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दशम स्कन्ध · अध्याय 20

वृन्दावन में वर्षा और शरद् ऋतु का वर्णन

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

श्लोक 1 (bhagavata.10.20.1)

श्रीशुक उवाच तयोस्तदद्भुतं कर्म दावाग्नेर्मोक्षमात्मनः । गोपाः स्त्रीभ्यः समाचख्युः प्रलम्बवधमेव च ॥ 20.1 ॥

śrī-śuka uvāca tayos tad adbhutaṁ karma dāvāgner mokṣam ātmanaḥ gopāḥ strībhyaḥ samācakhyuḥ pralamba-vadham eva ca

श्री शुकदेव जी ने कहा — गोप-बालकों ने स्त्रियों को उन दोनों (कृष्ण-बलराम) के उस अद्भुत कर्म का वर्णन सुनाया — दावाग्नि से स्वयं की रक्षा का, और साथ ही प्रलंबासुर के वध का भी।

श्लोक 2 (bhagavata.10.20.2)

गोपवृद्धाश्च गोप्यश्च तदुपाकर्ण्य विस्मिताः । मेनिरे देवप्रवरौ कृष्णरामौ व्रजं गतौ ॥ 20.2 ॥

gopa-vṛddhāś ca gopyaś ca tad upākarṇya vismitāḥ menire deva-pravarau kṛṣṇa-rāmau vrajaṁ gatau

यह सुनकर वृद्ध गोपजन और गोपियाँ अत्यंत विस्मित हो उठे, और उन्होंने मान लिया कि कृष्ण और राम कोई श्रेष्ठ देवता हैं, जो व्रज में अवतीर्ण हुए हैं।

श्लोक 3 (bhagavata.10.20.3)

ततः प्रावर्तत प्रावृट् सर्वसत्त्वसमुद्भवा । विद्योतमानपरिधिर्विस्फूर्जितनभस्तला ॥ 20.3 ॥

tataḥ prāvartata prāvṛṭ sarva-sattva-samudbhavā vidyotamāna-paridhir visphūrjita-nabhas-talā

तत्पश्चात् वर्षा ऋतु का आगमन हुआ, जो समस्त प्राणियों की जीवनदायिनी है; क्षितिज बिजली की चमक से जगमगा उठा और आकाश गर्जना से गूँज उठा।

श्लोक 4 (bhagavata.10.20.4)

सान्द्रनीलाम्बुदैर्व्योम सविद्युत्स्तनयित्नुभिः । अस्पष्टज्योतिराच्छन्नं ब्रह्मेव सगुणं बभौ ॥ 20.4 ॥

sāndra-nīlāmbudair vyoma sa-vidyut-stanayitnubhiḥ aspaṣṭa-jyotir ācchannaṁ brahmeva sa-guṇaṁ babhau

बिजली और गर्जना से युक्त, घने नीले बादलों से ढका आकाश, अस्पष्ट ज्योति वाला दिखने लगा — ठीक वैसे ही जैसे गुणों से आच्छादित होने पर ब्रह्म प्रतीत होता है।

श्लोक 5 (bhagavata.10.20.5)

अष्टौ मासान् निपीतं यद् भूम्याश्चोदमयं वसु । स्वगोभिर्मोक्तुमारेभे पर्जन्यः काल आगते ॥ 20.5 ॥

aṣṭau māsān nipītaṁ yad bhūmyāś coda-mayaṁ vasu sva-gobhir moktum ārebhe parjanyaḥ kāla āgate

आठ महीनों तक जिस जलरूपी धन को सूर्य ने अपनी किरणों से पृथ्वी से खींच लिया था, समय आने पर पर्जन्य (वर्षा) ने उसे फिर से लौटाना आरंभ कर दिया।

श्लोक 6 (bhagavata.10.20.6)

तडिद्वन्तो महामेघाश्चण्डश्वसनवेपिताः । प्रीणनं जीवनं ह्यस्य मुमुचुः करुणा इव ॥ 20.6 ॥

taḍidvanto mahā-meghāś caṇḍa-śvasana-vepitāḥ prīṇanaṁ jīvanaṁ hy asya mumucuḥ karuṇā iva

बिजली से युक्त विशाल बादल, प्रचंड वायु से कंपायमान होकर, इस जगत् के प्रीणन और जीवन-रूप जल को इस प्रकार बरसाने लगे मानो वे साक्षात् करुणा हों।

