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दशम स्कन्ध · अध्याय 23

यज्ञकर्ता ब्राह्मणों की पत्नियों का अनुग्रह

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (bhagavata.10.23.1)

श्रीगोपा ऊचुः राम राम महाबाहो कृष्ण दुष्टनिबर्हण । एषा वै बाधते क्षुन्नस्तच्छान्तिं कर्तुमर्हथः ॥ 23.1 ॥

śrī-gopa ūcuḥ rāma rāma mahā-bāho kṛṣṇa duṣṭa-nibarhaṇa eṣā vai bādhate kṣun nas tac-chāntiṁ kartum arhathaḥ

गोपों ने कहा — हे राम राम, हे महाबाहु! हे दुष्टों का दमन करने वाले कृष्ण! यह भूख हमें सता रही है, आप इसे शांत करें।

श्लोक 2 (bhagavata.10.23.2)

श्रीशुक उवाच इति विज्ञापितो गोपैर्भगवान् देवकीसुतः । भक्ताया विप्रभार्यायाः प्रसीदन्निदमब्रवीत् ॥ 23.2 ॥

śrī-śuka uvāca iti vijñāpito gopair bhagavān devakī-sutaḥ bhaktāyā vipra-bhāryāyāḥ prasīdann idam abravīt

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — गोपों द्वारा इस प्रकार निवेदन किए जाने पर, देवकीनन्दन भगवान, ब्राह्मणों की भक्त पत्नियों को कृपा दिखाने की इच्छा से, यह बोले।

श्लोक 3 (bhagavata.10.23.3)

प्रयात देवयजनं ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः । सत्रमाङ्गिरसं नाम ह्यासते स्वर्गकाम्यया ॥ 23.3 ॥

prayāta deva-yajanaṁ brāhmaṇā brahma-vādinaḥ satram āṅgirasaṁ nāma hy āsate svarga-kāmyayā

'यज्ञ-स्थल को जाओ, जहाँ वेदवादी ब्राह्मण स्वर्ग की कामना से आंगिरस नामक यज्ञ कर रहे हैं।'

श्लोक 4 (bhagavata.10.23.4)

तत्र गत्वौदनं गोपा याचतास्मद्विसर्जिताः । कीर्तयन्तो भगवत आर्यस्य मम चाभिधाम् ॥ 23.4 ॥

tatra gatvaudanaṁ gopā yācatāsmad-visarjitāḥ kīrtayanto bhagavata āryasya mama cābhidhām

'वहाँ जाकर, हे गोपो, हमारे द्वारा भेजे जाने की बात कहकर, आर्य बलराम और मेरा नाम लेकर अन्न माँगो।'

श्लोक 5 (bhagavata.10.23.5)

इत्यादिष्टा भगवता गत्वायाचन्त ते तथा । कृताञ्जलिपुटा विप्रान्दण्डवत्पतिता भुवि ॥ 23.5 ॥

ity ādiṣṭā bhagavatā gatvā yācanta te tathā kṛtāñjali-puṭā viprān daṇḍa-vat patitā bhuvi

भगवान से इस प्रकार आदेश पाकर, वे गोप वहाँ जाकर उसी प्रकार माँगने लगे — हाथ जोड़कर और भूमि पर दंडवत गिरकर ब्राह्मणों से याचना करते हुए।

श्लोक 6 (bhagavata.10.23.6)

हे भूमिदेवाः शृणुत कृष्णस्यादेशकारिणः । प्राप्ताञ्जानीत भद्रं वो गोपान्नो रामचोदितान् ॥ 23.6 ॥

he bhūmi-devāḥ śṛṇuta kṛṣṇasyādeśa-kāriṇaḥ prāptāñ jānīta bhadraṁ vo gopān no rāma-coditān

'हे भूदेवो! सुनिए। जानिए कि हम गोप, कृष्ण की आज्ञा का पालन करते हुए और राम द्वारा भेजे गए, यहाँ आए हैं — आपका कल्याण हो।'

श्लोक 7 (bhagavata.10.23.7)

गाश्चारयन्तावविदूर ओदनं रामाच्युतौ वो लषतो बुभुक्षितौ । तयोर्द्विजा ओदनमर्थिनोर्यदि श्रद्धा च वो यच्छत धर्मवित्तमाः ॥ 23.7 ॥

gāś cārayantāv avidūra odanaṁ rāmācyutau vo laṣato bubhukṣitau tayor dvijā odanam arthinor yadi śraddhā ca vo yacchata dharma-vittamāḥ

