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दशम स्कन्ध · अध्याय 21

गोपियों द्वारा कृष्ण की बाँसुरी के गीत की महिमा

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (bhagavata.10.21.1)

श्रीशुक उवाच इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना । न्यविशद् वायुना वातं सगोगोपालकोऽच्युतः ॥ 21.1 ॥

śrī-śuka uvāca itthaṁ śarat-svaccha-jalaṁ padmākara-sugandhinā nyaviśad vāyunā vātaṁ sa-go-gopālako ’cyutaḥ

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — इस प्रकार शरद ऋतु के निर्मल जल से भरे सरोवरों तथा कमल-सुगंधित शीतल वायु से युक्त उस वन में, अच्युत भगवान गौओं और गोपों सहित प्रविष्ट हुए।

श्लोक 2 (bhagavata.10.21.2)

कुसुमितवनराजिशुष्मिभृङ्ग- द्विजकुलघुष्टसरःसरिन्महीध्रम् । मधुपतिरवगाह्य चारयन् गाः सहपशुपालबलश्चुकूज वेणुम् ॥ 21.2 ॥

kusumita-vanarāji-śuṣmi-bhṛṅga dvija-kula-ghuṣṭa-saraḥ-sarin-mahīdhram madhupatir avagāhya cārayan gāḥ saha-paśu-pāla-balaś cukūja veṇum

उस वन में, जहाँ पुष्पित वृक्षों की पंक्तियाँ मतवाले भ्रमरों से गूँज रही थीं तथा सरोवर, नदियाँ और पर्वत पक्षियों के कलरव से गुंजायमान थे, मधुपति (कृष्ण) ने प्रवेश कर, बलराम और गोपों के साथ गौएँ चराते हुए अपनी बाँसुरी बजाई।

श्लोक 3 (bhagavata.10.21.3)

तद् व्रजस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम् । काश्चित्परोक्षं कृष्णस्य स्वसखीभ्योऽन्ववर्णयन् ॥ 21.3 ॥

tad vraja-striya āśrutya veṇu-gītaṁ smarodayam kāścit parokṣaṁ kṛṣṇasya sva-sakhībhyo ’nvavarṇayan

काम को जगाने वाले उस वेणु-गीत को सुनकर, व्रज की कुछ स्त्रियाँ, कृष्ण के परोक्ष में, अपनी सखियों से उसका वर्णन करने लगीं।

श्लोक 4 (bhagavata.10.21.4)

तद्वर्णयितुमारब्धाः स्मरन्त्यः कृष्णचेष्टितम् । नाशकन् स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप ॥ 21.4 ॥

tad varṇayitum ārabdhāḥ smarantyaḥ kṛṣṇa-ceṣṭitam nāśakan smara-vegena vikṣipta-manaso nṛpa

हे राजन्! उसका वर्णन करते हुए, कृष्ण की चेष्टाओं का स्मरण करते हुए, वे स्त्रियाँ काम के वेग से विक्षिप्त-चित्त होकर आगे कुछ न कह सकीं।

श्लोक 5 (bhagavata.10.21.5)

बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम् । रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन्गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥ 21.5 ॥

barhāpīḍaṁ naṭa-vara-vapuḥ karṇayoḥ karṇikāraṁ bibhrad vāsaḥ kanaka-kapiśaṁ vaijayantīṁ ca mālām randhrān veṇor adhara-sudhayāpūrayan gopa-vṛndair vṛndāraṇyaṁ sva-pada-ramaṇaṁ prāviśad gīta-kīrtiḥ

मयूर-पंख का मुकुट धारण किए, श्रेष्ठ नर्तक के समान सुंदर शरीर वाले, कानों में कर्णिकार पुष्प, सुवर्ण के समान पीत वस्त्र और वैजयंती माला धारण किए हुए, अपने अधरामृत से बाँसुरी के छिद्रों को भरते हुए, कृष्ण अपने ही चरण-चिह्नों से सुशोभित वृन्दावन में गोपों के समूह के साथ प्रविष्ट हुए, जो उनकी कीर्ति गा रहे थे।

श्लोक 6 (bhagavata.10.21.6)

इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम् । श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे ॥ 21.6 ॥

iti veṇu-ravaṁ rājan sarva-bhūta-manoharam śrutvā vraja-striyaḥ sarvā varṇayantyo ’bhirebhire

हे राजन्! इस प्रकार समस्त प्राणियों के मन को हरने वाली उस वेणु-ध्वनि को सुनकर, व्रज की सभी स्त्रियाँ उसका वर्णन करती हुई एक-दूसरे का आलिंगन करने लगीं।