श्लोक 7 (bhagavata.10.20.7)

तपःकृशा देवमीढा आसीद् वर्षीयसी मही । यथैव काम्यतपसस्तनुः सम्प्राप्य तत्फलम् ॥ 20.7 ॥

tapaḥ-kṛśā deva-mīḍhā āsīd varṣīyasī mahī yathaiva kāmya-tapasas tanuḥ samprāpya tat-phalam

ग्रीष्म के ताप से क्षीण हुई पृथ्वी, वर्षा के देवता की कृपा से पुनः परिपुष्ट हो उठी — ठीक उसी प्रकार जैसे किसी कामना के लिए तप करने वाले का शरीर, तप का फल प्राप्त होने पर पुनः पुष्ट हो जाता है।

श्लोक 8 (bhagavata.10.20.8)

निशामुखेषु खद्योतास्तमसा भान्ति न ग्रहाः । यथा पापेन पाषण्डा न हि वेदाः कलौ युगे ॥ 20.8 ॥

niśā-mukheṣu khadyotās tamasā bhānti na grahāḥ yathā pāpena pāṣaṇḍā na hi vedāḥ kalau yuge

संध्या के अंधकार में जुगनू ही चमकते हैं, तारे नहीं दिखाई देते — ठीक वैसे ही जैसे कलियुग में पाप की अधिकता से नास्तिक मत ही उभर आते हैं और वेद प्रकट नहीं हो पाते।

श्लोक 9 (bhagavata.10.20.9)

श्रुत्वा पर्जन्यनिनदं मण्डुकाः ससृजुर्गिरः । तूष्णीं शयानाः प्राग् यद्वद्ब्राह्मणा नियमात्यये ॥ 20.9 ॥

śrutvā parjanya-ninadaṁ maṇḍukāḥ sasṛjur giraḥ tūṣṇīṁ śayānāḥ prāg yadvad brāhmaṇā niyamātyaye

वर्षा की गर्जना सुनकर मेंढक बोल उठे, जो इससे पहले चुपचाप पड़े रहते थे — ठीक वैसे ही जैसे नियम का समय समाप्त होने पर मौन पड़े ब्राह्मण विद्यार्थी बोलने लगते हैं।

श्लोक 10 (bhagavata.10.20.10)

आसन्नुत्पथगामिन्यः क्षुद्रनद्योऽनुशुष्यतीः । पुंसो यथास्वतन्त्रस्य देहद्रविणसम्पदः ॥ 20.10 ॥

āsann utpatha-gāminyaḥ kṣudra-nadyo ’nuśuṣyatīḥ puṁso yathāsvatantrasya deha-draviṇa-sampadaḥ

सूखी पड़ी हुई छोटी-छोटी नदियाँ अब अपने मार्ग से भटककर बहने लगीं — ठीक वैसे ही जैसे इंद्रियों के वश में पड़े मनुष्य का शरीर और धन-संपत्ति उचित मार्ग से भटक जाते हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.10.20.11)

हरिता हरिभिः शष्पैरिन्द्रगोपैश्च लोहिता । उच्छिलीन्ध्रकृतच्छाया नृणां श्रीरिव भूरभूत् ॥ 20.11 ॥

haritā haribhiḥ śaṣpair indragopaiś ca lohitā ucchilīndhra-kṛta-cchāyā nṛṇāṁ śrīr iva bhūr abhūt

नई हरी घास से हरी-भरी, इंद्रगोप कीड़ों से लाल, और छत्रकों की छाया से युक्त पृथ्वी ऐसी दिखने लगी मानो वह किसी अकस्मात् धनवान हुए मनुष्य की शोभा हो।

श्लोक 12 (bhagavata.10.20.12)

क्षेत्राणि शष्यसम्पद्भिः कर्षकाणां मुदं ददुः । मानिनामनुतापं वै दैवाधीनमजानताम् ॥ 20.12 ॥

kṣetrāṇi śaṣya-sampadbhiḥ karṣakāṇāṁ mudaṁ daduḥ māninām anutāpaṁ vai daivādhīnam ajānatām

फसलों की समृद्धि से खेतों ने किसानों को हर्ष दिया, किंतु उन अभिमानी लोगों को, जो सब कुछ दैव के अधीन होना नहीं जानते थे, पश्चाताप ही दिया।

श्लोक 13 (bhagavata.10.20.13)