'यहाँ से थोड़ी दूर पर गौएँ चराते हुए राम और अच्युत भूखे हैं और आपके अन्न की इच्छा रखते हैं। हे द्विजो! हे धर्म के परम ज्ञाताओ! यदि आपमें श्रद्धा हो, तो अन्न की याचना करने वाले उन दोनों को अन्न प्रदान करें।'

श्लोक 8 (bhagavata.10.23.8)

दीक्षायाः पशुसंस्थायाः सौत्रामण्याश्च सत्तमाः । अन्यत्र दीक्षितस्यापि नान्नमश्नन् हि दुष्यति ॥ 23.8 ॥

dīkṣāyāḥ paśu-saṁsthāyāḥ sautrāmaṇyāś ca sattamāḥ anyatra dīkṣitasyāpi nānnam aśnan hi duṣyati

'हे सत्तमो! दीक्षा से लेकर पशु-यज्ञ तक की अवधि तथा सौत्रामणि यज्ञ को छोड़कर, अन्यत्र दीक्षित व्यक्ति के लिए भी अन्न ग्रहण करना दोषपूर्ण नहीं है।'

श्लोक 9 (bhagavata.10.23.9)

इति ते भगवद्याच्ञां शृण्वन्तोऽपि न शुश्रुवुः । क्षुद्राशा भूरिकर्माणो बालिशा वृद्धमानिनः ॥ 23.9 ॥

iti te bhagavad-yācñāṁ śṛṇvanto ’pi na śuśruvuḥ kṣudrāśā bhūri-karmāṇo bāliśā vṛddha-māninaḥ

इस प्रकार भगवान की याचना को सुनते हुए भी उन्होंने वस्तुतः नहीं सुनी — वे क्षुद्र कामनाओं वाले, अनेक कर्मकांडों में उलझे हुए, बालिश होते हुए भी स्वयं को वृद्ध-ज्ञानी मानने वाले थे।

श्लोक 10 (bhagavata.10.23.10)

देशः कालः पृथग्द्रव्यं मन्त्रतन्त्रर्त्विजोऽग्नयः । देवता यजमानश्च क्रतुर्धर्मश्च यन्मयः

deśaḥ kālaḥ pṛthag dravyaṁ mantra-tantrartvijo ’gnayaḥ devatā yajamānaś ca kratur dharmaś ca yan-mayaḥ

यज्ञ का स्थान और काल, उसकी विविध सामग्री, मंत्र और विधियाँ, पुरोहित और अग्नियाँ, देवता, यजमान, यज्ञ स्वयं और धर्म — ये सब उन्हीं के स्वरूप हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.10.23.11)

तं ब्रह्म परमं साक्षाद् भगवन्तमधोक्षजम् । मनुष्यदृष्ट्या दुष्प्रज्ञा मर्त्यात्मानो न मेनिरे

taṁ brahma paramaṁ sākṣād bhagavantam adhokṣajam manuṣya-dṛṣṭyā duṣprajñā martyātmāno na menire

फिर भी उन्हें — साक्षात् परब्रह्म, इंद्रियातीत भगवान — उन दुर्बुद्धि ब्राह्मणों ने, जो अपने को नश्वर देह ही मानते थे, मनुष्य-दृष्टि से देखकर नहीं पहचाना।

श्लोक 12 (bhagavata.10.23.12)

न ते यदोमिति प्रोचुर्न नेति च परन्तप । गोपा निराशाः प्रत्येत्य तथोचुः कृष्णरामयोः ॥ 23.12 ॥

na te yad om iti procur na neti ca parantapa gopā nirāśāḥ pratyetya tathocuḥ kṛṣṇa-rāmayoḥ

हे परन्तप! चूँकि उन्होंने न तो 'हाँ' कहा और न 'नहीं', गोप निराश होकर लौट आए और कृष्ण-राम से यह कह सुनाया।

श्लोक 13 (bhagavata.10.23.13)

तदुपाकर्ण्य भगवान् प्रहस्य जगदीश्वरः । व्याजहार पुनर्गोपान् दर्शयन्लौकिकीं गतिम् ॥ 23.13 ॥

tad upākarṇya bhagavān prahasya jagad-īśvaraḥ vyājahāra punar gopān darśayan laukikīṁ gatim

यह सुनकर, जगदीश्वर भगवान हँस पड़े, और लौकिक व्यवहार दिखाते हुए पुनः गोपों से बोले।

श्लोक 14 (bhagavata.10.23.14)

