विराट पर्व · अध्याय 78
अभिमन्यु और उत्तरा का विवाह
तेरहवाँ वर्ष पूरा होने पर पाण्डव उपप्लव्य में आकर रहते हैं और अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के पास दूत भेजते हैं। श्रीकृष्ण बलराम, अभिमन्यु, सुभद्रा और यादव-सेना के साथ आते हैं; पाण्डव उनके चरणों में गिरते हैं, और वे रोती हुई द्रौपदी को यह वचन देकर सान्त्वना देते हैं कि पृथ्वी युधिष्ठिर को मिलेगी। काशिराज, शैब्य और पाञ्चालराज अपनी सेनाओं के साथ आते हैं, और बड़े उत्सव के साथ अभिमन्यु का उत्तरा से विवाह होता है, जिसमें विराट और युधिष्ठिर भरपूर दान देते हैं। जनमेजय पूछते हैं कि इसके बाद युधिष्ठिर ने क्या कहा और क्या किया, और यहीं विराटपर्व समाप्त होता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.78.1)
ततस्त्रयोदशे वर्षे निवृत्ते पञ्च पाण्डवाः । उपप्लाव्ये विराटस्य वासं चक्रुः पुरोत्तमे ॥
tatastrayodaśe varṣe nivṛtte pañca pāṇḍavāḥ | upaplāvye virāṭasya vāsaṃ cakruḥ purottame
तब तेरहवाँ वर्ष पूरा हो जाने पर पाँचों पाण्डव विराट के श्रेष्ठ नगर उपप्लव्य में जाकर रहने लगे।
श्लोक 2 (4.78.2)
दूतान्मित्रेषु सर्वेषु ज्ञातिसंबन्धिकेष्वपि । प्रेषयामास कौन्तेयो विराटश्च महीपतिः ॥
dūtānmitreṣu sarveṣu jñātisaṃbandhikeṣvapi | preṣayāmāsa kaunteyo virāṭaśca mahīpatiḥ
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर और राजा विराट ने अपने सब मित्रों, जाति-बन्धुओं और सम्बन्धियों के पास दूत भेजे।
श्लोक 3 (4.78.3)
तेषु तत्रोपविष्टेषु प्रेषितेषु ततस्ततः । तत्रागमन्महाबाहुर्वनमाली बलानुजः ॥
teṣu tatropaviṣṭeṣu preṣiteṣu tatastataḥ | tatrāgamanmahābāhurvanamālī balānujaḥ
जब दूत चारों ओर भेज दिए गए और वहाँ जा पहुँचे, तब वनमाला धारण करने वाले, बलराम के छोटे भाई महाबाहु श्रीकृष्ण वहाँ आए।
श्लोक 4 (4.78.4)
तस्मिन्काले निशम्याथ दूतवाक्यं जनार्दनः । दयितं स्वस्रीयं पुत्रं सुभद्रायाः सुमानितम् । अभिमन्युं समादाय रामेण सहितस्तदा ॥
tasminkāle niśamyātha dūtavākyaṃ janārdanaḥ | dayitaṃ svasrīyaṃ putraṃ subhadrāyāḥ sumānitam | abhimanyuṃ samādāya rāmeṇa sahitastadā
उस समय दूतों का सन्देश सुनकर जनार्दन ने अपने प्रिय भानजे, सुभद्रा के परम सम्मानित पुत्र अभिमन्यु को साथ लिया और बलराम के साथ चल पड़े।
श्लोक 5 (4.78.5)
सर्वयादवमुख्यैश्च संवृतः परवीरहा । शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्विराटनगरं ययौ ॥
sarvayādavamukhyaiśca saṃvṛtaḥ paravīrahā | śaṅkhadundubhinirghoṣairvirāṭanagaraṃ yayau
समस्त प्रमुख यादवों से घिरे हुए, शत्रु-वीरों का संहार करने वाले वे शंखों और दुन्दुभियों के घोष के बीच विराटनगर पहुँचे।
श्लोक 6 (4.78.6)