जलस्थलौकसः सर्वे नववारिनिषेवया । अबिभ्रन् रुचिरं रूपं यथा हरिनिषेवया ॥ 20.13 ॥

jala-sthalaukasaḥ sarve nava-vāri-niṣevayā abibhran ruciraṁ rūpaṁ yathā hari-niṣevayā

जल और स्थल में रहने वाले समस्त प्राणी नए जल के सेवन से सुंदर रूप धारण करने लगे — ठीक वैसे ही जैसे भगवान की सेवा से मनुष्य सुंदर हो उठता है।

श्लोक 14 (bhagavata.10.20.14)

सरिद्भिः सङ्गतः सिन्धुश्चुक्षोभ श्वसनोर्मिमान् । अपक्वयोगिनश्चित्तं कामाक्तं गुणयुग् यथा ॥ 20.14 ॥

saridbhiḥ saṅgataḥ sindhuś cukṣobha śvasanormimān apakva-yoginaś cittaṁ kāmāktaṁ guṇa-yug yathā

नदियों के मिलने से समुद्र क्षुब्ध हो उठा, उसकी लहरें वायु से हिलोरें लेने लगीं — ठीक वैसे ही जैसे कामनाओं से रँगे, अपरिपक्व योगी का चित्त गुणों के संसर्ग से क्षुब्ध हो जाता है।

श्लोक 15 (bhagavata.10.20.15)

गिरयो वर्षधाराभिर्हन्यमाना न विव्यथुः । अभिभूयमाना व्यसनैर्यथाधोक्षजचेतसः ॥ 20.15 ॥

girayo varṣa-dhārābhir hanyamānā na vivyathuḥ abhibhūyamānā vyasanair yathādhokṣaja-cetasaḥ

वर्षा की मूसलधार से आहत होते हुए भी पर्वत विचलित नहीं हुए — ठीक वैसे ही जैसे विपत्तियों से घिरे रहने पर भी भगवान में चित्त लगाए भक्तजन विचलित नहीं होते।

श्लोक 16 (bhagavata.10.20.16)

मार्गा बभूवुः सन्दिग्धस्तृणैश्छन्ना ह्यसंस्कृताः । नाभ्यस्यमानाः श्रुतयो द्विजैः कालेन चाहताः ॥ 20.16 ॥

mārgā babhūvuḥ sandigdhās tṛṇaiś channā hy asaṁskṛtāḥ nābhyasyamānāḥ śrutayo dvijaiḥ kālena cāhatāḥ

उपेक्षित मार्ग घास से ढँककर अस्पष्ट हो गए — ठीक वैसे ही जैसे ब्राह्मणों द्वारा अभ्यास न किए जाने पर श्रुतियाँ काल के प्रभाव से लुप्तप्राय हो जाती हैं।

श्लोक 17 (bhagavata.10.20.17)

लोकबन्धुषु मेघेषु विद्युतश्चलसौहृदाः । स्थैर्यं न चक्रुः कामिन्यः पुरुषेषु गुणिष्विव ॥ 20.17 ॥

loka-bandhuṣu megheṣu vidyutaś cala-sauhṛdāḥ sthairyaṁ na cakruḥ kāminyaḥ puruṣeṣu guṇiṣv iva

सबके हितैषी बादलों के बीच भी बिजली अपने चंचल स्नेह के कारण एक स्थान पर स्थिर न रह सकी — ठीक वैसे ही जैसे कामातुर स्त्रियाँ गुणवान पुरुषों के प्रति भी स्थिर नहीं रह पातीं।

श्लोक 18 (bhagavata.10.20.18)

धनुर्वियति माहेन्द्रं निर्गुणं च गुणिन्यभात् । व्यक्ते गुणव्यतिकरेऽगुणवान् पुरुषो यथा ॥ 20.18 ॥

dhanur viyati māhendraṁ nirguṇaṁ ca guṇiny abhāt vyakte guṇa-vyatikare ’guṇavān puruṣo yathā

आकाश में इंद्रधनुष, जो गुणों (डोरी) रहित होते हुए भी गुणवान (वर्णयुक्त धनुष) प्रतीत होता है, ऐसे शोभित हुआ — ठीक वैसे ही जैसे गुणों के प्रपंच में प्रकट होने पर भी भगवान स्वयं गुणों से परे रहते हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.10.20.19)

