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दशम स्कन्ध · अध्याय 25

भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत का उद्धरण

अध्याय 24अध्याय-सूचीअध्याय 26

श्लोक 1 (bhagavata.10.25.1)

श्रीशुक उवाच इन्द्रस्तदात्मनः पूजां विज्ञाय विहतां नृप । गोपेभ्यः कृष्णनाथेभ्यो नन्दादिभ्यश्चुकोप ह ॥ 25.1 ॥

śrī-śuka uvāca indras tadātmanaḥ pūjāṁ vijñāya vihatāṁ nṛpa gopebhyaḥ kṛṣṇa-nāthebhyo nandādibhyaś cukopa ha

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — हे राजन्! अपनी पूजा को इस प्रकार बाधित हुआ जानकर, इंद्र कृष्ण को अपना स्वामी मानने वाले उन गोपों और नन्द आदि पर अत्यंत क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 2 (bhagavata.10.25.2)

गणं सांवर्तकं नाम मेघानां चान्तकारीणाम् । इन्द्रः प्रचोदयत् क्रुद्धो वाक्यं चाहेशमान्युत ॥ 25.2 ॥

gaṇaṁ sāṁvartakaṁ nāma meghānāṁ cānta-kārīṇām indraḥ pracodayat kruddho vākyaṁ cāheśa-māny uta

क्रुद्ध इंद्र ने संवर्तक नामक प्रलयंकारी मेघों के समूह को प्रेरित किया, और स्वयं को ईश्वर मानते हुए यह वचन कहे।

श्लोक 3 (bhagavata.10.25.3)

अहो श्रीमदमाहात्म्यं गोपानां काननौकसाम् । कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य ये चक्रुर्देवहेलनम् ॥ 25.3 ॥

aho śrī-mada-māhātmyaṁ gopānāṁ kānanaukasām kṛṣṇaṁ martyam upāśritya ye cakrur deva-helanam

'अहो! इन वनवासी गोपों के ऐश्वर्य-जनित अभिमान को देखो, जिन्होंने एक साधारण मनुष्य कृष्ण की शरण लेकर देवताओं का अपमान किया है!'

श्लोक 4 (bhagavata.10.25.4)

यथादृढैः कर्ममयैः क्रतुभिर्नामनौनिभैः । विद्यामान्वीक्षिकीं हित्वा तितीर्षन्ति भवार्णवम् ॥ 25.4 ॥

yathādṛḍhaiḥ karma-mayaiḥ kratubhir nāma-nau-nibhaiḥ vidyām ānvīkṣikīṁ hitvā titīrṣanti bhavārṇavam

'यह वैसा ही है जैसे मनुष्य आत्म-ज्ञान को त्यागकर, कमजोर कर्मकांडी यज्ञों के रूप में मात्र नाम की नौकाओं से संसार-सागर पार करना चाहें।'

श्लोक 5 (bhagavata.10.25.5)

वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम् । कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम् ॥ 25.5 ॥

vācālaṁ bāliśaṁ stabdham ajñaṁ paṇḍita-māninam kṛṣṇaṁ martyam upāśritya gopā me cakrur apriyam

'बातूनी, बचकाने, अहंकारी, अज्ञानी, फिर भी स्वयं को पंडित मानने वाले उस मनुष्य कृष्ण की शरण लेकर, गोपों ने मेरा अप्रिय किया है।'

श्लोक 6 (bhagavata.10.25.6)

एषां श्रियावलिप्तानां कृष्णेनाध्मापितात्मनाम् । धुनुत श्रीमदस्तम्भं पशून् नयत सङ्क्षयम् ॥ 25.6 ॥

eṣāṁ śriyāvaliptānāṁ kṛṣṇenādhmāpitātmanām dhunuta śrī-mada-stambhaṁ paśūn nayata saṅkṣayam

'इनका, जो अपने ऐश्वर्य से उन्मत्त हैं और कृष्ण द्वारा और फुला दिए गए हैं, उस श्री-मद रूपी स्तंभ को उखाड़ दो; इनके पशुओं का विनाश करो।'

श्लोक 7 (bhagavata.10.25.7)

अहं चैरावतं नागमारुह्यानुव्रजे व्रजम् । मरुद्गणैर्महावेगैर्नन्दगोष्ठजिघांसया ॥ 25.7 ॥

ahaṁ cairāvataṁ nāgam āruhyānuvraje vrajam marud-gaṇair mahā-vegair nanda-goṣṭha-jighāṁsayā

