विराट पर्व · अध्याय 65
उत्तर के सामने अर्जुन का आत्म-परिचय और दुर्योधन के भाइयों की पराजय
कर्ण की हार के बाद अर्जुन उत्तर से कहते हैं कि वह उन्हें भीष्म की सुनहरी ताल-ध्वजा के पास ले चले, और उसका उत्साह बढ़ाने के लिए अपने पराक्रम — निवातकवचों का वध, हिरण्यपुर का विनाश, पौलोमों और कालकेयों का संहार — तथा देवताओं से पाए दिव्यास्त्रों का वर्णन करते हैं। उत्तर रथ को कौरवों की सेना में ले जाता है; दुःशासन, विकर्ण, दुःसह, विविंशति आदि आक्रमण करते हैं और घायल होकर भगा दिए जाते हैं, और रणभूमि कटे सिरों से पट जाती है। तब दुर्योधन, कर्ण, शकुनि, द्रोण, अश्वत्थामा और कृप मिलकर अर्जुन को घेरते हैं, पर उनका ऐन्द्र अस्त्र सारी रणभूमि को ढक लेता है और पूरी कौरव सेना भय से भाग खड़ी होती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.65.1)
कर्णं पराजितं दृष्ट्वा पार्थो वैराटिमब्रवीत् । एतं मां प्रापयेदानीं रथवृन्दं प्रहारिणाम् ॥
karṇaṃ parājitaṃ dṛṣṭvā pārtho vairāṭimabravīt | etaṃ māṃ prāpayedānīṃ rathavṛndaṃ prahāriṇām
कर्ण को पराजित देखकर पार्थ ने विराटपुत्र से कहा: "अब मुझे प्रहार करने वाले योद्धाओं के उस रथ-समूह के पास ले चलो,
अर्जुन उवाच
श्लोक 2 (4.65.2)
यत्र शान्तनवो भीष्मः सर्वेषां नः पितामहः । सुयुद्धं काङ्क्षमाणो वै रथे तिष्ठति दंशितः ॥
yatra śāntanavo bhīṣmaḥ sarveṣāṃ naḥ pitāmahaḥ | suyuddhaṃ kāṅkṣamāṇo vai rathe tiṣṭhati daṃśitaḥ
जहाँ हम सबके पितामह शान्तनुनन्दन भीष्म अच्छे युद्ध की इच्छा से कवच पहने रथ पर खड़े हैं,
श्लोक 3 (4.65.3)
तालो वै काञ्चनो यत्र वज्रवैडूर्यभूषितः । अतीव समरे भाति मातरिश्वप्रकम्पितः ॥
tālo vai kāñcano yatra vajravaiḍūryabhūṣitaḥ | atīva samare bhāti mātariśvaprakampitaḥ
जहाँ हीरों और वैदूर्य से सजी सोने की ताल-ध्वजा हवा से हिलती हुई युद्ध में बहुत शोभा पा रही है।
श्लोक 4 (4.65.4)
दारुणं प्रहरिष्यामि रथबृन्दानि धन्विनाम् । आदास्याम्यहमेतेषां धनुर्ज्यावेष्टनानि च ॥
dāruṇaṃ prahariṣyāmi rathabṛndāni dhanvinām | ādāsyāmyahameteṣāṃ dhanurjyāveṣṭanāni ca
मैं उन धनुर्धरों के रथ-समूहों पर भीषण प्रहार करूँगा और उनके धनुष, प्रत्यंचाएँ और शिरोवेष्टन छीन लूँगा।
श्लोक 5 (4.65.5)
अस्यन्तं दिव्यमस्त्राणि चित्रमुत्तर पश्यसि ॥
asyantaṃ divyamastrāṇi citramuttara paśyasi
उत्तर, तुम मुझे अद्भुत ढंग से दिव्यास्त्र चलाते हुए देखोगे।
श्लोक 6 (4.65.6)
शतह्रदां जृम्भमाणां मेघस्थां प्रावृषीव च । सुवर्णपृष्ठं गाण्डीवं पश्यन्तु कुरवो मम ॥
