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दशम स्कन्ध · अध्याय 22

कृष्ण द्वारा अविवाहित गोपियों के वस्त्रों का हरण

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (bhagavata.10.22.1)

श्रीशुक उवाच हेमन्ते प्रथमे मासि नन्दव्रजकुमारिकाः । चेरुर्हविष्यं भुञ्जानाः कात्यायन्यर्चनव्रतम् ॥ 22.1 ॥

śrī-śuka uvāca hemante prathame māsi nanda-vraja-kumārikāḥ cerur haviṣyaṁ bhuñjānāḥ kātyāyany-arcana-vratam

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — हेमन्त ऋतु के प्रथम मास में, नन्द के व्रज की अविवाहित कन्याओं ने केवल हविष्य अन्न ग्रहण करते हुए कात्यायनी देवी की अर्चना का व्रत आरम्भ किया।

श्लोक 2 (bhagavata.10.22.2)

आप्लुत्याम्भसि कालिन्द्या जलान्ते चोदितेऽरुणे । कृत्वा प्रतिकृतिं देवीमानर्चुर्नृप सैकतीम्

āplutyāmbhasi kālindyā jalānte codite ’ruṇe kṛtvā pratikṛtiṁ devīm ānarcur nṛpa saikatīm

हे राजन्! कालिन्दी के जल में स्नान कर, अरुणोदय के समय नदी-तट पर बालू से देवी की मूर्ति बनाकर, वे उसकी पूजा करती थीं।

श्लोक 3 (bhagavata.10.22.3)

गन्धैर्माल्यैः सुरभिभिर्बलिभिर्धूपदीपकैः । उच्चावचैश्चोपहारैः प्रवालफलतण्डुलैः

gandhair mālyaiḥ surabhibhir balibhir dhūpa-dīpakaiḥ uccāvacaiś copahāraiḥ pravāla-phala-taṇḍulaiḥ

वे देवी की पूजा सुगंधित द्रव्यों, मालाओं और सुरभित बलियों से, तथा धूप-दीप एवं नाना प्रकार के उपहारों — नवीन अंकुर, फल और तंडुल — से करती थीं।

श्लोक 4 (bhagavata.10.22.4)

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि । नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः । इति मन्त्रं जपन्त्यस्ताः पूजां चक्रुः कुमारिकाः ॥ 22.4 ॥

kātyāyani mahā-māye mahā-yoginy adhīśvari nanda-gopa-sutaṁ devi patiṁ me kuru te namaḥ iti mantraṁ japantyas tāḥ pūjāṁ cakruḥ kumārikāḥ

'हे कात्यायनी! हे महामाया! हे महायोगिनी! हे अधीश्वरी देवी! नन्दगोप के पुत्र को मेरा पति बनाओ। आपको नमस्कार है।' — इस मंत्र का जप करती हुई वे कन्याएँ पूजा करती थीं।

श्लोक 5 (bhagavata.10.22.5)

एवं मासं व्रतं चेरुः कुमार्यः कृष्णचेतसः । भद्रकालीं समानर्चुर्भूयान्नन्दसुतः पतिः ॥ 22.5 ॥

evaṁ māsaṁ vrataṁ ceruḥ kumāryaḥ kṛṣṇa-cetasaḥ bhadrakālīṁ samānarcur bhūyān nanda-sutaḥ patiḥ

इस प्रकार एक मास तक वे कुमारियाँ, कृष्ण में मन लगाए, यह व्रत करती रहीं और भद्रकाली की अर्चना करती रहीं — 'नन्दपुत्र ही मेरे पति हों' यही भावना लिए हुए।

श्लोक 6 (bhagavata.10.22.6)

ऊषस्युत्थाय गोत्रैः स्वैरन्योन्याबद्धबाहवः । कृष्णमुच्चैर्जगुर्यान्त्यः कालिन्द्यां स्नातुमन्वहम् ॥ 22.6 ॥

ūṣasy utthāya gotraiḥ svair anyonyābaddha-bāhavaḥ kṛṣṇam uccair jagur yāntyaḥ kālindyāṁ snātum anvaham

प्रतिदिन ऊषाकाल में उठकर, एक-दूसरे को अपने-अपने कुल के नाम से पुकारती, बाँहों में बाँहें डाले, वे उच्च स्वर में कृष्ण का गुणगान करती हुई कालिन्दी में स्नान करने जाती थीं।