मां ज्ञापयत पत्नीभ्यः ससङ्कर्षणमागतम् । दास्यन्ति काममन्नं वः स्निग्धा मय्युषिता धिया ॥ 23.14 ॥

māṁ jñāpayata patnībhyaḥ sa-saṅkarṣaṇam āgatam dāsyanti kāmam annaṁ vaḥ snigdhā mayy uṣitā dhiyā

'ब्राह्मणों की पत्नियों को बताओ कि मैं संकर्षण सहित यहाँ आया हूँ। वे मुझसे स्नेह रखने वाली और मन से मुझमें बसी हुई हैं, वे तुम्हें इच्छानुसार अन्न देंगी।'

श्लोक 15 (bhagavata.10.23.15)

गत्वाथ पत्नीशालायां दृष्ट्वासीनाः स्वलङ्कृताः । नत्वा द्विजसतीर्गोपाः प्रश्रिता इदमब्रुवन् ॥ 23.15 ॥

gatvātha patnī-śālāyāṁ dṛṣṭvāsīnāḥ sv-alaṅkṛtāḥ natvā dvija-satīr gopāḥ praśritā idam abruvan

तब पत्नी-शाला में जाकर, सुसज्जित बैठी हुई उन्हें देखकर, गोपों ने द्विज-पत्नी सतियों को प्रणाम कर विनम्रतापूर्वक यह कहा।

श्लोक 16 (bhagavata.10.23.16)

नमो वो विप्रपत्नीभ्यो निबोधत वचांसि नः । इतोऽविदूरे चरता कृष्णेनेहेषिता वयम् ॥ 23.16 ॥

namo vo vipra-patnībhyo nibodhata vacāṁsi naḥ ito ’vidūre caratā kṛṣṇeneheṣitā vayam

'हे विप्र-पत्नियो! आपको नमस्कार। हमारी बात सुनिए। हम यहाँ से थोड़ी दूर विचरण कर रहे कृष्ण द्वारा भेजे गए हैं।'

श्लोक 17 (bhagavata.10.23.17)

गाश्चारयन् स गोपालैः सरामो दूरमागतः । बुभुक्षितस्य तस्यान्नं सानुगस्य प्रदीयताम् ॥ 23.17 ॥

gāś cārayan sa gopālaiḥ sa-rāmo dūram āgataḥ bubhukṣitasya tasyānnaṁ sānugasya pradīyatām

'गोपों के साथ गौएँ चराते हुए, बलराम सहित वे दूर से आए हैं। भूखे हैं, अतः उन्हें और उनके साथियों को अन्न दिया जाए।'

श्लोक 18 (bhagavata.10.23.18)

श्रुत्वाच्युतमुपायातं नित्यं तद्दर्शनोत्सुकाः । तत्कथाक्षिप्तमनसो बभूवुर्जातसम्भ्रमाः ॥ 23.18 ॥

śrutvācyutam upāyātaṁ nityaṁ tad-darśanotsukāḥ tat-kathākṣipta-manaso babhūvur jāta-sambhramāḥ

अच्युत के आगमन की बात सुनकर — जो सदैव उनके दर्शन को उत्सुक रहती थीं और उनकी कथाओं से जिनका मन आकृष्ट रहता था — वे अत्यंत उत्तेजित हो उठीं।

श्लोक 19 (bhagavata.10.23.19)

चतुर्विधं बहुगुणमन्नमादाय भाजनैः । अभिसस्रुः प्रियं सर्वाः समुद्रमिव निम्नगाः ॥ 23.19 ॥

catur-vidhaṁ bahu-guṇam annam ādāya bhājanaiḥ abhisasruḥ priyaṁ sarvāḥ samudram iva nimnagāḥ

पात्रों में चार प्रकार के गुणयुक्त अन्न लेकर, वे सब अपने प्रियतम की ओर वैसे ही दौड़ पड़ीं, जैसे नदियाँ समुद्र की ओर दौड़ती हैं।

श्लोक 20 (bhagavata.10.23.20)

निषिध्यमानाः पतिभिर्भ्रातृभिर्बन्धुभिः सुतैः । भगवत्युत्तमश्लोके दीर्घश्रुतधृताशयाः

niṣidhyamānāḥ patibhir bhrātṛbhir bandhubhiḥ sutaiḥ bhagavaty uttama-śloke dīrgha-śruta-dhṛtāśayāḥ

पतियों, भाइयों, बंधुओं और पुत्रों द्वारा रोके जाने पर भी, दीर्घकाल से सुनी गई कथाओं के कारण उनका चित्त सर्वोत्कृष्ट कीर्ति वाले भगवान में दृढ़तापूर्वक बंधा हुआ था।