न रराजोडुपश्छन्नः स्वज्योत्स्नाराजितैर्घनैः । अहंमत्या भासितया स्वभासा पुरुषो यथा ॥ 20.19 ॥

na rarājoḍupaś channaḥ sva-jyotsnā-rājitair ghanaiḥ ahaṁ-matyā bhāsitayā sva-bhāsā puruṣo yathā

अपनी ही चाँदनी से प्रकाशित बादलों से ढँका हुआ चंद्रमा प्रकाशित नहीं हो पा रहा था — ठीक वैसे ही जैसे अपनी ही चेतना से प्रकाशित अहंकार से ढँका हुआ जीव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट नहीं हो पाता।

श्लोक 20 (bhagavata.10.20.20)

मेघागमोत्सवा हृष्टाः प्रत्यनन्दञ्छिखण्डिनः । गृहेषु तप्तनिर्विण्णा यथाच्युतजनागमे ॥ 20.20 ॥

meghāgamotsavā hṛṣṭāḥ pratyanandañ chikhaṇḍinaḥ gṛheṣu tapta-nirviṇṇā yathācyuta-janāgame

बादलों के आगमन के उत्सव से हर्षित मोर उनका अभिनंदन करने लगे — ठीक वैसे ही जैसे गृहस्थी के संतापों से खिन्न लोग भगवद्भक्तों के आगमन पर हर्षित हो उठते हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.10.20.21)

पीत्वापः पादपाः पद्भिरासन्नानात्ममूर्तयः । प्राक् क्षामास्तपसा श्रान्ता यथा कामानुसेवया ॥ 20.21 ॥

pītvāpaḥ pādapāḥ padbhir āsan nānātma-mūrtayaḥ prāk kṣāmās tapasā śrāntā yathā kāmānusevayā

वृक्ष, जो पहले तपकर क्षीण हो गए थे, अपनी जड़ों से जल पीकर विविध रूपों में लहलहा उठे — ठीक वैसे ही जैसे तप से क्षीण हुआ व्यक्ति भोगों के सेवन से पुनः स्वस्थ हो उठता है।

श्लोक 22 (bhagavata.10.20.22)

सरःस्वशान्तरोधःसु न्यूषुरङ्गापि सारसाः । गृहेष्वशान्तकृत्येषु ग्राम्या इव दुराशयाः ॥ 20.22 ॥

saraḥsv aśānta-rodhaḥsu nyūṣur aṅgāpi sārasāḥ gṛheṣv aśānta-kṛtyeṣu grāmyā iva durāśayāḥ

सरोवरों के तट क्षुब्ध होने पर भी सारस पक्षी वहीं बसे रहे — ठीक वैसे ही जैसे दुराशाओं में फँसे सांसारिक लोग, गृहस्थी में सुख-शांति न होने पर भी वहीं टिके रहते हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.10.20.23)

जलौघैर्निरभिद्यन्त सेतवो वर्षतीश्वरे । पाषण्डिनामसद्वादैर्वेदमार्गाः कलौ यथा ॥ 20.23 ॥

jalaughair nirabhidyanta setavo varṣatīśvare pāṣaṇḍinām asad-vādair veda-mārgāḥ kalau yathā

इंद्र के वर्षा बरसाने पर बाँध जल-प्रवाह से टूट गए — ठीक वैसे ही जैसे कलियुग में नास्तिकों के मिथ्या वाद-विवाद से वैदिक मार्ग खंडित हो जाते हैं।

श्लोक 24 (bhagavata.10.20.24)

व्यमुञ्चन् वायुभिर्नुन्ना भूतेभ्यश्चामृतं घनाः । यथाशिषो विश्पतयः काले काले द्विजेरिताः ॥ 20.24 ॥

vyamuñcan vāyubhir nunnā bhūtebhyaś cāmṛtaṁ ghanāḥ yathāśiṣo viś-patayaḥ kāle kāle dvijeritāḥ

वायु से प्रेरित बादल प्राणियों के हित के लिए अमृत-सम जल बरसाने लगे — ठीक वैसे ही जैसे ब्राह्मणों की प्रेरणा से राजा समय-समय पर प्रजा को दान देते हैं।

श्लोक 25 (bhagavata.10.20.25)

एवं वनं तद् वर्षिष्ठं पक्वखर्जुरजम्बुमत् । गोगोपालैर्वृतो रन्तुं सबलः प्राविशद्धरिः ॥ 20.25 ॥

evaṁ vanaṁ tad varṣiṣṭhaṁ pakva-kharjura-jambumat go-gopālair vṛto rantuṁ sa-balaḥ prāviśad dhariḥ