श्लोक 7 (bhagavata.10.22.7)

नद्याः कदाचिदागत्य तीरे निक्षिप्य पूर्ववत् । वासांसि कृष्णं गायन्त्यो विजह्रुः सलिले मुदा ॥ 22.7 ॥

nadyāḥ kadācid āgatya tīre nikṣipya pūrva-vat vāsāṁsi kṛṣṇaṁ gāyantyo vijahruḥ salile mudā

एक दिन नदी-तट पर आकर, पहले की भाँति अपने वस्त्र उतार कर रख, कृष्ण का गान करती हुई वे हर्षपूर्वक जल में क्रीड़ा करने लगीं।

श्लोक 8 (bhagavata.10.22.8)

भगवांस्तदभिप्रेत्य कृष्णो योगेश्वरेश्वरः । वयस्यैरावृतस्तत्र गतस्तत्कर्मसिद्धये ॥ 22.8 ॥

bhagavāṁs tad abhipretya kṛṣno yogeśvareśvaraḥ vayasyair āvṛtas tatra gatas tat-karma-siddhaye

योगेश्वरों के भी ईश्वर भगवान कृष्ण यह जानकर, अपने सखाओं के साथ वहाँ गए, ताकि उनके व्रत की सिद्धि हो सके।

श्लोक 9 (bhagavata.10.22.9)

तासां वासांस्युपादाय नीपमारुह्य सत्वरः । हसद्भिः प्रहसन् बालैः परिहासमुवाच ह ॥ 22.9 ॥

tāsāṁ vāsāṁsy upādāya nīpam āruhya satvaraḥ hasadbhiḥ prahasan bālaiḥ parihāsam uvāca ha

उनके वस्त्र उठाकर, शीघ्रता से कदम्ब वृक्ष पर चढ़कर, हँसते हुए बालकों के साथ हँसते हुए, उन्होंने परिहासपूर्वक कहा।

श्लोक 10 (bhagavata.10.22.10)

अत्रागत्याबलाः कामं स्वं स्वं वासः प्रगृह्यताम् । सत्यं ब्रुवाणि नो नर्म यद् यूयं व्रतकर्शिताः ॥ 22.10 ॥

atrāgatyābalāḥ kāmaṁ svaṁ svaṁ vāsaḥ pragṛhyatām satyaṁ bravāṇi no narma yad yūyaṁ vrata-karśitāḥ

कृष्ण ने कहा — हे अबलाओ! जो चाहे यहाँ आकर अपना-अपना वस्त्र ले ले। मैं सत्य कह रहा हूँ, हँसी नहीं कर रहा, क्योंकि व्रत से तुम सब क्षीण हो गई हो।

श्लोक 11 (bhagavata.10.22.11)

न मयोदितपूर्वं वा अनृतं तदिमे विदुः । एकैकशः प्रतीच्छध्वं सहैवेति सुमध्यमाः ॥ 22.11 ॥

na mayodita-pūrvaṁ vā anṛtaṁ tad ime viduḥ ekaikaśaḥ pratīcchadhvaṁ sahaiveti su-madhyamāḥ

मैंने पहले कभी असत्य नहीं बोला — यह ये सब जानते हैं। हे सुमध्यमाओ! चाहे एक-एक कर आओ या सब मिलकर, अपने वस्त्र ले लो।

श्लोक 12 (bhagavata.10.22.12)

तस्य तत् क्ष्वेलितं दृष्ट्वा गोप्यः प्रेमपरिप्लुताः । व्रीडिताः प्रेक्ष्य चान्योन्यं जातहासा न निर्ययुः ॥ 22.12 ॥

tasya tat kṣvelitaṁ dṛṣṭvā gopyaḥ prema-pariplutāḥ vrīḍitāḥ prekṣya cānyonyaṁ jāta-hāsā na niryayuḥ

उनकी उस चंचल क्रीड़ा को देखकर, प्रेम में डूबी गोपियाँ लज्जित हो गईं; एक-दूसरे की ओर देखकर हँस पड़ीं, फिर भी जल से बाहर न निकलीं।

श्लोक 13 (bhagavata.10.22.13)

एवं ब्रुवति गोविन्दे नर्मणाक्षिप्तचेतसः । आकण्ठमग्नाः शीतोदे वेपमानास्तमब्रुवन् ॥ 22.13 ॥

evaṁ bruvati govinde narmaṇākṣipta-cetasaḥ ā-kaṇṭha-magnāḥ śītode vepamānās tam abruvan