'मैं स्वयं अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर, प्रबल वेगवान मरुद्गणों के साथ, नन्द के गोकुल को नष्ट करने की इच्छा से पीछे-पीछे चलूँगा।'

श्लोक 8 (bhagavata.10.25.8)

श्रीशुक उवाच इत्थं मघवताज्ञप्ता मेघा निर्मुक्तबन्धनाः । नन्दगोकुलमासारैः पीडयामासुरोजसा ॥ 25.8 ॥

śrī-śuka uvāca itthaṁ maghavatājñaptā meghā nirmukta-bandhanāḥ nanda-gokulam āsāraiḥ pīḍayām āsur ojasā

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — इंद्र की इस प्रकार आज्ञा पाकर, बंधनमुक्त हुए मेघों ने प्रचंड वर्षा से नन्द के गोकुल को पीड़ित करना आरंभ किया।

श्लोक 9 (bhagavata.10.25.9)

विद्योतमाना विद्युद्भिः स्तनन्तः स्तनयित्नुभिः । तीव्रैर्मरुद्गणैर्नुन्ना ववृषुर्जलशर्कराः ॥ 25.9 ॥

vidyotamānā vidyudbhiḥ stanantaḥ stanayitnubhiḥ tīvrair marud-gaṇair nunnā vavṛṣur jala-śarkarāḥ

बिजलियों से चमकते, गर्जन से गूँजते, प्रचंड मरुद्गणों से प्रेरित वे मेघ ओलों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 10 (bhagavata.10.25.10)

स्थूणास्थूला वर्षधारा मुञ्चत्स्वभ्रेष्वभीक्ष्णशः । जलौघैः प्लाव्यमाना भूर्नादृश्यत नतोन्नतम् ॥ 25.10 ॥

sthūṇā-sthūlā varṣa-dhārā muñcatsv abhreṣv abhīkṣṇaśaḥ jalaughaiḥ plāvyamānā bhūr nādṛśyata natonnatam

जब मेघ बार-बार खंभों जैसी मोटी जलधाराएँ छोड़ने लगे, तब जल-प्रवाह से डूबी हुई पृथ्वी में ऊँच-नीच का भेद ही दिखाई न देता था।

श्लोक 11 (bhagavata.10.25.11)

अत्यासारातिवातेन पशवो जातवेपनाः । गोपा गोप्यश्च शीतार्ता गोविन्दं शरणं ययुः ॥ 25.11 ॥

aty-āsārāti-vātena paśavo jāta-vepanāḥ gopā gopyaś ca śītārtā govindaṁ śaraṇaṁ yayuḥ

अत्यधिक वर्षा और आँधी से काँपते हुए पशु, तथा शीत से पीड़ित गोप और गोपियाँ, गोविन्द की शरण में गए।

श्लोक 12 (bhagavata.10.25.12)

शिरः सुतांश्च कायेन प्रच्छाद्यासारपीडिताः । वेपमाना भगवतः पादमूलमुपाययुः ॥ 25.12 ॥

śiraḥ sutāṁś ca kāyena pracchādyāsāra-pīḍitāḥ vepamānā bhagavataḥ pāda-mūlam upāyayuḥ

अपने सिर और अपने बछड़ों को अपने ही शरीर से ढककर, वर्षा से पीड़ित, काँपती हुई गौएँ भगवान के चरणों के समीप आ गईं।

श्लोक 13 (bhagavata.10.25.13)

कृष्ण कृष्ण महाभाग त्वन्नाथं गोकुलं प्रभो । त्रातुमर्हसि देवान्नः कुपिताद् भक्तवत्सल ॥ 25.13 ॥

kṛṣṇa kṛṣṇa mahā-bhāga tvan-nāthaṁ gokulaṁ prabho trātum arhasi devān naḥ kupitād bhakta-vatsala

'हे कृष्ण, कृष्ण! हे परम भाग्यशाली! हे प्रभु! यह गोकुल आपको ही अपना स्वामी मानता है — हे भक्तवत्सल, आप हमें क्रुद्ध देवताओं से बचाइए।'

श्लोक 14 (bhagavata.10.25.14)

शिलावर्षातिवातेन हन्यमानमचेतनम् । निरीक्ष्य भगवान् मेने कुपितेन्द्रकृतं हरिः ॥ 25.14 ॥

śilā-varṣāti-vātena hanyamānam acetanam nirīkṣya bhagavān mene kupitendra-kṛtaṁ hariḥ

