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दशम स्कन्ध · अध्याय 35

वन में विचरण करते श्रीकृष्ण का गोपियों द्वारा गुणगान

अध्याय 34अध्याय-सूचीअध्याय 36

श्लोक 1 (bhagavata.10.35.1)

श्रीशुक उवाच गोप्यः कृष्णे वनं याते तमनुद्रुतचेतसः । कृष्णलीलाः प्रगायन्त्यो निन्युर्दुःखेन वासरान् ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca gopyaḥ kṛṣṇe vanaṁ yāte tam anudruta-cetasaḥ kṛṣṇa-līlāḥ pragāyantyo ninyur duḥkhena vāsarān

शुकदेव जी ने कहा — जब कृष्ण वन को चले जाते, तो गोपियों का मन उनके पीछे-पीछे दौड़ता रहता; वे उनकी लीलाओं का गान करती हुई अपने दिन दुःखपूर्वक बिताती थीं।

श्लोक 2 (bhagavata.10.35.2)

श्रीगोप्य ऊचुः वामबाहुकृतवामकपोलो वल्गितभ्रुरधरार्पितवेणुम् । कोमलाङ्गुलिभिराश्रितमार्गं गोप्य ईरयति यत्र मुकुन्दः ॥ २ ॥

śrī-gopya ūcuḥ vāma-bāhu-kṛta-vāma-kapolo valgita-bhrur adharārpita-veṇum komalāṅgulibhir āśrita-mārgaṁ gopya īrayati yatra mukundaḥ

गोपियों ने कहा — हे सखियो, देखो तो, मुकुन्द अपने बाएँ गाल को बाईं भुजा पर टिकाकर, भौंहों को नचाते हुए, अपने अधरों पर रखी बाँसुरी को कोमल अंगुलियों से उसके छिद्रों पर थामकर बजाते हैं।

श्लोक 3 (bhagavata.10.35.3)

व्योमयानवनिताः सह सिद्धै- र्विस्मितास्तदुपधार्य सलज्जाः । काममार्गणसमर्पितचित्ताः कश्मलं ययुरपस्मृतनीव्यः ॥ ३ ॥

vyoma-yāna-vanitāḥ saha siddhair vismitās tad upadhārya sa-lajjāḥ kāma-mārgaṇa-samarpita-cittāḥ kaśmalaṁ yayur apasmṛta-nīvyaḥ

उस बाँसुरी की ध्वनि सुनकर अपने पतियों सिद्धों के साथ आकाश में विचरण करने वाली देवियाँ चकित रह जाती हैं; लज्जित होकर वे पाती हैं कि उनका मन काम की खोज में समर्पित हो चुका है, और इस व्याकुलता में उन्हें अपने वस्त्रों की करधनी के खुल जाने का भी भान नहीं रहता।

श्लोक 4 (bhagavata.10.35.4)

हन्त चित्रमबलाः शृणुतेदं हारहास उरसि स्थिरविद्युत् । नन्दसूनुरयमार्तजनानां नर्मदो यर्हि कूजितवेणुः ॥ ४ ॥

hanta citram abalāḥ śṛṇutedaṁ hāra-hāsa urasi sthira-vidyun nanda-sūnur ayam ārta-janānāṁ narma-do yarhi kūjita-veṇuḥ

अरी सखियो, यह अद्भुत बात सुनो — यह नन्द-नन्दन, जिनकी मुस्कान हार के समान चमकती है और जिनके वक्षस्थल पर मानो स्थिर बिजली दमकती है, जब भी उनकी बाँसुरी की ध्वनि उठती है, तब दुःखी जनों को आनन्द प्रदान करते हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.10.35.5)

वृन्दशो व्रजवृषा मृगगावो वेणुवाद्यहृतचेतस आरात् । दन्तदष्टकवला धृतकर्णा निद्रिता लिखितचित्रमिवासन् ॥ ५ ॥

vṛndaśo vraja-vṛṣā mṛga-gāvo veṇu-vādya-hṛta-cetasa ārāt danta-daṣṭa-kavalā dhṛta-karṇā nidritā likhita-citram ivāsan

उस ध्वनि को सुनकर दूर-दूर तक झुंडों में खड़े व्रज के बैल, हिरण और गौएँ अपना मन खो बैठते हैं; वे मुँह में भोजन का ग्रास दबाए, कान उठाए हुए, ऐसे स्थिर हो जाते हैं मानो सो रहे हों या किसी चित्र में अंकित हों।

