विराट पर्व · अध्याय 64
अर्जुन का पाँच महारथियों पर आक्रमण
भीष्म को परास्त करके अर्जुन कर्ण और अन्य महारथियों की ओर बढ़ते हैं। अश्वत्थामा सभा में की गई डींगों की याद दिलाकर कर्ण को ताना मारता है; कर्ण कहता है कि वह न अर्जुन से डरता है न कृष्ण से, और अश्वत्थामा उसे अपने वचन सच करने को कहता है। पाँचों महारथी अर्जुन को घेर लेते हैं, पर उनका दिव्यास्त्र रणभूमि को बाणों से ढक देता है और कौरव योद्धाओं का साहस टूट जाता है। अर्जुन उत्तर से रथ अश्वत्थामा की ओर मोड़ने को कहते हैं; कर्ण उन्हें मार डालने की ठानता है, पर द्रोण सलाह देते हैं कि एक कोस पीछे हटकर सेना को साथ लेकर फिर आक्रमण करें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.64.1)
भीष्मं विजित्य संग्रामे कुरूणां मिषतां रणे । ततो युद्धमनाः प्रायात्पार्थः पञ्च महारथान् ॥
bhīṣmaṃ vijitya saṃgrāme kurūṇāṃ miṣatāṃ raṇe | tato yuddhamanāḥ prāyātpārthaḥ pañca mahārathān
कुरुओं के देखते-देखते युद्ध में भीष्म को जीतकर युद्ध के लिए उत्सुक पार्थ पाँच महारथियों की ओर बढ़े।
श्लोक 2 (4.64.2)
आददानश्च नाराचान्विमृशन्निषुधी अपि । संस्पृशानश्च गाण्डीवं भूयः कर्णं समभ्यगात् ॥
ādadānaśca nārācānvimṛśanniṣudhī api | saṃspṛśānaśca gāṇḍīvaṃ bhūyaḥ karṇaṃ samabhyagāt
लोहे के बाण निकालते, अपने दोनों तूणीरों को टटोलते और गाण्डीव को छूते हुए वे फिर कर्ण की ओर बढ़े।
द्रौणिरुवाच
श्लोक 3 (4.64.3)
कर्ण यत्तत्सभामध्ये बह्वबद्धं प्रभाषसे । न मे युधि समोऽस्तीति तदिदं प्रत्युपस्थितम् ॥
karṇa yattatsabhāmadhye bahvabaddhaṃ prabhāṣase | na me yudhi samo'stīti tadidaṃ pratyupasthitam
"कर्ण, तुम सभा के बीच जो बहुत-सी अनर्गल बातें कहा करते थे कि युद्ध में मेरी बराबरी का कोई नहीं, वही बात अब सामने आ खड़ी हुई है।
श्लोक 4 (4.64.4)
एषोऽन्तक इव क्रुद्धः सर्वभूतावमर्दनः । अदूरात्प्रत्युपस्थाय जृम्भते केसरी यथा । न पलायस्व शूरश्चेत्स्थित्वा युध्यस्व फल्गुनम् ॥
eṣo'ntaka iva kruddhaḥ sarvabhūtāvamardanaḥ | adūrātpratyupasthāya jṛmbhate kesarī yathā | na palāyasva śūraścetsthitvā yudhyasva phalgunam
यह रहा वह, क्रोधित यमराज के समान, सब प्राणियों को रौंदने वाला, पास आकर सिंह की तरह अँगड़ाई ले रहा है। यदि तुम शूर हो तो भागो मत, डटकर फाल्गुन से युद्ध करो।"
कर्ण उवाच
श्लोक 5 (4.64.5)
नाहं बिभेमि बीभत्सोः कृष्णाद्वा देवकीसुतात् । पाण्डवेभ्योऽपि सर्वेभ्यः क्षत्रधर्ममनुव्रतः ॥
nāhaṃ bibhemi bībhatsoḥ kṛṣṇādvā devakīsutāt | pāṇḍavebhyo'pi sarvebhyaḥ kṣatradharmamanuvrataḥ
"मैं क्षत्रिय-धर्म का पालन करने वाला हूँ; मैं न बीभत्सु से डरता हूँ, न देवकीपुत्र कृष्ण से, न ही सब पाण्डवों से।