श्लोक 21 (bhagavata.10.23.21)

यमुनोपवनेऽशोकनवपल्लवमण्डिते । विचरन्तं वृतं गोपैः साग्रजं ददृशुः स्त्रियः

yamunopavane ’śoka nava-pallava-maṇḍite vicarantaṁ vṛtaṁ gopaiḥ sāgrajaṁ dadṛśuḥ striyaḥ

यमुना के तट पर, अशोक वृक्षों की नई कोंपलों से सुशोभित उपवन में, वे स्त्रियाँ उन्हें गोपों से घिरे, अपने अग्रज सहित विचरण करते देखने लगीं।

श्लोक 22 (bhagavata.10.23.22)

श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्ह- धातुप्रवालनटवेषमनुव्रतांसे । विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जं कर्णोत्पलालककपोलमुखाब्जहासम् ॥ 23.22 ॥

śyāmaṁ hiraṇya-paridhiṁ vanamālya-barha- dhātu-pravāla-naṭa-veṣam anavratāṁse vinyasta-hastam itareṇa dhunānam abjaṁ karṇotpalālaka-kapola-mukhābja-hāsam

श्याम वर्ण, स्वर्ण-वस्त्र धारण किए, वनमाला, मयूर-पंख, गेरु और नवपल्लवों से नर्तक-सा वेष बनाए, एक हाथ अपने अनुगत सखा के कंधे पर रखे, दूसरे हाथ से कमल घुमाते हुए, कानों में कमल-पुष्प, कपोलों पर लटें और कमल-सम मुख पर मुस्कान लिए हुए —

श्लोक 23 (bhagavata.10.23.23)

प्रायःश्रुतप्रियतमोदयकर्णपूरै- र्यस्मिन् निमग्नमनसस्तमथाक्षिरन्ध्रैः । अन्तः प्रवेश्य सुचिरं परिरभ्य तापं प्राज्ञं यथाभिमतयो विजहुर्नरेन्द्र ॥ 23.23 ॥

prāyaḥ-śruta-priyatamodaya-karṇa-pūrair yasmin nimagna-manasas tam athākṣi-randraiḥ antaḥ praveśya su-ciraṁ parirabhya tāpaṁ prājñaṁ yathābhimatayo vijahur narendra

हे नरेन्द्र! जिनका मन बहुधा सुनी गई उस प्रियतम की कथाओं के कर्णाभूषणों में सदा से डूबा हुआ था, उन स्त्रियों ने अपनी आँखों के छिद्रों से उन्हें भीतर प्रवेश कराकर, चिरकाल तक हृदय में आलिंगन कर, उस विरह-वेदना को उसी प्रकार त्याग दिया, जैसे ज्ञानीजन अपने परम इष्ट को पाकर संताप त्याग देते हैं।

श्लोक 24 (bhagavata.10.23.24)

तास्तथा त्यक्तसर्वाशाः प्राप्ता आत्मदिदृक्षया । विज्ञायाखिलदृग्द्रष्टा प्राह प्रहसिताननः ॥ 23.24 ॥

tās tathā tyakta-sarvāśāḥ prāptā ātma-didṛkṣayā vijñāyākhila-dṛg-draṣṭā prāha prahasitānanaḥ

यह जानकर कि वे सभी आशाएँ त्यागकर, केवल उनके दर्शन की इच्छा से आई हैं, समस्त द्रष्टाओं के भी द्रष्टा भगवान मुस्कुराते हुए बोले।

श्लोक 25 (bhagavata.10.23.25)

स्वागतं वो महाभागा आस्यतां करवाम किम् । यन्नो दिदृक्षया प्राप्ता उपपन्नमिदं हि वः ॥ 23.25 ॥

svāgataṁ vo mahā-bhāgā āsyatāṁ karavāma kim yan no didṛkṣayā prāptā upapannam idaṁ hi vaḥ

'हे परम भाग्यशालिनियो! स्वागत है। बैठिए। मैं आपके लिए क्या करूँ? मेरे दर्शन की इच्छा से आपका यहाँ आना आपके लिए ही उपयुक्त है।'

श्लोक 26 (bhagavata.10.23.26)

नन्वद्धा मयि कुर्वन्ति कुशलाः स्वार्थदर्शिनः । अहैतुक्यव्यवहितां भक्तिमात्मप्रिये यथा ॥ 23.26 ॥

nanv addhā mayi kurvanti kuśalāḥ svārtha-darśinaḥ ahaituky avyavahitāṁ bhaktim ātma-priye yathā