श्लोक 6 (bhagavata.10.35.6)

बर्हिणस्तबकधातुपलाशै- र्बद्धमल्लपरिबर्हविडम्बः । कर्हिचित् सबल आलि स गोपै- र्गाः समाह्वयति यत्र मुकुन्दः ॥ ६ ॥

barhiṇa-stabaka-dhātu-palāśair baddha-malla-paribarha-viḍambaḥ karhicit sa-bala āli sa gopair gāḥ samāhvayati yatra mukundaḥ

हे सखी, कभी-कभी मयूर-पंखों के गुच्छों, रंगीन खनिज-द्रव्यों और पत्तों से पहलवान के वेश की नकल करते हुए, वे बलराम तथा गोपबालकों के साथ बाँसुरी बजाते हुए गौओं को पुकारते हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.10.35.7)

तर्हि भग्नगतयः सरितो वै तत्पदाम्बुजरजोऽनिलनीतम् । स्पृहयतीर्वयमिवाबहुपुण्याः प्रेमवेपितभुजाः स्तिमितापः ॥ ७ ॥

tarhi bhagna-gatayaḥ sarito vai tat-padāmbuja-rajo ’nila-nītam spṛhayatīr vayam ivābahu-puṇyāḥ prema-vepita-bhujāḥ stimitāpaḥ

उस ध्वनि को सुनकर नदियाँ भी, हमारी ही भाँति अल्प-पुण्य होकर, वायु द्वारा लाई गई उनके चरण-कमलों की रज की लालसा में अपना प्रवाह रोक देती हैं; उनकी लहरें प्रेम से काँपने लगती हैं और उनका जल थम जाता है।

श्लोक 8 (bhagavata.10.35.8)

अनुचरैः समनुवर्णितवीर्य आदिपूरुष इवाचलभूतिः । वनचरो गिरितटेषु चरन्ती- र्वेणुनाह्वयति गाः स यदा हि ॥ ८ ॥

anucaraiḥ samanuvarṇita-vīrya ādi-pūruṣa ivācala-bhūtiḥ vana-caro giri-taṭeṣu carantīr veṇunāhvayati gāḥ sa yadā hi

अपने सखाओं द्वारा जिनके पराक्रम का बखान किया जाता है, वे आदिपुरुष के समान अचल वैभव से युक्त होकर वन में विचरते हुए, पर्वत-ढलानों पर चरती गौओं को अपनी बाँसुरी से पुकारते हैं।

श्लोक 9 (bhagavata.10.35.9)

वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः । प्रणतभारविटपा मधुधाराः प्रेमहृष्टतनवो ववृषुः स्म ॥ ९ ॥

vana-latās tarava ātmani viṣṇuṁ vyañjayantya iva puṣpa-phalāḍhyāḥ praṇata-bhāra-viṭapā madhu-dhārāḥ prema-hṛṣṭa-tanavo vavṛṣuḥ sma

उस पुकार को सुनकर वन की लताएँ और वृक्ष, मानो अपने भीतर विष्णु को ही प्रकट कर रहे हों, फल-फूलों से समृद्ध हो उठते हैं; उनकी शाखाएँ भार से झुक जाती हैं, उनके तनों के रोम प्रेम से खड़े हो जाते हैं, और वे मधु की धाराएँ बहाने लगते हैं।

श्लोक 10 (bhagavata.10.35.10)

दर्शनीयतिलको वनमाला- दिव्यगन्धतुलसीमधुमत्तैः । अलिकुलैरलघुगीतामभीष्ट- माद्रियन् यर्हि सन्धितवेणुः ॥ १० ॥

darśanīya-tilako vana-mālā- divya-gandha-tulasī-madhu-mattaiḥ ali-kulair alaghu gītām abhīṣṭa- m ādriyan yarhi sandhita-veṇuḥ

वह सर्वसुन्दर, अपनी वनमाला की तुलसी की दिव्य सुगन्ध से मतवाले भ्रमर-समूहों के प्रिय उच्च गान का आदर करते हुए, फिर अपनी बाँसुरी अधरों पर रख लेते हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.10.35.11)