कृतवर्मा च हार्दिक्यो युयुधानश्च सात्यकिः । अनाधृष्टिस्तथाऽक्रूरः सांबो निशठ एव च । प्रद्युम्नश्च महाबाहुरुल्मुकश्च महाबलः ॥
kṛtavarmā ca hārdikyo yuyudhānaśca sātyakiḥ | anādhṛṣṭistathā'krūraḥ sāṃbo niśaṭha eva ca | pradyumnaśca mahābāhurulmukaśca mahābalaḥ
हृदिकपुत्र कृतवर्मा, युयुधान सात्यकि, अनाधृष्टि, अक्रूर, साम्ब और निशठ, महाबाहु प्रद्युम्न और महाबली उल्मुक —
श्लोक 7 (4.78.7)
अभिमन्युमुपादाय सह मात्रा परन्तपाः । कृष्णेन सहिताः सर्वे पाण्डवान्द्रष्टुमागताः ॥
abhimanyumupādāya saha mātrā parantapāḥ | kṛṣṇena sahitāḥ sarve pāṇḍavāndraṣṭumāgatāḥ
ये सभी शत्रुओं को तपाने वाले वीर अभिमन्यु और उसकी माता को साथ लेकर श्रीकृष्ण के साथ पाण्डवों से मिलने आए।
श्लोक 8 (4.78.8)
इन्द्रसेनादयश्चैव रथैस्तैः सुसमाहितैः । उपेयुः सहिताः सर्वे परिसंवत्सरोषिताः ॥
indrasenādayaścaiva rathaistaiḥ susamāhitaiḥ | upeyuḥ sahitāḥ sarve parisaṃvatsaroṣitāḥ
इन्द्रसेन आदि भी, जो पूरे वर्ष अलग रहे थे, उन सुसज्जित रथों को लेकर एक साथ आ पहुँचे।
श्लोक 9 (4.78.9)
दशनागसहस्राणि हयानां द्विगुणं तथा । रथानां नियुतं पूर्णं निखर्वं च पदातयः ॥
daśanāgasahasrāṇi hayānāṃ dviguṇaṃ tathā | rathānāṃ niyutaṃ pūrṇaṃ nikharvaṃ ca padātayaḥ
दस हज़ार हाथी, उनसे दुगुने घोड़े, पूरे एक नियुत रथ और एक निखर्व पैदल सैनिक थे।
श्लोक 10 (4.78.10)
वृष्ण्यन्धकाश्च शतशो भोजाश्च परमौजसः । अन्वयुर्वृष्णिशार्दूलं वासुदेवं महाबलम् ॥
vṛṣṇyandhakāśca śataśo bhojāśca paramaujasaḥ | anvayurvṛṣṇiśārdūlaṃ vāsudevaṃ mahābalam
सैकड़ों वृष्णि और अन्धक तथा परम पराक्रमी भोज वृष्णिवंश के सिंह, महाबली वासुदेव के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 11 (4.78.11)
वासुदेवं तथाऽऽयान्तं श्रुत्वा पाण्डुसुतास्तदा । मात्स्येन सहिताः सर्वे प्रत्युद्याता जनार्दनम् ॥
vāsudevaṃ tathā''yāntaṃ śrutvā pāṇḍusutāstadā | mātsyena sahitāḥ sarve pratyudyātā janārdanam
वासुदेव के आने का समाचार सुनकर पाण्डु के सभी पुत्र मत्स्यराज के साथ जनार्दन की अगवानी के लिए निकले।
श्लोक 12 (4.78.12)
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्मङ्गलैश्च जनार्दनम् । ववन्दुर्मुदिताः सर्वे पादयोस्तस्य पाण्डवाः । मात्स्येन सहिताः सर्वे आनन्दाश्रुपरिप्लुताः ॥
śaṅkhadundubhinirghoṣairmaṅgalaiśca janārdanam | vavandurmuditāḥ sarve pādayostasya pāṇḍavāḥ | mātsyena sahitāḥ sarve ānandāśrupariplutāḥ
शंख और दुन्दुभियों के घोष तथा मंगलाचारों के साथ सभी पाण्डवों ने हर्ष से भरकर जनार्दन के चरणों में प्रणाम किया; मत्स्यराज समेत वे सब आनन्द के आँसुओं में डूबे हुए थे।
पाण्डवा ऊचुः
श्लोक 13 (4.78.13)