śatahradāṃ jṛmbhamāṇāṃ meghasthāṃ prāvṛṣīva ca | suvarṇapṛṣṭhaṃ gāṇḍīvaṃ paśyantu kuravo mama
कुरु मेरे सुनहरी पीठ वाले गाण्डीव को देखें, जो वर्षा ऋतु में बादल से कौंधती बिजली के समान है।
श्लोक 7 (4.65.7)
दक्षिणेनाथ वामेन कतमेन स्विदस्यति । इति मां शत्रवः सर्वे न विज्ञास्यन्ति सारथे ॥
dakṣiṇenātha vāmena katamena svidasyati | iti māṃ śatravaḥ sarve na vijñāsyanti sārathe
सारथि, "यह दाएँ हाथ से बाण चला रहा है या बाएँ से — आख़िर किससे?" — मेरे सब शत्रु यह नहीं जान पाएँगे।
श्लोक 8 (4.65.8)
अस्त्रोदकां हयावर्तां नागनक्रां रथह्रदाम् । नदीं प्रस्कन्दयिष्यामि परलोकापहारिणीम् ॥
astrodakāṃ hayāvartāṃ nāganakrāṃ rathahradām | nadīṃ praskandayiṣyāmi paralokāpahāriṇīm
मैं एक ऐसी नदी बहा दूँगा जिसका जल अस्त्र होंगे, भँवर घोड़े, मगरमच्छ हाथी और गहरे कुण्ड रथ — जो मनुष्यों को परलोक बहा ले जाएगी।
श्लोक 9 (4.65.9)
पाणिपादशिरःपृष्ठबाहुशङ्खचराचरम् । वनं कुरूणां छेत्स्यामि भल्लैः सन्नतपर्वभिः ॥
pāṇipādaśiraḥpṛṣṭhabāhuśaṅkhacarācaram | vanaṃ kurūṇāṃ chetsyāmi bhallaiḥ sannataparvabhiḥ
मैं झुकी गाँठों वाले भल्ल बाणों से कुरुओं के उस वन को काट डालूँगा, जिसकी चल-अचल उपज हाथ, पैर, सिर, पीठ, भुजाएँ और कनपटियाँ हैं।
श्लोक 10 (4.65.10)
तूणीशयाः सुपुङ्खाग्रा विशिखा दुन्दुभिस्वनाः । मया प्रमुक्ताः संग्रामे कुरून्धक्ष्यन्ति सायकाः ॥
tūṇīśayāḥ supuṅkhāgrā viśikhā dundubhisvanāḥ | mayā pramuktāḥ saṃgrāme kurūndhakṣyanti sāyakāḥ
तरकश में रहने वाले, सुन्दर पंखों और नोकों वाले, नगाड़ों जैसी गर्जना करने वाले मेरे बाण युद्ध में छूटकर कुरुओं को भस्म कर देंगे।
श्लोक 11 (4.65.11)
ध्वजवृक्षं शरतृणं नागाश्वश्वापदाकुलम् । रथसिंहगणैर्युक्तं धनुर्वल्लिसमाकुलम् । वनमादीपयिष्यामि कुरूणामस्त्रतेजसा ॥
dhvajavṛkṣaṃ śaratṛṇaṃ nāgāśvaśvāpadākulam | rathasiṃhagaṇairyuktaṃ dhanurvallisamākulam | vanamādīpayiṣyāmi kurūṇāmastratejasā
मैं अपने अस्त्रों के तेज से कुरुओं के उस वन में आग लगा दूँगा, जिसके वृक्ष ध्वजाएँ हैं, घास बाण हैं, जो हाथी-घोड़े रूपी वन्य पशुओं से भरा है, रथी रूपी सिंहों के झुंडों से युक्त है और धनुष रूपी लताओं से छाया हुआ है।
श्लोक 12 (4.65.12)
जयतो भारतीं सेनामेकस्य मम संयुगे । शतं मार्गा भविष्यन्ति पावकस्येव कानने ॥
jayato bhāratīṃ senāmekasya mama saṃyuge | śataṃ mārgā bhaviṣyanti pāvakasyeva kānane
जब मैं अकेला युद्ध में भरतवंशियों की सेना को जीतूँगा, तब उसमें वन में लगी आग की तरह सैकड़ों रास्ते बन जाएँगे।
श्लोक 13 (4.65.13)
