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दशम स्कन्ध · अध्याय 18

प्रलम्बासुर-वध

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (bhagavata.10.18.1)

श्रीशुक उवाच अथ कृष्णः परिवृतो ज्ञातिभिर्मुदितात्मभिः । अनुगीयमानो न्यविशद्व्रजं गोकुलमण्डितम् ॥ 18.1 ॥

śrī-śuka uvāca atha kṛṣṇaḥ parivṛto jñātibhir muditātmabhiḥ anugīyamāno nyaviśad vrajaṁ gokula-maṇḍitam

श्री शुकदेव जी ने कहा — तत्पश्चात् आनंदमग्न स्वजनों से घिरे और उनके द्वारा गुणगान किए जाते हुए कृष्ण गोकुल की गौओं से सुशोभित व्रज में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 2 (bhagavata.10.18.2)

व्रजे विक्रीडतोरेवं गोपालच्छद्ममायया । ग्रीष्मो नामर्तुरभवन्नातिप्रेयाञ्छरीरिणाम् ॥ 18.2 ॥

vraje vikrīḍator evaṁ gopāla-cchadma-māyayā grīṣmo nāmartur abhavan nāti-preyāñ charīriṇām

इस प्रकार गोपाल के भेष में अपनी माया से क्रीड़ा करते हुए उन दोनों के समय में व्रज में ग्रीष्म ऋतु आ गई, जो सामान्यतः देहधारियों को अधिक प्रिय नहीं होती।

श्लोक 3 (bhagavata.10.18.3)

स च वृन्दावनगुणैर्वसन्त इव लक्षितः । यत्रास्ते भगवान् साक्षाद् रामेण सह केशवः ॥ 18.3 ॥

sa ca vṛndāvana-guṇair vasanta iva lakṣitaḥ yatrāste bhagavān sākṣād rāmeṇa saha keśavaḥ

किंतु वृंदावन के गुणों के कारण वह ग्रीष्म भी मानो वसंत-सा प्रतीत होता था, क्योंकि वहाँ साक्षात् भगवान केशव बलराम के साथ निवास करते थे।

श्लोक 4 (bhagavata.10.18.4)

यत्र निर्झरनिर्ह्रादनिवृत्तस्वनझिल्लिकम् । शश्वत्तच्छीकरर्जीषद्रुममण्डलमण्डितम् ॥ 18.4 ॥

yatra nirjhara-nirhrāda- nivṛtta-svana-jhillikam śaśvat tac-chīkararjīṣa- druma-maṇḍala-maṇḍitam

वहाँ झरनों की गर्जना से झींगुरों की ध्वनि दब जाती थी, और वृक्षों के समूह निरंतर उनकी फुहारों से भीगे रहकर उस स्थान की शोभा बढ़ाते थे।

श्लोक 5 (bhagavata.10.18.5)

सरित्सरःप्रस्रवणोर्मिवायुना कह्लारकुञ्जोत्पलरेणुहारिणा । न विद्यते यत्र वनौकसां दवो निदाघवह्न्यर्कभवोऽतिशाद्वले ॥ 18.5 ॥

sarit-saraḥ-prasravaṇormi-vāyunā kahlāra-kañjotpala-reṇu-hāriṇā na vidyate yatra vanaukasāṁ davo nidāgha-vahny-arka-bhavo ’ti-śādvale

नदी, सरोवर और झरनों की लहरों से उठने वाली, तथा कमल एवं कुमुदिनी के पराग को अपने साथ लाने वाली वायु के कारण, हरी-भरी घास से भरे उस वन में रहने वालों को ग्रीष्म की धूप और दावाग्नि से उत्पन्न होने वाला संताप कभी नहीं सताता था।

श्लोक 6 (bhagavata.10.18.6)

अगाधतोयह्रदिनीतटोर्मिभि- र्द्रवत्पुरीष्याः पुलिनैः समन्ततः । न यत्र चण्डांशुकरा विषोल्बणा भुवो रसं शाद्वलितं च गृह्णते ॥ 18.6 ॥

agādha-toya-hradinī-taṭormibhir dravat-purīṣyāḥ pulinaiḥ samantataḥ na yatra caṇḍāṁśu-karā viṣolbaṇā bhuvo rasaṁ śādvalitaṁ ca gṛhṇate

गहरे जल वाली नदियों की लहरों से उनके तट सर्वत्र गीली, कीचड़युक्त बालू से भरे रहते थे, जिसके कारण सूर्य की विषतुल्य प्रचंड किरणें भी पृथ्वी के रस को और घास से ढके भूभाग को कभी सुखा नहीं पाती थीं।