गोविन्द के इस प्रकार कहने पर, उनके परिहास से मन को बंधी हुई गोपियाँ, ठंडे जल में गले तक डूबी काँपती हुई, उनसे बोलीं।

श्लोक 14 (bhagavata.10.22.14)

मानयं भोः कृथास्त्वां तु नन्दगोपसुतं प्रियम् । जानीमोऽङ्ग व्रजश्लाघ्यं देहि वासांसि वेपिताः ॥ 22.14 ॥

mānayaṁ bhoḥ kṛthās tvāṁ tu nanda-gopa-sutaṁ priyam jānīmo ’ṅga vraja-ślāghyaṁ dehi vāsāṁsi vepitāḥ

'हमारे साथ ऐसा मत करो! हे प्रिय, हम जानती हैं कि तुम नन्दगोप के पुत्र हो, जो सारे व्रज में प्रशंसित हो। हमें वस्त्र दे दो, हम काँप रही हैं।'

श्लोक 15 (bhagavata.10.22.15)

श्यामसुन्दर ते दास्यः करवाम तवोदितम् । देहि वासांसि धर्मज्ञ नो चेद् राज्ञे ब्रुवाम हे ॥ 22.15 ॥

śyāmasundara te dāsyaḥ karavāma tavoditam dehi vāsāṁsi dharma-jña no ced rājñe bruvāma he

'हे श्यामसुन्दर! हम तुम्हारी दासियाँ हैं, तुम जो कहोगे वही करेंगी। परन्तु हे धर्मज्ञ, हमें वस्त्र दे दो, अन्यथा हम राजा से शिकायत करेंगी।'

श्लोक 16 (bhagavata.10.22.16)

श्रीभगवानुवाच भवत्यो यदि मे दास्यो मयोक्तं वा करिष्यथ । अत्रागत्य स्ववासांसि प्रतीच्छत शुचिस्मिताः । नो चेन्नाहं प्रदास्ये किं क्रुद्धो राजा करिष्यति ॥ 22.16 ॥

śrī-bhagavān uvāca bhavatyo yadi me dāsyo mayoktaṁ vā kariṣyatha atrāgatya sva-vāsāṁsi pratīcchata śuci-smitāḥ no cen nāhaṁ pradāsye kiṁ kruddho rājā kariṣyati

भगवान ने कहा — यदि तुम सचमुच मेरी दासियाँ हो और मेरी बात मानोगी, तो यहाँ आकर, हे निर्मल-हास्य वाली, अपने-अपने वस्त्र ले लो। यदि नहीं, तो मैं नहीं दूँगा — क्रुद्ध राजा भला क्या कर लेगा?

श्लोक 17 (bhagavata.10.22.17)

ततो जलाशयात् सर्वा दारिकाः शीतवेपिताः । पाणिभ्यां योनिमाच्छाद्य प्रोत्तेरुः शीतकर्शिताः ॥ 22.17 ॥

tato jalāśayāt sarvā dārikāḥ śīta-vepitāḥ pāṇibhyāṁ yonim ācchādya protteruḥ śīta-karśitāḥ

तब शीत से काँपती और शीत से क्षीण हुई वे सभी बालिकाएँ, अपने हाथों से अपने गुह्य अंगों को ढककर, जल से बाहर निकल आईं।

श्लोक 18 (bhagavata.10.22.18)

भगवानाहता वीक्ष्य शुद्धभावप्रसादितः । स्कन्धे निधाय वासांसि प्रीतः प्रोवाच सस्मितम् ॥ 22.18 ॥

bhagavān āhatā vīkṣya śuddha-bhāva-prasāditaḥ skandhe nidhāya vāsāṁsi prītaḥ provāca sa-smitam

उन्हें इस प्रकार लज्जित देखकर, उनके शुद्ध भाव से प्रसन्न होकर, भगवान ने उनके वस्त्र अपने कंधे पर रखकर, प्रेमपूर्वक मुस्कुराते हुए कहा।

श्लोक 19 (bhagavata.10.22.19)

यूयं विवस्त्रा यदपो धृतव्रता व्यगाहतैतत्तदु देवहेलनम् । बद्ध्वाञ्जलिं मूध्र्न्यपनुत्तयेऽहसः कृत्वा नमोऽधोवसनं प्रगृह्यताम् ॥ 22.19 ॥

yūyaṁ vivastrā yad apo dhṛta-vratā vyagāhataitat tad u deva-helanam baddhvāñjaliṁ mūrdhny apanuttaye ’ṁhasaḥ kṛtvā namo ’dho-vasanaṁ pragṛhyatām