श्लोक 7 (bhagavata.10.21.7)

श्रीगोप्य ऊचुः अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननु विवेशयतोर्वयस्यैः । वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनवेणु जुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ॥ 21.7 ॥

śrī-gopya ūcuḥ akṣaṇvatāṁ phalam idaṁ na paraṁ vidāmaḥ sakhyaḥ paśūn anuviveśayator vayasyaiḥ vaktraṁ vrajeśa-sutayor anaveṇu-juṣṭaṁ yair vā nipītam anurakta-kaṭākṣa-mokṣam

गोपियों ने कहा — हे सखियो! हम नेत्रवानों के लिए इससे बढ़कर कोई फल नहीं जानतीं — जब व्रजराज के दोनों पुत्र अपने सखाओं के साथ गौओं को वन में ले जाते हुए, बाँसुरी से सुशोभित अपने मुख से प्रेमपूर्ण चितवन बरसाते हैं, उन्हें निहारने वाले नेत्र ही सार्थक हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.10.21.8)

चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्ज- मालानुपृक्तपरिधानविचित्रवेशौ । मध्ये विरेजतुरलं पशुपालगोष्ठ्यां रङ्गे यथा नटवरौ क्व च गायमानौ ॥ 21.8 ॥

cūta-pravāla-barha-stabakotpalābja mālānupṛkta-paridhāna-vicitra-veśau madhye virejatur alaṁ paśu-pāla-goṣṭhyāṁ raṅge yathā naṭa-varau kvaca gāyamānau

आम की नई कोंपलों, मयूर-पंखों, पुष्प-गुच्छों, कुमुदों और कमलों से गुंथी मालाओं से युक्त विचित्र वस्त्र पहने वे दोनों, गोपों की सभा के मध्य अत्यंत शोभायमान हो रहे थे — मानो रंगमंच पर दो श्रेष्ठ नर्तक हों, जो कभी-कभी गा भी उठते।

श्लोक 9 (bhagavata.10.21.9)

गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणु- र्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम् । भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं ह्रदिन्यो हृष्यत्त्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्याः ॥ 21.9 ॥

gopyaḥ kim ācarad ayaṁ kuśalaṁ sma veṇur dāmodarādhara-sudhām api gopikānām bhuṅkte svayaṁ yad avaśiṣṭa-rasaṁ hradinyo hṛṣyat-tvaco ’śru mumucus taravo yathāryaḥ

हे गोपियो! इस बाँसुरी ने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है कि यह अकेली ही दामोदर के अधरामृत का पान करती है — जो वस्तुतः हमारा अधिकार है — और शेष रस को नदियाँ पी लेती हैं। इसके बांधव बाँस के वृक्ष रोमांचित होकर, मानो हर्ष से, गौरवान्वित वृद्धजनों की भाँति आँसू बहा रहे हैं।

श्लोक 10 (bhagavata.10.21.10)

वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिं यद् देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि । गोविन्दवेणुमनु मत्तमयूरनृत्यं प्रेक्ष्याद्रिसान्ववरतान्यसमस्तसत्त्वम् ॥ 21.10 ॥

vṛndāvanaṁ sakhi bhuvo vitanoti kīrtiṁ yad devakī-suta-padāmbuja-labdha-lakṣmi govinda-veṇum anu matta-mayūra-nṛtyaṁ prekṣyādri-sānv-avaratānya-samasta-sattvam

हे सखी! वृन्दावन पृथ्वी की कीर्ति फैला रहा है, क्योंकि इसने देवकीनन्दन के चरण-कमलों से यह सम्पत्ति प्राप्त की है। पर्वत की चोटियों से गोविन्द की बाँसुरी पर मत्त मयूरों को नाचते देखकर, अन्य समस्त प्राणी निश्चल खड़े रह जाते हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.10.21.11)

धन्याः स्म मूढगतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेशम् । आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः ॥ 21.11 ॥

dhanyāḥ sma mūḍha-gatayo ’pi hariṇya etā yā nanda-nandanam upātta-vicitra-veśam ākarṇya veṇu-raṇitaṁ saha-kṛṣṇa-sārāḥ pūjāṁ dadhur viracitāṁ praṇayāvalokaiḥ

