उत्तर की ओर भाग चले — रथी रथों से, घुड़सवार घोड़ों की पीठ से और पैदल सैनिक भूमि पर।
श्लोक 40 (4.61.40)
शरैस्तु ताड्यमानानां कवचानां महात्मनाम् । ताम्रराजतलौहानां प्रादुरासीन्महास्वनः ॥
śaraistu tāḍyamānānāṃ kavacānāṃ mahātmanām | tāmrarājatalauhānāṃ prādurāsīnmahāsvanaḥ
जब बाण उन महान् योद्धाओं के ताँबे, चाँदी और लोहे के कवचों पर पड़ते, तब भारी झनझनाहट उठती थी।
श्लोक 41 (4.61.41)
छन्नमायोधनं जज्ञे शरीरैर्गतचेतसाम् । श्रान्त्या गलितशस्त्राणां पततामश्वसादिनाम् ॥
channamāyodhanaṃ jajñe śarīrairgatacetasām | śrāntyā galitaśastrāṇāṃ patatāmaśvasādinām
रणभूमि अचेत पड़े शवों से ढक गई — उन गिरते हुए घुड़सवारों के शरीरों से, जिनके हाथों से थकान के कारण शस्त्र छूट गए थे।
श्लोक 42 (4.61.42)
शून्यान्कुर्वन्रथोपस्थान्मानवैरास्तृणोन्महीम् । प्रनृत्यन्निव संग्रामे चापहस्तो धनंजयः ॥
śūnyānkurvanrathopasthānmānavairāstṛṇonmahīm | pranṛtyanniva saṃgrāme cāpahasto dhanaṃjayaḥ
रथों के बैठने के स्थान सूने करते हुए धनंजय ने धरती को मनुष्यों से पाट दिया; हाथ में धनुष लिए वे रण में मानो नृत्य कर रहे थे।
श्लोक 43 (4.61.43)
शिरांस्यपातयत्सङ्ख्ये क्षत्रियाणां नरर्षभः । श्रुत्वा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । त्रस्तानि सर्वसैन्यानि व्यलीयन्त च भागशः ॥
śirāṃsyapātayatsaṅkhye kṣatriyāṇāṃ nararṣabhaḥ | śrutvā gāṇḍīvanirghoṣaṃ visphūrjitamivāśaneḥ | trastāni sarvasainyāni vyalīyanta ca bhāgaśaḥ
उस नरश्रेष्ठ ने युद्ध में क्षत्रियों के सिर काट गिराए। वज्र की कड़क जैसी गाण्डीव की टंकार सुनकर सारी सेनाएँ भयभीत होकर टुकड़ियों में बिखरकर छिप गईं।
श्लोक 44 (4.61.44)
कुण्डलोष्णीषधारीणि जातरूपस्रजानि च । पतितानि स्म दृश्यन्ते शिरांसि रणमूर्धनि ॥
kuṇḍaloṣṇīṣadhārīṇi jātarūpasrajāni ca | patitāni sma dṛśyante śirāṃsi raṇamūrdhani
कुण्डल और पगड़ी धारण किए, सोने की मालाओं वाले सिर रण के मुहाने पर गिरे हुए दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 45 (4.61.45)
विशिखोन्मथितैर्गात्रैर्बाहुभिश्च सकार्मुकैः । सहस्ताभरणैश्चान्यैः प्रच्छन्ना भाति मेदिनी ॥
viśikhonmathitairgātrairbāhubhiśca sakārmukaiḥ | sahastābharaṇaiścānyaiḥ pracchannā bhāti medinī
बाणों से मथे हुए अंगों, धनुष-सहित भुजाओं और हाथों के आभूषणों सहित दूसरी भुजाओं से ढकी हुई धरती शोभा पा रही थी।
श्लोक 46 (4.61.46)
शिरसां पात्यमानानां समरे निशितैः शरैः । अश्मवृष्टिरिवाकाशादभवद्भरतर्षभ ॥
śirasāṃ pātyamānānāṃ samare niśitaiḥ śaraiḥ | aśmavṛṣṭirivākāśādabhavadbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, रण में तीखे बाणों से गिराए जाते सिरों की ऐसी वर्षा हुई मानो आकाश से पत्थर बरस रहे हों।
श्लोक 47 (4.61.47)
दर्शयित्वा तदाऽऽत्मानं रौद्रं रौद्रपराक्रमः । जघान समरे शूराञ्छतशोऽथ सहस्रशः ॥