'तुमने व्रत का पालन करते हुए भी नग्न होकर जल में प्रवेश किया — यह देवताओं का अपमान ही था। उस दोष को दूर करने के लिए सिर के ऊपर हाथ जोड़कर प्रणाम करो, फिर अपने वस्त्र ग्रहण करो।'

श्लोक 20 (bhagavata.10.22.20)

इत्यच्युतेनाभिहितं व्रजाबला मत्वा विवस्त्राप्लवनं व्रतच्युतिम् । तत्पूर्तिकामास्तदशेषकर्मणां साक्षात्कृतं नेमुरवद्यमृग् यतः ॥ 22.20 ॥

ity acyutenābhihitaṁ vrajābalā matvā vivastrāplavanaṁ vrata-cyutim tat-pūrti-kāmās tad-aśeṣa-karmaṇāṁ sākṣāt-kṛtaṁ nemur avadya-mṛg yataḥ

अच्युत के इस कथन को सुनकर, व्रज की स्त्रियाँ यह समझ गईं कि नग्न होकर स्नान करना व्रत-भंग ही था। अपने व्रत की पूर्ति चाहती हुई वे उन्हें प्रणाम करने लगीं, जो समस्त सत्कर्मों के साक्षात् फल और समस्त दोषों को हरने वाले हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.10.22.21)

तास्तथावनता दृष्ट्वा भगवान् देवकीसुतः । वासांसि ताभ्यः प्रायच्छत्करुणस्तेन तोषितः ॥ 22.21 ॥

tās tathāvanatā dṛṣṭvā bhagavān devakī-sutaḥ vāsāṁsi tābhyaḥ prāyacchat karuṇas tena toṣitaḥ

उन्हें इस प्रकार झुका हुआ देखकर, देवकीनन्दन भगवान, करुणा से द्रवित और उनके इस भाव से प्रसन्न होकर, उन्हें उनके वस्त्र लौटा दिए।

श्लोक 22 (bhagavata.10.22.22)

दृढं प्रलब्धास्त्रपया च हापिताः प्रस्तोभिताः क्रीडनवच्च कारिताः । वस्त्राणि चैवापहृतान्यथाप्यमुं ता नाभ्यसूयन् प्रियसङ्गनिर्वृताः ॥ 22.22 ॥

dṛḍhaṁ pralabdhās trapayā ca hāpitāḥ prastobhitāḥ krīḍana-vac ca kāritāḥ vastrāṇi caivāpahṛtāny athāpy amuṁ tā nābhyasūyan priya-saṅga-nirvṛtāḥ

यद्यपि वे भलीभाँति ठगी गईं, लज्जा से वंचित की गईं, उपहास की गई और खिलौने की भाँति नचाई गईं, और उनके वस्त्र भी छीन लिए गए — फिर भी वे उनसे रुष्ट नहीं हुईं, क्योंकि वे अपने प्रियतम के संग से ही संतुष्ट थीं।

श्लोक 23 (bhagavata.10.22.23)

परिधाय स्ववासांसि प्रेष्ठसङ्गमसज्जिताः । गृहीतचित्ता नो चेलुस्तस्मिन्लज्जायितेक्षणाः ॥ 22.23 ॥

paridhāya sva-vāsāṁsi preṣṭha-saṅgama-sajjitāḥ gṛhīta-cittā no celus tasmin lajjāyitekṣaṇāḥ

अपने वस्त्र पहनकर, अपने प्रियतम के मिलन के आनंद में मग्न, चित्त हरी हुई वे वहाँ से न हिलीं, उनकी आँखें लज्जा से झुकी हुई थीं।

श्लोक 24 (bhagavata.10.22.24)

तासां विज्ञाय भगवान् स्वपादस्पर्शकाम्यया । धृतव्रतानां सङ्कल्पमाह दामोदरोऽबलाः ॥ 22.24 ॥

tāsāṁ vijñāya bhagavān sva-pāda-sparśa-kāmyayā dhṛta-vratānāṁ saṅkalpam āha dāmodaro ’balāḥ

उन व्रतधारिणी स्त्रियों का यह संकल्प — उनके चरण-स्पर्श की कामना — जानकर, दामोदर ने उन अबलाओं से कहा।