इस प्रकार पके हुए खजूर और जामुन के फलों से युक्त उस वर्षा-शोभित वन में, गौओं और गोपों से घिरे बलराम सहित भगवान हरि क्रीड़ा करने के लिए प्रविष्ट हुए।

श्लोक 26 (bhagavata.10.20.26)

धेनवो मन्दगामिन्य ऊधोभारेण भूयसा । ययुर्भगवताहूता द्रुतं प्रीत्या स्नुतस्तनाः ॥ 20.26 ॥

dhenavo manda-gāminya ūdho-bhāreṇa bhūyasā yayur bhagavatāhūtā drutaṁ prītyā snuta-stanāḥ

अपने भारी थनों के कारण धीमी गति से चलने वाली गौवें, जब भगवान द्वारा बुलाई गईं, तो स्नेहवश उनके थन दूध से भीग उठे और वे शीघ्रता से उनकी ओर दौड़ पड़ीं।

श्लोक 27 (bhagavata.10.20.27)

वनौकसः प्रमुदिता वनराजीर्मधुच्युतः । जलधारा गिरेर्नादादासन्ना ददृशे गुहाः ॥ 20.27 ॥

vanaukasaḥ pramuditā vana-rājīr madhu-cyutaḥ jala-dhārā girer nādād āsannā dadṛśe guhāḥ

भगवान ने प्रसन्नचित्त वनवासिनी स्त्रियों को, मधु टपकाते वृक्षों की पंक्तियों को, और पर्वत की जलधाराओं की गर्जना से निकट ही स्थित गुफाओं को देखा।

श्लोक 28 (bhagavata.10.20.28)

क्वचिद् वनस्पतिक्रोडे गुहायां चाभिवर्षति । निर्विश्य भगवान् रेमे कन्दमूलफलाशनः ॥ 20.28 ॥

kvacid vanaspati-kroḍe guhāyāṁ cābhivarṣati nirviśya bhagavān reme kanda-mūla-phalāśanaḥ

वर्षा होने पर कभी किसी वृक्ष की खोह में, तो कभी किसी गुफा में प्रवेश कर, भगवान कंद, मूल और फलों का आहार करते हुए वहाँ क्रीड़ा करते थे।

श्लोक 29 (bhagavata.10.20.29)

दध्योदनं समानीतं शिलायां सलिलान्तिके । सम्भोजनीयैर्बुभुजे गोपैः सङ्कर्षणान्वितः ॥ 20.29 ॥

dadhy-odanaṁ samānītaṁ śilāyāṁ salilāntike sambhojanīyair bubhuje gopaiḥ saṅkarṣaṇānvitaḥ

घर से लाए गए दही-भात को जल के निकट किसी शिला पर रखकर, संकर्षण (बलराम) और अपने साथ भोजन करने वाले गोपों सहित भगवान भोजन करते थे।

श्लोक 30 (bhagavata.10.20.30)

शाद्वलोपरि संविश्य चर्वतो मीलितेक्षणान् । तृप्तान् वृषान् वत्सतरान् गाश्च स्वोधोभरश्रमाः ॥ 20.30 ॥

śādvalopari saṁviśya carvato mīlitekṣaṇān tṛptān vṛṣān vatsatarān gāś ca svodho-bhara-śramāḥ

हरी घास पर बैठे, आँखें मूँदकर जुगाली करते तृप्त बैलों, बछड़ों तथा अपने ही थनों के भार से थकी गौओं को देखते हुए —

श्लोक 31 (bhagavata.10.20.31)

प्रावृट्श्रियं च तां वीक्ष्य सर्वकालसुखावहाम् । भगवान् पूजयां चक्रे आत्मशक्त्युपबृंहिताम् ॥ 20.31 ॥

prāvṛṭ-śriyaṁ ca tāṁ vīkṣya sarva-kāla-sukhāvahām bhagavān pūjayāṁ cakre ātma-śakty-upabṛṁhitām

भगवान ने वर्षा ऋतु की उस शोभा को, जो सदैव सुख देने वाली और उनकी ही अंतरंगा शक्ति से विस्तृत थी, आदरपूर्वक निहारा और उसका सम्मान किया।

श्लोक 32 (bhagavata.10.20.32)