तव कृष्ण प्रसादाद्वै वर्षाण्येतानि सर्वशः । त्रयोदशोऽपि दाशार्ह यथा स समयः कृतः ॥
tava kṛṣṇa prasādādvai varṣāṇyetāni sarvaśaḥ | trayodaśo'pi dāśārha yathā sa samayaḥ kṛtaḥ
"हे कृष्ण, आपकी ही कृपा से, हे दाशार्ह, हमने जैसी शर्त की गई थी उसी के अनुसार ये सारे वर्ष, तेरहवाँ वर्ष भी,
श्लोक 14 (4.78.14)
उषिताः स्मो जगन्नाथ त्वं नाथो नो जनार्दन । रक्षस्व देवदेवेश त्वामार्य शरणं गताः ॥
uṣitāḥ smo jagannātha tvaṃ nātho no janārdana | rakṣasva devadeveśa tvāmārya śaraṇaṃ gatāḥ
बिता लिए हैं, हे जगन्नाथ। हे जनार्दन, आप ही हमारे स्वामी हैं। हे देवदेवेश, हमारी रक्षा कीजिए; हे आर्य, हम आपकी शरण में आए हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (4.78.15)
तान्वन्दमानान्सहसा परिष्वज्य जनार्दनः । विराटस्य सहायांस्तान्सर्वयादवसंवृतः ॥
tānvandamānānsahasā pariṣvajya janārdanaḥ | virāṭasya sahāyāṃstānsarvayādavasaṃvṛtaḥ
प्रणाम करते हुए उन पाण्डवों को जनार्दन ने तुरन्त गले लगा लिया, और समस्त यादवों से घिरे हुए उन्होंने विराट के सहायकों का
श्लोक 16 (4.78.16)
यथार्हं पूजयामास मुदा परमया युतः । वृष्णिवीराश्च तान्सर्वान्यथार्हं प्रतिपेदिरे ॥
yathārhaṃ pūjayāmāsa mudā paramayā yutaḥ | vṛṣṇivīrāśca tānsarvānyathārhaṃ pratipedire
परम प्रसन्नता के साथ यथायोग्य सत्कार किया; और वृष्णिवंशी वीरों ने भी उन सबका यथोचित सम्मान किया।
श्लोक 17 (4.78.17)
कृष्णा च देवकीपुत्रं ववन्दे पादयोस्तथा । तामुद्यम्य सुकेशान्तां नयने परिमृज्य च । उवाच वाक्यं देवेशः सर्वयादवसन्निधौ ॥
kṛṣṇā ca devakīputraṃ vavande pādayostathā | tāmudyamya sukeśāntāṃ nayane parimṛjya ca | uvāca vākyaṃ deveśaḥ sarvayādavasannidhau
कृष्णा (द्रौपदी) ने भी देवकीनन्दन के चरणों में प्रणाम किया। सुन्दर केशों वाली उस देवी को उठाकर और उसकी आँखें पोंछकर देवेश्वर श्रीकृष्ण ने सब यादवों के सामने उससे कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 18 (4.78.18)
मा शोकं कुरु कल्याणि धार्तराष्ट्रान्समाहितान् । अचिराद्धातयित्वाऽहं पार्थेन सहितः क्षितिम् ॥
mā śokaṃ kuru kalyāṇi dhārtarāṣṭrānsamāhitān | acirāddhātayitvā'haṃ pārthena sahitaḥ kṣitim
"हे कल्याणी, शोक मत करो। मैं शीघ्र ही पार्थ के साथ मिलकर एकत्र हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करूँगा
श्लोक 19 (4.78.19)
युधिष्ठिराय दास्यामि यातु ते मानसो ज्वरः । अभिमन्युना च पार्थेनरौक्मिणेयेन ते शपे ॥
yudhiṣṭhirāya dāsyāmi yātu te mānaso jvaraḥ | abhimanyunā ca pārthenaraukmiṇeyena te śape
और पृथ्वी युधिष्ठिर को सौंप दूँगा। तुम्हारे मन का सन्ताप दूर हो जाए। मैं अभिमन्यु, अर्जुन और रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न की शपथ खाकर तुमसे यह कहता हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (4.78.20)
