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दशम स्कन्ध · अध्याय 24

गोवर्धन पर्वत की पूजा

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25

श्लोक 1 (bhagavata.10.24.1)

श्रीशुक उवाच भगवानपि तत्रैव बलदेवेन संयुतः । अपश्यन्निवसन्गोपानिन्द्रयागकृतोद्यमान् ॥ 24.1 ॥

śrī-śuka uvāca bhagavān api tatraiva baladevena saṁyutaḥ apaśyan nivasan gopān indra-yāga-kṛtodyamān

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — वहीं निवास करते हुए, बलदेव सहित भगवान ने गोपों को इंद्र-यज्ञ की तैयारी में लगे देखा।

श्लोक 2 (bhagavata.10.24.2)

तदभिज्ञोऽपि भगवान् सर्वात्मा सर्वदर्शनः । प्रश्रयावनतोऽपृच्छद् वृद्धान् नन्दपुरोगमान् ॥ 24.2 ॥

tad-abhijño ’pi bhagavān sarvātmā sarva-darśanaḥ praśrayāvanato ’pṛcchad vṛddhān nanda-purogamān

यद्यपि सर्वात्मा सर्वदर्शी भगवान इसे पहले से ही जानते थे, तथापि विनम्रतापूर्वक नन्द आदि वृद्धजनों से पूछने लगे।

श्लोक 3 (bhagavata.10.24.3)

कथ्यतां मे पितः कोऽयं सम्भ्रमो व उपागतः । किं फलं कस्य वोद्देशः केन वा साध्यते मखः ॥ 24.3 ॥

kathyatāṁ me pitaḥ ko ’yaṁ sambhramo va upāgataḥ kiṁ phalaṁ kasya voddeśaḥ kena vā sādhyate makhaḥ

'हे पिता! मुझे बताइए, यह कैसी हलचल आप पर आ पड़ी है? इसका फल क्या है, यह किसके लिए है, और यह यज्ञ किस विधि से संपन्न किया जाता है?'

श्लोक 4 (bhagavata.10.24.4)

एतद् ब्रूहि महान् कामो मह्यं शुश्रूषवे पितः । न हि गोप्यं हि साधूनां कृत्यं सर्वात्मनामिह । अस्त्यस्वपरदृष्टीनाममित्रोदास्तविद्विषाम् ॥ 24.4 ॥

etad brūhi mahān kāmo mahyaṁ śuśrūṣave pitaḥ na hi gopyaṁ hi sadhūnāṁ kṛtyaṁ sarvātmanām iha asty asva-para-dṛṣṭīnām amitrodāsta-vidviṣām

'यह मुझे बताइए, हे पिता, मुझे सुनने की प्रबल इच्छा है। सज्जनों का कोई कार्य गुप्त नहीं होना चाहिए, जो सबको अपने समान देखते हैं, जिनके लिए न कुछ 'अपना' है न 'पराया', और जो मित्र, उदासीन तथा शत्रु में भेद नहीं करते।'

श्लोक 5 (bhagavata.10.24.5)

उदासीनोऽरिवद् वर्ज्य आत्मवत् सुहृदुच्यते ॥ 24.5 ॥

udāsīno ’ri-vad varjya ātma-vat suhṛd ucyate

'उदासीन व्यक्ति को शत्रु के समान त्याज्य कहा गया है, जबकि मित्र को अपने ही समान कहा जाता है।'

श्लोक 6 (bhagavata.10.24.6)

ज्ञात्वाज्ञात्वा च कर्माणि जनोऽयमनुतिष्ठति । विदुषः कर्मसिद्धिः स्याद् यथा नाविदुषो भवेत् ॥ 24.6 ॥

jñatvājñātvā ca karmāṇi jano ’yam anutiṣṭhati viduṣaḥ karma-siddhiḥ syād yathā nāviduṣo bhavet

'लोग कर्मों को कभी समझकर, कभी बिना समझे करते हैं; ज्ञानी की कर्म-सिद्धि उस प्रकार होती है, जैसी अज्ञानी की नहीं होती।'

श्लोक 7 (bhagavata.10.24.7)