मया चक्रमिवाविद्धं सैन्यं द्रक्ष्यसि केवलम् । तानहं रथनीडेभ्यः परलोकाय शात्रवान् । एकः प्रद्रावयिष्यामि चक्रपाणिरिवासुरान् ॥
mayā cakramivāviddhaṃ sainyaṃ drakṣyasi kevalam | tānahaṃ rathanīḍebhyaḥ paralokāya śātravān | ekaḥ pradrāvayiṣyāmi cakrapāṇirivāsurān
तुम देखोगे कि मैंने पूरी सेना को घूमते चक्र की तरह घुमा दिया है। जैसे चक्रधारी विष्णु ने असुरों को खदेड़ा था, वैसे ही मैं अकेला उन शत्रुओं को उनके रथों की बैठकों से परलोक की ओर खदेड़ दूँगा।
श्लोक 14 (4.65.14)
असंभ्रान्तो रथे तिष्ठन्समेषु विषमेषु च । मार्गमावृत्य तिष्ठन्तमपि भेत्स्यामि पर्वतम् ॥
asaṃbhrānto rathe tiṣṭhansameṣu viṣameṣu ca | mārgamāvṛtya tiṣṭhantamapi bhetsyāmi parvatam
समतल और ऊबड़-खाबड़ भूमि पर भी रथ में अविचल खड़ा रहकर मैं रास्ता रोककर खड़े पर्वत को भी चीर डालूँगा।
श्लोक 15 (4.65.15)
अहमिन्द्रस्य संग्रामे द्विषतो बलदर्पितान् । मातलिं सारथिं कृत्वा निवातकवचान्रणे । हतवान्सर्वतः सर्वान्धावतो युध्यतस्तदा ॥
ahamindrasya saṃgrāme dviṣato baladarpitān | mātaliṃ sārathiṃ kṛtvā nivātakavacānraṇe | hatavānsarvataḥ sarvāndhāvato yudhyatastadā
इन्द्र के युद्ध में मैंने मातलि को सारथि बनाकर बल के घमण्ड में चूर शत्रु निवातकवचों को रण में चारों ओर से, भागते हुए भी और लड़ते हुए भी, सबको मार डाला था।
श्लोक 16 (4.65.16)
निवातकवचान्हत्वा गाण्डीवास्त्रैः सहस्रशः । परं पारे समुद्रस्य हिरण्यपुरमारुजम् ॥
nivātakavacānhatvā gāṇḍīvāstraiḥ sahasraśaḥ | paraṃ pāre samudrasya hiraṇyapuramārujam
गाण्डीव के अस्त्रों से हज़ारों निवातकवचों को मारकर मैंने समुद्र के उस पार हिरण्यपुर को ध्वस्त कर दिया था।
श्लोक 17 (4.65.17)
हत्वा षष्टिसहस्राणि रथानामुग्रधन्विनाम् । पौलोमान्कालकेयांश्च समरे भृशदारुणान् । असुरानहनं घोरान्रौद्रेणास्त्रेण सारथे ॥
hatvā ṣaṣṭisahasrāṇi rathānāmugradhanvinām | paulomānkālakeyāṃśca samare bhṛśadāruṇān | asurānahanaṃ ghorānraudreṇāstreṇa sārathe
सारथि, भयंकर धनुष वाले साठ हज़ार रथियों को मारकर मैंने युद्ध में अत्यन्त क्रूर पौलोम और कालकेय असुरों को रौद्र अस्त्र से मार डाला था।
श्लोक 18 (4.65.18)
अहमिन्द्राद्दृढां मुष्टिं ब्रह्मणः क्षिप्रहस्तताम् । प्रगाढनिपुणं चित्रमतिवृद्धं प्रजापतेः ॥
ahamindrāddṛḍhāṃ muṣṭiṃ brahmaṇaḥ kṣiprahastatām | pragāḍhanipuṇaṃ citramativṛddhaṃ prajāpateḥ
मैंने इन्द्र से दृढ़ मुट्ठी, ब्रह्मा से हाथ की फुर्ती और प्रजापति से गहरी, सूक्ष्म, विचित्र और अत्यन्त विकसित युद्ध-कला पाई है।
श्लोक 19 (4.65.19)