सत्यमेतद्वचो मह्यमवैहि त्वमनिन्दिते । इत्युक्त्वा तां विसृज्याथ प्रीयमाणो युधिष्ठिरम् । अन्वास्त वृष्णिशार्दूलः सह वृष्ण्यन्धकैस्तथा ॥
satyametadvaco mahyamavaihi tvamanindite | ityuktvā tāṃ visṛjyātha prīyamāṇo yudhiṣṭhiram | anvāsta vṛṣṇiśārdūlaḥ saha vṛṣṇyandhakaistathā
"हे अनिन्दिते, मेरी इस बात को सत्य जानो।" यह कहकर और उसे विदा करके वृष्णिवंश के सिंह श्रीकृष्ण प्रसन्न मन से वृष्णियों और अन्धकों के साथ युधिष्ठिर के पास जा बैठे।
श्लोक 21 (4.78.21)
काशिराजश्च शैब्यश्च भजमानौ युधिष्ठिरम् । अक्षौहिणीभ्यां सहितावागतौ पृथिवीपती ॥
kāśirājaśca śaibyaśca bhajamānau yudhiṣṭhiram | akṣauhiṇībhyāṃ sahitāvāgatau pṛthivīpatī
काशिराज और शैब्य, दोनों भूपति, युधिष्ठिर के प्रति निष्ठा रखते हुए एक-एक अक्षौहिणी सेना के साथ आए।
श्लोक 22 (4.78.22)
अक्षौहिणीभिः पाञ्चालस्तिसृभिश्च महाबलः । द्रौपद्याश्च सुता वीराः शिखण्डी चापराजितः ॥
akṣauhiṇībhiḥ pāñcālastisṛbhiśca mahābalaḥ | draupadyāśca sutā vīrāḥ śikhaṇḍī cāparājitaḥ
महाबली पाञ्चालराज तीन अक्षौहिणी सेनाओं के साथ आए, और उनके साथ द्रौपदी के वीर पुत्र तथा अपराजित शिखण्डी भी आए;
श्लोक 23 (4.78.23)
धृष्टद्युम्नश्च दुर्धर्षः सर्वशस्त्रभृतांवरः । उपप्लाव्यं ययुः शीघ्रं पाण्डवार्थे महाबलाः ॥
dhṛṣṭadyumnaśca durdharṣaḥ sarvaśastrabhṛtāṃvaraḥ | upaplāvyaṃ yayuḥ śīghraṃ pāṇḍavārthe mahābalāḥ
तथा सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, दुर्जय धृष्टद्युम्न भी। ये महाबली वीर पाण्डवों के हित के लिए शीघ्रता से उपप्लव्य पहुँचे।
श्लोक 24 (4.78.24)
ततः शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । समीपमभिवर्तन्ते योधा यौधिष्ठिरं बलम् ॥
tataḥ śatasahasrāṇi prayutānyarbudāni ca | samīpamabhivartante yodhā yaudhiṣṭhiraṃ balam
तब लाखों, प्रयुतों और अर्बुदों की संख्या में योद्धा युधिष्ठिर की सेना के पास आ जुटे।
श्लोक 25 (4.78.25)
समुद्रमिव घर्मान्ते स्रोतःश्रेष्ठाः पृथक्पृथक् । आपूरयन्महीपाला यज्वानो भूरिदक्षिणाः । वेदावभृथसंपन्नाः शूराः सर्वे तनुत्यजः ॥
samudramiva gharmānte srotaḥśreṣṭhāḥ pṛthakpṛthak | āpūrayanmahīpālā yajvāno bhūridakṣiṇāḥ | vedāvabhṛthasaṃpannāḥ śūrāḥ sarve tanutyajaḥ
जैसे ग्रीष्म ऋतु के अन्त में बड़ी-बड़ी नदियाँ अलग-अलग धाराओं से समुद्र को भर देती हैं, वैसे ही राजाओं ने उस सेना को भर दिया — वे सब प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ करने वाले, वेदाध्ययन और अवभृथ-स्नान से सम्पन्न, शूरवीर और प्राणों का मोह छोड़ देने वाले थे।
श्लोक 26 (4.78.26)