तत्र तावत् क्रियायोगो भवतां किं विचारितः । अथवा लौकिकस्तन्मे पृच्छतः साधु भण्यताम् ॥ 24.7 ॥

tatra tāvat kriyā-yogo bhavatāṁ kiṁ vicāritaḥ atha vā laukikas tan me pṛcchataḥ sādhu bhaṇyatām

'तो क्या आपका यह अनुष्ठान सुविचारित है, अथवा केवल लौकिक प्रथा है? मैं पूछ रहा हूँ, कृपया सम्यक् रूप से बताइए।'

श्लोक 8 (bhagavata.10.24.8)

श्रीनन्द उवाच पर्जन्यो भगवानिन्द्रो मेघास्तस्यात्ममूर्तयः । तेऽभिवर्षन्ति भूतानां प्रीणनं जीवनं पयः ॥ 24.8 ॥

śrī-nanda uvāca parjanyo bhagavān indro meghās tasyātma-mūrtayaḥ te ’bhivarṣanti bhūtānāṁ prīṇanaṁ jīvanaṁ payaḥ

नन्द ने कहा — 'भगवान इंद्र वर्षा के अधिपति हैं; मेघ उन्हीं के स्वरूप हैं। वे जल बरसाते हैं, जो समस्त प्राणियों को संतोष और जीवन देने वाला है।'

श्लोक 9 (bhagavata.10.24.9)

तं तात वयमन्ये च वार्मुचां पतिमीश्वरम् । द्रव्यैस्तद्रेतसा सिद्धैर्यजन्ते क्रतुभिर्नराः ॥ 24.9 ॥

taṁ tāta vayam anye ca vārmucāṁ patim īśvaram dravyais tad-retasā siddhair yajante kratubhir narāḥ

'हे पुत्र! हम और अन्य लोग उस जल बरसाने वाले के स्वामी की, उन्हीं के वीर्य [वर्षा] से सिद्ध सामग्री द्वारा, यज्ञों से पूजा करते हैं।'

श्लोक 10 (bhagavata.10.24.10)

तच्छेषेणोपजीवन्ति त्रिवर्गफलहेतवे । पुंसां पुरुषकाराणां पर्जन्यः फलभावनः ॥ 24.10 ॥

tac-cheṣeṇopajīvanti tri-varga-phala-hetave puṁsāṁ puruṣa-kārāṇāṁ parjanyaḥ phala-bhāvanaḥ

'उसी के अवशेष से लोग अपना जीवन-निर्वाह करते हैं, त्रिवर्ग की सिद्धि के लिए; पर्जन्य ही पुरुषार्थी मनुष्यों के प्रयासों को फल देने वाले हैं।'

श्लोक 11 (bhagavata.10.24.11)

य एनं विसृजेद् धर्मं परम्पर्यागतं नरः । कामाद् द्वेषाद्भयाल्लोभात्स वै नाप्नोति शोभनम् ॥ 24.11 ॥

ya enaṁ visṛjed dharmaṁ paramparyāgataṁ naraḥ kāmād dveṣād bhayāl lobhāt sa vai nāpnoti śobhanam

'जो मनुष्य परम्परा से चले आ रहे इस धर्म को कामना, द्वेष, भय अथवा लोभ से त्याग देता है, वह निश्चय ही कल्याण को प्राप्त नहीं होता।'

श्लोक 12 (bhagavata.10.24.12)

श्रीशुक उवाच वचो निशम्य नन्दस्य तथान्येषां व्रजौकसाम् । इन्द्राय मन्युं जनयन् पितरं प्राह केशवः ॥ 24.12 ॥

śrī-śuka uvāca vaco niśamya nandasya tathānyeṣāṁ vrajaukasām indrāya manyuṁ janayan pitaraṁ prāha keśavaḥ

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — नन्द तथा अन्य व्रजवासियों के वचन सुनकर, इंद्र के मन में क्रोध उत्पन्न कराने की इच्छा से, केशव अपने पिता से बोले।

श्लोक 13 (bhagavata.10.24.13)

श्रीभगवानुवाच कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव प्रलीयते । सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ॥ 24.13 ॥