ओलों की वर्षा और प्रचंड आँधी से मूर्च्छित हुए अपने भक्तों को देखकर, भगवान हरि समझ गए कि यह क्रुद्ध इंद्र का ही कार्य है।

श्लोक 15 (bhagavata.10.25.15)

अपर्त्वत्युल्बणं वर्षमतिवातं शिलामयम् । स्वयागे विहतेऽस्माभिरिन्द्रो नाशाय वर्षति ॥ 25.15 ॥

apartv aty-ulbaṇaṁ varṣam ati-vātaṁ śilā-mayam sva-yāge vihate ’smābhir indro nāśāya varṣati

कृष्ण ने सोचा — 'चूँकि हमने उसका यज्ञ रुकवा दिया, इसलिए इंद्र हमारे विनाश के लिए यह असामयिक, प्रचंड, आँधी और ओलों से युक्त वर्षा बरसा रहा है।'

श्लोक 16 (bhagavata.10.25.16)

तत्र प्रतिविधिं सम्यगात्मयोगेन साधये । लोकेशमानिनां मौढ्याद्धनिष्ये श्रीमदं तमः ॥ 25.16 ॥

tatra pratividhiṁ samyag ātma-yogena sādhaye lokeśa-mānināṁ mauḍhyād dhaniṣye śrī-madaṁ tamaḥ

'मैं अपनी ही योग-शक्ति से इसका उचित प्रतिकार करूँगा; मैं उन लोक-ईश्वर मानने वालों की मूढ़ता से उपजे उस ऐश्वर्य-जनित अभिमान के अंधकार को नष्ट कर दूँगा।'

श्लोक 17 (bhagavata.10.25.17)

न हि सद्भावयुक्तानां सुराणामीशविस्मयः । मत्तोऽसतां मानभङ्गः प्रशमायोपकल्पते ॥ 25.17 ॥

na hi sad-bhāva-yuktānāṁ surāṇām īśa-vismayaḥ matto ’satāṁ māna-bhaṅgaḥ praśamāyopakalpate

'वस्तुतः सद्भाव से युक्त देवताओं को स्वयं को ईश्वर मानने का मोह नहीं होना चाहिए। मेरे द्वारा उन असंतुलित देवताओं का मान-भंग किया जाना उनके ही कल्याण के लिए है।'

श्लोक 18 (bhagavata.10.25.18)

तस्मान्मच्छरणं गोष्ठं मन्नाथं मत्परिग्रहम् । गोपाये स्वात्मयोगेन सोऽयं मे व्रत आहितः ॥ 25.18 ॥

tasmān mac-charaṇaṁ goṣṭhaṁ man-nāthaṁ mat-parigraham gopāye svātma-yogena so ’yaṁ me vrata āhitaḥ

'अतः जो व्रज मेरी शरण में है, मुझे अपना स्वामी मानता है, और मेरा ही परिवार है, उसकी मैं अपनी योग-शक्ति से रक्षा करूँगा; यही मेरा व्रत है।'

श्लोक 19 (bhagavata.10.25.19)

इत्युक्त्वैकेन हस्तेन कृत्वा गोवर्धनाचलम् । दधार लीलया विष्णुश्छत्राकमिव बालकः ॥ 25.19 ॥

ity uktvaikena hastena kṛtvā govardhanācalam dadhāra līlayā viṣṇuś chatrākam iva bālakaḥ

यह कहकर, विष्णु ने एक ही हाथ से गोवर्धन पर्वत को उठाकर, उसे उसी सहजता से धारण किया, जैसे कोई बालक छत्राक (कुकुरमुत्ता) पकड़े।

श्लोक 20 (bhagavata.10.25.20)

अथाह भगवान् गोपान्हेऽम्ब तात व्रजौकसः । यथोपजोषं विशत गिरिगर्तं सगोधनाः ॥ 25.20 ॥

athāha bhagavān gopān he ’mba tāta vrajaukasaḥ yathopajoṣaṁ viśata giri-gartaṁ sa-go-dhanāḥ

तब भगवान गोपों से बोले — 'हे माता, हे पिता, हे व्रजवासियो! सुखपूर्वक अपनी गौओं सहित इस पर्वत की गुफा में प्रवेश करो।'

श्लोक 21 (bhagavata.10.25.21)

न त्रास इह वः कार्यो मद्धस्ताद्रिनिपातनात् । वातवर्षभयेनालं तत्त्राणं विहितं हि वः ॥ 25.21 ॥

na trāsa iha vaḥ kāryo mad-dhastādri-nipātanāt vāta-varṣa-bhayenālaṁ tat-trāṇaṁ vihitaṁ hi vaḥ