तानागतानभिप्रेक्ष्य पार्थो ज्ञानभृतां वरः । पूजयामास विधिवद्यथार्हं राजसत्तमान् ॥
tānāgatānabhiprekṣya pārtho jñānabhṛtāṃ varaḥ | pūjayāmāsa vidhivadyathārhaṃ rājasattamān
उन्हें आया देखकर ज्ञानियों में श्रेष्ठ पार्थ ने उन श्रेष्ठ राजाओं का विधिपूर्वक यथायोग्य सत्कार किया।
श्लोक 27 (4.78.27)
पारिबर्हं ददौ कृष्णः पाण्डवानां महात्मनाम् । स्त्रियो वासांसि रत्नानि पृथक्पृथगनेकशः ॥
pāribarhaṃ dadau kṛṣṇaḥ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | striyo vāsāṃsi ratnāni pṛthakpṛthaganekaśaḥ
श्रीकृष्ण ने महात्मा पाण्डवों को विवाह के उपहार दिए — स्त्रियाँ, वस्त्र और रत्न, हर एक को अलग-अलग और बहुत बड़ी मात्रा में।
श्लोक 28 (4.78.28)
राजानो राजपुत्राश्च निवृत्ते समये तथा । यथार्हं पाण्डवश्रेष्ठैरवर्तन्ताभिपूजिताः । आसन्प्रहृष्टमनसः पारिबर्हं ददुस्तदा ॥
rājāno rājaputrāśca nivṛtte samaye tathā | yathārhaṃ pāṇḍavaśreṣṭhairavartantābhipūjitāḥ | āsanprahṛṣṭamanasaḥ pāribarhaṃ dadustadā
अवधि पूरी हो जाने पर श्रेष्ठ पाण्डवों ने राजाओं और राजकुमारों का भी यथायोग्य सम्मान किया; और उन्होंने भी प्रसन्न मन से विवाह के उपहार दिए।
श्लोक 29 (4.78.29)
सर्वेषु समवेतेषु राजभिर्वृष्णिभिः सह । विवाहो विधिवद्राजन्ववृधे कुरुमात्स्ययोः ॥
sarveṣu samaveteṣu rājabhirvṛṣṇibhiḥ saha | vivāho vidhivadrājanvavṛdhe kurumātsyayoḥ
हे राजन्, जब सब राजा वृष्णियों के साथ एकत्र हो गए, तब कुरुओं और मत्स्यों के बीच विधिपूर्वक विवाह का उत्सव आरम्भ हुआ।
श्लोक 30 (4.78.30)
ततः शङ्खा मृदङ्गाश्च गोमुखा डिण्डिमास्तदा । अभिमन्योर्विवाहे तु नेदुर्मात्स्यस्य वेश्मनि ॥
tataḥ śaṅkhā mṛdaṅgāśca gomukhā ḍiṇḍimāstadā | abhimanyorvivāhe tu nedurmātsyasya veśmani
तब अभिमन्यु के विवाह में मत्स्यराज के भवन में शंख, मृदंग, गोमुख और डिण्डिम बज उठे।
श्लोक 31 (4.78.31)
उच्चावचान्मृगाञ्जघ्नुर्मेध्यांश्च शतशस्तथा । भक्ष्यान्नभोज्यपानानि प्रभूतान्यभ्यहारयन् ॥
uccāvacānmṛgāñjaghnurmedhyāṃśca śataśastathā | bhakṣyānnabhojyapānāni prabhūtānyabhyahārayan
उन्होंने तरह-तरह के मृग और सैकड़ों यज्ञयोग्य पशु मारे, और खाने-पीने की प्रचुर सामग्री — भक्ष्य, अन्न, भोज्य और पेय — जुटाई।
श्लोक 32 (4.78.32)
गायनाख्यानशीलाश्च नटा वैतालिकास्तथा । स्तुवन्तस्तानुपातिष्ठन्सूताश्च सह मागधैः ॥
gāyanākhyānaśīlāśca naṭā vaitālikāstathā | stuvantastānupātiṣṭhansūtāśca saha māgadhaiḥ
गायक और कथावाचक, नट, वैतालिक, सूत और मागध उनकी स्तुति करते हुए उनकी सेवा में उपस्थित हुए।
श्लोक 33 (4.78.33)
स्त्रियो वृद्धास्तरुण्यश्च उत्सवे तस्य मङ्गले । द्रौपद्यन्तःपुरे चैव विराटस्य गृहे स्त्रियः ॥
