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विराट पर्व · अध्याय 63

अर्जुन द्वारा भीष्म की पराजय

भीष्म और अर्जुन का द्वन्द्व युद्ध होता है; दोनों एक-दूसरे की ध्वजा, सारथि और शरीर को बींधते हैं और बाणों तथा दिव्यास्त्रों से आकाश भर देते हैं। देवता, ऋषि और गन्धर्व दोनों की सराहना करते हैं, चित्रसेन इन्द्र से इस युद्ध की प्रशंसा करता है और इन्द्र पुष्पवर्षा करते हैं। केवल प्रचलित पाठ में मिलने वाले एक अंश में अश्वत्थामा अर्जुन से भागने पर कर्ण को धिक्कारता है और दुर्योधन उसे डाँटता है। अर्जुन भीष्म का धनुष काटकर उनकी छाती बींधता है; भीष्म रथ का कूबर पकड़े मूर्च्छित हो जाते हैं और सारथि उन्हें रणभूमि से हटा ले जाता है। अद्वितीय पितामह पाण्डवों के हित के लिए मानो पराजित हो जाते हैं।

अध्याय 62अध्याय-सूचीअध्याय 64

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.63.1)

ततो भीष्मः शरानष्टौ ध्वजे पार्थस्य वीर्यवान् । समार्पयन्महावेगाज्ज्वलतः पन्नगानिव ॥

tato bhīṣmaḥ śarānaṣṭau dhvaje pārthasya vīryavān | samārpayanmahāvegājjvalataḥ pannagāniva

तब पराक्रमी भीष्म ने पार्थ की ध्वजा में बड़े वेग वाले आठ बाण गाड़ दिए, जो सर्पों की भाँति दहक रहे थे।

श्लोक 2 (4.63.2)

ते ध्वजं पाण्डुपुत्रस्य समासाद्य पतत्रिणः । ध्वजस्थं कपिमाजघ्नुः ध्वजाग्रनिलयांश्च तान् ॥

te dhvajaṃ pāṇḍuputrasya samāsādya patatriṇaḥ | dhvajasthaṃ kapimājaghnuḥ dhvajāgranilayāṃśca tān

वे पंखधारी बाण पाण्डुपुत्र की ध्वजा तक पहुँचे और ध्वजा पर बैठे वानर तथा ध्वजा के शिखर पर बसने वाले उन प्राणियों पर जा लगे।

श्लोक 3 (4.63.3)

सारथिं च हयांश्चास्य विव्याध दशभिः शरैः । उरस्यताडयत्पार्थं त्रिभिरेवायसैः शरैः ॥

sārathiṃ ca hayāṃścāsya vivyādha daśabhiḥ śaraiḥ | urasyatāḍayatpārthaṃ tribhirevāyasaiḥ śaraiḥ

उन्होंने दस बाणों से अर्जुन के सारथि और घोड़ों को बींध डाला और लोहे के तीन बाणों से पार्थ की छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 4 (4.63.4)

ततोऽर्जुनः शरैस्तीक्ष्णैर्विद्ध्वा कुरुपितामहम् । ध्वजं च सारथिं चापि विव्याध दशभिः शरैः ॥

tato'rjunaḥ śaraistīkṣṇairviddhvā kurupitāmaham | dhvajaṃ ca sārathiṃ cāpi vivyādha daśabhiḥ śaraiḥ

तब अर्जुन ने तीखे बाणों से कुरुओं के पितामह को बींधा और दस बाणों से उनकी ध्वजा और सारथि को भी बींध डाला।

श्लोक 5 (4.63.5)

तद्युद्धमभवद्धोरं रोमहर्षणमद्भुतम् । भीष्मस्य सह पार्थेन बलिवासवयोरिव ॥

tadyuddhamabhavaddhoraṃ romaharṣaṇamadbhutam | bhīṣmasya saha pārthena balivāsavayoriva

भीष्म और पार्थ का वह युद्ध बलि और इन्द्र के युद्ध के समान भयंकर, रोमांचकारी और अद्भुत था।