श्लोक 6 (4.64.6)
सत्त्वाधिकानां शूराणां धनुर्वेदोपजीविनाम् । दर्शनाज्जायते दर्पः स्वरश्च न विषीदति ॥
sattvādhikānāṃ śūrāṇāṃ dhanurvedopajīvinām | darśanājjāyate darpaḥ svaraśca na viṣīdati
धनुर्वेद से जीविका चलाने वाले, अधिक साहसी शूरवीरों में शत्रु को देखते ही दर्प जाग उठता है, और उनका स्वर नहीं काँपता।
श्लोक 7 (4.64.7)
पश्यत्वाचार्यपुत्रो मामर्जुनेन समं युधि । युध्यमानं सुसंयुक्तं दैवं तु दुरतिक्रमम् ॥
paśyatvācāryaputro māmarjunena samaṃ yudhi | yudhyamānaṃ susaṃyuktaṃ daivaṃ tu duratikramam
आचार्यपुत्र देखें कि मैं पूरी तैयारी के साथ युद्ध में अर्जुन से कैसे लड़ता हूँ; यद्यपि दैव को लाँघना कठिन है।"
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 8 (4.64.8)
को दोषः कर्ण शूराणां वाचा साकं हि पौरुषम् । विद्यते यदि तल्लोके गुणोत्तरमिहोच्यते ॥
ko doṣaḥ karṇa śūrāṇāṃ vācā sākaṃ hi pauruṣam | vidyate yadi talloke guṇottaramihocyate
"कर्ण, यदि शूरवीरों के वचन के साथ पौरुष भी हो तो इसमें क्या दोष है? संसार में जहाँ यह पाया जाता है, उसे सबसे बड़ा गुण कहा जाता है।
श्लोक 9 (4.64.9)
युध्यस्व त्वमभीः पार्थं प्रपलायस्व मा रणात् । उक्तं वचः स्मरन्कर्ण नाहमित्यादि संयुगे ॥
yudhyasva tvamabhīḥ pārthaṃ prapalāyasva mā raṇāt | uktaṃ vacaḥ smarankarṇa nāhamityādi saṃyuge
कर्ण, निर्भय होकर पार्थ से युद्ध करो और रण से मत भागो; युद्ध में अपने कहे "मैं नहीं डरता…" आदि वचनों को याद रखो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (4.64.10)
तं समन्ताद्रथाः पञ्च परिवार्य धनञ्जयम् । त इषून्सम्यगस्यन्तो मुमुक्षन्तोऽपि जीवितात् ॥
taṃ samantādrathāḥ pañca parivārya dhanañjayam | ta iṣūnsamyagasyanto mumukṣanto'pi jīvitāt
तब पाँचों रथियों ने धनंजय को चारों ओर से घेर लिया; वे भली-भाँति बाण चलाते हुए उनके प्राण लेने पर तुले थे।
श्लोक 11 (4.64.11)
ते लाभमिव मन्वानाः क्षिप्रमार्च्छन्धनञ्जयम् । शरौघान्सम्यगस्यन्तो जीमूता इव वार्षिकाः ॥
te lābhamiva manvānāḥ kṣipramārcchandhanañjayam | śaraughānsamyagasyanto jīmūtā iva vārṣikāḥ
उन्हें हाथ आया लाभ समझकर वे वर्षा ऋतु के बादलों की तरह बाणों की झड़ी लगाते हुए शीघ्र ही धनंजय पर टूट पड़े।
श्लोक 12 (4.64.12)
बहुभिर्निशितैर्बाणैर्विविधैर्लोमवापिभिः । आद्रवन्प्रत्यवस्थाय प्रत्यविध्यन्धनञ्जयम् ॥
bahubhirniśitairbāṇairvividhairlomavāpibhiḥ | ādravanpratyavasthāya pratyavidhyandhanañjayam
वे दौड़कर आए, डटकर खड़े हुए और रोम तक काट देने वाले अनेक प्रकार के तीखे बाणों से धनंजय को बींधने लगे।