श्लोक 25 (bhagavata.10.22.25)

सङ्कल्पो विदितः साध्व्यो भवतीनां मदर्चनम् । मयानुमोदितः सोऽसौ सत्यो भवितुमर्हति ॥ 22.25 ॥

saṅkalpo viditaḥ sādhvyo bhavatīnāṁ mad-arcanam mayānumoditaḥ so ’sau satyo bhavitum arhati

'हे साध्वियो! मैं तुम्हारा संकल्प जानता हूँ — वह मेरी ही अर्चना थी। मेरे द्वारा अनुमोदित वह संकल्प सत्य होने योग्य है।'

श्लोक 26 (bhagavata.10.22.26)

न मय्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते । भर्जिता क्वथिता धानाः प्रायो बीजाय नेशते ॥ 22.26 ॥

na mayy āveśita-dhiyāṁ kāmaḥ kāmāya kalpate bharjitā kvathitā dhānāḥ prāyo bījāya neśate

'जिनका मन मुझमें लगा है, उनकी कामना पुनः कामना को जन्म नहीं देती — जैसे भुने और उबले हुए अन्न-कण प्रायः बीज बनने योग्य नहीं रहते।'

श्लोक 27 (bhagavata.10.22.27)

याताबला व्रजं सिद्धा मयेमा रंस्यथा क्षपाः । यदुद्दिश्य व्रतमिदं चेरुरार्यार्चनं सतीः ॥ 22.27 ॥

yātābalā vrajaṁ siddhā mayemā raṁsyathā kṣapāḥ yad uddiśya vratam idaṁ cerur āryārcanaṁ satīḥ

'अब जाओ, व्रज को लौट जाओ, तुम्हारा प्रयोजन सिद्ध हो गया। मेरे साथ तुम इन रात्रियों का आनंद लोगी — जिसके लिए, हे सतियो, तुमने यह व्रत और देवी की अर्चना की थी।'

श्लोक 28 (bhagavata.10.22.28)

श्रीशुक उवाच इत्यादिष्टा भगवता लब्धकामाः कुमारिकाः । ध्यायन्त्यस्तत्पदाम्भोजं कृच्छ्रान्निर्विविशुर्व्रजम् ॥ 22.28 ॥

śrī-śuka uvāca ity ādiṣṭā bhagavatā labdha-kāmāḥ kumārikāḥ dhyāyantyas tat-padāmbhojam kṛcchrān nirviviśur vrajam

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — भगवान से इस प्रकार आदेश पाकर, कामना पूर्ण हुई वे कन्याएँ, उनके चरण-कमलों का ध्यान करती हुईं, बड़ी कठिनाई से व्रज में लौटीं।

श्लोक 29 (bhagavata.10.22.29)

अथ गोपैः परिवृतो भगवान् देवकीसुतः । वृन्दावनाद्गतो दूरं चारयन् गाः सहाग्रजः ॥ 22.29 ॥

atha gopaiḥ parivṛto bhagavān devakī-sutaḥ vṛndāvanād gato dūraṁ cārayan gāḥ sahāgrajaḥ

तत्पश्चात् गोपों से घिरे हुए, अपने अग्रज (बलराम) सहित, देवकीनन्दन भगवान गौओं को चराते हुए वृन्दावन से दूर चले गए।

श्लोक 30 (bhagavata.10.22.30)

निदघार्कातपे तिग्मे छायाभिः स्वाभिरात्मनः । आतपत्रायितान् वीक्ष्य द्रुमानाह व्रजौकसः ॥ 22.30 ॥

nidaghārkātape tigme chāyābhiḥ svābhir ātmanaḥ ātapatrāyitān vīkṣya drumān āha vrajaukasaḥ

ग्रीष्म ऋतु की प्रचंड धूप में, वृक्षों को अपनी ही छाया से मानो छत्र बनाए हुए देखकर, उन्होंने व्रज के अपने सखाओं से कहा।

श्लोक 31 (bhagavata.10.22.31)

हे स्तोककृष्ण हे अंशो श्रीदामन् सुबलार्जुन । विशाल वृषभौजस्विन् देवप्रस्थ वरूथप

he stoka-kṛṣṇa he aṁśo śrīdāman subalārjuna viśāla vṛṣabhaujasvin devaprastha varūthapa