श्लोक 6 (4.63.6)

सन्ततं शरमालाभिराकाशं समपद्यत । अम्बुदैरिव धाराभिस्तयोः कार्मुकनिःसृतैः ॥

santataṃ śaramālābhirākāśaṃ samapadyata | ambudairiva dhārābhistayoḥ kārmukaniḥsṛtaiḥ

दोनों के धनुषों से छूटी बाणों की अविरल पंक्तियों से आकाश ऐसा ढक गया, जैसे बादल जलधाराओं से उसे ढक देते हैं।

श्लोक 7 (4.63.7)

भल्लैर्भल्लाः समाहत्य कुरुपाण्डवयो रणे । अन्तरिक्षे व्यराजन्त खद्योताः प्रावृषीव हि ॥

bhallairbhallāḥ samāhatya kurupāṇḍavayo raṇe | antarikṣe vyarājanta khadyotāḥ prāvṛṣīva hi

कुरुवंशी भीष्म और पाण्डुपुत्र अर्जुन के युद्ध में भल्ल बाण भल्ल बाणों से टकराकर आकाश में वर्षा ऋतु के जुगनुओं की तरह चमक उठे।

श्लोक 8 (4.63.8)

अग्निचक्रोपमं घोरं मण्डलीकृतमाहवे । गाण्डीवमभवज्जिष्णोः सव्यं दक्षिणमस्यतः ॥

agnicakropamaṃ ghoraṃ maṇḍalīkṛtamāhave | gāṇḍīvamabhavajjiṣṇoḥ savyaṃ dakṣiṇamasyataḥ

बाएँ और दाएँ दोनों ओर बाण छोड़ते हुए जिष्णु का गाण्डीव युद्ध में मण्डलाकार खिंचकर अग्नि-चक्र के समान भयंकर हो गया।

श्लोक 9 (4.63.9)

पर्वतं वारिधाराभिश्छादयन्निव तोयदः । अर्जुनश्छादयद्भीष्मं शरवर्षैरनेकशः ॥

parvataṃ vāridhārābhiśchādayanniva toyadaḥ | arjunaśchādayadbhīṣmaṃ śaravarṣairanekaśaḥ

जैसे मेघ जलधाराओं से पर्वत को ढक देता है, वैसे ही अर्जुन ने बार-बार बाणों की वर्षा से भीष्म को ढक दिया।

श्लोक 10 (4.63.10)

तां समुद्रमिवोद्धूतां शरवृष्टिं समुद्यताम् । व्यधमत्सायकैर्भीष्मः सोऽर्जुनं च न्यवारयत् ॥

tāṃ samudramivoddhūtāṃ śaravṛṣṭiṃ samudyatām | vyadhamatsāyakairbhīṣmaḥ so'rjunaṃ ca nyavārayat

उमड़े हुए समुद्र के समान उठी उस बाणवर्षा को भीष्म ने अपने बाणों से छिन्न-भिन्न कर दिया और अर्जुन को भी रोक दिया।

श्लोक 11 (4.63.11)

ततस्तानि विसृष्टानि शरजालानि सङ्घशः । आहतानि व्यशीर्यन्त अर्जुनस्य रथं प्रति ॥

tatastāni visṛṣṭāni śarajālāni saṅghaśaḥ | āhatāni vyaśīryanta arjunasya rathaṃ prati

तब झुंड के झुंड छोड़े गए वे बाणजाल टकराकर अर्जुन के रथ के पास ही बिखर गए।

श्लोक 12 (4.63.12)

ततः कनकपुङ्खाग्रैः शितैः संनतपर्वभिः । पतद्भिः खगवाजैश्च द्यौरासीत्संवृता शरैः ॥

tataḥ kanakapuṅkhāgraiḥ śitaiḥ saṃnataparvabhiḥ | patadbhiḥ khagavājaiśca dyaurāsītsaṃvṛtā śaraiḥ

तब सुनहरे पंखों वाले, तीखे, चिकनी गाँठों वाले और पक्षियों के परों से युक्त गिरते हुए बाणों से आकाश ढक गया।