darśayitvā tadā''tmānaṃ raudraṃ raudraparākramaḥ | jaghāna samare śūrāñchataśo'tha sahasraśaḥ
तब अपना रौद्र रूप दिखाकर उस भयंकर पराक्रमी ने रण में सैकड़ों और हज़ारों शूरवीरों को मार डाला।
श्लोक 48 (4.61.48)
तथावरुद्धश्चारण्ये दशवर्षाणि त्रीणि च । क्रोधाग्निमुत्ससर्जाजौ धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवः ॥
tathāvaruddhaścāraṇye daśavarṣāṇi trīṇi ca | krodhāgnimutsasarjājau dhārtarāṣṭreṣu pāṇḍavaḥ
इस प्रकार दस और तीन वर्ष तक वन में रोके रखे गए पाण्डुपुत्र ने युद्ध में धृतराष्ट्र के पुत्रों पर अपनी क्रोधाग्नि छोड़ दी।
श्लोक 49 (4.61.49)
तस्य तद्दहतः सैन्यं दृष्ट्वा चास्य पराक्रमम् । सर्वे शान्तिपरा योधा धार्तराष्ट्रस्य भारत ॥
tasya taddahataḥ sainyaṃ dṛṣṭvā cāsya parākramam | sarve śāntiparā yodhā dhārtarāṣṭrasya bhārata
हे भारत, उन्हें सेना को जलाते देखकर और उनका पराक्रम देखकर धृतराष्ट्र-पुत्र के सब योद्धाओं का युद्ध का उत्साह शान्त पड़ गया।
श्लोक 50 (4.61.50)
यथा नलवनं नागः प्रभिन्नः षष्टिहायनः । एवं सर्वानपामृद्नादर्जुनः शस्त्रतेजसा ॥
yathā nalavanaṃ nāgaḥ prabhinnaḥ ṣaṣṭihāyanaḥ | evaṃ sarvānapāmṛdnādarjunaḥ śastratejasā
जैसे साठ वर्ष का मदमत्त हाथी नरकुलों के वन को रौंद डालता है, वैसे ही अर्जुन ने अपने शस्त्रों के तेज से उन सबको कुचल डाला।
श्लोक 51 (4.61.51)
विद्राव्य च ततः सैन्यं त्रासयित्वा महारथान् । अर्जुनो जयतांश्रेष्ठः पर्यावर्तत भारत ॥
vidrāvya ca tataḥ sainyaṃ trāsayitvā mahārathān | arjuno jayatāṃśreṣṭhaḥ paryāvartata bhārata
हे भारत, सेना को भगाकर और महारथियों को भयभीत करके विजेताओं में श्रेष्ठ अर्जुन रणभूमि में चारों ओर घूमने लगे।
श्लोक 52 (4.61.52)
तस्य मार्गान्विचरतो निघ्नतश्च रणाजिरे । प्रावर्तत नदी घोरा शोणितान्त्रतरङ्गिणी ॥
tasya mārgānvicarato nighnataśca raṇājire | prāvartata nadī ghorā śoṇitāntrataraṅgiṇī
जब वे रणभूमि में अपने मार्गों पर विचरते हुए संहार कर रहे थे, तब रक्त और आँतों की लहरों वाली एक भयानक नदी बह निकली —
श्लोक 53 (4.61.53)
अस्थिशैवालसंबाधां संग्रामे पार्थनिर्मिताम् । शरचापप्लवां घोरां मांसशोणितकर्दमाम् ॥
asthiśaivālasaṃbādhāṃ saṃgrāme pārthanirmitām | śaracāpaplavāṃ ghorāṃ māṃsaśoṇitakardamām
युद्ध में पार्थ द्वारा रची गई वह भयानक नदी, जो हड्डियों रूपी सेवार से भरी थी, जिसमें बाण और धनुष बेड़ों जैसे तैर रहे थे और मांस तथा रक्त उसका कीचड़ थे;
श्लोक 54 (4.61.54)
रथोडुपां चान्त्रसर्पां केशशैवालशाड्वलाम् । करवालासिपाठीनां चामरोष्णीषफेनिलाम् ॥
rathoḍupāṃ cāntrasarpāṃ keśaśaivālaśāḍvalām | karavālāsipāṭhīnāṃ cāmaroṣṇīṣaphenilām
रथ उसकी डोंगियाँ थे, आँतें उसके साँप, केश उसके सेवार और घास; तलवारें और खड्ग उसकी मछलियाँ थीं, और चँवर तथा पगड़ियाँ उसका फेन;
श्लोक 55 (4.61.55)
अश्वग्रीवमहावर्तां कबन्धजलमानुषाम् । काककङ्करुतां तीव्रां सारसक्रौञ्चनादिताम् ॥