striyo vṛddhāstaruṇyaśca utsave tasya maṅgale | draupadyantaḥpure caiva virāṭasya gṛhe striyaḥ
उस मंगलमय उत्सव में बूढ़ी और युवा स्त्रियाँ, द्रौपदी के अन्तःपुर की और विराट के घर की स्त्रियाँ,
श्लोक 34 (4.78.34)
सुदेष्णां तु पुरस्कृत्य मत्स्यानामपि च स्त्रियः । आजग्मुश्चारुपीनाङ्ग्यः सुमृष्टमणिकुण्डलाः ॥
sudeṣṇāṃ tu puraskṛtya matsyānāmapi ca striyaḥ | ājagmuścārupīnāṅgyaḥ sumṛṣṭamaṇikuṇḍalāḥ
और मत्स्यदेश की स्त्रियाँ भी, सुदेष्णा को आगे करके आईं; उनके अंग सुन्दर और भरे-पूरे थे और कानों में चमकते मणिकुण्डल थे।
श्लोक 35 (4.78.35)
वर्णोपपन्नास्ता नार्यो रूपवत्यः स्वलंकृताः । सर्वासामभवत्कृष्णा रूपेण वपुषाऽधिका ॥
varṇopapannāstā nāryo rūpavatyaḥ svalaṃkṛtāḥ | sarvāsāmabhavatkṛṣṇā rūpeṇa vapuṣā'dhikā
वे स्त्रियाँ सुन्दर वर्ण वाली, रूपवती और भली-भाँति अलंकृत थीं, फिर भी रूप और देह-सौन्दर्य में कृष्णा (द्रौपदी) उन सबसे बढ़कर थी।
श्लोक 36 (4.78.36)
परिवार्योत्तरां श्लाघ्यां राजपुत्रीमलंकृताम् । सुतामिव महेन्द्रस्य पुरस्कृत्योपतस्थिरे ॥
parivāryottarāṃ ślāghyāṃ rājaputrīmalaṃkṛtām | sutāmiva mahendrasya puraskṛtyopatasthire
वे सब महेन्द्र की पुत्री के समान सजी हुई प्रशंसनीय राजकुमारी उत्तरा को घेरकर और उसे आगे करके उसकी सेवा में उपस्थित हुईं।
श्लोक 37 (4.78.37)
भृङ्गारं तु समादाय सौवर्णं जलपूरितम् । पार्थस्य हस्ते सहसा सुतामिन्दीवरेक्षणाम् । स्नुषार्थं प्राक्षिपद्वारि विराटो वाहिनीपतिः ॥
bhṛṅgāraṃ tu samādāya sauvarṇaṃ jalapūritam | pārthasya haste sahasā sutāmindīvarekṣaṇām | snuṣārthaṃ prākṣipadvāri virāṭo vāhinīpatiḥ
जल से भरी सोने की झारी लेकर सेनापति विराट ने अपनी कमल-नयनी पुत्री को पुत्रवधू के रूप में देने के लिए तुरन्त पार्थ के हाथ पर जल छोड़ा।
श्लोक 38 (4.78.38)
तां प्रत्यगृह्णात्कौन्तेयः सुतस्यार्थे महामनाः । सौभद्रश्चानवद्याङ्गो विराटतनयां तदा ॥
tāṃ pratyagṛhṇātkaunteyaḥ sutasyārthe mahāmanāḥ | saubhadraścānavadyāṅgo virāṭatanayāṃ tadā
उदारचित्त कुन्तीपुत्र अर्जुन ने अपने पुत्र के लिए उसे ग्रहण किया; और तब निर्दोष अंगों वाले सुभद्रानन्दन ने विराट की पुत्री को स्वीकार किया।
श्लोक 39 (4.78.39)
तत्रातिष्ठद्गृहीत्वा तु रूपमिन्द्रस्य धारयन् । स्नुषां तां परिगृह्णानः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
tatrātiṣṭhadgṛhītvā tu rūpamindrasya dhārayan | snuṣāṃ tāṃ parigṛhṇānaḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ
वहाँ इन्द्र के समान रूप धारण किए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर खड़े थे और उन्होंने उसे अपनी पुत्रवधू के रूप में अपनाया।
श्लोक 40 (4.78.40)