श्लोक 7 (bhagavata.10.18.7)

वनं कुसुमितं श्रीमन्नदच्चित्रमृगद्विजम् । गायन्मयूरभ्रमरं कूजत्कोकिलसारसम् ॥ 18.7 ॥

vanaṁ kusumitaṁ śrīman nadac-citra-mṛga-dvijam gāyan mayūra-bhramaraṁ kūjat-kokila-sārasam

वह वन पुष्पों से खिला हुआ, सुंदर, विभिन्न पशु-पक्षियों के शब्दों से गुंजायमान था; मयूर और भ्रमर गा रहे थे तथा कोकिल और सारस बोल रहे थे।

श्लोक 8 (bhagavata.10.18.8)

क्रीडिष्यमाणस्तन् कृष्णो भगवान् बलसंयुतः । वेणुं विरणयन् गोपैर्गोधनैः संवृतोऽविशत् ॥ 18.8 ॥

krīḍiṣyamāṇas tat krṣṇo bhagavān bala-saṁyutaḥ veṇuṁ viraṇayan gopair go-dhanaiḥ saṁvṛto ’viśat

क्रीडा करने की इच्छा से, बलराम सहित भगवान कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाते हुए गोपों और गौओं से घिरे हुए उस वन में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 9 (bhagavata.10.18.9)

प्रवालबर्हस्तबकस्रग्धातुकृतभूषणाः । रामकृष्णादयो गोपा ननृतुर्युयुधुर्जगुः ॥ 18.9 ॥

pravāla-barha-stabaka- srag-dhātu-kṛta-bhūṣaṇāḥ rāma-kṛṣṇādayo gopā nanṛtur yuyudhur jaguḥ

नई कोंपलों, मयूर-पंखों, पुष्प-गुच्छों की मालाओं और रंगीन खनिज-धातुओं से स्वयं को अलंकृत कर, राम-कृष्ण आदि गोपगण नृत्य करने लगे, कुश्ती लड़ने लगे और गाने लगे।

श्लोक 10 (bhagavata.10.18.10)

कृष्णस्य नृत्यतः केचिज्जगुः केचिदवादयन् । वेणुपाणितलैः शृङ्गैः प्रशशंसुरथापरे ॥ 18.10 ॥

kṛṣṇasya nṛtyataḥ kecij jaguḥ kecid avādayan veṇu-pāṇitalaiḥ śṛṅgaiḥ praśaśaṁsur athāpare

कृष्ण के नृत्य करते समय कुछ लोग गाते थे, कुछ बाँसुरी, ताली और सींग के वाद्य बजाते थे, तथा अन्य कुछ उनकी प्रशंसा करते थे।

श्लोक 11 (bhagavata.10.18.11)

गोपजातिप्रतिच्छन्ना देवा गोपालरूपिणौ । ईडिरे कृष्णरामौ च नटा इव नटं नृप ॥ 18.11 ॥

gopa-jāti-praticchannā devā gopāla-rūpiṇau īḍire kṛṣṇa-rāmau ca naṭā iva naṭaṁ nṛpa

हे राजन्! गोप-वेश में छिपे हुए देवगण, जिस प्रकार एक नर्तक दूसरे नर्तक की स्तुति करता है, उसी प्रकार गोपाल-रूपधारी कृष्ण और राम की स्तुति करते थे।

श्लोक 12 (bhagavata.10.18.12)

भ्रमणैर्लङ्घनैः क्षेपैरास्फोटनविकर्षणैः । चिक्रीडतुर्नियुद्धेन काकपक्षधरौ क्वचित् ॥ 18.12 ॥

bhramaṇair laṅghanaiḥ kṣepair āsphoṭana-vikarṣaṇaiḥ cikrīḍatur niyuddhena kāka-pakṣa-dharau kvacit

वे दोनों घूमकर, कूदकर, फेंककर, थपथपाकर और खींचकर खेलते थे, तथा कभी-कभी अपने कर्णपाशधारी सखाओं से मल्लयुद्ध भी करते थे।

श्लोक 13 (bhagavata.10.18.13)

क्वचिन्नृत्यत्सु चान्येषु गायकौ वादकौ स्वयम् । शशंसतुर्महाराज साधु साध्विति वादिनौ ॥ 18.13 ॥

kvacin nṛtyatsu cānyeṣu gāyakau vādakau svayam śaśaṁsatur mahā-rāja sādhu sādhv iti vādinau

हे महाराज! कभी जब अन्य लड़के नृत्य करते थे, तब वे दोनों स्वयं गायक और वादक बन जाते थे, और कभी वे स्वयं "साधु, साधु" कहकर उनकी प्रशंसा करते थे।