aśvagrīvamahāvartāṃ kabandhajalamānuṣām | kākakaṅkarutāṃ tīvrāṃ sārasakrauñcanāditām
घोड़ों की गर्दनें उसके बड़े भँवर थीं, धड़ उसके जल-जन्तु; कौओं और कंकों के तीखे स्वर से वह गूँज रही थी, और सारसों तथा क्रौंचों के नाद से भरी थी;
श्लोक 56 (4.61.56)
सिंहनादमहानादां शङ्खस्वनमहास्वनाम् । वीरोत्तमाङ्गपद्माढ्यां शरचापमहानलाम् ॥
siṃhanādamahānādāṃ śaṅkhasvanamahāsvanām | vīrottamāṅgapadmāḍhyāṃ śaracāpamahānalām
सिंहनाद उसका महानाद था और शंखों की ध्वनि उसका महाघोष; श्रेष्ठ वीरों के सिर उसके कमल थे, और बाण-धनुष उसके बड़े नरकुल;
श्लोक 57 (4.61.57)
पदातिमत्स्यकलुषां गजशीर्षककच्छपाम् । गोमायुमृगसंघुष्टां मांसमज्जाभिकर्दमाम् ॥
padātimatsyakaluṣāṃ gajaśīrṣakakacchapām | gomāyumṛgasaṃghuṣṭāṃ māṃsamajjābhikardamām
पैदल सैनिक उसकी मछलियाँ बनकर उसे गँदला कर रहे थे, हाथियों के सिर उसके कछुए थे; सियारों और वन्य पशुओं के शब्द से वह गूँज रही थी, और मांस तथा मज्जा उसका कीचड़ थे।
श्लोक 58 (4.61.58)
प्रावर्तयन्नदीं घोरां पिशाचगणसेविताम् । अपारामनिवासां च रक्तोदां सर्वतो वृताम् ॥
prāvartayannadīṃ ghorāṃ piśācagaṇasevitām | apārāmanivāsāṃ ca raktodāṃ sarvato vṛtām
उन्होंने पिशाचों के झुंडों से सेवित एक भयानक नदी बहा दी, जिसका कोई पार न था, जिसमें कोई टिक नहीं सकता था, जिसका जल रक्त था और जो चारों ओर फैली हुई थी।
श्लोक 59 (4.61.59)
अभीक्ष्णमकरोत्पार्थो नदीमुत्तमशोणिताम् । गजवर्ममहाद्वीपामश्वदेहमहाशिलाम् ॥
abhīkṣṇamakarotpārtho nadīmuttamaśoṇitām | gajavarmamahādvīpāmaśvadehamahāśilām
पार्थ ने बार-बार उत्तम रक्त की वह नदी बनाई, जिसमें हाथियों के कवच बड़े द्वीप थे और घोड़ों के शरीर बड़ी चट्टानें,
श्लोक 60 (4.61.60)
पदातिदेहसंघाटां रथावलिमहातरुम् । केशशाद्वलसंछन्नां सुतरां भीतिदां नृणाम् ॥
padātidehasaṃghāṭāṃ rathāvalimahātarum | keśaśādvalasaṃchannāṃ sutarāṃ bhītidāṃ nṛṇām
पैदल सैनिकों के शरीर जिसके बेड़े थे और रथों की पंक्तियाँ बड़े वृक्ष; केशों रूपी घास से ढकी वह नदी मनुष्यों को अत्यन्त भय देने वाली थी,
श्लोक 61 (4.61.61)
अगाधरक्तोदवहां यमसागरगामिनीम् । दुस्तरां भीरुमर्त्यानां शूराणां सुतरां नृप । प्रावर्तयन्नदीमेवं भीषणां पाकशासनिः ॥
agādharaktodavahāṃ yamasāgaragāminīm | dustarāṃ bhīrumartyānāṃ śūrāṇāṃ sutarāṃ nṛpa | prāvartayannadīmevaṃ bhīṣaṇāṃ pākaśāsaniḥ
अथाह रक्त-जल बहाने वाली, यम के सागर की ओर जाने वाली, डरपोक मनुष्यों के लिए दुस्तर पर शूरों के लिए सुतर — हे राजन्, ऐसी भयंकर नदी इन्द्रपुत्र ने बहा दी।
श्लोक 62 (4.61.62)
तस्याददानस्य शरान्सन्दधानस्य मुञ्चतः । विकर्षतश्च गाण्डीवं न किंचिद्ददृशेऽन्तरम् ॥
tasyādadānasya śarānsandadhānasya muñcataḥ | vikarṣataśca gāṇḍīvaṃ na kiṃciddadṛśe'ntaram
जब वे बाण लेते, चढ़ाते, छोड़ते और गाण्डीव खींचते, तब इन क्रियाओं के बीच कोई भी अन्तराल दिखाई नहीं देता था।