'निश्चय ही जो कुशल हैं और अपने वास्तविक हित को पहचानते हैं, वे मुझमें, जो आत्मा के प्रियतम हूँ, प्रत्यक्ष रूप से निष्काम और अखंड भक्ति करते हैं।'

श्लोक 27 (bhagavata.10.23.27)

प्राणबुद्धिमनःस्वात्मदारापत्यधनादयः । यत्सम्पर्कात्प्रिया आसंस्ततः को न्वपरः प्रियः ॥ 23.27 ॥

prāṇa-buddhi-manaḥ-svātma dārāpatya-dhanādayaḥ yat-samparkāt priyā āsaṁs tataḥ ko nv aparaḥ priyaḥ

'जिसके संसर्ग से प्राण, बुद्धि, मन, अपना शरीर, पत्नी, संतान, धन आदि प्रिय लगते हैं, उससे बढ़कर और कौन प्रिय हो सकता है?'

श्लोक 28 (bhagavata.10.23.28)

तद् यात देवयजनं पतयो वो द्विजातयः । स्वसत्रं पारयिष्यन्ति युष्माभिर्गृहमेधिनः ॥ 23.28 ॥

tad yāta deva-yajanaṁ patayo vo dvijātayaḥ sva-satraṁ pārayiṣyanti yuṣmābhir gṛha-medhinaḥ

'अतः यज्ञ-स्थल को लौट जाओ। तुम्हारे पति, वे द्विज गृहस्थ, तुम्हारी सहायता से अपना यज्ञ पूर्ण करेंगे।'

श्लोक 29 (bhagavata.10.23.29)

श्रीपत्न्य ऊचुः मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं सत्यं कुरुष्व निगमं तव पादमूलम् । प्राप्ता वयं तुलसिदाम पदावसृष्टं केशैर्निवोढुमतिलङ्घ्य समस्तबन्धून् ॥ 23.29 ॥

śrī-patnya ūcuḥ maivaṁ vibho ’rhati bhavān gadituṁ nr-śaṁsaṁ satyaṁ kuruṣva nigamaṁ tava pāda-mūlam prāptā vayaṁ tulasi-dāma padāvasṛṣṭaṁ keśair nivoḍhum atilaṅghya samasta-bandhūn

पत्नियों ने कहा — 'हे विभो! आपको ऐसी निष्ठुर बात नहीं कहनी चाहिए। अपने ही वचन को सत्य कीजिए — हम आपके चरण-मूल तक पहुँच चुकी हैं, समस्त बंधुओं को लांघकर, आपके चरणों से गिरी तुलसी-माला को अपने केशों में धारण करने की अभिलाषा से।'

श्लोक 30 (bhagavata.10.23.30)

गृह्णन्ति नो न पतयः पितरौ सुता वा न भ्रातृबन्धुसुहृदः कुत एव चान्ये । तस्माद् भवत्प्रपदयोः पतितात्मनां नो नान्या भवेद् गतिररिन्दम तद् विधेहि ॥ 23.30 ॥

gṛhṇanti no na patayaḥ pitarau sutā vā na bhrātṛ-bandhu-suhṛdaḥ kuta eva cānye tasmād bhavat-prapadayoḥ patitātmanāṁ no nānyā bhaved gatir arindama tad vidhehi

'अब न पति हमें ग्रहण करेंगे, न माता-पिता, न पुत्र; न भाई, बंधु या मित्र — तो अन्य कौन करेगा? अतः हे शत्रुदमन! जो आपके चरणों में गिर चुकी हैं, उनके लिए अब कोई अन्य गति नहीं — यही हमें प्रदान कीजिए।'

श्लोक 31 (bhagavata.10.23.31)

श्रीभगवानुवाच पतयो नाभ्यसूयेरन् पितृभ्रातृसुतादयः । लोकाश्च वो मयोपेता देवा अप्यनुमन्वते ॥ 23.31 ॥

śrī-bhagavān uvāca patayo nābhyasūyeran pitṛ-bhrātṛ-sutādayaḥ lokāś ca vo mayopetā devā apy anumanvate

भगवान ने कहा — 'तुम्हारे पति तुमसे द्वेष नहीं करेंगे, न पिता, भाई, पुत्र आदि। मुझसे जुड़ जाने पर संसार भी तुम्हें स्वीकार करेगा — देवता भी सहमत होंगे।'

श्लोक 32 (bhagavata.10.23.32)

न प्रीतयेऽनुरागाय ह्यङ्गसङ्गो नृणामिह । तन्मनो मयि युञ्जाना अचिरान्मामवाप्स्यथ ॥ 23.32 ॥

na prītaye ’nurāgāya hy aṅga-saṅgo nṛṇām iha tan mano mayi yuñjānā acirān mām avāpsyatha