śrī-bhagavān uvāca karmaṇā jāyate jantuḥ karmaṇaiva pralīyate sukhaṁ duḥkhaṁ bhayaṁ kṣemaṁ karmaṇaivābhipadyate

भगवान ने कहा — 'कर्म से ही प्राणी जन्म लेता है, कर्म से ही नष्ट होता है; सुख, दुःख, भय और कुशलता — ये सब कर्म से ही प्राप्त होते हैं।'

श्लोक 14 (bhagavata.10.24.14)

अस्ति चेदीश्वरः कश्चित्फलरूप्यन्यकर्मणाम् । कर्तारं भजते सोऽपि न ह्यकर्तुः प्रभुर्हि सः ॥ 24.14 ॥

asti ced īśvaraḥ kaścit phala-rūpy anya-karmaṇām kartāraṁ bhajate so ’pi na hy akartuḥ prabhur hi saḥ

'यदि कोई ऐसा ईश्वर हो भी, जो दूसरों के कर्मों का फलदाता हो, तो वह भी कर्ता पर ही निर्भर है — क्योंकि वह अकर्ता का स्वामी नहीं हो सकता।'

श्लोक 15 (bhagavata.10.24.15)

किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् । अनीशेनान्यथा कर्तुं स्वभावविहितं नृणाम् ॥ 24.15 ॥

kim indreṇeha bhūtānāṁ sva-sva-karmānuvartinām anīśenānyathā kartuṁ svabhāva-vihitaṁ nṛṇām

'यहाँ के प्राणी अपने-अपने कर्म का अनुसरण करते हैं, तो इंद्र का इससे क्या प्रयोजन, जब वे मनुष्यों के स्वभाव द्वारा निर्धारित को बदलने में असमर्थ हैं?'

श्लोक 16 (bhagavata.10.24.16)

स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते । स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ 24.16 ॥

svabhāva-tantro hi janaḥ svabhāvam anuvartate svabhāva-stham idaṁ sarvaṁ sa-devāsura-mānuṣam

'प्रत्येक प्राणी अपने स्वभाव के अधीन होकर उसी स्वभाव का अनुसरण करता है; यह संपूर्ण जगत — देव, असुर और मनुष्य सहित — स्वभाव में ही स्थित है।'

श्लोक 17 (bhagavata.10.24.17)

देहानुच्चावचाञ्जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा । शत्रुर्मित्रमुदासीनः कर्मैव गुरुरीश्वरः ॥ 24.17 ॥

dehān uccāvacāñ jantuḥ prāpyotsṛjati karmaṇā śatrur mitram udāsīnaḥ karmaiva gurur īśvaraḥ

'कर्म के द्वारा ही प्राणी ऊँची-नीची देहों को प्राप्त करता है और त्यागता है; कर्म ही शत्रु है, मित्र है, उदासीन है; कर्म ही गुरु और ईश्वर है।'

श्लोक 18 (bhagavata.10.24.18)

तस्मात्सम्पूजयेत्कर्म स्वभावस्थः स्वकर्मकृत् । अञ्जसा येन वर्तेत तदेवास्य हि दैवतम् ॥ 24.18 ॥

tasmāt sampūjayet karma svabhāva-sthaḥ sva-karma-kṛt anjasā yena varteta tad evāsya hi daivatam

'अतः अपने स्वभाव में स्थित रहकर, अपना कर्तव्य-कर्म करते हुए, कर्म का ही सम्मान करना चाहिए; जिससे मनुष्य सचमुच जीवन-यापन करता है, वही उसका वास्तविक देवता है।'

श्लोक 19 (bhagavata.10.24.19)

आजीव्यैकतरं भावं यस्त्वन्यमुपजीवति । न तस्माद् विन्दते क्षेमं जारान् नार्यसती यथा ॥ 24.19 ॥

ājīvyaikataraṁ bhāvaṁ yas tv anyam upajīvati na tasmād vindate kṣemaṁ jārān nāry asatī yathā

'जो अपनी वास्तविक जीविका को छोड़कर किसी अन्य के सहारे जीता है, उसे उससे कोई वास्तविक कल्याण प्राप्त नहीं होता — जैसे असती स्त्री को अपने उपपति से कोई स्थायी सुख नहीं मिलता।'