सरसि सारसहंसविहङ्गा- श्चारुगीताहृतचेतस एत्य । हरिमुपासत ते यतचित्ता हन्त मीलितदृशो धृतमौनाः ॥ ११ ॥

sarasi sārasa-haṁsa-vihaṅgāś cāru-gītā-hṛta-cetasa etya harim upāsata te yata-cittā hanta mīlita-dṛśo dhṛta-maunāḥ

उस मधुर धुन को सुनकर सरोवर के सारस, हंस और अन्य पक्षी अपना मन खो बैठते हैं; वे आगे आकर हरि की उपासना करने लगते हैं, उनका चित्त संयत हो जाता है, नेत्र मुँद जाते हैं, और वे मौन धारण कर लेते हैं।

श्लोक 12 (bhagavata.10.35.12)

सहबलः स्रगवतंसविलासः सानुषु क्षितिभृतो व्रजदेव्यः । हर्षयन् यर्हि वेणुरवेण जातहर्ष उपरम्भति विश्वम् ॥ १२ ॥

saha-balaḥ srag-avataṁsa-vilāsaḥ sānuṣu kṣiti-bhṛto vraja-devyaḥ harṣayan yarhi veṇu-raveṇa jāta-harṣa uparambhati viśvam

हे व्रज-देवियो, जब वे बलराम के साथ पर्वत की ढलानों पर क्रीड़ामय पुष्प-मुकुट धारण किए हुए क्रीड़ा करते हैं, तो अपनी बाँसुरी की ध्वनि से सबको आनन्दित करते हैं और स्वयं भी हर्षित होकर सम्पूर्ण विश्व को आनन्दित कर देते हैं।

श्लोक 13 (bhagavata.10.35.13)

महदतिक्रमणशङ्कितचेता मन्दमन्दमनुगर्जति मेघः । सुहृदमभ्यवर्षत् सुमनोभि- श्छायया च विदधत् प्रतपत्रम् ॥ १३ ॥

mahad-atikramaṇa-śaṅkita-cetā manda-mandam anugarjati meghaḥ suhṛdam abhyavarṣat sumanobhiś chāyayā ca vidadhat pratapatram

उस समय बादल भी किसी महान् पुरुष का अपराध करने के भय से चित्त में शंकित होकर अत्यन्त धीमे स्वर में उनके साथ गर्जना करता है, अपने मित्र पर पुष्पों की वर्षा करता है और अपनी छाया से उन पर छत्र तान देता है।

श्लोक 14 (bhagavata.10.35.14)

विविधगोपचरणेषु विदग्धो वेणुवाद्य उरुधा निजशिक्षाः । तव सुतः सति यदाधरबिम्बे दत्तवेणुरनयत् स्वरजातीः ॥ १४ ॥

vividha-gopa-caraṇeṣu vidagdho veṇu-vādya urudhā nija-śikṣāḥ tava sutaḥ sati yadādhara-bimbe datta-veṇur anayat svara-jātīḥ

हे सती (यशोदे), तुम्हारा पुत्र गोचारण की समस्त कलाओं में निपुण है और अपनी ही नई शैलियों से बाँसुरी बजाने में प्रवीण है; जब वह बिम्बफल-सी लाल अपनी अधरों पर बाँसुरी रखता है, तो विविध स्वर-लहरियाँ प्रवाहित होने लगती हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.10.35.15)

सवनशस्तदुपधार्य सुरेशाः शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः । कवय आनतकन्धरचित्ताः कश्मलं ययुरनिश्चिततत्त्वाः ॥ १५ ॥

savanaśas tad upadhārya sureśāḥ śakra-śarva-parameṣṭhi-purogāḥ kavaya ānata-kandhara-cittāḥ kaśmalaṁ yayur aniścita-tattvāḥ

उस ध्वनि को सुनकर इन्द्र, शिव, ब्रह्मा आदि प्रमुख देवगण तथा मुनिगण भी अपने सिर और हृदय झुका देते हैं, और उसका मर्म न समझ पाने के कारण मोहित हो जाते हैं।

श्लोक 16 (bhagavata.10.35.16)

निजपदाब्जदलैर्ध्वजवज्र- नीरजाङ्कुशविचित्रललामैः । व्रजभुवः शमयन् खुरतोदं वर्ष्मधुर्यगतिरीडितवेणुः ॥ १६ ॥

nija-padābja-dalair dhvaja-vajra nīrajāṅkuśa-vicitra-lalāmaiḥ vraja-bhuvaḥ śamayan khura-todaṁ varṣma-dhurya-gatir īḍita-veṇuḥ