'इस लोक में मेरे शरीर की समीपता से मनुष्यों को न सच्चा आनंद मिलता है, न स्थायी अनुराग। इसके बजाय अपना मन मुझमें लगाओ, तो तुम शीघ्र ही मुझे प्राप्त कर लोगी।'

श्लोक 33 (bhagavata.10.23.33)

श्रवणाद्दर्शनाद्ध्यानान्मयि भावोऽनुकीर्तनात् । न तथा सन्निकर्षेण प्रतियात ततो गृहान् ॥ 23.33 ॥

śravaṇād darśanād dhyānān mayi bhāvo ’nukīrtanāt na tathā sannikarṣeṇa pratiyāta tato gṛhān

'श्रवण, दर्शन, ध्यान और मेरे कीर्तन से ही मुझमें भाव उत्पन्न होता है — शारीरिक समीपता से उतना नहीं। अतः अब अपने घर लौट जाओ।'

श्लोक 34 (bhagavata.10.23.34)

श्रीशुक उवाच इत्युक्ता द्विजपत्न्यस्ता यज्ञवाटं पुनर्गताः । ते चानसूयवस्ताभिः स्त्रीभिः सत्रमपारयन् ॥ 23.34 ॥

śrī-śuka uvāca ity uktā dvija-patnyas tā yajña-vāṭaṁ punar gatāḥ te cānasūyavas tābhiḥ strībhiḥ satram apārayan

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर, वे द्विज-पत्नियाँ पुनः यज्ञ-स्थल को लौट गईं, और वे ब्राह्मण, बिना किसी द्वेष के, उन स्त्रियों के साथ यज्ञ पूर्ण करने लगे।

श्लोक 35 (bhagavata.10.23.35)

तत्रैका विधृता भर्त्रा भगवन्तं यथाश्रुतम् । हृदोपगुह्य विजहौ देहं कर्मानुबन्धनम् ॥ 23.35 ॥

tatraikā vidhṛtā bhartrā bhagavantaṁ yathā-śrutam hṛḍopaguhya vijahau dehaṁ karmānubandhanam

उनमें से एक स्त्री को उसके पति ने रोक रखा था; उसने अपने सुने हुए वर्णन के अनुसार भगवान का हृदय में आलिंगन कर, कर्म-बंधन के कारणस्वरूप अपने शरीर को त्याग दिया।

श्लोक 36 (bhagavata.10.23.36)

भगवानपि गोविन्दस्तेनैवान्नेन गोपकान् । चतुर्विधेनाशयित्वा स्वयं च बुभुजे प्रभुः ॥ 23.36 ॥

bhagavān api govindas tenaivānnena gopakān catur-vidhenāśayitvā svayaṁ ca bubhuje prabhuḥ

भगवान गोविन्द ने उसी चतुर्विध अन्न से गोपों को भोजन कराकर, स्वयं भी उसे ग्रहण किया।

श्लोक 37 (bhagavata.10.23.37)

एवं लीलानरवपुर्नृलोकमनुशीलयन् । रेमे गोगोपगोपीनां रमयन् रूपवाक्कृतैः ॥ 23.37 ॥

evaṁ līlā-nara-vapur nr-lokam anuśīlayan reme go-gopa-gopīnāṁ ramayan rūpa-vāk-kṛtaiḥ

इस प्रकार लीला हेतु मनुष्य-रूप धारण किए, मानव-समाज के आचरण का अनुसरण करते हुए, वे गौओं, गोपों और गोपियों को अपने रूप, वाणी और कर्मों से रिझाते हुए विहार करते रहे।

श्लोक 38 (bhagavata.10.23.38)

अथानुस्मृत्य विप्रास्ते अन्वतप्यन्कृतागसः । यद् विश्वेश्वरयोर्याच्ञामहन्म नृविडम्बयोः ॥ 23.38 ॥

athānusmṛtya viprās te anvatapyan kṛtāgasaḥ yad viśveśvarayor yācñām ahanma nṛ-viḍambayoḥ

तब वे ब्राह्मण, स्मरण कर, अपने अपराध को जानकर पश्चाताप करने लगे — 'हमने मनुष्य के वेश में आए विश्वेश्वर के उन दोनों की याचना अस्वीकार कर दी।'

श्लोक 39 (bhagavata.10.23.39)

