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दशम स्कन्ध · अध्याय 31

गोपियों के विरह-गीत

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (bhagavata.10.31.1)

गोप्य ऊचुः जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि । दयित दृश्यतां दिक्षु तावका- स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥ १ ॥

gopya ūcuḥ jayati te ’dhikaṁ janmanā vrajaḥ śrayata indirā śaśvad atra hi dayita dṛśyatāṁ dikṣu tāvakās tvayi dhṛtāsavas tvāṁ vicinvate

गोपियों ने कहा — हे प्रियतम! तुम्हारे जन्म मात्र से यह व्रज-भूमि परम गौरवशाली हो गई है, इसीलिए यहाँ इन्दिरा (लक्ष्मी) सदा निवास करती हैं। हे प्रिय, हमें किसी भी दिशा में दिखाई दो; तुम्हारे ही लिए हम अपने प्राणों को धारण किए हुए हैं और तुम्हें ही खोजती फिरती हैं।

श्लोक 2 (bhagavata.10.31.2)

शरदुदाशये साधुजातसत्- सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा । सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः ॥ २ ॥

śarad-udāśaye sādhu-jāta-sat- sarasijodara-śrī-muṣā dṛśā surata-nātha te ’śulka-dāsikā vara-da nighnato neha kiṁ vadhaḥ

हे प्रेम के स्वामी! तुम्हारी चितवन शरद ऋतु के सरोवर में उगे उत्तम कमल की भीतरी शोभा को भी मात करती है। हे वरदाता, हम तुम्हारी वे दासियाँ हैं जिन्होंने स्वयं को बिना किसी मूल्य के तुम्हें समर्पित कर दिया है; अब हमें त्यागकर तुम हमारा वध कर रहे हो — क्या यह हत्या नहीं है?

श्लोक 3 (bhagavata.10.31.3)

विषजलाप्ययाद् व्यालराक्षसाद् वर्षमारुताद् वैद्युतानलात् । वृषमयात्मजाद् विश्वतो भया- दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः ॥ ३ ॥

viṣa-jalāpyayād vyāla-rākṣasād varṣa-mārutād vaidyutānalāt vṛṣa-mayātmajād viśvato bhayād ṛṣabha te vayaṁ rakṣitā muhuḥ

हे पुरुषोत्तम! तुमने बार-बार हमारी रक्षा की है — विषैले जल से, भयंकर राक्षस से, प्रचण्ड वर्षा और आँधी से, बिजली की अग्नि से, वृषभ-दैत्य तथा मयपुत्र से — संसार के समस्त भयों से।

श्लोक 4 (bhagavata.10.31.4)

न खलु गोपीकानन्दनो भवान् अखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् । विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले ॥ ४ ॥

na khalu gopīkā-nandano bhavān akhila-dehinām antarātma-dṛk vikhanasārthito viśva-guptaye sakha udeyivān sātvatāṁ kule

तुम वास्तव में केवल गोपी के पुत्र नहीं हो, अपितु समस्त देहधारियों के हृदय में बसने वाले अन्तर्यामी हो। विश्व की रक्षा के लिए ब्रह्मा की प्रार्थना पर, हे सखा, तुम सात्वत (यदुवंश) कुल में अवतरित हुए हो।

श्लोक 5 (bhagavata.10.31.5)

विरचिताभयं वृष्णिधूर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात् । करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम् ॥ ५ ॥

viracitābhayaṁ vṛṣṇi-dhūrya te caraṇam īyuṣāṁ saṁsṛter bhayāt kara-saroruhaṁ kānta kāma-daṁ śirasi dhehi naḥ śrī-kara-graham

हे वृष्णिवंश-श्रेष्ठ! जो लोग संसार-बन्धन के भय से तुम्हारे चरणों की शरण लेते हैं, उन्हें तुम्हारे चरण अभय प्रदान करते हैं। हे प्रिय, अपने उस कमल-सम हाथ को, जो लक्ष्मी का हाथ थामे रहता है और समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है, हमारे सिर पर रख दो।

श्लोक 6 (bhagavata.10.31.6)

व्रजजनार्तिहन् वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित । भज सखे भवत्किङ्करीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय ॥ ६ ॥

vraja-janārti-han vīra yoṣitāṁ nija-jana-smaya-dhvaṁsana-smita bhaja sakhe bhavat-kiṅkarīḥ sma no jalaruhānanaṁ cāru darśaya

हे व्रजवासियों के दुःख को हरने वाले, हे नारियों के वीर! तुम्हारी मुस्कान अपने ही भक्तों का अभिमान चूर कर देती है। हे सखा, हमें अपनी दासी के रूप में स्वीकार करो और अपना सुन्दर कमल-मुख हमें दिखाओ।

श्लोक 7 (bhagavata.10.31.7)