एवं निवसतोस्तस्मिन् रामकेशवयोर्व्रजे । शरत्समभवद् व्यभ्रा स्वच्छाम्ब्वपरुषानिला ॥ 20.32 ॥

evaṁ nivasatos tasmin rāma-keśavayor vraje śarat samabhavad vyabhrā svacchāmbv-aparuṣānilā

इस प्रकार व्रज में निवास करते हुए राम और केशव के समय में शरद् ऋतु का आगमन हुआ, जब आकाश मेघरहित, जल स्वच्छ और वायु मंद हो जाती है।

श्लोक 33 (bhagavata.10.20.33)

शरदा नीरजोत्पत्त्या नीराणि प्रकृतिं ययुः । भ्रष्टानामिव चेतांसि पुनर्योगनिषेवया ॥ 20.33 ॥

śaradā nīrajotpattyā nīrāṇi prakṛtiṁ yayuḥ bhraṣṭānām iva cetāṁsi punar yoga-niṣevayā

शरद् ऋतु में कमलों के खिलने से जलाशय अपने मूल स्वरूप को पुनः प्राप्त हो गए — ठीक वैसे ही जैसे योग से पतित हुए साधकों का चित्त, योग के पुनः अभ्यास से अपनी शुद्ध अवस्था को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 34 (bhagavata.10.20.34)

व्योम्नोऽब्भ्रं भूतशाबल्यं भुवः पङ्कमपां मलम् । शरज्जहाराश्रमिणां कृष्णे भक्तिर्यथाशुभम् ॥ 20.34 ॥

vyomno ’bbhraṁ bhūta-śābalyaṁ bhuvaḥ paṅkam apāṁ malam śaraj jahārāśramiṇāṁ kṛṣṇe bhaktir yathāśubham

शरद् ऋतु ने आकाश से बादलों को, प्राणियों की भीड़-भाड़ को, पृथ्वी से कीचड़ को, और जल से मल को दूर कर दिया — ठीक वैसे ही जैसे कृष्ण के प्रति भक्ति आश्रमवासियों के समस्त अशुभ को दूर कर देती है।

श्लोक 35 (bhagavata.10.20.35)

सर्वस्वं जलदा हित्वा विरेजुः शुभ्रवर्चसः । यथा त्यक्तैषणाः शान्ता मुनयो मुक्तकिल्बिषाः ॥ 20.35 ॥

sarva-svaṁ jaladā hitvā virejuḥ śubhra-varcasaḥ yathā tyaktaiṣaṇāḥ śāntā munayo mukta-kilbiṣāḥ

सब कुछ त्यागकर बादल शुद्ध और उज्ज्वल दिखाई देने लगे — ठीक वैसे ही जैसे समस्त कामनाओं को त्यागकर शांत मुनि पाप-रहित होकर शोभित होते हैं।

श्लोक 36 (bhagavata.10.20.36)

गिरयो मुमुचुस्तोयं क्वचिन्न मुमुचुः शिवम् । यथा ज्ञानामृतं काले ज्ञानिनो ददते न वा ॥ 20.36 ॥

girayo mumucus toyaṁ kvacin na mumucuḥ śivam yathā jñānāmṛtaṁ kāle jñānino dadate na vā

पर्वत कहीं तो जल छोड़ते थे, कहीं शुद्ध जल नहीं छोड़ते थे — ठीक वैसे ही जैसे ज्ञानीजन कभी उचित समय पर ज्ञान-रूपी अमृत प्रदान करते हैं, तो कभी नहीं भी करते।

श्लोक 37 (bhagavata.10.20.37)

नैवाविदन् क्षीयमाणं जलं गाधजलेचराः । यथायुरन्वहं क्षय्यं नरा मूढाः कुटुम्बिनः ॥ 20.37 ॥

naivāvidan kṣīyamāṇaṁ jalaṁ gādha-jale-carāḥ yathāyur anv-ahaṁ kṣayyaṁ narā mūḍhāḥ kuṭumbinaḥ

उथले जल में विचरने वाले जलचर यह नहीं जानते थे कि उनका जल घटता जा रहा है — ठीक वैसे ही जैसे मूढ़ गृहस्थ मनुष्य यह नहीं जानते कि उनकी आयु प्रतिदिन क्षीण होती जा रही है।

श्लोक 38 (bhagavata.10.20.38)