रौद्रं रुद्रादहं वेद्मि वारुणं वरुणादपि । सौर्यं सूर्यादहं वेद्मि याम्यं दण्डधरादपि ॥
raudraṃ rudrādahaṃ vedmi vāruṇaṃ varuṇādapi | sauryaṃ sūryādahaṃ vedmi yāmyaṃ daṇḍadharādapi
मैं रुद्र से रौद्र अस्त्र और वरुण से वारुण अस्त्र जानता हूँ; सूर्य से सौर अस्त्र और दण्डधारी यम से याम्य अस्त्र भी जानता हूँ।
श्लोक 20 (4.65.20)
अस्त्रमाग्नेयमग्नेश्च वायव्यं मातरिश्वनः । अन्यैर्देवैरहं प्राप्तः को मां विषहते पुमान् ॥
astramāgneyamagneśca vāyavyaṃ mātariśvanaḥ | anyairdevairahaṃ prāptaḥ ko māṃ viṣahate pumān
आग्नेय अस्त्र मैंने अग्नि से और वायव्य अस्त्र मातरिश्वा (वायु) से पाया है; अन्य देवताओं से भी मुझे अस्त्र मिले हैं। कौन पुरुष मेरा सामना कर सकता है?
श्लोक 21 (4.65.21)
अद्य गाण्डीवनिर्मुक्तैःशरौघै रोमहर्षणैः । कुरूणां पातयिष्यामि रथवृन्दानि धन्विनाम् ॥
adya gāṇḍīvanirmuktaiḥśaraughai romaharṣaṇaiḥ | kurūṇāṃ pātayiṣyāmi rathavṛndāni dhanvinām
आज मैं गाण्डीव से छूटे रोंगटे खड़े कर देने वाले बाणों की बौछारों से कुरु धनुर्धरों के रथ-समूहों को धराशायी कर दूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (4.65.22)
एवमाश्वासितस्तेन वैराटिः सव्यसाचिना । व्यगाहत रथानीकं भीमं भीष्मस्य वाजिभिः ॥
evamāśvāsitastena vairāṭiḥ savyasācinā | vyagāhata rathānīkaṃ bhīmaṃ bhīṣmasya vājibhiḥ
सव्यसाची के इस प्रकार ढाढ़स बँधाने पर विराटपुत्र अपने घोड़ों के साथ भीष्म की भयंकर रथ-सेना में घुस गया।
श्लोक 23 (4.65.23)
रथिसिंहमनाधृष्यं जिगीषन्तं परान्रणे । अभ्यधावत्तदैवोग्रो ज्यां विकर्षन्धनञ्जयः ॥
rathisiṃhamanādhṛṣyaṃ jigīṣantaṃ parānraṇe | abhyadhāvattadaivogro jyāṃ vikarṣandhanañjayaḥ
तब उग्र धनंजय प्रत्यंचा खींचते हुए युद्ध में शत्रुओं को जीतने के इच्छुक उस अजेय रथिसिंह की ओर दौड़े।
श्लोक 24 (4.65.24)
दुःशासनोऽभ्ययात्तूर्णमर्जुनं भरतर्षभः ॥
duḥśāsano'bhyayāttūrṇamarjunaṃ bharatarṣabhaḥ
भरतश्रेष्ठ दुःशासन तेज़ी से अर्जुन की ओर बढ़ा।
श्लोक 25 (4.65.25)
अन्येऽपि चित्राभरणा युवानो मृष्टकुण्डलाः । अभ्ययुर्भीमधन्वानो मौर्वीं पर्यस्य बाहुभिः ॥
anye'pi citrābharaṇā yuvāno mṛṣṭakuṇḍalāḥ | abhyayurbhīmadhanvāno maurvīṃ paryasya bāhubhiḥ
चमकीले आभूषणों और चमचमाते कुण्डलों वाले, भयंकर धनुष धारण करने वाले अन्य युवक भी भुजाओं पर प्रत्यंचा लपेटे आगे बढ़े।
श्लोक 26 (4.65.26)
दुःशासनो विकर्णश्च वृषसेनो विविंशतिः । अभीता भीमधन्वानं पाण्डवं पर्यवारयन् ॥
duḥśāsano vikarṇaśca vṛṣaseno viviṃśatiḥ | abhītā bhīmadhanvānaṃ pāṇḍavaṃ paryavārayan