श्लोक 13 (4.63.13)

ततः प्रासृजदुग्राणि शरजालानि पाण्डवः । तावन्ति शरजालानि भीष्मः पार्थाय प्राहिणोत् ॥

tataḥ prāsṛjadugrāṇi śarajālāni pāṇḍavaḥ | tāvanti śarajālāni bhīṣmaḥ pārthāya prāhiṇot

तब पाण्डुपुत्र ने बाणों के भयंकर जाल छोड़े, और भीष्म ने भी उतने ही बाणजाल पार्थ की ओर भेजे।

श्लोक 14 (4.63.14)

साश्वं ससूतं सरथं स पार्थं समाचिनोद्भारतो वत्सदन्तैः । प्रच्छादयामास दिशश्च सर्वा नभश्च बाणैस्तपनीयपुङ्खैः ॥

sāśvaṃ sasūtaṃ sarathaṃ sa pārthaṃ samācinodbhārato vatsadantaiḥ | pracchādayāmāsa diśaśca sarvā nabhaśca bāṇaistapanīyapuṅkhaiḥ

उस भरतवंशी ने घोड़ों, सारथि और रथ सहित पार्थ को वत्सदन्त बाणों से पाट दिया और सुनहरे पंखों वाले बाणों से सारी दिशाओं और आकाश को भी ढक दिया।

श्लोक 15 (4.63.15)

ततो देवर्षिगन्धर्वाः साधुसाध्वित्यपूजयन् । दुष्करं कृतवान्भीष्मो यदर्जुनमवारयत् ॥

tato devarṣigandharvāḥ sādhusādhvityapūjayan | duṣkaraṃ kṛtavānbhīṣmo yadarjunamavārayat

तब देवर्षि और गन्धर्व "साधु, साधु!" कहकर सराहने लगे, "भीष्म ने अर्जुन को रोककर दुष्कर कार्य किया है।

देवर्षिगन्धर्वा ऊचुः

श्लोक 16 (4.63.16)

बलवानर्जुनो दक्षः क्षिप्रकारी च पाण्डवः । कोऽन्यः समर्थः पार्थस्य वेगं धारयितुं रणे ॥

balavānarjuno dakṣaḥ kṣiprakārī ca pāṇḍavaḥ | ko'nyaḥ samarthaḥ pārthasya vegaṃ dhārayituṃ raṇe

अर्जुन बलवान और कुशल है, यह पाण्डुपुत्र फुर्ती से काम करने वाला है। युद्ध में पार्थ के वेग को और कौन सह सकता है,

श्लोक 17 (4.63.17)

ऋते शान्तनवाद्भीष्मात्कृष्णाद्वा देवकीसुतात् । आचार्यवरमुख्याद्वा भारद्वाजान्महाबलात् ॥

ṛte śāntanavādbhīṣmātkṛṣṇādvā devakīsutāt | ācāryavaramukhyādvā bhāradvājānmahābalāt

सिवाय शान्तनुनन्दन भीष्म के, या देवकीपुत्र कृष्ण के, या आचार्यों में श्रेष्ठ महाबली भरद्वाजपुत्र द्रोण के?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (4.63.18)

अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य क्रीडतः पुरुषोत्तमौ । चक्षूंषि सर्वभूतानां मोदयन्तौ महाबलौ ॥

astrairastrāṇi saṃvārya krīḍataḥ puruṣottamau | cakṣūṃṣi sarvabhūtānāṃ modayantau mahābalau

वे दोनों पुरुषश्रेष्ठ अस्त्रों से अस्त्रों को रोकते हुए मानो खेल रहे थे, और वे दोनों महाबली सब प्राणियों की आँखों को आनन्द दे रहे थे।

श्लोक 19 (4.63.19)

प्राजापत्यं तथैवैन्द्रमाग्नेयं च सुदारुणम् । कौबेरं वारुणं चैव याम्यं वायव्यमेव च । प्रयुञ्जानौ महात्मानौ समरे तौ विरेजतुः ॥

prājāpatyaṃ tathaivaindramāgneyaṃ ca sudāruṇam | kauberaṃ vāruṇaṃ caiva yāmyaṃ vāyavyameva ca | prayuñjānau mahātmānau samare tau virejatuḥ