प्रणतदेहिनां पापकर्षणं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम् । फणिफणार्पितं ते पदाम्बुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम् ॥ ७ ॥

praṇata-dehināṁ pāpa-karṣaṇaṁ tṛṇa-carānugaṁ śrī-niketanam phaṇi-phaṇārpitaṁ te padāmbujaṁ kṛṇu kuceṣu naḥ kṛndhi hṛc-chayam

तुम्हारे चरण-कमल शरणागत जीवों के पापों का नाश करते हैं; वे गौओं के पीछे चरागाह में विचरते हैं और लक्ष्मी के निवास-स्थान हैं; वही चरण तुमने कालिय नाग के फणों पर रखे थे — अब उन्हें हमारे वक्षस्थल पर रखो और हमारे हृदय की काम-वासना को काट डालो।

श्लोक 8 (bhagavata.10.31.8)

मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण । विधिकरीरिमा वीर मुह्यतीर् अधरसीधुनाप्याययस्व नः ॥ ८ ॥

madhurayā girā valgu-vākyayā budha-manojñayā puṣkarekṣaṇa vidhi-karīr imā vīra muhyatīr adhara-sīdhunāpyāyayasva naḥ

हे कमल-नयन! तुम्हारी मधुर वाणी और मनोहर वचन ज्ञानीजनों को भी लुभा लेते हैं; हम तुम्हारी दासियाँ मोहित हो चुकी हैं — अपने अधरों के अमृत से हमें पुनर्जीवित करो।

श्लोक 9 (bhagavata.10.31.9)

तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम् । श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ये भूरिदा जनाः ॥ ९ ॥

tava kathāmṛtaṁ tapta-jīvanaṁ kavibhir īḍitaṁ kalmaṣāpaham śravaṇa-maṅgalaṁ śrīmad ātataṁ bhuvi gṛṇanti ye bhūri-dā janāḥ

तुम्हारी कथा का अमृत संसार-ताप से जलते हुए प्राणियों के लिए जीवन के समान है; इसे मुनिजन सराहते हैं, यह पापों को धो डालती है, इसका श्रवण मंगलकारी है और यह ऐश्वर्य से युक्त होकर सारी पृथ्वी में फैली हुई है। जो लोग इसका गान करते हैं, वे ही सबसे बड़े दानी हैं।

श्लोक 10 (bhagavata.10.31.10)

प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम् । रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ॥ १० ॥

prahasitaṁ priya-prema-vīkṣaṇaṁ viharaṇaṁ ca te dhyāna-maṅgalam rahasi saṁvido yā hṛdi spṛśaḥ kuhaka no manaḥ kṣobhayanti hi

तुम्हारी मुस्कान, प्रेमभरी चितवन, तुम्हारी लीलाएँ जो ध्यान करने योग्य और मंगलकारी हैं, तथा एकांत में हुई वे हृदयस्पर्शी बातें — हे छलिया, ये सब हमारे मन को व्याकुल कर देती हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.10.31.11)

चलसि यद् व्रजाच्चारयन् पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम् । शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति ॥ ११ ॥

calasi yad vrajāc cārayan paśūn nalina-sundaraṁ nātha te padam śila-tṛṇāṅkuraiḥ sīdatīti naḥ kalilatāṁ manaḥ kānta gacchati

हे स्वामी, जब तुम गौएँ चराने के लिए व्रज से बाहर जाते हो, तो यह सोचकर हमारा मन व्याकुल हो जाता है कि तुम्हारे कमल से भी सुकुमार चरण पत्थरों, नुकीली घास और अंकुरों से आहत हो जाएँगे।

श्लोक 12 (bhagavata.10.31.12)

दिनपरिक्षये नीलकुन्तलै- र्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम् । घनरजस्वलं दर्शयन् मुहु- र्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि ॥ १२ ॥

dina-parikṣaye nīla-kuntalair vanaruhānanaṁ bibhrad āvṛtam ghana-rajasvalaṁ darśayan muhur manasi naḥ smaraṁ vīra yacchasi

दिन के अन्त में, जब तुम अपने नीले घुँघराले केशों से घिरे और धूल से आच्छादित कमल-मुख को हमें दिखाते हो, तो हे वीर, तुम बार-बार हमारे मन में काम-भाव जगा देते हो।

श्लोक 13 (bhagavata.10.31.13)

प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि । चरणपङ्कजं शन्तमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥ १३ ॥

praṇata-kāma-daṁ padmajārcitaṁ dharaṇi-maṇḍanaṁ dhyeyam āpadi caraṇa-paṅkajaṁ śantamaṁ ca te ramaṇa naḥ staneṣv arpayādhi-han

तुम्हारे चरण-कमल, जिनकी पूजा स्वयं ब्रह्मा करते हैं, शरणागतों की कामनाएँ पूर्ण करते हैं; वे पृथ्वी के आभूषण हैं, परम शान्ति देने वाले हैं, और विपत्ति में ध्यान करने योग्य हैं। हे प्रियतम, हे व्यथा-नाशक, उन्हें हमारे वक्षस्थल पर रख दो।