धन्य हैं ये मृग, यद्यपि बुद्धि से मूढ़ हैं, जो हिरणी और कृष्णसार मृग दोनों मिलकर, बाँसुरी की ध्वनि सुनकर, विचित्र वेष धारण किए नन्दनन्दन को प्रेमपूर्ण चितवनों से रचित पूजा अर्पित करते हैं।

श्लोक 12 (bhagavata.10.21.12)

कृष्णं निरीक्ष्य वनितोत्सवरूपशीलं श्रुत्वा च तत्क्वणितवेणुविविक्तगीतम् । देव्यो विमानगतयः स्मरनुन्नसारा भ्रश्यत्प्रसूनकबरा मुमुहुर्विनीव्यः ॥ 21.12 ॥

kṛṣṇaṁ nirīkṣya vanitotsava-rūpa-śīlaṁ śrutvā ca tat-kvaṇita-veṇu-vivikta-gītam devyo vimāna-gatayaḥ smara-nunna-sārā bhraśyat-prasūna-kabarā mumuhur vinīvyaḥ

स्त्रियों के लिए उत्सव-स्वरूप कृष्ण के रूप और शील को देखकर, तथा उनकी झंकृत बाँसुरी के स्पष्ट गीत को सुनकर, विमानों में यात्रा करती देवांगनाएँ काम-वेग से व्याकुल हो मोहित हो जाती हैं — उनके जूड़े से फूल गिर पड़ते हैं और करधनियाँ ढीली हो जाती हैं।

श्लोक 13 (bhagavata.10.21.13)

गावश्च कृष्णमुखनिर्गतवेणुगीत- पीयूषमुत्तभितकर्णपुटैः पिबन्त्यः । शावाः स्नुतस्तनपयःकवलाः स्म तस्थु- र्गोविन्दमात्मनि दृशाश्रुकलाः स्पृशन्त्यः ॥ 21.13 ॥

gāvaś ca kṛṣṇa-mukha-nirgata-veṇu-gīta pīyūṣam uttabhita-karṇa-puṭaiḥ pibantyaḥ śāvāḥ snuta-stana-payaḥ-kavalāḥ sma tasthur govindam ātmani dṛśāśru-kalāḥ spṛśantyaḥ

गौएँ अपने कानों को पात्र-सा उठाकर, कृष्ण के मुख से निकलते वेणु-गीत के अमृत का पान कर रही थीं; बछड़े अपनी माताओं के बहते स्तनों से दूध का ग्रास मुख में लिए ही स्तब्ध खड़े रह गए, अश्रुपूरित नेत्रों से मानो अपने भीतर गोविन्द का स्पर्श कर रहे थे।

श्लोक 14 (bhagavata.10.21.14)

प्रायो बताम्ब विहगा मुनयो वनेऽस्मिन् कृष्णेक्षितं तदुदितं कलवेणुगीतम् । आरुह्य ये द्रुमभुजान् रुचिरप्रवालान् शृण्वन्ति मीलितदृशो विगतान्यवाचः ॥ 21.14 ॥

prāyo batāmba vihagā munayo vane ’smin kṛṣṇekṣitaṁ tad-uditaṁ kala-veṇu-gītam āruhya ye druma-bhujān rucira-pravālān śṛṇvanti mīlita-dṛśo vigatānya-vācaḥ

हे माँ! सम्भवतः इस वन के पक्षी साक्षात् मुनि ही हैं, जो वृक्षों की सुंदर नई डालियों पर चढ़कर, कृष्ण द्वारा देखे जाते हुए, नेत्र बंद किए, उस मधुर उठती हुई वेणु-ध्वनि को सुनते हैं, अन्य किसी शब्द की ओर ध्यान न देते हुए।

श्लोक 15 (bhagavata.10.21.15)

नद्यस्तदा तदुपधार्य मुकुन्दगीत- मावर्तलक्षितमनोभवभग्नवेगाः । आलिङ्गनस्थगितमूर्मिभुजैर्मुरारे- र्गृह्णन्ति पादयुगलं कमलोपहाराः ॥ 21.15 ॥

nadyas tadā tad upadhārya mukunda-gītam āvarta-lakṣita-manobhava-bhagna-vegāḥ āliṅgana-sthagitam ūrmi-bhujair murārer gṛhṇanti pāda-yugalaṁ kamalopahārāḥ

मुकुन्द के उस गीत को सुनकर नदियाँ, अपने मन के भाव को भँवरों से प्रकट करती हुई, अपना प्रवाह-वेग खो बैठती हैं; अपनी लहरों की भुजाओं से मुरारि के दोनों चरणों का आलिंगन कर, वे कमल-पुष्प भेंट करती हैं।