गाधवारिचरास्तापमविन्दञ्छरदर्कजम् । यथा दरिद्रः कृपणः कुटुम्ब्यविजितेन्द्रियः ॥ 20.38 ॥

gādha-vāri-carās tāpam avindañ charad-arka-jam yathā daridraḥ kṛpaṇaḥ kuṭumby avijitendriyaḥ

उथले जल में विचरने वाले प्राणी शरद् के सूर्य से उत्पन्न ताप से पीड़ित हो उठे — ठीक वैसे ही जैसे इंद्रियों को वश में न कर पाने वाला दरिद्र और कृपण गृहस्थ दुःख भोगता है।

श्लोक 39 (bhagavata.10.20.39)

शनैः शनैर्जहुः पङ्कं स्थलान्यामं च वीरुधः । यथाहंममतां धीराः शरीरादिष्वनात्मसु ॥ 20.39 ॥

śanaiḥ śanair jahuḥ paṅkaṁ sthalāny āmaṁ ca vīrudhaḥ yathāhaṁ-mamatāṁ dhīrāḥ śarīrādiṣv anātmasu

स्थल धीरे-धीरे कीचड़ से मुक्त होते गए, और लताएँ अपने कच्चेपन से — ठीक वैसे ही जैसे धीर पुरुष धीरे-धीरे शरीर आदि अनात्म वस्तुओं में अहंकार और ममत्व को त्याग देते हैं।

श्लोक 40 (bhagavata.10.20.40)

निश्चलाम्बुरभूत्तूष्णीं समुद्रः शरदागमे । आत्मन्युपरते सम्यङ्मुनिर्व्युपरतागमः ॥ 20.40 ॥

niścalāmbur abhūt tūṣṇīṁ samudraḥ śarad-āgame ātmany uparate samyaṅ munir vyuparatāgamaḥ

शरद् के आगमन पर समुद्र का जल निश्चल होकर शांत हो गया — ठीक वैसे ही जैसे आत्मा में पूर्णतः स्थित मुनि वेदाध्ययन आदि क्रियाओं से भी विरत होकर शांत हो जाता है।

श्लोक 41 (bhagavata.10.20.41)

केदारेभ्यस्त्वपोऽगृह्णन् कर्षका दृढसेतुभिः । यथा प्राणैः स्रवज्ज्ञानं तन्निरोधेन योगिनः ॥ 20.41 ॥

kedārebhyas tv apo ’gṛhṇan karṣakā dṛḍha-setubhiḥ yathā prāṇaiḥ sravaj jñānaṁ tan-nirodhena yoginaḥ

किसानों ने मजबूत मेड़ें बाँधकर खेतों से जल को बहने से रोक लिया — ठीक वैसे ही जैसे योगीजन प्राणों को रोककर बहते हुए ज्ञान को क्षीण होने से बचा लेते हैं।

श्लोक 42 (bhagavata.10.20.42)

शरदर्कांशुजांस्तापान् भूतानामुडुपोऽहरत् । देहाभिमानजं बोधो मुकुन्दो व्रजयोषिताम् ॥ 20.42 ॥

śarad-arkāṁśu-jāṁs tāpān bhūtānām uḍupo ’harat dehābhimāna-jaṁ bodho mukundo vraja-yoṣitām

शरद्-सूर्य की किरणों से उत्पन्न संताप को चंद्रमा ने हर लिया — ठीक वैसे ही जैसे देहाभिमान से उत्पन्न दुःख को ज्ञान हर लेता है, और व्रज की स्त्रियों के विरह-संताप को स्वयं मुकुंद।

श्लोक 43 (bhagavata.10.20.43)

खमशोभत निर्मेघं शरद्विमलतारकम् । सत्त्वयुक्तं यथा चित्तं शब्दब्रह्मार्थदर्शनम् ॥ 20.43 ॥

kham aśobhata nirmeghaṁ śarad-vimala-tārakam sattva-yuktaṁ yathā cittaṁ śabda-brahmārtha-darśanam

मेघरहित शरद् आकाश निर्मल तारों से सुशोभित हो उठा — ठीक वैसे ही जैसे सत्त्वगुण से युक्त चित्त वेद के यथार्थ अभिप्राय के दर्शन से सुशोभित होता है।

श्लोक 44 (bhagavata.10.20.44)