दृष्ट्वा स्त्रीणां भगवति कृष्णे भक्तिमलौकिकीम् । आत्मानं च तया हीनमनुतप्ता व्यगर्हयन् ॥ 23.39 ॥

dṛṣṭvā strīṇāṁ bhagavati kṛṣṇe bhaktim alaukikīm ātmānaṁ ca tayā hīnam anutaptā vyagarhayan

अपनी पत्नियों की भगवान कृष्ण के प्रति असाधारण भक्ति देखकर, और स्वयं उससे रहित पाकर, वे पछताते हुए अपनी निंदा करने लगे।

श्लोक 40 (bhagavata.10.23.40)

धिग् जन्म नस्त्रिवृद् यत् तद् धिग्व्रतं धिग्बहुज्ञताम् । धिक्कुलं धिक् क्रियादाक्ष्यं विमुखा ये त्वधोक्षजे ॥ 23.40 ॥

dhig janma nas tri-vṛd yat tad dhig vrataṁ dhig bahu-jñatām dhik kulaṁ dhik kriyā-dākṣyaṁ vimukhā ye tv adhokṣaje

'धिक्कार है हमारे त्रिविध जन्म को, धिक्कार है हमारे व्रतों को, धिक्कार है हमारी बहुज्ञता को! धिक्कार है हमारे कुल को, धिक्कार है हमारी कर्मकुशलता को — जो हमने इंद्रियातीत भगवान से मुख मोड़ लिया!'

श्लोक 41 (bhagavata.10.23.41)

नूनं भगवतो माया योगिनामपि मोहिनी । यद् वयं गुरवो नृणां स्वार्थे मुह्यामहे द्विजाः ॥ 23.41 ॥

nūnaṁ bhagavato māyā yoginām api mohinī yad vayaṁ guravo nṛṇāṁ svārthe muhyāmahe dvijāḥ

'निश्चय ही भगवान की माया योगियों को भी मोहित कर देती है, क्योंकि हम, जो मनुष्यों के गुरु हैं, स्वयं अपने ही हित के विषय में मोहित हो गए।'

श्लोक 42 (bhagavata.10.23.42)

अहो पश्यत नारीणामपि कृष्णे जगद्गुरौ । दुरन्तभावं योऽविध्यन्मृत्युपाशान् गृहाभिधान् ॥ 23.42 ॥

aho paśyata nārīṇām api kṛṣṇe jagad-gurau duranta-bhāvaṁ yo ’vidhyan mṛtyu-pāśān gṛhābhidhān

'अहो! देखो, जगद्गुरु कृष्ण के प्रति इन स्त्रियों का यह असीम प्रेम, जिसने गृहस्थी नामक मृत्यु-पाश को भी भेद डाला है!'

श्लोक 43 (bhagavata.10.23.43)

नासां द्विजातिसंस्कारो न निवासो गुरावपि । न तपो नात्ममीमांसा न शौचं न क्रियाः शुभाः

nāsāṁ dvijāti-saṁskāro na nivāso gurāv api na tapo nātma-mīmāṁsā na śaucaṁ na kriyāḥ śubhāḥ

'न तो इन स्त्रियों का द्विज-संस्कार हुआ है, न ये गुरुकुल में रहीं, न इन्होंने तप किया, न आत्म-चिंतन, न शौच, न शुभ कर्मकांड —

श्लोक 44 (bhagavata.10.23.44)

तथापि ह्युत्तमःश्लोके कृष्णे योगेश्वरेश्वरे । भक्तिर्दृढा न चास्माकं संस्कारादिमतामपि

tathāpi hy uttamaḥ-śloke kṛṣṇe yogeśvareśvare bhaktir dṛḍhā na cāsmākaṁ saṁskārādimatām api

— फिर भी सर्वोत्कृष्ट कीर्ति वाले, योगेश्वरों के भी ईश्वर कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति अटल है; जबकि हमारी, इतने संस्कारों के होते हुए भी, वैसी दृढ़ नहीं है।'

श्लोक 45 (bhagavata.10.23.45)

ननु स्वार्थविमूढानां प्रमत्तानां गृहेहया । अहो नः स्मारयामास गोपवाक्यैः सतां गतिः ॥ 23.45 ॥

nanu svārtha-vimūḍhānāṁ pramattānāṁ gṛhehayā aho naḥ smārayām āsa gopa-vākyaiḥ satāṁ gatiḥ

'सचमुच, जो हम अपने ही हित के विषय में मोहित थे, गृहस्थी की चिंता में उन्मत्त थे — अहो! उन्होंने गोपों की वाणी के माध्यम से हमें सज्जनों की परम गति का स्मरण करा दिया।'

श्लोक 46 (bhagavata.10.23.46)

अन्यथा पूर्णकामस्य कैवल्याद्यशिषां पतेः । ईशितव्यैः किमस्माभिरीशस्यैतद् विडम्बनम् ॥ 23.46 ॥

anyathā pūrṇa-kāmasya kaivalyādy-aśiṣāṁ pateḥ īśitavyaiḥ kim asmābhir īśasyaitad viḍambanam

'अन्यथा, जिनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हैं, जो कैवल्य आदि समस्त वरदानों के स्वामी हैं, वे ईश्वर हम जैसे शासित प्राणियों के साथ यह स्वांग क्यों रचते?'