प्रजापति और इन्द्र के अस्त्र, अग्नि का अत्यन्त भयंकर अस्त्र, तथा कुबेर, वरुण, यम और वायु के अस्त्रों का प्रयोग करते हुए वे दोनों महात्मा युद्ध में शोभा पाने लगे।

श्लोक 20 (4.63.20)

विस्मितान्यथ भूतानि तौ दृष्ट्वा संयुगे तदा । साधु पार्थ महाबाहो साधु भीष्मेति चाब्रुवन् ॥

vismitānyatha bhūtāni tau dṛṣṭvā saṃyuge tadā | sādhu pārtha mahābāho sādhu bhīṣmeti cābruvan

युद्ध में उन दोनों को देखकर प्राणी विस्मित हो गए और बोले, "वाह महाबाहु पार्थ! वाह भीष्म!"

भूतान्यूचुः

श्लोक 21 (4.63.21)

नैतदन्यो मनुष्येषु प्रदर्शयितुमाहवे । महास्त्राणां संप्रयोगं समरे भीष्मपार्थयोः ॥

naitadanyo manuṣyeṣu pradarśayitumāhave | mahāstrāṇāṃ saṃprayogaṃ samare bhīṣmapārthayoḥ

"मनुष्यों में कोई दूसरा युद्ध में भीष्म और पार्थ जैसा महान अस्त्रों का यह प्रयोग नहीं दिखा सकता।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (4.63.22)

एवं सर्वास्त्रविदुषोरस्त्रयुद्धमवर्तत ॥

evaṃ sarvāstraviduṣorastrayuddhamavartata

इस प्रकार सब अस्त्रों के ज्ञाता उन दोनों में अस्त्र-युद्ध चलता रहा।

श्लोक 23 (4.63.23)

अथ जिष्णुरुदावृत्य शितधारेण कार्मुकम् । न्यकृन्तद्गृध्रपत्रेण शातकुम्भपरिष्कृतम् ॥

atha jiṣṇurudāvṛtya śitadhāreṇa kārmukam | nyakṛntadgṛdhrapatreṇa śātakumbhapariṣkṛtam

तब जिष्णु ने मुड़कर तीखी धार वाले, गिद्ध के पंखों से युक्त बाण से भीष्म का सोने से सजा धनुष काट डाला।

श्लोक 24 (4.63.24)

निमेषान्तरमात्रेण भीष्मोऽन्यत्कार्मुकं रणे । समादाय नरव्याघ्रः सज्यं चक्रे महाबलः ॥

nimeṣāntaramātreṇa bhīṣmo'nyatkārmukaṃ raṇe | samādāya naravyāghraḥ sajyaṃ cakre mahābalaḥ

पलक झपकते ही नरश्रेष्ठ महाबली भीष्म ने रण में दूसरा धनुष उठाकर उस पर डोरी चढ़ा दी।

श्लोक 25 (4.63.25)

शरांश्च सुबहुन्क्रुद्धो मुमोचाशु धनंजये । अर्जुनोऽपि शरांस्तीक्ष्णान्भीष्माय निशितान्बहून् । चिक्षेप च महातेजास्तथा भीष्मश्च पाण्डवे ॥

śarāṃśca subahunkruddho mumocāśu dhanaṃjaye | arjuno'pi śarāṃstīkṣṇānbhīṣmāya niśitānbahūn | cikṣepa ca mahātejāstathā bhīṣmaśca pāṇḍave

क्रोध में भरकर उन्होंने शीघ्र ही धनंजय पर बहुत-से बाण छोड़े। महातेजस्वी अर्जुन ने भी भीष्म पर बहुत-से तीखे, पैने बाण चलाए, और भीष्म ने भी वैसे ही पाण्डुपुत्र पर।

श्लोक 26 (4.63.26)