श्लोक 20 (bhagavata.10.24.20)

वर्तेत ब्रह्मणा विप्रो राजन्यो रक्षया भुवः । वैश्यस्तु वार्तया जीवेच्छूद्रस्तु द्विजसेवया ॥ 24.20 ॥

varteta brahmaṇā vipro rājanyo rakṣayā bhuvaḥ vaiśyas tu vārtayā jīvec chūdras tu dvija-sevayā

'ब्राह्मण वेद-ज्ञान से जीवन-यापन करता है, क्षत्रिय पृथ्वी की रक्षा से, वैश्य वाणिज्य से, और शूद्र द्विजों की सेवा से।'

श्लोक 21 (bhagavata.10.24.21)

कृषिवाणिज्यगोरक्षा कुसीदं तूर्यमुच्यते । वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम् ॥ 24.21 ॥

kṛṣi-vāṇijya-go-rakṣā kusīdaṁ tūryam ucyate vārtā catur-vidhā tatra vayaṁ go-vṛttayo ’niśam

'कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा और ऋण देना — ये चार प्रकार की वृत्तियाँ कही गई हैं। इनमें हम सदा गोरक्षा से जीवन-यापन करते हैं।'

श्लोक 22 (bhagavata.10.24.22)

सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः । रजसोत्पद्यते विश्वमन्योन्यं विविधं जगत् ॥ 24.22 ॥

sattvaṁ rajas tama iti sthity-utpatty-anta-hetavaḥ rajasotpadyate viśvam anyonyaṁ vividhaṁ jagat

'सत्त्व, रज और तम — ये क्रमशः स्थिति, उत्पत्ति और अंत के कारण हैं। रज से ही यह नाना प्रकार का, परस्पर संबद्ध विश्व उत्पन्न होता है।'

श्लोक 23 (bhagavata.10.24.23)

रजसा चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बूनि सर्वतः । प्रजास्तैरेव सिध्यन्ति महेन्द्रः किं करिष्यति ॥ 24.23 ॥

rajasā coditā meghā varṣanty ambūni sarvataḥ prajās tair eva sidhyanti mahendraḥ kiṁ kariṣyati

'रजोगुण से प्रेरित होकर मेघ सर्वत्र जल बरसाते हैं; उसी से प्राणी पुष्ट होते हैं — इसमें महेंद्र क्या करेंगे?'

श्लोक 24 (bhagavata.10.24.24)

न नः पुरो जनपदा न ग्रामा न गृहा वयम् । वनौकसस्तात नित्यं वनशैलनिवासिनः ॥ 24.24 ॥

na naḥ purojanapadā na grāmā na gṛhā vayam vanaukasas tāta nityaṁ vana-śaila-nivāsinaḥ

'हे पिता! हमारे न नगर हैं, न जनपद, न ग्राम, न घर; हम तो सदा वन में रहने वाले, वन और पर्वत के निवासी हैं।'

श्लोक 25 (bhagavata.10.24.25)

तस्माद् गवां ब्राह्मणानामद्रेश्चारभ्यतां मखः । य इन्द्रयागसम्भारास्तैरयं साध्यतां मखः ॥ 24.25 ॥

tasmād gavāṁ brāhmaṇānām adreś cārabhyatāṁ makhaḥ ya indra-yāga-sambhārās tair ayaṁ sādhyatāṁ makhaḥ

'अतः गौओं, ब्राह्मणों और पर्वत के लिए यज्ञ आरंभ किया जाए; इंद्र-यज्ञ के लिए जो सामग्री एकत्र की गई है, उसी से यह यज्ञ संपन्न किया जाए।'

श्लोक 26 (bhagavata.10.24.26)

पच्यन्तां विविधाः पाकाः सूपान्ताः पायसादयः । संयावापूपशष्कुल्यः सर्वदोहश्च गृह्यताम् ॥ 24.26 ॥

pacyantāṁ vividhāḥ pākāḥ sūpāntāḥ pāyasādayaḥ saṁyāvāpūpa-śaṣkulyaḥ sarva-dohaś ca gṛhyatām