श्लोक 47 (bhagavata.10.23.47)

हित्वान्यान् भजते यं श्रीः पादस्पर्शाशयासकृत् । स्वात्मदोषापवर्गेण तद्याच्ञा जनमोहिनी ॥ 23.47 ॥

hitvānyān bhajate yaṁ śrīḥ pāda-sparśāśayāsakṛt svātma-doṣāpavargeṇa tad-yācñā jana-mohinī

'जिनके चरण-स्पर्श की इच्छा से लक्ष्मी स्वयं अन्य सबको त्यागकर, अपने ही दोष का परित्याग करते हुए, बार-बार उनकी सेवा करती हैं — उन्हीं का हमसे याचना करना समस्त जनों को चकित कर देने वाला है।'

श्लोक 48 (bhagavata.10.23.48)

देशः कालः पृथग्द्रव्यं मन्त्रतन्त्रर्त्विजोऽग्नयः । देवता यजमानश्च क्रतुर्धर्मश्च यन्मयः

deśaḥ kālaḥ pṛthag dravyaṁ mantra-tantrartvijo ’gnayaḥ devatā yajamānaś ca kratur dharmaś ca yan-mayaḥ

'जिनके ही स्वरूप यज्ञ का स्थान, काल, विविध सामग्री, मंत्र, विधियाँ, ऋत्विज, अग्नियाँ, देवता, यजमान, यज्ञ और धर्म हैं —

श्लोक 49 (bhagavata.10.23.49)

स एव भगवान् साक्षाद् विष्णुर्योगेश्वरेश्वरः । जातो यदुष्वित्याशृण्म ह्यपि मूढा न विद्महे

sa eva bhagavān sākṣād viṣṇur yogeśvareśvaraḥ jāto yaduṣv ity āśṛṇma hy api mūḍhā na vidmahe

— वही साक्षात् भगवान विष्णु, योगेश्वरेश्वर, यदुवंश में अवतरित हुए हैं — यह हमने सुना भी था, फिर भी मूढ़ होने के कारण हम पहचान न सके।'

श्लोक 50 (bhagavata.10.23.50)

तस्मै नमो भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे । यन्मायामोहितधियो भ्रमामः कर्मवर्त्मसु ॥ 23.50 ॥

tasmai namo bhagavate kṛṣṇāyākuṇṭha-medhase yan-māyā-mohita-dhiyo bhramāmaḥ karma-vartmasu

'उन भगवान कृष्ण को नमस्कार है, जिनकी बुद्धि कभी कुंठित नहीं होती, जिनकी माया से मोहित बुद्धि लिए हम कर्म-मार्गों पर भटक रहे हैं।'

श्लोक 51 (bhagavata.10.23.51)

स वै न आद्यः पुरुषः स्वमायामोहितात्मनाम् । अविज्ञतानुभावानां क्षन्तुमर्हत्यतिक्रमम् ॥ 23.51 ॥

sa vai na ādyaḥ puruṣaḥ sva-māyā-mohitātmanām avijñatānubhāvānāṁ kṣantum arhaty atikramam

'वे ही आदि पुरुष, अपनी माया से मोहित तथा उनके प्रभाव को न समझ पाने वाले हम लोगों के इस अपराध को क्षमा करने योग्य हैं।'

श्लोक 52 (bhagavata.10.23.52)

इति स्वाघमनुस्मृत्य कृष्णे ते कृतहेलनाः । दिदृक्षवो व्रजमथ कंसाद् भीता न चाचलन् ॥ 23.52 ॥

iti svāgham anusmṛtya kṛṣṇe te kṛta-helanāḥ didṛkṣavo vrajam atha kaṁsād bhītā na cācalan

इस प्रकार कृष्ण के प्रति किए गए अपने अपराध का स्मरण कर, वे उनके दर्शन के लिए उत्सुक हो उठे; परन्तु कंस के भय से व्रज की ओर न बढ़े।

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