अखण्डमण्डलो व्योम्नि रराजोडुगणैः शशी । यथा यदुपतिः कृष्णो वृष्णिचक्रावृतो भुवि ॥ 20.44 ॥

akhaṇḍa-maṇḍalo vyomni rarājoḍu-gaṇaiḥ śaśī yathā yadu-patiḥ kṛṣṇo vṛṣṇi-cakrāvṛto bhuvi

आकाश में पूर्ण मंडल वाला चंद्रमा तारों के समूह से घिरा हुआ ऐसे शोभित हुआ, जैसे पृथ्वी पर वृष्णिवंशियों से घिरे यदुपति कृष्ण शोभित होते हैं।

श्लोक 45 (bhagavata.10.20.45)

आश्लिष्य समशीतोष्णं प्रसूनवनमारुतम् । जनास्तापं जहुर्गोप्यो न कृष्णहृतचेतसः ॥ 20.45 ॥

āśliṣya sama-śītoṣṇaṁ prasūna-vana-mārutam janās tāpaṁ jahur gopyo na kṛṣṇa-hṛta-cetasaḥ

पुष्प-वन से आने वाली न अधिक शीतल, न अधिक उष्ण वायु का आलिंगन कर लोगों ने अपना संताप भुला दिया, किंतु जिन गोपियों का चित्त कृष्ण द्वारा हर लिया गया था, वे इससे संताप-मुक्त न हो सकीं।

श्लोक 46 (bhagavata.10.20.46)

गावो मृगाः खगा नार्यः पुष्पिण्यः शरदाभवन् । अन्वीयमानाः स्ववृषैः फलैरीशक्रिया इव ॥ 20.46 ॥

gāvo mṛgāḥ khagā nāryaḥ puṣpiṇyaḥ śaradābhavan anvīyamānāḥ sva-vṛṣaiḥ phalair īśa-kriyā iva

शरद् ऋतु के प्रभाव से गौवें, हिरणियाँ, पक्षिणियाँ और स्त्रियाँ ऋतुमती हो उठीं, और अपने-अपने पुरुषों द्वारा अनुसरण की जाने लगीं — ठीक वैसे ही जैसे भगवान की सेवा में किए गए कर्म अपने फलों द्वारा अनुसरण किए जाते हैं।

श्लोक 47 (bhagavata.10.20.47)

उदहृष्यन् वारिजानि सूर्योत्थाने कुमुद् विना । राज्ञा तु निर्भया लोका यथा दस्यून् विना नृप ॥ 20.47 ॥

udahṛṣyan vārijāni sūryotthāne kumud vinā rājñā tu nirbhayā lokā yathā dasyūn vinā nṛpa

हे राजन्! सूर्योदय होने पर सभी जलज पुष्प खिल उठे, केवल कुमुदिनी को छोड़कर — ठीक वैसे ही जैसे एक न्यायी राजा के राज्य में सभी प्रजा निर्भय रहती है, केवल चोर-डाकुओं को छोड़कर।

श्लोक 48 (bhagavata.10.20.48)

पुरग्रामेष्वाग्रयणैरिन्द्रियैश्च महोत्सवैः । बभौ भूः पक्वशष्याढ्या कलाभ्यां नितरां हरेः ॥ 20.48 ॥

pura-grāmeṣv āgrayaṇair indriyaiś ca mahotsavaiḥ babhau bhūḥ pakva-śaṣyāḍhyā kalābhyāṁ nitarāṁ hareḥ

नगरों और गाँवों में नवान्न-यज्ञ तथा अन्य महोत्सवों के साथ, पकी हुई फसलों से समृद्ध यह पृथ्वी हरि के दो अंशों (कृष्ण और बलराम) से अत्यंत सुशोभित हो उठी।

श्लोक 49 (bhagavata.10.20.49)

वणिङ्मुनिनृपस्नाता निर्गम्यार्थान् प्रपेदिरे । वर्षरुद्धा यथा सिद्धाः स्वपिण्डान् काल आगते ॥ 20.49 ॥

vaṇiṅ-muni-nṛpa-snātā nirgamyārthān prapedire varṣa-ruddhā yathā siddhāḥ sva-piṇḍān kāla āgate

वर्षा से रुके हुए व्यापारी, मुनि, राजा और स्नातक ब्रह्मचारी, अब बाहर निकलकर अपने-अपने प्रयोजनों की सिद्धि में लग गए — ठीक वैसे ही जैसे समय आने पर सिद्ध पुरुष अपने-अपने शरीरों को त्यागकर अपने गंतव्य को प्राप्त होते हैं।

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