श्लोक 13 (4.64.13)
ततः प्रहस्य बीभत्सुः सर्वशस्त्रभृतांवरः । दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणः प्रत्ययाद्रथसत्तमान् ॥
tataḥ prahasya bībhatsuḥ sarvaśastrabhṛtāṃvaraḥ | divyamastraṃ vikurvāṇaḥ pratyayādrathasattamān
तब सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ बीभत्सु ने हँसकर दिव्यास्त्र का प्रयोग करते हुए उन श्रेष्ठ रथियों पर धावा बोला।
श्लोक 14 (4.64.14)
यथा रश्मिभिरादित्यः प्रच्छादयति मेदिनीम् । एवं गाण्डीवनिर्मुक्तैः शरैः प्राच्छादयद्दिशः ॥
yathā raśmibhirādityaḥ pracchādayati medinīm | evaṃ gāṇḍīvanirmuktaiḥ śaraiḥ prācchādayaddiśaḥ
जैसे सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी को ढक लेता है, वैसे ही उन्होंने गाण्डीव से छूटे बाणों से दिशाओं को ढक दिया।
श्लोक 15 (4.64.15)
न रथानां न नागानां न ध्वजानां न वाजिनाम् । अविद्धं निशितैर्बाणैरासीद्द्व्यङ्गुलमन्तरम् ॥
na rathānāṃ na nāgānāṃ na dhvajānāṃ na vājinām | aviddhaṃ niśitairbāṇairāsīddvyaṅgulamantaram
रथों, हाथियों, ध्वजाओं और घोड़ों पर दो अंगुल भर भी ऐसी जगह नहीं बची जो उनके तीखे बाणों से न बिंधी हो।
श्लोक 16 (4.64.16)
सर्वे शान्तिपरा योधाः स्वचित्तं नाभिजज्ञिरे । हस्तिनोऽश्वाश्च वित्रस्ता व्यवलीयन्त भारत ॥
sarve śāntiparā yodhāḥ svacittaṃ nābhijajñire | hastino'śvāśca vitrastā vyavalīyanta bhārata
सब योद्धा युद्ध से विमुख हो गए और उन्हें अपनी सुध-बुध न रही; हे भारत, हाथी और घोड़े भयभीत होकर दुबक गए।
श्लोक 17 (4.64.17)
यथा नलवनं नागः प्रभिन्नः षाष्टिहायनः । एवं सर्वानपामृद्नादर्जुनः शस्त्रतेजसा ॥
yathā nalavanaṃ nāgaḥ prabhinnaḥ ṣāṣṭihāyanaḥ | evaṃ sarvānapāmṛdnādarjunaḥ śastratejasā
जैसे साठ वर्ष का मदमत्त हाथी सरकंडों के वन को रौंद डालता है, वैसे ही अर्जुन ने अपने शस्त्रों के तेज से उन सबको कुचल डाला।
श्लोक 18 (4.64.18)
गाण्डीवस्य तु घोषेण पृथिवी समकम्पत । मनांसि धार्तराष्ट्राणामप्यकृन्तद्धनञ्जयः ॥
gāṇḍīvasya tu ghoṣeṇa pṛthivī samakampata | manāṃsi dhārtarāṣṭrāṇāmapyakṛntaddhanañjayaḥ
गाण्डीव की टंकार से पृथ्वी काँप उठी, और धनंजय ने धृतराष्ट्र के पक्ष वालों के मन भी चीर डाले।
श्लोक 19 (4.64.19)
ततो विगाह्य सैन्यानां मध्यं शस्त्रभृतांवरः । सारथिं समरे शूरस्त्वभ्यभाषत वीर्यवान् ॥
tato vigāhya sainyānāṃ madhyaṃ śastrabhṛtāṃvaraḥ | sārathiṃ samare śūrastvabhyabhāṣata vīryavān
तब सेनाओं के बीच घुसकर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ उस पराक्रमी वीर ने युद्ध में अपने सारथि से कहा:
अर्जुन उवाच
श्लोक 20 (4.64.20)
संनियम्य हयानेतान्मन्दं वाहय सारथे । आचार्यपुत्रं समरे योधयिष्येऽपराजितम् ॥
saṃniyamya hayānetānmandaṃ vāhaya sārathe | ācāryaputraṃ samare yodhayiṣye'parājitam
"सारथि, इन घोड़ों को रोककर धीरे-धीरे हाँको। मैं युद्ध में अपराजित आचार्यपुत्र से लड़ूँगा।
श्लोक 21 (4.64.21)
पुरा ह्येष मया युक्तः स मे भवति पृष्ठतः ॥
purā hyeṣa mayā yuktaḥ sa me bhavati pṛṣṭhataḥ
पहले मैं इससे भिड़ चुका हूँ, और अब यह मेरे पीछे है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (4.64.22)
एवमुक्तेऽर्जुनेनासावश्वत्थामरथं प्रति । विराटपुत्रो जवनान्भृशमश्वानचोदयत् ॥
evamukte'rjunenāsāvaśvatthāmarathaṃ prati | virāṭaputro javanānbhṛśamaśvānacodayat
अर्जुन के ऐसा कहने पर विराटपुत्र ने वेगवान घोड़ों को अश्वत्थामा के रथ की ओर तेज़ी से दौड़ाया।
कर्ण उवाच
श्लोक 23 (4.64.23)
एषोपयाति बीभत्सुर्व्यथितो गाढवेदनः । तं तु तत्रैव यास्यामि नासौ मुच्येत जीवितात् ॥
eṣopayāti bībhatsurvyathito gāḍhavedanaḥ | taṃ tu tatraiva yāsyāmi nāsau mucyeta jīvitāt
"यह बीभत्सु आ रहा है, व्याकुल और गहरे घावों से पीड़ित। मैं वहीं उस पर टूट पड़ूँगा; यह जीवित नहीं बचेगा।"
द्रोण उवाच
श्लोक 24 (4.64.24)
नासौ भयेन निर्यातो महात्मा पाकशासनिः । नैवं भीता निवर्तन्ते न पुनर्गाढवेदनाः ॥
nāsau bhayena niryāto mahātmā pākaśāsaniḥ | naivaṃ bhītā nivartante na punargāḍhavedanāḥ
"वह महात्मा इन्द्रपुत्र भय के कारण नहीं निकला है। जो डरे हुए और गहरे घायल होते हैं, वे इस तरह लौटकर नहीं आते।
श्लोक 25 (4.64.25)
यद्येनमभिसंरब्धं पुनरेवाभियास्यसि । बहून्यस्त्राणि जानीते न पुनर्मोक्ष्यते भवान् ॥
yadyenamabhisaṃrabdhaṃ punarevābhiyāsyasi | bahūnyastrāṇi jānīte na punarmokṣyate bhavān
यदि तुम क्रोध में भरे उस वीर पर फिर से धावा बोलोगे, तो वह अनेक अस्त्र जानता है, तुम दोबारा नहीं छूट पाओगे।
श्लोक 26 (4.64.26)
दिष्ट्या दुर्योधनो मुक्तो दिष्ट्या गावः पलायिताः । मुक्तो दिष्ट्या च संग्रामे किं रणेन करिष्यसि ॥
diṣṭyā duryodhano mukto diṣṭyā gāvaḥ palāyitāḥ | mukto diṣṭyā ca saṃgrāme kiṃ raṇena kariṣyasi
सौभाग्य से दुर्योधन छूट गया, सौभाग्य से गौएँ भाग गईं, और सौभाग्य से तुम भी युद्ध में बच निकले। अब युद्ध करके क्या पाओगे?
श्लोक 27 (4.64.27)
क्रोशमात्रमपाक्रम्य बलमन्वानयामहे । अन्वागतबलाः पार्थं पुनरेवाभियास्यथ ॥
krośamātramapākramya balamanvānayāmahe | anvāgatabalāḥ pārthaṃ punarevābhiyāsyatha
आओ, एक कोस पीछे हटकर सेना को साथ ले आएँ; सेना के आ जाने पर तुम सब फिर पार्थ पर आक्रमण करना।"