श्लोक 14 (bhagavata.10.18.14)

क्वचिद्बिल्वैः क्वचित्कुम्भैः क्वचामलकमुष्टिभिः । अस्पृश्यनेत्रबन्धाद्यैः क्वचिन्मृगखगेहया ॥ 18.14 ॥

kvacid bilvaiḥ kvacit kumbhaiḥ kvacāmalaka-muṣṭibhiḥ aspṛśya-netra-bandhādyaiḥ kvacin mṛga-khagehayā

कभी बेल के फलों से, कभी कुम्भी फलों से, कभी आँवलों की मुट्ठियों से खेल खेलते, कभी छू-छुऔवल और आँख-मिचौली जैसे खेल खेलते, तो कभी पशु-पक्षियों की नकल करते हुए वे क्रीड़ा करते थे।

श्लोक 15 (bhagavata.10.18.15)

क्वचिच्च दर्दुरप्लावैर्विविधैरुपहासकैः । कदाचित् स्यन्दोलिकया कर्हिचिन्नृपचेष्टया ॥ 18.15 ॥

kvacic ca dardura-plāvair vividhair upahāsakaiḥ kadācit syandolikayā karhicin nṛpa-ceṣṭayā

कभी वे मेंढक की तरह उछल-कूद करते, कभी नाना प्रकार के हास्य-विनोद करते, कभी झूला झूलते, और कभी राजाओं की-सी चेष्टाओं का अभिनय करते।

श्लोक 16 (bhagavata.10.18.16)

एवं तौ लोकसिद्धाभिः क्रीडाभिश्चेरतुर्वने । नद्यद्रिद्रोणिकुञ्जेषु काननेषु सरःसु च ॥ 18.16 ॥

evaṁ tau loka-siddhābhiḥ krīḍābhiś ceratur vane nady-adri-droṇi-kuñjeṣu kānaneṣu saraḥsu ca

इस प्रकार वे दोनों लोक-प्रसिद्ध खेलों के साथ नदियों, पर्वतों की घाटियों, लताकुंजों, वनों और सरोवरों में विचरण करते रहे।

श्लोक 17 (bhagavata.10.18.17)

पशूंश्चारयतोर्गोपैस्तद्वने रामकृष्णयोः । गोपरूपी प्रलम्बोऽगादसुरस्तज्जिहीर्षया ॥ 18.17 ॥

paśūṁś cārayator gopais tad-vane rāma-kṛṣṇayoḥ gopa-rūpī pralambo ’gād asuras taj-jihīrṣayā

उसी वन में गोपों के साथ गौवें चराते हुए राम और कृष्ण के बीच, उन्हें हर लेने की इच्छा से गोप-रूप धारण किए प्रलंब नामक असुर आ पहुँचा।

श्लोक 18 (bhagavata.10.18.18)

तं विद्वानपि दाशार्हो भगवान् सर्वदर्शनः । अन्वमोदत तत्सख्यं वधं तस्य विचिन्तयन् ॥ 18.18 ॥

taṁ vidvān api dāśārho bhagavān sarva-darśanaḥ anvamodata tat-sakhyaṁ vadhaṁ tasya vicintayan

सर्वद्रष्टा दाशार्ह-वंशी भगवान कृष्ण उसे भलीभाँति पहचान चुके थे, फिर भी उन्होंने उसकी मित्रता स्वीकार कर ली, यद्यपि मन ही मन वे उसके वध का ही विचार कर रहे थे।

श्लोक 19 (bhagavata.10.18.19)

तत्रोपाहूय गोपालान् कृष्णः प्राह विहारवित् । हे गोपा विहरिष्यामो द्वन्द्वीभूय यथायथम् ॥ 18.19 ॥

tatropāhūya gopālān kṛṣṇaḥ prāha vihāra-vit he gopā vihariṣyāmo dvandvī-bhūya yathā-yatham

तब क्रीड़ा-कुशल कृष्ण ने गोपों को बुलाकर कहा — हे गोपो! आओ, हम सब यथोचित रीति से दो-दो दलों में बँटकर खेलें।

श्लोक 20 (bhagavata.10.18.20)

तत्र चक्रुः परिवृढौ गोपा रामजनार्दनौ । कृष्णसङ्घट्टिनः केचिदासन् रामस्य चापरे ॥ 18.20 ॥

tatra cakruḥ parivṛḍhau gopā rāma-janārdanau kṛṣṇa-saṅghaṭṭinaḥ kecid āsan rāmasya cāpare