दुःशासन, विकर्ण, वृषसेन और विविंशति ने निर्भय होकर भयंकर धनुष वाले पाण्डुपुत्र को घेर लिया।
श्लोक 27 (4.65.27)
तस्य दुःशासनः षष्टिं वामपार्श्वे समार्पयत् । अस्यतः प्रतिसन्धाय कुन्तीपुत्रस्य धीमतः ॥
tasya duḥśāsanaḥ ṣaṣṭiṃ vāmapārśve samārpayat | asyataḥ pratisandhāya kuntīputrasya dhīmataḥ
दुःशासन ने निशाना साधकर बाण चलाते हुए बुद्धिमान कुन्तीपुत्र की बाईं पसली में साठ बाण गाड़ दिए।
श्लोक 28 (4.65.28)
पुनश्चैव स भल्लेन विद्ध्वा वैराटिमुत्तरम् । द्वितीयेनार्जुनं वीरं प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे ॥
punaścaiva sa bhallena viddhvā vairāṭimuttaram | dvitīyenārjunaṃ vīraṃ pratyavidhyatstanāntare
फिर उसने एक भल्ल बाण से विराटपुत्र उत्तर को बींधकर दूसरे बाण से वीर अर्जुन की छाती बींध दी।
श्लोक 29 (4.65.29)
तस्य जिष्णुरुदावृत्य क्षुरधारेण कार्मुकम् । प्राकृन्तद्गृध्रपत्रेण जातरूपपरिष्कृतम् ॥
tasya jiṣṇurudāvṛtya kṣuradhāreṇa kārmukam | prākṛntadgṛdhrapatreṇa jātarūpapariṣkṛtam
जिष्णु ने मुड़कर छुरे जैसी धार वाले, गिद्ध के पंखों से युक्त बाण से उसका सोने से सजा धनुष काट डाला।
श्लोक 30 (4.65.30)
अथैनं पञ्चभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे । सोऽपयातो रथोपस्थात्पार्थबाणाभिपीडितः ॥
athainaṃ pañcabhirbāṇaiḥ pratyavidhyatstanāntare | so'payāto rathopasthātpārthabāṇābhipīḍitaḥ
फिर उन्होंने पाँच बाणों से उसकी छाती बींध दी, और पार्थ के बाणों से पीड़ित दुःशासन रथ-युद्ध से हट गया।
श्लोक 31 (4.65.31)
सर्वा दिशश्चाभ्यपतद्बीभत्सुरपराजितः । तं विकर्णः शरैस्तीक्ष्णैर्गृध्रपक्षैः शिलाशितैः । विव्याध परवीरध्नमर्जुनं धृतराष्ट्रजः ॥
sarvā diśaścābhyapatadbībhatsuraparājitaḥ | taṃ vikarṇaḥ śaraistīkṣṇairgṛdhrapakṣaiḥ śilāśitaiḥ | vivyādha paravīradhnamarjunaṃ dhṛtarāṣṭrajaḥ
अपराजित बीभत्सु सब दिशाओं में टूट पड़े। तब धृतराष्ट्रपुत्र विकर्ण ने शत्रु-वीरों का संहार करने वाले अर्जुन को पत्थर पर तेज़ किए गए, गिद्ध-पंखों वाले तीखे बाणों से बींधा।
श्लोक 32 (4.65.32)
ततस्तमपि कौन्तेयः शरेण नतपर्वणा । ललाटेऽभ्यहनद्गाढं स विद्धः प्राद्रवद्भयात् ॥
tatastamapi kaunteyaḥ śareṇa nataparvaṇā | lalāṭe'bhyahanadgāḍhaṃ sa viddhaḥ prādravadbhayāt
कुन्तीपुत्र ने उसे भी झुकी गाँठों वाले बाण से माथे पर ज़ोर से मारा, और बिंधकर वह डर के मारे भाग गया।
श्लोक 33 (4.65.33)
ततः पार्थमुपाद्रुत्य दुस्सहः सविविंशतिः । अवाकिरच्छरैस्तीक्ष्णैः परीप्सन्भ्रातरं रणे ॥