व्रज में विचरते हुए, ध्वजा, वज्र, कमल और अंकुश के चिह्नों से अंकित अपने कमल-दल सम चरणों से गौओं के तीखे खुरों से पीड़ित भूमि की व्यथा को शान्त करते हुए, गजराज-सी मन्थर गति से चलते हुए, अपनी प्रसिद्ध बाँसुरी बजाते हुए, वे हमारे निकट से गुजरते हैं।

श्लोक 17 (bhagavata.10.35.17)

व्रजति तेन वयं सविलास- वीक्षणार्पितमनोभववेगाः । कुजगतिं गमिता न विदामः कश्मलेन कवरं वसनं वा ॥ १७ ॥

vrajati tena vayaṁ sa-vilāsa vīkṣaṇārpita-manobhava-vegāḥ kuja-gatiṁ gamitā na vidāmaḥ kaśmalena kavaraṁ vasanaṁ vā

जब वे इस प्रकार हमारे पास से गुजरते हैं, तो उनकी क्रीड़ामय चितवन से उठी काम-वेदना से हमारा हृदय व्याकुल हो जाता है, और हम वृक्षों की भाँति निश्चल खड़ी रह जाती हैं, इस मोह में यह भी भान नहीं रहता कि हमारी वेणी और वस्त्र ढीले पड़ गए हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.10.35.18)

मणिधरः क्वचिदागणयन् गा मालया दयितगन्धतुलस्याः । प्रणयिनोऽनुचरस्य कदांसे प्रक्षिपन् भुजमगायत यत्र ॥ १८ ॥

maṇi-dharaḥ kvacid āgaṇayan gā mālayā dayita-gandha-tulasyāḥ praṇayino ’nucarasya kadāṁse prakṣipan bhujam agāyata yatra

कहीं मणियों की माला हाथ में लिए गौएँ गिनते हुए, अपनी प्रियतमा तुलसी की सुगन्ध वाली माला पहने, कभी किसी प्रेमी सखा के कन्धे पर भुजा डाले हुए वे गाने लगते हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.10.35.19)

क्वणितवेणुरववञ्चितचित्ताः कृष्णमन्वसत कृष्णगृहिण्यः । गुणगणार्णमनुगत्य हरिण्यो गोपिका इव विमुक्तगृहाशाः ॥ १९ ॥

kvaṇita-veṇu-rava-vañcita-cittāḥ kṛṣṇam anvasata kṛṣṇa-gṛhiṇyaḥ guṇa-gaṇārṇam anugatya hariṇyo gopikā iva vimukta-gṛhāśāḥ

उनकी झंकृत बाँसुरी की ध्वनि सुनकर कृष्णमृगों (काले हिरणों) की पत्नियाँ भी मन खो बैठती हैं; वे उस गुणों के सागर कृष्ण के निकट आकर उनके पास बैठ जाती हैं, ठीक वैसे ही जैसे हम गोपियों ने भी अपने घर-गृहस्थी की सारी आशा त्याग दी है।

श्लोक 20 (bhagavata.10.35.20)

कुन्ददामकृतकौतुकवेषो गोपगोधनवृतो यमुनायाम् । नन्दसूनुरनघे तव वत्सो नर्मदः प्रणयिणां विजहार ॥ २० ॥

kunda-dāma-kṛta-kautuka-veṣo gopa-godhana-vṛto yamunāyām nanda-sūnur anaghe tava vatso narma-daḥ praṇayiṇāṁ vijahāra

हे निष्पाप यशोदे, तुम्हारा पुत्र, नन्दनन्दन, चमेली की माला से क्रीड़ामय रूप से सुसज्जित होकर, गोपबालकों और गौओं से घिरा हुआ, यमुना के तट पर अपने प्रिय सखाओं को आनन्दित करते हुए क्रीड़ा कर रहा है।

श्लोक 21 (bhagavata.10.35.21)

मन्दवायुरुपवात्यनुकूलं मानयन् मलयजस्पर्शेन । वन्दिनस्तमुपदेवगणा ये वाद्यगीतबलिभिः परिवव्रुः ॥ २१ ॥

manda-vāyur upavāty anukūlaṁ mānayan malaya-ja-sparśena vandinas tam upadeva-gaṇā ye vādya-gīta-balibhiḥ parivavruḥ