श्लोक 16 (bhagavata.10.21.16)

दृष्ट्वातपे व्रजपशून् सह रामगोपैः सञ्चारयन्तमनु वेणुमुदीरयन्तम् । प्रेमप्रवृद्ध उदितः कुसुमावलीभिः सख्युर्व्यधात् स्ववपुषाम्बुद आतपत्रम् ॥ 21.16 ॥

dṛṣṭvātape vraja-paśūn saha rāma-gopaiḥ sañcārayantam anu veṇum udīrayantam prema-pravṛddha uditaḥ kusumāvalībhiḥ sakhyur vyadhāt sva-vapuṣāmbuda ātapatram

बलराम और गोपों के साथ धूप में व्रज की गौओं को हाँकते हुए, निरंतर बाँसुरी बजाते हुए कृष्ण को देखकर, प्रेम से उमड़ा हुआ मेघ, पुष्प-मालाओं सहित ऊपर उठकर, अपने ही शरीर से अपने सखा के लिए छत्र बना देता है।

श्लोक 17 (bhagavata.10.21.17)

पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जराग- श्रीकुङ्कुमेन दयितास्तनमण्डितेन । तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम् ॥ 21.17 ॥

pūrṇāḥ pulindya urugāya-padābja-rāga śrī-kuṅkumena dayitā-stana-maṇḍitena tad-darśana-smara-rujas tṛṇa-rūṣitena limpantya ānana-kuceṣu jahus tad-ādhim

वन में रहने वाली पुलिन्द स्त्रियाँ, जिन्हें कृष्ण के दर्शन से काम-पीड़ा उत्पन्न हुई थी, उनके प्रिय गोपियों के वक्षस्थलों को अलंकृत करने वाले तथा उनके सर्वप्रशंसित चरण-कमलों की-सी लालिमा लिए हुए कुंकुम से रँगी घास को अपने मुख और वक्ष पर मलकर, तृप्त हो जाती हैं और अपनी पीड़ा त्याग देती हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.10.21.18)

हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो यद् रामकृष्णचरणस्परशप्रमोदः । मानं तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यत् पानीयसूयवसकन्दरकन्दमूलैः ॥ 21.18 ॥

hantāyam adrir abalā hari-dāsa-varyo yad rāma-kṛṣṇa-caraṇa-sparaśa-pramodaḥ mānaṁ tanoti saha-go-gaṇayos tayor yat pānīya-sūyavasa-kandara-kandamūlaiḥ

हे सखी! देखो, यह पर्वत हरि का श्रेष्ठतम सेवक है, क्योंकि यह राम और कृष्ण के चरण-स्पर्श से आनंदित होकर, उनकी गौओं के समूह सहित, जल, कोमल तृण, गुफाओं और कंदमूलों से उनका सम्मान करता है।

श्लोक 19 (bhagavata.10.21.19)

गा गोपकैरनुवनं नयतोरुदार- वेणुस्वनैः कलपदैस्तनुभृत्सु सख्यः । अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरुणां निर्योगपाशकृतलक्षणयोर्विचित्रम् ॥ 21.19 ॥

gā gopakair anu-vanaṁ nayator udāra veṇu-svanaiḥ kala-padais tanu-bhṛtsu sakhyaḥ aspandanaṁ gati-matāṁ pulakas taruṇāṁ niryoga-pāśa-kṛta-lakṣaṇayor vicitram

गोपों के साथ गौओं को वन में ले जाते हुए, कमर में दुहने की रस्सियाँ बाँधे, बाँसुरी के मधुर, उदार स्वर जब चराचर प्राणियों पर पड़ते हैं, तो हे सखियो, चलने वाले प्राणी स्तब्ध हो जाते हैं और अचल वृक्ष भी रोमांचित हो उठते हैं — यह कैसा विचित्र दृश्य है!

श्लोक 20 (bhagavata.10.21.20)

एवंविधा भगवतो या वृन्दावनचारिणः । वर्णयन्त्यो मिथो गोप्यः क्रीडास्तन्मयतां ययुः ॥ 21.20 ॥

evaṁ-vidhā bhagavato yā vṛndāvana-cāriṇaḥ varṇayantyo mitho gopyaḥ krīḍās tan-mayatāṁ yayuḥ

इस प्रकार वृन्दावन में विचरण करने वाले भगवान की ऐसी लीलाओं का परस्पर वर्णन करती हुई गोपियाँ उन्हीं में तन्मय हो गईं।

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