'हे स्तोक-कृष्ण, हे अंशु, श्रीदामा, सुबल, अर्जुन, हे विशाल, वृषभ, ओजस्वी, देवप्रस्थ और वरूथप —

श्लोक 32 (bhagavata.10.22.32)

पश्यतैतान् महाभागान् परार्थैकान्तजीवितान् । वातवर्षातपहिमान् सहन्तो वारयन्ति नः

paśyataitān mahā-bhāgān parārthaikānta-jīvitān vāta-varṣātapa-himān sahanto vārayanti naḥ

— इन महाभाग्यशाली वृक्षों को देखो, जिनका जीवन केवल दूसरों के हित के लिए है; ये स्वयं वायु, वर्षा, धूप और शीत सहन करते हुए हमें उनसे बचाते हैं।'

श्लोक 33 (bhagavata.10.22.33)

अहो एषां वरं जन्म सर्वप्राण्युपजीवनम् । सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ 22.33 ॥

aho eṣāṁ varaṁ janma sarva-prāṇy-upajīvanam su-janasyeva yeṣāṁ vai vimukhā yānti nārthinaḥ

'अहो! इनका जन्म धन्य है, जो समस्त प्राणियों का जीवन-निर्वाह करते हैं — सज्जन पुरुष के समान, जिनसे माँगने वाला कोई भी निराश होकर नहीं लौटता।'

श्लोक 34 (bhagavata.10.22.34)

पत्रपुष्पफलच्छायामूलवल्कलदारुभिः । गन्धनिर्यासभस्मास्थितोक्मैः कामान्वितन्वते ॥ 22.34 ॥

patra-puṣpa-phala-cchāyā- mūla-valkala-dārubhiḥ gandha-niryāsa-bhasmāsthi- tokmaiḥ kāmān vitanvate

'अपने पत्तों, फूलों, फलों, छाया, जड़ों, छाल और लकड़ी से, तथा अपनी सुगंध, रस, भस्म, गुठली और अंकुरों से, ये सबकी कामनाएँ पूर्ण करते हैं।'

श्लोक 35 (bhagavata.10.22.35)

एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु । प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेयआचरणं सदा ॥ 22.35 ॥

etāvaj janma-sāphalyaṁ dehinām iha dehiṣu prāṇair arthair dhiyā vācā śreya-ācaraṇaṁ sadā

'देहधारियों के इस लोक में जन्म की यही सार्थकता है — अपने प्राणों, धन, बुद्धि और वाणी से सदा दूसरे प्राणियों के कल्याण का आचरण करना।'

श्लोक 36 (bhagavata.10.22.36)

इति प्रवालस्तबकफलपुष्पदलोत्करैः । तरूणां नम्रशाखानां मध्यतो यमुनां गतः ॥ 22.36 ॥

iti pravāla-stabaka- phala-puṣpa-dalotkaraiḥ tarūṇāṁ namra-śākhānāṁ madhyato yamunāṁ gataḥ

यह कहते हुए, वे नई कोंपलों, फलों, फूलों और पत्तों के भार से झुकी हुई डालियों वाले वृक्षों के बीच से होकर यमुना की ओर गए।

श्लोक 37 (bhagavata.10.22.37)

तत्र गाः पाययित्वापः सुमृष्टाः शीतलाः शिवाः । ततो नृप स्वयं गोपाः कामं स्वादु पपुर्जलम् ॥ 22.37 ॥

tatra gāḥ pāyayitvāpaḥ su-mṛṣṭāḥ śītalāḥ śivāḥ tato nṛpa svayaṁ gopāḥ kāmaṁ svādu papur jalam

वहाँ गौओं को स्वच्छ, शीतल और कल्याणकारी जल पिलाकर, तत्पश्चात् हे राजन्, गोपों ने स्वयं भी उस मीठे जल को यथेच्छ पिया।

श्लोक 38 (bhagavata.10.22.38)

तस्या उपवने कामं चारयन्तः पशून् नृप । कृष्णरामावुपागम्य क्षुधार्ता इदमब्रुवन् ॥ 22.38 ॥

tasyā upavane kāmaṁ cārayantaḥ paśūn nṛpa kṛṣṇa-rāmāv upāgamya kṣudh-ārtā idam abravan

उसके तट पर स्थित उपवन में यथेच्छ पशु चराते हुए, हे राजन्, भूख से पीड़ित गोप कृष्ण और बलराम के पास जाकर यह कहने लगे।

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