मन्द समीर अनुकूल होकर बहती हुई चन्दन की सुगन्ध से उसका सम्मान कर रही है, और उपदेव-गण राजसभा के भाटों की भाँति वाद्य, गान तथा भेंटों से उसे घेरे हुए हैं।

श्लोक 22 (bhagavata.10.35.22)

वत्सलो व्रजगवां यदगध्रो वन्द्यमानचरणः पथि वृद्धैः । कृत्स्नगोधनमुपोह्य दिनान्ते गीतवेणुरनुगेडितकीर्तिः ॥ २२ ॥

vatsalo vraja-gavāṁ yad aga-dhro vandyamāna-caraṇaḥ pathi vṛddhaiḥ kṛtsna-go-dhanam upohya dinānte gīta-veṇur anugeḍita-kīrtiḥ

व्रज की गौओं के प्रति इतने वत्सल कि उन्होंने गोवर्धन पर्वत उठा लिया, मार्ग में वृद्धजनों द्वारा जिनके चरण पूजे जाते हैं, वे दिन के अन्त में सम्पूर्ण गोधन को एकत्र करके बाँसुरी बजाते हैं, और उनके सखा उनकी कीर्ति का गान करते हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.10.35.23)

उत्सवं श्रमरुचापि दृशीना- मुन्नयन् खुररजश्छुरितस्रक् । दित्सयैति सुहृदासिष एष देवकीजठरभूरुडुराजः ॥ २३ ॥

utsavaṁ śrama-rucāpi dṛśīnām unnayan khura-rajaś-churita-srak ditsayaiti suhṛd-āsiṣa eṣa devakī-jaṭhara-bhūr uḍu-rājaḥ

अपनी थकान की आभा से भी नेत्रों के लिए मानो उत्सव रचते हुए, गौओं के खुरों से उड़ी धूल से धूसरित माला धारण किए हुए, अपने सखाओं की कामनाएँ पूर्ण करने को उत्सुक, यह देवकी के गर्भ से उदित चन्द्रमा निकट आ रहा है।

श्लोक 24 (bhagavata.10.35.24)

मदविघूर्णितलोचन ईषत्- मानदः स्वसुहृदां वनमाली । बदरपाण्डुवदनो मृदुगण्डं मण्डयन् कनककुण्डललक्ष्म्या ॥ २४ ॥

mada-vighūrṇita-locana īṣat māna-daḥ sva-suhṛdāṁ vana-mālī badara-pāṇḍu-vadano mṛdu-gaṇḍaṁ maṇḍayan kanaka-kuṇḍala-lakṣmyā

मानो मद से कुछ-कुछ घूमती हुई आँखों के साथ, वे अपने हितैषी सखाओं का कोमलता से सम्मान करते हैं; वनमाला धारण किए, बेर के फल-सा पीला मुख लिए, स्वर्ण-कुण्डलों की शोभा से उनके कोमल कपोल सुशोभित हैं।

श्लोक 25 (bhagavata.10.35.25)

यदुपतिर्द्विरदराजविहारो यामिनीपतिरिवैष दिनान्ते । मुदितवक्त्र उपयाति दुरन्तं मोचयन् व्रजगवां दिनतापम् ॥ २५ ॥

yadu-patir dvirada-rāja-vihāro yāminī-patir ivaiṣa dinānte mudita-vaktra upayāti durantaṁ mocayan vraja-gavāṁ dina-tāpam

यह यदुपति, गजराज-सी शोभायुक्त चाल से चलते हुए, दिन के अन्त में मानो रात्रि के स्वामी चन्द्रमा हों, प्रसन्न मुख लिए निकट आ रहे हैं, व्रज की गौओं को दिन की असह्य उष्णता से मुक्त कराते हुए।

श्लोक 26 (bhagavata.10.35.26)

श्रीशुक उवाच एवं व्रजस्त्रियो राजन् कृष्णलीलानुगायतीः । रेमिरेऽहःसु तच्चित्तास्तन्मनस्का महोदयाः ॥ २६ ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ vraja-striyo rājan kṛṣṇa-līlānugāyatīḥ remire ’haḥsu tac-cittās tan-manaskā mahodayāḥ

शुकदेव जी ने कहा — हे राजन्! इस प्रकार व्रज की स्त्रियाँ निरन्तर कृष्ण की लीलाओं का गान करती हुईं, उनके चित्त और मन में तल्लीन होकर, अपने दिन महान् उत्सव के आनन्द में व्यतीत करती थीं।

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