तयोर्दिव्यास्त्रविदुषोरस्यतोरनिशं शरान् । न विशेषस्तदा राजन्दृश्यते सुमहात्मनोः ॥

tayordivyāstraviduṣorasyatoraniśaṃ śarān | na viśeṣastadā rājandṛśyate sumahātmanoḥ

दिव्यास्त्रों के ज्ञाता वे दोनों महात्मा निरन्तर बाण चला रहे थे; हे राजन्, तब उनमें कोई अन्तर दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 27 (4.63.27)

अथावृणोद्दश दिशः शरैरतिरथस्तदा । किरीटमाली कौन्तेयः शूरं शान्तनवं तथा ॥

athāvṛṇoddaśa diśaḥ śarairatirathastadā | kirīṭamālī kaunteyaḥ śūraṃ śāntanavaṃ tathā

तब किरीटधारी अतिरथी कुन्तीपुत्र ने दसों दिशाओं को बाणों से ढक दिया, और वीर शान्तनुनन्दन को भी।

श्लोक 28 (4.63.28)

अतीव पाण्डवो भीष्मं भीष्मश्चातीव पाण्डवम् । बभूव तत्र सङ्घेऽस्मिन्लोके राजंस्तदद्भुतम् ॥

atīva pāṇḍavo bhīṣmaṃ bhīṣmaścātīva pāṇḍavam | babhūva tatra saṅghe'sminloke rājaṃstadadbhutam

उस संग्राम में पाण्डुपुत्र भीष्म से बढ़ जाते और भीष्म पाण्डुपुत्र से; हे राजन्, संसार में यह एक अद्भुत दृश्य था।

श्लोक 29 (4.63.29)

पाण्डवेन हताः शूरा भीष्मस्य रथरक्षिणः । शेरते स्म महाबाहो कौन्तेयस्याभितो रथम् ॥

pāṇḍavena hatāḥ śūrā bhīṣmasya ratharakṣiṇaḥ | śerate sma mahābāho kaunteyasyābhito ratham

हे महाबाहु, पाण्डुपुत्र के हाथों मारे गए भीष्म के वीर रथरक्षक कुन्तीपुत्र के रथ के चारों ओर पड़े थे।

श्लोक 30 (4.63.30)

ततो गाण्डीवनिर्मुक्ता निरमित्रं चिकीर्षवः । असक्ताः पुङ्खसंसक्ताः श्वेतवाहनपत्रिणः ॥

tato gāṇḍīvanirmuktā niramitraṃ cikīrṣavaḥ | asaktāḥ puṅkhasaṃsaktāḥ śvetavāhanapatriṇaḥ

तब श्वेत घोड़ों वाले अर्जुन के पंखधारी बाण, जो शत्रुओं का सफाया करना चाहते थे, गाण्डीव से छूटकर बिना रुके, एक-दूसरे के पंखों से सटे हुए चलने लगे,

श्लोक 31 (4.63.31)

निष्पतन्तो रथात्तस्य धौता हैरण्यवाससः । आकाशे प्रत्यदृश्यन्त हंसानामिव पङ्क्तयः ॥

niṣpatanto rathāttasya dhautā hairaṇyavāsasaḥ | ākāśe pratyadṛśyanta haṃsānāmiva paṅktayaḥ

और उनके रथ से निकलते हुए वे चमकीले, सुनहरे बाण आकाश में हंसों की पंक्तियों जैसे दिखाई देते थे।

श्लोक 32 (4.63.32)

तस्य तद्दिव्यमस्त्रं हि प्रगाढं चित्रमस्यतः । प्रेक्षन्ते स्मान्तरिक्षस्थाः सर्वे देवाः सवासवाः ॥

tasya taddivyamastraṃ hi pragāḍhaṃ citramasyataḥ | prekṣante smāntarikṣasthāḥ sarve devāḥ savāsavāḥ

आकाश में स्थित इन्द्र सहित सभी देवता उनके द्वारा छोड़े जा रहे उस प्रबल और विचित्र दिव्य अस्त्र को देख रहे थे।

श्लोक 33 (4.63.33)