'तुम्हें यह भय नहीं करना चाहिए कि यह पर्वत मेरे हाथ से गिर जाएगा; और आँधी-वर्षा का भी भय मत करो, तुम्हारी रक्षा का प्रबंध पहले ही किया जा चुका है।'

श्लोक 22 (bhagavata.10.25.22)

तथा निर्विविशुर्गर्तं कृष्णाश्वासितमानसः । यथावकाशं सधनाः सव्रजाः सोपजीविनः ॥ 25.22 ॥

tathā nirviviśur gartaṁ kṛṣṇāśvāsita-mānasaḥ yathāvakāśaṁ sa-dhanāḥ sa-vrajāḥ sopajīvinaḥ

इस प्रकार कृष्ण द्वारा आश्वस्त होकर, वे सब अपने धन, अपनी गौओं और अपने आश्रितों सहित, यथास्थान उस गुफा में प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 23 (bhagavata.10.25.23)

क्षुत्तृड्व्यथां सुखापेक्षां हित्वा तैर्व्रजवासिभिः । वीक्ष्यमाणो दधाराद्रिं सप्ताहं नाचलत् पदात् ॥ 25.23 ॥

kṣut-tṛḍ-vyathāṁ sukhāpekṣāṁ hitvā tair vraja-vāsibhiḥ vīkṣyamāṇo dadhārādriṁ saptāhaṁ nācalat padāt

भूख-प्यास की पीड़ा तथा अपने सुख की चिंता को त्यागकर, व्रजवासियों के देखते-देखते, वे सात दिनों तक अपने स्थान से टस से मस हुए बिना उस पर्वत को धारण किए रहे।

श्लोक 24 (bhagavata.10.25.24)

कृष्णयोगानुभावं तं निशम्येन्द्रोऽतिविस्मितः । निस्तम्भो भ्रष्टसङ्कल्पः स्वान्मेघान् सन्न्यवारयत् ॥ 25.24 ॥

kṛṣṇa-yogānubhāvaṁ taṁ niśamyendro ’ti-vismitaḥ nistambho bhraṣṭa-saṅkalpaḥ svān meghān sannyavārayat

कृष्ण की इस योग-शक्ति के प्रभाव को देखकर इंद्र अत्यंत चकित हो गए; उनका दर्प चूर-चूर हो गया, संकल्प भंग हो गया, और उन्होंने अपने मेघों को रोक लिया।

श्लोक 25 (bhagavata.10.25.25)

खं व्यभ्रमुदितादित्यं वातवर्षं च दारुणम् । निशम्योपरतं गोपान् गोवर्धनधरोऽब्रवीत् ॥ 25.25 ॥

khaṁ vyabhram uditādityaṁ vāta-varṣaṁ ca dāruṇam niśamyoparataṁ gopān govardhana-dharo ’bravīt

आकाश को मेघरहित, सूर्य को उदित और भयंकर आँधी-वर्षा को शांत हुआ देखकर, गोवर्धनधारी भगवान गोपों से बोले।

श्लोक 26 (bhagavata.10.25.26)

निर्यात त्यजत त्रासं गोपाः सस्त्रीधनार्भकाः । उपारतं वातवर्षं व्युदप्रायाश्च निम्नगाः ॥ 25.26 ॥

niryāta tyajata trāsaṁ gopāḥ sa-strī-dhanārbhakāḥ upārataṁ vāta-varṣaṁ vyuda-prāyāś ca nimnagāḥ

'हे गोपो! अपनी पत्नियों, धन और बच्चों सहित बाहर आओ; भय त्यागो। आँधी-वर्षा थम चुकी है, और नदियाँ भी अपने तट में लौट आई हैं।'

श्लोक 27 (bhagavata.10.25.27)

ततस्ते निर्ययुर्गोपाः स्वं स्वमादाय गोधनम् । शकटोढोपकरणं स्त्रीबालस्थविराः शनैः ॥ 25.27 ॥

tatas te niryayur gopāḥ svaṁ svam ādāya go-dhanam śakaṭoḍhopakaraṇaṁ strī-bāla-sthavirāḥ śanaiḥ

तब गोप अपनी-अपनी गौओं और गाड़ियों में लदी सामग्री लेकर बाहर निकले; स्त्रियाँ, बच्चे और वृद्धजन धीरे-धीरे उनके पीछे चले।