'नाना प्रकार के व्यंजन बनाए जाएँ, खीर तथा दालें, संयाव, अपूप और शष्कुली नामक पकवान बनें, और गौओं का सारा दूध लिया जाए।'

श्लोक 27 (bhagavata.10.24.27)

हूयन्तामग्नयः सम्यग्ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादिभिः । अन्नं बहुगुणं तेभ्यो देयं वो धेनुदक्षिणाः ॥ 24.27 ॥

hūyantām agnayaḥ samyag brāhmaṇair brahma-vādibhiḥ annaṁ bahu-guṇaṁ tebhyo deyaṁ vo dhenu-dakṣiṇāḥ

'वेदवादी ब्राह्मणों द्वारा विधिपूर्वक अग्नियों का हवन किया जाए; उन्हें प्रचुर, उत्तम अन्न दिया जाए और दक्षिणा में गौएँ प्रदान की जाएँ।'

श्लोक 28 (bhagavata.10.24.28)

अन्येभ्यश्चाश्वचाण्डालपतितेभ्यो यथार्हतः । यवसं च गवां दत्त्वा गिरये दीयतां बलिः ॥ 24.28 ॥

anyebhyaś cāśva-cāṇḍāla- patitebhyo yathārhataḥ yavasaṁ ca gavāṁ dattvā giraye dīyatāṁ baliḥ

'अन्य सभी को — कुत्तों, चांडालों और पतितों को भी — यथायोग्य अन्न दिया जाए; तथा गौओं को चारा देकर पर्वत को बलि अर्पित की जाए।'

श्लोक 29 (bhagavata.10.24.29)

स्वलङ्कृता भुक्तवन्तः स्वनुलिप्ताः सुवाससः । प्रदक्षिणां च कुरुत गोविप्रानलपर्वतान् ॥ 24.29 ॥

sv-alaṅkṛtā bhuktavantaḥ sv-anuliptāḥ su-vāsasaḥ pradakṣiṇāṁ ca kuruta go-viprānala-parvatān

'भलीभाँति भोजन कर, अच्छी तरह अलंकृत होकर, चंदन-लेपित होकर, सुंदर वस्त्र धारण कर, गौओं, ब्राह्मणों, अग्नियों और पर्वत की परिक्रमा करो।'

श्लोक 30 (bhagavata.10.24.30)

एतन्मम मतं तात क्रियतां यदि रोचते । अयं गोब्राह्मणाद्रीणां मह्यं च दयितो मखः ॥ 24.30 ॥

etan mama mataṁ tāta kriyatāṁ yadi rocate ayaṁ go-brāhmaṇādrīṇāṁ mahyaṁ ca dayito makhaḥ

'हे पिता, यह मेरा विचार है; यदि अच्छा लगे तो इसे कीजिए। यह यज्ञ गौओं, ब्राह्मणों और पर्वत को, तथा मुझे भी, प्रिय होगा।'

श्लोक 31 (bhagavata.10.24.31)

श्रीशुक उवाच कालात्मना भगवता शक्रदर्प जिघांसया । प्रोक्तं निशम्य नन्दाद्याः साध्वगृह्णन्त तद्वचः ॥ 24.31 ॥

śrī-śuka uvāca kālātmanā bhagavatā śakra-darpa-jighāṁsayā proktaṁ niśamya nandādyāḥ sādhv agṛhṇanta tad-vacaḥ

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — काल-स्वरूप भगवान द्वारा, इंद्र के अभिमान को नष्ट करने की इच्छा से कहे गए इन वचनों को सुनकर, नन्द आदि ने उन्हें सहर्ष स्वीकार किया।

श्लोक 32 (bhagavata.10.24.32)

तथा च व्यदधुः सर्वं यथाह मधुसूदनः । वाचयित्वा स्वस्त्ययनं तद्द्रव्येण गिरिद्विजान्

tathā ca vyadadhuḥ sarvaṁ yathāha madhusūdanaḥ vācayitvā svasty-ayanaṁ tad-dravyeṇa giri-dvijān

और उन्होंने वैसा ही सब कुछ किया जैसा मधुसूदन ने कहा था; स्वस्ति-वाचन कराकर, उसी सामग्री से पर्वत और ब्राह्मणों की पूजा की।