तं दृष्ट्वा परमप्रीतो गन्धर्वश्चित्रमद्भुतम् । शशंस देवराजाय चित्रसेनः प्रतापवान् ॥

taṃ dṛṣṭvā paramaprīto gandharvaścitramadbhutam | śaśaṃsa devarājāya citrasenaḥ pratāpavān

उस अद्भुत चमत्कार को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए प्रतापी गन्धर्व चित्रसेन ने देवराज से उसकी प्रशंसा की:

चित्रसेन उवाच

श्लोक 34 (4.63.34)

पश्येमानरिनिर्दारान्संसक्तानिव गच्छतः । चित्ररूपमिदं जिष्णोर्दिव्यमस्त्रमुदीर्यतः ॥

paśyemānarinirdārānsaṃsaktāniva gacchataḥ | citrarūpamidaṃ jiṣṇordivyamastramudīryataḥ

"देखिए, शत्रुओं को चीर देने वाले ये बाण मानो एक-दूसरे से जुड़े हुए चले जा रहे हैं! जिष्णु जो दिव्य अस्त्र छोड़ रहा है, उसका रूप कैसा विचित्र है।

श्लोक 35 (4.63.35)

नेदं मनुष्याः श्रद्दध्युर्न हीदं तेषु विद्यते । सौराणां च महास्त्राणां विचित्रोऽयं समागमः ॥

nedaṃ manuṣyāḥ śraddadhyurna hīdaṃ teṣu vidyate | saurāṇāṃ ca mahāstrāṇāṃ vicitro'yaṃ samāgamaḥ

मनुष्य इस पर विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि उनमें ऐसा कुछ नहीं पाया जाता। यह महान दिव्य अस्त्रों का अनोखा संगम है।

श्लोक 36 (4.63.36)

मध्यन्दिनगतं सूर्यं प्रतपन्तमिवाम्बरे । न शक्नुवन्ति सैन्यानि पाण्डवं प्रसमीक्षितुम् ॥

madhyandinagataṃ sūryaṃ pratapantamivāmbare | na śaknuvanti sainyāni pāṇḍavaṃ prasamīkṣitum

जैसे आकाश में दोपहर के तपते सूर्य को कोई नहीं देख पाता, वैसे ही सेनाएँ पाण्डुपुत्र की ओर देख नहीं पातीं।

श्लोक 37 (4.63.37)

उभौ विश्रुतकर्माणावुभौ शूरौ महीक्षिताम् । उभौ विचित्रकर्माणावुभौ युधि दुरासदौ ॥

ubhau viśrutakarmāṇāvubhau śūrau mahīkṣitām | ubhau vicitrakarmāṇāvubhau yudhi durāsadau

दोनों अपने कर्मों के लिए विख्यात हैं, दोनों राजाओं में शूरवीर हैं, दोनों के कर्म विचित्र हैं, और दोनों से युद्ध में भिड़ना कठिन है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 38 (4.63.38)

इत्युक्तो देवराजस्तु पार्थभीष्मसमागमम् । पूजयामास दिव्येन पुष्पवर्षेण भारत ॥

ityukto devarājastu pārthabhīṣmasamāgamam | pūjayāmāsa divyena puṣpavarṣeṇa bhārata

हे भारत, यह सुनकर देवराज ने दिव्य पुष्पों की वर्षा करके पार्थ और भीष्म के उस युद्ध का सम्मान किया।

श्लोक 39 (4.63.39)

अश्वत्थामा ततोऽभ्येत्य द्रुतं कर्णमभाषत । अहमेको हनिष्यामि समेतान्सर्वपाण्डवान् ॥

aśvatthāmā tato'bhyetya drutaṃ karṇamabhāṣata | ahameko haniṣyāmi sametānsarvapāṇḍavān

तब अश्वत्थामा ने शीघ्रता से पास आकर कर्ण से कहा: "'मैं अकेला ही सब पाण्डवों को एक साथ मार डालूँगा' —

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 40 (4.63.40)