tataḥ pārthamupādrutya dussahaḥ saviviṃśatiḥ | avākiraccharaistīkṣṇaiḥ parīpsanbhrātaraṃ raṇe
तब विविंशति के साथ दुःसह ने पार्थ पर धावा बोलकर, युद्ध में अपने भाई को बचाने की इच्छा से, उन पर तीखे बाणों की वर्षा की।
श्लोक 34 (4.65.34)
तावुभौ गृध्रपत्राभ्यां निशिताभ्यां धनञ्जयः । विव्याध युगपद्व्यग्रस्तयोर्वाहानसूदयत् ॥
tāvubhau gṛdhrapatrābhyāṃ niśitābhyāṃ dhanañjayaḥ | vivyādha yugapadvyagrastayorvāhānasūdayat
एक साथ दोनों से जूझते धनंजय ने गिद्ध-पंखों वाले दो तीखे बाणों से दोनों को एक साथ बींध दिया और उनके घोड़ों को मार डाला।
श्लोक 35 (4.65.35)
तौ हताश्वौ तु विद्धाङ्गौ धृतराष्ट्रात्मजावुभौ । अभिपत्य रथैरन्यैरपनीतौ पदानुगैः ॥
tau hatāśvau tu viddhāṅgau dhṛtarāṣṭrātmajāvubhau | abhipatya rathairanyairapanītau padānugaiḥ
घोड़े मारे जाने और अंग बिंध जाने पर धृतराष्ट्र के उन दोनों पुत्रों को उनके अनुचर दौड़कर दूसरे रथों में बैठाकर ले गए।
श्लोक 36 (4.65.36)
व्यद्रावयदशेषांश्च धृतराष्ट्रसुतांस्तदा । विद्राव्य च रणे पार्थो रणभूमिं व्यराजयत् ॥
vyadrāvayadaśeṣāṃśca dhṛtarāṣṭrasutāṃstadā | vidrāvya ca raṇe pārtho raṇabhūmiṃ vyarājayat
तब उन्होंने धृतराष्ट्र के बाकी सब पुत्रों को भी भगा दिया, और युद्ध में उन्हें खदेड़कर पार्थ ने रणभूमि को जगमगा दिया।
श्लोक 37 (4.65.37)
किरीटमाली कौन्तेयो लब्धलक्षः प्रतापवान् । पातयन्नुत्तमाङ्गानि बाहूश्च परिघोपमान् ॥
kirīṭamālī kaunteyo labdhalakṣaḥ pratāpavān | pātayannuttamāṅgāni bāhūśca parighopamān
लक्ष्य को कभी न चूकने वाले प्रतापी किरीटधारी कुन्तीपुत्र सिरों और परिघ जैसी भुजाओं को काट-काटकर गिराने लगे,
श्लोक 38 (4.65.38)
अशेरत महावीराः शतशो रुक्ममालिनः ॥
aśerata mahāvīrāḥ śataśo rukmamālinaḥ
और सोने की मालाएँ पहने सैकड़ों महावीर वहाँ धराशायी पड़े थे।
श्लोक 39 (4.65.39)
कमलदिनकरेन्दुसन्निभैः सितदशनैः सुमुखाक्षिनासिकैः । रुचिरमकरकुण्डलैर्मही पुरुषशिरोभिरथास्तृता बभौ ॥
kamaladinakarendusannibhaiḥ sitadaśanaiḥ sumukhākṣināsikaiḥ | ruciramakarakuṇḍalairmahī puruṣaśirobhirathāstṛtā babhau
कमल, सूर्य और चन्द्रमा के समान, उजले दाँतों, सुन्दर मुख, आँखों और नासिकाओं तथा मनोहर मकराकृत कुण्डलों वाले मनुष्यों के सिरों से पटी हुई पृथ्वी शोभा पाने लगी।
श्लोक 40 (4.65.40)
सुनसं चारुदीप्ताक्षं क्लृप्तश्मश्रु स्वलंकृतम् । अदृश्यत शिरश्छिन्नमनेकं हेमकुण्डलम् ॥
sunasaṃ cārudīptākṣaṃ klṛptaśmaśru svalaṃkṛtam | adṛśyata śiraśchinnamanekaṃ hemakuṇḍalam