श्लोक 33 (bhagavata.10.24.33)

उपहृत्य बलीन् सम्यगादृता यवसं गवाम् । गोधनानि पुरस्कृत्य गिरिं चक्रुः प्रदक्षिणम्

upahṛtya balīn samyag ādṛtā yavasaṁ gavām go-dhanāni puraskṛtya giriṁ cakruḥ pradakṣiṇam

विधिपूर्वक श्रद्धा से बलि अर्पित कर और गौओं को चारा देकर, गोधन को आगे कर उन्होंने पर्वत की परिक्रमा की।

श्लोक 34 (bhagavata.10.24.34)

अनांस्यनडुद्युक्तानि ते चारुह्य स्वलङ्कृताः । गोप्यश्च कृष्णवीर्याणि गायन्त्यः सद्विजाशिषः ॥ 24.34 ॥

anāṁsy anaḍud-yuktāni te cāruhya sv-alaṅkṛtāḥ gopyaś ca kṛṣṇa-vīryāṇi gāyantyaḥ sa-dvijāśiṣaḥ

बैलों से जुते हुए गाड़ियों पर चढ़कर, सुसज्जित गोपियाँ कृष्ण के पराक्रम का गान करती हुईं, ब्राह्मणों के आशीर्वचनों के साथ चलीं।

श्लोक 35 (bhagavata.10.24.35)

कृष्णस्त्वन्यतमं रूपं गोपविश्रम्भणं गतः । शैलोऽस्मीति ब्रुवन् भूरि बलिमादद् बृहद्वपुः ॥ 24.35 ॥

kṛṣṇas tv anyatamaṁ rūpaṁ gopa-viśrambhaṇaṁ gataḥ śailo ’smīti bruvan bhūri balim ādad bṛhad-vapuḥ

किन्तु कृष्ण, गोपों में विश्वास जगाने के लिए, एक भिन्न रूप धारण कर, 'मैं ही यह पर्वत हूँ' यह कहते हुए, विशाल शरीर से वह प्रचुर बलि ग्रहण करने लगे।

श्लोक 36 (bhagavata.10.24.36)

तस्मै नमो व्रजजनैः सह चक्र आत्मनात्मने । अहो पश्यत शैलोऽसौ रूपी नोऽनुग्रहं व्यधात् ॥ 24.36 ॥

tasmai namo vraja-janaiḥ saha cakra ātmanātmane aho paśyata śailo ’sau rūpī no ’nugrahaṁ vyadhāt

उस रूप को, व्रजवासियों के साथ, स्वयं आत्मा होते हुए भी, अपने ही स्वरूप को नमस्कार किया, और कहा — 'अहो! देखो, वह पर्वत रूप धारण कर हम पर अनुग्रह कर रहा है!'

श्लोक 37 (bhagavata.10.24.37)

एषोऽवजानतो मर्त्यान् कामरूपी वनौकसः । हन्ति ह्यस्मै नमस्यामः शर्मणे आत्मनो गवाम् ॥ 24.37 ॥

eṣo ’vajānato martyān kāma-rūpī vanaukasaḥ hanti hy asmai namasyāmaḥ śarmaṇe ātmano gavām

'यह पर्वत, जो इच्छानुसार रूप धारण कर सकता है, अनादर करने वाले नश्वर वनवासियों का विनाश कर देता है; अतः हम अपने तथा गौओं के कल्याण के लिए इसे नमस्कार करें।'

श्लोक 38 (bhagavata.10.24.38)

इत्यद्रिगोद्विजमखं वासुदेवप्रचोदिताः । यथा विधाय ते गोपा सहकृष्णा व्रजं ययुः ॥ 24.38 ॥

ity adri-go-dvija-makhaṁ vāsudeva-pracoditāḥ yathā vidhāya te gopā saha-kṛṣṇā vrajaṁ yayuḥ

इस प्रकार वासुदेव-नंदन द्वारा प्रेरित होकर, पर्वत, गौओं और ब्राह्मणों के इस यज्ञ को विधिपूर्वक संपन्न कर, वे गोप कृष्ण सहित व्रज को लौट गए।

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