द्रुपदश्च विराटश्च शिखण्डी च महाबलः । युयुधानश्च शैब्यश्च धृष्टद्युम्नश्च सात्यकिः ॥
drupadaśca virāṭaśca śikhaṇḍī ca mahābalaḥ | yuyudhānaśca śaibyaśca dhṛṣṭadyumnaśca sātyakiḥ
द्रुपद और विराट, महाबली शिखण्डी, युयुधान और शैब्य, धृष्टद्युम्न और सात्यकि —
श्लोक 41 (4.78.41)
सप्तैतेऽक्षौहिणीपाला यज्वानो भूरिदक्षिणाः । पाण्डवं परिवार्यैते निवेशं चक्रिरे तदा ॥
saptaite'kṣauhiṇīpālā yajvāno bhūridakṣiṇāḥ | pāṇḍavaṃ parivāryaite niveśaṃ cakrire tadā
ये सातों, जो एक-एक अक्षौहिणी के स्वामी और प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ करने वाले थे, पाण्डव को घेरकर वहीं डेरा डालकर ठहर गए।
श्लोक 42 (4.78.42)
तत्रस्थायां तु सेनायां मात्स्यो धर्मभृतांवरः । प्रीतो दुहितरं गृह्य प्रददावभिमन्यवे ॥
tatrasthāyāṃ tu senāyāṃ mātsyo dharmabhṛtāṃvaraḥ | prīto duhitaraṃ gṛhya pradadāvabhimanyave
सेना के वहाँ ठहर जाने पर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ मत्स्यराज ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री का हाथ पकड़ा और उसे अभिमन्यु को सौंप दिया।
श्लोक 43 (4.78.43)
प्रतिगृह्योत्तरां पार्थः पुरस्कृत्य जनार्दनम् । विवाहं कारयामास सौभद्रस्य महात्मनः ॥
pratigṛhyottarāṃ pārthaḥ puraskṛtya janārdanam | vivāhaṃ kārayāmāsa saubhadrasya mahātmanaḥ
पार्थ ने उत्तरा को ग्रहण किया और जनार्दन को आगे रखकर महात्मा सुभद्रानन्दन का विवाह सम्पन्न कराया।
श्लोक 44 (4.78.44)
ततो विवाहो ववृधे स्फीतः सर्वगुणान्वितः । सौभद्रस्याद्भुतं कर्म पितुस्तव पितुस्तदा ॥
tato vivāho vavṛdhe sphītaḥ sarvaguṇānvitaḥ | saubhadrasyādbhutaṃ karma pitustava pitustadā
तब वह विवाह-समारोह सब गुणों से युक्त होकर बड़ी धूमधाम से बढ़ता गया — तुम्हारे पिता के पिता सुभद्रानन्दन का वह अद्भुत संस्कार।
श्लोक 45 (4.78.45)
धौम्यः शिष्यैः परिवृतो जुहावाग्नौ विधानतः । अग्निं प्रदक्षिणीकुर्वन्सौभद्रः पाणिमग्रहीत् ॥
dhaumyaḥ śiṣyaiḥ parivṛto juhāvāgnau vidhānataḥ | agniṃ pradakṣiṇīkurvansaubhadraḥ pāṇimagrahīt
शिष्यों से घिरे धौम्य ने विधिपूर्वक अग्नि में आहुतियाँ दीं, और सुभद्रानन्दन ने अग्नि की प्रदक्षिणा करते हुए वधू का पाणिग्रहण किया।
श्लोक 46 (4.78.46)
ततः पार्थाय संहृष्टो मात्स्यराजो धनं महत् । तस्मै शतसहस्राणि हयानां वातरंहसाम् ॥
tataḥ pārthāya saṃhṛṣṭo mātsyarājo dhanaṃ mahat | tasmai śatasahasrāṇi hayānāṃ vātaraṃhasām
तब अत्यन्त हर्षित मत्स्यराज ने पार्थ को बहुत-सा धन दिया — वायु के समान वेग वाले एक लाख घोड़े,
श्लोक 47 (4.78.47)
द्वे च नागशते मुख्ये धनं बहुविधं तदा । प्रादान्मात्स्यपतिर्हृष्टः कन्याधनमनुत्तमम् ॥
dve ca nāgaśate mukhye dhanaṃ bahuvidhaṃ tadā | prādānmātsyapatirhṛṣṭaḥ kanyādhanamanuttamam