सुन्दर नाक, मनोहर चमकती आँखों, सँवारी हुई दाढ़ी, सुन्दर अलंकारों और सोने के कुण्डलों वाले अनेक कटे हुए सिर दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 41 (4.65.41)
एवं तत्प्रहतं सैन्यं समन्तात्प्रद्रुतं भयात् ॥
evaṃ tatprahataṃ sainyaṃ samantātpradrutaṃ bhayāt
इस प्रकार मार खाई हुई वह सेना भय से चारों ओर भाग खड़ी हुई।
श्लोक 42 (4.65.42)
अथ दुर्योधनः कर्णः सौबलः शकुनिस्तदा । द्रोणश्च द्रोणपुत्रश्च कृपश्चातिरथो रणे ॥
atha duryodhanaḥ karṇaḥ saubalaḥ śakunistadā | droṇaśca droṇaputraśca kṛpaścātiratho raṇe
तब दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि, द्रोण और द्रोणपुत्र, तथा युद्ध में अतिरथी कृप —
श्लोक 43 (4.65.43)
सहिता विजयं तत्र योधयन्तो महारथाः । विष्फारयन्तश्चापानि बलवन्ति महाबलाः ॥
sahitā vijayaṃ tatra yodhayanto mahārathāḥ | viṣphārayantaścāpāni balavanti mahābalāḥ
वे सब महारथी, एक साथ मिलकर वहाँ विजय (अर्जुन) से युद्ध करने के लिए अपने मज़बूत धनुषों की टंकार करते हुए महाबली योद्धा,
श्लोक 44 (4.65.44)
ततः कीर्णपताकेन रथेनादित्यवर्चसा । पुनरावृत्य मार्गस्थं ददृशुर्वानरध्वजम् ॥
tataḥ kīrṇapatākena rathenādityavarcasā | punarāvṛtya mārgasthaṃ dadṛśurvānaradhvajam
लौटकर उन्होंने सूर्य के समान तेजस्वी, फहराती पताकाओं वाले रथ पर मार्ग में खड़े कपिध्वज अर्जुन को देखा।
श्लोक 45 (4.65.45)
ते महास्त्रैर्महेष्वासाः परिवार्य धनञ्जयम् । अभ्यवर्षन्सुसंक्रुद्धा महामेघा इवाचलम् ॥
te mahāstrairmaheṣvāsāḥ parivārya dhanañjayam | abhyavarṣansusaṃkruddhā mahāmeghā ivācalam
उन महाधनुर्धरों ने महान अस्त्रों से धनंजय को घेरकर क्रोध में भरकर उन पर ऐसी वर्षा की जैसे बड़े बादल पर्वत पर बरसते हैं।
श्लोक 46 (4.65.46)
शरौघान्सम्यगस्यन्तो जीमूता इव शारदाः । युद्धे तस्थुर्महावीर्याः प्रतपन्तः किरीटिनम् ॥
śaraughānsamyagasyanto jīmūtā iva śāradāḥ | yuddhe tasthurmahāvīryāḥ pratapantaḥ kirīṭinam
शरद् ऋतु के बादलों की तरह बाणों की झड़ी लगाते हुए वे पराक्रमी योद्धा किरीटधारी अर्जुन को संतप्त करते हुए युद्ध में डटे रहे।
श्लोक 47 (4.65.47)
इषुभिर्बहुभिस्तूर्णं निशितैर्लोमवापिभिः । अदूरात्प्रत्यवस्थाय पाण्डवं समयोधयन् ॥
iṣubhirbahubhistūrṇaṃ niśitairlomavāpibhiḥ | adūrātpratyavasthāya pāṇḍavaṃ samayodhayan
पास ही डटकर वे रोम तक काट देने वाले बहुत-से तीखे बाणों से फुर्ती के साथ पाण्डुपुत्र से लड़ने लगे।
श्लोक 48 (4.65.48)
ततः प्रहस्य बीभत्सुस्तमैन्द्रं पञ्चवार्षिकम् । अस्त्रमादित्यसंकाशं गाण्डीवे समयोजयत् ॥