इति कर्म समक्षं मे सभामध्ये त्वयोदितम् । न तु तत्कृतमेकस्माद्भीतो धावसि सूतज ॥

iti karma samakṣaṃ me sabhāmadhye tvayoditam | na tu tatkṛtamekasmādbhīto dhāvasi sūtaja

यह तुमने सभा के बीच मेरे सामने कहा था। पर तुमने वह किया नहीं; हे सूतपुत्र, एक ही व्यक्ति से डरकर तुम भाग रहे हो।

श्लोक 41 (4.63.41)

वैचित्रवीर्यजाः सर्वे त्वामाश्रित्य पृथासुतान् । जेतुमिच्छन्ति संग्रामे भवान्युध्यस्व फल्गुनम् ॥

vaicitravīryajāḥ sarve tvāmāśritya pṛthāsutān | jetumicchanti saṃgrāme bhavānyudhyasva phalgunam

विचित्रवीर्य के वंश में जन्मे सभी कौरव तुम्हारे ही भरोसे युद्ध में पृथा के पुत्रों को जीतना चाहते हैं। तुम स्वयं फाल्गुन से युद्ध करो!"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 42 (4.63.42)

अश्वत्थामोदितं वाक्यं श्रुत्वा दुर्योधनस्तदा । प्रत्युवाच रुषा द्रौणिं कर्णप्रियचिकीर्षया ॥

aśvatthāmoditaṃ vākyaṃ śrutvā duryodhanastadā | pratyuvāca ruṣā drauṇiṃ karṇapriyacikīrṣayā

अश्वत्थामा की यह बात सुनकर कर्ण को प्रसन्न करने की इच्छा से दुर्योधन ने रोष के साथ द्रोणपुत्र को उत्तर दिया:

दुर्योधन उवाच

श्लोक 43 (4.63.43)

मा मानभङ्गं विप्रेन्द्र कुरु विश्रुतकर्मणः । मानभङ्गेन राज्ञां तु बलहानिर्भविष्यति ॥

mā mānabhaṅgaṃ viprendra kuru viśrutakarmaṇaḥ | mānabhaṅgena rājñāṃ tu balahānirbhaviṣyati

"हे विप्रश्रेष्ठ, विख्यात कर्मों वाले इस वीर का मान भंग मत करो। राजाओं का मान भंग होने से उनका बल घट जाता है।

श्लोक 44 (4.63.44)

शूरा वदन्ति संग्रामे वाचा कर्माणि कुर्वते । पराक्रमन्ति संग्रामे स्वस्य वीर्यानुसारतः ॥

śūrā vadanti saṃgrāme vācā karmāṇi kurvate | parākramanti saṃgrāme svasya vīryānusārataḥ

शूरवीर बोलते हैं और युद्ध में अपने वचनों को कर्म में बदल देते हैं; वे संग्राम में अपने-अपने बल के अनुसार पराक्रम दिखाते हैं।

श्लोक 45 (4.63.45)

तस्मात्तं नार्हति भवान्गर्हितुं शूरसंमतम् ॥

tasmāttaṃ nārhati bhavāngarhituṃ śūrasaṃmatam

इसलिए वीरों द्वारा सम्मानित इस पुरुष की निन्दा करना तुम्हें शोभा नहीं देता।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 46 (4.63.46)

राज्ञैवमुक्तः स द्रौणिर्गतरोषोऽभवत्तदा ॥

rājñaivamuktaḥ sa drauṇirgataroṣo'bhavattadā

राजा के ऐसा कहने पर द्रोणपुत्र का क्रोध शान्त हो गया।

श्लोक 47 (4.63.47)

ततो भीष्मः शान्तनवो बाणान्पार्श्वे समार्पयत् । अस्यतः प्रतिसन्धाय विवृतं सव्यसाचिनः ॥

tato bhīṣmaḥ śāntanavo bāṇānpārśve samārpayat | asyataḥ pratisandhāya vivṛtaṃ savyasācinaḥ

तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने निशाना साधकर बाण छोड़ते हुए सव्यसाची के खुले पार्श्व में बाण गाड़ दिए।

श्लोक 48 (4.63.48)