श्लोक 28 (bhagavata.10.25.28)

भगवानपि तं शैलं स्वस्थाने पूर्ववत् प्रभुः । पश्यतां सर्वभूतानां स्थापयामास लीलया ॥ 25.28 ॥

bhagavān api taṁ śailaṁ sva-sthāne pūrva-vat prabhuḥ paśyatāṁ sarva-bhūtānāṁ sthāpayām āsa līlayā

भगवान ने, समस्त प्राणियों के देखते-देखते, उस पर्वत को सहजता से पूर्ववत् उसके ही स्थान पर स्थापित कर दिया।

श्लोक 29 (bhagavata.10.25.29)

तं प्रेमवेगान्निर्भृता व्रजौकसोयथा समीयुः परिरम्भणादिभिः । गोप्यश्च सस्नेहमपूजयन् मुदादध्यक्षताद्भिर्युयुजुः सदाशिषः ॥ 25.29 ॥

taṁ prema-vegān nirbhṛtā vrajaukaso yathā samīyuḥ parirambhaṇādibhiḥ gopyaś ca sa-sneham apūjayan mudā dadhy-akṣatādbhir yuyujuḥ sad-āśiṣaḥ

प्रेम के वेग से अभिभूत, व्रजवासी अपने-अपने ढंग से — कोई आलिंगन कर, कोई अन्य प्रकार से — उनके पास आए; और गोपियाँ स्नेहपूर्वक हर्ष से उनकी पूजा कर, दही और अक्षत अर्पित कर, शुभ आशीर्वाद देने लगीं।

श्लोक 30 (bhagavata.10.25.30)

यशोदा रोहिणी नन्दो रामश्च बलिनां वरः । कृष्णमालिङ्ग्य युयुजुराशिषः स्नेहकातराः ॥ 25.30 ॥

yaśodā rohiṇī nando rāmaś ca balināṁ varaḥ kṛṣṇam āliṅgya yuyujur āśiṣaḥ sneha-kātarāḥ

यशोदा, रोहिणी, नन्द तथा बलवानों में श्रेष्ठ राम — इन सबने कृष्ण का आलिंगन किया, और स्नेह से अभिभूत होकर उन्हें आशीर्वाद दिया।

श्लोक 31 (bhagavata.10.25.31)

दिवि देवगणाः सिद्धाः साध्या गन्धर्वचारणाः । तुष्टुवुर्मुमुचुस्तुष्टाः पुष्पवर्षाणि पार्थिव ॥ 25.31 ॥

divi deva-gaṇāḥ siddhāḥ sādhyā gandharva-cāraṇāḥ tuṣṭuvur mumucus tuṣṭāḥ puṣpa-varṣāṇi pārthiva

हे राजन्! स्वर्ग में देवगण, सिद्ध, साध्य, गंधर्व और चारण उनकी स्तुति करने लगे, और प्रसन्न होकर पुष्पों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 32 (bhagavata.10.25.32)

शङ्खदुन्दुभयो नेदुर्दिवि देवप्रचोदिताः । जगुर्गन्धर्वपतयस्तुम्बुरुप्रमुखा नृप ॥ 25.32 ॥

śaṅkha-dundubhayo nedur divi deva-pracoditāḥ jagur gandharva-patayas tumburu-pramukhā nṛpa

हे नृप! स्वर्ग में देवताओं की प्रेरणा से शंख और दुंदुभियाँ बज उठीं, और तुम्बुरु आदि गंधर्वपति गाने लगे।

श्लोक 33 (bhagavata.10.25.33)

ततोऽनुरक्तैः पशुपैः परिश्रितोराजन् स्वगोष्ठं सबलोऽव्रजद्धरिः । तथाविधान्यस्य कृतानि गोपिकागायन्त्य ईयुर्मुदिता हृदिस्पृशः ॥ 25.33 ॥

tato ’nuraktaiḥ paśupaiḥ pariśrito rājan sva-goṣṭhaṁ sa-balo ’vrajad dhariḥ tathā-vidhāny asya kṛtāni gopikā gāyantya īyur muditā hṛdi-spṛśaḥ

तत्पश्चात्, हे राजन्, अपने प्रिय गोप-सखाओं से घिरे, बलराम सहित हरि अपने ही गोष्ठ की ओर चल पड़े; और गोपियाँ उनके ऐसे कार्यों का गान करती हुई, आनंदित और हृदय से स्पर्शित होकर, अपने मार्ग पर चलती रहीं।

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