tataḥ prahasya bībhatsustamaindraṃ pañcavārṣikam | astramādityasaṃkāśaṃ gāṇḍīve samayojayat
तब बीभत्सु ने हँसकर स्वर्ग में बिताए अपने पाँच वर्षों में पाया हुआ, सूर्य के समान तेजस्वी ऐन्द्र अस्त्र गाण्डीव पर चढ़ाया।
श्लोक 49 (4.65.49)
नाक्षाणां न च चक्राणां न रथानां न वाजिनाम् । अङ्गुलाद्द्व्यङ्गुलाद्वापि विवृतं प्रत्यदृश्यत ॥
nākṣāṇāṃ na ca cakrāṇāṃ na rathānāṃ na vājinām | aṅgulāddvyaṅgulādvāpi vivṛtaṃ pratyadṛśyata
न धुरियों पर, न पहियों पर, न रथों पर, न घोड़ों पर, एक या दो अंगुल भर भी खुली जगह दिखाई नहीं दी।
श्लोक 50 (4.65.50)
यथा रश्मिभिरादित्यो वृणुते सर्वतो दिशम् । एवं किरीटिना मुक्तं सर्वं प्राच्छादयज्जगत् ॥
yathā raśmibhirādityo vṛṇute sarvato diśam | evaṃ kirīṭinā muktaṃ sarvaṃ prācchādayajjagat
जैसे सूर्य अपनी किरणों से सब दिशाओं को ढक लेता है, वैसे ही किरीटधारी के छोड़े बाणों ने सारे जगत् को ढक दिया।
श्लोक 51 (4.65.51)
यथा बलाहके विद्युत्पावको वा शिलोच्चये । तथा गाण्डीवमभवच्छक्रायुधमिवाततम् ॥
yathā balāhake vidyutpāvako vā śiloccaye | tathā gāṇḍīvamabhavacchakrāyudhamivātatam
जैसे बादल में बिजली या पर्वत पर आग, वैसे ही खिंचा हुआ गाण्डीव इन्द्रधनुष के समान दिखाई देने लगा।
श्लोक 52 (4.65.52)
यथा वर्षति पर्जन्यो विद्युत्पतति पर्वते । विस्फूर्जिता दिशः सर्वा ज्वलद्गाण्डीवमावृणोत् ॥
yathā varṣati parjanyo vidyutpatati parvate | visphūrjitā diśaḥ sarvā jvaladgāṇḍīvamāvṛṇot
जैसे बादल बरसता है और पर्वत पर बिजली गिरती है, वैसे ही दहकते गाण्डीव ने गरज से गूँजती सारी दिशाओं को ढक लिया।
श्लोक 53 (4.65.53)
त्रस्ताश्च रथिनः सर्वे चैन्द्रमस्त्रं विकुर्वति । सर्वे शान्तिपरा योधाः स्वचित्तं नाभिजज्ञिरे । सहिता द्रोणभीष्माभ्यां प्रमोहगतचेतनाः ॥
trastāśca rathinaḥ sarve caindramastraṃ vikurvati | sarve śāntiparā yodhāḥ svacittaṃ nābhijajñire | sahitā droṇabhīṣmābhyāṃ pramohagatacetanāḥ
जब उन्होंने ऐन्द्र अस्त्र का प्रयोग किया तो सब रथी भयभीत हो गए। सब योद्धा युद्ध से विमुख हो गए और उन्हें अपनी सुध-बुध न रही; द्रोण और भीष्म सहित वे सब मोह में पड़कर अचेत-से हो गए।
श्लोक 54 (4.65.54)
तानि सर्वाणि सैन्यानि भग्नानि भरतर्षभ । प्राद्रवन्त दिशः सर्वा भयाद्वै सव्यसाचिनः ॥
tāni sarvāṇi sainyāni bhagnāni bharatarṣabha | prādravanta diśaḥ sarvā bhayādvai savyasācinaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, वे सारी सेनाएँ तितर-बितर होकर सव्यसाची के भय से सब दिशाओं में भाग गईं।