दो सौ उत्तम हाथी और अनेक प्रकार का धन; प्रसन्न मत्स्यपति ने अनुपम कन्याधन प्रदान किया।
श्लोक 48 (4.78.48)
पारिबर्हं च पार्थेभ्यः प्रददौ मत्स्यपुङ्गवः । कृष्णेन सह कौन्तेयः प्रत्यगृह्णात्प्रभूतवत् ॥
pāribarhaṃ ca pārthebhyaḥ pradadau matsyapuṅgavaḥ | kṛṣṇena saha kaunteyaḥ pratyagṛhṇātprabhūtavat
मत्स्यश्रेष्ठ विराट ने पृथा के पुत्रों को भी विवाह के उपहार दिए, और कुन्तीपुत्र ने श्रीकृष्ण के साथ उस प्रचुर भेंट को स्वीकार किया।
श्लोक 49 (4.78.49)
कृते विवाहे तु तदा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं यदुपाहरदच्युतः ॥
kṛte vivāhe tu tadā dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | brāhmaṇebhyo dadau vittaṃ yadupāharadacyutaḥ
विवाह सम्पन्न हो जाने पर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने वह सारा धन, जो अच्युत श्रीकृष्ण लाए थे, ब्राह्मणों को दान कर दिया —
श्लोक 50 (4.78.50)
गोसहस्राणि वस्त्राणि रत्नानि विविधानि च । भूषणानि च सर्वाणि यानानि शयनानि च ॥
gosahasrāṇi vastrāṇi ratnāni vividhāni ca | bhūṣaṇāni ca sarvāṇi yānāni śayanāni ca
हज़ारों गौएँ, वस्त्र, अनेक प्रकार के रत्न, सब तरह के आभूषण, सवारियाँ और शय्याएँ।
श्लोक 51 (4.78.51)
नागरान्प्रीतिभिर्दिव्यैस्तर्पयामास भूपतिः ॥
nāgarānprītibhirdivyaistarpayāmāsa bhūpatiḥ
राजा ने नगरवासियों को दिव्य आनन्द-उपहारों से तृप्त किया।
श्लोक 52 (4.78.52)
तन्महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनाकुलम् । नगरं मत्स्यराजस्य शुशुभे भरतर्षभ ॥
tanmahotsavasaṃkāśaṃ hṛṣṭapuṣṭajanākulam | nagaraṃ matsyarājasya śuśubhe bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, हृष्ट-पुष्ट लोगों से भरा हुआ मत्स्यराज का नगर किसी महान उत्सव के समान शोभा पा रहा था।
श्लोक 53 (4.78.53)
पुरोहितैरमात्यैश्च पौरैर्जानपदैः सह । विराटो नृपतिः श्रीमान्सौभद्रायाभिमन्यवे । तां सुतामुत्तरां दत्त्वा मुमुदे परमं तदा ॥
purohitairamātyaiśca paurairjānapadaiḥ saha | virāṭo nṛpatiḥ śrīmānsaubhadrāyābhimanyave | tāṃ sutāmuttarāṃ dattvā mumude paramaṃ tadā
पुरोहितों, मन्त्रियों, नगरवासियों और जनपदवासियों के साथ श्रीमान् राजा विराट अपनी पुत्री उत्तरा सुभद्रापुत्र अभिमन्यु को देकर अत्यन्त आनन्दित हुए।
जनमेजय उवाच
श्लोक 54 (4.78.54)
वृत्ते विवाहे हृष्टात्मा यदुवाच युधिष्ठिरः । तत्सर्वं कथयस्वेह कृतवन्तो यदुत्तरम् ॥
vṛtte vivāhe hṛṣṭātmā yaduvāca yudhiṣṭhiraḥ | tatsarvaṃ kathayasveha kṛtavanto yaduttaram
"विवाह सम्पन्न हो जाने पर प्रसन्नचित्त युधिष्ठिर ने जो कुछ कहा और उसके बाद उन्होंने जो कुछ किया, वह सब मुझे यहाँ बताइए।"