तब गोपों ने राम और जनार्दन को अपने-अपने दल का नायक बनाया; कुछ कृष्ण के दल में शामिल हुए और शेष राम के दल में।

श्लोक 21 (bhagavata.10.18.21)

आचेरुर्विविधाः क्रीडा वाह्यवाहकलक्षणाः । यत्रारोहन्ति जेतारो वहन्ति च पराजिताः ॥ 18.21 ॥

ācerur vividhāḥ krīḍā vāhya-vāhaka-lakṣaṇāḥ yatrārohanti jetāro vahanti ca parājitāḥ

वे नाना प्रकार के "सवार और वाहक" वाले खेल खेलने लगे, जिनमें विजेता पराजितों की पीठ पर सवार होते थे और पराजित उन्हें ढोते थे।

श्लोक 22 (bhagavata.10.18.22)

वहन्तो वाह्यमानाश्च चारयन्तश्च गोधनम् । भाण्डीरकं नाम वटं जग्मुः कृष्णपुरोगमाः ॥ 18.22 ॥

vahanto vāhyamānāś ca cārayantaś ca go-dhanam bhāṇḍīrakaṁ nāma vaṭaṁ jagmuḥ kṛṣṇa-purogamāḥ

इस प्रकार बारी-बारी से एक-दूसरे को ढोते और गौओं को चराते हुए, कृष्ण के नेतृत्व में वे सब भाण्डीरक नामक वटवृक्ष के पास जा पहुँचे।

श्लोक 23 (bhagavata.10.18.23)

रामसङ्घट्टिनो यर्हि श्रीदामवृषभादयः । क्रीडायां जयिनस्तांस्तानूहुः कृष्णादयो नृप ॥ 18.23 ॥

rāma-saṅghaṭṭino yarhi śrīdāma-vṛṣabhādayaḥ krīḍāyāṁ jayinas tāṁs tān ūhuḥ kṛṣṇādayo nṛpa

हे राजन्! जब उस खेल में बलराम के दल के श्रीदामा, वृषभ आदि विजयी होते, तब कृष्ण आदि उन-उन विजेताओं को अपनी पीठ पर ढोते थे।

श्लोक 24 (bhagavata.10.18.24)

उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः । वृषभं भद्रसेनस्तु प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ॥ 18.24 ॥

uvāha kṛṣṇo bhagavān śrīdāmānaṁ parājitaḥ vṛṣabhaṁ bhadrasenas tu pralambo rohiṇī-sutam

पराजित होकर भगवान कृष्ण ने श्रीदामा को ढोया, भद्रसेन ने वृषभ को ढोया, और प्रलंब ने रोहिणी-पुत्र बलराम को ढोया।

श्लोक 25 (bhagavata.10.18.25)

अविषह्यं मन्यमानः कृष्णं दानवपुङ्गवः । वहन् द्रुततरं प्रागादवरोहणतः परम् ॥ 18.25 ॥

aviṣahyaṁ manyamānaḥ kṛṣṇaṁ dānava-puṅgavaḥ vahan drutataraṁ prāgād avarohaṇataḥ param

कृष्ण को असह्य (अजेय) मानते हुए, उस दानव-श्रेष्ठ ने बलराम को ढोते हुए, उन्हें उतारने के नियत स्थान से आगे तेज गति से ले जाना आरंभ कर दिया।

श्लोक 26 (bhagavata.10.18.26)

तमुद्वहन् धरणिधरेन्द्रगौरवं महासुरो विगतरयो निजं वपुः । स आस्थितः पुरटपरिच्छदो बभौ तडिद्द्युमानुडुपतिवाडिवाम्बुदः ॥ 18.26 ॥

tam udvahan dharaṇi-dharendra-gauravaṁ mahāsuro vigata-rayo nijaṁ vapuḥ sa āsthitaḥ puraṭa-paricchado babhau taḍid-dyumān uḍupati-vāḍ ivāmbudaḥ

बलराम को ढोते हुए वह महान् असुर, जब वे विशाल पर्वतों के राजा के समान भारी हो गए, तो उसका वेग मंद पड़ गया; उसने अपना वास्तविक रूप धारण कर लिया, और स्वर्णाभूषणों से सुशोभित होकर वह बिजली की चमक और चंद्रमा को ढके हुए बादल के समान दिखने लगा।

श्लोक 27 (bhagavata.10.18.27)