श्लोक 14 (bhagavata.10.31.14)

सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम् । इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥ १४ ॥

surata-vardhanaṁ śoka-nāśanaṁ svarita-veṇunā suṣṭhu cumbitam itara-rāga-vismāraṇaṁ nṛṇāṁ vitara vīra nas te ’dharāmṛtam

हे वीर, हमें अपने अधरों का वह अमृत प्रदान करो, जो मिलन के सुख को बढ़ाता है, शोक का नाश करता है, तुम्हारी झंकृत बाँसुरी द्वारा पूर्णतः चूमा गया है, और लोगों को अन्य समस्त आसक्तियाँ भुला देता है।

श्लोक 15 (bhagavata.10.31.15)

अटति यद् भवानह्नि काननं त्रुटि युगायते त्वामपश्यताम् । कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम् ॥ १५ ॥

aṭati yad bhavān ahni kānanaṁ truṭi yugāyate tvām apaśyatām kuṭila-kuntalaṁ śrī-mukhaṁ ca te jaḍa udīkṣatāṁ pakṣma-kṛd dṛśām

जब तुम दिन में वन में विचरने चले जाते हो, तो तुम्हें न देख पाने से एक क्षण भी हमें एक युग जैसा प्रतीत होता है। और जब हम उत्कण्ठा से तुम्हारे घुँघराले केशों से सुशोभित मुखमण्डल को निहारती हैं, तब भी उस मूर्ख विधाता की बनाई हुई पलकें हमारे दर्शन में बाधा डालती हैं।

श्लोक 16 (bhagavata.10.31.16)

पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवा- नतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः । गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥ १६ ॥

pati-sutānvaya-bhrātṛ-bāndhavān ativilaṅghya te ’nty acyutāgatāḥ gati-vidas tavodgīta-mohitāḥ kitava yoṣitaḥ kas tyajen niśi

हे अच्युत, तुम भली-भाँति जानते हो कि हम क्यों आई हैं — पतियों, पुत्रों, पूर्वजों, भाइयों और बन्धु-बान्धवों को पूरी तरह त्यागकर, तुम्हारी बाँसुरी की ऊँची तान से मोहित होकर तुम्हारे पास आई हैं। हे छलिया, तुम्हारे सिवा और कौन रात्रि में अपने पास आई स्त्रियों को यों त्याग देगा?

श्लोक 17 (bhagavata.10.31.17)

रहसि संविदं हृच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम् । बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः ॥ १७ ॥

rahasi saṁvidaṁ hṛc-chayodayaṁ prahasitānanaṁ prema-vīkṣaṇam bṛhad-uraḥ śriyo vīkṣya dhāma te muhur ati-spṛhā muhyate manaḥ

उन गुप्त वार्तालापों का स्मरण करके, जिन्होंने हमारे हृदय में काम-भाव जगाया, तुम्हारे मुस्कुराते मुख और प्रेम भरी चितवन को याद करके, तथा लक्ष्मी के निवास-स्वरूप तुम्हारे विशाल वक्षस्थल को देखकर, हमारा मन बार-बार तीव्र लालसा से मोहित हो जाता है।

श्लोक 18 (bhagavata.10.31.18)

व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम् । त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम् ॥ १८ ॥

vraja-vanaukasāṁ vyaktir aṅga te vṛjina-hantry alaṁ viśva-maṅgalam tyaja manāk ca nas tvat-spṛhātmanāṁ sva-jana-hṛd-rujāṁ yan niṣūdanam

हे प्रिय! तुम्हारा दर्शन-मात्र व्रज के वनवासियों का दुःख हरने वाला और सम्पूर्ण विश्व का कल्याण करने वाला है। तुम्हारी लालसा से व्याकुल हम पर थोड़ी कृपा करो, क्योंकि तुम्ही अपने भक्तों के हृदय-रोग की एकमात्र औषधि हो।

श्लोक 19 (bhagavata.10.31.19)

यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु । तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥ १९ ॥

yat te sujāta-caraṇāmburuhaṁ staneṣu bhītāḥ śanaiḥ priya dadhīmahi karkaśeṣu tenāṭavīm aṭasi tad vyathate na kiṁ svit kūrpādibhir bhramati dhīr bhavad-āyuṣāṁ naḥ

हे प्रिय, तुम्हारे अत्यन्त कोमल चरण-कमलों को हम अपने कठोर वक्षस्थल पर भी डरते-डरते धीरे से रखती हैं, कहीं वे आहत न हो जाएँ — फिर भी उन्हीं चरणों से तुम वन में विचरते हो। क्या इससे तुम्हें पीड़ा नहीं होती? हमारा मन, जिसका जीवन ही तुम हो, इस चिन्ता से व्याकुल रहता है कि कहीं कंकड़-पत्थर तुम्हारे कोमल चरणों को घायल न कर दें।

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