ततः प्रसह्य बीभत्सुः पृथुधारेण कार्मुकम् । न्यकृन्तद्गृध्रपत्रेण भीष्मस्यामिततेजसः ॥

tataḥ prasahya bībhatsuḥ pṛthudhāreṇa kārmukam | nyakṛntadgṛdhrapatreṇa bhīṣmasyāmitatejasaḥ

तब बीभत्सु ने बलपूर्वक चौड़ी धार वाले, गिद्ध के पंखों से युक्त बाण से अमित तेजस्वी भीष्म का धनुष काट डाला।

श्लोक 49 (4.63.49)

अथैनं दशभिः पश्चात्प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे । यतमानं पराक्रान्तं कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः ॥

athainaṃ daśabhiḥ paścātpratyavidhyatstanāntare | yatamānaṃ parākrāntaṃ kuntīputro dhanañjayaḥ

फिर कुन्तीपुत्र धनंजय ने पराक्रम से जूझते हुए भीष्म की छाती में बदले में दस बाण मारे।

श्लोक 50 (4.63.50)

स पीडितो महाबाहुर्गृहीत्वा रथकूबरम् । गाङ्गेयो युधि दुर्धर्षस्तस्थौ दीप इवातुरः ॥

sa pīḍito mahābāhurgṛhītvā rathakūbaram | gāṅgeyo yudhi durdharṣastasthau dīpa ivāturaḥ

घायल होकर युद्ध में दुर्जय महाबाहु गंगापुत्र रथ का कूबर पकड़कर बुझते दीपक की भाँति पीड़ित खड़े रह गए।

श्लोक 51 (4.63.51)

तं विसंज्ञमपोवाह संयन्ता रथवाजिनाम् । उपदेशमनुस्मृत्य रक्षमाणो महारथम् ॥

taṃ visaṃjñamapovāha saṃyantā rathavājinām | upadeśamanusmṛtya rakṣamāṇo mahāratham

उन्हें अचेत देखकर रथ के घोड़ों को हाँकने वाला सारथि दी गई सीख को याद करके उस महारथी की रक्षा के लिए उन्हें रणभूमि से दूर ले गया।

श्लोक 52 (4.63.52)

पराक्रमे च शौर्ये च वीर्ये सत्त्वे बले रणे । शस्त्रास्त्रेषु च सर्वेषु लाघवे दूरपातने ॥

parākrame ca śaurye ca vīrye sattve bale raṇe | śastrāstreṣu ca sarveṣu lāghave dūrapātane

जो पराक्रम और शौर्य में, वीर्य, सत्त्व और रण में बल में, सभी शस्त्रास्त्रों में, फुर्ती में और दूर तक मार करने में,

श्लोक 53 (4.63.53)

यस्य नास्ति समो लोके पितृदत्तवरश्च यः । जितश्रमो जितारातिर्निस्तन्द्रिः खेदवर्जितः । यः स्वेच्छामरणः शूरः पितृशुश्रूषणे रतः ॥

yasya nāsti samo loke pitṛdattavaraśca yaḥ | jitaśramo jitārātirnistandriḥ khedavarjitaḥ | yaḥ svecchāmaraṇaḥ śūraḥ pitṛśuśrūṣaṇe rataḥ

संसार में जिसकी बराबरी का कोई नहीं; जिसे पिता से वर मिला है; जिसने थकान और शत्रुओं को जीत लिया है, जो न आलस्य जानता है न श्रान्ति; जो अपनी इच्छा से ही मृत्यु पाने वाला शूरवीर है और पिता की सेवा में लगा रहा —

श्लोक 54 (4.63.54)

दुर्योधनहितार्थाय युद्ध्वा पार्थेन संगरे । पृथासुतहितार्थाय पराजित इवाभवत् ॥

duryodhanahitārthāya yuddhvā pārthena saṃgare | pṛthāsutahitārthāya parājita ivābhavat

वही भीष्म दुर्योधन के हित के लिए पार्थ से युद्ध करके, पृथा के पुत्रों के हित के लिए, मानो पराजित हो गए।

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