निरीक्ष्य तद्वपुरलमम्बरे चरत् प्रदीप्तदृग् भ्रुकुटितटोग्रदंष्ट्रकम् । ज्वलच्छिखं कटककिरीटकुण्डल- त्विषाद्भुतं हलधर ईषदत्रसत् ॥ 18.27 ॥

nirīkṣya tad-vapur alam ambare carat pradīpta-dṛg bhru-kuṭi-taṭogra-daṁṣṭrakam jvalac-chikhaṁ kaṭaka-kirīṭa-kuṇḍala- tviṣādbhutaṁ haladhara īṣad atrasat

आकाश में विचरण करते हुए उस विशाल शरीर को, जिसकी आँखें धधक रही थीं, भौंहों के पास भयंकर दाढ़ें थीं, जिसके केश जलते हुए-से थे, और जो कड़े, मुकुट तथा कुंडलों की अद्भुत कांति से युक्त था, देखकर हलधर बलराम कुछ क्षण के लिए भयभीत हो गए।

श्लोक 28 (bhagavata.10.18.28)

अथागतस्मृतिरभयो रिपुं बलो विहायसार्थमिव हरन्तमात्मनः । रुषाहनच्छिरसि दृढेन मुष्टिना सुराधिपो गिरिमिव वज्ररंहसा ॥ 18.28 ॥

athāgata-smṛtir abhayo ripuṁ balo vihāya sārtham iva harantam ātmanaḥ ruṣāhanac chirasi dṛḍhena muṣṭinā surādhipo girim iva vajra-raṁhasā

तत्पश्चात् अपनी वास्तविकता का स्मरण होते ही, निर्भय बलराम ने समझ लिया कि यह शत्रु उन्हें उनके साथियों से दूर हर ले जाना चाहता है; क्रोधित होकर उन्होंने अपनी कठोर मुष्टि से, जिस प्रकार इंद्र वज्र के वेग से पर्वत पर प्रहार करते हैं, उसी प्रकार उसके सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 29 (bhagavata.10.18.29)

स आहतः सपदि विशीर्णमस्तको मुखाद् वमन् रुधिरमपस्मृतोऽसुरः । महारवं व्यसुरपतत् समीरयन् गिरिर्यथा मघवत आयुधाहतः ॥ 18.29 ॥

sa āhataḥ sapadi viśīrṇa-mastako mukhād vaman rudhiram apasmṛto ’suraḥ mahā-ravaṁ vyasur apatat samīrayan girir yathā maghavata āyudhāhataḥ

उस प्रहार से उसका सिर तत्काल चूर-चूर हो गया; वह असुर मुख से रक्त वमन करता, चेतनाशून्य होकर, महाध्वनि करता हुआ प्राणहीन होकर गिर पड़ा, ठीक उसी प्रकार जैसे इंद्र के अस्त्र से आहत पर्वत गिर पड़ता है।

श्लोक 30 (bhagavata.10.18.30)

दृष्ट्वा प्रलम्बं निहतं बलेन बलशालिना । गोपाः सुविस्मिता आसन्साधु साध्विति वादिनः ॥ 18.30 ॥

dṛṣṭvā pralambaṁ nihataṁ balena bala-śālinā gopāḥ su-vismitā āsan sādhu sādhv iti vādinaḥ

बलशाली बलराम के हाथों प्रलंब को मारा गया देखकर, गोपगण अत्यंत आश्चर्यचकित हो गए और "साधु, साधु!" कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 31 (bhagavata.10.18.31)

आशिषोऽभिगृणन्तस्तं प्रशशंसुस्तदर्हणम् । प्रेत्यागतमिवालिङ्ग्य प्रेमविह्वलचेतसः ॥ 18.31 ॥

āśiṣo ’bhigṛṇantas taṁ praśaśaṁsus tad-arhaṇam pretyāgatam ivāliṅgya prema-vihvala-cetasaḥ

वे उन्हें आशीर्वाद देते हुए उनकी उस पात्रता के अनुरूप स्तुति करने लगे, और प्रेम से विह्वल होकर उन्हें ऐसे गले लगाया मानो वे मृत्युलोक से लौट आए हों।

श्लोक 32 (bhagavata.10.18.32)

पापे प्रलम्बे निहते देवाः परमनिर्वृताः । अभ्यवर्षन् बलं माल्यैः शशंसुः साधु साध्विति ॥ 18.32 ॥

pāpe pralambe nihate devāḥ parama-nirvṛtāḥ abhyavarṣan balaṁ mālyaiḥ śaśaṁsuḥ sādhu sādhv iti

पापी प्रलंब के मारे जाने पर देवगण परम आनंदित हो उठे; उन्होंने बलराम पर पुष्पमालाओं की वर्षा की और "साधु, साधु!" कहकर उनकी प्रशंसा की।

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